गुरुद्वारा बोर्ड की मीटिंग नांदेड़ में लेने के लिए बारह सदस्योंने मांग की
तारासिंह मुंबई पर क्यों है अड़ा?
हजूर साहिब के सभी सिख जरूर पढ़िए और शेयर कीजिये
रविंदर सिंघ मोदी
- हजूरसाहिब, नांदेड़ -
हजूरी साध संगत की मांग पर हजूर साहेब की सभी निवासी गुरुद्वारा बोर्ड मेंबर साहिबान ने बोर्ड की ता. २८ जुलाई, २०१८ की मीटिंग नांदेड़ में लेने की लिखित मांग की हैं. मीत प्रधान सरदार भूपिंदर सिंह मिन्हास, मुंबई के गुरिंदर सिंह बावा, भोपाल के गुरदीप सिंह भाटिया ने साध संगत की मांग का सन्मान किया हैं. साथ ही हमारे लोकल मेंबर साहिबान में भागिन्दर सिंह घड़ीसाज (;सचिव), अमरीकसिंह वासरीकर (सभापति), सरजीत सिंह गिल (सभापति), राजिंदर सिंह पुजारी (सभापति), सुरिंदर सिंघ, शेरसिंघ फौजी, रणजीत सिंह कामठेकर, परमज्योत सिंह चाहल, गुरमीत सिंह महाजन ने लिखित रूप से मांग की हैं की गुरुद्वारा बोर्ड की मीटिंग नांदेड़ में आयोजित की जाये. सभी बोर्ड मेंबर साहिबान का जाहिर आभार और धन्यवाद।
तखत सचखंड श्री हजूर अबचल नगर साहिब मंडल (बोर्ड) का मुख्यालय हजूर साहिब नांदेड़ में है. इसलिए जाहिर है कि बोर्ड की बैठक भी नांदेड़ में ही होनी चाहिए. यह बात भी क्या नांदेड़ के गुरु के वफ़ादार सिखों को समझाने की जरुरत हैं ? हमारे सभी स्थानीय सदस्य जो गुरु घर के सेवक हैं और संगत की सेवा और गुरु की भक्ति को सर्वपरिय मानते हैं क्या वे गुरुघर के पैसों से सैरसपाटा करने की मंशा रखते हैं? फिर तारासिंह हर मीटिंग मुंबई में रखकर गुरु घर की गुल्लक से इतना पैसा क्यों खर्च करवाता है?
मुंबई में मीटिंग के लिए केवल सदस्य ही जाते हैं ऐसा नहीं है. गुरुद्वारा के अधिकारी और कर्मचारियों को भी दो से तीन दिनों के लिए मुंबई जाना पड़ता हैं. मेंबर साहिबान के एयर टिकिट, रेलवे टिकिट, लॉज और भोजन का खर्च, कर्मचारियों का टी.ऐ. और डी. ए. और रहने का खर्च और समय सभी का नियोजन करना पड़ता हैं. चार से पांच लाख का खर्च गुरु घर पर पड़ता है. केवल तारा सिंह की तानाशाही भरे फैसले के लिए. क्या इसे गुरु घर का सेवक कहना चाहिए? यदि तारासिंह को नांदेड़ आना पसंद नहीं है तो गुरुद्वारा बोर्ड का अध्यक्ष पद छोड़ दे.
एक्ट संशोधन करवाकर इसने गुरुद्वारा बोर्ड का सरकारीकरण लगभग करवा दिया हैं अब पता नहीं कब इसका अधिग्रहण भी सरकार से करवा दे? इतना सब करने के बाद भी ये व्यक्ति खुलासा पत्र भेजकर खुलासा भी कर रहा है कि संशोधन मैंने नहीं सरकार ने किया है. सरकार से किसने मांग की इसका खुलासा कौन करेंगा ? कोरम पूरा करने के लिए तुझे बाहर के सदस्य ये बात भी सभी को पता है चल चुकी है. तारा सिंह यदि तू सच बोलने वाला इंसान है तो बता बढ़ाये गए छह मेंबर में से एक मेंबर सरकारी नॉन सिख कर्मचारी होगा ये किसलिए संशोधन किया गया? जिस तरह से शिंगणापुर संस्था का अधिग्रहण सरकार ने किया है, क्या गुरुद्वारा बोर्ड भी सरकार को चाहिए? और उसके के लिए ये तारा सिंह गंगू रसोइया बना हुआ है? इन सब बातों का खुलासा करने की इस तारासिंह में हिम्मत नहीं है इसीलिए ये सरकारी पिट्टू हजूर साहिब आने से डर रहा है.
हजूर साहिब में तारा सिंह के कुछ समर्थक हैं जो आंदोलनकर्ताओं को बुरी नज़र से देख रहे हैं. तारासिंह ने गुरु घर के खिलाफ काम किया हैं इसलिए इसके समर्थक अबतक सबकुछ समझकर भी ख़ामोशी अपनाएं हुए हैं. तारासिंह जितना झूठ बोल रहा हैं उसके समर्थकों की परेशानियां भी उतनी और बढ़ रही हैं. मैं सभी उन समर्थकों से निवेदन करना चाहता हूँ कि, भाइयों, तारासिंह आपको व्यक्तिगत रूप से पसंद है हमें कोई दिक्कत नहीं हैं. आप उससे अच्छा रिश्ता बनाकर रखिए हमें कोई आपत्ति नहीं हैं. हम उस व्यक्ति की उन नीतियों के खिलाफ हैं जिससे उसने गुरुद्वारा बोर्ड का सरकारीकरण करवाने के लिए संशोधन किया हैं. हम उसका विरोध आपके कारण नहीं कर रहे हैं समझिये. आपकी हमारी कोई निजी दुश्मनी थोड़े ही हैं. आप चुनाव लड़ना चाहते हैं लड़िये! आप मेंबर बनना चाहते हैं बनिए! हमने कब रोका है? हम क्या रोक रहे हैं ये आप भी अच्छे से जान चुके हैं. आप हमारे आंदोलन में साथ ना दे कोई शिकायत नहीं हैं. लेकिन हमारे आंदोलन को कमजोर कर क्या आप गुरु घर और हजूर साहिब के सिखों का भला कर रहे हैं?
कल जब आप चुनाव में वोट मांगने निकलेंगे तो मेरे जैसे कई लोग जानना चाहेंगे कि आपने गुरुद्वारा बोर्ड संस्था बचाने के लिए पहल क्यों नहीं की, क्या जवाब डोंगे. देखिये हमारे जो मेंबर साहब मीटिंग के लिए मुंबई नहीं जा रहे हैं उन पर हम गर्व महसूस कर रहे हैं. आपका नाम लेने पर पर हमें पश्चयताप की आह न निकालनी पड़े इस बात की गंभीरता आप भी अपनाइये. सही को सही, या गलत को गलत बताइये. तारासिंह के समर्थकों से मैं यह सवाल करना चाहता हूँ, "क्या एक्ट संशोधन से आप खुश हैं? समाधानी हैं"? क्या गुरुद्वारा बोर्ड का सरकारीकरण योग्य है? क्या बोर्ड सरकार के अधीन रहना चाहिए? यदि आपको सही प्रतीत होता हैं तो खुलकर बताइये। मैं भी एक बार अपनी भूमिका पर विचार कर सकूँ कि क्या मुझे इस आंदोलन में रहना चाहिए या आंदोलन से स्वयं को अलग कर लेने के लिए सोचना चाहिए.
































