एसजीपीसी का दबावतंत्र !
शिरोमणि अकाली दल की कूटनीति?
हजुरसाहिब में उभरा तनाव
रविंदरसिंघ मोदी
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| गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के प्रशासक श्री अभिजीत राऊत परिवार सहित मत्था टेकने पहुँचे ! |
हजुरसाहिब स्थित 'दी नांदेड़ सिख गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजूर अबचल नगर साहिब बोर्ड' संस्था के पिछले प्रशासक डॉ परविंदरसिंघ पसरीचा का कार्यकाल समाप्त होने के कारण और उनके खिलाफ जनमानस में व्याप्त नाराजगी के कारण उन्हें महाराष्ट्र सरकार ने आगे अवसर नहीं दिया. वहीं नांदेड़ के जिलाधीश श्री अभिजीत राऊत को बोर्ड का प्रशासक नियुक्त किया गया. विदित हो कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा डॉ परविंदरसिंघ पसरीचा को जून 2022 में केवल तीन माह के 'शॉर्ट टर्म' के लिए बोर्ड का प्रशासक बनाया था. लेकिन डॉ पसरीचा ने आगे चलकर अपने राजनीतिक संबंधों का भरपूर फायदा उठाते हुए अपने कार्यकाल को 3 माह से 13 माह तक आगे बढ़ाने में सफलता प्राप्त की. यह माना जाये कि डॉ पसरीचा यहाँ गुरुद्वारा बोर्ड पर कायमरूपी प्रशासक रहने के इच्छुक है तो कोई गलत नहीं होगा. सोचना यह है कि आखिर एक ही व्यक्ति को कितनी बार गुरुद्वारा बोर्ड का प्रशासक रखा जाना चाहिए? इस बात पर गंभीरता से विचार होना चाहिए. यदि डॉ पसरीचा साहब चाहते हैं कि सालों - साल वें ही यहाँ के प्रशासक बनें रहें तो हजुरसाहिब के स्थानीय लोगों को बोर्ड का संचालन करने का अवसर कब मिलेगा? एसजीपीसी तो चाह रहीं है कि तखत सचखंड बोर्ड पर फिर से उनके मुहरों की नियुक्ति करवाई जाए इसलिए नांदेड़ के जिलाधीश श्री अभिजीत राऊत को प्रशासक बनाये जाने का विरोध बड़े पैमाने पर शुरू किया गया है.
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| शोशल मीडिया पर हो रहा विरोध ! भाई साहब हरजिंदरसिंघ धामी ने किया विरोध ! |
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति द्वारा जोरशोर से इस बात पर एतराज जताया जा रहा है कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के सूत्र किसी गैर सिख के हाथों क्यों सौपें गए! एसजीपीसी के प्रधान भाईसाहब भाई हरजिंदरसिंघजी ने पुरी क्षमता के साथ केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार तक अपना विरोध पहुँचाया. शोशल मीडिया पर भी 'गैर सिख प्रशासक' का विषय खासा चर्चा में हैं. जाहीर है डॉ पसरीचा के कनेक्शन भी काम कर गए और टीवी समाचारों के डिबेट तक यह विषय जा पहुँचा. शिरोमणि अकाली दल के नेता भी समाचार पत्रों में और शोशल मीडिया में यह विषय प्रस्तुत कर असंतोष व्यक्त करते देखें जा रहें हैं. आज इन लोगों की हजुरसाहिब के प्रति चिंता देखकर दिल गदगद हो उठा हैं. मेरा विनम्र आरोप हैं कि हजुरसाहिब बोर्ड की समस्याओं के प्रति सालों साल चुप्पी साधने के बाद अब कूटनीतिक बयानों की बौछार करते हुए अकाली दल के नेता हकीकत में "मौके पर चौका" लगाने की छुपी नीत्ति पर काम कर रहें हैं. उन्हें प्रत्यक्ष में हजुरसाहिब का बोर्ड सरकार के चुंगल से मुक्त करवाने में कोई दिलचस्पी नहीं हैं. उनकी दिलचस्पी हजुरसाहिब बोर्ड पर कलम ग्यारह के संशोधित वर्तमान प्रावधान को भुनाकर सचखंड बोर्ड पर अपना (एसजीपीसी) का प्रधान अथवा प्रशासक बनवाने मात्र की हैं.
इधर हजुरसाहिब में बहुत से लोग गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड पर 'गैर सिख प्रशासक' की नियुक्ति पर रोष प्रकट कर रहें हैं. बहुत से लोग चाह रहें हैं कि सिखों की इस संस्था पर किसी सिख को प्रशासक बनाया जाना चाहिए था. हालांकि चर्चा तो यह थी कि गुरुद्वारा बोर्ड पर स्थानीय लोगों की प्रशासकीय समिति नियुक्त होगी. लेकिन सरकार ने स्थानीय सिखों को धत्ता बताया और सिखों की धार्मिक संस्था पर अपना अधिपत्य कायम रखा.
डॉ पसरीचा के प्रति असंतोष... !
सवाल है जिलाधीश अभिजीत राऊत को प्रशासक बनाये जाने का. इस बात के दो उत्तर है. एक, यह कि डॉ परविंदरसिंघ पसरीचा के खिलाफ सालभर से प्रस्तुत शिकायतें, उनकी कार्यशैली और बयानबाजी पर उठते आक्षेप इत्यादि के कारण महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें आगे अवसर प्रदान नहीं किया. दो सप्ताह पहले ही नांदेड़ के एक नेता की अगुवाई में सिखों का एक वफद मुंबई मंत्रालय होकर आया था, जहाँ डॉ पसरीचा को पद से हटाने की मांग जोरशोर से की गईं थी. दूसरा कारण, गुरुद्वारा बोर्ड कानून 1956 में बोर्ड के प्रधान अथवा प्रशासक नियुक्ति के लिए कानूनी प्रावधान दर्ज हैं. जिसके तहत प्रशासक पद के सूत्र जिलाधीश या समकक्ष अधिकारी को सौपें जाने का प्रावधान है. पहले भी वर्ष 2000, जुलाई माह में जब स. शेरसिंघ फौजी का बोर्ड बर्खास्त किया गया था तब बोर्ड के सूत्र अतिरिक्त जिलाधीश श्री कालम पाटिल को सौपें गए थे. पश्च्यात वर्ष 2002 में तत्कालीन जिलाधीश श्री तानाजी सत्रे को बोर्ड का प्रशासक बनाया गया था. दोनों अधिकारी 'नॉन सिख' थे. उस समय भी भरपूर विरोध हुआ था. डॉ धीरजकुमार और डॉ श्रीकर परदेसी भी बोर्ड के कुछ समय प्रशासक थे.
गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड की स्थापना सन 1956 में हुईं थी. पहला प्रशासक उस समय का जिलाधीश नॉन सिख अधिकारी था. 1970 तक यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहा. सन 1971 में पंजाब के नेता और क्रांतिकारी व्यक्तित्व जत्थेदार स्व. गुरचरनसिंघ तोहड़ा गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान बनें और पहली बार सिख प्रशासक संस्था पर नियुक्त हुआ था. स्व. तोहड़ा लगातार चौदह वर्षों तक बोर्ड के प्रधान बनें रहें थे. बीतें 67 वर्षों के कार्यकाल में हजूर साहिब के स्थानीय प्रधान के पास केवल 16 वर्षों का प्रशासन रहा. सरदार लड्डूसिंघ महाजन और सरदार शेरसिंघ फौजी तथा कुछ समय के लिए औरंगाबाद निवासी स्व. संतसिंघजी ने प्रशासन किया. शेष 51 सालों तक किसका प्रशासन रहा इसका चिंतन किया जाना चाहिए. सवाल यहीं उठता है हजुरसाहिब के स्थानीय लोगों के हवाले उनकी संस्था का प्रशासन क्यों नहीं होना चाहिए? नांदेड़ के अमृतधारी सिखों के हाथों में बोर्ड का संचालन हो ऐसा सभी की इच्छा हैं. एसजीपीसी और उनके मुंबईया कनेक्शन नहीं चाहते कि हजुरसाहिब के स्थानीय लोगों के बोर्ड का नेतृत्व रहें. एसजीपीसी के प्रधान साहब को डॉ पसरीचा को बर्खास्त किए जाने का विरोध करते समय यह भी पता कर लेना चाहिए था कि डॉ पसरीचा को हटाए जाने के लिए मुंबई स्थित एसजीपीसी के एक सदस्य (पिछले बोर्ड में मेंबर) द्वारा एक याचिका उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की गईं थी. जाँच ले!
चुनाव करवाएं जाए.... !
जिलाधीश श्री अभिजीत राऊत समझदार और नीतिपरख अधिकारी है. राजनीतिक अपरिहार्यता है आज उनके हाथों भले ही गुरुद्वारा बोर्ड का प्रशासन है. लेकिन स्थानीय सिख समाज को चाहिए कि एक शिष्टमंडल के रूप में श्री अभिजीत राऊत से मिलकर यह मांग रखें कि, जल्द से जल्द गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव करवाएं जाएं. आज की वर्तमान परिस्थिति देखते हुए और लोकतांत्रिक तत्व जीवित रखने के लिए गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव करवाएं जाना जरुरी हैं. यदि एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल के नेताओं द्वारा दबावतंत्र का प्रयोग कर और दिल्ली और महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं को गल में डालकर गुरुद्वारा बोर्ड पर प्रशासक के रूप में किसी मुंबईया व्यक्ति नियुक्ति करवाने की कूटनीति की गईं तो हजुरसाहिब के लोगों फिर ढोल पीटते रहना पड़ जायेगा. हजुरसाहिब में जो लोग गैरसिख प्रशासक का मुद्दा गर्म कर रहें हैं वें अप्रत्यक्ष रूप से एसजीपीसी की कूटनीति को सफल करवाने में सहायता प्रदान कर रहें हैं ऐसी मेरी सोच हैं. जिसके लिए इन संस्थाओं और नेताओं का पिछला इतिहास भी गौर फरमाना होगा. हजुरसाहिब बोर्ड के वर्तमान हालात के लिए राजनीतिक लोगों के साथ साथ शिरोमणि अकाली दल और एसजीपीसी की पिछली रणनीतियाँ कारणीभूत है. एकनाथ शिंदे सरकार गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के विषय में नांदेड़ के स्थानीय सिखों के साथ चर्चा करें यहीं एक सकारात्मक कदम होगा.
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