सोचा आज 'मंटो' को याद कर लूँ..!
रविंदरसिंह मोदी
भारत में पैदा हुए लेकिन पाकिस्तान में अंतिम साँसे लेने वाले मशहूर लेखक, शायर, कहानीकार सादत हसन 'मंटो' ने भारत - पाकिस्तान बंटवारे को लेकर काफ़ी कुछ लिखा हैं. बंटवारे की त्रासदी पर बहुत चिंतन भी किया था लेकिन शायद नियति ने उन्हें ज्यादा मोहलत नहीं बख़्शी. मात्र 43 साल की उम्र में मंटो ने सन 1955 में दुनिया को अलविदा कह दिया. उनकी पैदाइश ता. 10 मई, सन 1912 की है. जलंधर पंजाब में उनका जन्म हुआ था. यदि मंटो उम्रदराज होते तो एक नए तरह का साहित्यसृजन निश्चित ही हमें पढ़ने को मिलता.
सादत हसन मंटो की उर्दू कहानी तोबा टेकसिंह को मैंने कोई बाईस - तेईस साल पहले पढ़ा होगा. यह कहानी दो बार पढ़ीं. क्योंकि सन 2012 में मंटो की जन्मशताब्दी मनाई गई थी उस वक्त, तब दोबारा से तोबा टेकसिंह कहानी पढ़ लीं. उस कहानी में बंटवारा होने के बाद की परिस्थितयों का मार्मिक चित्रण देखने को मिलता है. सिख किसान सरदार बिशनसिंह जमींदार के सत्य चरित्र पर आधारित यह कहानी बहुत कुछ सीखा जाती है.
मंटो को करोड़ों लोगों ने पढ़ा होगा, उनको पसंद करने वाले भी करोड़ों में ही होंगे. लेकिन मैं मंटो को लेकर कुछ तय नहीं कर पाया. जो बेबाकी मै अपने भीतर या अन्य साहित्यिकों में तलाशता रहा वो मंटो में बहुत हदतक उपलब्ध भी है लेकिन पता नहीं क्यों मंटो ज़माने के प्रति किसी दुश्मनी पर उतारू तो नहीं थे ऐसे ख़्यालात उठने लगें तब मैंने अपने आपको 'मंटो' से दूर कर लिया. अभी तक दूर ही रहा. पर आज अचानक आज कुछ महसूस हुआ कि 'चीर निंद्रा' में सोये 'मंटो' को याद कर लूँ. 'मंटो' को याद करने के लिए साहित्य की प्रमाणिकता और बर्दाश्त करने की इंतेहा से गुजरना पड़ता हैं. भारत देश में सादत हसन मंटो के साहित्य को लेकर अक्सर मंथन होता आया हैं. इसलिए मंटो यहाँ जीवित रहें, वे मरे नहीं ! मंटो इसलिए भी ज़िन्दा रहें कि उनके साहित्य को लेकर बहुत से लोगों ने रोजगार ज़िन्दा रखा. बॉलीवुड की मूवी खलनायक का वो मशहूर गीत "चोली के पीछे क्या है... " मंटो की उस बात पर आधारित भी है कि, मैं किसी को कपड़े नहीं पहना सकता, ये काम तो दर्जी का है! मुझे इन विषयों में कहीं रिश्ता नजर आया था. क्या गीतकार आनंद बख़्शी ने मंटो को पढ़ा होगा?
'मंटो', दोनों सरकारों के रवैय्ये पर तंज करते थे इसलिए पाकिस्तान में वे पिछड़ गए, या उन्हें पिछड़ा रखा गया. यदि भारत में रहते तो इतिहास कुछ अलग होता. 'मंटो' को आज याद करने की वजह शायद ये भी है कि मंटो ऐसे शख्स भी है जिन्होंने देश बंटवारे के समय लाखों लोगों की लाशें उस सरजमीं पर बिखरी हुई देखीं थीं. वे उन घटनाओं के साक्षी है, गवाह भी थे. उन्होंने खुलकर उन घटनाओं का मातम भी मनाया था. लाखों लोगों की एक साथ मौत की त्रासदी को उन्होंने तमाशा कहा था. आज विश्व में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न है कि लोग जंग में तो नहीं पर वाइरस संक्रमण से मर रहें हैं. आज हम सभी गवाह हैं कि किस तरह लाखों लोग मर रहें हैं. आज के हालात में मौत कितना बड़ा तमाशा बन गईं हैं. मानवता के चेहरे पर यह किसी मानसिक विकृति का तमाशा नहीं तो क्या हैं. जिसने ऐसा वाइरस बनाया और लाखों लोगों को मौत का शिकार बनाया, जिसने करोड़ों लोगों की जानें संकट में डाली, क्या यह तमाशा नहीं हैं? आज करोड़ों लोगों की साँसों में उत्पन्न घुटन का गुनहगार कौन है, यह भी खुलकर नहीं कहा जाता ! फिर तो यह तय हुआ कि मंटो की ज़माने के प्रति नाराजी सही थीं. उनकी बेबाकी ने एक समय की सियासत को ललकारा था. आज का साहित्य जगत जाने क्यों खामोश हैं. किस तमाशे की इंतेहा की प्रतीक्षा हैं? 'मंटो' का 'ठंडा गोश्त' शायद कभी गर्म नहीं होगा. देश में छाई परिस्तिथियों में भारतीय साहित्य क्षेत्र अब भी धुर्वीकरण को ही मुख्य रखकर कलम चला रहा हैं. आज हम यह मार्मिक तंज कर सकते हैं कि जितनी कलम साहित्यिक वर्ग नहीं घिस पा रहा हैं, उससे ज्यादा तो अस्पताल और डॉक्टर अपनी कलम घीस रहें हैं. मैं दुआओं में गहरा विश्वास रखता हूँ लेकिन खेद के साथ कह रहा हूँ कि यह दुनिया अब 'दवा - दारू' पर निर्भर होती चलीं जा रहीं हैं. 'मंटो' याद आ गए उनका शुक्रिया ! जिन्हें दिल कभी भुला ही नहीं था उन्हें 'मंटो' के बहाने एक बार फिर याद करने का जैसे बहाना मिल गया. आज की परिस्थितियां एक मानसिक द्वन्द को आमंत्रण दें रहीं हैं. 'मंटो' जैसा इंकलाब चाहते हैं वैसा तो संभव नहीं पर एक राष्ट्रीय संघर्ष की आपात भावना की सुगबुगाहट देश में शुरू होगी यह उम्मीद ज़िन्दा कर रहा हूँ. .
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(रविंदरसिंह मोदी)


