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मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

यह सैक्रिफाइस इलेक्शन है - रविंदर सिंघ मोदी

यह सैक्रिफाइस इलेक्शन है - रविंदर सिंघ मोदी 

आपका अंतिम मौका चला गया !!!
गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर साहिब मंडल (बोर्ड ) के चुनाव ता. 28 दिसंबर 2018 को हो रहे हैं. मराठवाड़ा के सिख मतदाता अपने तीन सदस्यों का चयन करेंगे. अपने प्यारे प्रतिनिधि चुनेगे. उन्हें गुरुद्वारा बोर्ड में जिम्मेदारियों सहित भेजेंगे. हमारी आकांक्षाएं बहुत हैं. हम बहुत आशावाद पाल रहे हैं. लेकिन हकीकत से रूबरू होना भी जरुरी है. 

आज मैं यह खुलासा करना चाहता हूँ कि वास्तविकता हमारी सोच और अपेक्षाओं से कुछ अलग है. हकीकत यह है कि ये चुनाव साधसंगत की मांग पर नहीं हो रहे हैं. बल्कि भाजपा विधायक तारा सिंह की रणनीति का ही यह एक हिस्सा है. तारा सिंह को अपना नया बोर्ड स्थापित करने की जल्दी है. उसने गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट की कलम 6 का संशोधन अभी तक भी रद्द नहीं करवाया हैं. क्योंकि सरकार जो योजनाबद्ध तरीके से करना चाह रही है तारा सिंह बखूबी वही अंजाम दे रहा हैं. बोर्ड का कानून पूरी तरह बदल कर सरकार हजूर साहिब के सिखों के हाथों से बोर्ड छीनना चाह रही है. दूसरा यह कि मुम्बईया लॉबी यहाँ अपना एकाधिकार स्थापित करना चाह रही हैं. ये चुनाव मात्र बाहरवालों की यहाँ सत्ता स्थापित करने की योजना हैं. तारा सिंह अपने भांझे - भतीजे और मुंबई के पैसे वालों के साथ ताजपोशी के लिए तैयार है. जैसे हि 31 दिसंबर को तीन सीटों के चुनाव नतीजे घोषित हो जायेंगे वैसे ही नए बोर्ड गठन की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएंगी. 
मैंने इन चुनावों को "सैक्रिफाइस चुनाव" का नाम दिया है. बलिदान!! जिसका मुख्य कारण यह है कि हजूर साहिब के सिखों की इस चुनाव को दिल खोलकर दी गई स्वीकृति. सरकार ने चुनाव लादे और सभी ने उत्साह के साथ उसे स्वीकार कर लिया ! किसी ने चुनाव का बहिष्कर नही किया. प्रशासन ने प्रक्रिया शुरू की तो मतदाता सूचि में नाम डालने की जल्दबाजी भी हुई. क्योंकि बहुत से लोगों को मेंबर बनने की जल्दी थी. किसी ने यह नहीं सोचा कि आगे क्या होगा?
चुनाव प्रक्रिया को लेकर जहां लोगों में उत्साह देखा जा रहा है, वो उत्साह कलम 11 और कलम 6 के संशोधन के ख़िलाफ़ नहीं देखा गया. बहुत अफ़सोस की बात है कि हजूरी संगत अपने बोर्ड को बचाना छोड़ कर उस तारा सिंह के चुंगल में फंस गए जिसने आपके पवित्र स्थल के प्रबंधन के सूत्र सरकार को सौंप दिए. आपकी सिक्खी को इसलिए प्रणाम कि आपने छिन्नेवालों को ही अपना नेता कबूल कर लिया. जिनका तन मन हजूरी बोर्ड के लिए समर्पित है उनका नेता तारा सिंह कैसे हो सकता हैं? यह नहीं होना चाहिए था.  

तारा सिंह द्वारा लादे गए चुनाव अपनाकर और उसका फिर से बोर्ड गठित कर हजूर साहिब के वफ़ादार सिख क्या साबित कर रहे हैं ? ये चुनाव अंतिम अवसर है इसके बाद तो चुनाव होना भी मुश्किल है. इसीलिए मैंने इसे सैक्रिफाइस चुनाव कहा है कि हमने वो सबकुछ कर दिया जो बाहर वाले चाहते हैं. हजूरी सिखों ने इन चुनावों के माध्यम से बोर्ड का बलिदान कर दिया ये मानकर चले. यह एक कड़वी सच्चाई हैं. अब आपके हाथ सिर्फ नौकरियां मांगना रह गया है. प्रतिकार नहीं करने, नहीं लड़ने की कोई तो किंमत चुकानी होगी. आगे चलकर ये कहावत मशहूर हो जाएगी कि "हाथ का बोर्ड गंवाना कोई हजूर साहिब के निष्ठावान सिखों से सीखे". 



गुरुतागद्दी त्रिशताब्दी के समय भी बहुत सी समस्याएं प्रस्तुत हुई थी पर कोई नहीं लड़ा था. जिसका परिणाम ये हुआ कि हजूर साहिब के सिखों में लड़ने की प्रवृत्ति ही समाप्त हो गई. एकबार फिर साबित हो गया हैं कि हम केवल एकदूसरे के साथ ही लड़ सकते हैं. सरकार के खिलाफ संघर्ष तक नहीं कर सकते. लड़ने वालों की टाँगे खींच सकते हैं. जो होना था वही हो रहा हैं? किसी को कोई खबर नहीं हैं. इसीलिए तो मैं कह रहा हूँ कि यह "बलिदान चुनाव" हैं. जो लोग चुनाव में जीत कर आएंगे उनमें से कोई भी ये मादा नहीं रखता कि हजूरी प्रधान वो बनाएगा. यहाँ तारासिंह को हटाना हमारे बस में नहीं है. क्योंकि हमें अब तक लगता था कि तारासिंह अकेला सब कुछ कर रहा हैं. लेकिन अब यह तथ्य सामने आ रहा हैं कि तारा सिंह ने भी जैसे बोर्ड को सरकार के अधीन करने की सुपारी उठाई हैं. बाद में यहाँ का बजट, सत्ता, आराम, चापलूस, चाकर और सुविधाएँ देखकर उसने कायम का यहां सत्ता में रहने का मन बना लिया हो. कुछ भी हो हमने अंतिम अवसर भी खो दिया हैं यह मानकर चलिए. ये खरी-खरी बातें बुरी लग रही हो तो लगे, क्षमा मांगना भी एक तरह से पक्के हजूरी विचारों से बेमानी होगी.   
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रविंदर सिंघ मोदी

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

तारासिंह अब तक का सबसे निष्क्रिय प्रधान !
लगभग २०० करोड़ के बजट का नहीं क्या गया उपयोग 
क्या हजूर साहिब बोर्ड को शिरडी ट्रस्ट जैसा बनाया जा रहा हैं?
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रविन्दरसिंह मोदी

इससे पूर्व भी मैंने बेबाक तौर पर यह बात कही है कि विधायक तारा सिंह की प्रधानगी नांदेड़ के सिखों के लिए अभिशाप से कम नहीं है. अब मेरी यह बात भी तारा सिंह के समर्थक वर्ग को अप्रिय प्रतीत हो सकती है, जब मैं यह तर्क प्रस्तुत करूँ कि सन १९५६ से अब तक के गुरुद्वारा बोर्ड कार्यकाल में तारा सिंह का विगत पौने चार वर्षों का कार्यकाल सबसे निष्क्रिय साबित हुआ है. पिछले तीन वर्षों में गुरुद्वारा बोर्ड के बजट का ठीक से उपयोग करने में भी तारासिंह बुरी तरह से विफल साबित हुआ है. मैं बेबाक और खरी खरी कह रहा हूँ आप खुद जाँच कर देख लीजिये. 
विधायक तारा सिंह ने अप्रैल २०१५ में महाराष्ट्र सरकार के आदेश से गुरुद्वारा सचखंड मंडल (बोर्ड) का अध्यक्ष पद प्राप्त किया था. पद पर बैठने के बाद जब तारासिंह ने गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड (मंडल) के आर्थिक मामलों का निरिक्षण किया तो उसके अधिपत्य में ६० करोड़ राशि के बजट की संस्था थी. उसके बाद वर्ष २०१६ - २०१७ आर्थिक वर्ष का बजट प्रस्तुत हुआ तो वह बढ़कर ६८ करोड़ हो गया. वर्ष २०१७-२०१८ में बजट की राशि ८८ करोड़ इतनी दर्शाई गई थी. अभी वर्ष २०१८ - २०१९ का जब वार्षिक बजट प्रस्तुत हुआ तो यह अकड़ा बढ़कर ९५ करोड़ हो गया. वर्ष २०१५-१६ से वर्ष २०१८-१९ इन चार सालों का आर्थिक प्रारूप कहता हैं कि चार वर्षों में दो सौ करोड़ से तीन सौ करोड़ की राशि खर्च करने का अवसर था. जो तारा सिंह ने गंवाया हैं. इस राशि के उपयोग से नांदेड़ शहर में छह भव्य मार्केट इमारतों का निर्माण हो सकता था. वही लगभग ५० एकड़ जमीन खरीदी जा सकती थी. तारा सिंह ने कोई संपत्ति खड़ी नहीं की. क्यों? सोचिए?

तारासिंह के कार्यकाल में प्रस्तावित और अनुमानित आर्थिक व्यवहार की संभावित सीमा तीन सौ करोड़ (३०० करोड़) से ज्यादा की है. उसी तरह से पिछले तीन वर्षों का शुद्ध बजट देखा जाए तो लगभग २०० करोड़ रूपयों का व्यवहार प्रभावित हुआ है. बोर्ड के पास इतना बड़ा विकल्प होने के बावजूद भी तारासिंह ने अध्यक्ष के नाते इस बजट का उपयोग ठीक तरह से नहीं किया. तारासिंह ने भूमिपूजन तो दो से तीन स्थानों पर किये लेकिन प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हुए. तारासिंह के कार्यकाल में गुरुद्वारा बोर्ड के धन राशि से कोई नयी ईमारत, मार्किट, काम्प्लेक्स, गुरुद्वारा, डेवढ़ी, बाथरूम, रोड या कोई छत का निर्माण हुआ हो तो बताइयेगा. इतनी जमीनें उपलब्ध होने के बावजूद उसने कोई भी स्ट्रक्चर खड़ा नहीं किया. क्योंकि एक तो उसके पास विज़न (दूरदृष्टि) नहीं, दूसरे इच्छाशक्ति नहीं, तीसरे फुट डालों झगडे कराओ की राजनीति और चौथे केवल सरकारी अध्यक्ष होने का रौब. इस कारण उसने कोई गुरु घर का पैसा बैंकों में ब्लॉक रखा.
अब जायजा लेते है उन कुछ कामों का जो उसने करवाएं. पहले नम्बर पर चिल्ड्रन पार्क का काम. यह कार्य उसने मुंबई के अपने निकटतम व्यक्ति से करवाया. यह विषय भी काफी चर्चा में रहा था. तारा सिंह ने दूसरा काम करने में रूचि दिखाई वो है श्री गुरु गोबिंद सिंघजी म्यूजियम के अधूरे कार्यों के विषय में. तारा सिंह के पद लेने के बाद खर्च की कोई सीमा ही नहीं रही. जो वस्तु १० रुपयों की थी वो मान लीजिये ५० रुपयों में खरीदी गई. खर्च और मरम्मत कार्यों का खर्च लाखों में होने की बात सामने आयी हैं. जिसमे ठेकेदार को अग्रिम धन देने का मामला भी चर्चा में रहा हैं. म्युझियम में कितने के कार्य करवाएं गएँ, किसके ऑब्जरवेशन में करवाएं गए, अभी और कितना खर्च करना हैं जैसे प्रश्न खड़े हैं. जाहिर हैं तारा सिंह तो जवाब नहीं देगा. सरकार भी धांधलियों की जाँच नहीं करवाएंगी. 
खैर मुद्दे पर आते हैं, दशमेश अस्पताल में संसाधन बढ़ाने के पहले के बोर्ड के निर्णय पर उसने कुछ खर्च किया. छोटे-मोटे स्लाइडिंग, पार्टीशन, बॉउंड्री वॉल, खालसा हाई स्कूल , सचखंड पब्लिक स्कूल रिनिवेशन, वृद्ध आश्रम के कमरों को अधिकारियों  का निवास स्थान बनाने के लिए रेनोवशन में खर्च, तोड़फोड़ आदि कार्य कर उसने कुछ करोड़ व्यर्थ किये ऐसा आरोप स्वयं बोर्ड के मेंबर ही लगा रहे हैं. तारा सिंह ने कोई ईमारत खड़ी नहीं की.  यात्री निवास नहीं बनाया.  उत्पन्न बढ़ाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की. 
बोर्ड की बैठकें मुंबई में लेकर तीन से साढ़े तीन वर्षों में करोड़ों का खर्च करवाया. मुंबई  बैठकें हुई, उनमें क्या प्रभावी निर्णय हुए? बोर्ड का उत्पन्न तो नहीं बढ़ा उलटे खर्च ज्यादा हुए. तारा सिंह जब जब नांदेड़ दौरे पर आया तो दौरा खर्च भी बढ़ गया. अख़बारों में विज्ञापन छपवाकर गुरुघर में खुद का दरबार आयोजित किया गया. बैनर और पोस्टर में भी अब तक करोड़ के निकट खर्च हुए होंगे. अभी भी आवश्यक खर्च जारी हैं. 
उसने अपने रिश्तेदारों को ऊँचे पैकेज पर डायरेक्टर बनाया. जहां जगह नहीं थी वहां भर्ती करवाई. चार महीनों में चार सौ कर्मचारी भर्ती करते समय बोर्ड मीटिंग में किसी तरह का कोई प्रस्ताव पास नहीं किया. नयी भर्ती किये गए कर्मचारियों का प्रति माह अंदाजा ३३ लाख रुपयों के वेतन की अतिरिक्त व्यवस्था नहीं की गई बल्कि गोलक से ही वो खर्च किया जा रहा हैं. ऊपर से इतने कर्मचारियों को भविष्य में स्थाई (परमानेंट) नौकरी का आश्वाशन भी नहीं दिया गया, क्योंकि सभी को डेलीवेजस पर नहीं बल्कि कॉन्ट्रैक्ट टाइप नौकरिया बांटी गई. किसी भी कर्मचारी को भर्ती के साथ पद बहाल नहीं किये गए. स्थाई कर्मचारियों को रोटेशनल प्रमोशन नहीं दिए गए जो कि उनका हक्क और अधिकार बनता हैं. वरिष्ठ कर्मचारी प्रमोशन से वंचित हैं. उनके साथ सरासर अन्याय किया गया. तारा सिंह ने उनकी बात तक नहीं सुनी. बोर्ड में कार्यरत महिला कर्मचारियों को प्रमोशन में न्याय नहीं दिया गया. उल्टा महिला शोषण बढ़ने के समाचार सुनने में आते रहे हैं. तारा सिंह के निकटवर्तीय की जाँच के लिए महिला और बाल उत्पीड़न पथक ने छानबीन भी की हैं. यानी तखत की गरिमा बनाये रखने में वो पूरी तरह से विफल साबित हुआ हैं. 
क्या निष्क्रिय प्रवृत्ति का व्यक्ति दुबारा प्रधान बनना चाहिए?
तारा सिंह के प्रधान राज्य में क्या विकास किया गया साध संगत को आज खुलकर बताया जाये यह सभी की मांग हैं. सरकारी नुमाईंदा होने और चार सालों का आर्थिक बजट हाथ में रहते हुए भी उसने कोई बड़ा काम नहीं किया. इतना बजट उसने ब्लॉक क्यों रखा उसका सच बाहर आना चाहिए. आगे भी तारा सिंह प्रधान बनने के लिए पासे बिछा चूका हैं. जो लोग गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव लढ रहे हैं, उन्होंने हजूरी प्रधान का विषय गंभीरता से लेते हुए तारा सिंह से सवाल करना चाहिए कि पिछले पौने चार सालों में उसने बजट ब्लॉक क्यों रखा? क्या शिरडी ट्रस्ट की तरह ही सरकार को लोन देने की कोई गुप्त योजना हैं? क्या फिक्स डिपॉजिट्स पर किसी को लोन की सिफारिश की गई हैं? विकास नहीं करना था तो पद पर बैठकर हजूर साहिब  झगडे लगाने की क्या जरुरत थी? तखत साहब पर मेम्बरों को कसम खिलने की क्या जरुरत थी?
हजूर साहिब के लोगों का दुर्भाग्य कहा जाना चाहिए की १९५६ से लेकर आज तारीख तक केवल १६ साल ही हजूरी प्रधान पद पर रहे. जिनमें से नांदेड़ के केवल दो ही प्रधान रहे जिन्होंने साढ़े नौ साल प्रधान पद पर निकला. बाकी समय यानी पचास वर्षों के करीब बाहरवालों ने, कलेक्टर ने और प्रशासकों ने यहाँ की सत्ता संभाली हैं. फिर भी हजूर साहिब के बाशिंदे जो कहते हैं कि गुरु हाजिर नजीर हैं, वो नहीं चाहते कि गुरुघर में स्थानीय प्रधान बनें. गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव में २२ उम्मीदवार खड़े हैं जिनमे से कुछ डम्मी माना जाएं तो भी आठ से नौ उम्मीदवार मैदान में हैं. सभी योग्य हैं और राजनीती समझते हैं. मैं किसी उम्मीदवार के लिए व्यक्तिगत नहीं कह रहा हूँ चयन संगत का अधिकार हैं. सभी उम्मीदवार चाहते हैं हजूरी प्रधान बनें. लेकिन प्रत्यक्ष में बनाने के हालत में कोई नहीं दिखता. क्योंकि उनकी मानसिकता स्थिर हो गई हैं कि बोर्ड पर बाहर वालों का राज कायम रखना है. जाहिर हैं सरकारी नियुक्ति की प्रथा के रहते यहाँ का प्रधान चुनने का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता. इस समस्या का हल किसके पास हैं? जो सबसे योग्य उम्मीदवार है वो यह जाहिर करें. 
क्या वर्तमान में त्यागपत्र देकर भी गद्दी पर बैठा निष्क्रिय प्रधान दुबारा से प्रधान बनना चाहिए? क्या सरकार यहाँ निष्क्रिय व्यक्ति लादकर सचखंड बोर्ड को भी शिरडी ट्रस्ट जैसा बना रही जहां सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहे? और तारा सिंह इसी छुपे अजेंडे पर काम कर रहा हैं?
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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

हजूरी प्रधान कैसे ?
फिर प्रधान बनने के लिए तारासिंह की तडजोड़ शुरू 
बोर्ड पर स्थापित होगा मुम्बईया राज?
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रविन्दरसिंघ मोदी 
जब तक मुख्यमंत्री श्रीमान देवेंद्र फडणवीस जी का आँख बँधकर समर्थन कायम है तब तक भाजपा के विधायक और गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड नांदेड़ के सरकारी प्रधान तारा सिंह का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता यह तो स्पष्ट हो चला है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उनकी हर गलती, नादानी, मनमानी, अफरा-तफरी और साजिश को नजर अंदाज कर रहे हैं. गुरुद्वारा सचखंड के प्रबंधन में उन्हें जी.पी.सी. के मेंबर उनके हुकुम के आगे नतमस्तक दिखाई दे रहे है. 
इस कुशल हुकुमरान ने हजूर साहिब में नौकरियां बांटकर सब सिखों की जुबानें सील दी हैं. प्रमोशन तो मिठाई जैसी बाँट कर उन्होंने नियमों को तक पर रख दिया. उनके खिलाफ कितनी भी शिकायतें कर लीजिये उनको पद से कोई नहीं हटा सकता। भाजपा के इस विधायक के पीछे सरकार खड़ी हो जाने से उसकी मनमानी इतनी बढ़ गई कि गुरु घर के प्रबंधन में सैकड़ों गलतियाँ कर दी. नुकसान कर दिया. गोलक पर खर्च लाद दिया और सच्चा सुच्चा बनने का नाटक करना शुरू कर दिया. भाजपा के ईमानदार सरकार द्वारा लादे हुए इस प्रधान ने गुरुघर के प्रबंधन को उसने किसी निजी ट्रस्ट की सत्ता जैसा हाँकना शुरू कर दिया. आज भी हाँक रहा हैं. शायद उसे मरने तक भी यहाँ का प्रधान बना रहना है. अब तो उसके साथ इस.जी.पी.सी. की मुंबई की हस्तियाँ और दशम की विरोधी भी कंधे से कन्धा लगाकर काम कर रहे हैं. सभी की यही इच्छा है कि हजूर साहिब में हजूरी प्रधान नहीं बनना चाहिए. 
अब तो औरंगाबाद में भी यही बात फैलाई जा रही हैं की यहाँ हजूरी प्रधान ठीक नहीं हैं. इसलिए मुंबई वालों की सत्ता हजूर साहिब में स्थापित होनी चाहिए. बहुत सी शक्तियाँ इस काम में जुट गई हैं कि हजूरी प्रधान ना  बन पाएं और कलम ग्यारह (११) सरकार के अधीन रखकर ही हजूर साहिब बोर्ड का प्रशासन चलाया जाना चाहिए. और यह काम तारा सिंह के लिए कोई कठिन नहीं हैं. मुंबई से औरंगाबाद और वहाँ से हजुरसाहिब तक उसने अपना नेटवर्क मजबूत कर लिया हैं. अपना नेटवर्क मजबूत करने के लिए उनसे भाजपा को पहले दूर कर दिया. उसने कांग्रेस के कुछ मोहरों को मैदान में उतारा. कुछ पढ़े लिखों को पदों का लालच देकर अपने साथ कर लिया. दीवान ख़त्म करने की धमकियां देकर एक गुट को खामोश कर दिया तो दूसरें को उत्साहित कर दिया. 
अब गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव में वो अपने तीन मेंबर चुनकर लाने के प्रयास में हैं. उसकी नीति और राजनीति हजुरसाहिब की संगत के आगे कामयाब लग रही हैं. हो सकता हैं कि चुनाव के बाद तारासिंह अपने साथ मुंबई के दो से तीन मेंबर बोर्ड में लेकर आ जाएँ. पिछली बार जिनकों सरकार द्वारा मनोनीत कर दिया गया था शायद उनके स्थान पर मुंबई और नागपुर से  कोई मेंबर बनकर आये. और हजूर साहिब के स्वाभिमानी सिख उन्हें "साहब" "साहब" कहकर सिरमात्थे लगा ले.    
 स्मरण होगा कि अपने इसी राजनीतिक बल और राजनीतिक पहुँच के कारण ही तारासिंह ने गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कानून १९५६ (कलम ११) में जबरन संशोधन करवाकर गुरु घर का सरकारीकरण करवा दिया था और हम कुछ नहीं कर पाए थे. बाहुबली तारासिंह सिंह यही तक नहीं रुके उन्होंने तो बाद में प्रधान का कोरम मुंबई में बैठे बैठे प्राप्त करने के लिए गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट १९५६ में कलम ६ में भी संशोधन करवा दिया.  यह संशोधन पीछे लेने के लिए उसके खिलाफ आंदोलन किया गया. पर उसने कुशलता से उसे दबा दिया. इस आंदोलन को निरस्त करने करने के लिए उसने साम दाम दंड भेद का सहारा लिया. यहाँ तक कि संतों की अपील पर भी उसने संशोधन पीछे नहीं लिया. क्योंकि उसे अपनी राजनीतिक ताकत केवल गुरुघर के खिलाफ ही उपयोग में लाना था. इस पगड़ीधारी विधायक ने अपनी राजनीतीक साख गुरु घर के सरकारी कारण करने में खर्च कर दी. अब बोर्ड की चाब्बीयां भी सरकार को सौंपने की उसकी तैयारी दिखाई दे रही हैं. 
औरंगाबाद से खेल शुरू !!
(औरंगाबाद में २० दिसंबर को कलम ग्यारह के समर्थक मुंबई के मेंबर चुनाव प्रचार करते हुए.) 
औरंगाबाद में उसने गुरुवार ता. २० दिसंबर को गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव का प्रचार किया लेकिन भाजपा के लिए नहीं. उसने स्पष्ट कहा हैं कि नांदेड़ के एक उम्मीदवार को वोट दे बाकी दो यही के उम्मीदवारों को वोट दे. यानी वो नांदेड़ और औरंगाबाद के मतदाताओं में सीधी फूट डालना चाह रहा हैं. उसके साथ प्रचार में इस.जी.पी.सी. के मेंबर भी थे, मीत प्रधान भूपिंदर सिंह मिन्हास और गुरविंदर सिंह बावा,. इकबाल सिंह, सुरजीत सिंह भी प्रचार बैठक में शामिल थे. विधायक तारा सिंह की ऐसी नीतियाँ हैं तो हजुरसाहिब के सिखों को भी सोचना चाहिए कि उनका भविष्य क्या होगा? तारा सिंह को निष्पक्ष रहना चाहिए थे या भाजपा के उम्मीदवार खड़े करने चाहिए थे. मुख्यमंत्री जी तारा सिंह से और क्या करवाना चाहते हैं आप?  वर्ष २०१५ से आपने हमारा बोर्ड अधिग्रहित कर लिया हैं. अब बोर्ड बर्खास्त करना था लेकिन नहीं किया. तारासिंह का इस्तीफा क्यों लिया गया? सरकार का बल लेकर वो अब नान्देड़ के सिखों के साथ खेल खेल रहा हैं. आपस में एक दूसरों को लड़ा रहा हैं. ऐसे में हजूरी प्रधान कैसे बनेगा? 
(विधायक तारा सिंह औरंगाबाद में चनाव प्रचार में अपना सिक्का जमाते हुए. )
इस चुनाव में भी विधायक तारासिंह सभी को चॉकलेट दे रहा हैं. जिनका प्रचार कर रहा है उन्हें भी बेवकूफ बना रहा हैं. वो किसी भी हाल में हजूरी प्रधान बनने नहीं देगा. चुनकर आनेवाले मेंबर उसकी गोद में बैठकर राजनीति नहीं करेंगे, इसकी क्या गारंटी? चाहे कोई भी स्थानीय व्यत्कि मेंबर बनें, कोई भी हजूर साहिब निवासी का निवासी प्रधान बनें हमे आपत्ति नहीं. ना विरोध होगा. सभी को अधिकार है वो प्रधान बनें , मेंबर बनें. लेकिन गुरुघर के, तारासिंह के नहीं. इसलिए जो लोग तारासिंह का सहारा ले रहे हैं उन्हें उसकी कोई जरुरत ही नहीं हैं. अपनी काबिलियत पर चुनकर आये हम स्वागत करेंगे. आपका काम आपको सफलता देगा. लेकिन यदि आप तारा सिंह के लिए चुनकर आना चाहते हैं तो आपकी राजनीतिक कुशलता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाता हैं. हजूर साहिब की भोली भली संगत का भविष्य दाँव पर लगाना किसी हाल में भी उचित नहीं होगा. तारा सिंह ने गुरुघर का सरकारीकरण कर पाप ही किया हैं उसके पाप में  हजूर साहिब का कोई भी भागीदार ना बनें यही प्रार्थना हैं.  
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बुधवार, 12 दिसंबर 2018

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड चुनाव का 
प्रचार जोरों में... 
रविंदर सिंघ मोदी  


तखत सचखंड श्री हजूर साहिब बोर्ड के तीन सदस्य पदों के लिए आगामी २८ दिसंबर को आयोजित चुनाव के लिए उम्मीदवारों की प्रचार यंत्रणा सक्रीय हो गई हैं. चुनाव मैदान में हालाँकि २६ उमीदवार हैं लेकिन जिनमें से कुछ डमी प्रत्याशी हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने केवल समर्थन घोषित करने के लिए अपना परचा भरा हैं. लेकिन चुनाव मैदान में असल में सोलह (१६) उम्मीदवार ही अंत तक लड़ेंगे ऐसा प्राथमिक चित्र दिखाई दे रहा हैं. संभव हैं की अंत तक केवल ग्यारह (११) लोग ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में दिखाई दे.

जो उम्मीदवार चुनाव लड़ा  रहे हैं उनमें रणजीत सिंह कामठेकर, गुरमीत सिंघ महाजन, रविंदर सिंह बुंगई, कुँजीवाले मनप्रीत सिंह, तेजपालसिंह खेड़, धूपिया जसबीर सिंह, अवतारसिंह पहरेदार, जोगिन्दर सिंह रामगाड़िया, गुलाटी हरचरण सिंह गोबिंदसिंह, ओबेराय ऋषिराज सिंह, कौशल परविंदर सिंह जगजीत सिंह, गाड़ीवाले कर्नलसिंघ, गुलबीरसिंघ नवाब, हरप्रीत सिंह लांगरी, दिगवा हरभजनसिंह, प्रकाश सिंह कान्सा यह अपने स्वयं के लिए मतदान मांग रहें हैं. 
इच्छुक लेकिन अन्य के लिए प्रयासरत उम्मीदवारों में संभाव्य उम्मीदवार के रूप में अथवा डमी के रूप में बलजीत सिंह बावरी, हरदीपसिंह घड़ीसाज, पेशकर परमजीत सिंह, प्रेमजीतसिंघ सुखाई, तेजवंत सिंह संतोकसिंघ रागी, पुजारी सतनामसिंह, बाठ हरप्रीतसिंघ के नाम चर्चा में हैं. 

अधिकतर उम्मीदवारों ने अपना चुनाव प्रचार आरम्भ कर दिया हैं. पूर्व बोर्ड सचिव और वर्त्तमान मेंबर रणजीत सिंह कामठेकर द्वारा बगैर पैनल के अकेले उम्मीदवार के रूप में भाग्य आजमाया जा रहा हैं. बोर्ड मेंबर गुरमीतसिंह महाजन भी अकेले चुनाव मैदान में हैं. मैनेजिंग मेंबर रविंद्र सिंह बुंगाई भी अपने बुते पर अकेले लड़ रहे हैं. हजूरी क्रांति संघटन के उम्मीदवार मनप्रीत सिंह कुँजीवाले भी अकेले चल रहे हैं. शिवसेना के नेता अवतारसिंह पहरेदार और जोगिंदर सिंघ रामगडिया भी बगैर किसी पैनल के मैदान में हैं. 

उधर चुनाव की दृष्टी से महत्वपूर्ण माने जानेवाले औरंगाबाद के निवासी उम्मीदवारों में सबसे अनुभवी हरचरण सिंघ गुलाटी, नए उम्मीदवार कौशल परविंदर सिंघ और प्रकाशसिंघ कान्सा अकेले के बलबूते चुनाव मैदान में हैं. जो उम्मीदवार स्वयं के बुते चुनाव में हैं उनकी रणनीति थर्ड ऑप्शन की रही हैं. यह नीत्ति बहुत बार कारगर साबित होती हैं लेकिन चुनावी हवा में नुकसान भी पहुंचाती हैं. इसलिए यह नीति एक गैम्बल जैसी प्रतीत हो रही हैं. 
एकमात्र पैनल : 
इस चुनाव में एकमात्र पैनल बना है. इस पैनल का नाम "हम चाकर गोबिंद के " रखा गया हैं. जिसमें तेजपाल सिंघ खेड़ (नांदेड़), गुलबीरसिंघ नवाब (नांदेड़) और ऋषिराज सिंह ओबेराय (औरगांबाद) का समावेश हैं. तेजपालसिंह खेड़ को पिछले चुनावों में बड़ी संख्या में वोट मिले थे पर वे कुछ वोटों से चुनाव में असफल साबित हुए थे. जिसके कारण इस बार उन्होंने ने पैनल की रणनीति को अमल में लाया हैं. 

प्रचार की शुरुवात जोरों में 
गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव के प्रचार तंत्र की शुरुवात जोरों में हुई हैं. उम्मीदवारों ने पोस्टर और पर्चों के साथ अपने प्रचार यात्रा की शुरुवात हुई हैं. अधिकतर उम्मीदवारों ने अपने प्रचार की नांदेड़ जिले में पहली फेरी पूर्ण कर ली है. शहरी और ग्रामीण मतदाताओं से मेलमुलाकत कर अपनी निशानियाँ और चुनावी पत्रक का वितरण शुरू कर दिया हैं. गुरुद्वारा मार्ग, चिखलवाड़ी, बड़पुरा, अबचलनगर कॉलोनी, यात्रिनिवास सहित अन्य स्थानों पर चुनावी पोस्टर और बैनर लग गए हैं. कुलमिलकर विधानसभा चुनावों जैसा यहाँ चित्र दिखाई दे रहा हैं. 
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रविंदर सिंघ मोदी 
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गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

समाचार 
हजूर साहिब बोर्ड चुनाव में २६ प्रत्याशी मैदान में 
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१२ उम्मीदवारों ने नामांकन पीछे लिए 
२८ दिसंबर को होगा मतदान. 
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रविन्दरसिंघ मोदी 
श्री हजूर साहिब, नांदेड़ स्थित गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड की तीन सीटों के लिए आयोजित चुनाव के मैदान में अब २६ प्रत्याशी रह गए हैं. ता. ६ दिसंबर की दोपहर ३ बजने तक नामांकन पर्चा पीछे लेने की अंतिम अवधि थी. जिसके तहत बारह प्रत्याशियों ने अपने पर्चे पीछे ले लिए. भले ही चुनाव में दमदार प्रत्याशी शामिल नहीं है लेकिन परिस्थिति बड़ी रोचक हो गई हैं. ता. २८ दिसंबर को मतदान होगा. जिसके लिए मराठवाड़ा के नांदेड़, औरंगाबाद, उस्मानाबाद, बीड, जालना, परभणी, हिंगोली, लातूर और चंद्रपुर जिले के तीन तहसीलों के मतदाता मतदान करेंगे. सूचि में १२ हजार सात सौ से अधिक मतदाताओं का समावेश हैं. 
पर्चे पीछे लेने के बाद चुनाव मैदान में २६ उमीदवार खड़े हैं, जिनमें रणजीत सिंह कामठेकर, गुरमीत सिंघ महाजन, रविंदर सिंह बुंगई, कुँजीवाले मनप्रीत सिंह, तेजपालसिंह खेड़, धूपिया जसबीर सिंह, अवतारसिंह पहरेदार, जोगिन्दर सिंह रामगाड़िया, गुलाटी हरचरण सिंह गोबिंदसिंह, ओबेराय ऋषिराज सिंह, कौशल परविंदर सिंह जगजीत सिंह, गाड़ीवाले कर्नलसिंघ, गुलबीरसिंघ नवाब, हरप्रीत सिंह लांगरी, दिगवा हरभजनसिंह, बलजीत सिंह बावरी, हरदीपसिंह घड़ीसाज, पेशकर परमजीत सिंह, प्रेमजीतसिंघ सुखाई, प्रकाश सिंह कान्सा , तेजवंत सिंह संतोकसिंघ रागी, पुजारी सतनामसिंह, बाठ हरप्रीतसिंघ आदि का समावेश हैं. 
नामांकन पीछे लेनेवालों में वर्तमान सदस्य शेरसिंघ हीरा सिंह फौजी, मोहनसिंह गाड़ीवाले, रामगडिया गुरदेवसिंघ, ओबेराय जसपालसिंह, ओबेराय ओंकारसिंह, बावरी ठाकुर सिंह, सेना गुरमीतसिंह, खैरा जोगेंद्र सिंह, बुंगाई रघबीर सिंह, चाहेल तेजपालसिंह और राजसिंघ फौजी का समावेश हैं. शेरसिंघ फौजी वर्तमान बोर्ड में सदस्य हैं. चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में रणजीत सिंह कामठेकर, गुरमीत सिंह महाजन बोर्ड में सदस्य हैं. जबकि रविंदर सिंह बुंगाई मैनेजिंग कमिटी में मेंबर हैं. 
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इस चुनाव में बड़ी हस्तियों द्वारा दुरी बनाये हुए हैं जो सामान्य मतदाताओं में चर्चा का विषय बन गया हैं. गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान के रूप में सरकार द्वारा सीधी नियुक्ति किये जाने के कारण अधिकतर संगत में रोष व्याप्त हैं. उसी तरह से बोर्ड चुनाव जितने के लिए अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल और सरकार हस्तक्षेप के कारण भी समझदार सिख चुनाव से दूर ही दिखाई दे रहे हैं.  
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बुधवार, 5 दिसंबर 2018

पुलिस द्वारा की गई अमानवीय पिटाई में सिखलीगर सिख की मौत 
कौन खड़ा रहेगा सिखलीगरों के उत्थान के लिए ? 
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रविंदर सिंघ मोदी

महाराष्ट्र पुलिस ने बेहद शर्मनाक और अमानवीय घटना को अंजाम दिया हैं. मराठवाड़ा संभाग के परभणी शहर के पास बलसा गांव में ता. १ दिसंबर की सुबह कत्ता सिंघ पिता जसमत सिंघ दुदानी नामक ५० वर्षीय सिखलीगर सिख की पुलिस द्वारा डंडे बरसाएं जाने के बाद मौत हो गई. ये गरीब सिख परिसर के एक गुरुद्वारा और निशान साहिब को तोड़ने से मना कर रहा था. 
प्राप्त जानकारी के मुताबिक मुताबिक ता. एक दिसंबर की सुबह परभणी शहर से सटे पिंगली इलाके में बलसा ग्रामपंचायत में कैनाल किनारे सिचाई विभाग की सरकारी जमीन पर से पुलिस और प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने की मुहीम शुरू की गयी. सुबह लगभग ९ बजे के समय सरकारी अतिक्रमण पथक पुलिस को लेकर वहाँ पहुंचा. पथक के कर्मचारियों ने आव देखा ना ताव देखा मकान तोड़ने शुरू कर दिए. 
अतिक्रमण पथक द्वारा प्रोक्लीन (जे.सी.बी.) मशीन की सहायता से मकान हटाने शुरू किये गए. यह मशीन जैसे ही निशान साहिब के पास पहुंची कत्तासिंघ ने निशान साहिब तोड़ने का विरोध किया. कत्तासिंघ दुदानी ने निशान साहब का कसकर पकड़ लिया और कहा कि यह हमारा पावन चिन्ह हैं इसे न तोड़े. तब पुलिस ने सत्ता सिंघ पर लाठियां भांजनी शुरू कर दी. उसकी सहायता के लिए दूसरे लोग पहुंचे लेकिन पुलिस ने लाठीचार्ज करते हुए सभी की धुनाई कर दी. उन्होंने महिलाओं को भी नहीं बक्शा. कत्ता सिंघ अभी भी निशान साहब से चिपका हुआ था तो उसकी पीठ और सिर पर पुलिस ने डंडे बरसायें. जिससे वो बेहोश हो गया. 
पुलिस ने उसे खींचकर दूर किया. लेकिन जैसे ही ये संकेत मिले की वो गंभीर रूप से घायल हो चूका है तो लाठी चार्ज बंद कर पुलिस ने उसके परिवार से वायरल हुए हैं. 
परिवार ने कुछ युवकों के साथ मिलकर आखरी सांसें गिन रहे कत्ता सिंघ को तुरंत परभणी शहर के सरकारी अस्पताल में उपचार हेतु भर्ती करवाया लेकिन उपचार के चलते ही रात में उसकी मौत हो गई. जिसके बाद जैसे सिखलीगर समाज में मातम सा फ़ैल गया. 
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घटना के बाद सिखलीगर समाज को तुरंत सहायता नहीं मिल पायी. पुलिस ने बहुत डराया. जिला प्रशासन ने भी उल्टा मामला बनाने और अपने अधिकारी एवं कर्मचारियों को तथा मारपीट में शामिल पुलिस के अधिकारी और पुलिस को बचाने का बहुत प्रयास किया. 
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ता. ३ दिसंबर को गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदर सिंघ मिन्हास, गुरुद्वारा मेंबर गुरमीत सिंह महाजन, सरजीत सिंघ गिल, रणजीत सिंह कायहाँ की जमींन पर विगत तीस वर्षों से सिखलीगर समाज के लगभग ३० परिवार मकान बनाकर रह रहे थे. उनके द्वारा वहाँ पूजापाठ के लिए एक गुरुद्वारा भी उनके द्वारा बनाया गया था. गुरुद्वारा परिसर में एक बड़ा निशान साहिब लगाया गया था. विगत तीस वर्षों से यहाँ के निवासी टैक्स भी चूका रहे हैं. 
 कहामठेकर, डी.पी. सिंह, गुरविन्दर सिंह वाधवा, सुखविंदर सिंह हुंदल, गुरप्रीत सिंह सोखी, कर्नल सिंह गाड़ीवाले, गुरमीत सिंह बेदी, मनप्रीत सिंह कुँजीवाले, जसपाल सिंह गाड़ीवाले सहित बड़ी संख्या में सिख समाज के लोग घटनास्थल पर पहुंचे. बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदर सिंह मिन्हास ने मृतक के परिवार की सांत्वना की. बोर्ड मेम्बरों द्वारा यह निर्णय भी अवगत करवाया गया कि हजूर साहिब बोर्ड द्वारा मृतक के परिवार को एक लाख की आर्थिक सहायता की जाएगी. साथ ही जिन परिवारों के मकान तोड़ दिए गए हैं उन्हें २५ हजार की मदत की जाएगी. साथ ही खुले में पड़े परिवारों के लिए सचखंड बोर्ड एक महीने तक दोनों समय का लंगर लगाएगा. 
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इस घटना से मराठवाड़ा के सभी जिलों में सिखलीगर परिवार रोष में है. सरकार द्वारा बगैंर सुचना के इस तरह से ठण्ड के दिनों में मकान तोड़ दिए जाने से महिला और छोटे बच्चे भी खुले में आ गए हैं. ता. २ दिसंबर को परभणी के जिला कलेक्टर को साधसंगत की ओर से एक ज्ञापन सौपकर मामले की जाँच कराने और गरीब सिखलीगर समाज को दुबारा मकान बनाकर देने की मांग की गई. इस समय जिलाधीश कार्यालय के सामने नारेबाजी की गई. 
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कौन लड़ेगा सिखलीगरों के लिए : 

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न ये उठ रहा हैं कि महाराष्ट्र प्रदेश में सभी ओर सिखलीगर समाज उपेक्षित और वंचित हैं. बार - बार ये समाज पुलिस बर्बरता से कांप जाता हैं. पुलिस भी सिखलीगर को पकड़कर पहले पिटाई कर देती है बाद में पूछताछ करती हैं. सिखलीगर समाज पर हुए अन्याय को लेकर लड़ने के लिए उस संभ्रांत सिखों की जरुरत हैं जो स्वयं को उच्च प्रति के सिख मानते हैं. हालांकि सिखलीगर समुदाय ऐसा है जो केश और ककार रखता हैं. सिखलीगर समाज ने कभी केश कत्तल कर सिक्खी छोड़ी नहीं. १९८४ के कठीण दौर में भी सिखलीगर समाज ने सितम झेले पर सिक्खी नहीं छोड़ी. सिखलीगर समाज के उत्थान के लिए सिख समाज को एकजुट होकर लड़ने की जरुरत हैं. हजूर साहिब के सिक्खो पर बहुत कुछ निर्भर करता हैं. राजनीति को अलग रखकर आज पुलिस बर्बरता की घटना को गंभीरता से लेने की जरूरत हैं. उसी तरह सिखलीगर समाज और समुदाय के नेताओं से भी प्रार्थना है की इस विषय को संजीदगी से ले. गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के चुनाव से प्रभावित होकर कोई काम न करें. सबसे पहला काम तो बेघर हुए सिखलीगर परिवारों को सरकारी आवास बनवाकर दिलाने का हैं. सामूहिक रूप से ये प्रयास सभी को करना होगा. 
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