यह सैक्रिफाइस इलेक्शन है - रविंदर सिंघ मोदी
आपका अंतिम मौका चला गया !!!
गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर साहिब मंडल (बोर्ड ) के चुनाव ता. 28 दिसंबर 2018 को हो रहे हैं. मराठवाड़ा के सिख मतदाता अपने तीन सदस्यों का चयन करेंगे. अपने प्यारे प्रतिनिधि चुनेगे. उन्हें गुरुद्वारा बोर्ड में जिम्मेदारियों सहित भेजेंगे. हमारी आकांक्षाएं बहुत हैं. हम बहुत आशावाद पाल रहे हैं. लेकिन हकीकत से रूबरू होना भी जरुरी है.
आज मैं यह खुलासा करना चाहता हूँ कि वास्तविकता हमारी सोच और अपेक्षाओं से कुछ अलग है. हकीकत यह है कि ये चुनाव साधसंगत की मांग पर नहीं हो रहे हैं. बल्कि भाजपा विधायक तारा सिंह की रणनीति का ही यह एक हिस्सा है. तारा सिंह को अपना नया बोर्ड स्थापित करने की जल्दी है. उसने गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट की कलम 6 का संशोधन अभी तक भी रद्द नहीं करवाया हैं. क्योंकि सरकार जो योजनाबद्ध तरीके से करना चाह रही है तारा सिंह बखूबी वही अंजाम दे रहा हैं. बोर्ड का कानून पूरी तरह बदल कर सरकार हजूर साहिब के सिखों के हाथों से बोर्ड छीनना चाह रही है. दूसरा यह कि मुम्बईया लॉबी यहाँ अपना एकाधिकार स्थापित करना चाह रही हैं. ये चुनाव मात्र बाहरवालों की यहाँ सत्ता स्थापित करने की योजना हैं. तारा सिंह अपने भांझे - भतीजे और मुंबई के पैसे वालों के साथ ताजपोशी के लिए तैयार है. जैसे हि 31 दिसंबर को तीन सीटों के चुनाव नतीजे घोषित हो जायेंगे वैसे ही नए बोर्ड गठन की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएंगी.
मैंने इन चुनावों को "सैक्रिफाइस चुनाव" का नाम दिया है. बलिदान!! जिसका मुख्य कारण यह है कि हजूर साहिब के सिखों की इस चुनाव को दिल खोलकर दी गई स्वीकृति. सरकार ने चुनाव लादे और सभी ने उत्साह के साथ उसे स्वीकार कर लिया ! किसी ने चुनाव का बहिष्कर नही किया. प्रशासन ने प्रक्रिया शुरू की तो मतदाता सूचि में नाम डालने की जल्दबाजी भी हुई. क्योंकि बहुत से लोगों को मेंबर बनने की जल्दी थी. किसी ने यह नहीं सोचा कि आगे क्या होगा?
चुनाव प्रक्रिया को लेकर जहां लोगों में उत्साह देखा जा रहा है, वो उत्साह कलम 11 और कलम 6 के संशोधन के ख़िलाफ़ नहीं देखा गया. बहुत अफ़सोस की बात है कि हजूरी संगत अपने बोर्ड को बचाना छोड़ कर उस तारा सिंह के चुंगल में फंस गए जिसने आपके पवित्र स्थल के प्रबंधन के सूत्र सरकार को सौंप दिए. आपकी सिक्खी को इसलिए प्रणाम कि आपने छिन्नेवालों को ही अपना नेता कबूल कर लिया. जिनका तन मन हजूरी बोर्ड के लिए समर्पित है उनका नेता तारा सिंह कैसे हो सकता हैं? यह नहीं होना चाहिए था.
तारा सिंह द्वारा लादे गए चुनाव अपनाकर और उसका फिर से बोर्ड गठित कर हजूर साहिब के वफ़ादार सिख क्या साबित कर रहे हैं ? ये चुनाव अंतिम अवसर है इसके बाद तो चुनाव होना भी मुश्किल है. इसीलिए मैंने इसे सैक्रिफाइस चुनाव कहा है कि हमने वो सबकुछ कर दिया जो बाहर वाले चाहते हैं. हजूरी सिखों ने इन चुनावों के माध्यम से बोर्ड का बलिदान कर दिया ये मानकर चले. यह एक कड़वी सच्चाई हैं. अब आपके हाथ सिर्फ नौकरियां मांगना रह गया है. प्रतिकार नहीं करने, नहीं लड़ने की कोई तो किंमत चुकानी होगी. आगे चलकर ये कहावत मशहूर हो जाएगी कि "हाथ का बोर्ड गंवाना कोई हजूर साहिब के निष्ठावान सिखों से सीखे".
गुरुतागद्दी त्रिशताब्दी के समय भी बहुत सी समस्याएं प्रस्तुत हुई थी पर कोई नहीं लड़ा था. जिसका परिणाम ये हुआ कि हजूर साहिब के सिखों में लड़ने की प्रवृत्ति ही समाप्त हो गई. एकबार फिर साबित हो गया हैं कि हम केवल एकदूसरे के साथ ही लड़ सकते हैं. सरकार के खिलाफ संघर्ष तक नहीं कर सकते. लड़ने वालों की टाँगे खींच सकते हैं. जो होना था वही हो रहा हैं? किसी को कोई खबर नहीं हैं. इसीलिए तो मैं कह रहा हूँ कि यह "बलिदान चुनाव" हैं. जो लोग चुनाव में जीत कर आएंगे उनमें से कोई भी ये मादा नहीं रखता कि हजूरी प्रधान वो बनाएगा. यहाँ तारासिंह को हटाना हमारे बस में नहीं है. क्योंकि हमें अब तक लगता था कि तारासिंह अकेला सब कुछ कर रहा हैं. लेकिन अब यह तथ्य सामने आ रहा हैं कि तारा सिंह ने भी जैसे बोर्ड को सरकार के अधीन करने की सुपारी उठाई हैं. बाद में यहाँ का बजट, सत्ता, आराम, चापलूस, चाकर और सुविधाएँ देखकर उसने कायम का यहां सत्ता में रहने का मन बना लिया हो. कुछ भी हो हमने अंतिम अवसर भी खो दिया हैं यह मानकर चलिए. ये खरी-खरी बातें बुरी लग रही हो तो लगे, क्षमा मांगना भी एक तरह से पक्के हजूरी विचारों से बेमानी होगी.
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रविंदर सिंघ मोदी









