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सोमवार, 21 अगस्त 2023

गुरुद्वारा बोर्ड संस्था से हाथ धोएगा हजूरी समाज? 

तखत सचखंड श्री हजूर अबचल नगर साहिब, नांदेड़

रविंदरसिंघ मोदी 

मैंने अपनी पत्रकारिता के तीस वर्षों में हजूर साहिब के हजूरी समाज को इतना बेबस और कमजोर कभी नहीं देखा. हजुरसाहिब के बाशिंदों में राजनीतिक एवं सामाजिक बिखराव स्पष्ट रूप से झलक रहा हैं. पिछले सात - आठ वर्षों से गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था का संचालन बाहरी लोगों के हाथ होने से समाज का अर्थकारण भी प्रभावित हो गया हैं. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बोर्ड की सत्ता हांकनेवालों ने प्रबंधन के नाम पर अधिक गोरखधंदा ही संचालित किया. सन 2018 - 19 के चुनावों ने समाज को दो से तीन धड़ों में विभाजित कर दिया था. जिससे एक लंबे समय से समाज बँटा हुआ देख रहा हूँ. राजनेताओं के लिए कुछ नया करने हेतु कोई माध्यम उपलब्ध नहीं रहा. समाज से संबंधित कोई सामाजिक प्रोजेक्ट भी नहीं है इसलिए एक बिखरे हुए समाज का चित्रण अभिव्यक्त करना कठिन नहीं होगा. 

मैं स्पष्ट रूप से यह आकलन कर पा रहा हूँ कि हजुरसाहिब के स्थानीय बाशिंदों के हाथों से गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था छीन ली जा रहीं हैं. हमें कलम ग्यारह के विषय में उलझाएं रखकर मुंबई की षडयंत्रकारी शक्तियां बोर्ड कानून का सबसे घातक संशोधन करवाने की योजना पर काम कर रही हैं. मुंबई और ठाणे के सदस्य भर्ती के साथ बारह का बहुमत हाथ रखने का षड्यंत्र! जिसके चलते, अब हजुरसाहब के लोगों के हाथों से बोर्ड का प्रबंधन हमेशा हमेशा के लिए निकल जाने वाला है मानलो! आनेवाले समय में सिंघ सभा गुरुद्वारों से बोर्ड की सत्ता हाँकी जायेगी और हजुरसाहिब के लोग विवशता के घूँट पीकर रह जायेंगे. वह दौर लादने की जिद्दी कोशिश मुंबई और ठाणे से की जा रहीं हैं. जिनके बाल - बच्चे सिर मुंडे हैं, जिनके घर शराब बंटती हैं वें लोग हजुरसाहिब का प्रशासन चलाने के लिए दंड बैठकें पेल रहें हैं. 

हजुरसाहिब के स्थानीय लोगों में और मुंबई के हाईप्रोफाइल सिखों की जीवनशैली और सोंच में काफी अंतर है. कुछ बातें कड़वी लग सकती हैं लेकिन सच कहना ही होगा. नांदेड़ के सिखों की कोई राजनीतिक पहचान कायम नहीं हैं. नांदेड़ में राजनीतिक पार्टियों ने सिखों को पार्टी में कोई अच्छा ओहदा भी नहीं दें रखा हैं. शहर उपाध्यक्ष पद से ज्यादा क्या दिया गया हैं. ऐसे पद नाम के लिए होते हैं. पार्टियों के पास चार से छह उपाध्यक्ष, चार से पांच सेक्रेटरी या अन्य कनिष्ठ पद होते हैं. उससे ज्यादा कुछ नहीं दिया जाता हैं. यह पद भी इसलिए कि आगे पीछे घूमने और सिखों की शक्ति का इस्तेमाल किया जा सकें. सिखों की पहुँच यहाँ के नेताओं के घर तक ही बन पाती हैं. 

दूसरी ओर मुंबई, ठाणे और पुणे के सिखों की राजनीतिक पहुँच बहुत बड़ी होती हैं. उनके संबंध सीधे मंत्रियों और मुख्यमंत्री तक होते हैं. उन्हें बादल, सिरसा और धामी जैसे नेताओं का सहयोग प्राप्त हो जाता हैं. यहाँ हम एक विधायक नहीं खोज पाए कलम ग्यारह के प्रस्ताव को विधानसभा में प्रस्तुत करने के लिए और उधर उनके लिए मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री के घर पहुंचना आसान हैं. उनके लिए रामदेव बाबा भी योग छोड़कर सिफारिशें करने के लिए दौड़ते हैं. उन राजनीतिक प्रवृत्ती के सिखों के पास पैसों का जुगाड़ भी कठिन नहीं हैं. उनके साथ हमारी प्रतियोगिता हो नहीं सकती. ऐसे बाहरी लोग चाह रहें हैं कि हजुरसाहिब बोर्ड उनके अख्तियार में रहें. हमेशा, हमेशा के लिए रहें. 

हजुरसाहिब की धरती पर सन 1708 से ही सिखों का निवास हैं. दशमेश पिताजी की उर्जास्थली की सेवा और रख-रखाव पंजप्यारे भाई दयासिंघजी और भाई धरमसिंघजी के मार्गदर्शन में होता रहा. उनके पश्च्यात भी सिखों ने यहाँ समर्पण के साथ अपनी सेवाएं प्रदान की. सन 1831 के बाद शेर - ए - पंजाब महाराजा रणजीतसिंघजी की लाहोरी खालसा फौज का यहाँ आगमन हुआ और सिखों की आबादी में थोड़ा इजाफा हुआ. कालान्तर से सिख समुदाय मराठवाड़ा, तेलंगाना, कर्नाटका तक विस्तारित होता चला गया. जिसे हम दक्खन देश कहते हैं और इस क्षेत्र के निवासी दक्खनी ! 

हजुरसाहिब के सिक्खों को दक्खनी नाम पंजाबियों ने दिया. हजूरी तो हम स्वयंघोषित हैं. हजूरी संस्कृति का कोई मजबूत खाका अमल में नहीं होने से हम यह कह सकते हैं कि अभी हमारी संस्कृति युवा नहीं हुईं है. हमें अभी लंबा सफ़र तय करना है. सफ़र आसान नहीं हैं. हजूरी अथवा दक्खनी संस्कृति पर बस आक्रमण ही आक्रमण होने हैं. दक्खन को पंजाब बनाने की कोशिशें हर पल होती रहेगी. कालान्तर से हम हजूरी बनें रह पाएंगे क्या यह भी प्रश्नचिन्ह है? सबसे पहले आपकी संस्था छीन लीं जायेगी पश्च्यात संस्कृति. 

आप सभी का दर्द कलम ग्यारह का वो संशोधन है जिसके आधार पर गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड पर सीधे सरकारी प्रधान लादें जा रहें हैं. सरकार ने सन 2015 में स्व. तारा सिंघ (तत्कालीन विधायक, मुंबई) को पहला प्रधान बनाकर भेजा. तीव्र विरोध हुआ. लेकिन एसजीपीसी की अंदरूनी सहायता से तारासिंह सफल रहा. एसजीपीसी का मीत प्रधान साथ में लेकर उसने खूब दादागिरी से प्रशासन चलाया. कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने के चॉकलेट तारासिंह बार - बार देता था. लेकिन उसने कलम का संशोधन पीछे लेने के बजाय कलम 6 का विस्तार कर मुंबई और ठाणे के सदस्य बढ़ाने का ख़तरनाक खेल खेला था. उस समय हजुरसाहिब की साधसंगत को मैंने समय पर अगाह किया और अख़बारों में लेख लिखकर जागरूकता बधाई. स्थानीय सिखों के बहुत विरोध के बाद कलम 6 का बिल सरकार ने बगैर कन्फर्मेशन किये छोड़ दिया. तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि वो बिल अपने आप लैप्स हो जायेगा. पता नहीं चल पाया कि आगे क्या हुआ. उस बिल को छह माह में अपने आप लैप्स हो जाना चाहिए था. कानून है! यह विषय सबसे बड़ा ख़तरा बना हुआ हैं. मुंबई स्थित एसजीपीसी के सदस्य उसी पुराने बिल को फिर से जिन्दा करने की कोशिश कर रहें हैं. ऐसे में कलम ग्यारह तो हर हाल में रद्द करवानी पड़ेगी, क्योंकि उसे हटाकर ही बोर्ड पर बाहरी लोग सत्ता कर पाएंगे. इस तरह से एक लंबी सोंच मुंबई की इन हस्तियों द्वारा अपनाई जा रहीं हैं. 

पिछले आठ साल में बार - बार वायदे कर मुकर जाने वाले लोग अब मीटींग करवाकर समाज को उलझाने के प्रयास में हैं. एसजीपीसी वाले हर हाल में बैठक करवाने पर आमदा है. उन्होंने अभी हाल ही मुंबई में बैठक करवाने का प्रयास किया था पर हजुरसाहिब से वहां कोई गया नहीं. पश्च्यात अब रणजीतसिंह कामठेकर के माध्यम से नांदेड़ के सीटी प्राइड होटल में एक मीटींग रखीं गई हैं. हम यह तर्क रख सकते है कि सरदार रणजीतसिंह कामठेकर हजूरी संस्कृति अंश है. फिर भी यह विश्वास के साथ कहा नहीं जा सकता कि वें हजुरसाहब के पक्ष में पहल करेंगे या एसजीपीसी के पैटर्न का. रणजीतसिंह कामठेकर कभी भी, किसी हाल में सरदार परमज्योतसिंघ के खिलाफ भूमिका नहीं अपना सकते, यह शाश्वत सत्य है. जब यह आलम है, तब सिटी प्राइड की बैठक आयोजन के पीछे का मकसद क्या होगा इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है. 

दिलचस्पी इस बात की रह जाती है कि बैठक में उपस्थित होने वाले सभी लोग उस हजूरी संस्कृति की आन लेकर बैठक में बैठनेवाले हैं क्या? ये लोग एसजीपीसी की खूँटी पर कहीं दक्खनी संस्कृति टांगने तो नहीं चलें हैं? हमारी समस्याएं, हमारे प्रश्नं यहीं छटपटा रहें हैं. समाज के बहुत सारे ज्वलंत प्रश्नं हैं. सवाल है कि ऐसी बैठक स्थानीय हजूरी लोगों द्वारा रखीं जानी चाहिए थीं. जिसमें एसजीपीसी का कोई तत्व उपस्थित ना होने पाए. हमें खुलकर दक्खनी सिखों की समस्या पर बोलने का मौका तो मिलें! हजुरसाहिब के स्थानीय लोगों को चाहिए कि वें पुरी क्षमता के साथ कलम ग्यारह के पिछले संशोधन को रद्द कर बोर्ड 1956 एक्ट को पहले की जैसा करें. इसके लिए हजुरसाहिब के लोगों को एकजुटता का परिचय देते हुए स्वतंत्र पहल करनी चाहिए. 

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बुधवार, 16 अगस्त 2023

 कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने का प्रोसीजर क्या है? 

अधिवेशन समाप्त हो गया अब कहाँ रद्द होगी कलम ग्यारह? 

रविंदरसिंघ मोदी 

मुंबई के एसजीपीसी मेंबर जी तोड़ कोशिश कर रहें हैं कि उनके बुलावे पर हजूर साहिब के बाशिंदे हाथ जोड़कर मुंबई बैठक में उपस्थित हो जाए. हजुरसाहिब के हक़दारो को इनकी निय्यत और पिछली कारगुजारियों पर आवश्य नज़र मारनी होगी. यह अपने घर बुलाने वाले होते कौन हैं. गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड का हेडक्वार्टर हजुरसाहिब नांदेड़ हैं. 

हजुरसाहिब के लोगों को मुंबई बुलाने का मकसद भाटिया कमेटी की रिपोर्ट के तहत गुरुद्वारा बोर्ड में मुंबई और ठाणे तथा अन्य सिंघ सभा गुरुद्वारों के मेंबर लादने की कोशिश है. कलम ग्यारह हटने के बाद मुंबई अथवा एसजीपीसी का प्रधान बनना कठिन है. इसलिए पहले मुंबई के सदस्य बढाकर बहुमत पक्का करने का उनका इरादा हैं. 

कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने की सही प्रक्रिया क्या है मैं थोड़े में बता दूँ. यह संशोधन केवल विधानसभा के अधिवेशन के दौरान चर्चा कर रद्द किया जा सकता हैं. किसी विधायक (आमदार) को चर्चा के लिए यह प्रस्ताव विधानसभा में प्रस्तुत करना होता हैं. उसके पश्च्यात सभा में बहुमत से उसे पास अथवा रद्द करवाना होता हैं. मुंबई वाले किस तरह बेवकूफ बना रहें देख लीजिये. अभी मुंबई में जब तक अधिवेशन चल रहा था इन्होंने पहल नहीं की. अभी कुछ दिन पहले अधिवेशन समाप्त हो गया है. अधिवेशन समाप्त होने के बाद कलम ग्यारह रद्द करने की बैठक यह मुंबई में लेने जा रहें हैं. ऐसी किसी बैठक लेने से पहले कलम ग्यारह की सात सदस्य ड्राफ्ट कमेटी का ड्राफ्ट आदरणीय जत्थेदार साहिब के पास पेश कर सुपरिन्टेन्डेन्ट साहब के मार्फत और जिलाधीश कार्यालय के पत्राचार से रीतसर उसे मंत्रालय में प्रस्तुत करना हैं. पहले यह काम करें. स. गुरविंदरसिंघ बावा ने ता. 12 और 13 जून 2019 को हजुरसाहिब में बहुत वायदे किये थे. चार टॉवर खड़े करेंगे. यात्री निवास तोड़ डाला गया. एक ईंट भी नहीं लगा पाए. उन्हें सन 2019 की रैनसभाई में दिया हुआ अपना ही भाषण जाँच लेना चाहिए. हजुरसाहिब में बहुत दिनों से शांति का वातावरण बना हुआ हैं उसे अब ख़राब करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. 

सरदार परमज्योतसिंघ चाहल कृपया यह बताये कि कलम ग्यारह का विषय विधानसभा अधिवेशन के बगैर कहाँ निराकरण हो सकता है? हो सकता हैं क्या बताइये हजुरसाहिब को. आप सब जानते हुए हुए भी हजुरसाहिब के लोगों को टिकीट बाँटने में लगें हो. आप हजुरसाहिब आइये और पहले ड्राफ्ट का कर्तव्य पूरा कीजिये हम आपके आभारी रहेंगे. कलम ग्यारह अब अगले अधिवेशन में रद्द हो सकती हैं. उस अधिवेशन के लिए अभी चार माह का समय हैं. हजुरसाहिब के बाशिंदे कृपया यह जाँच ले. धन्यवाद !

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सोमवार, 14 अगस्त 2023

 डॉ विजय सतबीरसिंघ ने बोर्ड का प्रभार संभाला 

तखत साहब पर हुआ सम्मान 

डॉ विजय सतबीरसिंघ रविवार की शाम तखत सचखंड श्री हजूर साहिब में मत्था टेकने के बाद. 

रविंदरसिंघ मोदी 

पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डॉ विजय सतबीरसिंघ ने आखिर सोमवार की सुबह गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड के प्रशासक पद का प्रभार स्वीकार कर लिया. तमाम विवादों और विरोध को नज़र अंदाज़ कर श्री विजय सतबीरसिंघ रविवार ता. 13 अगस्त के दिन नांदेड़ पहुँचे थे. उन्होंने कल शाम तखत सचखंड हजुरसाहिब दरबार साहिब पहुंचकर मत्था टेका. इस अवसर पर उनके साथ दो पारिवारिक सदस्य भी थे. 

तखत साहिब के जत्थेदार संतबाबा कुलवंतसिंघजी और पंजप्यारे साहिबान द्वारा उन्हें पारंपरिक रूप से चोला, दस्तार, हार और श्रीसाहब देकर सम्मानित किया गया. ऐसी जानकारी गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के अधीक्षक सरदार ठानसिंघ बुंगाई द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में दीं गई. 

गुरुद्वारा बोर्ड प्रशासक का पदभार सँभालने के पश्च्यात डॉ विजय सतबीरसिंघ ने कहा कि वें गुरु घर की सेवा के लिए सदैव सेवक बनकर कार्य करने के इच्छुक हैं. डॉ विजय सतबीरसिंघ सेवानिवृत्ति से पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा के ऊँचे ओहदे पर कार्यरत थे. महाराष्ट्र प्रदेश में वें एडिशनल चीफ सेक्रेटरी पद से सेवा निवृत्त हुए. उन्होंने नांदेड़, अमरावती, मुंबई में अनेक ओहदो पर पारदर्शिता के साथ सेवा निभाई थीं. 

गुरुद्वारा बोर्ड के सूत्र स्वीकारते हुए डॉ विजय सतबीरसिंघ. साथ है अधीक्षक स. ठानसिंघ बुंगाई. 

उच्च शिक्षित डॉ विजय सतबीरसिंघ ने अमृतसर से एमबीबीएस पूर्ण की थीं. पश्च्यात उच्च पढ़ाई के लिए अमरीका की हारवर्ड यूनिवर्सिटी और इंग्लैंड की मेनचेस्टर यूनिवर्सिटी से उच्च पदवी प्राप्त की थीं. डॉ विजय सतबीरसिंघ इससे पूर्व सन 2014 में गुरुद्वारा बोर्ड के प्रशासक रहें थे. इस बार उनकी नियुक्ति काफी नाटकीय रहीं है. अभी एक सप्ताह पूर्व ही महाराष्ट्र सरकार ने डॉ परविंदरसिंघ पसरीचा को प्रशासक पद से हटाकर गुरुद्वारा बोर्ड के नये प्रशासक के रूप में नांदेड़ के जिलाधीश डॉ अभिजीत राऊत को प्रशासक नियुक्त किया था. लेकिन गुरुद्वारा बोर्ड पर गैर सिख प्रशासक की नियुक्ती का पंजाब, दिल्ली और अन्य स्थानों से विरोध होने लगा था. जिसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने अभिजीत राऊत के स्थान पर सेवानिवृत्त अधिकारी डॉ विजय सतबीरसिंघ को बोर्ड के प्रशासक के रूप में नियुक्त कर डाला. 

हजुरसाहिब के स्थानीय निवासियों में डॉ विजय सतबीरसिंघ की नियुक्ति को लेकर खासा विरोध जारी हैं. उन्होंने इससे पूर्व वर्ष 2014 से 2015 के कार्यकाल में गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कानून 1956 एक्ट को बदलने का काफी प्रयास किया था. उन्होंने नांदेड़ के स्थानीय निवासियों से बगैर चर्चा किए ही जस्टिस जगमोहन सिंघ भाटिया की रिपोर्ट लागु करने के समर्थन में भूमिका निभाई थीं. अभी भी उनके प्रति संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि वें गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड एक्ट में बदलाव करने की भूमिका में ना आ जाए. उनको लेकर हजुरसाहिब में असंतोष भी व्याप्त हैं. 

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रविवार, 13 अगस्त 2023

सिरसा जी यह पाप सिर पर ना लीजिये!

मुंबई में एसजीपीसी वालों की गुप्त मीटिंग !

'कलम ग्यारह' चर्चा की आड़ में 'भाटिया कमिटी' करेंगे लागु?

रविंदरसिंघ मोदी 

एसजीपीसी के मुंबई स्थित सदस्य स. गुरविंदरसिंघ बावा ने अचानक से मुंबई स्थित उनके घर (होटल) पर आनेवाली ता. 17 और 18 अगस्त को एक बैठक आयोजन करने का ऐलान किया हैं. बावा के विशेष दूत और एसजीपीसी के सदस्य परमज्योतसिंघ चहल उस बैठक के आयोजन के लिए जी तोड़ प्रयास कर रहें हैं. उन्होंने कलम 11 विचार मंथन के नाम से एक व्हाट्सप्प ग्रुप भी शुरू किया है जिसमें हजुरसाहिब के सक्रिय नेताओं और कार्यकर्ताओं को जोड़ा जा रहा हैं. यह अचनाक से कलम ग्यारह के निराकरण के विषय में मुंबई में बैठक रखने का अधिकार उन्हें किसने दिया? सब जानते हैं कि वो पिछला अधूरा काम यानी भाटिया कमेटी की रिपोर्ट के तहत 'कलम 6 के प्रावधान' को बदलकर मुंबई के 6 सदस्य, ठाणे, पुणे और महिला सदस्य बोर्ड में नॉमिनेशन के जरिये लादने का मनसूबा पूरा करने का यह प्रयास कर रहें है. पहले उस समय, हमने आपकी उस हिमायत को रोक कर सरकार से वो प्रावधान रुकवाया था. तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस ने वो बिल निरस्त करने की घोषणा की थीं. लेकिन विधानसभा में उसे रद्द नहीं किया गया था. अब पूरा का पूरा गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड हाईजैक करने की छुपी योजना (साजिश) पूर्ण करना चाह रहें हैं. यह हजुरसाहिब के सच्चे हक़दारों के सामने करने की आपकी हिमायत कैसे हो रहीं हैं? आपकी राजनीतिक दादागिरी नहीं चलेगी. हजुरसाहिब निवासियों के हाथों से गुरु घर के प्रबंधन को हमेशा हमेशा छीनने का "पाप" शायद भाजपा नेता मनजिंदर सिंघ सिरसा से करवाया जा रहा हैं. आनेवाली 17 अगस्त को आयोजित परमज्योतसिंघ चाहल के समन्वय वाली उस मुंबई की बैठक में हजुरसाहिब के बहुत से दिग्गज उपस्थित होने जा रहें हैं. मीटिंग में उपास्थित रहने के लिए अभ्यार्थियों को ट्रेन के टिकट देना का प्रयोजन किया गया हैं. रहने की व्यवस्था भी गुरविंदरसिंघ बावा के होटल में की जा रहीं हैं, ऐसी खुलीं चर्चा यहाँ चल रहीं हैं. 

मनजिंदरसिंघ सिरसा और दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी मुंबई में श्री देवेंद्र फडणवीस के बँगले पर बयान जारी करते हुए. 

अभी दो दिन पहले तखत सचखंड हजुरसाहिब बोर्ड के प्रशासक नियुक्ति के विषय को लेकर जो नाट्यक्रम घटित हुआ वो जग जाहीर हैं. सबने देखा और बहुत कुछ महसूस किया. हजुरसाहिब के लोगों को गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के प्रबंधन से कैसे दूर रखा जाए उसके लिए एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल ने कितनी तत्परता दिखाई. कितनी ताकत दिखाई सबने देखा हैं. किस तरह मनजिंदरसिंघ सिरसा ने एक ही बैठक में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और आधुनिक राजनीति के चाणक्य श्री देवेंद्र फडणवीस को शीशे में उतार दिया. सिरसा ने अपनी इच्छा (मांग) मनवा भी लीं और यह संदेश दें दिया कि हजुरसाहिब बोर्ड पर वहां के स्थानीय लोगों की नहीं बल्कि भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के आधिपत्य वाली सत्ता रहेगी. श्री सिरसा ने नांदेड़ के जिलाधीश डॉ अभिजीत राऊत को तब्दील कर डॉ विजय सतबीरसिंघ की नियुक्ति करवा डाली. इस नियुक्ति को लेकर मुंबई निवासी एसजीपीसी वालों ने जो स्वार्थी खेल की चौसर बिछाई हैं, उसमें हजुरसाहिब के लोग फँसनेवाले हैं. पहले प्रधान पद गया अब पूरा कि पूरा बोर्ड हाथ से जानें वाला हैं. 

मुंबई में गुप्त मीटिंग? 

सरदार मनजिंदरसिंघ सिरसा, उनके हालिया मुंबई दौरे में सरदार गुरविंदरसिंघ बावा के पास ठहरें थे. मुंबई में श्री सिरसा और गुरविंदरसिंघ बावा की टीम के बीच गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड के एक्ट संशोधन को लेकर गुप्त मीटिंग भी हुईं. उस मीटिंग में संभवतः यह तय हुआ है कि कलम ग्यारह के पिछले संशोधन को निरस्त करवाते समय जो मसौदा सरकार द्वारा पारित करवाना है वो मसौदा भाटिया समिति की रिपोर्ट के आधार पर 22 सदस्यीय बोर्ड का हो. जिसमें मुंबई शहर के छह सिंघ सभा गुरुद्वारा के प्रधान अथवा प्रतिनिधि को सीधे बोर्ड का सदस्य मनोनीत किया जाए. ठाणे से भी एक सदस्य मनोनित किया जाए. वहीं मुंबई से एक महिला प्रतिनिधी की सीधी नियुक्ति की जाए, ऐसे कुल 12 सीटों पर एसजीपीसी प्रोत्साहित लोगों की नियुक्ति के प्रावधान हैं. मराठवाड़ा के सिखों के लिए सात सीटों पर चुनाव करवाएं जायेंगे. यानी, हजुरसाहिब वालों के बजाए मुंबई के लोग जनमोजन्मो तक बोर्ड की सत्ता पर रहेंगे. उनके पास 12 का बहुमत हमेशा उपलब्ध रहेगा. हजुर साहिब के लोग चुनाव लड़कर बँटे रहेंगे. यह काम अब पूर्ण ताकत और क्षमता के साथ होने जा रहा हैं. अब सिरसा एंड कंपनी तथा शिरोमणि अकाली दल की हिमायत को ना श्री अशोकराव चव्हाण रोक पाएंगे ना कि नांदेड़ के सांसद श्री प्रतापराव पाटिल चिखलीकर ही रोक पाएंगे. क्योंकि बोर्ड का संचालन इन दिनों जलगांव से संचालित हो रहा है! नांदेड़ जिले के पालकमंत्री महोदय भी आजकल गुरुद्वारा की समस्याओं के प्रति सुध नहीं लेते. नांदेड़ के नेताओं के हाथ कुछ नहीं रहा. एसजीपीसी उनके सिर पर प्रशासन कर रहीं हैं. यदि भाटिया समिति की रिपोर्ट लागु हुईं तो माना जायेगा कि दी सिख गुरुद्वारा ऑल इंडिया एक्ट का रास्ता साफ हो जायेगा. 

नांदेड़ के पालक मंत्री किसके साथ? 

हमारा सवाल है स. परमज्योतसिंघ चाहल से कि आदरणीय पंजप्यारे साहिबान द्वारा सन 2019 में स्थापित सात सदस्यीय समिति का कलम ग्यारह के संशोधन को रद्द करवाने के लिए ड्राफ्ट बनाकर पंजप्यारे साहिबान के पास क्यों पेश नहीं किया गया? चार सालों में एक छोटा सा ड्राफ्ट मंत्रालय तक नहीं पहुँचा पाए? आप भूपिंदरसिंघ बोर्ड के समन्वयक थे. कलम ग्यारह रद्द करवाने का आश्वासन आपके साथ सभी ने दिया था. सात सदस्य समिति ने वो ड्राफ्ट पेश नहीं किया और बात अभी वहीं रुकीं हुईं हैं. मुंबई मीटिंग से पहले उस ड्राफ्ट का मसौदा आदरणीय पंजप्यारे साहिबान के पास पेश किया जाए ऐसी नैतिक मांग है. हजुरसाहब बोर्ड के संबंध में सभी बैठक हजुरसाहिब में होनी चाहिए. हजुरसाहिब की साधसंगत के प्रति गुरविंदर बावा एंड कंपनी अपना द्वेष ख़त्म करें यहीं परामर्श हैं. अंत में याद दिला दूँ, श्री अकाल तखत साहिब जी का हुकुमनामा (आदेश) है कि "एक ही घर में श्री गुरु ग्रंथसाहिब और शराब साथ नहीं रह सकते!"


सरदार जगदीप सिंघ नंबरदार द्वारा जानकारी कानून के तहत संगृहीत की गई जानकारी में देखिए 👇👇

जगदीपसिंघ नंबर ने माहिती अधिकार में जाँच की तो पता चला की सात सदस्य समिति द्वारा सरकार से कोई पत्रव्यवहार किया नहीं गया!👇




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शनिवार, 12 अगस्त 2023

 सिरसा ने पासा फीट करवा दिया? 

विजय सतबीरसिंघ गुरुद्वारा बोर्ड के प्रशासक बनें

भाटिया समिति की सिफारिशें लादने की रणनीति 

मुंबई में देवेंद्र फडणवीस से मुलाक़ात कर नांदेड़ के कलेक्टर को हटाने की मांग प्रस्तुत करते भाजपा नेता मनजिंदर सिंघ सिरसा. 

रविंदरसिंघ मोदी 

भारतीय जनता पार्टी के नेता मनजिंदरसिंघ सिरसा का मुंबई में बनाया गया वीडियो (क्लिप) शोशल मीडिया पर खूब धूम मचाए हुए हैं. उस वीडियो क्लिप के माध्यम से श्री सिरसा महाराष्ट्र सरकार से पहले यह घोषणा करते नज़र आ रहें हैं कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के नवनियुक्त प्रशासक नांदेड़ के जिलाधीश श्री अभिजीत राऊत को हटाकर उनके स्थान पर पूर्व आईएएस अधिकारी और पूर्व प्रशासक श्री विजय सतबीरसिंघ की नियुक्ति की जा रहीं हैं. सिरसा ने कुछ फोटो ट्वीटर पर भी जारी किये हैं जिनमें उपमुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस के साथ त्रिसदस्यीय शिष्टमंडल की चर्चा का दृश्य दिखाई पड़ रहा हैं. 

गौरतलब है कि पूर्व विधायक और भाजपा का सिख चेहरा श्री मनजिंदरसिंघ सिरसा और दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के श्री हरमीतसिंघ कालका की अगुवाईवाले शिष्टमंडल ने ता. 11 जुलाई 2023 की सुबह मुंबई में महाराष्ट्र के गृहमंत्री एवं उपमुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस से उनके निवासस्थान पर भेट की. श्री सिरसा ने नांदेड़ स्थित गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था के प्रशासक के रूप में गैर सिख की नियुक्ति का विरोध प्रस्तुत कर उन्हें पद से हटाकर सिख अधिकारी या पूर्व आईएएस अधिकारी विजय सतबीरसिंघ बाठ की नियुक्ति की मांग प्रस्तुत कर डाली. नियुक्ति करवा भी डाली. 

श्री विजय सतबीरसिंघ, पूर्व IAS 

श्री देवेंद्र फडणवीस, भाजपा के अपने सहकारी की मांग भला कैसे टालते. उन्होंने फटाफट आश्वासन भी दे डाला कि नये प्रशासक अभिजीत राऊत को हटाकर श्री विजय सतबीरसिंघ (सेवा निवृत्त आईएएस अधिकारी) की गुरुद्वारा बोर्ड के प्रशासक के रूप में नियुक्ति की जाये. फिर क्या था..... महाराष्ट्र के राजस्व मंत्रालय के हरकत में आने से पहले श्री सिरसा ने वीडियो जारी कर बयान शुरू कर दी. वैसे सिरसा जी से सर्वसामान्य रूप से पूछना चाहूंगा कि आपको इस कार्य के लिए भेजा किसने हैं? एसजीपीसी ने, शिरोमणि अकाली दल ने, भाजपा ने या मुंबई में बैठकर गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड पर भाटिया आयोग की सिफारिशें लागु करवाने हेतु बोर्ड के साथ खिलवाड़ कर रहें कुछ एसजीपीसी के प्रतिनिधियों ने? या आप स्वयं ही पधार गए? 

श्री सिरसा शिष्टमंडल की कार्यतत्परता से यह स्पष्ट हो जाता है कि महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर मनजिंदरसिंघ सिरसा का प्रभाव सकारात्मक हैं. एक समय वो भी था जब श्री सिरसा ने देवेंद्र फडणवीस को खुश करने की नियत से शिवसेना नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे और उनके बेटे श्री आदित्य ठाकरे के खिलाफ ट्वीटर पर मोर्चा खोल डाला था. उद्धव ठाकरे के खिलाफ राजनीतिक द्वंद कर रहीं फ़िल्म अभिनेत्री कंगना राणावत को भी उन्होंने खूब प्रोत्साहित किया था. तत्काल में उनकी इन बातों ने महाराष्ट्र के भाजपा सर्वोसर्वा श्री देवेंद्र फडणवीस का मन जीत लिया था. इस कारण देवेंद्र फडणवीस कभी मनजिंदरसिंघ सिरसा की मांग टाल नहीं सकते यह स्पष्ट हैं. इस कारण सिरसा ने बहुत सोची समझी रणनीति के तहत विजय सतबीरसिंघ को प्रशासक के रूप में नियुक्त करवा दिया कि वें एक सिख है. पंजाब और अन्य प्रदेशों में गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड पर गैर सिख प्रशासक नियुक्ति का विषय गहराया हुआ था. विजय सतबीरसिंघ की नियुक्ति के बाद सिरसा समर्थकों ने और एसजीपीसी के नेताओं ने जैसे जश्न मना डाला. शोशल मीडिया पर सिरसा की कामयाबी के कशीदे छपने शुरू हो गए. विजय सतबीरसिंघ की नियुक्ति को अब एसजीपीसी के प्रधान भाई हरजिंदरसिंघजी धामी से लेकर सामान्य भाजपा कार्यकर्त्ता भी उचित मान रहा हैं. नांदेड़ के भाजपा कार्यकर्त्ता भी मौन अपना कर सिरसा की कृति को बल प्रदान कर रहें हैं. हजुरसाहिब में सर्वसामान्य स्थानीय कार्यकर्ता विजय सतबीरसिंघ के परिवार की सिक्खी को लेकर शोशल मीडिया में प्रश्न उठा रहें हैं. कुलमिलाकर गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड अब इन राजनीतिकों के लिए राजनीति का मैदान बन गया है. 

कलम ग्यारह का निराकरण करवाएं सिरसा !

इधर नांदेड़ में बैठें हजूरी, सिंघ सरदार भी हैरत में है कि महाराष्ट्र सरकार, विशेष कर नेता श्री देवेंद्र फडणवीस ने कैसे एक ही मुलाकात में सिरसा की बात को स्वीकार कर लिया हैं. यहाँ तक कि चार दिन पहले जारी सरकारी नोटिफिकेशन को बदलने का निर्णय कुछ क्षणों में ले लिया? ताज्जुब है कि श्रीमान देवेंद्र फडणवीस और महाराष्ट्र सरकार नांदेड़ के सिखों की बात कभी क्यों नहीं सुन पायीं हैं? नांदेड़ का सिख समाज विगत आठ वर्षों से श्रीमान देवेंद्र फडणवीस से निवेदन करता आ रहा हैं कि उनके द्वारा ता. 15 फरवरी, 2015 के दिन विधानसभा में बतौर विधेयक गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कानून 1956 की धारा 6 के प्रावधान मुताबिक अध्यक्ष नियुक्ति अथवा निर्वाचन को प्रभावित करती कलम ग्यारह में किये गए संशोधन को रद्द कर कानून की धारा 11 को पूर्ववत करने की जाए. कलम ग्यारह के पूर्व प्रावधान लौटाए जाए. लेकिन श्री देवेंद्र फडणवीस गत आठ वर्षों से नांदेड़ के सिखों की मांग अनसुनी कर रहें हैं. श्री फडणवीस यह बताये कि सिखों की इस धार्मिक संस्था के अध्यक्ष नियुक्ति के अधिकार सरकार के अधीन क्यों कर लिए गए है? इन सवालों के जवाब नांदेड़ के सिख समाज को कब सुनने को मिलेंगे. 

याद दिला दें कि कुछ साल पहले मनजिंदरसिंघ सिरसा और शिरोमणि अकाली दल के सभी नेताओं ने वीडियो जारी कर कलम ग्यारह रद्द करने का विषय गर्म किया था. लेकिन जैसे ही एसजीपीसी के सदस्य भूपिंदरसिंघ मिनहास को प्रधान नियुक्त किया गया वैसे ही सबने चुप्पी साध लीं. अचरज है कि गुरु घर की बातें सामने रखकर तिकड़म भिड़ानेवाले सिरसा कभी कलम ग्यारह के संशोधन रद्द करवाने की बात लेकर देवेंद्र फडणवीस से नहीं मिलें. सिरसा चाहे तो एक दिन में कलम ग्यारह के विषय का निराकरण करवा सकते हैं. लेकिन श्री सिरसा इस विषय में प्रतिनिधित्व नहीं कर रहें हैं. 

विजय सतबीरसिंघ क्यों पक्ष में है भाटिया कमेटी की रिपोर्ट पर?

2014 से 2015 का वो कार्यकाल स्मरण में लाया जाना चाहिए जब श्री विजय सतबीरसिंघ ने भाटिया कमेटी की रिपोर्ट को लागु करवाने के सभी रास्तें अनुकूल बना डाले थे. मुंबई, ठाणे, पुणे और नासिक शहरों से गुरुद्वारा बोर्ड पर सदस्य मनोनीत करने की सिफारिशों को उन्होंने उचित करार दिया था. हजुरसाहिब में भाटिया कमिटी की सिफारिशें लागु करने के विषय में विरोध होता आया हैं. पहले, उस विषय को तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस तक पहुंचाकर विरोध किया गया था. सन 2015 में भाजपा के पूर्व विधायक स्व. तारासिंह ने गुरुद्वारा एक्ट में सीधे ही बदलाव करवाकर खुद को प्रधान बना कर जबरन बोर्ड के सूत्र हाथ में लिए थे. उस समय विजय सतबीरसिंघ को प्रशासक पद से हटाया गया था. लेकिन उससे पूर्व विजय सतबीरसिंघ ने जस्टिस जगमोहनसिंघ भाटिया समिति के प्रारूप को अमल में लाने की पूर्ण व्यवस्था अपना ली थीं. मुंबई, ठाणे, पुणे सिंघ सभा के सदस्य लादने की रणनीति पर भरपूर कार्य हुआ हैं. अब फिर एक बार विजय सतबीरसिंघ वही पुराना विषय लागु कर सकते हैं. उनकी नियुक्ति बहुत सोच समझकर करवाई गई है ऐसी चर्चा यहाँ जारी हैं. ईश्वर हजुरसाहिब को परदे के पीछे बैठें षड़यंत्रकारियों से बचाये यहीं अरदास हैं. 

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मंगलवार, 8 अगस्त 2023

 एसजीपीसी का दबावतंत्र ! 

शिरोमणि अकाली दल की कूटनीति

हजुरसाहिब में उभरा तनाव 

रविंदरसिंघ मोदी 

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के प्रशासक श्री अभिजीत राऊत परिवार सहित मत्था टेकने पहुँचे !

हजुरसाहिब स्थित 'दी नांदेड़ सिख गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजूर अबचल नगर साहिब बोर्ड' संस्था के पिछले प्रशासक डॉ परविंदरसिंघ पसरीचा का कार्यकाल समाप्त होने के कारण और उनके खिलाफ जनमानस में व्याप्त नाराजगी के कारण उन्हें महाराष्ट्र सरकार ने आगे अवसर नहीं दिया. वहीं नांदेड़ के जिलाधीश श्री अभिजीत राऊत को बोर्ड का प्रशासक नियुक्त किया गया. विदित हो कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा डॉ परविंदरसिंघ पसरीचा को जून 2022 में केवल तीन माह के 'शॉर्ट टर्म' के लिए बोर्ड का प्रशासक बनाया था. लेकिन डॉ पसरीचा ने आगे चलकर अपने राजनीतिक संबंधों का भरपूर फायदा उठाते हुए अपने कार्यकाल को 3 माह से 13 माह तक आगे बढ़ाने में सफलता प्राप्त की. यह माना जाये कि डॉ पसरीचा यहाँ गुरुद्वारा बोर्ड पर कायमरूपी प्रशासक रहने के इच्छुक है तो कोई गलत नहीं होगा. सोचना यह है कि आखिर एक ही व्यक्ति को कितनी बार गुरुद्वारा बोर्ड का प्रशासक रखा जाना चाहिए? इस बात पर गंभीरता से  विचार होना चाहिए. यदि डॉ पसरीचा साहब चाहते हैं कि सालों - साल वें ही यहाँ के प्रशासक बनें रहें तो हजुरसाहिब के स्थानीय लोगों को बोर्ड का संचालन करने का अवसर कब मिलेगा?  एसजीपीसी तो चाह रहीं है कि तखत सचखंड बोर्ड पर फिर से उनके मुहरों की नियुक्ति करवाई जाए इसलिए नांदेड़ के जिलाधीश श्री अभिजीत राऊत को प्रशासक बनाये जाने का विरोध बड़े पैमाने पर शुरू किया गया है. 

शोशल मीडिया पर हो रहा विरोध ! भाई साहब हरजिंदरसिंघ धामी ने किया विरोध !

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति द्वारा जोरशोर से इस बात पर एतराज जताया जा रहा है कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के सूत्र किसी गैर सिख के हाथों क्यों सौपें गए! एसजीपीसी के प्रधान भाईसाहब भाई हरजिंदरसिंघजी ने पुरी क्षमता के साथ केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार तक अपना विरोध पहुँचाया. शोशल मीडिया पर भी 'गैर सिख प्रशासक' का विषय खासा चर्चा में हैं. जाहीर है डॉ पसरीचा के कनेक्शन भी काम कर गए और टीवी समाचारों के डिबेट तक यह विषय जा पहुँचा. शिरोमणि अकाली दल के नेता भी समाचार पत्रों में और शोशल मीडिया में यह विषय प्रस्तुत कर असंतोष व्यक्त करते देखें जा रहें हैं. आज इन लोगों की हजुरसाहिब के प्रति चिंता देखकर दिल गदगद हो उठा हैं. मेरा विनम्र आरोप हैं कि हजुरसाहिब बोर्ड की समस्याओं के प्रति सालों साल चुप्पी साधने के बाद अब कूटनीतिक बयानों की बौछार करते हुए अकाली दल के नेता हकीकत में "मौके पर चौका" लगाने की छुपी नीत्ति पर काम कर रहें हैं. उन्हें प्रत्यक्ष में हजुरसाहिब का बोर्ड सरकार के चुंगल से मुक्त करवाने में कोई दिलचस्पी नहीं हैं. उनकी दिलचस्पी हजुरसाहिब बोर्ड पर कलम ग्यारह के संशोधित वर्तमान प्रावधान को भुनाकर सचखंड बोर्ड पर अपना (एसजीपीसी) का प्रधान अथवा प्रशासक बनवाने मात्र की हैं. 

इधर हजुरसाहिब में बहुत से लोग गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड पर 'गैर सिख प्रशासक' की नियुक्ति पर रोष प्रकट कर रहें हैं. बहुत से लोग चाह रहें हैं कि सिखों की इस संस्था पर किसी सिख को प्रशासक बनाया जाना चाहिए था. हालांकि चर्चा तो यह थी कि गुरुद्वारा बोर्ड पर स्थानीय लोगों की प्रशासकीय समिति नियुक्त होगी. लेकिन सरकार ने स्थानीय सिखों को धत्ता बताया और सिखों की धार्मिक संस्था पर अपना अधिपत्य कायम रखा. 

डॉ पसरीचा के प्रति असंतोष... !

सवाल है जिलाधीश अभिजीत राऊत को प्रशासक बनाये जाने का. इस बात के दो उत्तर है. एक, यह कि डॉ परविंदरसिंघ पसरीचा के खिलाफ सालभर से प्रस्तुत शिकायतें, उनकी कार्यशैली और बयानबाजी पर उठते आक्षेप इत्यादि के कारण महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें आगे अवसर प्रदान नहीं किया. दो सप्ताह पहले ही नांदेड़ के एक नेता की अगुवाई में सिखों का एक वफद मुंबई मंत्रालय होकर आया था, जहाँ डॉ पसरीचा को पद से हटाने की मांग जोरशोर से की गईं थी. दूसरा कारण, गुरुद्वारा बोर्ड कानून 1956 में बोर्ड के प्रधान अथवा प्रशासक नियुक्ति के लिए कानूनी प्रावधान दर्ज हैं. जिसके तहत प्रशासक पद के सूत्र जिलाधीश या समकक्ष अधिकारी को सौपें जाने का प्रावधान है. पहले भी वर्ष 2000, जुलाई माह में जब स. शेरसिंघ फौजी का बोर्ड बर्खास्त किया गया था तब बोर्ड के सूत्र अतिरिक्त जिलाधीश श्री कालम पाटिल को सौपें गए थे. पश्च्यात वर्ष 2002 में तत्कालीन जिलाधीश श्री तानाजी सत्रे को बोर्ड का प्रशासक बनाया गया था. दोनों अधिकारी 'नॉन सिख' थे. उस समय भी भरपूर विरोध हुआ था. डॉ धीरजकुमार और डॉ श्रीकर परदेसी भी बोर्ड के कुछ समय प्रशासक थे. 

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड की स्थापना सन 1956 में हुईं थी. पहला प्रशासक उस समय का जिलाधीश नॉन सिख अधिकारी था. 1970 तक यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहा. सन 1971 में पंजाब के नेता और क्रांतिकारी व्यक्तित्व जत्थेदार स्व. गुरचरनसिंघ तोहड़ा गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान बनें और पहली बार सिख प्रशासक संस्था पर नियुक्त हुआ था. स्व. तोहड़ा लगातार चौदह वर्षों तक बोर्ड के प्रधान बनें रहें थे. बीतें 67 वर्षों के कार्यकाल में हजूर साहिब के स्थानीय प्रधान के पास केवल 16 वर्षों का प्रशासन रहा. सरदार लड्डूसिंघ महाजन और सरदार शेरसिंघ फौजी तथा कुछ समय के लिए औरंगाबाद निवासी स्व. संतसिंघजी ने प्रशासन किया. शेष 51 सालों तक किसका प्रशासन रहा इसका चिंतन किया जाना चाहिए. सवाल यहीं उठता है हजुरसाहिब के स्थानीय लोगों के हवाले उनकी संस्था का प्रशासन क्यों नहीं होना चाहिए? नांदेड़ के अमृतधारी सिखों के हाथों में बोर्ड का संचालन हो ऐसा सभी की इच्छा हैं. एसजीपीसी और उनके मुंबईया कनेक्शन नहीं चाहते कि हजुरसाहिब के स्थानीय लोगों के बोर्ड का नेतृत्व रहें. एसजीपीसी के प्रधान साहब को डॉ पसरीचा को बर्खास्त किए जाने का विरोध करते समय यह भी पता कर लेना चाहिए था कि डॉ पसरीचा को हटाए जाने के लिए मुंबई स्थित एसजीपीसी के एक सदस्य (पिछले बोर्ड में मेंबर) द्वारा एक याचिका उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की गईं थी. जाँच ले! 

चुनाव करवाएं जाए.... !

जिलाधीश श्री अभिजीत राऊत समझदार और नीतिपरख अधिकारी है. राजनीतिक अपरिहार्यता है आज उनके हाथों भले ही गुरुद्वारा बोर्ड का प्रशासन है. लेकिन स्थानीय सिख समाज को चाहिए कि एक शिष्टमंडल के रूप में श्री अभिजीत राऊत से मिलकर यह मांग रखें कि, जल्द से जल्द गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव करवाएं जाएं. आज की वर्तमान परिस्थिति देखते हुए और लोकतांत्रिक तत्व जीवित रखने के लिए गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव करवाएं जाना जरुरी हैं. यदि एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल के नेताओं द्वारा दबावतंत्र का प्रयोग कर और दिल्ली और महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं को गल में डालकर गुरुद्वारा बोर्ड पर प्रशासक के रूप में किसी मुंबईया व्यक्ति नियुक्ति करवाने की कूटनीति की गईं तो हजुरसाहिब के लोगों फिर ढोल पीटते रहना पड़ जायेगा. हजुरसाहिब में जो लोग गैरसिख प्रशासक का मुद्दा गर्म कर रहें हैं वें अप्रत्यक्ष रूप से एसजीपीसी की कूटनीति को सफल करवाने में सहायता प्रदान कर रहें हैं ऐसी मेरी सोच हैं. जिसके लिए इन संस्थाओं और नेताओं का पिछला इतिहास भी गौर फरमाना होगा. हजुरसाहिब बोर्ड के वर्तमान हालात के लिए राजनीतिक लोगों के साथ साथ शिरोमणि अकाली दल और एसजीपीसी की पिछली रणनीतियाँ कारणीभूत है. एकनाथ शिंदे सरकार गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के विषय में नांदेड़ के स्थानीय सिखों के साथ चर्चा करें यहीं एक सकारात्मक कदम होगा. 

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