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शनिवार, 21 जुलाई 2018

अत्याचार दिवस मानना क्यों जरुरी है ?
रविंदर सिंघ मोदी 
 हजूर साहिब जैसे एक मर्यादा और सिक्खी परंपरा से जुड़े तखत साहब की व्यवस्था संचालन के लिए गठित और केवल सिखों की विरासत मानी जानेवाली दक्षिण भारत की सर्वोच्च धार्मिक संस्था गुरुद्वारा तखत सचखंड साहब का वजूद  खतरें में है. सौ करोड़ बजट वाली संस्था सभी के आँखों में सल रही है. संस्था  बजट, संस्था की गरिमा, संस्था साख बाहर के कुछ लोगों की नियत में खोट पैदा कर रही हैं. साथ ही महाराष्ट्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार को भी अपनी ओर आकर्षित कर रही है. 
सरकार ने गुरुतागद्दी त्रिशताब्दी समारोह के समय से ही गुरुद्वारा बोर्ड लेकर भ्रम पालने शुरू कर दिए थे. चार साल पहले जब भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई तो महाराष्ट्र के सभी प्रमुख तीर्थ क्षेत्रों का अभ्यास शुरू हो गया. महाराष्ट्र के जितने बड़े धार्मिकस्थल हैं वहां तक सरकार कानून और प्रशासन लेकर पहुंच गई. शिरडी, शिंगणापुर और अन्य कुछ मंदिरों  संस्थाओं को कब्जे में लेने के लिए सरकार ने शिकंजा कसना शुरू किया. नांदेड़ के गुरुद्वारा की संस्था कब्जे  लिए उन्हें मुलुंड का चापलूस विधायक तारासिंह मिल गया. तारा सिंह को मंत्री पद नहीं दिया गया क्योंकि उम्र हो चुकी है. इस उम्र में बड़ी संख्या में नेता आराम फरमा रहे हैं. बेचारे भाजपा के नेता लालकृष्ण अडवाणी को घर बिठा दिया गया. 
खैर तारा सिंह का उपयोग जरुरी था क्योंकि संस्था पर सरकार और विशेषकर राजस्व विभाग की बुरी नजर थी. तारा सिंह को पुरे अधिकार देकर, गुरुद्वारा बोर्ड कानून में संशोधन करवाकर सीधा अध्यक्ष बनाकर तखत सचखंड साहब की सत्ता सौंप दी गई. बाद में उसी तारा सिंह को पकड़कर सरकार ने गुरुद्वारा बोर्ड के सरकारीकरण की योजना योजना बनाई. कोई और सिख होता तो तुरंत अध्यक्ष पद छोड़ देता, लेकिन जिसे सिक्खी से कोई सरोकार ही नहीं उस तारा सिंह के लिए गुरु घर कोई मायने नहीं रखता. 
इस तारा सिंह ने थाली में सजाकर गुरुद्वारा बोर्ड सरकार के अधीन कर दिया. इंसान वर्ष की आयु में सठिया जाता है, यह तो अब ८२ साल का बुजुर्ग है. इस तारा सिंह ने जैसा राजस्व विभाग ने प्रस्ताव चाहा वैसा बनाकर सरकार के पास प्रस्तुत कर डाला. ठान सिंघ बुंगाई को अधीक्षक पद से हटाने के पीछे यही एक मुख्य कारण था कि कानून संशोधन के प्रस्ताव की किसी को कानोकान खबर ना लगे. तारासिंह अपने मंसूबों में कामयाब भी हो गया. कानून संशोधन के विषय में और तीन लोगों को जानकारी थी ऐसा दावा किया जा रहा है और उनके नाम भी उजागर हो जाएंगे. 
तारा सिंह ने अपना खुलासा किया और इस बात से ही मुकर गया कि कानून संशोधन के विषय में उसे कोई जानकारी थी  ही नहीं. जबकि सरकार ने अपने संशोधन प्रस्ताव की टिपण्णी में यह उल्लेख किया है कि तारासिंह का पत्र पहुंचा है जिसमें स्वयं तारा सिंह ने यह कहा है कि उसे मीटिंग लेने में लोकल मेंबर सहयोग नहीं कर रहे है इसलिए उसे बाहर और छह मेंबर बढाकर दिए जाये. इनमें एक नॉन सिख सरकारी कर्मचारी को मेंबर बनाया जाये. नॉन सिख कर्मचारी मेंबर क्यों चाहिए? यह बातें दर्शाती हैं कि आनेवाले कुछ समय में शिंगणापुर ट्रस्ट की तर्ज पर नांदेड़ गुरुद्वारा की संस्था पर भी ये सरकार अधिग्रहण विधयेक लेकर आएगी. अधिग्रहण के लिए पूर्ण बहुमत की आवश्यकता होती है इसलिए पहले बाहर के सदस्य बढ़ाये जा रहे हैं. उन्हें नांदेड़ आने की जरुरत ही न पड़े तारा सिंह के पास बैठकर सीधे सरकारीकरण और अधिग्रहण का प्रस्ताव पारित कर सरकार के पास भेज दिया जाए. 
जब अधिग्रहण होगा या सरकारीकरण होगा तो सबसे पहले बोर्ड के कर्मचारियों पर पहली मार पड़ेगी. संस्थाओं को बगैर कारण बताए  डेलीवेजस और पक्के कर्मचारियों को हटाने या सक्ति की सेवा निवृति देने का स्वतंत्र है. हमारी संस्था के बजट पर दूसरे ऐश करेंगे. इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता. हमें हमारी संस्था, हमारी गरिमा, हमारी विरासत बचाना है. इसलिए गंभीरता समझते हुए कृपया सभी सिख भाई और बहने और युवा साथी अत्याचार दिवस में जरूर शामिल हो. अत्याचार दिवस के लिए सिख व्यापारी अपनी दुकानों पर काली झंडी लगा सकते हैं. अपने वाहनों पर भी काले झंडे लगा सकते हैं. सभी उपस्थित रहे सुबह ११ बजे. स्थान कलेक्टर ऑफिस, नांदेड़. तारीख  ,२०१८. 
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