श्री गुरु तेगबहादुर जी के 400 सालाना प्रकाशपर्व को लेकर की गईं मांग !!
मेरी ब्लॉग सूची
रविवार, 21 फ़रवरी 2021
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021
साका श्री ननकाणा साहिब की शताब्दी पर केंद्र सरकार की राजनीति !
क्या बीबी जगीर कौर कोई प्रेरणा लेगी ?
हजूरसाहिब बोर्ड कब मुक्त करवाएंगे!
रविंदरसिंघ मोदी
पाकिस्तान स्थित श्री ननकाणा साहिब में घटित "शहीदी साका" या सिख नरसंहार की घटना को ता. 20 फरवरी के दिन एक सौ साल पूर्ण हो रहें हैं. सौ वर्ष पूर्व तत्कालीन हिन्दू महंत नरैणदास ने कत्त्लेआम करवाकर 260 से ज्यादा सिखों को शहीद करवा दिया था जिनमें महिला और बच्चों का भी समावेश था. उपरोक्त घटना के बाद ही श्री गुरु नानक देव जी की जन्मस्थली श्री ननकाणा साहिब और अन्य ऐतहासिक गुरुद्वारों को तत्कालीन अंग्रेज प्रशासन ने सिखों को सौंपा था.
शहीदी साका श्री ननकाणा साहिब की पहली शताब्दी का आयोजन पाकिस्तान स्थित शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा आयोजित किया गया हैं. इस कार्यक्रम में शामिल होने का न्यौता मिला तब लगभग आठ हजार श्रद्धालु सिखों ने पाकिस्तान यात्रा की अनुमति के लिए सरकार के पास आवेदन दिया. लेकिन केंद्र सरकार द्वारा सिख श्रद्धालुओं को अनुमति नकार दीं गईं. जिससे इस शहीदी साका कार्यक्रम में अब भारतीय सिख शामिल नहीं हो पा रहें हैं. दुर्भाग्य हैं कि अब सरकार निर्धारण कर रहीं हैं कि सिख कौनसे कार्यक्रम में शामिल हो और कौनसे कार्यक्रम में शामिल ना हो.
केंद्र सरकार की इस राज-नीति पर अब पंजाब के सभी राजनीतिक दल खुलकर बोल रहें हैं. भारतीय जनता पार्टी के मित्र दल भी अब केंद्र की नीतियों की आलोचना करते देखें जा रहें हैं. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी भी रोष जता रहीं हैं. अभी हाल ही में एसजीपीसी कार्यालय के सामने धरना दें रहें सिखों पर लाठियां बरसाएं जानें की घटना से शर्मसार हुईं एसजीपीसी संस्था के लिए सिखों का रोष दूर करने के लिए साका ननकाणा साहिब का कार्यक्रम मददगार साबित हो सकता था. लेकिन केंद्र सरकार ने ऐसी राजनीतिक चाल चलीं कि बादल साहब मात खा गए.
केंद्र सरकार नहीं चाहती थीं कि हिन्दूं के खिलाफ मनाये जाने वाले इस कार्यक्रम में सिख शामिल हो. इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार की कुछ और भी सोंच हो सकती हैं. सुरक्षा का कारण पाकिस्तान सरकार को देना चाहिए था लेकिन केंद्र सरकार स्वयं कारण प्रस्तुत कर रहीं हैं. जबकि करतारपुर कॉरिडोर का श्रेय अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया के सामने लेना था तब बड़ी संख्या में सिखों को ननकाणा साहिब जाने की अनुमति बहाल की गईं थीं.
शहीदी साका श्री ननकाणा साहिब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर संस्था के इतिहास में सबसे बड़ा मील का पत्थर हैं यदि इसे ठीक तरह से सोचा जाएं. इस शहीदी साका की घटना के बाद ही सही मायने में एसजीपीसी संस्था के गठन को आधिकारिक बल और स्वायत्ता प्राप्त हुईं. पूर्व में गुरुद्वारों के एकछत्र केन्द्रीकरण के लिए शुरू एसजीपीसी के प्रयासों को 'अकाली लहर' का संबोधन दिया जा रहा था.
शहीदी साका की घटना के बाद अकाली लहर को मजबूती प्राप्त हुईं. ननकाणा साहिब में हुए सिख विरोधी नरसंहार में 260 से ज्यादा सिखों को मौत के घाट उतारा गया था. सिख नेताओं को पेड़ से बांधकर जिन्दा जला दिया गया. लाशों के टुकड़े कर ईंटों की भट्टी में जलाया गया था. यह आंदोलन गुरुद्वारों पर किये गए अवैध अधिग्रहण (कब्ज़ा) के खिलाफ था. यदि यह बड़े बलिदान की घटना नहीं होती तो शायद बहुत से गुरुद्वारों का प्रबंधन उदासी और अन्य सम्रदायों के अधीन होता. इस घटना के बाद ही एसजीपीसी गठन और विस्तार को राह दर्शाई.
अपनी स्थापना का इस साल शताब्दी जश्न मना रहीं एसजीपीसी संस्था की सुदृढ़ शुरुआत ने तत्कालीन संयुक्त पंजाब में राजनीतिक पार्टी के रूप में अकाली दल का गठन प्रोत्साहित किया. पश्च्यात में शिरोमणि अकाली दल रौशनी में आया. पहले एसजीपीसी का गठन हुआ था यह इतिहास हैं. आज यह भी इतिहास हैं की राजनीतिक पार्टी शिरोमणि दल की संप्रभुता में एसजीपीसी संस्था काम कर रहीं हैं. आज की एसजीपीसी में यह मादा भी नहीं कि सरकार के अधीन हो चलें धार्मिक संस्थाओं को सरकार से मुक्त करवाएं. श्री हजूर साहिब की धार्मिक संस्था महाराष्ट्र सरकार के अधीन हैं. इस विषय में एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल की राजनीति किस निचलेस्तर पर पहूंच गईं हैं. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की नवनियुक्त प्रधान बीबी जगीरकौर साका ननकाणा साहिब की घटना को लेकर केंद्र सरकार पर आरोप - प्रत्यारोप कर रहीं हैं, बीबी जगीर कौर महाराष्ट्र सरकार की नीति पर भी कुछ बोले ना ! भाई गोबिंदसिंघ लोंगोवाल बहुत वायदे कर मुकर गए. अब बीबी जगीरकौर क्या कदम उठाएंगी? क्या वे साका ननकाना साहिब की शताब्दीपूर्ति के अवसर पर कोई प्रेरणा लेगी ?
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021
'हिन्दू - सिख' पाटने की राजनीति कारगर !!
भारत सरकार द्वारा पारित नव कृषि कानून को लेकर दो से अढ़ाई माह से देश की राजधानी दिल्ली की सीमा को घेरकर किसान संघठन और किसान आंदोलन को हाँक रहें हैं. तारीख 26-11-2020 को आंदोलन का प्रारंभ हुआ था. शुरुआत से लेकर आज तारीख तक सरकार और किसान संघटनों के बीच दस से अधिक बार बैठकें हो चूकी हैं लेकिन कोई समाधान निष्कर्ष तक पहूंच नहीं पाया. सरकार की तटस्थ भूमिका और किसानों के दृढ़ इरादे के कारण यह आंदोलन अनेक बाधाओं से गुजरा हैं. अभी यात्रा जारी है.
इस आंदोलन की बहुत सी विशेष बातें हैं. जिनमें एक बात यह भी है कि, किसान आंदोलन ने बहुत से नये नेता पैदा कर दिये. राकेश टिकेट, योगेंद्र यादव जैसे नेता ज़मीन से उठकर आसमान पर छप रहें हैं. वहीं आंदोलन से जुड़े, सभी सक्रिय सिख नेता उपेक्षित बैठें दिखाई दें रहें हैं. ना वें आंदोलन छोड़कर घर लौट सकते हैं ना आक्रामक भूमिका स्वीकार कर सकते हैं. जाहीर हैं कि समस्त सिख कौम राजनीति का शिकार हो गई हैं. सन 1984 के बाद सिखों को जो नकारात्मक विशेषण मिले थे उससे भी तीखें और असहनीय विशेषण इस आंदोलन ने सिखों को दिये. सिखों को अपनी पुरानी छवि को धोने में तीन दशकों से अधिक का समां बीता था. समस्त विश्व में सिखों को जब सेवाभावी कौम, जमात या समूह के रूप में पुकारा जा रहा हैं, मसीहा कहा जा रहा, ऐसे समय में सिखों को अपराधी छविवाली कौम बताकर सोशल मीडिया पर प्रचारित करने वाले कौन हैं?
संसद में रेकॉर्ड में लाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां सिखों की कुर्बानियां गिनवाती हैं. लेकिन उनकी पार्टी के सोशल मीडिया सेल द्वारा सिख विरोधी पोस्ट और टिपण्णियों को रोकने का आदेश नहीं दिया जाता हैं. यह राजनीति केवल हिन्दू और सिखों को पाटने, डराने और मजबूर करने की अनैतिक राजनीति को अंजाम दिया जा रहा हैं. इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता अब भाजपा और अन्य हिंदुत्ववादी संघटनों को सिखों की जरुरत नहीं रह गई हैं. जब कभी बलिदान की जरुरत होगी तब याद कर लिया जायेगा.
जो लोग इस समय ऐसी पार्टियों और संघटनों में सक्रिय अथवा निष्क्रिय बैठें हैं क्या वें कोई भूमिका अपनाएंगे ? उन्हें यह कैसे गवारा कर रहा हैं कि अपने धर्म, पंथ और धर्मानुयायीओं को अपमानित होता चुपचाप देखा जाएं. बड़े - बुजुर्ग मानते हैं कि, कोई पार्टी धर्म से बड़ी नहीं, कोई संघठन पंथ से बड़ा नहीं. लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा सभी तथ्यों को दरकिनार कर धर्म का लाभ राजनीतिक पार्टियों को दिलाने में अग्रसर हैं. इसलिए किसान आंदोलन को सफल होने में दीर्घ संघर्ष करना पड़ रहा हैं. आगे इस आंदोलन का जो भी हश्र हो लेकिन इस समय जो सिखों के प्रति जो दरार खींची दिखाई दे रहीं हैं वो दुर्भाग्यपूर्ण है.
रविंदरसिंघ मोदी
होली हल्ला महल्ला यात्रा मार्ग की दुरुस्ती करें : मनबीरसिंघ ग्रंथी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार समूह) के युथ प्रदेश सचिव स. मनबीर...
-
जता जताकर और सता सताकर ! दिया जाए तो उसका मोल क्या ? रविंदरसिंघ मोदी (तखत सचखंड श्री हजूर साहब जो मुरादों की पूर्ति का दर हैं !) गुरुद्वा...
-
आखरी मीटिंग, आखरी दाँव ? कलम ग्यारह पर तारासिंह की नकारात्मक भूमिका ---------- रविन्दरसिंघ मोदी फरवरी के अंतिम सप्ताह में महार...
-
समाचार रजिंदरसिंघ पुजारी तनखैया घोषित पंज तख्तों पर सेवा लगाई नांदेड़, हजूर साहिब, २२ फरवरी - शुक्रवार की शाम गुरुद्वा...
-
मंत्रालय से दशहरा हल्ला महल्ला को अनुमति नहीं !! मुंबई उच्चन्यायालय से उम्मीद रविंदरसिंघ मोदी (दशहरा महोत्सव फाइल फोटो) तखत सचखंड श्री हज...
-
डेली वेजस कर्मचारियों पर टेढ़ी नज़र? गुरुद्वारा बोर्ड प्रशासन अब कर्मचारियों पर दुश्मनी निकालने की फिराक में ! जब से गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड ...
-
गुरुद्वारा बोर्ड के जिम्मेदारानं की चुप्पी योग्य नहीं हैं ! ज्ञानी हरिंदरसिंघ जी अलवर वाले का चिंतन रविंदरसिंघ मोदी ( ज्ञानी हरिंदरसिंघ ...
-
सिख श्रद्धालुओं के साथ हुईं मारपीट का निषेध भोजपुर बिहार में ट्रक पर पत्थराव और तोड़फोड़! (बिहार के भोजपुर में चंदा उगाही कर रहे युवकों के सम...








