"अटल-विचार" बेबाक थे
रविंदर सिंह मोदी
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक साहित्यिक, एक कवी के रूप में मेरे लिए सदैव आदर्श रहें हैं. उनके विचार स्पष्ट और बेबाक थे क्योंकि उनमें नैतिकता अंत तक जीवित थी. राजनीति में 'साम-दाम, दंड-भेद' का प्रयोग उन्होंने दूर ही रखा था. केवल चरित्र, ईमानदारी, नैतिकता और चिंतन के सहारे उन्होंने अपना राजनीतिक व्यक्तित्व खड़ा किया था, जो वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी से बड़ा दिखाई दे रहा हैं. उनकी छवि विराट प्रतीत हो रही है. उनका जीवन एक सदी जैसा लग रहा है. देश के राजनीतिक इतिहास में अटल जी का अध्याय ईमानदारी के सुवर्ण पृष्ठों पर अंकित हो गए हैं. सबसे अच्छी बात तो यह थी कि, वे स्वयं की भी हर गतिविधि का सूक्षम अवलोकन करते थे. हर विषय, हर भूमिका के बाद आत्ममंथन करते थे. अटल जी के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यही कही जा सकती है कि जो लोग राजनीति में रूचि नहीं रखते वें भी उन्हें पसंद करते थे. अटल जी अपनी दुविधा भी बहुत बेबाक तरीके से प्रस्तुत करते थे. जैसे की उनकी निम्नलिखित पंक्तियाँ:
नकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं
गीत नहीं गाता हूं
पीठ मे छुरी सा चांद, राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं
गीत नहीं गाता हूं.
दिल्ली और लखनऊ के राजनीतिक पटल पर काम-काज की जदोजहद के बावजूद उनके द्वारा साहित्य क्षेत्र के लिए समय निकलना बहुत बड़ी बात थी. उनके सामने सफ़ेद कागज़ का एखाद टुकड़ा भी बिखरा होता तो उसे उठाकर वे फाईल में अथवा अपनी जेब में रख लेते थे. बहुत बार उन टुकड़ों पर कुछ अशियार भी लिखकर जेब में रख लेते थे. हर सुबह पेन की स्याही जरूर जाँच लेते थे.
एक पत्रकार के रूप में उन्होंने कार्य शुरू किया और अपनी लेखनी से उन्होंने विचारों की क्रांति पैदा की. जनसंघ और भाजपा के लिए उन्होंने समस्त भारत का भ्रमण किया. विविध संस्कृतियों का उन्होंने अध्यन किया. देश के किसी क्षेत्र पर उन्होंने कभी अप्रिय शब्द व्यक्त नहीं किये. यहाँ तक कि कश्मीर के विषय में उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा कि उसे पचाया ना जा सकें. पंजाब के आतंकवाद पर भी उन्होंने संभलकर ही बात रखी. निम्न कविता में कश्मीर और पंजाब के प्रति उनका दर्द स्पष्ट हो जाता है.
दूध में दरार पड़ गई
खून क्यों सफेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया.
बंट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.
खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है.
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई.
अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता.
बात बनाएं, बिगड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.
अटल जी जाने के बाद भी उनके विचार सामान्य लोगों को भी प्रेरणा देते रहेंगे. आज राजनीति को हथियार बनाकर 'साम-दाम, दंड-भेद' की राजनीति को अंजाम देने वालों को तो अटल जी की प्रिय भाजपा में रहकर भाजपा का अपमान करने की कोई जरुरत ही नहीं. अटलजी के विचार भाजपा ही नहीं देश को एक रूप करने में बहुत कारगर हैं. वे विचार सदैव अटल अरु बेबाक रहेंगे इसमें कोई संदेह नहीं हैं. ऐसे महामानव को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए अंतकरण: बोझिल महसूस कर रहा हैं. परमात्मा उन्हें दुबारा इसी भारत भूमि पर नवजीवन प्रदान करे।



