जता जताकर और सता सताकर !
दिया जाए तो उसका मोल क्या ?
रविंदरसिंघ मोदी
| (तखत सचखंड श्री हजूर साहब जो मुरादों की पूर्ति का दर हैं !) |
गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड के अलिप्त प्रधान साहब और उनके "मंत्री मंडल" से मुखातिब होने के ऐसे में अवसर ही नहीं मिल पा रहे हैं. मुद्दत हो गईं है कि माननीय प्रधान साहब हजूर साहब का रुख नहीं कर रहे हैं. उनके दायित्व के अधीन बोर्ड कार्यालय, पॉलिसी मैटर, त्योहारात, पूजा पाठ, कर्मचारी, मैनेजमेंट, कार्यप्रणाली और बोर्ड से जुड़ी संभावनाओं की भी वे सुध ले रहे हैं कि नहीं, पता नहीं. संस्था का सारा दायित्व अपने "मंत्री मण्डल" पर छोड़ कर वें मुंबई, औरंगाबाद आदि स्थानों से ईमेल द्वारा मंजूरी देने का काम जारी रखें हुए हैं. बहुत महीनों से वें हजूर साहिबवालों के फोन भी रिसीव नहीं कर रहे हैं. उनकी व्यस्तता, व्यवसाय और स्वास्थ्य आदि का विचार कर हम भी महीनों में कभी एखाद बार उन्हें फोन पर संपर्क करते हैं पर वें उठाते ही नहीं. साहब जिद्द के बड़े पक्के है. जो धारणा मन में बना लेते हैं उस पर अडिग रहते हैं. एक संपन्न और अच्छे व्यवसायी होने के उनके तमाम गुणों का मैं व्यक्तिगत रूप से प्रशंसक रहा हूँ. यद्यपि ऐसा हो भी, तब भी, उनमें और उनके मंत्री मंडल के कामकाज और निर्णय आदि को लेकर बहुत बड़ा अंतर नजर भी आ रहा हैं. अंत में प्रधान साहब का निर्णय वहीं होता है जो मंत्री मंडल का होता हैं. नौ लोगों में बोर्ड का कामकाज चलाकर वैसे भी उन्होंने अपनी राजनीतिक सूझबूझ भी सुदृढ़ होने का संकेत दें दिया हैं. अब बाबा रामदेव और देवेंद्र का दिव्य साथ मिल जाए और उद्धव जी की सरकार पर पासे बैठ जाए तो निश्चित ही अगली सत्ता भी उनकी ही होंगी. उन्हें शुभकामनायें !
| डेली वेजस, बिलमुक्ता और पर्मनन्ट कर्मचारियों की समस्याओं को सुनता कौन हैं ! |
यह पोस्ट ! प्रधान साहब की सेवा में एक खुले पत्र के रूप में बहुत ही नम्रतापूर्वक प्रस्तुत कर रहा हूँ. आशा इस पत्र का अस्वाद प्रधान साहब ही नहीं उनका मंत्रिमंडल भी उठाएगा. महाराष्ट्र सरकार द्वारा तारीख 8 मार्च, 2018 के मुहूर्त पर प्रधान साहब को गुरुद्वारा बोर्ड का "अध्यक्ष" इसलिए नियुक्त किया गया था कि वें अपनी प्रबलता, यथाशक्ति, बुद्धि कौशल्य से बोर्ड संचालन की "सेवा" का दायित्व निभाए. श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज के इस पावन स्थान (तखत साहब) की सेवा और प्रबंध निभाए. लेकिन प्रधान साहब जी द्वारा बोर्ड संचालन के दायित्व और अधिकार जैसे बांट दिए गए है. पिछले तीन सालों में बार - बार यह अहसास भी यदा कदा महसूस होता ही रहा कि सरकार द्वारा नियुक्त प्रधान साहब के अलावा कोई और शक्तियां बोर्ड की व्यवस्था देख रहीं हैं. मेरे जैसे एक सामान्य सिख व्यक्ति के मन में बहुत बार यह बात मुँह तक आ जाती हैं कि, यह बोर्ड "अध्यक्षीय नेतृत्व" वाला लग नहीं रहा! साहब! बोर्ड का प्रत्यक्ष में "वाली" कौन है? यह प्रश्न हमने किया भी था ! न्यूज़ पेपर्स तो शायद आप पढ़ते ही नहीं. दूसरा यह कि सवाल के जवाब नहीं देने का आपका कथित अनुशासन भी बाधाएं खड़ी किये हुए हैं. खैर छोड़िए!8
| आस्था का घर ! उम्मीदों का दर !! |
प्रधान साहब से यहीं एक प्रश्न पूछने की मनोकामना थी कि बोर्ड में सेवारत अस्थाई और स्थाई कर्मचारियों के प्रलंबित प्रश्नों को आप कब तक टालते रहोगे? और कितने समय तक गरीब परिवारों को रुसवा करते रहोगे? संस्था के एक नंबर के प्रमुख होने के नाते आपसे इस विषय में प्रश्न करने का अभिव्यक्ति अधिकार हमें प्राप्त है. डेली वेजस और बिलमुक्ता कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का विषय पिछले पांच से छह सालों से प्रलंबित है. तीन - चार सौ से ज्यादा अस्थाई कर्मचारी महज सात से आठ हजार रुपयों के अल्प वेतन में अपना घर चला रहे हैं. अल्प वेतन में वें बीमारी, संक्रमण, बच्चों की पढ़ाई आदि समस्याओं से जूझ रहे हैं. दो साल की सेवा के बाद अस्थाई कर्मचारी अथवा बीलमुक्ता कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने की शुरू से प्रैक्टिस चलीं आ रहीं हैं. सरकारी नियमों के तहत एक साल की निरंतर सेवा के बदले अस्थाई कर्मचारी को सेवा में पक्का करने के प्रावधान भी उपलब्ध हैं. आपके बोर्ड में डेलीवेजस और बिलमुक्ता हैसियत पर क्लर्क या सेवादार के रूप में पिछले पांच से छह सालों से कर्मचारी सेवा निभा रहे हैं. बार - बार आपको ज्ञापन, निवेदन दिए जाते हैं, भेजें जाते हैं. लेकिन उन पर कोई सुनवई नहीं होती हैं. क्या आप में निर्णय क्षमता नहीं है? क्या आपके निर्णय लेने के अधिकार किसी अन्य ओहदेदार के अधीन हो चले हैं? सच मानिये ऐसी चर्चाएं आए दिन सुनने को मिल रहीं हैं! इसलिए सोचा आपको सीधे ही प्रश्न कर लिया जाएं कि "सच्चाई क्या है? " आप ही परिस्थिति का सत्यकथन कर सकते हो.
प्रधान साहब, पिछले छह सालों से छह से सात हजार रूपये अल्प वेतन में सेवाएं निभा रहे यह अस्थाई कर्मचारी हर मेंबर साहब के पास अर्जियां देकर, हाथ जोड़कर प्रार्थना करते आ रहे हैं कि उन्हें सेवा में पक्का किया जाएं. 80 % से 90 % कर्मचारी विवाहित है. परिवार वाले हैं. उनकी भी आर्थिक समस्याएं हैं. कर्मचारियों की या उनके परिवारों की बद्दुआएं मत लीजिए. परमात्मा ने आपको सब कुछ दिया हुआ हैं. आपके परोपकारी चरित्र पर बद्दुआओं की छाया ना पड़ने दीजिए. तीन साल का समय देखते - देखते निकल गया! क्या साध्य हुआ? आप सरकार नियुक्त प्रधान हो. आपको इन कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का अधिकार प्राप्त है. "बोर्ड मीटिंग की आस" पर भी पक्का किया जा सकता हैं. या विशेष प्रस्ताव बनाकर आप सहित सभी नौ लोगों की दस्तखत लेकर आप आदेश जारी कर सकते हो. कुछ विषयों को लेकर फिल-हाल न्यायालयीन दिक्कत की परिस्थिति संभव हो सकती हैं. लेकिन आनेवाले दो से तीन सप्ताह में बाद न्यायालयीन स्थिति भी स्पष्ट हो जायेगी.
आप प्रधान (प्रमुख) होने के नाते आपको अधिकार प्राप्त है कि आप कर्मचारियों के हितों के विषय में निर्णय पारित करें. बीच में दो साल पहले आपने एक मीटिंग में मात्र एक कर्मचारी को सेवा में पक्का किया गया था! उस समय स्वयं मेंबर साहिबान ने भी सवाल उठाये थे! कौनसी इमरजेंसी थी, कौन से नियम और पात्र कर्मचारियों को सेवा में पक्का नहीं करने के क्या कारण थे आदि सवाल आप तक पहुँचाएँ गए थे. कर्मचारी भाई सुपरिन्टेन्डेन्ट कार्यालय के बाहर धरने पर भी बैठें थे. सेवा में पक्का करने के आश्वासन देकर तब उन्हें धरने पर से उठाया गया था. मेंबर साहिबान भी उस समय उपस्थित थे, वें आपको प्रसंग वर्णन कर सकते हैं. बाद में आश्वासन पुरे नहीं किये गए. दो साल निकल गए.
प्रधान साहब ! हम तो चाह रहे हैं कि आपके कार्यकाल में यह पात्र सभी कर्मचारी सेवा पक्का होकर आपको दुआएं दें. इन परिवारों की दुआएं आपको मिले. सोचिए साहब, इन गरीब कर्मचारियों को बाद में (इलेक्शन के मौके पर) जता जताकर और सता सताकर सेवा में पक्का किया भी जायेगा ना साहब. उससे ना आपको दुआएं मिलेगी ना आपके साथियों को वोट मिलेंगे. डेली वेजस और बिलमुक्ता कर्मचारियों के और उनसे संबंधित परिवारों के वोटों की संख्या 2700 से 2900 के लगभग है! कोई संभ्रम में ना रहे कि सताए गए कर्मचारियों की आगे मानसिकता क्या हो सकती. पत्रकारिता में स्टैटिस्टिक्स पर ध्यान देना ही होता है. ग्राफ किसी भी करवट जा सकता है. अब 4500 हजार वोट संख्या पाकर (जुगाड़ कर) इलेक्शन जीता जा सकता हैं. नांदेड़ शहर के 2900 वोट कम नहीं हैं. गुरु महाराज जी के आशीर्वाद से हमारे कर्मचारी भाई - बहन आज इस परिस्थिति में नजर आ रहे हैं कि किसी का भी ग्राफ ऊपर चढ़ा दें या किसी का भी ग्राफ नीचे उतार दें !
साहब जी! आपकी प्रधानगी में वरिष्ठ कर्मचारी वर्ग के साथ भी बहुत सौतेला व्यवहार देखने को मिला हैं. वरिष्ठ पात्र कर्मचारियों को समय पर ग्रेड नहीं मिल पाए, पदोन्नति में अन्याय, पोस्टिंग में अन्याय होता देखा गया हैं. कुछ पात्र वरिष्ठ कर्मचारी तो सेवानिवृत्त हो चले हैं. महिला कर्मचारियों के साथ पदोन्नत्ति में भेदभाव के आरोप भी लगते रहे हैं. एक वरिष्ठ महिला कर्मचारी अभी सेवानिवृत्ति के निकट है. परिश्रमी होने के बावजूद भी उस सीनियर बहन को ना प्रमोशन ना ग्रेड हीं दिया गया ! न पदोन्नति! जिन पर मंत्रिमंडल की मेहेरबानी वालों को आसानी से मिल गया है. जिनका अधिकार मारा गया, जिनकी पात्रता नजरअंदाज की गईं, वें तो बद्दुआएं ही देंगे ना साहब !
आपके तीन सालों के टर्म में सस्पैंड कर्मचारियों के विषय लटका कर रखें गए हैं. सालों हो गए ! कुछ तो सेवानिवृत्त हो चले. पर उनके भविष्य और जीवन के बारे में निर्णय नहीं लिए गए. 2015 से लेकर अभी तक, सस्पैंड कर्मचारी मामलों के संबंध में कितनी जाँच कमेटियां बनीं और जाँच अधूरी रह गई. सालों - साल निर्णय लटके हुए. जो कर्मचारी निर्दोष है, जिन पर परिवार की जिम्मेदारी है वें इस समय कितने दबाव में हैं आप अंदाजा नहीं लगा सकते. इन कर्मचारियों के विषय में कोई ना कोई निर्णय लेना ही होगा. पर आप कोई ठोस कदम उठाने को राजी ही नहीं है. आपके सुपेरियर प्रबंधन का कोई अस्तित्व है भी कि नहीं !
उम्मीद है साहब, जो हो गया उसे भूलकर, आप स्वस्थ और उदार मन से कर्मचारी वर्ग के हितों की रक्षा में निर्णय लेंगे. अब तो आदरणीय संतों ने भी गुहार लगाई है. उनका सम्मान किस तरह से रखना है विचार कीजियेगा बाकी इन कर्मचारियों के साथ हम यहाँ आशावादी बनें हुए हैं. मेरी कोई बात असहज प्रतीत हो रहीं हैं तो वें इन कर्मचारी भाई और बहनों के आत्मा की आवाज मानकर क्षमा कीजियेगा. धन्यवाद !
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