प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के गुरुद्वारा दर्शन का स्वागत होना चाहिए!
रविंदरसिंह मोदी
(प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी गुरुद्वारा श्री रकाबगंज साहिब में मत्था टेकते हुए)
सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी के शहीदी गुरुपूरब के अवसर पर भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र जी मोदी ने दिल्ली स्थित गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब पहुंचकर दर्शन लिए. यह घटना सिख जगत के लिए एक तरह से सकारात्मक है और उसके दीर्घ परिणाम भी सामने आएंगे. कुछ लोग इस घटना को किसान आंदोलन से जोड़कर देख रहे हैं. राजनीतिक समीक्षक, पत्रकार, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर सकारात्मक और नकारात्मक विचार जारी है. इस विषय को लेकर एक राजनीतिक दृष्टिकोण से मंथन जारी है. यदि कोई और समय होता तो शायद इस विषय की चर्चा इतनी नहीं होती जैसे कि अब हो रही है. यह पहला मौका नहीं है कि, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी किसी गुरुपूरब को लेकर गुरुद्वारा पहुंचे हैं. अति विशेष मौकों पर और गुरपुरब के अवसर पर श्री नरेंद्र जी मोदी अक्सर धार्मिक स्थलों की यात्राएं करते आए हैं. एक तरह से यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि धार्मिक स्थलों को भेट देना जैसे मंदिर, गुरुद्वारे आदि यह उनके स्वभाव में शामिल है.
(प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी रुमाला भेंट करते हुए)
लेकिन गुरुद्वारा श्री रकाबगंज साहिब दर्शन की घटना को विवाद में खींचा जा रहा है. जो लोग इस घटना को लेकर अपना विरोध प्रकट कर रहें क्या वें स्पष्ट कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री को गुरुद्वारा दर्शन के लिए जाना नहीं चाहिए था? किसान आंदोलन की पृष्ठ्भूमी पर उभरे मतभेद के कारण हम यह यात्रा का मूल्यांकन नहीं कर सकते. देश की वर्तमान परिस्थिति में जारी किसान आंदोलन पर नजर डाली जाए तो यह विषय हर किसी के लिए नाजुक समय चल रहा है जबकि केंद्र सरकार और किसानों के बीच एक टकराव जारी है. इस टकराव में कहीं ना कहीं किसानों के आंदोलन से जुड़े सिख समुदाय और सिख राजनीतिक समय की चक्की के दो पाटों में पीसे चले जा रहे हैं. ऐसे समय श्री नरेंद्र मोदी गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब पहुंचे है और उन्होंने प्रार्थना की है तो एक श्रद्धालु और प्रधानमंत्री के तौर पर यह उनका प्रथम अधिकार है. इस विषय को राजनीति से अधिक जोड़ा जाए तो सिख समाज को पाटे जाने से कोई नहीं रोक सकता. प्रधानमंत्री मोदी की गुरुद्वारा यात्रा का स्वागत होना चाहिए था. विधायक मनजिंदरसिंघ सिरसा को भी प्रधानमंत्री के प्रोटोकॉल के तहत उस समय गुरुद्वारा श्री रकाबगंज साहिब में उपस्थित रहना चाहिए था. अभी दो तीन माह पूर्व तक तो वें मोदी जी और भाजपा की तारीफ में कशीदे पढ़ते देखें जा रहें थे. अब क्या हो गया?
https://youtu.be/1ldGtzGRh6Y
मोदी जी विदेशों में अपनी यात्राओं के दौरान वहाँ के गुरुद्वारों में मत्था टेकने गये थे. उस समय सभी ने उन्हें निष्पक्ष नेता और सिख धर्म का करीबी नेता कहकर छवि जारी की थीं. करतारपुर कॉरिडोर के समय भी मोदी जी की सराहना सभी ने की थीं और नवज्योतसिंघ सिद्धू की अधिक आलोचना की जारी थीं. लेकिन आज प्रधानमंत्री की गुरुद्वारा भेट को राजनीतिक दृष्टिकोण के पैमाने में नापना कहाँ तक जायज हैं?
(प्रधानमंत्री साधसंगत से मुलाक़ात करते हुए)
देश में जारी किसान आंदोलन को सिख पंथ बड़ा समर्थन दिया हैं और यह समर्थन जारी हैं. देश में बहुत से लोग आज भी किसानों के लिए अच्छी सोंच रखते हैं. वो भावनाएं महत्वपूर्ण है. आंदोलन अनिश्चित है और संभव है कि किसान आंदोलन में प्रस्तुत मांगें सरकार किसी अर्थ में स्वीकार कर सकती है. यह विषय अलग हैं. श्री गुरु तेगबहादुर जी के शहीदी गुरपूरब का अपना अलग महत्त्व हैं. जिस स्थान पर नवम गुरु जी की शहीदी हुईं उस दिल्ली में रहकर भी प्रधानमंत्री गुरपूरब के समय वहाँ नहीं पहुँचते तो शायद सिखों के लिए वो घटना बहुत नकारात्मक साबित होती थीं. लेकिन प्रधानमंत्री ने घटना की अहमियत को जाना और गुरुद्वारा में उपस्थित होकर मत्था टिकाते हुए अरदास की. उन्होंने रुमाला भी चढ़ाया. सिख श्रद्धालुओं के साथ सेल्फी भी खिंचवाई. उन्होंने गुरुद्वारा में कोई राजनीतिक रौब का प्रदर्शन नहीं किया और ना ही कोई राजनीतिक भाष्य ही किया कि जिससे विवाद खड़ा हो सकें. ऐसे समय सिख पंथ को चाहिए कि वें, प्रधानमंत्री जी की गुरुद्वारा भेट को राजनीतिक मुद्दा ना बनने दें. देश के सर्वोच्च नेतृत्व के साथ धार्मिक क्षेत्र में सौजन्य बनाकर रखना समय की प्राथमिकता मानी जानी चाहिए. गुरुपूरब को लेकर कोई बाहरी व्यक्ति कितनी ही राजनीति कर ले, लेकिन हम सिख होने के नाते किसी को गुरुद्वारा आने से नहीं रोक सकते.


















































