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बुधवार, 13 जून 2018
धारा ११ को लेकर
गुरुद्वारा बोर्ड सदस्यों में उदासिनता
रविंदर सिंह मोदी
गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड, नांदेड़ संस्था के अध्यक्ष की सीधी नियुक्ति निर्देशित करनेवाली वाली बोर्ड कानून १९५६ की धारा ११ (संशोधित) को लेकर गुरुद्वारा तख़त सचखंड बोर्ड के सदस्यों में गहरी उदासिनता देखने को मिली है. इस धारा में महाराष्ट्र सरकार द्वारा तीन वर्ष (फरवरी २०१५) में संशोधन कर गुरुद्वारा बोर्ड के अध्यक्ष की सरकार द्वारा नियुक्ति की प्रणाली शुरू की थी. इसी संशोधित धारा का सहारा लेकर भारतीय जनता पार्टी के मुलुंड - मुंबई के विधायक तारा सिंह ने गुरुद्वारा बोर्ड अध्यक्ष पद पर कब्ज़ा किया था. शुरुवात में जब संगत द्वारा विरोध हुआ तो तारासिंह ने वायदा किया था की धारा ११ के अध्यादेश को रद्द करवाया जायेगा. तीन सालों में तारासिंह ने अपना वायदा नहीं निभाया. खैर राजनितिक नेता तो अपने स्वार्थ के सामने वायदे करते हैं और परिस्थिति बदलने पर वायदे भूल भी जाते है. फिर तारासिंह को तो गुरुघर में सत्ता करनी थी वो कैसे अपना वायदा निभाते. सत्ता के लिए तो उन्होंने गुरुघर के अध्यक्ष पद का सरकारीकरण कर दिया. उनसे ज्यादा उम्मीद नहीं रख सकते लेकिन अन्य मेंबर साहिबान क्यों अपने जमीर पर तीन वर्षों तक सरकारीकरण का बोझ ढाते रहे और ढा रहे हैं समझ नहीं आता. गुरुघर के सेवक के रूप में अपना परिचय देनेवाले ये लोग अपनी स्वतंत्रता सरकार के अधीन रखें हुए हैं. मेरा सवाल सभी मेंबर साहिबान से है और जो मेंबर बनने के सपने देख रहे हैं उनसे हैं कि, क्या अपने जमीर पर सरकारी नियुक्त अध्यक्ष की गुलामी का बोझ लेकर गुरुघर की सेवा करना चाहते है? गुरुद्वारा बोर्ड के मेंबर साहिबान के अधिकार है कि वे अपना अध्यक्ष खुद चुने. अपने अधिकार छिन जाने का क्या जरा भी मलाल नहीं हो रहा?
इस समय समाज का एक घटक तीन सीटों के चुनावों की मांग लेकर आंदोलन चला रहा है. जो लोग बोर्ड का मेंबर बनने की लालसा लेकर आंदोलन चला रहे हैं, उन्हें कलम ११ को लेकर भी अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए. तीन सालों में किसीने भी इस विषय पर आवाज नहीं उठाई है. क्यों ?
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