तारासिंह अब तक का सबसे निष्क्रिय प्रधान !
लगभग २०० करोड़ के बजट का नहीं क्या गया उपयोग
क्या हजूर साहिब बोर्ड को शिरडी ट्रस्ट जैसा बनाया जा रहा हैं?
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रविन्दरसिंह मोदी
इससे पूर्व भी मैंने बेबाक तौर पर यह बात कही है कि विधायक तारा सिंह की प्रधानगी नांदेड़ के सिखों के लिए अभिशाप से कम नहीं है. अब मेरी यह बात भी तारा सिंह के समर्थक वर्ग को अप्रिय प्रतीत हो सकती है, जब मैं यह तर्क प्रस्तुत करूँ कि सन १९५६ से अब तक के गुरुद्वारा बोर्ड कार्यकाल में तारा सिंह का विगत पौने चार वर्षों का कार्यकाल सबसे निष्क्रिय साबित हुआ है. पिछले तीन वर्षों में गुरुद्वारा बोर्ड के बजट का ठीक से उपयोग करने में भी तारासिंह बुरी तरह से विफल साबित हुआ है. मैं बेबाक और खरी खरी कह रहा हूँ आप खुद जाँच कर देख लीजिये.
विधायक तारा सिंह ने अप्रैल २०१५ में महाराष्ट्र सरकार के आदेश से गुरुद्वारा सचखंड मंडल (बोर्ड) का अध्यक्ष पद प्राप्त किया था. पद पर बैठने के बाद जब तारासिंह ने गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड (मंडल) के आर्थिक मामलों का निरिक्षण किया तो उसके अधिपत्य में ६० करोड़ राशि के बजट की संस्था थी. उसके बाद वर्ष २०१६ - २०१७ आर्थिक वर्ष का बजट प्रस्तुत हुआ तो वह बढ़कर ६८ करोड़ हो गया. वर्ष २०१७-२०१८ में बजट की राशि ८८ करोड़ इतनी दर्शाई गई थी. अभी वर्ष २०१८ - २०१९ का जब वार्षिक बजट प्रस्तुत हुआ तो यह अकड़ा बढ़कर ९५ करोड़ हो गया. वर्ष २०१५-१६ से वर्ष २०१८-१९ इन चार सालों का आर्थिक प्रारूप कहता हैं कि चार वर्षों में दो सौ करोड़ से तीन सौ करोड़ की राशि खर्च करने का अवसर था. जो तारा सिंह ने गंवाया हैं. इस राशि के उपयोग से नांदेड़ शहर में छह भव्य मार्केट इमारतों का निर्माण हो सकता था. वही लगभग ५० एकड़ जमीन खरीदी जा सकती थी. तारा सिंह ने कोई संपत्ति खड़ी नहीं की. क्यों? सोचिए?
तारासिंह के कार्यकाल में प्रस्तावित और अनुमानित आर्थिक व्यवहार की संभावित सीमा तीन सौ करोड़ (३०० करोड़) से ज्यादा की है. उसी तरह से पिछले तीन वर्षों का शुद्ध बजट देखा जाए तो लगभग २०० करोड़ रूपयों का व्यवहार प्रभावित हुआ है. बोर्ड के पास इतना बड़ा विकल्प होने के बावजूद भी तारासिंह ने अध्यक्ष के नाते इस बजट का उपयोग ठीक तरह से नहीं किया. तारासिंह ने भूमिपूजन तो दो से तीन स्थानों पर किये लेकिन प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हुए. तारासिंह के कार्यकाल में गुरुद्वारा बोर्ड के धन राशि से कोई नयी ईमारत, मार्किट, काम्प्लेक्स, गुरुद्वारा, डेवढ़ी, बाथरूम, रोड या कोई छत का निर्माण हुआ हो तो बताइयेगा. इतनी जमीनें उपलब्ध होने के बावजूद उसने कोई भी स्ट्रक्चर खड़ा नहीं किया. क्योंकि एक तो उसके पास विज़न (दूरदृष्टि) नहीं, दूसरे इच्छाशक्ति नहीं, तीसरे फुट डालों झगडे कराओ की राजनीति और चौथे केवल सरकारी अध्यक्ष होने का रौब. इस कारण उसने कोई गुरु घर का पैसा बैंकों में ब्लॉक रखा.
अब जायजा लेते है उन कुछ कामों का जो उसने करवाएं. पहले नम्बर पर चिल्ड्रन पार्क का काम. यह कार्य उसने मुंबई के अपने निकटतम व्यक्ति से करवाया. यह विषय भी काफी चर्चा में रहा था. तारा सिंह ने दूसरा काम करने में रूचि दिखाई वो है श्री गुरु गोबिंद सिंघजी म्यूजियम के अधूरे कार्यों के विषय में. तारा सिंह के पद लेने के बाद खर्च की कोई सीमा ही नहीं रही. जो वस्तु १० रुपयों की थी वो मान लीजिये ५० रुपयों में खरीदी गई. खर्च और मरम्मत कार्यों का खर्च लाखों में होने की बात सामने आयी हैं. जिसमे ठेकेदार को अग्रिम धन देने का मामला भी चर्चा में रहा हैं. म्युझियम में कितने के कार्य करवाएं गएँ, किसके ऑब्जरवेशन में करवाएं गए, अभी और कितना खर्च करना हैं जैसे प्रश्न खड़े हैं. जाहिर हैं तारा सिंह तो जवाब नहीं देगा. सरकार भी धांधलियों की जाँच नहीं करवाएंगी.
खैर मुद्दे पर आते हैं, दशमेश अस्पताल में संसाधन बढ़ाने के पहले के बोर्ड के निर्णय पर उसने कुछ खर्च किया. छोटे-मोटे स्लाइडिंग, पार्टीशन, बॉउंड्री वॉल, खालसा हाई स्कूल , सचखंड पब्लिक स्कूल रिनिवेशन, वृद्ध आश्रम के कमरों को अधिकारियों का निवास स्थान बनाने के लिए रेनोवशन में खर्च, तोड़फोड़ आदि कार्य कर उसने कुछ करोड़ व्यर्थ किये ऐसा आरोप स्वयं बोर्ड के मेंबर ही लगा रहे हैं. तारा सिंह ने कोई ईमारत खड़ी नहीं की. यात्री निवास नहीं बनाया. उत्पन्न बढ़ाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की.
बोर्ड की बैठकें मुंबई में लेकर तीन से साढ़े तीन वर्षों में करोड़ों का खर्च करवाया. मुंबई बैठकें हुई, उनमें क्या प्रभावी निर्णय हुए? बोर्ड का उत्पन्न तो नहीं बढ़ा उलटे खर्च ज्यादा हुए. तारा सिंह जब जब नांदेड़ दौरे पर आया तो दौरा खर्च भी बढ़ गया. अख़बारों में विज्ञापन छपवाकर गुरुघर में खुद का दरबार आयोजित किया गया. बैनर और पोस्टर में भी अब तक करोड़ के निकट खर्च हुए होंगे. अभी भी आवश्यक खर्च जारी हैं.
उसने अपने रिश्तेदारों को ऊँचे पैकेज पर डायरेक्टर बनाया. जहां जगह नहीं थी वहां भर्ती करवाई. चार महीनों में चार सौ कर्मचारी भर्ती करते समय बोर्ड मीटिंग में किसी तरह का कोई प्रस्ताव पास नहीं किया. नयी भर्ती किये गए कर्मचारियों का प्रति माह अंदाजा ३३ लाख रुपयों के वेतन की अतिरिक्त व्यवस्था नहीं की गई बल्कि गोलक से ही वो खर्च किया जा रहा हैं. ऊपर से इतने कर्मचारियों को भविष्य में स्थाई (परमानेंट) नौकरी का आश्वाशन भी नहीं दिया गया, क्योंकि सभी को डेलीवेजस पर नहीं बल्कि कॉन्ट्रैक्ट टाइप नौकरिया बांटी गई. किसी भी कर्मचारी को भर्ती के साथ पद बहाल नहीं किये गए. स्थाई कर्मचारियों को रोटेशनल प्रमोशन नहीं दिए गए जो कि उनका हक्क और अधिकार बनता हैं. वरिष्ठ कर्मचारी प्रमोशन से वंचित हैं. उनके साथ सरासर अन्याय किया गया. तारा सिंह ने उनकी बात तक नहीं सुनी. बोर्ड में कार्यरत महिला कर्मचारियों को प्रमोशन में न्याय नहीं दिया गया. उल्टा महिला शोषण बढ़ने के समाचार सुनने में आते रहे हैं. तारा सिंह के निकटवर्तीय की जाँच के लिए महिला और बाल उत्पीड़न पथक ने छानबीन भी की हैं. यानी तखत की गरिमा बनाये रखने में वो पूरी तरह से विफल साबित हुआ हैं.
क्या निष्क्रिय प्रवृत्ति का व्यक्ति दुबारा प्रधान बनना चाहिए?
तारा सिंह के प्रधान राज्य में क्या विकास किया गया साध संगत को आज खुलकर बताया जाये यह सभी की मांग हैं. सरकारी नुमाईंदा होने और चार सालों का आर्थिक बजट हाथ में रहते हुए भी उसने कोई बड़ा काम नहीं किया. इतना बजट उसने ब्लॉक क्यों रखा उसका सच बाहर आना चाहिए. आगे भी तारा सिंह प्रधान बनने के लिए पासे बिछा चूका हैं. जो लोग गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव लढ रहे हैं, उन्होंने हजूरी प्रधान का विषय गंभीरता से लेते हुए तारा सिंह से सवाल करना चाहिए कि पिछले पौने चार सालों में उसने बजट ब्लॉक क्यों रखा? क्या शिरडी ट्रस्ट की तरह ही सरकार को लोन देने की कोई गुप्त योजना हैं? क्या फिक्स डिपॉजिट्स पर किसी को लोन की सिफारिश की गई हैं? विकास नहीं करना था तो पद पर बैठकर हजूर साहिब झगडे लगाने की क्या जरुरत थी? तखत साहब पर मेम्बरों को कसम खिलने की क्या जरुरत थी?
हजूर साहिब के लोगों का दुर्भाग्य कहा जाना चाहिए की १९५६ से लेकर आज तारीख तक केवल १६ साल ही हजूरी प्रधान पद पर रहे. जिनमें से नांदेड़ के केवल दो ही प्रधान रहे जिन्होंने साढ़े नौ साल प्रधान पद पर निकला. बाकी समय यानी पचास वर्षों के करीब बाहरवालों ने, कलेक्टर ने और प्रशासकों ने यहाँ की सत्ता संभाली हैं. फिर भी हजूर साहिब के बाशिंदे जो कहते हैं कि गुरु हाजिर नजीर हैं, वो नहीं चाहते कि गुरुघर में स्थानीय प्रधान बनें. गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव में २२ उम्मीदवार खड़े हैं जिनमे से कुछ डम्मी माना जाएं तो भी आठ से नौ उम्मीदवार मैदान में हैं. सभी योग्य हैं और राजनीती समझते हैं. मैं किसी उम्मीदवार के लिए व्यक्तिगत नहीं कह रहा हूँ चयन संगत का अधिकार हैं. सभी उम्मीदवार चाहते हैं हजूरी प्रधान बनें. लेकिन प्रत्यक्ष में बनाने के हालत में कोई नहीं दिखता. क्योंकि उनकी मानसिकता स्थिर हो गई हैं कि बोर्ड पर बाहर वालों का राज कायम रखना है. जाहिर हैं सरकारी नियुक्ति की प्रथा के रहते यहाँ का प्रधान चुनने का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता. इस समस्या का हल किसके पास हैं? जो सबसे योग्य उम्मीदवार है वो यह जाहिर करें.
क्या वर्तमान में त्यागपत्र देकर भी गद्दी पर बैठा निष्क्रिय प्रधान दुबारा से प्रधान बनना चाहिए? क्या सरकार यहाँ निष्क्रिय व्यक्ति लादकर सचखंड बोर्ड को भी शिरडी ट्रस्ट जैसा बना रही जहां सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहे? और तारा सिंह इसी छुपे अजेंडे पर काम कर रहा हैं?
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