बोर्ड के चुनाव के साथ-साथ
गुरुद्वारा बोर्ड कानून में संशोधन होने की आशंका !
रविंदर सिंह मोदी
हजूर साहिब नांदेड़
गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था के तीन सीटों के चुनाव करवाने की मांग लेकर सिख समाज का एक घटक पिछले दिनों हड़ताल पर था. पश्च्यात भूख हड़ताल भी की गई. लेकिन उस हड़ताल का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला. सभी बातें सरकार और बोर्ड के वर्तमान अध्यक्ष भाजपा के विधायक तारा सिंह के अनुकूल साबित हुई. दक्षिण भारतीय सिखों की ये संस्था अब सभी के निशाने पर है. हर कोई सरकार की चापलूसी कर गुरुद्वारा बोर्ड का मालिक बनने के प्रयास में है. अब ये भी चर्चा है कि बोर्ड के तीन सीटों के चुनावों के साथ साथ बोर्ड एक्ट १९५६ में फिर से संशोधन कर मुंबई, पुणे, नासिक, औरंगाबाद और नागपुर के सिंघसभा गुरुद्वारों को प्रतिनिधित्व देने की पहल की जा रही हैं.
ता. १ जून २०१८ से १९ जून २०१८ तक सिख समाज के एक समूह द्वारा जिलाधीश कार्यालय के सामने अनशन किया गया था. जिस समय ये अनशन किया जा रहा था उस समय मुंबई में बैठे कुछ स्वार्थी लोग महाराष्ट्र सरकार और विशेष कर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को यह अहसास करवाने में प्रयत्नरत थे कि हजूर साहिब के निवासी एक्ट में बदलाव चाहते है. अनशनकर्ताओं के शिष्टमंडल को भी मुंबई में चर्चा के दौरान एक बड़े महसूल अधिकारी ने कानून में संशोधन की प्रक्रिया शुरू किये जाने की जानकारी दी थी.
दूसरी बात यह है कि, गुरुद्वारा बोर्ड के अध्यक्ष सरदार तारा सिंह को सरकार को पत्र देने की जरुरत ही क्या थी कि तीन सीटों के चुनाव करवाएं जाएं। उनकी मंशा यही है कि मैं प्रधान पद पर कायम रहते हुए अपनी मर्जी के तीन मेंबर चुनकर आये. ताकि आगे किसी तरह का विरोध न झेलना पड़े. सरदार तारासिंह इलेक्टेड मेम्बरों से खासे परेशान बताये जा रहे हैं. तारासिंह संशोधन के पूर्ण पक्षधर लग रहे है.
साथ ही तारा सिंह की ये मंशा भी उजागर हो रही हैं कि वे किसी भी हाल में प्रधानगी से हटना नहीं चाह रहे. वे पद पर बने रहकर चुनाव करवाना छह रहे हैं. शेष बोर्ड उसी तरह रखकर केवल तीन सीटों के चुनाव करवाने से सरकारी गैज़ेट प्रक्रिया में छेड़छाड़ करना होगा. क्या ये जायज होगा.
रही संशोधन करने की बात तो अब हजूर साहिब बचाने की जिम्मेदारी किसकी बनती है ये तय करना चाहिए. यदि कानून में संशोधन किया जायेगा तो हजूर साहिब की सिखो के हाथों में भविष्य में नौकरियां करना भी नहीं रह जायेगा.
आज जो लोग पद बचाने के लिए खामोश चल रहे हैं कल उनकी मेम्बरी कहाँ तक सुरक्षित रहेगी ये भी देखनेवाली बात होगी. क्योंकि पूर्व न्यायधीश भाटिया द्वारा पेश की गई कानून संशोधन सम्बन्धी रिपोर्ट का पिटारा अब खुलने की प्रतीक्षा में है. रिपोर्ट में बाहर शहरों के सिंघसभा गुरुद्वारों को प्रतिनिधित्व देने की सिफारिश की गई हैं ऐसी चर्चा हैं, जो हजूर साहिब के सिखों के लिए बहुत ही नुकसानदायी साबित होगी.
इसलिए सिख समाज के सभी घटकों को एकत्र होकर पहले एक्ट १९५६ की धारा ११ द्वारा सीधे प्रधान नियुक्ति के विषय को लेकर आवाज उठानी होगी. महाराष्ट्र सरकार द्वारा जबरन विधानसभा में धारा ११ में बदलाव कर अध्यक्ष की सीधी नियुक्ति का निर्णय हमपर लादा गया था. अब बाहर के मेंबर भी लादे जा रहे हैं!

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