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मंगलवार, 15 सितंबर 2020

जम्मू - कश्मीर में "पंजाबी" को सरकारी भाषा का सम्मान मिलना चाहिए

 जम्मू - कश्मीर में "पंजाबी" को सरकारी भाषा का सम्मान मिलना चाहिए 

रविंदरसिंघ मोदी 


इन दिनों जम्मू - कश्मीर में कार्यालयीन भाषा के रूप में पंजाबी भाषा (गुरुमुखी लिपि) को मान्यता देने की व्यापक मांग हो रहीं हैं. पहले जम्मू से उठीं मांग धीरे धीरे पंजाब, हरियाणा होते हुए दिल्ली पहूंच गईं. ता. 2 सितंबर 20 के दिन जम्मू कश्मीर कैबिनेट में भाषा आर्डिनेंस प्रस्तुत हुआ जिसमें प्रदेश के कार्यालयीन सरकारी भाषा के तौर पर कश्मीरी, डोंगरी और हिन्दी को मान्यता प्रदान की गईं. इससे पूर्व वहाँ उर्दू, अंग्रेजी को कामकाज की भाषा के रूप में अधिक प्रयोग में लाया जाता रहा था. यह भाषा आर्डिनेंस (bill) मंजूरी के लिए सांसद में प्रस्तुत किया गया. 

जम्मू - कश्मीर में उपर्युक्त सरकारी भाषाओं में पंजाबी भाषा को शामिल करने की मांग बहुत जोर पकड़ रहीं हैं. शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीरसिंह बादल ने भी उपर्युक्त विषय में अपना पक्ष प्रस्तुत किया. डॉ. फारुख अब्दुल्लाह ने भी अपनी ख़ामोशी में एक तरह से एनओसी प्रदान कर दी. अब मामला प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के हाथ हैं. भारतीय संविधान में अध्याय 17 अंतर्गत धारा 343 से 351 तक राष्ट्रीय भाषा और प्रादेशिक भाषाओं की रचना, अस्तित्व, उपयोगी और व्यवहार का समायोजन अधिकार प्रस्तुत किये गये हैं. धारा 345 द्वारा प्रस्तुत अधिकारों के वर्णन के मुताबिक धारा 346 और 347 के प्रभाव में प्रदेश (state) की आधिकारिक भाषा प्रस्तावित करने के पूर्ण अधिकार राज्यों को सौपें गए हैं. 

देश में अभी तक 22 भाषाओं को मुख्य भाषा के रूप में चुना गया हैं जिनका किसी भी राज्य में वहाँ की सरकार इच्छित भाषा को सरकारी कामकाज के लिए स्वीकार कर सकती हैं. लेकिन उसके लिए संसद में विशेष ऑर्डिनेंस पास करवाना जरुरी है. उस ऑर्डनेन्स को महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा भी मान्यता प्रदान करना आवश्यक है.  पंजाबी भाषा का शुमार देश की 22 भाषाओं में होने के कारण जम्मू कश्मीर राज्य में उसे आधिकारिक सरकारी भाषा के रूप में मान्यता प्रदान हो सकती है.

पंजाबी भाषा उत्तर पश्चिम में विस्तारित बोली भाषा के रूप में कई सदियों से प्रचलित थीं और आज भी है. पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, पाकिस्तान अंतर्गत पंजाब, अफगानिस्तान तक पंजाबी बोली भाषा व्यवहार में प्रस्तुत थीं. साढ़े पांच सौ वर्षों में इस बोली भाषा को गुरुमुखी लिपि भी उपलब्ध हो गईं. पंजाब और हरियाणा राज्यों में पंजाबी को आधिकारिक सरकारी भाषा का स्तर प्रदान हैं. पूर्व में कश्मीर राज्य पर सिख राजा महाराजा हरी सिंघ का साम्राज्य था. जिन्होंने कश्मीर का विलय स्वतंत्रता पश्च्यात भारत गणराज्य में करवाया था. उनके समय में वहाँ पंजाबी भाषा प्रचलित थीं और व्यवहार का हिस्सा थीं. सिखों के षष्ठ गुरु, श्री हरिगोबिन्द साहिब की कर्मभूमि बहुत समय तक कश्मीर रहीं थीं. उससे भी सक्षम पहलु यह माना जाना चाहिए कि, कश्मीरी पंडितों के धर्म को बचाने के लिए सिखों के नवम गुरु श्री तेगबहादुर जी ने अपने शीश का बलिदान दिया था. क्या यह ऐतिहासिक पहलु वर्तमान केंद्र सरकार नजर अंदाज कर सकती हैं?  

आज पंजाब से लेकर दिल्ली तक पंजाबी भाषा प्रचलन में हैं. पूर्व में महाराजा रणजीतसिंघजी के साम्राज्य काल में पंजाबी भाषा अफगानिस्तान तक विस्तारित हुईं थीं. 1960 तक अफगानिस्तान और पाकिस्तान में पंजाबी भाषा और गुरुमुखी लिपि का प्रचलन था. लेकिन बाद में वहाँ के राजनीतिक हालात में परिवर्तन होने के बाद भाषा भी सिमटकर रह गईं. लेकिन कश्मीर के बहाने अब पंजाबी भाषा को विस्तारित करने का एक अवसर उपलब्ध हो रहा हैं. अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर दो राज्यों में विभाजित कर उसमें से लद्दाख को अलग राज्य बनाया गया. जिसके कारण कश्मीर में दुबारा से राज्य की आधिकारिक भाषा की पुनर्रचना हो रहीं हैं. पंजाबी भाषा को कश्मीर और जम्मू में आधिकारिक भाषा का स्तर मिलना न्यायोचित होगा. 





एसजीपीसी टॉस्क फोर्स द्वारा धरना दे रहें जत्थेबंदियों की पिटाई !

 एसजीपीसी टॉस्क फोर्स द्वारा धरना दे रहें जत्थेबंदियों की पिटाई !

मीडिया कर्मियों के साथ हाथापाई 

रविंदरसिंघ मोदी 

अमृतसर श्री दरबार साहब परिसर से सलग्न श्रोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी कार्यालय के बाहर आज एसजीपीसी टॉस्क फ़ोर्स द्वारा वहाँ धरने पर बैठें जत्थेबंदियों पर हमला कर उनकी पिटाई कर देने का एक मामला सामने आया हैं. टॉस्क फ़ोर्स कर्मियों द्वारा पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की भी पिटाई कर दी गईं. इस मारपीट घटना को लेकर जहाँ एसजीपीसी के प्रधान भाई गोबिंदसिंघ लोंगोवाल को लेकर रोष का वातावरण बन गया है वहीं घटना के पीछे शिरोमणि अकाली दल के नेताओं की साजिश होने के भी आरोप लगाएं जा रहें हैं. 

उल्लेखनीय है कि, विगत कुछ दिनों से श्री गुरु ग्रंथसाहब जी के 328 बीड साहब के गायब (चोरी) होने का मामला सुर्खियों में हैं. इस विषय में सिख जत्थेबंदियों द्वारा एसजीपीसी से सवाल किये जा रहें हैं. उक्त मामले को लेकर सिख जत्थेबंदियां धरना धरे बैठीं हैं. घटना की गंभीरता देखकर एसजीपीसी कार्यालय के बाहर टॉस्क फोर्स को तैनात कर दिया गया. सोमवार ता. 14 सितंबर को जत्थेबंदियों द्वारा प्रधान भाई गोबिंदसिंघ लोंगोवाल को एक ज्ञापन भी सौंपा गया था. उस समय तनाव का वातावरण बन गया था. 

लेकिन मंगलवार ता. 15 सितंबर की दोपहर के समय अचानक से टॉस्क फोर्स द्वारा धरने पर बैठे लोगों को उठाने का प्रयास किया. जिसके बाद मामला दो गुटों में झड़प और मारपीट तक पहूंच गया. टॉस्क फोर्स द्वारा इस समय घटना का कवरेज कर रहें मीडिया कर्मियों पर भी हमला कर उनकी पिटाई कर दी गईं. पत्रकारों के साथ की गईं हाथापाई की घटना के बाद एसजीपीसी के खिलाफ रोष व्यक्त हो रहा हैं. 

दूसरी ओर श्री गुरु ग्रंथसाहिब के पावन स्वरूपों की चोरी मामले में एसजीपीसी की चुप्पी रहस्य बढ़ा रहीं हैं. आरोप लगाएं जा रहें हैं कि, आज धरना दे रहें जत्थेबंदियों के साथ किये गए दुर्व्यवहार के पीछे शिरोमणि अकाली दल के शीर्ष नेताओं का हाथ हैं. आज हुईं झड़प और मारपीट मामले में भाई गोबिंदसिंघ लोंगोवाल की छवि पर भी सवाल उठ रहें हैं. 

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