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गुरुवार, 24 जून 2021

ravindersingh modi warned about the unauthorised post s

 गुमराह करनेवालों से सावधान !!

रविंदरसिंघ मोदी 

अभी - अभी पता चला हैं कि खुरापाती दिमाग़ के कुछ लोग मेरे नाम (रविंदरसिंघ मोदी) और मेरे ब्लॉग (हजुरसाहिब टुडे) के नाम से कुछ मजकूर कॉपीपेस्ट पोस्ट कर रहे हैं. और सभी को गुमराह कर रहे हैं. अभी हाल ही में मैंने "हजूरसाहिब टुडे" ब्लॉग पर लिखा था कि गुरुद्वारा बोर्ड के डेली वेजस, बिलमुक्ता और डेली रोजंदारी कर्मचारियों के दैनिक वेतन में वेतनवृद्धि की जाएं. कलर्क को प्रतिदिन एक सौ रूपये और सेवादार और रोजंदार कर्मचारियों को प्रतिदिन 75/- रूपये बढाकर दिए जाएं. लेकिन कुछ लोगों ने समाज में मेरी प्रतिमा ख़राब करने की नियत से मैटर में काटछांट, छेड़छाड़ कर और गलत मनघढ़ंत बातें लिखकर व्हाट्सप्प और सोशल मीडिया पर लोगों को गुमराह करने का प्रयास किया हैं. कर्मचारियों की संख्या कम करने जैसे घटिया प्रस्ताव मेरे नाम के जरिये पोस्ट हो रहे हैं ऐसी बातें सुनने में आ रहीं हैं. जो कि एक गंभीर साइबर क्राइम हैं. प्रार्थना हैं, बोर्ड के कर्मचारी भाई - बहन ऐसे अनर्गल मैटर पर या मेरे नाम से फ़ॉरवर्डेड नकली पोस्ट पर यकीन ना करें. कुछ डेलीवेजस कर्मचारी भाइयों ने मुझसे मिलकर उक्त विषय पर प्रश्न कर बताया कि ऐसा मैटर उन्होंने पढ़ा हैं. मैंने मेरे ब्लॉग पर लिखा मैटर पढ़कर सुनाया तब उनका समाधान हुआ और उन्होंने मुझे शुभकामनायें दीं कि आगे भी समाज और विशेष कर गुरुद्वारा बोर्ड कर्मचारियों की मांगें उठाते रहें. मैं यह बता दूँ कि डैलीवेजस को पर्मनंट किया जाना चाहिए. मुझ पर विश्वास जताने के लिए कर्मचारी भाइयों का शुक्रिया. 

मैं अपनी भूमिका मेरे ब्लॉग के जरिये सार्वजनिक रूप से जाहीर करता आया हूँ. व्हाट्सअप मेरा प्रमुख माध्यम नहीं हैं. वो मैं केवल सूचना और पत्रकारिता के लिए उपयोग में लाता हूँ. मैं, गुरुद्वारा बोर्ड कर्मचारियों की मांगों को लेकर पिछले बीस से बाईस सालों से कर्मचारियों के पक्ष में खड़ा हूँ. आगे भी तत्पर रहूँगा. कर्मचारी जल्दी पर्मनंट हो जाएं यह मेरी पिछले दो से तीन सालों की मांगें हैं. कोई एक कर्मचारी बता दें कि कर्मचारियों के खिलाफ मैंने कोई लिखित प्रस्ताव गुरुद्वारा बोर्ड में प्रस्तावित किया हैं क्या. क्या कभी किसी के प्रमोशन या ग्रेड का विरोध किया हैं? बताएं या मेरी लिखीं कोई न्यूज़ बताएं. इसलिए प्रार्थना हैं कि अफवाह फैलाने वाले तथ्यों से सावधानी बरतें. मैटर पर मुझसे चर्चा जरूर करें. 

कुछ लोगों ने पिछले एक दो सालों से मुझे बदनाम करने का, समाज में मेरी प्रतिमा ख़राब करने का जैसे अभियान शुरू किया हुआ हैं. मेरे बारे में झूठी अफवाह फैलाकर युवा लोगों को भड़का रहे हैं ऐसा सुनने में आ रहा हैं. जबकि मैंने हजूर साहिब और हजूरी साधसंगत के खिलाफ कभी कोई भाष्य नहीं किया हैं. कोई बात अयोग्य लगीं या जँची नहीं तो उसका प्रोपोगेंडा ना करते हुए खामोश रहा. अपने लिखान से मैं सदा धर्मप्रचार और समाज की अच्छी बातों को ही प्रचारित करता आया हूँ. बहुत से लोगों के चरित्रनिर्माण में मैंने भरपूर सहयोग भी दिया हैं. अच्छे नेताओं का सदैव साथ दिया हैं और आगे भी करेंगे. लेकिन कुछ राजनीतिक प्रवृत्ति के "सफ़ेद लिबासपोश" मेरे नाम को धुंधला करने का प्रयास कर रहे हैं. व्हाट्सप्प पर भी छुपे और झूठे नामों का प्रयोग कर रहे हैं. सुनने में आ रहा हैं कि मेरे नाम से मैसेज लिखकर कॉपीपेस्ट कर फॉरवर्ड किये जा रहें हैं. क्या ऐसा करने से वें गुरुद्वारा बोर्ड का चुनाव जीत जायेंगे? क्या महानगर पालिका का चुनाव जीत जायेंगे? यदि मुझे "टारगेट" कर आप अपना मनसूबा पूरा करना चाहते हो तो जरूर करें. प्रार्थना हैं कि मेरे बारे में जो कहना हैं अपने नाम से कहो, बुरा मानने वाली कोई बात नहीं हैं. मेरे जैसे सामान्य व्यक्ति के लिए "छुपे एजैंडा" चलाने की कोई जरुरत नहीं हैं. लिखना हो तो ऐसा लिखो कि समाज के काम आ पाए. आगे आप को ही समाज की बागडोर संभालनी हैं. चुनाव भी करीब आ रहे हैं. समाज के लिए तन मन धन से काम करें यहीं शुभकामनायें. मै अपनी निवृत्ति लेने पर विचार कर रहा हूँ. 


(नोट : इस ब्लॉग के मैटर का कॉपी राइट मेरा हैं. इसका मैटर कॉपी करना या उसमें कांटछांट करना गैरकानूनी हैं. इस पोस्ट को आप जैसे का तैसा पोस्ट करें कोई एतराज नहीं. लेकिन मैटर में छेड़छाड़ कर गुमराह ना करें. वकील साहब मेरे साथ भी हैं. )






बुधवार, 23 जून 2021

 "ग्रहण" वेब-सीरीज सिखों के प्रति साजिश तो नहीं? 

रविंदरसिंघ मोदी 

ता. 24 जून 2021 को वेब -सीरीज "ग्रहण" का नया सिलसिला शुरू किया जा रहा हैं. "ग्रहण" का प्रचार प्रसार भी बड़ेस्तर का हैं. ग्रहण के ट्रेलर विज्ञापन में एक पगड़ीधारी सिख को हिंसक रूप में प्रदर्शित किया जा रहा हैं. इस विषय में सिखों के सभी संघटनों द्वारा विरोध शुरू किया गया हैं. संदेह हो रहा हैं कि फ़िल्म, वेब सीरीज और राजनीतिक मीडिया में सिखों की प्रतिमा को ख़राब करने का प्रयास किया जा रहा है. 

बताया जा रहा हैं कि वेब सीरीज "ग्रहण" की कहानी वर्ष 2016 में घटित बोकारो घटना पर आधारित हैं. जो आई. पी. एस. अधिकारी अमृता सिंह के इर्दगिर्द घूमती हैं. कहानी के अन्य पात्र जो पगड़ीधारी सिख हैं, वें सन 1984 के सिख विरोधी घटनाओं का बदला लेने के लिए प्रयास करते हैं. लेकिन जब तक यह कहानी आँखों से नहीं देखीं जाती तब तक शायद हमें मूल धारणा और 'कंटैन्स' का पता नहीं चल पायेगा. 

मेरी व्यक्तिगत सोंच यह हैं कि पिछले छह से सात वर्षों में फ़िल्म निर्माता, फ़िल्म निर्देशक, कहानीकार, राजनीतिक मीडिया द्वारा सिखों की मूल प्रतिमा को खलनायक और कमजोर सख्शियत के रूप में उभरने का पूरा प्रयास किया जा रहा हैं. सिखों का व्यक्तित्व सेवाभावी, सीमा का प्रहरी और मददगार के रूप में प्रदर्शित होता आया हैं. बहादुरी, शौर्य और ईमानदारी में सिखों को प्रतीक के रूप में जाना जाता रहा हैं. अब सिखों की प्रतिमा कमजोर और नकारात्मक दर्शाने का एक षड़यंत्र सा खेला जा रहा हैं. "ग्रहण के बहाने सिख समाज की प्रतिमा पर ग्रहण लगाने का यह प्रयास हो रहा हैं. 

आपको याद होगा कि संजय बारू की पुस्तक "दि एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर" फ़िल्म (मूवी) बनाकर डॉ. मनमोहनसिंघ जी की प्रतिमा को कमजोर बताया गया. ऐसे दृश्य पेश किये गए, ऐसे तथ्य परोसे गए जिससे डॉ मनमोहन सिंघ एक अशक्त और लाचार प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित हो. उन्हे नोबल पुरस्कार या अन्य कोई पुरस्कार नहीं मिले इसलिए शायद राजनीतिक मिडिया का यह पैतरा खेला गया था. अनुपम खेर ने बहुत दिल लगाकर डॉ मनमोहन सिंघ जी की भूमिका फ़िल्म में निभाई थीं. और भी बहुत सी फ़िल्में हैं जिनमें सिखों की प्रतिमा को कमजोर आंका गया हैं. सेंसर बोर्ड "धर्म का मर्म" कब समझेगा? मैं ऐसी मानसिकता का तीव्र निषेध करता हूँ जो किसी धर्म, जाति और व्यक्तित्व की प्रतिमा से खिलवाड़ करते हैं. डॉ मनमोहन सिंह एक बुद्धिजीवि हैं. उनके खिलाफ बुद्धिजीवियों का षड़यंत्र योग्य नहीं. इससे देश की प्रतिमा भी बिगाड़ने का दुःसाहस कहा जाएं तो गलत नहीं होगा.  


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मंगलवार, 22 जून 2021

निवृत्ति लेने की सोंच रहा हूँ ! Ravindersingh modi

 निवृत्ति लेने की सोंच रहा हूँ ! 

रविंदरसिंघ मोदी 


तीन दशकों से अधिक का एक दीर्घ समय मैंने पत्रकारिता, समाज सेवा, शिक्षा क्षेत्र, साहित्य सेवा क्षेत्र में व्यतीत किया हैं. इस कार्यावधि में मैंने कभी किसी राजनीतिक विचारधारा को अपनाये बगैर लगातार हजुरसाहिब के लिए अलग - अलग माध्यम से स्वयं को आंदोलन बनकर सेवा निभाता रहा. तखत साहिब के उपक्रम, धार्मिक कार्यक्रम, त्यौहार, उत्सव और स्थानीय सिखों की प्रतिमा को सकारात्मक आकार देने के लिए मैं झुजता रहा, प्रयत्नशील रहा. बदलते हुए, तब्दील होते हुए हजुरसाहिब के जनजीवन, इतिहास और मार्गक्रमण का मैं एक प्रमाण हूँ. मैं, अब विचार कर रहा हूँ कि सभी तरह के जारी उपक्रमों से निवृत्ति प्राप्त कर लूँ. केवल समाचार पत्रों का संपादन और दृश्य पत्रकारिता में कार्यरत रहूँ. सभी तरह के सामाजिक और धार्मिक आंदोलन से अब निवृत्ति प्राप्त कर लूँ. इस सोंच के पीछे बहुत से कारण हैं. जिनमें एक प्रमुख कारण स्वास्थ्य का हैं. पिछले दो से तीन वर्षों में लगातार स्वास्थ्य समस्याएं जारी हैं. आगे लंबे समय तक मैं काम नहीं कर पाउँगा शायद. हालिया कोविड संक्रमण काल में मुझ सामान्य सिख पर दशमेश पिता, श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज की छत्र-छाया अबाधित रहीं जिसके कारण हर समय, हर विपरीत परस्थिति में मैं सुरक्षित रह पाया. संतों का आशीर्वाद और सभी हितचिंतकों की सदिच्छा से मैं कठिन दौर से बाहर निकल पाया हूँ. मुझे अहसास हैं कि आनेवाले समय में परिस्थिति किसी भी करवट बैठ सकती हैं. आगे क्या दौर आएगा कोई कह नहीं सकता. 

राजनीति क्षेत्र में जाने की मेरी कोई इच्छा नहीं हैं, हालांकि कुछ प्रस्ताव मेरे पास हैं. विकल्प पहले भी थे, आज भी हैं लेकिन मेरी अपनी विचारधारा के चलते मैंने युवावस्था से ही राजनीति का परहेज किया हैं. इस कारण मैंने सदा राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों का समय - समय पर तिरस्कार, ईर्ष्या, द्वेष और सौतेलापन झेला हैं. कई बार कूटनीतियों का शिकार भी रहा हूँ. 

मैंने, जिन - जिन क्षेत्रों में कार्य किया हैं, उन क्षेत्रों में मेरा कोई "गॉड फादर" नहीं रहा हैं. हां बहुत से लोग मेरे लिए आदर्श जरुर रहे हैं. खुद में थोड़ा बहुत हुनर था. काम के प्रति समर्पण था. सदा सकारात्मक दृष्टिकोण साथ था. किसी को गलत राह पर भेजनें की कभी मंशा नहीं रहीं. कभी किसी युवा को उग्रता की ओर मोड़ने का या भटकाने का काम नहीं किया. अभी तक खुद के नाम पर कोई संस्था खड़ी नहीं की. ना कभी हजूरसाहिब की गरिमा को कम किया हैं. लेखन के माध्यम से मैंने सदैव यहाँ का गुणगान किया हैं. हजूरसाहिब की वर्तमान परिस्थितियों में मेरा कोई स्थान मुझे दिखाई नहीं देता हैं. अब यहाँ कुछ करने के लिए अनुकूल माहौल उपलब्ध नहीं हैं. समाज की डोर "होनहार" लोगों के हाथ हैं. बाहरी नेतृत्व बहुतों की मंशा हो! यहाँ हमारी सलाह काम नहीं करेंगी. इसलिए निर्णय पर सोचना योग्य होगा. 

हजूर साहिब के समाज का सामाजिक विज्ञान को मैं कभी समझ नहीं पाया. लोग बौद्धिकता को जेब में रखने की हिमाकत चाहते हैं. कुछ बुद्धिजीवि मेरे साथ प्रतियोगिता करना चाहते हैं. बहुत से राजनीतिक चेहरों का मेरे प्रति यह प्रयास रहा हैं कि, समाज में मेरा स्थान केवल एक लेखक का रह जाएं. यह सामूहिक प्रयास (दांव) भी रहा हैं. जब तक आप लिख - लिख कर लोगों को लाभान्वित करते रहते हो, लोग आपके आपके पीछे - पीछे रहते हैं. सम्मान परोसते हैं. लोगों को चुनाव जितवाते हो तब तक ठीक. जब आप किसी के लिए सेवाएं संक्षिप्त कर देते हो तो तब अभिलाषी सभी द्वेष, बदनामी और अपमान तक पर उतारू हो जाते हैं. आपके खिलाफ अभियान चलाते हैं. पिछले दो सालों में मुझे सभी अनुभव प्राप्त हो गए हैं. मेरे बहुत से भ्रम, संभ्रम भी टूटे. यहाँ, नेता और नेतृत्व बनने के लिए व्यक्ति के पास संघटन, बड़ी रिश्तेदारी (टब्बर), बड़ा मित्रवर्ग और पैसा जैसी योग्यता चाहिए हैं. टिकने और टिकाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीति अमल में लाने की सक्षमता चाहिए. मैं ऐसी बड़ी औकात नहीं रखता. इस बात का अहसास होने से अपने आपको सारे राजनीतिक प्रपंचों से सदैव मुक्त रखा. अलग ही रखा. जिसने प्यार और सम्मान से गुरुफतेह बुलाई मै नतमस्तक हो गया. जिन्होंने हिकारत दिखाई, बदनामी की, ईर्ष्या दिखाई, मेरी प्रतिमा को मलिन करने के अभियान चलाये उन्हें कभी कोई शिकायत नहीं की. नफरत करें यह उनका अधिकार हैं ! इसलिए समाज के किसी वर्ग से कोई शिकायत नहीं हैं. सबकी अपनी - अपनी सफलताएं हैं, मेरी अपनी सफलता या नाकामी सही. समाज में और भी सेवाभावी, बुद्धिजीवि, कर्मशील उपजाने की क्षमता हैं. अच्छे लोगों को, अच्छे विचारों का वलय दृष्टिगोचर होकर रहेगा यह विश्वास हैं. 

विगत 32 वर्षों में मैंने मेरे कार्य और पेशे को लेकर प्रमाणिकता के साथ काम किया हैं. जो घटित हुआ उसे कोई बदल नहीं सकता ! सब इतिहास हैं ! लेकिन उसका मूल्यांकन करने का हौसला और नियत किसी की नहीं होगी. मेरे द्वारा संचालित पांच से छह बड़े आंदोलन इस बात के साक्षी हैं. पूरी ईमानदारी से यह भी स्वीकार करता हूँ कि मैं अभी तक सफल नहीं हो पाया, वो है, कलम ग्यारह के संशोधन को रद्द करवाने का आंदोलन! यह आंदोलन अभी समाप्त नहीं हुआ हैं! सच्चाई यह हैं कि, यह आंदोलन मेरे हाथ नहीं रखा गया हैं. इस विषय के निराकरण को लेकर गठित समिति का उत्तरदायित्व बड़ा हैं. सात मेंबर साहिबान की एक समिति "सात सदस्यीय समिति " द्वारा ड्राफ्ट बनाकर, उसे महाराष्ट्र सरकार को भेजना हैं. बोर्ड के सदस्यों का शिष्टमंडल सरकार से मिलकर "संशोधन" रद्द करवाने की मांग करेगा ऐसा उस समय निर्धार किया गया था. दुर्भाग्यवश या राजनीतिवश मैं उस समिति में नहीं हूँ. मेरे लड़ने के सभी अधिकार उस समिति ने दो साल पहले ही अपने अधीन कर लिए हैं. वर्ष 2015 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा बगैर हमारी सलाह लिए गुरुद्वारा बोर्ड के एक्ट में कलम ग्यारह का संशोधन लादा गया था. उस विषय को हजूर साहिब से विरोध दर्शाने वाला मै पहला व्यक्ति था. इस विषय को प्रस्तुत कर जनभावना का रूप देनेवाला मै था. पर मुझे समिति में स्थान नहीं देकर "समिति" ने आंदोलन का दायित्व खुद स्वीकार कर लिया. एक तरह से मुझे दुत्कार कर आंदोलन से बाहर कर दिया गया. मेरे जीवन में यह अपमान का सबसे बड़ा क्षण था ! मुझे आंदोलन से उठाकर बाहर फेंक दिया गया. 

मुझे कलम ग्यारह का वादा याद दिलाने वाले, तानें मारने वाले, बदनाम करने वाले "सज्जन" कभी यह क्यों नहीं सोच पाए कि उस समिति में रविंदरसिंघ मोदी को क्यों नहीं शामिल किया गया? उन्होंने बीते दो सालों में उस "समिति" से कभी प्रश्न किया हैं कि "कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने वाला ड्राफ्ट " सरकार को अभी तक क्यों नहीं भेजा गया?" इस समिति पर साधसंगत का विश्वास हैं इसलिए मैं खामोश रहा और खामोश हूँ. अपने स्तर पर सरकार से मेरी मांग लगातार जारी हैं. इस आंदोलन के अभी तक की असफलता की जिम्मेदारी मै अपने ऊपर लेने को तैयार हूँ क्योंकि मैं चंद सत्ताधीशों से उनकी सत्ता लालसा में बाधा नहीं बनना चाहता हूँ. मैं व्यक्तिगत रूप से यह अलाव ज्वलित रखने का प्रयास करूँगा. वर्तमान बोर्ड तीन साल चलाये या पांच साल कुछ साध्य नहीं होनेवाला. हजुरसाहिब की साधसंगत के अनुकूल गुरुद्वारा बोर्ड का कानून रहे यह मेरी मंशा हैं. यह अपराध है तो बताइये? कौन क्या करें, क्या भूमिका लें यह मेरे कहने की बात नहीं रह जाती. सभी राजनीति के माहिर हैं, जानकर हैं. उस लिहाज से मेरी सलाह के कोई मायने नहीं हो शायद. हजुरसाहिब की सेवा का जिन्होंने व्रत लिया हैं, साधसंगत को जिन्होंने वचननामे परोसे हैं उन सभी के लिए मैं भी एक मामूली सिख ही हूँ. सही मायने में मेरी यहीं पहचान भी हैं. एक सामान्य और मामूली सिख बनें रहने से संतुष्टि प्राप्त हो ऐसी शुरू से अभिलाषा कायम हैं. इसलिए मैं चाह रहा हूँ कि बहुत सारे दायित्वों से अब मैं मुक्त हो जाऊ. मेरे कारण किसी को कष्ट पहुंचा हो, किसी की भावनाएं व्यथित हुईं हो तो मैं अपराधबोध स्वीकार कर आपसे माफी मांगता हूँ. नये लोग काम करें, समाज की प्रतिमा उज्वल करें और समाज को विकसित करें यहीं मेरी मनोकामनायें रहेगी. 

दूसरी ओर मेरा पत्रकार परिवार, साहित्य क्षेत्र परिवार और मित्र परिवार हमेशा मेरी जीवनयात्रा में साथ रहा. इस कारण एक संस्मरणीय संघर्ष यात्रा यहाँ तक आ पहुंची हैं. दस सालों की गुरुद्वारा बोर्ड की नौकरी, 34 वर्षों की साहित्य लिखाण सेवा, 28 सालों की अर्ध (6 वर्ष) और पूर्णसमय (22 वर्ष) की पत्रकारिता, देश के बड़े समाचार पत्र उद्योगों के लिए सेवा पात्रता और कार्य, साथ समाज के लिए अलग - अलग विषयों को लेकर सरकार और प्रशासन से मैं एक मामूली व्यक्ति संघर्षरत रहा. चार लोगों के लिए काम आ पाया यह मेरे लिए एक संतुष्टि का विषय हैं. अब सक्रियता को छोड़ कर केवल संक्षिप्त पत्रकारिता के लिए मैं समय देना चाह रहा हूँ. ब्लॉग के माध्यम से मैं सभी हितचिंतकों से, सीनियर लोगों से और सभी उम्र के मित्र वर्ग से उनकी राय, सलाह चाहता हूँ कि वें मुझे अपने विचारों से अवगत करवाएं कि मुझे क्या निर्णय लेना चाहिए? मेरा व्हाट्सप्प नंबर 9420654574. आप सभी की भावनाएं मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं. 

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शुक्रवार, 18 जून 2021

 गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पर छाया आर्थिक संकट ? 

डेलीवेजस, बिलमुक्ता रोजंदारी कर्मचारियों को राहत दीजिए

रविंदरसिंघ मोदी 

      गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड हजुरसाहिब नांदेड़ धार्मिक संस्था की वार्षिक बजट बैठक ता. 13-06-2021 को ऑनलाइन प्रणाली से संपन्न हुई. यह मीटिंग मार्च में स्थगित करनी पड़ गई थी. हालिया संपन्न बोर्ड मीटिंग में बीस विषयों के अलावा फुटकल विषयों पर भी चर्चा हुईं. लगभग सभी मुद्दें घुमाफिराकर पास कर लिए गए. एक - दो निर्णय जो बोर्ड प्रशासन को दिक्कत में डाल सकते थे, उन्हें पूरा या अधूरा रद्द कर दिया गया. वैसे वर्ष 2020 - 2021 के वार्षिक बजट में प्रस्तावित बजट की अनुमानित आमदानी में 70 से 80 करोड़ का सीधा नुकसान (घाटा) दिखाई दें रहा हैं. पिछले वर्ष के प्रस्तावित बजट में 125 करोड़ की आय अनुमानित रखी गई थीं. लेकिन वर्षपूर्ति पर कुल आय ऐसे - तैसे 32 करोड़ रूपये के आसपास ही हो पाई. कोरोना संकट कालावधि में गोलक और अन्य आमदानी बुरी तरह से प्रभावित हुईं हैं. इसलिए वर्ष 2021 - 2022 का आर्थिक प्रारूप पत्र (बजट) केवल 65 करोड़ ही प्रस्तावित करना पड़ गया. यांनी आर्थिक मामलों में गुरुद्वारा बोर्ड संस्था गहरे संकट में घिर गई हैं कहा जाए तो गलत नहीं होगा. 

इस विषय में शायद गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान, पदाधिकारी, समन्वयक और मेंबर साहिबान खुलकर कुछ बताने में असमर्थ प्रतीत हो रहे हैं. इस बजट को किसने कितनी गंभीरता से लिया हम कह नहीं सकते लेकिन इस विकट परिस्थिति में वार्षिक बजट को लेकर चाहिए थीं, वैसी गंभीर चर्चा भी देखने को नहीं मिली हैं. कारण ! कारण यहीं कि बजट से ज्यादा पदाधिकारी और मेंबर साहिबान को अपने अपने व्यक्तिगत मुद्दों को पास करवाने तक ही जिज्ञासा थीं कही जाएं तो गलत नहीं होगा. बोर्ड की आमदानी में वृद्धि को लेकर किसी के पास कोई नया प्रस्ताव नहीं था. मेंबर साहिबान विषय पत्रिका में शामिल अधिकतर विषयों को लेकर वैसे आपसी सहमति में ही दिखाई दिए. नौ में से आठ मेंबर साहिबान ऑनलाइन मीटिंग में हाजिर थे. एक मेंबर साहब अनुपस्थित थे. 

प्रधान भूपिंदरसिंघ मनहास को ग्यारह महीनों के अंतराल के बाद एक मीटिंग पूर्ण सफल होने की संतुष्टि तो हुईं होगी. लेकिन एक नई बात यह देखने को मिली कि सेक्रेटरी स. रविंदरसिंघ बुंगाई द्वारा डेलीवेजस कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने की गई मांग को प्रधान भूपिंदरसिंघ मनहास द्वारा अस्वीकार (ख़ारिज) कर दिया गया! यह बात चमत्कार हैं या केवल एक दृश्यम मात्र हैं? सभी के देखने में यह आया हैं कि अभी तक गुरुद्वारा बोर्ड की सत्ता को सेक्रेटरी रविंदरसिंघ बुंगाई एकतरफा चला रहे हैं. मुंबई या औरंगाबाद में बैठें प्रधान साहब कोई दैनंदिन निर्णय लेने से पहले या ऑफिस आर्डर पर दस्तखत करने से पहले सेक्रेटरी रविंदरसिंघ बुंगाई या समन्वयक स. परमज्योत सिंघ चाहल का परामर्श जरूर लेते हैं. इस विषय में क्या हो गया? 

आश्चर्य की बात तो यह हैं कि हालिया बोर्ड मीटिंग के एजैंडा में कर्मचारियों को पक्का करने का विषय एजैंडा में शामिल ही नहीं करवाया गया था! यह देखकर इस तरह का संदेह मन में उठना स्वाभाविक सी बात हैं. यदि विषय पत्रिका में यह विषय रखकर उसे आर्थिक परेशानियों का हवाला देकर अस्वीकार कर दिया जाता तो शायद कुछ समझा जा सकता हैं. पिछले चार से पाँच माह से बोर्ड कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का विषय लेकर खुद इलेक्टेड मेंबर साहिबान मांग करते आ रहे थे. कभी लेटर के माध्यम से, कभी वीडियो के माध्यम से, कभी मीडिया के माध्यम से मांग और आश्वासन का दौर चलता आया हैं. तीनों सदस्य एक मंच पर आ गए थे. लेकिन क्यों वो विषय एजैंडा में स्थान पा नहीं सका? इतना अहम विषय एजैंडा में क्यों नहीं रखा गया यह सवाल कर्मचारियों को भी खल रहा हैं. कुछ कर्मचारियों ने हमारे साथ भी इस विषय में चर्चा की और अपनी परेशानियों से अवगत करवाया. 

बोर्ड मीटिंग में रविंदरसिंघ बुंगाई ने आवाज उठाई थी कि बड़ी संख्या कर्मचारी पांच सालों से डेलीवेजस पर कार्यरत हैं और नियमों के तहत दो सालों की सेवा के बाद उन्हें सेवा में पक्का किया जाना चाहिए. वैसे बोर्ड एक्ट में पक्का करने को लेकर कोई लिखित नियम नहीं हैं, "दो साल" शब्द केवल एक प्रैक्टिस के तहत चला आ रहा हैं. इस लिहाज से जाहीर है सभी डेलीवेजस कर्मचारी आशावाद में थे. लेकिन प्रधान साहब ने सेक्रेटरी साहब का मौखिक प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया! अन्य सदस्य क्या चर्चा करते? आर्थिक संकट के संबंध में शायद उन्हें पूर्व कल्पना होगी. यदि सभी पात्र कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का निर्णय लिया जाता तो गुरुद्वारा बोर्ड की तिजोरी पर प्रतिमाह 34 लाख से 36 तक का अतिरिक्त खर्च बढ़ जाता. यानी एक वर्ष में साढे चार करोड़ तक का बजट बढ़ जाता. कोरोना के हालात में यह निर्णय संभव नहीं था. इसलिए एजैंडा में मुद्दा शामिल नहीं हो पाया होगा. लेकिन सीधा तथ्य परोसने की बजाए उस विषय को मोड़ देने का प्रयास योग्य नहीं होगा. वैसे देखा जाएं तो पिछले दो ढाई सालों में कर्मचारी पक्के क्यों नहीं किये गए. जिन्हें दो वर्ष हुए उन्हें बोर्ड मीटिंग के आस पर पक्का किया जाना कोई गैर नहीं होता. 

हमारी सलाह है कि बोर्ड भले अभी कुछ समय के लिए कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का विषय आगे बढ़ा दें. लेकिन डेलीवेजस, बिलमुक्ता और रोजंदारी में वेतन वृद्धि जरुर करें. हमारा प्रस्ताव हैं कि कोरोना और महंगाई का वर्तमान समय देखते हुए कलर्क के वेतन में प्रतिदिन एक सौ रूपये (₹ 100/-) और सेवादार के वेतन में प्रतिदिन पिचहत्तर रूपये (₹ 75/-) की वेतनवृद्धि की राहत दी जाएं. वहीं आज्ञा आदेश के लिए भी रोजंदारी में प्रतिदिन 75/- रूपये मजदूरी बढ़ाई जाएं. यदि प्रधान साहब और मेंबर साहिबान इस निर्णय पर सहमति बनाते हैं तो निश्चित ही चार से पंच सौ कर्मचारियों को राहत मिलेगी. वहीं जो मामले अनुकंपा से जुड़े हैं उनका निराकरण तो किया जा सकता हैं. उनको प्रलंबित रखा जाना कर्मचारियों के अधिकार और हक पर अन्याय हैं. अनुकंपा और ससपेंड कर्मचारियों के विषय में बोर्ड की भूमिका कर्मचारियों को प्रताड़ित करने जैसी हैं. क्या यह मामला लटकाकर रखने का निर्णय प्रधान साहब का व्यक्तिगत हैं? अब इलेक्टेड मेंबर साहिबान भूमिका क्यों नहीं अपनाते? 

अंतिम बात यह कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था आर्थिक संकट में घिर गई हैं. भूपिंदरसिंघ मनहास के पास कोई जादू की छड़ी नहीं हैं कि घुमाई और तिजोरी भर गई. श्री मनहास पिछले दो से ढाई सालों में बोर्ड के लिए नैतिक मार्गों से कोई बड़ी उगराई करने में भी असफल रहे हैं. कोरोना तो मार्च 2020 में आया और अप्रेल 2020 में लॉकडाउन जारी हुआ. भूपिंदर सिंघ मनहास ने मार्च 2019 में पद संभाला. मार्च 2019 से अप्रैल 2020 तक 13 माह में आमदानी बढ़ाने के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं हो पाए. केवल बातें, प्रदर्शन और विवाद में उन्होंने समय गंवाया कहा जाएं तो गलत नहीं होगा. 

बीते 14 महीनों में तखत साहब की गोलक में चढ़ावा निरंतर घटता चला गया. उस पर हर माह कोई ना कोई काम के बहाने खर्च जारी हैं. लॉकडाउन में भी टेंडर जारी होते रहे हैं ! खर्च जारी है लेकिन आमदानी कम हो रही हैं. क्या बोर्ड के प्रधान और मेंबर साहिबान आमदानी वृद्धि के लिए या चढ़ावा जमा करने के लिए प्रयास नहीं कर सकते? यदि बोर्ड द्वारा मीडिया के जरिये विश्व के सिखों से या सिख संस्थाओं से दसवंध की अपील की जाएं तो संस्था आर्थिक संकट से उबर सकती हैं. बोर्ड संस्था में कार्यरत डेढ़ हजार कर्मचारियों की शक्ति व्यर्थ हो रही हैं. हर स्वाभिमानी सिख चाहेगा कि गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पर छाये आर्थिक संकट के बादल दूर हटाने में भूमिका निभाएं. 

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शनिवार, 12 जून 2021

सिख विद्यार्थियों का वजीफा ना रोका जाएं !

 गुरुद्वारा बोर्ड को सिख विद्यार्थियों का वजीफा रोकना नहीं चाहिए !

रविंदरसिंघ मोदी 


(Bhupinder singh manhas, president, GSB)

श्री हजूर साहिब नांदेड़ स्थित गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था द्वारा सिख विद्यार्थियों के वजीफा (स्कॉलरशिप) के विषय में अनदेखी नहीं करनी चाहिए. गुरुद्वारा बोर्ड द्वारा पिछले आर्थिक वर्ष 2020-2021 में सिख विद्यार्थियों को वजीफा देने के लिए अर्थसंकल्प (बजट) प्रावधान किया गया था. लेकिन कोविड 19 संक्रमण का बहाना कर वजीफा वितरित नहीं किया गया जबकि सरकार ने शैक्षणिक वर्ष कानूनन पूर्ण कर लिया. 50% से ज्यादा बच्चों को फीस भरनी पड़ी वहीं 50% विद्यार्थियों की शैक्षणिक फीस भरना शेष है. बारहवीं के छात्रों ने भी अलग अलग परीक्षाओं की फीस भरी हुई हैं. कुछ परीक्षाएं रद्द हो गई लेकिन फीस तो अदा हो चूकी हैं. 

जिन विद्यार्थियों फरवरी 2020 में टूशन लगाया उनको भी फीस चुकानी पड़ी. कॉलेज में भी फीस भरनी पड़ गई. उच्च शिक्षा स्नातक और उच्च स्नातक वर्गों के विद्यार्थियों को भी फीस चुकानी पड़ी. इस वर्ष कोविड की विभीषिका के बावजूद सभी यूनिवर्सिटी द्वारा फीस में भारी बढ़ोतरी की गई हैं. अब वर्ष 2021-2022 शैक्षणिक सत्र के लिए विद्यार्थियों को प्रवेश लेना हैं और अकादमीक फीस भरना हैं. इस वर्ष जून में लॉकडाउन शिथिल हो जाने से स्कूल और कॉलेज के लिए प्रवेश शुरू हो रहें हैं. विद्यार्थियों को टूशन क्लास लगवाने. लॉकडाउन की विभीषिका के चलते आज बहुत से सिख परिवार हताहत हैं. बहुत से सिख परिवारों में कोविड संक्रमण का प्रादुर्भाव रहा हैं. समाज में पिछले साल भर में डेढ़ सौ के लगभग मौतें हुई हैं. बहुत से घरों ने कमानेवाले प्रमुख को खो दिया हैं. कोरोना के उपचार में बहुत से परिवारों को ब्याज से पैसे लेकर जरूरतें पूर्ण करनी पड़ रहीं हैं. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो गई हैं. 

जाहीर हैं कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड द्वारा जारी वर्ष के अर्थसंकल्प में वजीफा फण्ड का एक करोड़ राशि का प्रावधान तो करेगा. पिछले वर्ष के फण्ड प्रावधान का शेष अनुशेष वितरित नहीं किया गया. यांनी वजीफा के फण्ड में दो करोड़ की राशि का समायोजन करने की संभावना और गुंजाईश हैं. लेकिन उदासीनता और राजनीतिक सोंच के कारण गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड सिख विद्यार्थियों के साथ न्याय नहीं कर पा रहा हैं. जिसके चलते सिख विद्यार्थियों का नुकसान हो रहा हैं. बोर्ड को चाहिए कि कम से कम विद्या (शिक्षा) जैसे क्षेत्र में राजनीति ना करें. सिख समाज के नेता, खासकर गुरुद्वारा बोर्ड की राजनीति से जुड़े नेतागण इस संबंध में गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान साहब के सामने खुलकर चर्चा क्यों नहीं करते हैं? प्रधान साहब के करीब और खास कहलाने वाले नेतागण वजीफा नीति को लेकर खुलकर बहस क्यों नहीं करते? यदि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड सिख विद्यार्थियों की पढ़ाई को प्रोत्साहित नहीं कर रहा हैं तो बहुत बड़ा दुर्भाग्य हैं. सिख विद्यार्थी अपना अधिकार लेने के लिए आंदोलन करें इससे पूर्व गुरुद्वारा बोर्ड के अर्थसंकल्प में वजीफा फण्ड का प्रावधान करने के साथ साथ जुलाई अथवा अगस्त माह में बच्चों को वजीफ़े का वितरण किया जाएं. ऐसी सभी से प्रार्थना हैं. 

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 गुरुद्वारा बोर्ड की मीटिंग के मायने !

भूपिंदरसिंघ मनहास 'दरबार साहब' की इमारत का मूल्य बताए ! या माफी मांगे !

रविंदरसिंघ मोदी 

( तखत सचखंड श्री हजूर साहिब दरबार साहिब )

आनेवाली तारीख 13 जून 2021 को गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड नांदेड़ संस्था की बोर्ड बैठक झूम ऑनलाइन प्रणाली द्वारा संपन्न होने जा रहीं हैं. पिछली बोर्ड बैठक ता. 20-07-2020 को संपन्न हुई थीं जो खासी चर्चाओं में रहीं थीं. उसके पश्च्यात आयोजित पिछली बजट बैठक हो नहीं पाई थी. गुरुद्वारा बोर्ड यह धार्मिक संस्था होने के कारण और उसका आर्थिक व्यवहार (बजट) अनुमानित एक सौ करोड़ होने के कारण संस्था के आर्थिक व्यवहार नहीं रुकने चाहिए ऐसा मेरा स्वतंत्र मत हैं. क्योंकि दैनंदिन पूजापाठ, दीयाबाती, व्यवस्था, कर्मचारियों का वेतन, बिजली बिलों का भुगतान जैसे बहुत से खर्च मायने रखते हैं. साथ ही लंगरसेवा, हॉस्पिटल सेवा, यात्रीनिवास व्यवस्था के लिए भी रोजाना खर्च करना पड़ता हैं. ऐसे दैनंदिन खर्च रोजाना करना अपरिहार्यता हैं. इस विषय को समझा जा सकता हैं. लेकिन बजट मीटिंग नहीं होने की बात का हो-हल्ला मचाने के बजाए मंथली बजट जिलाधीश साहब की अनुमति से करवाने का भी विकल्प मौजूद है. सन 1991 के बाद ऐसे प्रयोग होते आये हैं. इन विकल्पों का उपयोग नहीं करने से बोर्ड के एक हजार से ज्यादा पक्के कर्मचारियों को आर्थिक मुसीबतों से रूबरू होना पड़ा. नियम तो यह है कि मीटिंग होने के बाद की प्रोसेडिंग जारी होने तक पास किये गए मुद्दों को अमल में नहीं लाया जा सकता. मीटिंग ख़त्म होते ही बोर्ड वेतन कैसे जारी कर सकता हैं? वर्ष 2021-2022 के आर्थिक बजट को मान्यता की प्रोसिडिंग की तकनीक दिक्कत तो हैं. लेकिन श्रेयवाद को दरकिनार कर समाज की आवश्यकता के सभी मुद्दों के साथ न्याय जरुरी हैं. फटाफट निर्णय नहीं लेकर उसका राजनीतिकरण किये जाना घातक है और एक धार्मिक संस्था में कार्यप्रणली में अवरोध पैदा करने का दुःसाहस भी. 

सात या नौ सदस्यों के सीमित अधिकार हैं !

ता. 13-06-2021 को आयोजित बोर्ड बैठक का ज्यादा विरोध नहीं हुआ है यह बात गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान के हित में हैं. वैसे भी भोपाल एसजीपीसी की मनोनीत रिक्त सीट पर स. हरपालसिंघ स्व. गुरदीपसिंघ भाटिया की सदस्य के तौर पर नियुक्ति से बोर्ड का संतुलन 50 प्रतिशत सदस्य संख्या के नियमों की पूर्ति करता है. इसलिए बैठक जायज हैं. बोर्ड के प्रधान के पास आज बैठक के लिए जरुरी गणपूर्ति संख्या (7) उपलब्ध हैं. जिसे हम कोरम कहते हैं. इस समय बोर्ड में 17 में से नौ सदस्य मौजूद हैं. जिसके पास कोरम उपलब्ध हो वो हर तरह के निर्णय पास करवा सकता हैं. जाहीर हैं ग्यारह महीनों के अंतराल के बाद मीटिंग हो रहीं है विषय पत्रिका में मुद्दे तो होंगे ही. लेकिन बोर्ड को ऐसे मुद्दे पास करने की तकनीकि दिक्कत है कि जिन मुद्दों को पास करवाने के लिए बोर्ड एक्ट (17 सदस्यीय बोर्ड) के दो तिहाई सदस्यों की सहमति जरुरी है. उदाहरण के लिए गुरुद्वारा की खेती लीज पर देने या किरायेनामे पर देने के लिए बोर्ड के सतरह सदस्यों के अस्तित्ववाले बोर्ड के ही अधिकार हो. आज के नौ सदस्यों में से दो तिहाई संख्या का समीकरण धोखाधड़ी जैसा है. इस विषय पर बोर्ड के अन्य सदस्य बात क्यों नहीं कर रहे हैं? आपसी सहमति के मुद्दें या किसी व्यक्तिविशेष को सहायता पहुंचाने की मंशा से पास किये गए निर्णय से बोर्ड का नुकसान हो सकता हैं. जमीनों के संबंध में अभी निर्णय लेना अनुचित होगा. यदि ऐसे निर्णय लिए जाते हो तो जमीन विवाद से जुड़े न्यायालयीन मामलों में गुरुद्वारा बोर्ड का खर्च गुरु की गोलक से नहीं करवाकर उसकी पूर्ण जिम्मेदारी और दायित्व बोर्ड अध्यक्ष की होनी चाहिए. बोर्ड अध्यक्ष वैसा लिखित करार करके दें सकते हैं क्या?  

अब सबसे गंभीर बात ! 

बैठक एजैंडा सूची में 20 नंबर पर एक मुद्दा रखा गया हैं कि गुरुद्वारा बोर्ड के सभी इमारतों का बीमा करवाया जाएं. साथ ही दरबार साहब की इमारत का बीमा करवाया जाएं. यात्री निवास और कार्यालयों की इमारतों का बीमा करवाएं जाने के लिए हमारा पूर्ण समर्थन हैं. लेकिन यदि श्री गुरु गोबिंद सिंघजी महाराज के कायम निवास तखत सचखंड श्री हजूर साहिब 'दरबार साहब' की इमारत का बीमा करवाने और दरबार साहब का मूल्यांकन करवाने जैसी अविवेकपूर्ण पेशकश बोर्ड के माध्यम से की जा रहीं हैं तो मै, स. रविंदरसिंघ मोदी, पत्रकार हजूर साहब व्यक्तिगतरूप से इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध करता हूँ. आशा करता हूँ जो भी गुरु का सच्चा सिख इस विषय में गौर करेगा निश्चित ही मेरे द्वारा प्रोत्साहित तत्वतः निषेध में शामिल हो जायेगा. 

(आक्षेप पत्र)

स. भूपिंदरसिंघ मनहास क्या इतने बड़े व्यवसायी हो गए कि उन्होंने दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज के घर 'दरबार साहब' का मूल्यांकन करना शुरू कर दिया हैं ! उनकी, कौनसी बीमा कंपनी से बात हुई जो हजूर साहब के पवित्र पावन दरबार साहब की सही कीमत तय करेंगी? मनहास साहब, बताइये 'दरबार साहब' का मूल्य (कीमत) क्या तय किया है आपने? बीमा करवाने के लिए दस्तावेज पर कितना आंकड़ा भरोगे? दरबार साहब का बीमा करवाने के लिए कंपनी को कोई कीमत तो तय करनी होगी! किश्त भी भरनी होगी! शेर-ए-पंजाब महाराज रणजीतसिंघजी द्वारा सेवाभाव से निर्मित गुरुघर के दरबार साहब का निर्माण करवाया गया था. यह दरबार साहब भवन अमूल्य हैं. श्रद्धा और आस्था के इस धरोहर का मोल लगाने का गुनाह आपने किया हैं और उसके लिए आपको तखत साहब में माफी मांगनी चाहिए.  

बोर्ड का एजैंडा 👇

( देखिए 20 नंबर का मुद्दा )🖕



(मुद्दा नंबर 20🖕)

शहंशाह दशमेश पिता जी के सचखंड दरबार साहब की इमारत करोड़ों सिखों का सबसे अंतिम 'आस्था केंद्र' है. यह दरबार साहब हमारा उर्जास्थान है, जहाँ दशमपिता श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज ने ग्यारहवें और युगोंयुग अटल श्री गुरुग्रंथ साहिब जी को गुरुगद्दी प्रदान की है. यह दरबार साहब सिख इतिहास की ऐतहासिक और सांस्कृतिक धरोहर हैं. इनका मूल्यांकन कैसे हो सकता हैं? दाम किस प्रणाली से तय होंगे? यह ईमारत आस्था, सेवा और उस दौर से इस दौर तक की साधसंगत के योगदान से निर्मित है. गुरु महाराज के अंगीठा साहब का क्या मूल्य तय करोगे? दरबार साहब के सौंदर्यकरण के लिए कितना सोना लगा, कितनी चांदी लगी, दीवारें कितनी बनीं है, कलश कितने हैं, क्या सभी का मूल्य तय किया जायेगा? जिस दौर में दरबार साहब की ईमारत जर्जर होगी उस समय दरबार साहब के नवनिर्माण अथवा सौंदर्यकरण के लिए साधसंगत सक्षम होगी. श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज स्वयं अपने स्थान की सेवा करवा लेंगे. 

मैं, गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के मौजूदा सभी सदस्य और व्यवस्थापन समिती के सदस्यों से प्रश्न करना चाहता हूँ कि आप सभी ने तो विषय पत्रिका में 20 नंबर का मुद्दा पढ़ा होगा ? क्या इस विषय में आप लिखित आक्षेप नहीं लें सकते थे? साधसंगत की सेवा का दायित्व और तखत साहब की महानता का निवर्हन सभी सदस्यों की जिम्मेदारी हैं. वोट की राजनीति के अलावा धार्मिक मूल्यों को अबाधित रखने के लिए विवेक जागरूक रखना जरुरी हैं. 

मै गुरुद्वारा बोर्ड के सरकार द्वारा नियुक्त जिम्मेदार प्रधान सरदार भूपिंदर सिंघ मनहास (मुंबई) से शिकायत करना चाहूंगा कि, प्रधानसाहब, यह एक अटल सच्चाई हैं कि, आपके गुरुद्वारा बोर्ड के अभी तक के ढाई वर्ष के कार्यकाल में हजुरसाहब बोर्ड पूर्णरूप से अस्थिर हो गया हैं. दक्खन प्रदेश की सिख नुमाइंदगी आपके कार्यकाल में पूर्णरूप से ख़त्म हो गई हैं. गुरुद्वारा परिसर में बार - बार तनाव और हिंसा घटित हो रहीं हैं. राजनीति के चलते ही सिख नौजवानों पर आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं. गुरुद्वारा परिसर में हमेशा लॉ एंड आर्डर भंग हुआ हैं. आपकी दम्भ नीति से आज हजूर साहिब के कितने परिवार त्रस्त हैं. सबसे पहले आपके कार्यकाल का मूल्यांकन होना चाहिए. मैं, एसजीपीसी की प्रधान बीबी जगीरकौर जी से निवेदन करूँगा कि वो स्वयं सरदार भूपिंदरसिंघ मनहास के कार्यकाल का मूल्यांकन करवाए. 

यदि गुरुद्वारा बोर्ड के मेंबर साहिबान और व्यवस्थापन समिती सदस्यों का विवेक जागरूक हैं और आप गुरुघर के वफादार हो, साधसंगत के सेवक हो, किसी बीमा कंपनी से आपका व्यक्तिगत लालच नहीं है तो तुरंत मीटिंग एजैंडा के मुद्दा नंबर 20 में संशोधन करवाकर 'दरबार साहब' का बीमा करवाने का विषय हटा दें. और इस तरह की सोच के लिए भूपिंदर सिंघ मनहास को चाहिए कि वें एक सच्चे सिख की नैतिकता और कर्तव्यपरायणता के तहत श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज के सच्चे दरबार में उपस्थित होकर गुरु महाराज से माफी मांगे. 

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