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बुधवार, 30 जनवरी 2019

हजूर साहिब रेलवे स्टेशन पर श्रद्धालु यात्री परेशान 
हजूर साहिब में रेलवे समस्या पर आंदोलन की तैयारी 
रविंदर सिंघ मोदी 

महाराष्ट्र के नांदेड़ शहर स्थित श्री हजूर साहिब स्टेशन पर पंजाब और अन्य प्रांतों से पहुँचनेवाले श्रद्धालु यात्रीगण यहाँ पहुँचकर खासे परेशान हो रहे हैं. वजह है सभी गाड़ियाँ का प्लेटफार्म पर आगमन. हजूर साहिब के दर्शनों का पहुंचनेवाले यात्रीगण अपना लगेज लेकर तीन प्लेटफार्म लांघकर स्टेशन के बहार पहुंच रहे हैं. छोटे बच्चे और बुजुर्गों के लिए तो यह कसरत से बड़ा काम हो रहा हैं. रेलवे प्रशासन को इस समस्या से बार-बार अवगत करवाने पर भी रेलवे प्रशासन द्वारा इस समस्या पर विचार नहीं किया जा रहा हैं. जिससे हजूर साहिब के सेवाभावी युवक अब इस समस्या को लेकर आंदोलन की राह तलाश रहें है.  
दक्षिण मध्य रेलवे ज़ोन अंतर्गत सचखंड एक्सप्रेस (१२७१५) सबसे सफल रेलवे गाड़ी है जो श्री हजूर साहब नांदेड़ से श्री अमृतसर स्टेशन का रोजाना सफर तय करती हैं. इस रेलवे गाड़ी से रोजाना डेढ़ से दो हजार श्रद्धालु और यात्री यात्रा करते हैं. इस गाड़ी के टिकट आरक्षण में वर्ष भर तेजी रहती हैं. कभी गाड़ी खाली नहीं दौड़ती है. श्री हजूर साहिब के दर्शन हेतु पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, मध्यप्रदेश के यात्रियों के लिए सचखंड एक्सप्रेस बहुत अनुकूल है. उसी तरह से महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के यात्रियों के पंजाब और जम्मू के तीर्थस्थलों के दर्शनों के लिए यह रेलवे गाड़ी बहुत उपयोगी है. 


सचखंड एक्सप्रेस १९९५ से नांदेड़ और अमृतसर के बीच दौड़ रही है. पहले साप्ताहिक के रूप में शुरू हुई यह गाड़ी वर्ष १९९७ में सप्ताह में पांच दिन चलाई गई. वर्ष २००७ से यह गाड़ी सप्ताह के सात दिन दौड़ रही है. इस धार्मिक यात्रा में छोटे बच्चें, महिलाएं, बुजुर्ग भी यात्रा करते हैं. यह यात्रा ३६ से ४० घंटों की होती हैं. जिससे यात्रीगण काफी तक जातें हैं. उसी तरह से श्री हजूर साहिब से श्री गंगानगर के बीच भी गाड़ी नंबर १२४८५ दौड़ती है. यह गाड़ी भी अब रोजाना दौड़ रही हैं. 
दोनों रेलगाड़ियों के समस्या लगभग एक जैसी हैं. नांदेड़ के श्री हजूर साहिब रेलवे स्टेशन पर पहुंचनेवाली सभी गाड़ियों का आगमन प्लेटफार्म नंबर चार (४) पर हो रहा हैं. जबकि तखत सचखंड श्री हजूर साहिब तीर्थस्थल प्लेटफार्म नंबर एक (१) की दिशा में हैं. प्लेटफार्म नंबर चार पर सुविधाएँ नहीं हैं. यहाँ से तखत सचखंड पहुँचने के लिए आसान रास्ता उपलब्ध नहीं हैं. गोकुल नगर से विष्णुनगर रस्ते से गुरुद्वारा की बसें गुजरने के लिए दिक्क़ते ही दिक्कतें हैं. बारिश में तो रेलवे अंडर ब्रिज में पानी भरने के कारण चार से पांच माह रास्ता बंद रहता हैं. गोकुल नगर का हिस्सा आपराधिक गतिविधियों का केंद्र माना जाता है. 
दूसरा रास्ता बहुत घुमाकर जाता हैं. स्टेडियम रोड और वी.आई.पी. रोड, से होकर घूमकर जाना होता हैं.  यात्रियों को बसें नहीं मिलती उनको ऑटो रिक्शावाले बहुत परेशान करते हैं. दुगना, तिगना किराया हड़पते हैं. बहुत बार यात्रियों का सामान भी चोरी हो जाता हैं. ऐसी परिस्थिति में ३६ से ४० घंटों की यात्रा करने बाद भी यात्री को बड़ी दिक्कतों को सामना करना पड़ता हैं. यदि यह रेलवे गाड़ियां चार नंबर के बजाय एक नंबर प्लेटफार्म पर पहुँचती हैं तो यात्रियों को अधिक सुविधाएँ उपलब्ध होगी. लेकिन यह बात दक्षिण मध्य रेल विभाग प्रशासन सुनने को तैयार नहीं हैं. 
इस विषय में हजूर साहिब के सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा डी.आर.एम. (नांदेड़) को ज्ञापन प्रस्तुत कर सचखंड एक्सप्रेस और श्री गंगानगर एक्सप्रेस को प्लेटफार्म नंबर एक पर लेने की मांग की गई हैं. गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कार्यालय द्वारा भी पत्राचार किया गया हैं. संत बाबा बलविंदर सिंघजी ने भी रेलवे के डी.आर.एम. से चर्चा कर मांग प्रस्तुत की लेकिन रेलवे प्रशासन सुनने को तैयार नहीं. इसलिए अब हजुरसाहिब के युवा, सामाजिक कार्यकर्ता और बोर्ड मेंबर एक सामाजिक आंदोलन करने का विचार कर रहे हैं. 

ता. २९ जनवरी को एक बैठक लेकर तय किया गया कि ता. १ फरवरी , २०१९ को रेलवे डी.आर.एम. को एक ज्ञापन पेशकर आंदोलन के लिए आगाह किया जाए. यह भी तय किया गए कि नांदेड़ से लेकर अमृतसर तक के हर स्टेशन अंतर्गत वहां के सिख रेलवे प्रशासन को ज्ञापन पेशकर मांग करें कि सचखंड एक्सप्रेस गाड़ी को प्लेटफार्म नंबर एक पर ही रोका जाएँ. दिल्ली के सिखों से विशेष निवेदन हैं कि वे रेल मंत्रालय को ज्ञापन देकर मांग प्रस्तुत करें. रेलवे बोर्ड चेयरमैन को भी दिल्ली के सिख ज्ञापन देकर मांग मानवाएँ. 
हजुरसाहिब के सभी सेवाभावी सिख जत्थे, संघटन और युवा मिलकर रूपरेखा के तहत आंदोलन करें. गुरुद्वारा के दर्शनों को आनेवाले यात्रीगण यहाँ की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हैं. यात्रियों के योगदान से ही गुरुद्वारा के कर्मचारी, आसपास के व्यापारी, रिक्शावाले, टैक्सीवाले और अन्यों के पेट निर्भर हैं. इसलिए रेलवे से आनेवाले यात्रियों को सुविधाएँ दिलवाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए. इसके लिए गुरुद्वारा बोर्ड प्रशासन को भी आंदोलन में पूर्ण सहयोग करना चाहिए. साथ ही उधर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर को भी भूमिका लेनी होगी. सभी के सहयोग से यह आंदोलन सफल हो सकता हैं. पहले चरण में ता. १ फ़रवरी को ज्ञापन (निवेदन) प्रस्तुत करने की सभी कृपा करें. सुबह ११. ३० बजे नांदेड़ रेल प्रशासन को ज्ञापन प्रस्तुत करना तय हुआ हैं. नांदेड़ से लेकर दिल्ली तक सभी स्टेशन के परिवेश में रहनेवाले सिख वहां के रेलवे प्रशासन के सामने मांग रखें यह प्राथना हैं. 
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रविवार, 27 जनवरी 2019

सिख रेजिमेंट की शानदार वापसी 
देश के सिखों में ख़ुशी की लहर 
रविंदर सिंघ मोदी 

भारतीय गणतंत्र दिवस के अवसर पर देश की राजधानी दिल्ली में ता. २६ जनवरी, २०१९ के दिन आयोजित राष्ट्रिय परेड (संचलन) में जब सिख रेजिमेंट के सशस्त्र दस्ते ने अपनी पारंपरिक वर्दी में पथ संचालन किया तो देश के सिखों का सीना एक बार फिर फूलकर चौड़ा हो गया. देश में सन १८४६ से सेवारत सिख रेजिमेंट को सन २०१६ में अचानक से पथ संचलन परेड में हिस्सा लेने से रोक दिया गया था. 
सिख रेजिमेंट का इतिहास लगभग १७२ वर्षों का है. सिखों ने हर मोर्चे पर युद्ध में हिस्सा लिया और अपना जौहर दिखाया. पाकिस्तान, चीन, बांगलादेश सहित अनेक स्थानों पर सिख रेजिमेंट ने युद्ध में हिस्सा लेकर अपनी वीरता का परिचय दिया. सन १९९९ में हुए कारगिल युद्ध में सिख रेजिमेंट की बटालियन द्वारा टाइगर हिल से पाकिस्तानी सेना को हटाकर वहां कब्ज़ा किया था. जिसमें १० सिख जवानों ने अपनी जानें गँवाई थी. 
सिख रेजिमेंट के पास ७२ लड़ाईयों के सम्मान प्राप्त हैं. शहादत देकर रेजिमेंट द्वारा दो परमवीर चक्र, १४ महावीर, ५ कीर्ति चक्र, ६७ वीर चक्र सहित लगभग १६०० सम्मान प्राप्त हैं.
सिख राज्य के लुप्त होने के बाद महाराजा रणजीत सिंघजी की प्रेरणा पर सिख सैनिकों को एकत्र कर अंग्रेजों ने सिख रेजिमेंट की स्थापना की थी. बाद में प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के समय भी विदेशों में सिख रेजिमेंट ने अपनी वीरता से सभी को स्तब्ध कर दिया था. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सिख रेजिमेंट को भारतीय सेना में प्रमुख फौजी रेजिमेंट के रूप में शामिल किया गया. स्वंत्रता के बाद अचानक हुए सीमा पर आक्रमण के समय सिख रेजिमेंट ने दुश्मनों के सभी आक्रमण विफल किये. सिख गुरुओं की शिक्षाओं पर मार्गक्रमण करनेवाली सिख रेजिमेंट को जब गणतंत्र दिवस के परेड में शामिल नहीं किया गया था तो देशभर के सिखों की भावनाएँ आहत हुई थी.
अब जब २०१९ की परेड में लाल रंग की प्रभावी वर्दी में सिख रेजिमेंट के दस्ते ने मार्च परेड किया तो तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत हुआ. साथ ही परेड देख रहें लोगों में उत्साह का वातावरण बन गया. टी.वी. पर ये दृश्य देखनेवालों ने सिख रेजिमेंट की भूरी-भूरी प्रसंशा कर डाली. देश की रक्षा में सिख रेजिमेंट का योगदान सदा गौरवशाली रहा हैं. हर मोर्चे पर सिख रेजिमेंट अग्रसर रही हैं. ऐसी बहादुर रेजिमेंट के परेड में शामिल नहीं रहने से दुश्मनों के लिए कई तरह की चर्चाओं को अवसर मिल गया. सिख कौम में देशभक्ति का प्राकृतिक गुण है. देश की रक्षा, संस्कृति की रक्षा के सभी गुण सिख गुरुओं की शिक्षा से सृजित हैं. ऐसी सिख रेजिमेंट पर सिख ही क्या  नागरिक को फक्र होना चाहिए. गणतंत्र दिवस की परेड में पथ संचलन के बाद निश्चित ही रेजिमेंट का मनोबल ऊँचा हुआ होगा. सिख रेजिमेंट के पथ संचलन के बाद देश के सभी सिखों में जज्बात जाग गए हैं. देश के लिए मर मिटने के लिए सिख युवा फिर अग्रसर हो उठे हैं. 
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बुधवार, 23 जनवरी 2019

आंदोलन की धमक अब देशभर

आंदोलन की धमक अब देशभर 
मुख्यमंत्री को सौंपा गया ज्ञापन 
गुरुद्वारा बोर्ड कानून के संशोधन जल्द होंगे पूर्ववत
रविन्दरसिंघ मोदी 

श्री हजूर साहिब की धरती से उठा आंदोलन अब महाराष्ट्र के सीमाएँ लाँघकर पंजाब और अन्य राज्यों में पहुँच चूका हैं. हर स्थान से कलम ग्यारह के उस संशोधन का विरोध किया जा रहा हैं. महाराष्ट्र सरकार अब दबाव में है और बहुत जल्द हमें यह समाचार सुनने में मिल सकता है कि सरकार द्वारा ता. १८ फरवरी, २०१५ को किये गुरुद्वारा बोर्ड कानून में किये गए बदलाव का संशोधन वापिस लिया जा रहा हैं. 
इस बात का पहला श्रेय आदरणीय जत्थेदार संतबाबा कुलवंतसिंघजी और सम्मानीय पंजप्यारे साहिबान को जाता हैं. पंज प्यारेसाहिबान द्वारा गुरुमत्ता पारित करने के बाद हजुरसाहिब ही नहीं महाराष्ट्र, तेलंगाना, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश और कर्नाटका के सिखों ने जगह-जगह विरोध और प्रदर्शन शुरू कर दिया हैं. आंदोलन का दूसरा श्रेय हमारे पूज्य संत बाबा बलविंदर सिंघजी कारसेवा वाले और शिरोमणि पंथ अकाली बूढ़ा दल ९६ करोड़ी के जत्थेदार संत बाबा प्रेमसिंघजी माता साहेब वालों को जाता हैं. जिन्होंने साधसंगत का नेतृत्व स्वीकार कर ता. २१ जनवरी, २०१९  को एक भव्य आंदोलन को अंजाम दिया. 

इस आंदोलन ने नांदेड़ से लेका मुंबई तक हलचल मचा दी. इस आंदोलन से हजुरसाहिब के सभी सामाजिक संघठन जुड़ गए. साधसंगत से चुनकर आए तीनों सदस्यों ने भरपूर परिश्रम किया. हजूर साहिब के अन्य बोर्ड सदस्यों ने भी सकारात्मक भूमिका को अंजाम दिया. हजूर साहिब के नवजवानों ने जोश और उत्साह दिखाकर संघठन का परिचय दिया. यदि आपस में एकता हो तो हर आंदोलन सफल हो जाता हैं. नांदेड़ के साथ-साथ परभणी, परतुर, औरंगाबाद, श्रीरामपुर, अहमदनगर, मुंबई में आंदोलन की तीव्रता पहुंची और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. 
मुंबई में शिष्ट मंडल 


सबसे बड़ा काम ये हुआ कि हजुरसाहिब के एक शिष्ट मंडल ने ता. २२ जनवरी, २०१९ को मुंबई पहूँचकर मंत्रालय में मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर उन्हें हजुरसाहिब की साधसंगत की मांग का एक ज्ञापन सौंपा. शिष्ट मंडल में गुरुद्वारा सदस्य गुरमीत सिंघ महाजन, राजेंद्र सिंघ पुजारी, गुरप्रीत सिंघ सोखी थे. वहीं बोर्ड के प्रधान और विधायक तारासिंह को शिष्ट मंडल की अगुवाई करनी पड़ी. बोर्ड के सचिव परमज्योत सिंह चाहल भी शिष्ट मंडल में शामिल हुए. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ज्ञापन को सकारात्मक लेकर कानून संशोधन को रद्द करने की अनुकूलता दिखाई. जिससे उन अनैतिक तत्वों की गतिविधियों पर भी ब्रेक लग गया जो कलम ग्यारह का लाभ उठाकर बोर्ड का सीधा प्रधान बनने के लिए प्रयासरत थे. 
उधर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के प्रधान भाई गोबिंदसिंघ जी लोंगोवाल ने हजूर साहिब की साधसंगत की मांग के बाद व्यक्तिगत रूप से इस आंदोलन को अपना समर्थन जाहिर करते हुए महाराष्ट्र सरकार को ज्ञापन भेजकर मांग करने का निर्णय लिया. लेकिन दूसरी ओर श्रोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के मुंबई के सदस्यों ने लेकिन कलम ग्यारह को अपना समर्थन जारी रखा हुआ हैं. 
केंद्रीय मंत्री श्रीमती हरसिमरत कौर बादल ने आंदोलन को गंभीरता से लेते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को ट्वीट कर विषय से अवगत कराया और मांग प्रस्तुत की. जिसके बाद देवेंद्र फडणवीस द्वारा ट्वीट का तुरंत जवाब दिया गया और एक्ट संशोधन के विषय में सकारात्मक जवाब दिया गया. ये ट्वीट भी खासा चर्चा में रहा. मंजिंदरसिंघ सिरसा (दिल्ली) और मंजीत सिंह जी.के. द्वारा भी मांग उठाई गई. 
कुलमिलाकर गुरुद्वारा बोर्ड कानून १९५६ की कलम ग्यारह के एक्ट संशोधन को रद्द करने की मांग देशभर पहुँच गई. अब हर स्तर से विरोध उठ रहा हैं. सरकार की मंशा और मुंबई के कुछ लोगों की कारगुजारियां साधसंगत के सामने खुलकर उजागर हो चुकी है. जो अनैतिक तत्त्व बोर्ड का प्रधान पद खरीदने की भाषा कर रहे थे उन्हें भी करारा जवाब मिला है. हजूर साहिब के नौजवानों में उन व्यापारी प्रवृत्ति के लोगों के प्रति खासा रोष व्याप्त हैं. होना भी चाहिए. बहरहाल ख़ुशी इस बात की है कि हजूर साहिब की साधसंगत के आंदोलन के साथ अब देश के सभी घटक जुड़ रहे हैं. आनेवाले दिनों में हजूर साहिब का बोर्ड सरकार के नियंत्रण से मुक्त होने के पुरे आसार दिखाई दे रहे हैं. 
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सोमवार, 21 जनवरी 2019

एक नयी पहल का सूत्रपात ;
जत्थेदार जी और पंजप्यारे साहिबान को धन्यवाद 
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गुरुद्वारा बोर्ड कानून के सभी संशोधन रद्द करने की मांग 
जयकारों से गूंज उठी हजूर साहिब नगरी 
रविंदर सिंघ मोदी 


तखत सचखंड श्री हजूर साहिब की पावन धरती से तारीख २१ जनवरी २०१९ के दिन एक नयी पहल का सूत्रपात हुआ. गुरुद्वारा बोर्ड को महाराष्ट्र सरकार के चुंगल से मुक्त करवाने के लिए आखिर पंथ के जत्थेदार संतबाबा कुलवंतसिंघजी और आदरणीय पंजप्यारे साहिबान को कदम उठाना पड़ गया. पंजप्यारे साहिबान ने तखत साहिब के सान्निध्य में गुरुमत्ता लेकर सरकारी संशोधन बर्खास्त करने की मांग रखी. साथ ही इस मांग को पूरा करने  शुरू किये गए आंदोलन का नेतृत्व संतबाबा बलविंदर सिंघजी कारसेवा वाले और संतबाबा प्रेमसिंघजी माता साहेब वालों को सौंपा.

पंजप्यारे साहिबान की इस मांग को हजूरी साधसंगत ने हाथोहाथ लेकर हजूर साहिब नगरी में भव्य रैली निकालकर गुरुद्वारा बोर्ड कानून १९५६ में वर्ष २०१५ से अबतक किये गए सभी सरकारी संशोधन रद्द करने की मांग की. जिलाधीश श्री अरुण डोंगरे को एक ज्ञापन भी प्रस्तुत किया. संत बाबा बलविंदर सिंघजी और संतबाबा प्रेमसिंघजी मातासाहिब वालों के नेतृत्व में आंदोलन को आज एक नई दिशा प्राप्त हुई कहा जाए तो गलत नहीं होगा. पंजप्यारे साहिबान के आदेश के बाद साधसंगत का जोश भी चरम पर रहा. जयकारों से नगरी गूंज गई. 
इस नयी पहल से मुंबई में हलचल मच गई. सरकार के अधीन गुरुद्वारा बोर्ड कानून की धारा ग्यारह (११ ) का आधार लेकर मुंबई के कुछ विवादित मेंबर हजूर साहिब बोर्ड का प्रधान बनने के लिए मंत्रालय की सीढियां  घिसने में लगे हुए है. उनकी अरमानों को अब ठेस लगी होगी. लेकिन क्या ये अपनी नापाक हरकतों से बाज आएंगे? आइये आज आपको एक शरीफ मुम्बईया की कहानी बताते है.

दो-तीन माह पहले की घटना है, जब एसजीपीसी के सदस्य और गुरुद्वारा बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदरसिंघ मिन्हास गुरुद्वारा परिसर के ए विंग ब्लॉक के एक कमरे में आकर ठहरे थे. उनके साथ उनके पुत्र भी थे. उनके यहाँ होने की सुचना भाई देवेंद्रसिंघ मोटरावाले ने दी. तब सरदार लड्डूसिंघ महाजन, जसपालसिंघ लांगरी, अवतारसिंघ पहरेदार, देवेंद्रसिंह विष्णुपुरीकर, तेजपालसिंघ खेड़ और मैं स्वयं भूपिंदर सिंघ मिन्हास से मिलने पहुंचे. तारासिंह द्वारा बुलाई गई बैठक में उपस्थित होने का उनसे कारण पूछा तो शुरू में कुछ गर्मागर्मी हुई. बाद जब चर्चा पटरी पर लौटी मीत मिन्हास ने हमें आश्वासन दिया कि, कलम ग्यारह रद्द करवाने के लिए अब वो हमारा साथ देंगे. यहीं नहीं बल्कि हमारे शिष्टमंडल को मुख्यमंत्री का समय दिलवाएंगे. भला मनुष्य मानकर हमने साहब की बात पर यकीन कर लिया और रास्ता ताकते रहे कि कब मिन्हास साहब हमें मुख्यमंत्री के पास लेकर चलते हैं. 
मिन्हास साहब मुख्यमंत्री से मिलने तो गए लेकिन हमारे शिष्टमंडल को समय दिलाने के लिए नहीं बल्कि प्रधान पद पर अपना टांका फिट करने के लिए. उन्होंने मुख्यमंत्री से मिलकर तारासिंह के बारे में हजुरसाहिब में उठे असंतोष का हवाला देकर अगलीबार कलम ग्यारह का उपयोग कर अपने को हजूर साहिब बोर्ड का प्रधान नियुक्त करने की मांग कर डाली. यही नहीं प्रधान पद के बदले कुछ सौदेबाजी के पैतरे बिछा दिए. 
मुख्यमंत्री महोदय ने तारासिंघ को बुलाकर उनका त्यागपत्र मांग लिया. उसके बाद भूपिंदर सिंह मिन्हास ने गुरुद्वारा बोर्ड के तीन सदस्यों के चुनाव के दौरान संगत का ध्यान बटाकर अपने पासे मजबूत करने शुरू कर दिए. एसजीपीसी से मेंबरशिप त्यागकर सांठगांठ कर सरकारी प्रधान बनने की नीति अपना ली. एसजीपीसी के सदस्य के रूप में गुरविंदरसिंघ बावा, परमज्योत सिंघ चाहल को अपना समर्थक रखा. औरंगाबाद में मीटिंग लेकर वहां से अपना समर्थक मेंबर चुनकर लाने का असफल प्रयास किया. यांनी मुंबई मैं बैठकर कैसे कोरम पूर्ण कर लिया जाएं इसकी सभी व्यवस्थाएं जुटा ली. तारासिंह भी उनके साथ और इकबालसिंघ भी उनके साथ. बस नांदेड़ के एक दो मेम्बरों को अपनी ओर करने की कोशिश और मुंबई में बैठकर शासन चलने की पूरी योजना लगभग पूर्ण. 
मिन्हास जी ने तखत साहब के परिसर में बैठकर हमसे वादा किया और मुकर गए. यही नहीं तखत का प्रधान बनने के लिए उन्होंने जो पैंतरे अपनाएं, वो हजुरसाहिब के लोगों को नीचे दबाने का बंदोबस्त हैं. ये सब किसलिए. क्या एस.जी.पी.सी. का यह अंदरूनी खेल हैं? या मिन्हास एस.जी.पी.सी. को भी उपयोग में ला रहे हैं? छल और बल का प्रयोग कर तखत साहब का प्रधान बनने की यह नीति सरकार की आदतें बिगाड़ने वाली हैं. क्या मोल दे रहे हैं वो प्रधान पद का सरकार को? तारासिंह की बातों पर यकीन किया जाएं तो बेहद शर्मसार करनेवाले तथ्य सामने आ रहे हैं. ऐसी ओछी राजनीति करनेवाले और झूठे वायदे कर धोखेबाजी करनेवालों को यहाँ का प्रधान बनने की कोई जरुरत नहीं हैं. प्रधान तो क्या उन्हें बोर्ड का मेंबर भी नहीं बनना चाहिए.
तखत साहब की पवित्रता का बनाये रखने के लिए संत बाबा बलविंदर सिंघजी और संत बाबा प्रेमसिंघजी की अगुवाई में हजुरसाहिब के अमृतधारी सिखों ने गुरुद्वारा बोर्ड कानून की कलम ग्यारह हटाने के लिए आंदोलन का मार्ग अपना लिया हैं. रहत मर्यादा की उपेक्षा करनेवालों ने अब इस बोर्ड की तरफ बुरी नजर डालने से पहले  अपनी नियत के विषय में सोच लेना चाहिए.

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बुधवार, 16 जनवरी 2019

समय आ गया है अब आवाज बुलंद हो 
हजूरी प्रधान के लिए बड़े आंदोलन की जरुरत 
रविंदर सिंघ मोदी 

मुंबई मंत्रालय में गुरुद्वारा के नए बोर्ड गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है. तीन सदस्यों के चुनाव के बाद अब बाहरवालों का रास्ता साफ़ है. अब बोर्ड की नए से रचना कर, नया अध्यक्ष (प्रधान) नियुक्त करने की पहल जारी है. उधर प्रक्रिया में तेजी है. इधर हजूरी प्रधान के सपने देखनेवाले हम सब सुस्त हैं. हजूर साहिब से कोई बड़ी पहल तो मायने रखती है. केवल निवेदन देने मात्र और अख़बारों में सुर्खियाँ बटोरने से हजूरी प्रधान की नियुक्ति नहीं हो जाती. जरुरत हैं एक नई पहल और एक नए आंदोलन की. 
यह अपेक्षा हम साधसंगत में चुनकर आए हमारे तीनों सम्मानीय सदस्यों से कर सकते हैं कि वे संघटित होकर एक बड़ा आंदोलन करें जिसमें बड़ी संख्या में साधसंगत भी जुड़े. चुनकर आएं सदस्यों ने साढ़े तीन हजार से साढ़े चार हजार वोट प्राप्त किये हैं. यह कोई छोटी बात नहीं हैं. इसका अर्थ यही निकलता हैं कि साध संगत ने उन्हें अपना नुमाइंदा मान लिया हैं. अब तीनों सदस्यों की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि वे गुरुद्वारा बोर्ड कानून १९५६ की कलम ११ में हुए संशोधन को रद्द करवा कर हजूरी प्रधान का चयन करवाने का रास्ता साफ़ करें. यहाँ के व्यवस्थापन में हजूर साहिब का नुमाइंदा प्रधान के रूप में प्रस्तुत करें अथवा करवाएं.
एक बार सरकार द्वारा अध्यक्ष नियुक्त करने के बाद यह लड़ाई बहुत मुश्किल हो जाएगी. क्योंकि बड़े बड़े दिग्गज प्रधान पद पाने के लिए पासे बिछाये हुए हैं. दिल्ली, मुंबई और नागपुर की शक्तियां इस कार्य में जुटी हुई हैं. इस बात को गंभीरता से लेते हुए चुनकर आएं तीनों सदस्य और बोर्ड के में मनोनीत अन्य सदस्य मिलकर बैठक का आयोजन कर आंदोलन की दिशा तय करें. यदि सभी सदस्य हजूरी प्रधान और कलम ११ रद्द करवाने के विषय में एकजुट होते हैं तो निश्चित ही एक बड़ा जनांदोलन खड़ा हो सकता है. 
जाहिर हैं कि संभाव्य आंदोलन में स्थानीय साध संगत की पूर्ण शक्ति भी प्राप्त हो सकती हैं. यदि यहाँ मौका चूक गए तो आनेवाले पच्चीस सालों में भी हजूरी प्रधान नहीं बन पायेगा. इसलिए २६ जनवरी से पहले ही यहाँ शांतता पूर्ण आंदोलन कर बोर्ड पर हमारा प्रधान मांगना चाहिए. लोकतंत्र में हमारा प्रधान चुनने का अधिकार हमें होना चाहिए. जिस  तरह से बोर्ड का काम चल रहा हैं उसे देखकर ये लग रहा हैं कि सन १९७५ की तर्ज पर गुरुद्वारा बोर्ड में भी आपातकाल लागु कर दिया गया हैं. इस अघोषित आपातकाल के ख़िलाफ़ लड़ने का यही सबसे उपयुक्त समय आ गया हैं. यदि मौका चूक गए तो साधसंगत से किये गए वायदे  झूठ का पुलिंदा साबित होंगे इसमें कोई दो राय नहीं हैं. 
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रविंदर सिंघ मोदी 

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

क्या गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड प्रधान पद की सौदेबाजी हो रही है?
कौन गद्दार दशमेश पिता का स्थान कब्ज़ाना चाह रहा है? 
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हजूरी प्रधान का सपना दिखानेवालों का संघर्ष शुरू !
रविंदर सिंघ मोदी 

(यह लेख हजूर साहिब के उन लोगों के लिए हैं जो जागृत नहीं हैं. 
यदि पढ़कर सो जाना हैं या व्यर्थ ही चर्चा करना है 
तो शायद लेख लिखना एक शोकांतिका मात्र माना जाना चाहिए. 
यदि लेख पसंद पड़े तो निश्चित ही आपके हक और अधिकार की लड़ाई में महत्वपूर्ण प्रतीत होगा. )

मुंबई के कुछ व्यावसायिक और आधे राजनीतिक लगातार गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड के ख़िलाफ़ हथकंडे अपना रहे हैं. किसी तरह से गुरुद्वारा बोर्ड का सदस्य पद मिल जाये इस मंशा से वहां का एक समूह पहले कार्य करता था. लेकिन अब उनकी मंशा गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड का प्रधान पद पाना है. क्योंकि हमारी गुरुद्वारा बोर्ड नामक धार्मिक संस्था १९५६ एक्ट में कलम ११ के संशोधन के बाद सरकार के अधीन जो है. सीधी बात है कि ये संस्था अब सरकारी मिलकियत बन गई है. सरकार जिसे चाहिए उसे प्रधान बना सकती हैं. जिसे चाहिए उसे मेंबर बना सकती है. लड़कर तो नांदेड़ के सिखों को मेंबर बनना पड़ता हैं. 
बड़े शर्म की बात है कि जिस संस्था का गठन नान्देड़ के वफादार अमृतधारी गुरु सिखों ने करवाया था और उसे सत्ता के रूप में बाहर वाले उपयोग कर रहे हैं. अक्सर चर्चा में सुनने को मिल रहा है कि, मुंबई और नागपुर के लोगों ने मुख्यमंत्री के नाक में दम कर रखा है कि हमें संस्था का प्रधान बनाओ, सदस्य बनाओ. अब तो गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान बनने के लिए वर्तमान मीत प्रधान और मुंबई के व्यवसायी भूपिंदर सिंघ मिन्हास साम, दाम, दंड और भेद अपनाकर मुख्यमंत्री के पीछे लगे हुए हैं कि एकबार मुझे नांदेड़ के गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बना दो. वे मुख्यमंत्री से कह  हैं कि फिर एकबार कलम ११ का उपयोग कर मुझे प्रधान बना दीजिये. जाहिर हैं एस.जी.पी.सी. भी इस बात का समर्थन कर रही होगी कि हजूर साहिब तखत पर उनके दो मुंबई निवासी मेम्बरों की सत्ता स्थापित हो जाये. चर्चा है कि मुंबई के ये लोग प्रधान पद पाने के लिए कोई भी दाम चुकाने को तैयार है.  विगत दो दिनों से नांदेड़ में इस तरह की चर्चा उफ़ान पर हैं. 
ये भी एक संयोग है कि बोर्ड के प्रधान और मिन्हास साहब के साथी सरदार तारा सिंघ भी विगत दो दिनों से नांदेड़ में गुरुद्वारा बोर्ड को लेकर चिंतन कर रहे हैं, क्या उनका पत्ता कटने वाला हैं? तारासिंह चिंतित है इसीलिए कि उनके राजनीतिक भविष्य का अब क्या होगा. नांदेड़ के बहुत से सदस्य उनकी सांत्वना कर रहे थे कि हम आपके साथ हैं. जहाँ - जहाँ तारा सिंह निकले सब उनके आगे पीछे दिखाई देते. अभी भी बहुत से लोगों को उम्मीद है कि तारा सिंह में इस.जी.पी.सी. के मुम्बइया सदस्यों का दांव पलटने का सामर्थ्य है. मुख्यमंत्री के अधिक करीब तो आमदार तारा सिंघ ही हैं फिर भूपिंदर सिंघ मिन्हास की मुख्यमंत्री से निकटता कैसे? वजह गहरी लग रही है. मिन्हास जब भी नांदेड़ पहुंचते है तब मीठी मुस्कान बिखरकर कहते हैं कि कलम ११ और कलम ६ के संशोधन की लड़ाई में मैं आपके साथ हूँ. एकबार तो गुरुद्वारा परिसर के कमरे में उन्होंने हमसे हुई बातचीत में  मुख्यमंत्री  देवेंद्र फडणवीस से मिलवाने का वायदा भी किया था. लेकिन मुख्यमंत्री से मिलवाना तो दूर अब कलम ११ का आधार लेकर स्वयं गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनने की फील्डिंग लगा चुके है ऐसा स्पष्ट हो रहा है.
यदि कोई सिख गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनने के लिए सरकार के साथ सांठ - गांठ के चक्कर में है तो वो हजूर साहिब का गद्दार माना जाये. क्या पद खरीदना वफादार सिखों की परंपरा में शुमार है?  एस.जी.पी.सी. इस बात से इत्तेफाक रखती है कि कोई गुरु घर के सीटों की बोली लगाएं ? हजूर साहिब बोर्ड के लिए वर्तमान समय कठिन बना हुआ हैं. महाराष्ट्र सरकार ने  गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कानून में जबरन संशोधन कर बोर्ड पर अपना अधिकार कर लिया जो नांदेड़ के सिखों का अधिकार छीनने जैसा हैं. मुखयमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस जी को वर्ष २०१५ में किये गए कलम ११ का संशोधन रद्द करना चाहिए. वहीं कलम ६ और कलम १५ के प्रस्तावित संशोधन भी पीछे लेने चाहिए. 
मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे संशोधन रद्द करवाकर नांदेड़ के सिखों के हवाले बोर्ड कर दे. कुछ व्यापारियों ने बोर्ड और रैंन सभाई के नाम पर यहाँ एक कारोबार शुरू किया हैं. तखत के नाम पर कारोबार हरगिज बर्दाश्त नहीं होना चाहिए. यदि कुछ सदस्य चाहते हैं कि मुम्बइया लॉबी की सत्ता यहाँ बनी रहे तो उन्हें हजूरी प्रधान का तुन्तुना बजाने कोई जरुरत नहीं. दूसरी ओर यह जाहिर सी बात है कि हजूर साहिब के जागरूक लोग यदि सोते रह जायेंगे तो गुरुद्वारा बोर्ड के पदों का कारोबार कर, बाहर के लोग सत्ता में आ जायेंगे. चुनावों के बाद तो आपकी नींद खुलनी चाहिए ऐसी अपेक्षा की जा सकती हैं. 
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बुधवार, 2 जनवरी 2019

बुंगई, कुंजीवाले और महाजन मेंबर बनें !


रविंदर सिंघ बुंगई, मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले और गुरमीत सिंघ महाजन चुनाव में सफल 

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के नतीजे मिले-जुले
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क्या पाया हजुरसाहिब के सिखों ने चुनावों से? 
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रविंदर सिंघ मोदी 

तखत सचखंड श्री हजूर अपचलनगर साहिब बोर्ड के चुनावों के नतीजें ता. ३१ दिसंबर, २०१८ को साधसंगत के सामने प्रस्तुत हुए हैं. तीन सीटों के चुनाव के नतीजें मिलेजुले आये हैं. मतदाताओं ने अपने प्रतिनिधि के रूप में सरदार रविन्दरसिंघ बुंगई, मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले और गुरमीतसिंघ महाजन को चुना हैं. जनता जनार्दन हैं इसलिए नतीजों पर कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. 
मतदान से पूर्व ही रविन्दरसिंघ बुंगई ने प्रचारतंत्र प्रभावी रखते हुए मानों जीत दर्ज कर ली थी. सर्वाधिक वोट लेकर उन्होंने बड़ी जीत हासिल की. सरदार गुरमीत सिंघ महाजन ने लगातार दूसरीबार जीत दर्ज कर अपना सिक्का मनवाया. वहीँ नए चेहरे के रूप में सरदार मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले ने मतदाताओं का विश्वास जीत लिया. हमें युवा नेतृत्व मिला हैं. तीनों ऊर्जावान हैं और उनके पास संघटन शक्ति हैं. यदि योजना और दृढ़ निश्चय कर लिए जाये तो ये युवा नेता बहुत कुछ सकारात्मक कर सकते हैं. तीनों सदस्यों को नए पर्व के लिए हार्दिक शुभकामनाएं. 
विगत सव्वा महीने से तीन सदस्य चुनाव को लेकर चली राजनीतिक गहमागहमी अब समाप्त हो चली हैं. इस बार देखा गया कि बड़ी संख्या में युवा वर्ग ने चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया. रिश्तेदार, मित्र और परिचित सव्वा महीने तक व्यस्त दिखाई दिए. गुरुद्वारा बोर्ड के चुनावों ने इस बार विधानसभा के प्रचार को भी पीछे छोड़ दिया लगता. सम्पूर्ण नांदेड़ नगरी बैनर और पोस्टरों से पट गई थी. गुरुद्वारा के चारों ओर चुनाव प्रचार की धूम मची हुई थी. चुनाव प्रचार के लोभ से विधायक तारासिंह एंड कंपनी भी खुद को रोक नहीं पायी. मुंबई से मतदाताओं से संपर्क जारी था. दूसरी ओर इस चुनाव में साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल भरपूर दिखाई दिया. पानी की तरह पैसा बहाया गया. युवा वर्ग को चुनाव प्रचार का अच्छा तजुर्बा मिल गया कहा जाये तो गलत नहीं होगा. लेकिन चुनाव समाप्त होते ही कुछ लोग जरूर बेरोजगार हो गए हैं. 
चुनाव जीतकर सदस्य बने नए तीनों नवसदस्यों को फिर एक बार मुबारकबाद. तीनों सदस्यों पर हजूरी सिखों के नेतृत्व के एक जिम्मेदारी हैं. यदि सभी स्थानीय सदस्य एकजुट होकर रहते हैं तो निश्चित ही स्थानीय सिखों का और विशेषकर गुरुघर का भला कर सकते हैं. किसी भी सदस्य को यह समझाने की जरुरत नहीं कि उसकी जिम्मेदारी क्या हैं और गुरु महाराज से वफ़ादारी क्या हैं. साधसंगत की अपेक्षाएं बहुताधिक नहीं हैं. लेकिन फिर भी उन अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं हो पा रही हैं क्योंकि गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पराधीन हो चली हैं. जब तक इस संस्था के अध्यक्ष पद पर सरकारी नियुक्त प्रधान बैठा हैं तब तक कोई भी सदस्य छाती ठोंककर ये नहीं कह सकता कि यह संस्था उनकी हैं. जिसका मुख्य कारण है वर्ष २०१५ में हुए गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट संशोधन अनुसार कलम ग्यारह  (११) में हुआ बदलाव और सत्तांतर. बाद में स्थानिक सिखों के साथ किया गया सरकारी अध्यक्ष द्वारा की गई दो गुटों की राजनीती. हूकूमशाह की तरह गुरुद्वारा एक्ट में दुबारा कलम ६ में संशोधन की खुरापात. दूसरे हजूर साहिब की स्थानिक संस्था में बढ़ा सरकारी हस्तक्षेप. भविष्य में भी ये खुरापाती प्रवृत्ति के लोग तखत सचखंड श्री हजूर साहिब का नेतृत्व बाहरी शक्तियों को सौंप देंगे इसमें कोई दो राय नहीं हैं. ऐसे में १९५६ में हजूर साहिब के वफादार सिखों द्वारा पंजीकृत करवाई गई संस्था मुंबइयाँ नेता और व्यापारियों का सत्ता केंद्र बन गई हैं. अब नए सदस्यों की जिम्मेदारी बनती हैं की वे न बाहरी लोगों के चुंगल में फंसी हमारी संस्था को स्वतंत्र करें. साथ ही यहाँ की गरिमा कायम रखने के लिए बोर्ड की छवि भी स्वच्छ और सुन्दर बनायें. जैसे कि सभी ने कलम ग्यारह के खिलाफ लड़ने का आश्वासन अपने मेनिफेस्टो में दिया हैं. उस अनुसार उनके द्वारा कलम ग्यारह के संशोधन को पूर्ववत कर अपना प्रधान चुनने का विकल्प उपलब्ध करवाएं. 
मैं बहुत ही जिम्मेदारी के साथ और दुःखी मन से ये बात कह रहा हूँ कि किसी भी सन्माननीय मेंबर के नाम के साथ किसी का मोहरा या किसी का प्यादा या किसी का आदमी जैसे विशेषण योग्य प्रतीत नहीं होते. हर सदस्य की अपनी गरिमा हो तो हजूरी सिखों का मस्तक भी शान से ऊँचा उठ जाता है. यदि कोई पद और टेंडर की लाचारी में अपने माथे पर किसी का लेबल लगाकर स्वयं को गुरु घर का सेवक या प्रतिनिधि जताने की हिमाकत करता हैं तो निश्चित ही बीते चुनावों का कोई अर्थ नहीं रह जाता. आपको प्रतिनिधि या नेता चुनकर साधसंगत ने क्या पाया इस पर गहरा मंथन जरुरी हो जाता हैं. 
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  होली हल्ला महल्ला यात्रा मार्ग की दुरुस्ती करें : मनबीरसिंघ ग्रंथी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार समूह) के युथ प्रदेश सचिव स. मनबीर...