तारासिंह की प्रधानगी तखत साहब के लिए अभिशाप जैसी !
रविंदर सिंह मोदी
(फ़ाइल फोटो )
एक व्यक्ति सिर पर दस्तार बांधता है. अपने नाम में अमृतपान में मिली उपाधि "सिंह" अथवा "सिंघ" का उपयोग करता हैं. गुरुद्वारा में जाकर मत्था भी टेकता है. एक अमृतधारी सिख की तरह बाहर समाज में आचरण भी करता है. लेकिन उसके दिल में ना सिख गुरु और ना सिक्खी तत्वों के प्रति आस्था रहती है और ना ही वह गुरु घर को नुकसान पहुँचाने में कोई कसर छोड़ता है. ऐसे व्यक्ति को क्या किसी तखत जैसे गरिमामय स्थान का प्रधान होना चाहिए ?
जो व्यक्ति गुरु घर को बचाने के लिए (सरकार द्वारा किये गए संशोधन के प्रस्ताव का सूत्रधार बनता है और संगत की मांग के बावजूद भी सरकार के मुखिया मुख्यमंत्री के पास संशोधन रद्द करवाने के विषय में) आवाज नहीं उठता हो क्या ऐसे डरपोक और षडयंत्रकारी व्यक्ति को तखत जैसे स्थान पर प्रधान होना चाहिए ?
जिस व्यक्ति ने जमीनों के वितरण में पक्षपात किया हो, जिसने अपने रिश्तेदारों को वेतन देने के लिए गुरु घर की गोलक खर्च की, जिसने योग्यता प्राप्त और हक़दार कर्मचारियों ना प्रमोशन दिया न ग्रेड दिया हो, जिसने ३५० बेरोजगार युवकों को डेलीवेजस पर नियुक्ति नहीं देकर फिक्स पे अथवा एग्रीमेंट टाइप के अप्पॉइंमेंट देकर उनके भविष्य से खिलवाड़ शुरू की हैं क्या उसे प्रधान बना रहना चाहिए ?
जिस व्यक्ति ने नांदेड़ के स्थानीय गुरुद्वारा बोर्ड मेम्बरों को हमेशा गुटों में बांटने की नीति अपनाकर अपना सिक्का चलाया. तखत की मर्यादा के ख़िलाफ कुछ मेम्बरों को वर्ष २०१५ में तखत साहब पर मत्था टीकाकार गुरु महाराज की और श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी की शपथ "कसम" खाने के लिए मजबूर किया. क्या उसे प्रधान पद पर रहने का अधिकार है?
तारा सिंह जैसे व्यक्ति को तखत सचखंड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा नांदेड़ का प्रधान बनाकर भारतीय जनता पार्टी ने पता नहीं क्या साध लिया. लेकिन हजूर साहिब के लोगों ने इस थापे गए व्यक्ति की प्रधानगी से सिर्फ अभिशाप और अभिशाप ही पाया है ऐसा में दावे के साथ कह सकता हूँ. देवेंद्र फडणवीस जैसे युवा नेतृत्व से गहरी चूक हो गई या मान लो कि लापरवाही में या अतिविश्वास में एक "पाप" हो गया. श्री गुरु गोबिंद सिंघजी महाराज के इस पावन स्थल पर कभी हैदराबाद रियासत के राजा, औरंगजेब का लड़का बहादुरशाह या निज़ाम ने भी कोई वास्तु लेकर जाने की नियत नहीं रखीं वहां ये तारा सिंह गुरुघर का सरकारीकरण करने पर तुला हुआ है.
देश में बहुत से धार्मिक स्थलों का सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया गया हैं. महाराष्ट्र सरकार के निशाने पर नांदेड़ का गुरुद्वारा है. जब किसी ने भी जब मांग नहीं की तो संशोधन किसलिए ? तीन सालों बार संशोधन? कल कोई और सिरफिरा सरकार से सीधा नियुक्त होकर आएगा और किसी ऐतहासिक गुरुद्वारा को किसी संत कोई देने या बोली लगाकर आवंटित करने की कोशिश करेगा तो क्या तब भी सरकार उसका साथ देगी और लोग खामोश तमाशा देखेंगे ? जो इस परिस्थिति में पूरी तरह से तारासिंह की नीतियों को शरणागत हो गए है वे लोग क्या कदम उठाएंगे ? कुछ नवजवानों को एक्ट संशोधन का ठीक से समझ नहीं आ रहा हैं, वे उतना ही समझ रहे हैं जितना उनके करीबी नेतागण उन्हें समझा रहे हैं. जिन्हें एक्ट संशोधन के संघर्ष में नहीं पड़ना है उन्हें गुरुद्वारा बोर्ड के चुनावों में रस क्यों हैं ? क्या सरकारी नियुक्त प्रधान की गुलामी करने के लिए ? या महज अपने ही समाज के कुछ व्यक्ति से बदला निकालने के लिए? किसलिए यह सब किया जा रहा हैं ?
आज एक्ट संशोधन को लेकर सिख समाज के लोग बँट गए हैं. एक दूसरे को दुश्मन की निगाह से देख रहे हैं. एक दूसरे की आलोचना कर रहे हैं. यहाँ तारा सिंह के राज में मारपीट, हमले और पुलिस करवाई जैसी बातों से समाज में विचलन हो रहा है. यह सब क्या किसी अभिशाप कम है ? सरकार का भेजा राजनीतिक नेता यहाँ सत्ता भोग रहा है और यहाँ के वतनदार निवासी अभिशाप की छाया में रहें ? देवेंद्र फडणवीस जी नांदेड़ की वतनदार सिखों ऐसी मानसिकता के आपका निर्णय कारणीभूत ही नहीं बल्कि एक अभिशाप प्रतीत हो रहा है. कुछ कीजिये ! या फिर जलियावालां की तर्ज पर नांदेड़ के वतनदार सिखों पर सीधा ऑपरेशन कर दीजिये. आप और तारा सिंह शासक है. सरकार है, आपको सबकुछ माफ़ हो जायेगा.
