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गुरुवार, 20 मई 2021

 न्यू सॉउथ वेल्स के स्कूलों में "कृपाण" पाबंद !

रविंदरसिंह मोदी 


ऑस्ट्रेलिया के न्यू सॉउथ वेल्स स्टेट प्रशासन द्वारा वहाँ के सरकारी स्कूलों में सिख विद्यार्थियों के कृपाण धारण कर स्कूल आने पर पाबंदी के आदेश जारी किये गए. न्यू सॉउथ मिनिस्टर साराह मिशेल द्वारा ता. 18-05-2021 को आदेश जारी किया गया जिसकी अनुपालना ता. 19-05-2021 से अमल में लाई गई. ऑस्ट्रिलयन सरकार के निर्णय के बाद वहाँ के सिख समुदाय ने सरकार के प्रति नाराजी व्यक्त कर शासन आदेश पर पुनर्विचार करने की अपील की हैं. 


न्यू सॉउथ वेल्स प्रांत के सिडनी स्थित ग्लेनवुड स्कूल में ता. 06-05-2021 को एक घटना घटित हुई थी जिसमें एक 14 वर्षीय सिख विद्यार्थी का स्कूल की कक्षा में वहाँ के अन्य विद्यार्थियों से किसी विषय को लेकर झगड़ा हो गया. तीन से चार विद्यार्थियों द्वारा जब उस सिख विद्यार्थी के साथ मारपीट की गई तब उस सिख विद्यार्थी द्वारा कृपाण निकाल कर अपना बचाव किया गया. इस समय एक सोलह वर्षीय विद्यार्थी कृपाण से घायल हो गया.  

घटना के बाद पुलिस को मामला सौंपा गया. पश्च्यात में कुछ अभिभावकों द्वारा स्कूलों में कृपाण के उपयोग पर पाबंदी लगाने की मांग की. ऑस्ट्रेलिया सरकार ने घटना की समीक्षा के पश्च्यात ता. 19 मई से स्कूलों में कृपाण के उपयोग पर पाबंदी लागु कर दी. सिखों के एक प्रतिनिधि मंडल ने सरकारी निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील सरकार से की. साथ ही कृपाण को धार्मिक अनुपालना सिद्धांत का प्रमुख आधार बताकर खालसा पंथ के अमृतपान का ऐतहासिक प्रसंग और उससे जुड़े सभी धार्मिक तथ्यों को प्रस्तुत किया हैं. पर अभी तक ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा निर्णय को लेकर कोई भी नई टिप्पणी या पुनर्विचार की तैयारी दर्शाई नहीं गई. 

ऑस्ट्रेलिया सरकार के निर्णय का भारत में सिख संस्थाओं द्वारा विरोध प्रकट किया गया. इस घटना को लेकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने भी बयान जारी किया हैं कि सिखों की धार्मिक स्वतंत्रता पर यह अगाध है. ऑस्ट्रेलिया सरकार को यह निर्णय रद्द करना चाहिए. 

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बुधवार, 19 मई 2021

 श्री दशमेश हॉस्पीटल में कोरोना वैक्सीन उपलब्ध करवाई जाएं 

रविंदरसिंह मोदी 

नांदेड़ महाराष्ट्र 

यहाँ के तखत सचखंड श्री हज़ूर साहब बोर्ड द्वारा संचालित श्री दशमेश हॉस्पिटल अंतर्गत शुरू किया गया कोरोना कोविड 19 संक्रमण रोकथाम वैक्सीन केंद्र (टीका केंद्र) में विगत बीस दिनों से कोवैक्सीन टीकाकरण प्रक्रिया बंद हैं. वैक्सीन का कोटा उपलब्ध नहीं होने से प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो रहीं है. दूसरी ओर पहली डोज प्राप्त कर चूके नागरिक अब दूसरी डोज पाने के लिए संघर्ष कर रहें हैं. नागरिकों की सुविधा हेतु श्री दशमेश हॉस्पिटल में कोरोना टीकाकरण कार्य दुबारा से शुरू किये जाना चाहिए ऐसी मांग जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, महानगर पालिका, जिला अस्पताल प्रशासन और जिला स्वास्थ अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत है. 

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के श्री दशमेश हॉस्पिटल में ता. 03-04-2021 को कोरोना कोविड 19 टीकाकरण शुरू किया गया था. कोवैक्सीन का टीका यहाँ लगवाना शुरू किया गया था जिससे नागरिकों को बहुत सुविधा उपलब्ध हो गई थीं. हॉस्पिटल में तज्ञ डॉक्टर और स्टाफ होने के कारण और अन्य सभी उपचार सुविधाएं उपलब्ध होने की वजह से नागरिकों को बहुत आसानी हो रहीं थीं. लेकिन ता. 28-04-2021 से वैक्सीन सेवा बंद हो गई क्योंकि वैक्सीन कोटे की किल्लत प्रस्तुत हो गई. 

उल्लेखनीय है कि, ता. 29-04-2021 से वैक्सीन के डोज दशमेश हॉस्पीटल में उपलब्ध नहीं हो पाए हैं. लगातार बीस दिनों से यह किल्लत प्रस्तुत हो रहीं हैं. जिससे आम नागरिकों की परेशानी हो रहीं हैं. पहली डोज प्राप्त कर चूके लोगों को 30 से 42 दिनों के दौरान दूसरी डोज लेना अनिवार्य है. इसलिए नागरिकों में चिंता का वातावरण बना हुआ हैं. वैक्सीन टीकाकरण लगभग एक साल चलने वाला है. इसलिए श्री दशमेश हॉस्पीटल का केंद्र अबाधित रूप से शुरू रखा जाएं ऐसी मांग प्रस्तुत हो रहीं हैं. 


मंगलवार, 11 मई 2021

 सोचा आज 'मंटो' को याद कर लूँ..!

रविंदरसिंह मोदी

(सादत हुसैन "मंटो)

भारत में पैदा हुए लेकिन पाकिस्तान में अंतिम साँसे लेने वाले मशहूर लेखक, शायर, कहानीकार सादत हसन 'मंटो' ने भारत - पाकिस्तान बंटवारे को लेकर काफ़ी कुछ लिखा हैं. बंटवारे की त्रासदी पर बहुत चिंतन भी किया था लेकिन शायद नियति ने उन्हें ज्यादा मोहलत नहीं बख़्शी. मात्र 43 साल की उम्र में मंटो ने सन 1955 में दुनिया को अलविदा कह दिया. उनकी पैदाइश ता. 10 मई, सन 1912 की है. जलंधर पंजाब में उनका जन्म हुआ था. यदि मंटो उम्रदराज होते तो एक नए तरह का साहित्यसृजन निश्चित ही हमें पढ़ने को  मिलता. 

सादत हसन मंटो की उर्दू कहानी तोबा टेकसिंह को मैंने कोई बाईस - तेईस साल पहले पढ़ा होगा. यह कहानी दो बार पढ़ीं. क्योंकि सन 2012 में मंटो की जन्मशताब्दी मनाई गई थी उस वक्त, तब दोबारा से तोबा टेकसिंह कहानी पढ़ लीं. उस कहानी में बंटवारा होने के बाद की परिस्थितयों का मार्मिक चित्रण देखने को मिलता है. सिख किसान सरदार बिशनसिंह जमींदार के  सत्य चरित्र पर आधारित यह कहानी बहुत कुछ सीखा जाती है. 

(स्व. तोबा टेक सिंह उर्फ़ बिशन सिंह जमींदार : यह कहानी हर सिख को भी  पड़नी चाहिए.)

मंटो को करोड़ों लोगों ने पढ़ा होगा, उनको पसंद करने वाले भी करोड़ों में ही होंगे. लेकिन मैं मंटो को लेकर कुछ तय नहीं कर पाया. जो बेबाकी मै अपने भीतर या अन्य साहित्यिकों में तलाशता रहा वो मंटो में बहुत हदतक उपलब्ध भी है लेकिन पता नहीं क्यों मंटो ज़माने के प्रति किसी दुश्मनी पर उतारू तो नहीं थे ऐसे ख़्यालात उठने लगें तब मैंने अपने आपको 'मंटो' से दूर कर लिया. अभी तक दूर ही रहा. पर आज अचानक आज कुछ महसूस हुआ कि 'चीर निंद्रा' में सोये 'मंटो' को याद कर लूँ. 'मंटो' को याद करने के लिए साहित्य की प्रमाणिकता और बर्दाश्त करने की इंतेहा से गुजरना पड़ता हैं. भारत देश में सादत हसन मंटो के साहित्य को लेकर अक्सर मंथन होता आया हैं. इसलिए मंटो यहाँ जीवित रहें, वे मरे नहीं ! मंटो इसलिए भी ज़िन्दा रहें कि उनके साहित्य को लेकर बहुत से लोगों ने रोजगार ज़िन्दा रखा. बॉलीवुड की मूवी खलनायक का वो मशहूर गीत "चोली के पीछे क्या है... "  मंटो की उस बात पर आधारित भी है कि, मैं किसी को कपड़े नहीं पहना सकता, ये काम तो दर्जी का है! मुझे इन विषयों में कहीं रिश्ता नजर आया था. क्या गीतकार आनंद बख़्शी ने मंटो को पढ़ा होगा? 

'मंटो', दोनों सरकारों के रवैय्ये पर तंज करते थे इसलिए पाकिस्तान में वे पिछड़ गए, या उन्हें पिछड़ा रखा गया. यदि भारत में रहते तो इतिहास कुछ अलग होता. 'मंटो' को आज याद करने की वजह शायद ये भी है कि मंटो ऐसे शख्स भी है जिन्होंने देश बंटवारे के समय लाखों लोगों की लाशें उस सरजमीं पर बिखरी हुई देखीं थीं. वे उन घटनाओं के साक्षी है, गवाह भी थे. उन्होंने खुलकर उन घटनाओं का मातम भी मनाया था. लाखों लोगों की एक साथ मौत की त्रासदी को उन्होंने तमाशा कहा था. आज विश्व में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न है कि लोग जंग में तो नहीं पर वाइरस संक्रमण से मर रहें हैं. आज हम सभी गवाह हैं कि किस तरह लाखों लोग मर रहें हैं. आज के हालात में मौत कितना बड़ा तमाशा बन गईं हैं. मानवता के चेहरे पर यह किसी मानसिक विकृति का तमाशा नहीं तो क्या हैं. जिसने ऐसा वाइरस बनाया और लाखों लोगों को मौत का शिकार बनाया, जिसने करोड़ों लोगों की जानें संकट में डाली, क्या यह तमाशा नहीं हैं? आज करोड़ों लोगों की साँसों में उत्पन्न घुटन का गुनहगार कौन है, यह भी खुलकर नहीं कहा जाता ! फिर तो यह तय हुआ कि मंटो की ज़माने के प्रति नाराजी सही थीं. उनकी बेबाकी ने एक समय की सियासत को ललकारा था. आज का साहित्य जगत जाने क्यों खामोश हैं. किस तमाशे की इंतेहा की प्रतीक्षा हैं? 'मंटो' का 'ठंडा गोश्त' शायद कभी गर्म नहीं होगा. देश में छाई परिस्तिथियों में भारतीय साहित्य क्षेत्र अब भी धुर्वीकरण को ही मुख्य रखकर कलम चला रहा हैं. आज हम यह मार्मिक तंज कर सकते हैं कि जितनी कलम साहित्यिक वर्ग नहीं घिस पा रहा हैं, उससे ज्यादा तो अस्पताल और डॉक्टर अपनी कलम घीस रहें हैं. मैं दुआओं में गहरा विश्वास रखता हूँ लेकिन खेद के साथ कह रहा हूँ कि यह दुनिया अब 'दवा - दारू' पर निर्भर होती चलीं जा रहीं हैं. 'मंटो' याद आ गए उनका शुक्रिया ! जिन्हें दिल कभी भुला ही नहीं था उन्हें 'मंटो' के बहाने एक बार फिर याद करने का जैसे बहाना मिल गया. आज की परिस्थितियां एक मानसिक द्वन्द को आमंत्रण दें रहीं हैं. 'मंटो' जैसा इंकलाब चाहते हैं वैसा तो संभव नहीं पर एक राष्ट्रीय संघर्ष की आपात भावना की सुगबुगाहट देश में शुरू होगी यह उम्मीद ज़िन्दा कर रहा हूँ.  .

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(रविंदरसिंह मोदी)

सोमवार, 10 मई 2021

 कोरोना त्रासदी और सिख समाज ! 

रविंदरसिंघ मोदी 

(ऑक्सीजन लंगर)

पिछले कुछ वर्षों में सिख समाज के सामाजिक वर्तन का अवलोकन यदि करूं तो मैं इस निष्कर्ष पर आ पहुँचा हूँ कि मानव सेवा में सिख समुदाय एक वैश्विक सेवा संघठन के रूप में उभरा है. भारत ही नहीं यूरोप, अफ्रीका और अन्य खंडों तक सिख समुदाय का सेवा तत्व समर्पित हुआ है. यदि सिखों का कोई वैश्विक पंजीयन सेवा संघटन आकार प्राप्त करें तो मेरा दावा है कि वर्तमान में कार्यरत रेडक्रॉस सोसाइटी या अन्य किसी सहायता संघठन से बड़ा इसका स्वरुप उभर कर सामने आ सकता है. भारत में पिछले सवा साल की कोरोना कोविड - 19 संक्रमण त्रासदी में सिखों का सेवाभाव खुलकर सामने आया हैं. आज सही समय भी हैं कि उन सभी सिख संघटनों, संस्थाओं, समूह और गुरुधामों का हौसलाअफजाई किया जाएं जो स्वयं के जीवन की परवाह किये बगैर लोगों को मौत की मुँह से बचाने में लगें हुए हैं. देश की राजधानी दिल्ली और गाज़ियाबाद महानगर में ही करीब डेढ़ लाख लोगों का जीवन बचाने में सिख संस्था और सिख व्यक्तियों ने योगदान दिया हैं. चाहे वर्तमान में उभरे ऑक्सीजन संकट की बात की जाएं या गुरुद्वारों में शुरू मल्टीस्पेशलिस्ट सेवा केंद्रों की शुरुआत और उनके संचालन सेवा की बात की जाएं, सिखों ने सरकार की और भारतीय जनमानस की सेवा में समर्पण प्रस्तुत किया हैं. क्या विश्व स्वस्थ संघठन या मानव अधिकार संघठन, सिख समुदाय की इस निस्वार्थ सेवा का मूल्यांकन कर रहें हैं? क्या दुनिया के सभी बड़े संपन्न राष्ट्र और विशेषतौर पर भारतीय सरकार कहीं सिख समुदाय की सेवाओं का मूल्यांकन दर्ज कर रहीं हैं? 

(ऑक्सीजन ट्रीटमेंट सेंटर और कोविड उपचार केंद्र)

दूसरा पहलू यह कि क्या भारतीय जनमानस सिखों की इस सेवा को किस सन्दर्भ में देख देख रहा हैं. कोरोना संकट की घड़ी में सिख समुदाय का वास्तविक सेवा भाव पंथ के लिए एक नई छवि को शिल्पित कर रहा हैं. सिख पंथ की सबसे बड़ी छवि यानी देश के सीमाप्रहरी की थीं उससे एक कदम और आगे यह सेवाभाव विस्तारित हुआ है. सोलह - सतरह वर्ष आयु के सिख बच्चें, सिख नौजवान, प्रौढ़, सेवानिवृत्त सिख और सिख महिलाएं भी अपने प्राणों की परवाह किये बगैर आज सेवा का तत्व लेकर एक जानलेवा संक्रमण से जूझ रहें हैं. दिल्ली के हर गुरुद्वारा, हर नगर, हर गलीं तक सिखों की एम्बुलेंस, लंगर, दवाइयां और ऑक्सीजन पहूंच रहें हैं. लॉकडाउन में लोग जीवन की सलामती के लिए खुद को घरों में कैद किये हुए हैं, वहाँ सिख मौत से आँखें मिलाकर संघर्ष कर रहें हैं. यहीं चित्र देश के बहुत से प्रदेशों का है जहाँ सिख संस्थाएं, संघठन, समूह मानवता की सेवा में प्रस्थ हैं. इस दृष्टि से सिखों के इस सेवा बल का सामाजिक योगदान राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर दर्ज करवाना समय की सबसे बड़ी मांग हैं. 

दसवंध का सही उपयोग : 

(निशुल्क एम्बुलेंस और बस सेवा)

सिख धर्म की स्थापना के तत्वों में सबसे दार्शनिक पहलु सेवा के रूप में ही प्रस्थ किया गया. सद्गुरु श्री नानकदेव जी द्वारा "नाम जपो, किरत करो और वंड छको " यह मूल नित्यकर्म सिखों की झोली में डाले गए हैं. प्रभु परमात्मा का नाम जपना यानी भक्ति से जुड़े रहना. किरत (कीर्त) कमाई करना यानी मेहनत और परिश्रम से कमाया धन और उससे जीविका निर्वहन करना. तीसरा वंड छकना ! बांटकर खाना. चाहे वो लंगर के माध्यम से हो अथवा दुविधा और संकट में घीरें लोगों तक सहायता पहुँचाना. सिख को सहायता देकर सेवा योग्य बनाना आदि. सिख धर्म की स्थापना से लेकर आज तक की पंथ (धर्म) की यात्रा में यह पहला अवसर हैं जब सिखों के दसवंध का उपयोग पूर्ण क्षमता के साथ हो रहा हैं. लगभग सवा साल तक अविरत सेवा करने यदि सिख संस्थाएं सफल हुईं हैं तो निश्चित ही सिखों का दसवंध चढ़ाने और खर्च करने की आस्था आज के परिवेश में सभी तरह के सामाजिक सेवा सिद्धातों से ऊपर हैं. 

(लंगर सेवा अविरत जारी हैं)

बीते सवा साल में देशांतर्गत कोरोना काल में गुरुद्वारा, सिख संस्था, समूहों द्वारा चार सौ करोड़ से अधिक राशि की लंगर सेवा समर्पित की गई हैं. वर्तमान में भी वैद्यकीय सेवा क्षेत्र में लगभग डेढ़ सौ करोड़ के संसाधन सिखों ने खड़े किये हैं. सिखों के इस सेवाभाव का मूल्यांकन विश्व के अर्थशास्त्री अब किस सिद्धांत में सन्दर्भित करेंगे यह एक नई चुनौती मात्र हैं. सामाजिक शास्त्रों के पुनर्लेखन की आवश्यकता पर मैं भाष्य कर रहा हूँ जो विश्व के समक्ष नए सिद्धांत रचनाओं का नया सूत्रपात हैं. सिख पंथ, मेरा आशय समझ लें कि वर्तमान में सिखों के योगदान और सेवा को शीर्ष पर पहुंचाने का यह उपलब्ध अवसर कहीं खो ना जाएं. सिख पंथ ने सद्गुरु श्री गुरु नानक के वंड छको तत्व को आज सही मायने में सार्थक किया हैं. 

(प्रतिदिन लंगर सेवा)

सिख पंथ हर रोज अरदास करते समय सरबत का भला का प्रामाणिक भाव प्रस्तुत करता हैं. हे परमात्मा ! श्री अकाल पुरख के सामने हर सिख रोज प्रार्थना करें कि, कोरोना संक्रमण की त्रासदी समाप्त हो जाएं. जब तक यह संकट खड़ा है तब तक इससे लड़ने की जिम्मेदारी सभी की हैं. हर सिख अपनी यथा क्षमता से अपना योगदान प्रस्तुत करें ऐसी उम्मीद बनीं रहेगी. सरकार भी सिखों को फ्रंट वॉरियर के रूप मान्यता प्रदान करें ऐसी मांग आज प्रस्तुत कर रहा हूँ. योग्य लगें तो आगे शेयर कीजिए. 

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रविवार, 9 मई 2021

 गुरुधामों से फिरौती ! 

(गुरुद्वारा बाल लीला साहिब मैनी संगत, पटना, बिहार)

रविंदरसिंघ मोदी

सिख जगत के लिए गहन चिंता का विषय प्रस्तुत हुआ है. किसी अज्ञात शक्ति द्वारा बिहार की राजधानी पटना शहर स्थित गुरुद्वारा बाल लीला साहब (मैनी संगत) को उध्वस्त कर देने की धमकी देते हुए 50 करोड़ रुपयों की राशि बतौर फिरौती मांगी गई है. स्वतंत्र भारत मे यह पहला मामला होगा जब एक गुरुद्वारा (गुरुधाम) से फिरौती की मांग की गई है. यह विषय राजनीतिक साजिश भी हो सकता है और अपराध नियत भी. बिहार में रंगदारी और फिरौती मांगने का प्रचलन नया नहीं है. आपराधिक तत्व ऐसे हथकंडे अपनाते रहते हैं. लेकिन सेवाभावी, बहादुर सिख कौम के ऐतिहासिक गुरुद्वारा को इस तरह से पत्र भेजकर 50 करोड़ की रंगदारी का प्रयत्न करना या तो किसी बड़े आपराधिक संघठन का काम हैं अथवा पटना साहिब गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की कोई अंतर्गत साजिश हो सकती हैं. क्योंकि पत्र में उल्लेख किया गया हैं कि यदि फिरौती अदा नहीं हुई तो गुरुद्वारा बाललीला साहिब पर आक्रमण किया जायेगा अथवा प्रबंधक कमिटी के पदाधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया जायेगा. पत्र में जो संपर्क नंबर दिया गया था वो किसी सरकारी कर्मचारी का है जिसे यह मामला ज्ञात ही नहीं है. बिहार सरकार, विशेष कर मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के लिए भी यह विषय चुनौतिपूर्ण है. पुलिस मामले की जाँच कर रही हैं. रंगदारी का यह विषय गंभीरता से लिया जाना चाहिए. 

आश्चर्य की बात तो यह है कि सिखों की सर्वोच्च नेतृत्व संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी उपर्युक्त विषय में मौन धारण किये हुए है. गुरुद्वारा बाल लीला साहिब यह ऐतिहासिक गुरुद्वारा है जो दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज के बाल लीला का ऐतिहासिक प्रमाण है. राजा फतेहचंद मैनी और उनकी धर्मपत्नी विशंभरी देवी मैनी रानी को गुरु गोबिंदसिंघजी ने यहीं वर दिया था और उनकी गोद में खेलकर उनके हाथों छोले - पुरी खाई थीं. कहा जाता है कि इसी स्थान से कुछ दूरी पर गंगा तट पर पंडित शिवदत्त को बाल गोबिंदराय में श्रीकृष्ण के दर्शन हुए थे. इस दृष्टि से यह स्थान बहुत महत्वपूर्ण है. सिख इतिहास की यह एक धरोहर भी है. श्री गुरु गोबिंदसिंघजी का जन्म सन 1666 में पटना में हुआ था. सन 1666 से सन 1671 तक गुरु जी, माता गुजरी जी का यहाँ निवास रहा था. गुरु तेगबहादुर साहब भी इस स्थान से जुड़े थे और बहुत बार उन्होंने यहाँ निवास किया था. इस स्थान पर वर्ष 2019 में संत बाबा कश्मीरसिंघजी भूरीवाले द्वारा कारसेवा के माध्यम से एक भव्य गुरुद्वारा ईमारत का निर्माण करवाया गया. मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार द्वारा गुरुद्वारा की नई ईमारत का उद्धघाटन करवाया गया था. 

उपर्युक्त घटना से सिख कौम में चिंता और चिंतन का वातावरण है. क्योंकि ऐसी घटना के जरिये सिख कौम को उकसाकर रास्ते पर लाने का एक प्रयास है. अभी हाल में बिहार से करीब पश्चिम बंगाल और असम में चुनाव हुए है. इन चुनावों में धर्म और क्षेत्रीयता को लेकर लोगों में दरार पड़ गई है. ऐसे समय में सिखों को उकसाकर किसी नई घटना को को अंजाम देने का प्रयास कुछ अज्ञात शक्तियों का रहा होगा. सिख कौम इन षड़यंत्र को समझकर आगे का कदम उठाएंगे ऐसी आशा की जा सकती है. 

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