गुरुद्वारा कानून संशोधन रद्द करो आंदोलन को मिल रहा हैं समर्थन
सर्वपक्षीय समर्थन की जरुरत
नांदेड़ के नेतागण हैं खामोश !!
रविंदर सिंघ मोदी
श्री हजूरसाहिब की पवित्र भूमि में गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड कानून १९५६ (दी सिख गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजूर अपचल नगर साहिब) की धारा ११ में हुए सरकारी संशोधन के खिलाफ शुरू आंदोलन महाराष्ट्र सरकार के लिए गले में फंसी हड्डी की तरह हो गया है. महाराष्ट्र सरकार पर दिन पर दिन सर्वपक्षीय दबाव तो बन ही रहा हैं साथ भारतीय जनता पार्टी अंतर्गत भी शीर्ष नेताओं द्वारा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से उक्त मामले में सवाल पूछे जा रहे हैं.
दिल्ली और पंजाब से लगातार गुरुद्वारा बोर्ड कानून में हुए संशोधन रद्द करने के लिए मांग उठ रही हैं. इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया और प्रिंट मीडिया में नांदेड़ गुरुद्वारा बोर्ड का विषय खासा चर्चा में प्रस्तुत हुआ हैं. जिससे महाराष्ट्र सरकार को अपनी गलती पर पछतावा भी हो रहा है. वहीं सिखों को नीतिगत रूप से पीछे धकेलने का मनसूबा पाले हुए कुछ जातिवादी षडयंत्रकारी संगठन गुरुद्वारा बोर्ड कानून की धारा ११ में हुए संशोधन को योग्य बताकर अल्पसंख्यंक सिखों की संस्था में अपने मनसूबे पूर्ण करने की राजनीति कर रहे हैं.
संस्था नांदेड़ की होने के कारण यहाँ पहला अधिकार नांदेड़ के सिखों को मिलना चाहिए ये मेरा मत है. संस्था पर सरकारी नियंत्रण नहीं होना चाहिए. यही मत हजारों की संख्या में हजूरसाहिब के सिखों द्वारा व्यक्त किया जा रहा हैं. अपने हक़ और अधिकारों के लिए हजूर साहिब सिख संघर्ष के मैदान में सक्रीय है, ऐसे में किसी बाहर के संघटन को तखत सचखंड श्री हजूर साहिब के विषय में बयानबाजी में नहीं पड़ना चाहिए.
आंदोलन अब चरम पर हैं. महाराष्ट्र सरकार ने भी संज्ञान लिया है. जिसे देखकर लग रहा हैं कि निकट समय में कलम ११ का संशोधन रद्द हो जायेगा. साथ ही नया बोर्ड भी घोषित कर दिया जायेगा.
इस आंदोलन को अभी तक महाराष्ट्र के किसी भी राजनीतिक पार्टी या संघटन ने अपना समर्थन घोषित नहीं किया हैं. देशभर में जहां आंदोलन को लेकर सिख संस्थाएं अपना समर्थन दे रही हैं वही महाराष्ट्र के विशेष कर नांदेड़ के राजनितिक संघटनों की चुप्पी दुखद हैं. यहाँ के राजनितिक संघटन और पार्टियां केवल गुरुतागद्दी विकास का मुद्दा अपने मैनुफेस्टो में शामिल कर विकास का प्रचार करने के लिए है ऐसा लग रहा हैं. नांदेड़ जिले के सांसद, विधायक और राजनीतिक दलों के पदाधिकारी केवल सिखों का तमाशा देख रहे हैं. ऐसा प्रतीत हो रहा हैं की गुरुद्वारा बोर्ड संस्था सरकार के अधीन रहे ऐसी इच्छा सभी राजनीतिक पार्टियों की हैं. गुरुद्वारा बोर्ड की जमीनों पर बूरी नजर रखनेवाले कुछ तथ्य भला कैसे सिखों की संस्था को स्वतंत्र करने का विचार रख सकते हैं ? जब तक नांदेड़ के सभी नेता इस आंदोलन को अपना समर्थन घोषित नहीं करते तब तक आंदोलन को बल नहीं मिल सकता. इस बात की गंभीरता के मद्दे नजर विविध राजनितिक पार्टियों में कार्यरत सभी सिख पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी अपनी पार्टियों पर दबाव डालने का प्रयास करें. यदि नहीं मानते हैं तो ऐसी राजनीतिक पार्टियों के लिए वे प्रचार में भी शामिल ना हो ऐसी प्रार्थना हैं.

