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बुधवार, 20 मार्च 2019

मनहास का हजुरसाहिब में पहला कदम ही राजनीतिपूर्ण 
मनहास और उनके समर्थकों से हैं आंदोलनकारियों की जान को खतरा !
रविंदर सिंघ मोदी 


तखत साहब के आदरणीय पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता का उल्लंघन कर भूपिंदर सिंघ मिनिहास ने महाराष्ट्र सरकार से गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड का प्रधान पद मांगकर ले लिया. ता. २१ जनवरी, २०१९ को आदरणीय पंजप्यारे साहिबान ने गुरुद्वारा बोर्ड कानून की धारा ग्यारह का संशोधन रद्द करने का गुरुमत्ता पास किया था. साथ ही कलम ग्यारह से कोई गुरु सिख प्रधान पद प्राप्त न करे यह भी कहा गया था. पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता को हजूर साहिब के अधिकत्तर उत्साही सिखों ने श्रद्धा सहित मान लिया. कुछ समीकरण वाले और लालची लोग समीकरण में व्यस्त हो गए. जिनमें भूपिंदर सिंघ मिनिहास सबसे अग्रणी रहे. क्योंकि वें शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के गुप्त एजंडा पर चल रहे थे. हरसिमरत कौर बादल, सुखबीर सिंघ बादल और प्रकाश सिंघ बादल ने कलम ग्यारह के विषय को और पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता का राजनीतिक उपयोग कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर दबाव डालकर कलम ग्यारह के तहत भूपिंदर सिंह मिनिहास को गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनाने के समीकरण सामने किया. विधायक सिरसा (दिल्ली) की भूमिका भी संदिग्ध रही. देवेंद्र फडणवीस ने हजूर साहिब सिखों की जनभावना को दरकिनार कर, जनांदोलन की घोर उपेक्षा कर कलम ग्यारह को नहीं हटाया बल्कि उसके जरिये ही जबरन भूपिंदर सिंघ मिनिहास को प्रधान बनाया. महाराष्ट्र सरकार ने एक तरह से नौ सदस्यों का बोर्ड घोषित कर असंवैधानिक रूप से बोर्ड घोषित किया. क्योंकि बोर्ड कानून की अनुपालना के तहत महाराष्ट्र सरकार ने सरकार मनोनीत दो सदस्यों की संख्या होते हुए भी उसमें से एक पद पर मिनिहास की नियुक्ति कर डाली. अन्य एक पद क्यों घोषित नहीं किया गया ? हैदराबाद प्रतिनिधि का नाम उपलब्ध होते हुए भी उस नाम को बोर्ड में स्थान नहीं दिया गया. मुख्यमंत्री ने वैसा बोर्ड घोषित किया जैसा कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को चाहिए था. यह एक तरह से नांदेड़ के भूमिपुत्रों के साथ अन्याय नहीं तो क्या ? मुख्यमंत्री ने दस बार आश्वसन दिया लेकिन कलम ग्यारह रद्द नहीं की. खैर, भूपिंदर सिंघ मिनिहास गुरुमत्ता का उल्लंघन कर प्रधान बन गए. इसका अर्थ ये होता हैं की वे तनखैया सजा के भी पत्र हो गए. लेकिन बोर्ड के कुछ सदस्यों को ढाल बनाकर मिनिहास हजूर साहिब भी पहुंच गए. ता. १८ मार्च २०१९ को उनका हजूर साहिब आगमन हुआ. उससे पहले नांदेड़ की पुलिस ने कलम ग्यारह से जुड़े तेरह लोगों को ये कहकर पाबंद करने की कार्यवाई शुरू की कि , उनसे मिनिहास को खतरा हैं. ये शिकायत गुरुद्वारा बोर्ड कार्यालय द्वारा की गई. भूपिंदर सिंघ मिनिहास ने चार्ज भी नहीं संभाला कि राजनीती शुरू कर दी. गुरुद्वारा कार्यालय के उस दिन के प्रभारी अधीक्षक रणजीत सिंघ चिरागिया और प्रशासकीय अधिकारी डी. पी. सिंघ ने शिकायत कर समाज के तरह लोगों को जैसे अपराधी के कटघरे में खड़ा कर दिया. जिसका उद्देश्य क्या था और क्यों ये अधिकारी इतने राजनीतिक रूप से समाज के खिलाफ भूमिका में उतर आये, उनका क्या हित था इस विषय का चिंतन होना चाहिए. मिनिहास का कहना था की उन्होंने कोई शिकायत नहीं की थी और ना गुरुद्वारा कार्यालय को निर्देश कदिया था. फिर इस घटना के पीछे कौन है ? अधीक्षक गुरविंदर सिंघ वाधवा उस दिन छुट्टी पर थे या जानबूझकर साइड में रहकर ये करवा रहे थे ये भी सोचना होगा. एक तनखैया पत्र व्यक्ति के लिए इतना सब ? उससे बड़ी बात ये कि कलम ग्यारह रद्द करने के लिए पंजप्यारे साहिबान ने जीन सात सदस्यों की समिति का गठन किया उसमें भी मिनिहास सदस्य हैं. हजुरसाहिब आने के बाद मिनिहास द्वारा कलम ग्यारह रद्द करने के लिए मीटिंग लेना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने गुरुमत्ता की उल्लंघना विषय में भी पंजप्यारे साहिबान से माफ़ी नहीं मांगी. ना हजूर साहिब के लोगों से माफ़ी मांगी. मिनिहास का होली मनाने आने की बात कहकर सभी यात्री निवासों की इमारतों का निरिक्षण करना, गुरु नानक मार्केट की ईमारत का निरिक्षण करना और कुछ मार्किट गिराकर नए बनाने जैसे बातें करना ये सब को संकेत करता है कि मिनिहास ने हजुरसाहिब के कुछ लोगों को मैनेजिंग कमिटी का मेंबर बनाने का लालच देकर कलम ग्यारह के आंदोलन को कुचलने की  पूरी योजना बनाई थी और उसके ऊपर ही वे अमल कर रहे हैं. अब नांदेड़ के जिन सिखों के खिलाफ पुलिस में करवाई की शिकायत की गई उसका अर्थ कुछ लोगों को डराना और आंदोलन से जुड़े अच्छे चरित्र के लोगों की छवि ख़राब करना था. जिस तरह की राजनीति भूपिंदर सिंघ मिनिहास और  उनके समर्थकों ने शुरू की हैं वो हजूर साहिब के लोगों के लिए घातक हैं. प्रत्यक्ष में कलम  ग्यारह के आंदोलन में सक्रीय कार्यकर्तों के लिए तो बहुत घातक हैं. एक तरह से आंदोलनकारियों पर अत्याचार और दादागिरी हैं. मुख्यमंत्री की निकटता का लाभ उठाकर मिनिहास ये सब कर रहे हैं. उनके पास आंदोलनकारियों से निपटने के लिए करोड़ों और अरबों रूपये हैं. बड़े - बड़े लोग उनके इर्द गिर्द हैं. जिन लोगों के सहारे नांदेड़ में भूपिंदर सिंह मिनिहास ने  अपने पहले कदम पर ही दादागिरी की राजनीति  की शुरुवात की हैं वो कलम ग्यारह के आंदोलन से जुड़े सक्रीय कार्यकर्तों के लिए जान से खतरे के संकेत हैं. मेरे जैसे सक्रिय और बुद्धिजीवि तो इनके लिए राह का सबसे बड़ा कांटा माना जा रहा हैं. निश्चित ही भूपिंदर सिंघ मिनिहास हजूर साहिब बोर्ड की सत्ता  पाने के लिए हम जैसे कार्यकर्ताओं का घात करवा सकते हैं. गुरुद्वारा बोर्ड के संगत  में  से निर्वाचित दो सदस्यों को भी भविष्य में खतरें पेश आ सकते हैं. क्योंकि नांदेड़ के इस बोर्ड की बैठकें मुंबई में रखी जाती हैं. कुलमिलाकर हजूर साहिब के इस गरिमामय बोर्ड पर बाहर के लोगोंने साम दाम और दंड भेद से कब्ज़ा कर लिया हैं. महाराष्ट्र सरकार ने हजुरसाहिब के लोगों को न्याय देना चाहिए. वहीँ नांदेड़ और मुंबई के पुलिस विभाग द्वारा भी नांदेड़ के सिखों को न्याय देकर उनकी रक्षा करनी चाहिए ऐसी मांग हजूर साहिब से उठ रही हैं. 
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मंगलवार, 12 मार्च 2019

मोदी - राज में महाराष्ट्र सरकार कर रहीं हैं सिखों पर अत्याचार 
नांदेड़ गुरुद्वारा पर फिर लादा गया सरकारी अध्यक्ष
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प्रधानमंत्री मोदी भी प्रश्न करे कि सिखों की संस्था का लोकतंत्र क्यों छिन लिया गया 
रविंदर सिंघ मोदी 

देश में सभी तरफ मोदी के कार्यों की प्रशंसा करने के लिए लोग प्रतियोगिता कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर मोदी के प्रसंशक उनकी तारीफ का कोई मौका नहीं चूकते. लेकिन दूसरी ओर मोदी सरकार के राज में महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार का सिखों पर अत्याचार जारी हैं. ता. ९ मार्च, २०१९ के दिन महाराष्ट्र सरकार ने नांदेड़ के गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड संस्था पर दुबारा से सरकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया. जबकि विगत चार सालों से नांदेड़ के सिख बराबर से गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पर सरकार द्वारा किये जा रहे अध्यक्ष नियुक्ति का विरोध उठाकर रखा हुआ हैं. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्वयं आठ से दस बार सिख समाज को आश्वासन दिया था कि गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड संस्था कानून १९५६ की धारा ग्यारह में किया गया संशोधन रद्द कर दिया जायेगा. लेकिन मुख्यमंत्री ने सभी आश्वासनों से मुकरते हुए अपने करीबी,  व्यवसायी भूपिंदर सिंघ मिन्हास को गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान नियुक्त कर दिया. 
फाइल फोटो 
मुख्यमंत्री ने इस समय अल्पसंख्यक सिखों पर रौब कसने और "हम करें सो कायदा" का उदाहरण प्रस्तुत किया जो लोकतंत्र की प्रतिमा मलिन करता हैं. साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में ये स्पष्ट संकेत भी देता हैं कि नांदेड़ के सिखों पर सरकार इतने सालों से कैसे अत्याचार कर रही हैं. देवेंद्र फडणवीस ने एकतरफा निर्णय लेते हुए साबित कर दिया की वे जनमानस का नहीं सुनते बल्कि बिज़नेस मन ही उन्हें प्रिय हैं. 
देवेंद्र फडणवीस द्वारा कलम ग्यारह का दुबारा से प्रयोग नांदेड़ के सिखों के गले नहीं उतर रहा हैं. देश में प्रजातंत्र रहते हुए भी देवेंद्र फडणवीस ने क्यों नांदेड़ स्थित सिखों के पवित्र पावन तखत साहब श्री गुरुद्वारा तखत सचखंड हजूर साहिब संस्था को सरकार के नियंत्रण में कर लिया. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने ता. १८ फरवरी, २०१५ के दिन गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड कानून १९५६ की धारा ग्यारह में बदलाव करते हुए संस्था पर अध्यक्ष नियुक्त करने का निर्णय अपने अधीन कर लिया. जबकि १९५६ से बोर्ड के सत्रह सदस्य मिलकर अपना प्रधान चुनते थे. इस बात की गंभीरता देखते हुए जनमानस (साधसंगत) की मांग पर तखत साहब के आदरणीय पंजप्यारे साहिबान ने संस्था को सरकारी अधिपत्य निकालकर लोकतंत्र बहाल करने के लिए धार्मिक गुरुमत्ता भी पारित किया. उस गुरुमत्ता के तहत संतबाबा बलविंदर सिंघजी कारसेवा वाले और संत बाबा प्रेमसिंघजी माता साहेब वाले इस आंदोलन के नेतृत्व कर रहे हैं. लेकिन इतने आंदोलन होने के बावजूद भी सरकार ने सिखों की नहीं सुनी. 
उल्लेखीनय हैं कि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वयोवृद्ध विधायक तारासिंह को संस्था का प्रधान बनाने के लिए जबरन ये कानून पास करवाया था. यह कानून पारित होने के बाद से जनमानस द्वारा लगातार सरकारी निर्णय और कानून संशोधन का विरोध किया जाता रहा. लेकिन राजनीतिक क्षमता का उपयोग कर मुख्यमंत्री और भाजपा द्वारा हमेशा सिखों की मांगों को दरकिनार कर दिया गया. अब जबकि कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने का समय था तो मुख्यमंत्री ने आश्वासन देकर भी फिर से अपने निकटवर्तीय को प्रधान बनाया और नांदेड़ ही नहीं मराठवाड़ा के सक\सिखों पर अत्याचार कर दिया. आखिर मुख्यमंत्री यह संस्था अपने अधीन क्यों रखना चाहते हैं? नांदेड़ के सिख तो पूछ ही रहे हैं. लोकप्रिय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी श्री देवेंद्र फडणवीस से पूछे कि सिखों के प्रति लोकतंत्र क्यों समाप्त कर दिया गया हैं. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने क्यों ये संस्था अपने कब्जे कर रखी हैं? अल्पसंख्यंकों के साथ सौतेला व्यव्हार क्यों हो रहा हैं? सरकार होने का अर्थ क्या किसी एक जातिसमूह पर दादागिरी होता है? महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने गुरुघर के साथ और नांदेड़ के सिखों के साथ आक्रांताओं जैसा व्यवहार शुरू किया हुआ हैं. मोदी जी क्या आप कुछ नहीं कर सकतें?   

गुरुवार, 7 मार्च 2019

आखरी मीटिंग, आखरी दाँव ?
कलम ग्यारह पर तारासिंह की नकारात्मक भूमिका 
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रविन्दरसिंघ मोदी 

फरवरी के अंतिम सप्ताह में महाराष्ट्र विधानसभा का अधिवेशन दो दिनों में लपेट दिया गया. हम सोंच रहे थे कि अधिवेशन में गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड कानून में संशोधित और बहुचर्चित कलम ग्यारह (११) का विषय चर्चा पटल पर रखकर हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जायेगा. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. अधिवेशन और चलता और राजस्व विभाग के विषयों में ये विषय रखकर या प्रश्न पूछकर उसपर चर्चा कर संशोधन रद्द करने का निर्णय लिया जाता. 
दूसरा कारण ये भी कहा जा सकता है कि, गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान और आदरणीय विधायक तारा सिंह द्वारा कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाने के लिए कोई पहल नहीं की गई. उन्होंने कलम ग्यारह हटाने के लिए महाराष्ट्र सरकार को कोई लिखित प्रस्ताव भी नहीं दिया. उन्हें एक सिख विधायक कहा जाता है, लेकिन सभागृह के एकमात्र सिख विधायक ने कोई स्पष्ट भूमिका नहीं अपनाई, बल्कि कलम ग्यारह के विषय से बचने के लिए उन्होंने शायद लीलावती अस्पताल का उपयोग कर लिया. लीलावती अस्पताल वैसे तारा सिंह का आरामगाह कहा जाना चाहिए. जब भी तबियत ख़राब होती है या कोई टेंशन होता है तो वे लीलावती की शरण में चले जाते हैं.  
अबकी बार तारासिंह जी लम्बे समय के लिए उपचार करवाने के लिए अस्पताल में दाखिल हुए. उन्होंने उपचार लेते-लेते ही ता. १७ मार्च, २०१९ को आयोजित होनेवाली गुरुद्वारा बोर्ड मीटिंग का एजेंडा भी तय किया. वही लेटे - लेटे कर्मचारियों के निलंबन की झड़ी भी लगा दी. यहीं से जैसे उन्होंने आखरी मीटिंग का आखरी दॉँव भी खेल लिया ऐसा हम नहीं कहते बल्कि यह गुरुद्वारा बोर्ड के राजीनीतिक गलियारे में चल रही घमासान चर्चा में सबसे चर्चित मुद्दा है. कुछ मेंबर तो कानाफूसी कर रहे हैं कि तारासिंह जी कलम ग्यारह के मुद्दे का सामना नहीं करना चाह रहे थे. उन्हें कलम ग्यारह के विषय में चर्चा के दौरान स्पष्टीकरण भी देना पड़ सकता था. अधिवेशन के बहार मंत्रिमंडल की बैठक में भी कलम ग्यारह का विषय समाप्त हो सकता था. है ये बात तारासिंह जी को समझ आणि चाहिए. 
आदरणीय पंजप्यारे साहिबान ने कलम ग्यारह के विषय में सकारात्मक आदेश देने के बाद और कलम ग्यारह रद्द करवाने के आंदोलन के सूत्र संतबाबा बलविंदरसिंघजी कारसेवा वाले और संतबाबा प्रेमसिंघजी द्वारा सँभालने के बाद तो तारासिंह जी को कलम ग्यारह के लिए पहल करना चाहिए था. बल्कि तखत साहिब का हुकुम मानकर एक सिख होने के नाते कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाने के लिए लिखित प्रस्ताव पेश करना चाहिए था. लेकिन उन्होंने सरल मार्ग तय कर लिया और बजट मीटिंग का आखरी दाँव खेलने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी. बजट मीटिंग के एजेंडे में उन्होने ता. २८-०७-२०१८ की उस बैठक की प्रौढ़ता को मान्यता देने का विषय भी राजनीतिक रूप से पेश किया गया हैं. जिस बैठक का स्थानीय आठ सदस्यों ने एकजुट होकर विरोध किया था. देखना हैं कि जिस मीटिंग का विरोध किया गया था उसकी फुटकल मांगों को कौन सदस्य प्रौढ़ता देता हैं. उस बैठक का विरोध कलम ग्यारह के लिए किया गया था. स्थानीय मेंबर साहिब इस विषय में नैतिकता अपनाएंगे या तारासिंह के प्रभाव में पास पास पास कहेंगे ये देखना होगा.  
ये भी इक कड़वी सच्चाई हैं कि तारासिंह ने अपने चार वर्षों के लम्बे कार्यकाल में कई भूमिपूजन तो कर लिए लेकिन कोई मार्किट खड़ा नहीं किया. इतना बड़ा बजट ब्लॉक कर रखा. इस कार्यकाल में पास होने के बाद चार मार्किट तो खड़े हो जाने चाहिए थे. अंत अंत में संतबाबा जोगिन्दर सिंघजी मोनी सीवन क्लास की बिल्डिंग काम ज्यादा दर पर स्वीकार की गई. काम देने के लिए भी तारा सिंह जी का एकाधिकार चर्चा का विषय रहा था. खैर....... अब फिर से नए मार्किट का विषय बैठक में रखा गया हैं! उम्मीद हैं, ता. १७ मार्च की बैठक में मुंबई के सिविल कांट्रेक्टर बड़ी संख्या में मीटिंग स्थल पर मुंबई में उपस्थित रहेंगे. 
कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाकर बोर्ड पर अधिपत्य भोगनेवाले तारासिंह का कार्यकाल दक्खन के सिखों के लिए खासा नकारात्मक साबित किया जा सकता हैं. और हैं भी. बोर्ड का प्रधान बनने के लिए इस विधायक ने सभी को गुमराह करके रख दिया. सुना हैं कि कलम ग्यारह के संशोधन रद्द करने के लिए महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग को बड़ी कसरत करनी पड़ रही हैं. तारासिंह द्वारा करवाया गया संशोधन संवैधानिक रूप से बड़ी गलती है ये अब बात सामने आ रही हैं. इसे गलती कहा जाए फिर स्वार्थ की खुरापात. अब अपनी अंतिम मीटिंग में तारासिंह को क्या पास करवाना हैं? 
बहुत बार ऐसा हुआ है पहले की बजट मीटिंग हुई ही नहीं और कलेक्टर के आदेश से बजट के लिए अनुमति प्राप्त कर ली गई. सामने लोकसभा चुनावों की अचार संहिता लगने का वातावरण है. बजट मीटिंग से पहले ही अचार संहिता प्रभाव में आ सकती हैं. इसलिए भी मीटिंग की कोई जरुरत नहीं होनी चाहिए. मंत्री मंडल की बैठक में गुरुद्वारा बोर्ड कलम ग्यारह का विषय समाप्त कर दिया जा सकता था. लेकिन उसके लिए प्रयास नहीं किया गया. मुख्यमंत्री शायद इस विषय की गंभीरता को जान ले और घोषित कर दे कि कलम ग्यारह रद्द कर दी गई है. 
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