मनहास का हजुरसाहिब में पहला कदम ही राजनीतिपूर्ण
मनहास और उनके समर्थकों से हैं आंदोलनकारियों की जान को खतरा !
रविंदर सिंघ मोदी
तखत साहब के आदरणीय पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता का उल्लंघन कर भूपिंदर सिंघ मिनिहास ने महाराष्ट्र सरकार से गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड का प्रधान पद मांगकर ले लिया. ता. २१ जनवरी, २०१९ को आदरणीय पंजप्यारे साहिबान ने गुरुद्वारा बोर्ड कानून की धारा ग्यारह का संशोधन रद्द करने का गुरुमत्ता पास किया था. साथ ही कलम ग्यारह से कोई गुरु सिख प्रधान पद प्राप्त न करे यह भी कहा गया था. पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता को हजूर साहिब के अधिकत्तर उत्साही सिखों ने श्रद्धा सहित मान लिया. कुछ समीकरण वाले और लालची लोग समीकरण में व्यस्त हो गए. जिनमें भूपिंदर सिंघ मिनिहास सबसे अग्रणी रहे. क्योंकि वें शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के गुप्त एजंडा पर चल रहे थे. हरसिमरत कौर बादल, सुखबीर सिंघ बादल और प्रकाश सिंघ बादल ने कलम ग्यारह के विषय को और पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता का राजनीतिक उपयोग कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर दबाव डालकर कलम ग्यारह के तहत भूपिंदर सिंह मिनिहास को गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनाने के समीकरण सामने किया. विधायक सिरसा (दिल्ली) की भूमिका भी संदिग्ध रही. देवेंद्र फडणवीस ने हजूर साहिब सिखों की जनभावना को दरकिनार कर, जनांदोलन की घोर उपेक्षा कर कलम ग्यारह को नहीं हटाया बल्कि उसके जरिये ही जबरन भूपिंदर सिंघ मिनिहास को प्रधान बनाया. महाराष्ट्र सरकार ने एक तरह से नौ सदस्यों का बोर्ड घोषित कर असंवैधानिक रूप से बोर्ड घोषित किया. क्योंकि बोर्ड कानून की अनुपालना के तहत महाराष्ट्र सरकार ने सरकार मनोनीत दो सदस्यों की संख्या होते हुए भी उसमें से एक पद पर मिनिहास की नियुक्ति कर डाली. अन्य एक पद क्यों घोषित नहीं किया गया ? हैदराबाद प्रतिनिधि का नाम उपलब्ध होते हुए भी उस नाम को बोर्ड में स्थान नहीं दिया गया. मुख्यमंत्री ने वैसा बोर्ड घोषित किया जैसा कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को चाहिए था. यह एक तरह से नांदेड़ के भूमिपुत्रों के साथ अन्याय नहीं तो क्या ? मुख्यमंत्री ने दस बार आश्वसन दिया लेकिन कलम ग्यारह रद्द नहीं की. खैर, भूपिंदर सिंघ मिनिहास गुरुमत्ता का उल्लंघन कर प्रधान बन गए. इसका अर्थ ये होता हैं की वे तनखैया सजा के भी पत्र हो गए. लेकिन बोर्ड के कुछ सदस्यों को ढाल बनाकर मिनिहास हजूर साहिब भी पहुंच गए. ता. १८ मार्च २०१९ को उनका हजूर साहिब आगमन हुआ. उससे पहले नांदेड़ की पुलिस ने कलम ग्यारह से जुड़े तेरह लोगों को ये कहकर पाबंद करने की कार्यवाई शुरू की कि , उनसे मिनिहास को खतरा हैं. ये शिकायत गुरुद्वारा बोर्ड कार्यालय द्वारा की गई. भूपिंदर सिंघ मिनिहास ने चार्ज भी नहीं संभाला कि राजनीती शुरू कर दी. गुरुद्वारा कार्यालय के उस दिन के प्रभारी अधीक्षक रणजीत सिंघ चिरागिया और प्रशासकीय अधिकारी डी. पी. सिंघ ने शिकायत कर समाज के तरह लोगों को जैसे अपराधी के कटघरे में खड़ा कर दिया. जिसका उद्देश्य क्या था और क्यों ये अधिकारी इतने राजनीतिक रूप से समाज के खिलाफ भूमिका में उतर आये, उनका क्या हित था इस विषय का चिंतन होना चाहिए. मिनिहास का कहना था की उन्होंने कोई शिकायत नहीं की थी और ना गुरुद्वारा कार्यालय को निर्देश कदिया था. फिर इस घटना के पीछे कौन है ? अधीक्षक गुरविंदर सिंघ वाधवा उस दिन छुट्टी पर थे या जानबूझकर साइड में रहकर ये करवा रहे थे ये भी सोचना होगा. एक तनखैया पत्र व्यक्ति के लिए इतना सब ? उससे बड़ी बात ये कि कलम ग्यारह रद्द करने के लिए पंजप्यारे साहिबान ने जीन सात सदस्यों की समिति का गठन किया उसमें भी मिनिहास सदस्य हैं. हजुरसाहिब आने के बाद मिनिहास द्वारा कलम ग्यारह रद्द करने के लिए मीटिंग लेना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने गुरुमत्ता की उल्लंघना विषय में भी पंजप्यारे साहिबान से माफ़ी नहीं मांगी. ना हजूर साहिब के लोगों से माफ़ी मांगी. मिनिहास का होली मनाने आने की बात कहकर सभी यात्री निवासों की इमारतों का निरिक्षण करना, गुरु नानक मार्केट की ईमारत का निरिक्षण करना और कुछ मार्किट गिराकर नए बनाने जैसे बातें करना ये सब को संकेत करता है कि मिनिहास ने हजुरसाहिब के कुछ लोगों को मैनेजिंग कमिटी का मेंबर बनाने का लालच देकर कलम ग्यारह के आंदोलन को कुचलने की पूरी योजना बनाई थी और उसके ऊपर ही वे अमल कर रहे हैं. अब नांदेड़ के जिन सिखों के खिलाफ पुलिस में करवाई की शिकायत की गई उसका अर्थ कुछ लोगों को डराना और आंदोलन से जुड़े अच्छे चरित्र के लोगों की छवि ख़राब करना था. जिस तरह की राजनीति भूपिंदर सिंघ मिनिहास और उनके समर्थकों ने शुरू की हैं वो हजूर साहिब के लोगों के लिए घातक हैं. प्रत्यक्ष में कलम ग्यारह के आंदोलन में सक्रीय कार्यकर्तों के लिए तो बहुत घातक हैं. एक तरह से आंदोलनकारियों पर अत्याचार और दादागिरी हैं. मुख्यमंत्री की निकटता का लाभ उठाकर मिनिहास ये सब कर रहे हैं. उनके पास आंदोलनकारियों से निपटने के लिए करोड़ों और अरबों रूपये हैं. बड़े - बड़े लोग उनके इर्द गिर्द हैं. जिन लोगों के सहारे नांदेड़ में भूपिंदर सिंह मिनिहास ने अपने पहले कदम पर ही दादागिरी की राजनीति की शुरुवात की हैं वो कलम ग्यारह के आंदोलन से जुड़े सक्रीय कार्यकर्तों के लिए जान से खतरे के संकेत हैं. मेरे जैसे सक्रिय और बुद्धिजीवि तो इनके लिए राह का सबसे बड़ा कांटा माना जा रहा हैं. निश्चित ही भूपिंदर सिंघ मिनिहास हजूर साहिब बोर्ड की सत्ता पाने के लिए हम जैसे कार्यकर्ताओं का घात करवा सकते हैं. गुरुद्वारा बोर्ड के संगत में से निर्वाचित दो सदस्यों को भी भविष्य में खतरें पेश आ सकते हैं. क्योंकि नांदेड़ के इस बोर्ड की बैठकें मुंबई में रखी जाती हैं. कुलमिलाकर हजूर साहिब के इस गरिमामय बोर्ड पर बाहर के लोगोंने साम दाम और दंड भेद से कब्ज़ा कर लिया हैं. महाराष्ट्र सरकार ने हजुरसाहिब के लोगों को न्याय देना चाहिए. वहीँ नांदेड़ और मुंबई के पुलिस विभाग द्वारा भी नांदेड़ के सिखों को न्याय देकर उनकी रक्षा करनी चाहिए ऐसी मांग हजूर साहिब से उठ रही हैं.
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