सवा करोड़ के पटाखें फूँक देते हैं हजुर साहब के सिख!
दो सप्ताह तक चलाये जाते हैं पटाखें!
रविंदर सिंघ मोदी
हजुर साहब के सिख त्योहार पसंद हैं। हजूर साहब में दशहरा, दिवाली, होली और बैसाखी तथा विविध गुरपुरब, चौकियां और त्योहार श्रद्धा और उत्साह के साथ बनाए जाते हैं। यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि हजूर साहिब में वर्ष भर त्योहारों की धूम मची रहती है। इन त्योहारों में दिवाली का त्यौहार बहुत ही आकर्षण का केंद्र होता है। दिवाली पर्व के समय एक ही सप्ताह में सिख समाज चार त्यौहार मनाता है। जिसमें दिवाली से एक दिन पूर्व तखत स्नान का भव्य त्यौहार मनाया जाता है। उसके पश्चात दीपमाला और दिवाली का त्यौहार होता है जिसमें तखत साहब अंतर्गत सभी गुरुद्वारा रोशनी से जगमगा उठते हैं।
अगले दिन दीपमाला दिवाली त्योहार को समर्पित दिवाली हल्ला महला नगर कीर्तन यात्रा निकाली जाती है। दिवाली हल्ला महला के दूसरे दिन सुबह यानी दूज की तिथि पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का गुरुतागद्दी त्यौहार मनाया जाता है। सिखों के लिए इस त्योहार से बड़ा कोई अन्य त्यौहार हो नहीं सकती। इस त्यौहार के दौरान भी नगीनाघाट गुरुद्वारा साहब से तखत साहब तक नगर कीर्तन यात्रा निकाली जाती है। गुरुतागद्दी श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का त्योहार पंचमी तक मनाया जाता है। गुरुतागद्दी त्यौहार के दौरान भव्य कीर्तन दरबार और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। परलोक गमन को समर्पित एक नगर कीर्तन यात्रा भी निकाली जाती है।
इस तरह से एक सप्ताह के दरम्यान हल्ला महल्ला सहित तीन नगर कीर्तन यात्राएं निकाली जाती है। जिनमें हजारों लोग श्रद्धा सहित शामिल होते हैं। हल्ला महला और नगर कीर्तन यात्रा में अधिकतर युवा वर्ग शामिल रहता है। इन त्योहारों के दरम्यान युवा वर्ग उत्साह से ओतप्रोत दिखाई पड़ता हैं। तखत स्नान से श्री गुरु नानक देवजी के प्रकाशपुरब तक यानी दो सप्ताह तक युवाओं का उत्साह चरम पर रहता हैं। त्योहारों को मनाते समय युवा वर्ग पटाखेंबाजी में मग्न हो उठते हैं। विशेषकर दीपमाला दिवाली के बाद हजुरसाहिब में बहुत पटाखेंबाजी की जाती हैं। मेरे व्यक्तिगत आकलन के अनुसार दिवाली के एक सप्ताह के दौरान हजुरसाहिब का सिख समाज अंदाजातन सवा करोड़ राशि के पटाखें चला देता हैं।
गुरुद्वारा सचखंड परिसर में परंपरागत रूप से आतिशबाजी की जाती है लेकिन उससे हटकर सिख परिवार अपने घरों और दुकानों के सामने पटाखेंबाजी करते हैं। हजुरसाहिब में ऐसे भी कुछ संपन्न परिवार हैं जो 50 हजार से एक लाख रूपये मूल्य के पटाखें चलाते हैं। कुछ परिवार गरीबों को पटाखें बाँटते भी हैं। एक तरह से सिख समाज पटाखों का बहुत बड़ा खरीददार हैं। सिख धर्म में लंगर का विशेष महत्व हैं।
मैं, यह विचार कर रहा था कि यदि स्थानीय सिख पटाखा खरीदी में कुछ कटौती कर बची हुईं राशि को शिक्षा क्षेत्र में निवेश करते हैं तब बहुत बड़ा सामाजिक लाभ होगा। यदि सवा करोड़ में से 50 लाख की राशि एकत्र हो जाती हैं तब जरुरतमंद बच्चों की उच्च शिक्षा की समस्या का निराकरण हो सकता हैं। हम वहीं पैसा बचानें की सोच रहें हैं जो पटाखों से धुआँ बनकर उड़ जाता हैं। यदि सवा करोड़ राशि का दसवंद भी बचाया जाए तब भी साढ़े बारह लाख की राशि बन सकती हैं। इस विषय में युवा वर्ग को निश्चित ही पहल करनी चाहिए ऐसा मेरा आग्रह हैं। समाज के वरिष्ठों को और समाजसेवा में अग्रसर लोगों को इस विषय में गंभीरता से सोचना चाहिए। गुरु महाराज जी का नगरकीर्तन शोभा और वैभव के साथ निकलना चाहिए। दिवाली हल्ला महल्ला और गुरुतागद्दी नगरकीर्तन यात्रा में अस्तव्यस्त और लोगों को दिक्कत पेश करें ऐसी पटाखेंबाजी नहीं होनी चाहिए। गुरुद्वारा बोर्ड द्वारा हल्ला महल्ला और नगरकीर्तन के दौरान पटाखें चलाये जाते थे और बहुत सुरक्षित रूप से उन्हें चलाया जाता हैं। कुछ लोग सावधानी से पटाखेंबाजी करते हैं। लेकिन कुछ शरारती लड़के केवल शरारत करने और हुल्ल्डबाजी के लिए आड़े तिरछे पटाखें, रॉकेट, सिटी जैसे पटाखें चलाते हैं जिससे अन्य लोगों को दिक्कत होती हैं।
हल्ला महल्ला और नगरकीर्तन में अनियंत्रित पटाखेंबाजी का सिलसिला बीस से पचीस वर्षों से शुरु हैं। नियंत्रित पटाखेंबाजी योग्य हैं। लेकिन जिस पटाखेंबाजी से गलत संदेश प्रसारित होता हैं, प्रदूषण को बढ़ावा मिलता हैं, स्थानीय सिख समाज के बुजुर्गों को तकलीफ पहुँचती हैं, महिला और शिशुओं को परेशानी होती है, उस स्तर की पटाखेंबाजी पर अंकुश लगना चाहिए। माता - पिता भी अपने बच्चों को समझायें और नियंत्रित करें कि वें नगरकीर्तन का उत्साह ना बिगाड़े। केवल पटाखे चलाने मात्र से हम गुरु महाराज जी की खुशियाँ प्राप्त नहीं कर सकते। गुरु महाराज जी की खुशियाँ तब प्राप्त होगी जब गुरूजी के कारज निर्विघन्तापूर्वक संपन्न होगे। हल्ला महल्ला और नगरकीर्तन में धार्मिक सद्भाव, भक्ति और गुरबाणी का प्रचार प्रसार अधिक होना चाहिए। गतकाबाजी और भजनबंदगी को बढ़ावा मिलना चाहिए।
त्यौहार और गुरुपूरब तो वास्तव में हम तखत साहब और गुरुद्वारों में माना लेते हैं। लेकिन हल्ला महल्ला और नगरकीर्तन यात्रा यह साधसंगत जी का सामूहिक उत्सव होता हैं। स्थानीय सिखों की एकता, भाईचारा और मित्रवृत्ति बढ़नी चाहिए और उसके लिए नगरकीर्तन एक सक्षम माध्यम हैं। हल्ला महल्ला और नगरकीर्तन हमारे यानी दक्खन की साध संगत का मेलजोल के लिए एक उपयुक्त साधन भी हैं। हल्ला महल्ला यह गुरु महाराज जी के समय से संचालित हो रहीं एक पारंपरिक व्यवस्था हैं। इस धार्मिक व्यवस्था का सभी को सम्मान करना चाहिए। आपके पटाखों से कोई आहत ना हो इस बात का ख्याल गुरु के हर सिख को करना चाहिए। यदि पटाखेंबाजी नियंत्रित होगी तब हल्ला महल्ला और नगरकीर्तन का उत्साह कई गुना बढ़ जायेगा। यह मेरे निजी विचार हैं पसंद आये हो तो इसे औरों तक पहुंचाए। अन्यथा पढ़कर भूल जाए।वाहेगुरु जी का खालसा। वाहेगुरु जी की फ़तेह जी।
