श्री गुरु नानक देव जी को भूल गए इतिहासकार !
पंजाब की बारहवीं की इतिहास पुस्तक में गुरु नानक का जिक्र तक नहीं
रविंदर सिंह मोदी
बात पंजाब और सिक्खी की हो और पंथ के सृजनहार, पहले गुरु, श्री गुरु नानक देवजी का जिक्र ना हो, तो सोचिए कि कैसा प्रतीत होता है. गुरूजी, सिक्खी और सिखों का यह तो घोर अपमान हुआ ना ? यह सिख इतिहास के साथ षड़यंत्र हुआ ना ? बस यही कुछ घटित हुआ है पंजाब के शिक्षा क्षेत्र में.
हाल ही में पंजाब के शिक्षा विभाग द्वारा कक्षा बारहवीं के इतिहास पाठ्यक्रम की एक पुस्तक वितरित की गई जिसमें १५ वीं और १६ वीं शताब्दी के पंजाब का चित्रण लगभग १२ पृष्ठों के लेख के द्वारा किया गया. आपको जानकर हैरानी होगी कि उसमें कहीं भी श्री गुरु नानक देवजी के नाम या कार्यों का उल्लेख तक नहीं किया गया. इस विषय का समाचार जैसे ही बाहर आया वैसे ही सिखों में रोष और चिंता व्याप्त हुई हैं. यह सब ऐसे समय में घटित है जब सिख जगत श्री गुरु नानक देव जी के ५५० वें प्रकाश पूरब (जनम दिहाड़ा) मनाने की तैयारी में जुटा हुआ हैं.
बताया जा रहा है कि, इतिहास के इस पाठ्यक्रम में पंजाब की राजसी दशा और इतिहास पर भरपूर जानकारी परोसी गई. सिकंदर लोधी के पंजाब आगमन की कहानी, बाबर और हुमायूँ के इतिहास की जानकारी दी गईं हैं. जबकि उनके खिलाफ प्रतिकार की पहल करनेवाले गुरु नानक देव जी का जिक्र टाल दिया गया. सिकंदर लोधी से गुरु नानक देवजी की वैचारिक लड़ाई सिख जगत में प्रसिद्ध है. कई इतिहासकारों ने लिखा हैं. गुरु नानक देव जी बाबर की कैद में चक्की चलाते थे. बाबर को जाबर (अत्याचारी) कहकर उन्होंने प्रतिकार किया था. लेकिन यह सारे ऐतहासिक प्रसंगों को पुस्तक में शामिल नहीं किया गया. यह सबकुछ जानबूझ कर और सोची-समझीं विचारधारा के तहत घटित हो रहा हैं कहा जाएं तो गलत नहीं होगा.
महाराष्ट्र के मराठा समाज की सराहना की जानी चाहिए कि उसने छत्रपति शिवाजी महाराज के इतिहास को जीवंत जीवंत ही नहीं रखा बल्कि इतिहास में एक लम्बा संशोधन भी करवाया. राजस्थान में भी वीर महाराणा प्रताप सिंह जी के इतिहास पर व्यापक शोध का कार्य क्षत्रिय राजपूत समाज ने जारी रखा. पंजाब में कुछ लापरवाही हुईं.
वहां, अधिकतर इतिहास पंजाबी भाषा में और गुरुमुखी लिपि में होने के कारण इतिहास और जानकारी सिमित रह गईं. गुरुमुखी में रचित और छपे बहुत से सन्दर्भ ग्रन्थ, पुस्तकें और दस्तावेज नष्ट हो गए. आपको ज्ञात कराऊँ कि श्री गुरु गोबिंद सिंघजी महाराज जिस समय अपने परिवार और साथियों के साथ सिरसा नदी पार कर रहे थे तब बाढ़ के कारण दो टन वजन का बहुमूल्य सिख साहित्य जिसमें इतिहास खोजी दस्तावेज, पांडुलिपियां आदि पानी में बहकर नष्ट हो गए थे. गुरु जी ने वह साहित्य खोज करवाने और लिखवाने में बीस से पच्चीस वर्षों की मेहनत की थी.
अब तक हमारे पास जो इतिहास और दस्तावेज सुरक्षित हैं उसके आधार पर सिख पंथ मार्गक्रमण कर रहा हैं. लेकिन युवा पीढ़ी की मानसिकता उस तथ्य को जल्दी स्वीकार करती हैं जो पाठ्यक्रम में लिखित सामग्री हो. ठीक है सिख धर्म में पैदा हुए बच्चों को सिख धर्म हम समझा सकते हैं लेकिन गैर सिख विद्यार्थियों को सिख धर्म समझने और पढ़ने की जरुरत ही महसूस नहीं होती है, वें क्यों जानना चाहेंगे सिख धर्म के सन्दर्भ में. साढ़े पांच सौ वर्षों में सिख धर्म जितना परिचित चाहिए था, उतना नहीं हुआ. उसके कारणों पर चिंतन जरुरी हैं. लेकिन इस चिंतन के लिए किसी भी सिख के पास समय नहीं है. तब कहां सुरक्षित रह पायेगा आपका इतिहास और आप ?


























