राजनीति प्रिय सिख युवा और प्रगति की बाधाएं
रविंदर सिंघ मोदी
भारत देश में राजनीति क्षेत्र अधिकतर लोगों के आकर्षण और उत्सुकता का विषय हैं. विशेषकर युवा वर्ग का एक बड़ा प्रमाण राजनीति क्षेत्र में गहरी उत्सुकता रखता दिखाई दे रहा हैं. पिछले सात से आठ वर्षों में देश में जितने बड़े आंदोलन हुए उसमें भी युवा वर्ग सबसे अग्रणी रहा था. हमारे देश में राजनीति में सक्रिय होने के लिए जातीय आधार भी बहुत मायने रखता हैं. जिस जाति की जनसंख्या का प्रमाण ज्यादा होता है वहां राजनीतिक संभावनाएं भी अधिक होती है. जिन जातियों की जनसंख्या का प्रमाण कम होता है उन जातियों के नागरिकों को राजनीति में सक्रिय होने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता है. परिश्रम का फल कभी मिलता है और कभी नहीं. इस कारण राजनीति एक व्यवसाय हो गई है. राजनीति अंतर्गत सेवाभाव केवल दिखावा मात्र रह गया हैं.
वर्तमान में २० करोड़ से अधिक लोक राजनीतिक दलों के सदस्य के रूप में सक्रिय हैं. भाजपा के लिए देश में ११ करोड़ से ज्यादा सदस्य कार्यरत है. कांग्रेस पार्टी के सदस्यों की संख्या भाजपा से आधे से भी कम यानी ३ करोड़ ५० लाख के आसपास होने की सम्भावना हैं. अन्य राष्ट्रिय राजनीतिक दलों के समर्थक भी लाखों या करोड़ में बताये जाते हैं. लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि जिस पार्टी की सरकार सत्ता में होती हैं उनकी सदस्य संख्या बढ़ सी जाती हैं. दलबदलू कार्यकर्ता और नेता हर एक पार्टी में होते हैं. भाजपा पार्टी में भी बाहरी दलों से आये नेता और कार्यकर्ताओं संख्या आश्चर्यकारक हैं. भाजपा में इस समय आधे से ज्यादा लोग बाहर के यांनी कांग्रेस के दिखाई दे रहे हैं.
इतनी बड़ी कार्यकर्ता संख्या में लोकसभा के लिए केवल ५४५ लोग सांसद बनकर चुनकर आते हैं. वही अलग - अलग राज्यों से विधायक के रूप में चुनकर आनेवाले भी हजारों में होते हैं. शेष करोड़ों लोग कार्यकर्ता के रूप में अपना दायित्व निभाते हैं. कुछ खुशनसीब मंडलों में, महामण्डलों में, स्वीकृत सदस्य के रूप में स्थापित किये जाते हैं लेकिन स्थापना का दारोमदार भी जाति के अनुपात पर निर्भर रहता हैं.
भारत में सिखों का अलग राज्य है. पंजाब के नाम से हम उसे जानते हैं. पंजाब सहित पुरे देश में सिख समुदाय की जनसंख्या दो करोड़ के लगभग है. जनसंख्या का अल्प प्रमाण ही सिखों की राजनीति में पिछड़े होने का सबसे बड़ा कारण माना जाता है और जातीय समीकरणों के चलते उपर्युक्त तथ्य सही भी है. महाराष्ट्र में सिखों की जनसंख्या तीन लाख से कुछ ऊपर है. नांदेड़ जिले में कितनी है उसका उत्तर मैं देना नहीं चाहता. पहला तर्क तो यही है कि, जातीय प्रमाण के समीकरण के चलते ही नांदेड़ जिले में सिख नेता का उभारना, स्थापित होना एक बड़ी मशकत है. दूसरा तर्क होनहार नहीं होना, तर्क रखने में असफल रहना, सही समय पर सही तथ्य न परोसना भी नेताओं की उत्पत्ति नहीं होने का बड़ा कारण है. तिसरा तथ्य प्रामाणिक कार्य नहीं करना और समय पर गुटबाजी और बयानबाजी कर छोटे विषयों को तूल देना भी नेताओं का विकास रोके हुए हैं. चौथा कारण आगे बढ़नेवाले की टाँग खींचना तथा पाँचवाँ कारण योग्य व्यक्ति का चयन नहीं कर अपने रिश्तेदार और मित्रों का पदों पर चयन करना भी एक रुकावट का प्रमुख कारण है. छठा कारण समर्पण भाव से काम नहीं कर चाटुकारिता और चापलूसी का प्रदर्शन भी प्रगति में बाधक हैं. राजनीतिक विफलता के और भी बहुत से कारण प्रस्तुत किये जा सकते हैं कि क्यों सिख युवकों को राजनीतिक आधार उपलब्ध नहीं हो पाता हैं.
सिख नवयुवकों में सबसे बड़ी कमी विचारों का अनुग्रहण नहीं करना हैं. विचारों और आदर्शों की तुलना का उनके पास समय और ना ही कोई हुनर है. वर्तमान समय में राजनेता और राजनीति का स्तर क्या होना चाहिए इस विषय में कोई भी विचार नहीं कर पाता. गुटबाजी को फ़ौरन स्वीकृति मिल जाती है. ग़लत धरना पालने की कला अधिकतर नवयुवकों में दिखाई देती हैं. सिख युवकों को तो जैसे गुटबाजी का अभिशाप ही मिला हुआ हैं. कौम और समाज के लिए भी कार्य करना है तो सौ कारण प्रस्तुत हो जाते हैं. युवकों के दिलों में जिन नेताओं की धारना घर कर बैठी हुई है उसके आगे कौम और समाज के लिए होने चाहिए वो सारे योगदान फीके पड़ जाते हैं. आपके गल्ली के नेता ने कह दिया तो आपके लिए वो बात जैसे जीवन-मरण वाली बात हो गई. समाज खड्डे में भी जाये, आपका धर्म संकट में भी पड़ जाये तब भी युवकों में राजनीतिक प्रेरणा ही अधिक कार्य करती हैं. धार्मिक और सामाजिक चेतना से अधिक राजनीतिक चेतना सक्रिय होना सिख समाज की राजनीतिक उन्नती में भी सेंध लगाती है.
इसी कारण सिख युवकों को न राजनीती क्षेत्र में दिशा में मिल रही है और न धर्म के लिए योगदान करने के लिए ही कोई प्रेरणा मिल रही हैं. हम अज्ञान को आगे रखना चाह रहे हैं और अज्ञान ही हमारे सिख युवकों का मार्गदर्शन कर रहा हैं. यही उदहारण पंजाब में दिखाई देने लगा हैं लेकिन वहां जातीय समीकरण ने अभी तक सिखों का नेतृत्व खड़ा रखा हैं. लेकिन महाराष्ट्र में तो सिखों के पास नेतृत्व ही नहीं हैं. सिखों के पास राजनितिक पद भी नहीं हैं. सिखों का कोई मंत्री नहीं है. एक विधायक है लेकिन उसका झुकाव सिक्खी में नहीं बल्कि हिंदुत्व में होने से वो हमारे किसी काम का नहीं. महाराष्ट्र में पैदा हुए सिख आईएएस या आईपीएस कैडर में भी नहीं हैं. प्रसाशनिक पदों पर भी सिख अधिकारी नहीं हैं. ऐसे में सिख युवकों का राजनीति में सक्रिय रहना एक छलावा मात्र है. दस से बीस साल के राजनीतिक जीवन में भी हमारे सिख युवक किसी गल्ली के नेता के कार्यकर्ता से अधिक पहचान नहीं बना पाते हैं. राजनेताओं तक उनकी सीधी पहुँच नहीं बन पाती हैं.
क्यों? क्यों स्थापित नहीं होते सिख युवक? राजनीति प्रिय होने के बावजूद भी वो सिख युवकों का व्यवसाय नहीं बन पाने के कारणों पर जब तक निष्पक्ष चिंतन नहीं किया जाता तब तक राजनीतिक क्षेत्र सिख युवकों को स्थापित नहीं कर सकता यह मेरा यक्तिगत अनुभव हैं. मैंने पत्रकारिता के माध्यम से समाज को भी जाना, राजनीति को भी जाना, राजनीतिकों को भी जाना और कुछ कुछ हमारे युवा वर्ग को जाना हैं. मेरे अकेले के चिंतन करने में कोई अर्थ नहीं रह जाता. मेरी राय हैं कि यह एक सामूहिक चिंतन का विषय है. चिंतन का दायरा व्यापक होना चाहिए. युवकों के हर गुट, हर समूह में इस विषय पर चिंतन होना चाहिए. ये चिंतन आपकी अपनी मानसिकता से होना चाहिए किसी अन्य के प्रभाव से इस तथ्य का चिंतन ईमानदारी नहीं होगी. यदि चिंतन की करने की आपकी तैयारी है तो मेरी भी सामूहिक चिंतन की तैयारी है. कभी ना कभी तो विषय निरपेक्ष चिंतन होना ही चाहिए. आगे युवा वर्ग की मर्जी.
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रविंदर सिंह मोदी

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