१९८४ के सिख विरोधी दंगों पर राजनाथ सिंह का बयान दुर्भाग्यपूर्ण
भीड़तंत्र की आड़ में दोषी कांग्रेसियों को बचाने की कोशिश
रविन्दरसिंघ मोदी
हजूर साहिब नांदेड़ - केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का १९८४ के सिख विरोधी दंगों पर जारी किया गया बयान दुर्भाग्यपूर्ण है. ये बयान भी उन दंगों की तरह ही सिख विरोधी प्रतीत हो रहा है. दिल्ली और उत्तर भारत में ३४ साल पहले सिखों को निर्दयता के साथ मार डाला गया था, सिख महिलाओं और बच्चियों पर सामूहिक अत्याचार किया गया था. मासूम छोटे बच्चों को निर्दयता से कत्तल किया गया था. तीन से चार दिन चलें दंगों में पुलिस ने कुछ नहीं किया था. दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार दंगें देखते रहे थे. क्योंकि वो सब एक भीड़ कर रही थीं? भीड़ में यदि कांग्रेसी शामिल नहीं थे तो कौन था?
यहां एक व्यक्ति की भी हत्या हो जाती है तो पुलिस छानबीन कर किसी न किसी तरह से कातिल तक पहुँच जाती है. दिल्ली में तो हजारों मार डाले गए. दिन और रात चार दिनों तक दंगे चलते रहें सरकार और पुलिस दोनों भी कुछ नहीं कर पाएं. बहुत सी जाँच समितियां बिठाई गई. पर उन कांग्रेस नेताओं के ख़िलाफ़ कोई करवाई नहीं हुई. अब जबकि लग रहा था कि इन्साफ होनेवाला हैं तो देश के गृह मंत्री स्वयं बयान देकर एक तरह से न्याय पालिका को छुप्पा निर्देश दे रहे हैं कि मामला भीड़ पर छोड़कर कांग्रेस नेताओं को क्लीन चिट बहाल कर दी जाएं. क्या अटल बिहारी वाजपेयी साहब से इसी तरह की राजनीति का पाठ पड़ा है क्या?
केंद्रीय गृह मंत्री के बयान में दिल्ली के उस सिख समूह को भी एक तरह से चेतावनी ही दी गई हैं कि यदि आनेवाले चुनावों में भाजपा के साथ नहीं आओगे तो आगे मुश्किल होगी. संदेह हो रहा है कि भाजपा ने दिल्ली को भाजपामय बनाने के लिए एक तरह से साँठगाँठ की है. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के पहले देश की संसद ने एक तरह से सिखों के कातिलों को निर्दोष करार दे दिया हैं. सिखों को ना कांग्रेस रास आई और ना भाजपा!

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