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शनिवार, 12 जून 2021

सिख विद्यार्थियों का वजीफा ना रोका जाएं !

 गुरुद्वारा बोर्ड को सिख विद्यार्थियों का वजीफा रोकना नहीं चाहिए !

रविंदरसिंघ मोदी 


(Bhupinder singh manhas, president, GSB)

श्री हजूर साहिब नांदेड़ स्थित गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था द्वारा सिख विद्यार्थियों के वजीफा (स्कॉलरशिप) के विषय में अनदेखी नहीं करनी चाहिए. गुरुद्वारा बोर्ड द्वारा पिछले आर्थिक वर्ष 2020-2021 में सिख विद्यार्थियों को वजीफा देने के लिए अर्थसंकल्प (बजट) प्रावधान किया गया था. लेकिन कोविड 19 संक्रमण का बहाना कर वजीफा वितरित नहीं किया गया जबकि सरकार ने शैक्षणिक वर्ष कानूनन पूर्ण कर लिया. 50% से ज्यादा बच्चों को फीस भरनी पड़ी वहीं 50% विद्यार्थियों की शैक्षणिक फीस भरना शेष है. बारहवीं के छात्रों ने भी अलग अलग परीक्षाओं की फीस भरी हुई हैं. कुछ परीक्षाएं रद्द हो गई लेकिन फीस तो अदा हो चूकी हैं. 

जिन विद्यार्थियों फरवरी 2020 में टूशन लगाया उनको भी फीस चुकानी पड़ी. कॉलेज में भी फीस भरनी पड़ गई. उच्च शिक्षा स्नातक और उच्च स्नातक वर्गों के विद्यार्थियों को भी फीस चुकानी पड़ी. इस वर्ष कोविड की विभीषिका के बावजूद सभी यूनिवर्सिटी द्वारा फीस में भारी बढ़ोतरी की गई हैं. अब वर्ष 2021-2022 शैक्षणिक सत्र के लिए विद्यार्थियों को प्रवेश लेना हैं और अकादमीक फीस भरना हैं. इस वर्ष जून में लॉकडाउन शिथिल हो जाने से स्कूल और कॉलेज के लिए प्रवेश शुरू हो रहें हैं. विद्यार्थियों को टूशन क्लास लगवाने. लॉकडाउन की विभीषिका के चलते आज बहुत से सिख परिवार हताहत हैं. बहुत से सिख परिवारों में कोविड संक्रमण का प्रादुर्भाव रहा हैं. समाज में पिछले साल भर में डेढ़ सौ के लगभग मौतें हुई हैं. बहुत से घरों ने कमानेवाले प्रमुख को खो दिया हैं. कोरोना के उपचार में बहुत से परिवारों को ब्याज से पैसे लेकर जरूरतें पूर्ण करनी पड़ रहीं हैं. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो गई हैं. 

जाहीर हैं कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड द्वारा जारी वर्ष के अर्थसंकल्प में वजीफा फण्ड का एक करोड़ राशि का प्रावधान तो करेगा. पिछले वर्ष के फण्ड प्रावधान का शेष अनुशेष वितरित नहीं किया गया. यांनी वजीफा के फण्ड में दो करोड़ की राशि का समायोजन करने की संभावना और गुंजाईश हैं. लेकिन उदासीनता और राजनीतिक सोंच के कारण गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड सिख विद्यार्थियों के साथ न्याय नहीं कर पा रहा हैं. जिसके चलते सिख विद्यार्थियों का नुकसान हो रहा हैं. बोर्ड को चाहिए कि कम से कम विद्या (शिक्षा) जैसे क्षेत्र में राजनीति ना करें. सिख समाज के नेता, खासकर गुरुद्वारा बोर्ड की राजनीति से जुड़े नेतागण इस संबंध में गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान साहब के सामने खुलकर चर्चा क्यों नहीं करते हैं? प्रधान साहब के करीब और खास कहलाने वाले नेतागण वजीफा नीति को लेकर खुलकर बहस क्यों नहीं करते? यदि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड सिख विद्यार्थियों की पढ़ाई को प्रोत्साहित नहीं कर रहा हैं तो बहुत बड़ा दुर्भाग्य हैं. सिख विद्यार्थी अपना अधिकार लेने के लिए आंदोलन करें इससे पूर्व गुरुद्वारा बोर्ड के अर्थसंकल्प में वजीफा फण्ड का प्रावधान करने के साथ साथ जुलाई अथवा अगस्त माह में बच्चों को वजीफ़े का वितरण किया जाएं. ऐसी सभी से प्रार्थना हैं. 

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 गुरुद्वारा बोर्ड की मीटिंग के मायने !

भूपिंदरसिंघ मनहास 'दरबार साहब' की इमारत का मूल्य बताए ! या माफी मांगे !

रविंदरसिंघ मोदी 

( तखत सचखंड श्री हजूर साहिब दरबार साहिब )

आनेवाली तारीख 13 जून 2021 को गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड नांदेड़ संस्था की बोर्ड बैठक झूम ऑनलाइन प्रणाली द्वारा संपन्न होने जा रहीं हैं. पिछली बोर्ड बैठक ता. 20-07-2020 को संपन्न हुई थीं जो खासी चर्चाओं में रहीं थीं. उसके पश्च्यात आयोजित पिछली बजट बैठक हो नहीं पाई थी. गुरुद्वारा बोर्ड यह धार्मिक संस्था होने के कारण और उसका आर्थिक व्यवहार (बजट) अनुमानित एक सौ करोड़ होने के कारण संस्था के आर्थिक व्यवहार नहीं रुकने चाहिए ऐसा मेरा स्वतंत्र मत हैं. क्योंकि दैनंदिन पूजापाठ, दीयाबाती, व्यवस्था, कर्मचारियों का वेतन, बिजली बिलों का भुगतान जैसे बहुत से खर्च मायने रखते हैं. साथ ही लंगरसेवा, हॉस्पिटल सेवा, यात्रीनिवास व्यवस्था के लिए भी रोजाना खर्च करना पड़ता हैं. ऐसे दैनंदिन खर्च रोजाना करना अपरिहार्यता हैं. इस विषय को समझा जा सकता हैं. लेकिन बजट मीटिंग नहीं होने की बात का हो-हल्ला मचाने के बजाए मंथली बजट जिलाधीश साहब की अनुमति से करवाने का भी विकल्प मौजूद है. सन 1991 के बाद ऐसे प्रयोग होते आये हैं. इन विकल्पों का उपयोग नहीं करने से बोर्ड के एक हजार से ज्यादा पक्के कर्मचारियों को आर्थिक मुसीबतों से रूबरू होना पड़ा. नियम तो यह है कि मीटिंग होने के बाद की प्रोसेडिंग जारी होने तक पास किये गए मुद्दों को अमल में नहीं लाया जा सकता. मीटिंग ख़त्म होते ही बोर्ड वेतन कैसे जारी कर सकता हैं? वर्ष 2021-2022 के आर्थिक बजट को मान्यता की प्रोसिडिंग की तकनीक दिक्कत तो हैं. लेकिन श्रेयवाद को दरकिनार कर समाज की आवश्यकता के सभी मुद्दों के साथ न्याय जरुरी हैं. फटाफट निर्णय नहीं लेकर उसका राजनीतिकरण किये जाना घातक है और एक धार्मिक संस्था में कार्यप्रणली में अवरोध पैदा करने का दुःसाहस भी. 

सात या नौ सदस्यों के सीमित अधिकार हैं !

ता. 13-06-2021 को आयोजित बोर्ड बैठक का ज्यादा विरोध नहीं हुआ है यह बात गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान के हित में हैं. वैसे भी भोपाल एसजीपीसी की मनोनीत रिक्त सीट पर स. हरपालसिंघ स्व. गुरदीपसिंघ भाटिया की सदस्य के तौर पर नियुक्ति से बोर्ड का संतुलन 50 प्रतिशत सदस्य संख्या के नियमों की पूर्ति करता है. इसलिए बैठक जायज हैं. बोर्ड के प्रधान के पास आज बैठक के लिए जरुरी गणपूर्ति संख्या (7) उपलब्ध हैं. जिसे हम कोरम कहते हैं. इस समय बोर्ड में 17 में से नौ सदस्य मौजूद हैं. जिसके पास कोरम उपलब्ध हो वो हर तरह के निर्णय पास करवा सकता हैं. जाहीर हैं ग्यारह महीनों के अंतराल के बाद मीटिंग हो रहीं है विषय पत्रिका में मुद्दे तो होंगे ही. लेकिन बोर्ड को ऐसे मुद्दे पास करने की तकनीकि दिक्कत है कि जिन मुद्दों को पास करवाने के लिए बोर्ड एक्ट (17 सदस्यीय बोर्ड) के दो तिहाई सदस्यों की सहमति जरुरी है. उदाहरण के लिए गुरुद्वारा की खेती लीज पर देने या किरायेनामे पर देने के लिए बोर्ड के सतरह सदस्यों के अस्तित्ववाले बोर्ड के ही अधिकार हो. आज के नौ सदस्यों में से दो तिहाई संख्या का समीकरण धोखाधड़ी जैसा है. इस विषय पर बोर्ड के अन्य सदस्य बात क्यों नहीं कर रहे हैं? आपसी सहमति के मुद्दें या किसी व्यक्तिविशेष को सहायता पहुंचाने की मंशा से पास किये गए निर्णय से बोर्ड का नुकसान हो सकता हैं. जमीनों के संबंध में अभी निर्णय लेना अनुचित होगा. यदि ऐसे निर्णय लिए जाते हो तो जमीन विवाद से जुड़े न्यायालयीन मामलों में गुरुद्वारा बोर्ड का खर्च गुरु की गोलक से नहीं करवाकर उसकी पूर्ण जिम्मेदारी और दायित्व बोर्ड अध्यक्ष की होनी चाहिए. बोर्ड अध्यक्ष वैसा लिखित करार करके दें सकते हैं क्या?  

अब सबसे गंभीर बात ! 

बैठक एजैंडा सूची में 20 नंबर पर एक मुद्दा रखा गया हैं कि गुरुद्वारा बोर्ड के सभी इमारतों का बीमा करवाया जाएं. साथ ही दरबार साहब की इमारत का बीमा करवाया जाएं. यात्री निवास और कार्यालयों की इमारतों का बीमा करवाएं जाने के लिए हमारा पूर्ण समर्थन हैं. लेकिन यदि श्री गुरु गोबिंद सिंघजी महाराज के कायम निवास तखत सचखंड श्री हजूर साहिब 'दरबार साहब' की इमारत का बीमा करवाने और दरबार साहब का मूल्यांकन करवाने जैसी अविवेकपूर्ण पेशकश बोर्ड के माध्यम से की जा रहीं हैं तो मै, स. रविंदरसिंघ मोदी, पत्रकार हजूर साहब व्यक्तिगतरूप से इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध करता हूँ. आशा करता हूँ जो भी गुरु का सच्चा सिख इस विषय में गौर करेगा निश्चित ही मेरे द्वारा प्रोत्साहित तत्वतः निषेध में शामिल हो जायेगा. 

(आक्षेप पत्र)

स. भूपिंदरसिंघ मनहास क्या इतने बड़े व्यवसायी हो गए कि उन्होंने दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज के घर 'दरबार साहब' का मूल्यांकन करना शुरू कर दिया हैं ! उनकी, कौनसी बीमा कंपनी से बात हुई जो हजूर साहब के पवित्र पावन दरबार साहब की सही कीमत तय करेंगी? मनहास साहब, बताइये 'दरबार साहब' का मूल्य (कीमत) क्या तय किया है आपने? बीमा करवाने के लिए दस्तावेज पर कितना आंकड़ा भरोगे? दरबार साहब का बीमा करवाने के लिए कंपनी को कोई कीमत तो तय करनी होगी! किश्त भी भरनी होगी! शेर-ए-पंजाब महाराज रणजीतसिंघजी द्वारा सेवाभाव से निर्मित गुरुघर के दरबार साहब का निर्माण करवाया गया था. यह दरबार साहब भवन अमूल्य हैं. श्रद्धा और आस्था के इस धरोहर का मोल लगाने का गुनाह आपने किया हैं और उसके लिए आपको तखत साहब में माफी मांगनी चाहिए.  

बोर्ड का एजैंडा 👇

( देखिए 20 नंबर का मुद्दा )🖕



(मुद्दा नंबर 20🖕)

शहंशाह दशमेश पिता जी के सचखंड दरबार साहब की इमारत करोड़ों सिखों का सबसे अंतिम 'आस्था केंद्र' है. यह दरबार साहब हमारा उर्जास्थान है, जहाँ दशमपिता श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज ने ग्यारहवें और युगोंयुग अटल श्री गुरुग्रंथ साहिब जी को गुरुगद्दी प्रदान की है. यह दरबार साहब सिख इतिहास की ऐतहासिक और सांस्कृतिक धरोहर हैं. इनका मूल्यांकन कैसे हो सकता हैं? दाम किस प्रणाली से तय होंगे? यह ईमारत आस्था, सेवा और उस दौर से इस दौर तक की साधसंगत के योगदान से निर्मित है. गुरु महाराज के अंगीठा साहब का क्या मूल्य तय करोगे? दरबार साहब के सौंदर्यकरण के लिए कितना सोना लगा, कितनी चांदी लगी, दीवारें कितनी बनीं है, कलश कितने हैं, क्या सभी का मूल्य तय किया जायेगा? जिस दौर में दरबार साहब की ईमारत जर्जर होगी उस समय दरबार साहब के नवनिर्माण अथवा सौंदर्यकरण के लिए साधसंगत सक्षम होगी. श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज स्वयं अपने स्थान की सेवा करवा लेंगे. 

मैं, गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के मौजूदा सभी सदस्य और व्यवस्थापन समिती के सदस्यों से प्रश्न करना चाहता हूँ कि आप सभी ने तो विषय पत्रिका में 20 नंबर का मुद्दा पढ़ा होगा ? क्या इस विषय में आप लिखित आक्षेप नहीं लें सकते थे? साधसंगत की सेवा का दायित्व और तखत साहब की महानता का निवर्हन सभी सदस्यों की जिम्मेदारी हैं. वोट की राजनीति के अलावा धार्मिक मूल्यों को अबाधित रखने के लिए विवेक जागरूक रखना जरुरी हैं. 

मै गुरुद्वारा बोर्ड के सरकार द्वारा नियुक्त जिम्मेदार प्रधान सरदार भूपिंदर सिंघ मनहास (मुंबई) से शिकायत करना चाहूंगा कि, प्रधानसाहब, यह एक अटल सच्चाई हैं कि, आपके गुरुद्वारा बोर्ड के अभी तक के ढाई वर्ष के कार्यकाल में हजुरसाहब बोर्ड पूर्णरूप से अस्थिर हो गया हैं. दक्खन प्रदेश की सिख नुमाइंदगी आपके कार्यकाल में पूर्णरूप से ख़त्म हो गई हैं. गुरुद्वारा परिसर में बार - बार तनाव और हिंसा घटित हो रहीं हैं. राजनीति के चलते ही सिख नौजवानों पर आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं. गुरुद्वारा परिसर में हमेशा लॉ एंड आर्डर भंग हुआ हैं. आपकी दम्भ नीति से आज हजूर साहिब के कितने परिवार त्रस्त हैं. सबसे पहले आपके कार्यकाल का मूल्यांकन होना चाहिए. मैं, एसजीपीसी की प्रधान बीबी जगीरकौर जी से निवेदन करूँगा कि वो स्वयं सरदार भूपिंदरसिंघ मनहास के कार्यकाल का मूल्यांकन करवाए. 

यदि गुरुद्वारा बोर्ड के मेंबर साहिबान और व्यवस्थापन समिती सदस्यों का विवेक जागरूक हैं और आप गुरुघर के वफादार हो, साधसंगत के सेवक हो, किसी बीमा कंपनी से आपका व्यक्तिगत लालच नहीं है तो तुरंत मीटिंग एजैंडा के मुद्दा नंबर 20 में संशोधन करवाकर 'दरबार साहब' का बीमा करवाने का विषय हटा दें. और इस तरह की सोच के लिए भूपिंदर सिंघ मनहास को चाहिए कि वें एक सच्चे सिख की नैतिकता और कर्तव्यपरायणता के तहत श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज के सच्चे दरबार में उपस्थित होकर गुरु महाराज से माफी मांगे. 

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गुरुवार, 20 मई 2021

 न्यू सॉउथ वेल्स के स्कूलों में "कृपाण" पाबंद !

रविंदरसिंह मोदी 


ऑस्ट्रेलिया के न्यू सॉउथ वेल्स स्टेट प्रशासन द्वारा वहाँ के सरकारी स्कूलों में सिख विद्यार्थियों के कृपाण धारण कर स्कूल आने पर पाबंदी के आदेश जारी किये गए. न्यू सॉउथ मिनिस्टर साराह मिशेल द्वारा ता. 18-05-2021 को आदेश जारी किया गया जिसकी अनुपालना ता. 19-05-2021 से अमल में लाई गई. ऑस्ट्रिलयन सरकार के निर्णय के बाद वहाँ के सिख समुदाय ने सरकार के प्रति नाराजी व्यक्त कर शासन आदेश पर पुनर्विचार करने की अपील की हैं. 


न्यू सॉउथ वेल्स प्रांत के सिडनी स्थित ग्लेनवुड स्कूल में ता. 06-05-2021 को एक घटना घटित हुई थी जिसमें एक 14 वर्षीय सिख विद्यार्थी का स्कूल की कक्षा में वहाँ के अन्य विद्यार्थियों से किसी विषय को लेकर झगड़ा हो गया. तीन से चार विद्यार्थियों द्वारा जब उस सिख विद्यार्थी के साथ मारपीट की गई तब उस सिख विद्यार्थी द्वारा कृपाण निकाल कर अपना बचाव किया गया. इस समय एक सोलह वर्षीय विद्यार्थी कृपाण से घायल हो गया.  

घटना के बाद पुलिस को मामला सौंपा गया. पश्च्यात में कुछ अभिभावकों द्वारा स्कूलों में कृपाण के उपयोग पर पाबंदी लगाने की मांग की. ऑस्ट्रेलिया सरकार ने घटना की समीक्षा के पश्च्यात ता. 19 मई से स्कूलों में कृपाण के उपयोग पर पाबंदी लागु कर दी. सिखों के एक प्रतिनिधि मंडल ने सरकारी निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील सरकार से की. साथ ही कृपाण को धार्मिक अनुपालना सिद्धांत का प्रमुख आधार बताकर खालसा पंथ के अमृतपान का ऐतहासिक प्रसंग और उससे जुड़े सभी धार्मिक तथ्यों को प्रस्तुत किया हैं. पर अभी तक ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा निर्णय को लेकर कोई भी नई टिप्पणी या पुनर्विचार की तैयारी दर्शाई नहीं गई. 

ऑस्ट्रेलिया सरकार के निर्णय का भारत में सिख संस्थाओं द्वारा विरोध प्रकट किया गया. इस घटना को लेकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने भी बयान जारी किया हैं कि सिखों की धार्मिक स्वतंत्रता पर यह अगाध है. ऑस्ट्रेलिया सरकार को यह निर्णय रद्द करना चाहिए. 

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बुधवार, 19 मई 2021

 श्री दशमेश हॉस्पीटल में कोरोना वैक्सीन उपलब्ध करवाई जाएं 

रविंदरसिंह मोदी 

नांदेड़ महाराष्ट्र 

यहाँ के तखत सचखंड श्री हज़ूर साहब बोर्ड द्वारा संचालित श्री दशमेश हॉस्पिटल अंतर्गत शुरू किया गया कोरोना कोविड 19 संक्रमण रोकथाम वैक्सीन केंद्र (टीका केंद्र) में विगत बीस दिनों से कोवैक्सीन टीकाकरण प्रक्रिया बंद हैं. वैक्सीन का कोटा उपलब्ध नहीं होने से प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो रहीं है. दूसरी ओर पहली डोज प्राप्त कर चूके नागरिक अब दूसरी डोज पाने के लिए संघर्ष कर रहें हैं. नागरिकों की सुविधा हेतु श्री दशमेश हॉस्पिटल में कोरोना टीकाकरण कार्य दुबारा से शुरू किये जाना चाहिए ऐसी मांग जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, महानगर पालिका, जिला अस्पताल प्रशासन और जिला स्वास्थ अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत है. 

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के श्री दशमेश हॉस्पिटल में ता. 03-04-2021 को कोरोना कोविड 19 टीकाकरण शुरू किया गया था. कोवैक्सीन का टीका यहाँ लगवाना शुरू किया गया था जिससे नागरिकों को बहुत सुविधा उपलब्ध हो गई थीं. हॉस्पिटल में तज्ञ डॉक्टर और स्टाफ होने के कारण और अन्य सभी उपचार सुविधाएं उपलब्ध होने की वजह से नागरिकों को बहुत आसानी हो रहीं थीं. लेकिन ता. 28-04-2021 से वैक्सीन सेवा बंद हो गई क्योंकि वैक्सीन कोटे की किल्लत प्रस्तुत हो गई. 

उल्लेखनीय है कि, ता. 29-04-2021 से वैक्सीन के डोज दशमेश हॉस्पीटल में उपलब्ध नहीं हो पाए हैं. लगातार बीस दिनों से यह किल्लत प्रस्तुत हो रहीं हैं. जिससे आम नागरिकों की परेशानी हो रहीं हैं. पहली डोज प्राप्त कर चूके लोगों को 30 से 42 दिनों के दौरान दूसरी डोज लेना अनिवार्य है. इसलिए नागरिकों में चिंता का वातावरण बना हुआ हैं. वैक्सीन टीकाकरण लगभग एक साल चलने वाला है. इसलिए श्री दशमेश हॉस्पीटल का केंद्र अबाधित रूप से शुरू रखा जाएं ऐसी मांग प्रस्तुत हो रहीं हैं. 


मंगलवार, 11 मई 2021

 सोचा आज 'मंटो' को याद कर लूँ..!

रविंदरसिंह मोदी

(सादत हुसैन "मंटो)

भारत में पैदा हुए लेकिन पाकिस्तान में अंतिम साँसे लेने वाले मशहूर लेखक, शायर, कहानीकार सादत हसन 'मंटो' ने भारत - पाकिस्तान बंटवारे को लेकर काफ़ी कुछ लिखा हैं. बंटवारे की त्रासदी पर बहुत चिंतन भी किया था लेकिन शायद नियति ने उन्हें ज्यादा मोहलत नहीं बख़्शी. मात्र 43 साल की उम्र में मंटो ने सन 1955 में दुनिया को अलविदा कह दिया. उनकी पैदाइश ता. 10 मई, सन 1912 की है. जलंधर पंजाब में उनका जन्म हुआ था. यदि मंटो उम्रदराज होते तो एक नए तरह का साहित्यसृजन निश्चित ही हमें पढ़ने को  मिलता. 

सादत हसन मंटो की उर्दू कहानी तोबा टेकसिंह को मैंने कोई बाईस - तेईस साल पहले पढ़ा होगा. यह कहानी दो बार पढ़ीं. क्योंकि सन 2012 में मंटो की जन्मशताब्दी मनाई गई थी उस वक्त, तब दोबारा से तोबा टेकसिंह कहानी पढ़ लीं. उस कहानी में बंटवारा होने के बाद की परिस्थितयों का मार्मिक चित्रण देखने को मिलता है. सिख किसान सरदार बिशनसिंह जमींदार के  सत्य चरित्र पर आधारित यह कहानी बहुत कुछ सीखा जाती है. 

(स्व. तोबा टेक सिंह उर्फ़ बिशन सिंह जमींदार : यह कहानी हर सिख को भी  पड़नी चाहिए.)

मंटो को करोड़ों लोगों ने पढ़ा होगा, उनको पसंद करने वाले भी करोड़ों में ही होंगे. लेकिन मैं मंटो को लेकर कुछ तय नहीं कर पाया. जो बेबाकी मै अपने भीतर या अन्य साहित्यिकों में तलाशता रहा वो मंटो में बहुत हदतक उपलब्ध भी है लेकिन पता नहीं क्यों मंटो ज़माने के प्रति किसी दुश्मनी पर उतारू तो नहीं थे ऐसे ख़्यालात उठने लगें तब मैंने अपने आपको 'मंटो' से दूर कर लिया. अभी तक दूर ही रहा. पर आज अचानक आज कुछ महसूस हुआ कि 'चीर निंद्रा' में सोये 'मंटो' को याद कर लूँ. 'मंटो' को याद करने के लिए साहित्य की प्रमाणिकता और बर्दाश्त करने की इंतेहा से गुजरना पड़ता हैं. भारत देश में सादत हसन मंटो के साहित्य को लेकर अक्सर मंथन होता आया हैं. इसलिए मंटो यहाँ जीवित रहें, वे मरे नहीं ! मंटो इसलिए भी ज़िन्दा रहें कि उनके साहित्य को लेकर बहुत से लोगों ने रोजगार ज़िन्दा रखा. बॉलीवुड की मूवी खलनायक का वो मशहूर गीत "चोली के पीछे क्या है... "  मंटो की उस बात पर आधारित भी है कि, मैं किसी को कपड़े नहीं पहना सकता, ये काम तो दर्जी का है! मुझे इन विषयों में कहीं रिश्ता नजर आया था. क्या गीतकार आनंद बख़्शी ने मंटो को पढ़ा होगा? 

'मंटो', दोनों सरकारों के रवैय्ये पर तंज करते थे इसलिए पाकिस्तान में वे पिछड़ गए, या उन्हें पिछड़ा रखा गया. यदि भारत में रहते तो इतिहास कुछ अलग होता. 'मंटो' को आज याद करने की वजह शायद ये भी है कि मंटो ऐसे शख्स भी है जिन्होंने देश बंटवारे के समय लाखों लोगों की लाशें उस सरजमीं पर बिखरी हुई देखीं थीं. वे उन घटनाओं के साक्षी है, गवाह भी थे. उन्होंने खुलकर उन घटनाओं का मातम भी मनाया था. लाखों लोगों की एक साथ मौत की त्रासदी को उन्होंने तमाशा कहा था. आज विश्व में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न है कि लोग जंग में तो नहीं पर वाइरस संक्रमण से मर रहें हैं. आज हम सभी गवाह हैं कि किस तरह लाखों लोग मर रहें हैं. आज के हालात में मौत कितना बड़ा तमाशा बन गईं हैं. मानवता के चेहरे पर यह किसी मानसिक विकृति का तमाशा नहीं तो क्या हैं. जिसने ऐसा वाइरस बनाया और लाखों लोगों को मौत का शिकार बनाया, जिसने करोड़ों लोगों की जानें संकट में डाली, क्या यह तमाशा नहीं हैं? आज करोड़ों लोगों की साँसों में उत्पन्न घुटन का गुनहगार कौन है, यह भी खुलकर नहीं कहा जाता ! फिर तो यह तय हुआ कि मंटो की ज़माने के प्रति नाराजी सही थीं. उनकी बेबाकी ने एक समय की सियासत को ललकारा था. आज का साहित्य जगत जाने क्यों खामोश हैं. किस तमाशे की इंतेहा की प्रतीक्षा हैं? 'मंटो' का 'ठंडा गोश्त' शायद कभी गर्म नहीं होगा. देश में छाई परिस्तिथियों में भारतीय साहित्य क्षेत्र अब भी धुर्वीकरण को ही मुख्य रखकर कलम चला रहा हैं. आज हम यह मार्मिक तंज कर सकते हैं कि जितनी कलम साहित्यिक वर्ग नहीं घिस पा रहा हैं, उससे ज्यादा तो अस्पताल और डॉक्टर अपनी कलम घीस रहें हैं. मैं दुआओं में गहरा विश्वास रखता हूँ लेकिन खेद के साथ कह रहा हूँ कि यह दुनिया अब 'दवा - दारू' पर निर्भर होती चलीं जा रहीं हैं. 'मंटो' याद आ गए उनका शुक्रिया ! जिन्हें दिल कभी भुला ही नहीं था उन्हें 'मंटो' के बहाने एक बार फिर याद करने का जैसे बहाना मिल गया. आज की परिस्थितियां एक मानसिक द्वन्द को आमंत्रण दें रहीं हैं. 'मंटो' जैसा इंकलाब चाहते हैं वैसा तो संभव नहीं पर एक राष्ट्रीय संघर्ष की आपात भावना की सुगबुगाहट देश में शुरू होगी यह उम्मीद ज़िन्दा कर रहा हूँ.  .

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(रविंदरसिंह मोदी)

सोमवार, 10 मई 2021

 कोरोना त्रासदी और सिख समाज ! 

रविंदरसिंघ मोदी 

(ऑक्सीजन लंगर)

पिछले कुछ वर्षों में सिख समाज के सामाजिक वर्तन का अवलोकन यदि करूं तो मैं इस निष्कर्ष पर आ पहुँचा हूँ कि मानव सेवा में सिख समुदाय एक वैश्विक सेवा संघठन के रूप में उभरा है. भारत ही नहीं यूरोप, अफ्रीका और अन्य खंडों तक सिख समुदाय का सेवा तत्व समर्पित हुआ है. यदि सिखों का कोई वैश्विक पंजीयन सेवा संघटन आकार प्राप्त करें तो मेरा दावा है कि वर्तमान में कार्यरत रेडक्रॉस सोसाइटी या अन्य किसी सहायता संघठन से बड़ा इसका स्वरुप उभर कर सामने आ सकता है. भारत में पिछले सवा साल की कोरोना कोविड - 19 संक्रमण त्रासदी में सिखों का सेवाभाव खुलकर सामने आया हैं. आज सही समय भी हैं कि उन सभी सिख संघटनों, संस्थाओं, समूह और गुरुधामों का हौसलाअफजाई किया जाएं जो स्वयं के जीवन की परवाह किये बगैर लोगों को मौत की मुँह से बचाने में लगें हुए हैं. देश की राजधानी दिल्ली और गाज़ियाबाद महानगर में ही करीब डेढ़ लाख लोगों का जीवन बचाने में सिख संस्था और सिख व्यक्तियों ने योगदान दिया हैं. चाहे वर्तमान में उभरे ऑक्सीजन संकट की बात की जाएं या गुरुद्वारों में शुरू मल्टीस्पेशलिस्ट सेवा केंद्रों की शुरुआत और उनके संचालन सेवा की बात की जाएं, सिखों ने सरकार की और भारतीय जनमानस की सेवा में समर्पण प्रस्तुत किया हैं. क्या विश्व स्वस्थ संघठन या मानव अधिकार संघठन, सिख समुदाय की इस निस्वार्थ सेवा का मूल्यांकन कर रहें हैं? क्या दुनिया के सभी बड़े संपन्न राष्ट्र और विशेषतौर पर भारतीय सरकार कहीं सिख समुदाय की सेवाओं का मूल्यांकन दर्ज कर रहीं हैं? 

(ऑक्सीजन ट्रीटमेंट सेंटर और कोविड उपचार केंद्र)

दूसरा पहलू यह कि क्या भारतीय जनमानस सिखों की इस सेवा को किस सन्दर्भ में देख देख रहा हैं. कोरोना संकट की घड़ी में सिख समुदाय का वास्तविक सेवा भाव पंथ के लिए एक नई छवि को शिल्पित कर रहा हैं. सिख पंथ की सबसे बड़ी छवि यानी देश के सीमाप्रहरी की थीं उससे एक कदम और आगे यह सेवाभाव विस्तारित हुआ है. सोलह - सतरह वर्ष आयु के सिख बच्चें, सिख नौजवान, प्रौढ़, सेवानिवृत्त सिख और सिख महिलाएं भी अपने प्राणों की परवाह किये बगैर आज सेवा का तत्व लेकर एक जानलेवा संक्रमण से जूझ रहें हैं. दिल्ली के हर गुरुद्वारा, हर नगर, हर गलीं तक सिखों की एम्बुलेंस, लंगर, दवाइयां और ऑक्सीजन पहूंच रहें हैं. लॉकडाउन में लोग जीवन की सलामती के लिए खुद को घरों में कैद किये हुए हैं, वहाँ सिख मौत से आँखें मिलाकर संघर्ष कर रहें हैं. यहीं चित्र देश के बहुत से प्रदेशों का है जहाँ सिख संस्थाएं, संघठन, समूह मानवता की सेवा में प्रस्थ हैं. इस दृष्टि से सिखों के इस सेवा बल का सामाजिक योगदान राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर दर्ज करवाना समय की सबसे बड़ी मांग हैं. 

दसवंध का सही उपयोग : 

(निशुल्क एम्बुलेंस और बस सेवा)

सिख धर्म की स्थापना के तत्वों में सबसे दार्शनिक पहलु सेवा के रूप में ही प्रस्थ किया गया. सद्गुरु श्री नानकदेव जी द्वारा "नाम जपो, किरत करो और वंड छको " यह मूल नित्यकर्म सिखों की झोली में डाले गए हैं. प्रभु परमात्मा का नाम जपना यानी भक्ति से जुड़े रहना. किरत (कीर्त) कमाई करना यानी मेहनत और परिश्रम से कमाया धन और उससे जीविका निर्वहन करना. तीसरा वंड छकना ! बांटकर खाना. चाहे वो लंगर के माध्यम से हो अथवा दुविधा और संकट में घीरें लोगों तक सहायता पहुँचाना. सिख को सहायता देकर सेवा योग्य बनाना आदि. सिख धर्म की स्थापना से लेकर आज तक की पंथ (धर्म) की यात्रा में यह पहला अवसर हैं जब सिखों के दसवंध का उपयोग पूर्ण क्षमता के साथ हो रहा हैं. लगभग सवा साल तक अविरत सेवा करने यदि सिख संस्थाएं सफल हुईं हैं तो निश्चित ही सिखों का दसवंध चढ़ाने और खर्च करने की आस्था आज के परिवेश में सभी तरह के सामाजिक सेवा सिद्धातों से ऊपर हैं. 

(लंगर सेवा अविरत जारी हैं)

बीते सवा साल में देशांतर्गत कोरोना काल में गुरुद्वारा, सिख संस्था, समूहों द्वारा चार सौ करोड़ से अधिक राशि की लंगर सेवा समर्पित की गई हैं. वर्तमान में भी वैद्यकीय सेवा क्षेत्र में लगभग डेढ़ सौ करोड़ के संसाधन सिखों ने खड़े किये हैं. सिखों के इस सेवाभाव का मूल्यांकन विश्व के अर्थशास्त्री अब किस सिद्धांत में सन्दर्भित करेंगे यह एक नई चुनौती मात्र हैं. सामाजिक शास्त्रों के पुनर्लेखन की आवश्यकता पर मैं भाष्य कर रहा हूँ जो विश्व के समक्ष नए सिद्धांत रचनाओं का नया सूत्रपात हैं. सिख पंथ, मेरा आशय समझ लें कि वर्तमान में सिखों के योगदान और सेवा को शीर्ष पर पहुंचाने का यह उपलब्ध अवसर कहीं खो ना जाएं. सिख पंथ ने सद्गुरु श्री गुरु नानक के वंड छको तत्व को आज सही मायने में सार्थक किया हैं. 

(प्रतिदिन लंगर सेवा)

सिख पंथ हर रोज अरदास करते समय सरबत का भला का प्रामाणिक भाव प्रस्तुत करता हैं. हे परमात्मा ! श्री अकाल पुरख के सामने हर सिख रोज प्रार्थना करें कि, कोरोना संक्रमण की त्रासदी समाप्त हो जाएं. जब तक यह संकट खड़ा है तब तक इससे लड़ने की जिम्मेदारी सभी की हैं. हर सिख अपनी यथा क्षमता से अपना योगदान प्रस्तुत करें ऐसी उम्मीद बनीं रहेगी. सरकार भी सिखों को फ्रंट वॉरियर के रूप मान्यता प्रदान करें ऐसी मांग आज प्रस्तुत कर रहा हूँ. योग्य लगें तो आगे शेयर कीजिए. 

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रविवार, 9 मई 2021

 गुरुधामों से फिरौती ! 

(गुरुद्वारा बाल लीला साहिब मैनी संगत, पटना, बिहार)

रविंदरसिंघ मोदी

सिख जगत के लिए गहन चिंता का विषय प्रस्तुत हुआ है. किसी अज्ञात शक्ति द्वारा बिहार की राजधानी पटना शहर स्थित गुरुद्वारा बाल लीला साहब (मैनी संगत) को उध्वस्त कर देने की धमकी देते हुए 50 करोड़ रुपयों की राशि बतौर फिरौती मांगी गई है. स्वतंत्र भारत मे यह पहला मामला होगा जब एक गुरुद्वारा (गुरुधाम) से फिरौती की मांग की गई है. यह विषय राजनीतिक साजिश भी हो सकता है और अपराध नियत भी. बिहार में रंगदारी और फिरौती मांगने का प्रचलन नया नहीं है. आपराधिक तत्व ऐसे हथकंडे अपनाते रहते हैं. लेकिन सेवाभावी, बहादुर सिख कौम के ऐतिहासिक गुरुद्वारा को इस तरह से पत्र भेजकर 50 करोड़ की रंगदारी का प्रयत्न करना या तो किसी बड़े आपराधिक संघठन का काम हैं अथवा पटना साहिब गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की कोई अंतर्गत साजिश हो सकती हैं. क्योंकि पत्र में उल्लेख किया गया हैं कि यदि फिरौती अदा नहीं हुई तो गुरुद्वारा बाललीला साहिब पर आक्रमण किया जायेगा अथवा प्रबंधक कमिटी के पदाधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया जायेगा. पत्र में जो संपर्क नंबर दिया गया था वो किसी सरकारी कर्मचारी का है जिसे यह मामला ज्ञात ही नहीं है. बिहार सरकार, विशेष कर मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के लिए भी यह विषय चुनौतिपूर्ण है. पुलिस मामले की जाँच कर रही हैं. रंगदारी का यह विषय गंभीरता से लिया जाना चाहिए. 

आश्चर्य की बात तो यह है कि सिखों की सर्वोच्च नेतृत्व संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी उपर्युक्त विषय में मौन धारण किये हुए है. गुरुद्वारा बाल लीला साहिब यह ऐतिहासिक गुरुद्वारा है जो दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज के बाल लीला का ऐतिहासिक प्रमाण है. राजा फतेहचंद मैनी और उनकी धर्मपत्नी विशंभरी देवी मैनी रानी को गुरु गोबिंदसिंघजी ने यहीं वर दिया था और उनकी गोद में खेलकर उनके हाथों छोले - पुरी खाई थीं. कहा जाता है कि इसी स्थान से कुछ दूरी पर गंगा तट पर पंडित शिवदत्त को बाल गोबिंदराय में श्रीकृष्ण के दर्शन हुए थे. इस दृष्टि से यह स्थान बहुत महत्वपूर्ण है. सिख इतिहास की यह एक धरोहर भी है. श्री गुरु गोबिंदसिंघजी का जन्म सन 1666 में पटना में हुआ था. सन 1666 से सन 1671 तक गुरु जी, माता गुजरी जी का यहाँ निवास रहा था. गुरु तेगबहादुर साहब भी इस स्थान से जुड़े थे और बहुत बार उन्होंने यहाँ निवास किया था. इस स्थान पर वर्ष 2019 में संत बाबा कश्मीरसिंघजी भूरीवाले द्वारा कारसेवा के माध्यम से एक भव्य गुरुद्वारा ईमारत का निर्माण करवाया गया. मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार द्वारा गुरुद्वारा की नई ईमारत का उद्धघाटन करवाया गया था. 

उपर्युक्त घटना से सिख कौम में चिंता और चिंतन का वातावरण है. क्योंकि ऐसी घटना के जरिये सिख कौम को उकसाकर रास्ते पर लाने का एक प्रयास है. अभी हाल में बिहार से करीब पश्चिम बंगाल और असम में चुनाव हुए है. इन चुनावों में धर्म और क्षेत्रीयता को लेकर लोगों में दरार पड़ गई है. ऐसे समय में सिखों को उकसाकर किसी नई घटना को को अंजाम देने का प्रयास कुछ अज्ञात शक्तियों का रहा होगा. सिख कौम इन षड़यंत्र को समझकर आगे का कदम उठाएंगे ऐसी आशा की जा सकती है. 

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शनिवार, 17 अप्रैल 2021

अमरीका में सिखों पर फिर नस्ली हमला ? 

चार सिखों सहित आठ की मौत !

हमलावर युवक ने खुद को गोली मारी !

रविंदरसिंघ मोदी

(अमरीका : इस स्थान पर हुईं गोलीबारी)

अमेरिका में ता. 16 अप्रैल की रात इंडियानापॉलीस FedEx facility में एक 20 वर्षीय अमरीका निवासी युवक द्वारा की गई अंधाधुन्द गोलीबारी की घटना में आठ लोगों की मौत हो गई जिनमें चार सिखों का समावेश हैं. अन्य कुछ लोग घायल हैं जिन्हें उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया हैं. इस घटना से अमेरिका के सिखों में रोष का वातावरण बन गया हैं. वहीं विश्वभर से इस घटना की निंदा की जा रहीं हैं. इसे सिखों के खिलाफ नस्ली हमलें के रूप में भी देखा जा रहा हैं. 

( Indianapolis FedEx कार्यालय )

प्राप्त जानकारी के मुताबिक इंडियानापॉलीस FedEx facility इस उद्योग समूह को एक सिख परिवार द्वारा संचालित किया जाता था. बड़ी संख्या में वहाँ कर्मचारी काम करते हैं. उस स्थान पर ब्रैंडेड होल नामक युवक कार्यरत था. जिसे वर्ष 2020 में ही किसी कारणवश काम से हटा दिया था. उस युवक ने ता. 16 अप्रैल की रात लगभग 11 बजे (भारतीय समय) उद्योगसमूह परिसर में प्रवेश कर अचानक से गन से गोलीबारी शुरू कर दी. 

हमलावर  : ब्रैंडेड होल (20 वर्ष)

गोलीबारी में स्थान पर ही आठ लोगों की मौत हो गई. जिनमें अमरजीत सिंघ जोहल (66), जसविंदर कौर जोहल (64), जसविंदरसिंघ (68), अमरजीतसिंघ सेखों (48),  मैथिव आर. अलेक्जेंडर (32), सामरिया ब्लॉक (19), कार्ली स्मिथ (19), जॉन वेशरत (74) का समावेश हैं. इस घटना को अंजाम देने के बाद इस बीस वर्षीय हमलावर ने घटनास्थल पर ही खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली. बहरहाल इस घटना से अमरीका में सिखों के असुरक्षित होने का विषय चर्चा में ला दिया हैं. जनवरी 2021 के बाद यह दूसरी घटना हैं जब सिखों पर इस तरह से नस्ली हमले को अंजाम दिया गया है. तीन - चार साल पहले विस्कॉन्सिन गुरुद्वारा में घटी घटना अभी भी स्मरण में हैं. 

मारनेवाले सभी भारतीय हैं जो व्यवसाय के लिए वहाँ रह रहे थे. बताया जाता है कि इस स्थान पर बड़ी संख्या में सिख कार्यरत हैं. घटना के बारह घंटे गुजर जाने पर भी भारत सरकार द्वारा अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया. 

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रविवार, 21 फ़रवरी 2021

 श्री गुरु तेगबहादुर जी के 400 सालाना प्रकाशपर्व को लेकर की गईं मांग !!






शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

 साका श्री ननकाणा साहिब की शताब्दी पर केंद्र सरकार की राजनीति !

क्या बीबी जगीर कौर कोई प्रेरणा लेगी ? 

हजूरसाहिब बोर्ड कब मुक्त करवाएंगे!

रविंदरसिंघ मोदी

(साका श्री ननकाणा साहिब - 20-02-1921)

पाकिस्तान स्थित श्री ननकाणा साहिब में घटित "शहीदी साका" या सिख नरसंहार की घटना को ता. 20 फरवरी के दिन एक सौ साल पूर्ण हो रहें हैं. सौ वर्ष पूर्व तत्कालीन हिन्दू महंत नरैणदास ने कत्त्लेआम करवाकर 260 से ज्यादा सिखों को शहीद करवा दिया था जिनमें महिला और बच्चों का भी समावेश था. उपरोक्त घटना के बाद ही श्री गुरु नानक देव जी की जन्मस्थली श्री ननकाणा साहिब और अन्य ऐतहासिक गुरुद्वारों को तत्कालीन अंग्रेज प्रशासन ने सिखों को सौंपा था. 

शहीदी साका श्री ननकाणा साहिब की पहली शताब्दी का आयोजन पाकिस्तान स्थित शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा आयोजित किया गया हैं. इस कार्यक्रम में शामिल होने का न्यौता मिला तब लगभग आठ हजार श्रद्धालु सिखों ने पाकिस्तान यात्रा की अनुमति के लिए सरकार के पास आवेदन दिया. लेकिन केंद्र सरकार द्वारा सिख श्रद्धालुओं को अनुमति नकार दीं गईं. जिससे इस शहीदी साका कार्यक्रम में अब भारतीय सिख शामिल नहीं हो पा रहें हैं. दुर्भाग्य हैं कि अब सरकार निर्धारण कर रहीं हैं कि सिख कौनसे कार्यक्रम में शामिल हो और कौनसे कार्यक्रम में शामिल ना हो. 


केंद्र सरकार की इस राज-नीति पर अब पंजाब के सभी राजनीतिक दल खुलकर बोल रहें हैं. भारतीय जनता पार्टी के मित्र दल भी अब केंद्र की नीतियों की आलोचना करते देखें जा रहें हैं. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी भी रोष जता रहीं हैं. अभी हाल ही में एसजीपीसी कार्यालय के सामने धरना दें रहें सिखों पर लाठियां बरसाएं जानें की घटना से शर्मसार हुईं एसजीपीसी संस्था के लिए सिखों का रोष दूर करने के लिए साका ननकाणा साहिब का कार्यक्रम मददगार साबित हो सकता था. लेकिन केंद्र सरकार ने ऐसी राजनीतिक चाल चलीं कि बादल साहब मात खा गए. 

केंद्र सरकार नहीं चाहती थीं कि हिन्दूं के खिलाफ मनाये जाने वाले इस कार्यक्रम में सिख शामिल हो. इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार की कुछ और भी सोंच हो सकती हैं. सुरक्षा का कारण पाकिस्तान सरकार को देना चाहिए था लेकिन केंद्र सरकार स्वयं कारण प्रस्तुत कर रहीं हैं. जबकि करतारपुर कॉरिडोर का श्रेय अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया के सामने लेना था तब बड़ी संख्या में सिखों को ननकाणा साहिब जाने की अनुमति बहाल की गईं थीं. 


शहीदी साका श्री ननकाणा साहिब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर संस्था के इतिहास में सबसे बड़ा मील का पत्थर हैं यदि इसे ठीक तरह से सोचा जाएं. इस शहीदी साका की घटना के बाद ही सही मायने में एसजीपीसी संस्था के गठन को आधिकारिक बल और स्वायत्ता प्राप्त हुईं. पूर्व में गुरुद्वारों के एकछत्र केन्द्रीकरण के लिए शुरू एसजीपीसी के प्रयासों को 'अकाली लहर' का संबोधन दिया जा रहा था. 

शहीदी साका की घटना के बाद अकाली लहर को मजबूती प्राप्त हुईं. ननकाणा साहिब में हुए सिख विरोधी नरसंहार में 260 से ज्यादा सिखों को मौत के घाट उतारा गया था. सिख नेताओं को पेड़ से बांधकर जिन्दा जला दिया गया. लाशों के टुकड़े कर ईंटों की भट्टी में जलाया गया था. यह आंदोलन गुरुद्वारों पर किये गए अवैध अधिग्रहण (कब्ज़ा) के खिलाफ था. यदि यह बड़े बलिदान की घटना नहीं होती तो शायद बहुत से गुरुद्वारों का प्रबंधन उदासी और अन्य सम्रदायों के अधीन होता. इस घटना के बाद ही एसजीपीसी गठन और विस्तार को राह दर्शाई. 

अपनी स्थापना का इस साल शताब्दी जश्न मना रहीं एसजीपीसी संस्था की सुदृढ़ शुरुआत ने तत्कालीन संयुक्त पंजाब में राजनीतिक पार्टी के रूप में अकाली दल का गठन प्रोत्साहित किया. पश्च्यात में शिरोमणि अकाली दल रौशनी में आया. पहले एसजीपीसी का गठन हुआ था यह इतिहास हैं. आज यह भी इतिहास हैं की राजनीतिक पार्टी शिरोमणि दल की संप्रभुता में एसजीपीसी संस्था काम कर रहीं हैं. आज की एसजीपीसी में यह मादा भी नहीं कि सरकार के अधीन हो चलें धार्मिक संस्थाओं को सरकार से मुक्त करवाएं. श्री हजूर साहिब की धार्मिक संस्था महाराष्ट्र सरकार के अधीन हैं. इस विषय में एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल की राजनीति किस निचलेस्तर पर पहूंच गईं हैं. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की नवनियुक्त प्रधान बीबी जगीरकौर साका ननकाणा साहिब की घटना को लेकर केंद्र सरकार पर आरोप - प्रत्यारोप कर रहीं हैं, बीबी जगीर कौर महाराष्ट्र सरकार की नीति पर भी कुछ बोले ना ! भाई गोबिंदसिंघ लोंगोवाल बहुत वायदे कर मुकर गए. अब बीबी जगीरकौर क्या कदम उठाएंगी?  क्या वे साका ननकाना साहिब की शताब्दीपूर्ति के अवसर पर कोई प्रेरणा लेगी ? 




गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

 'हिन्दू - सिख' पाटने की राजनीति कारगर !!

दिल्ली की सीमा पर आज भी डटें हैं किसान आंदोलनकारी 

भारत सरकार द्वारा पारित नव कृषि कानून को लेकर दो से अढ़ाई माह से देश की राजधानी दिल्ली की सीमा को घेरकर किसान संघठन और किसान आंदोलन को हाँक रहें हैं. तारीख 26-11-2020 को आंदोलन का प्रारंभ हुआ था. शुरुआत से लेकर आज तारीख तक सरकार और किसान संघटनों के बीच दस से अधिक बार बैठकें हो चूकी हैं लेकिन कोई समाधान निष्कर्ष तक पहूंच नहीं पाया. सरकार की तटस्थ भूमिका और किसानों के दृढ़ इरादे के कारण यह आंदोलन अनेक बाधाओं से गुजरा हैं. अभी यात्रा जारी है. 

इस आंदोलन की बहुत सी विशेष बातें हैं. जिनमें एक बात यह भी है कि, किसान आंदोलन ने बहुत से नये नेता पैदा कर दिये. राकेश टिकेट, योगेंद्र यादव जैसे नेता ज़मीन से उठकर आसमान पर छप रहें हैं. वहीं आंदोलन से जुड़े, सभी सक्रिय सिख नेता उपेक्षित बैठें दिखाई दें रहें हैं. ना वें आंदोलन छोड़कर घर लौट सकते हैं ना आक्रामक भूमिका स्वीकार कर सकते हैं. जाहीर हैं कि समस्त सिख कौम राजनीति का शिकार हो गई हैं. सन 1984 के बाद सिखों को जो नकारात्मक विशेषण मिले थे उससे भी तीखें और असहनीय विशेषण इस आंदोलन ने सिखों को दिये. सिखों को अपनी पुरानी छवि को धोने में तीन दशकों से अधिक का समां बीता था. समस्त विश्व में सिखों को जब सेवाभावी कौम, जमात या समूह के रूप में पुकारा जा रहा हैं, मसीहा कहा जा रहा, ऐसे समय में सिखों को अपराधी छविवाली कौम बताकर सोशल मीडिया पर प्रचारित करने वाले कौन हैं?  

संसद में रेकॉर्ड में लाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां सिखों की कुर्बानियां गिनवाती हैं. लेकिन उनकी पार्टी के सोशल मीडिया सेल द्वारा सिख विरोधी पोस्ट और टिपण्णियों को रोकने का आदेश नहीं दिया जाता हैं. यह राजनीति केवल हिन्दू और सिखों को पाटने, डराने और मजबूर करने की अनैतिक राजनीति को अंजाम दिया जा रहा हैं. इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता अब भाजपा और अन्य हिंदुत्ववादी संघटनों को सिखों की जरुरत नहीं रह गई हैं. जब कभी बलिदान की जरुरत होगी तब याद कर लिया जायेगा. 

जो लोग इस समय ऐसी पार्टियों और संघटनों में सक्रिय अथवा निष्क्रिय बैठें हैं क्या वें कोई भूमिका अपनाएंगे ? उन्हें यह कैसे गवारा कर रहा हैं कि अपने धर्म, पंथ और धर्मानुयायीओं को अपमानित होता चुपचाप देखा जाएं. बड़े - बुजुर्ग मानते हैं कि, कोई पार्टी धर्म से बड़ी नहीं, कोई संघठन पंथ से बड़ा नहीं. लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा सभी तथ्यों को दरकिनार कर धर्म का लाभ राजनीतिक पार्टियों को दिलाने में अग्रसर हैं. इसलिए किसान आंदोलन को सफल होने में दीर्घ संघर्ष करना पड़ रहा हैं. आगे इस आंदोलन का जो भी हश्र हो लेकिन इस समय जो सिखों के प्रति जो दरार खींची दिखाई दे रहीं हैं वो दुर्भाग्यपूर्ण है. 

रविंदरसिंघ मोदी 





मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

 

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के गुरुद्वारा दर्शन का स्वागत होना चाहिए!

रविंदरसिंह मोदी 

(प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी गुरुद्वारा श्री रकाबगंज साहिब में मत्था टेकते हुए)

सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी के शहीदी गुरुपूरब के अवसर पर भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र जी मोदी ने दिल्ली स्थित गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब पहुंचकर दर्शन लिए. यह घटना सिख जगत के लिए एक तरह से सकारात्मक है और उसके दीर्घ परिणाम भी सामने आएंगे. कुछ लोग इस घटना को किसान आंदोलन से जोड़कर देख रहे हैं. राजनीतिक समीक्षक, पत्रकार, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर सकारात्मक और नकारात्मक विचार जारी है. इस विषय को लेकर एक राजनीतिक दृष्टिकोण से मंथन जारी है. यदि कोई और समय होता तो शायद इस विषय की चर्चा इतनी नहीं होती जैसे कि अब हो रही है. यह पहला मौका नहीं है कि, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी किसी गुरुपूरब को लेकर गुरुद्वारा पहुंचे हैं. अति विशेष मौकों पर और गुरपुरब के अवसर पर श्री नरेंद्र जी मोदी अक्सर धार्मिक स्थलों की यात्राएं करते आए हैं. एक तरह से यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि धार्मिक स्थलों को भेट देना जैसे मंदिर, गुरुद्वारे आदि यह उनके स्वभाव में शामिल है. 

(प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी रुमाला भेंट करते हुए)

लेकिन गुरुद्वारा श्री रकाबगंज साहिब दर्शन की घटना को विवाद में खींचा जा रहा है. जो लोग इस घटना को लेकर अपना विरोध प्रकट कर रहें क्या वें स्पष्ट कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री को गुरुद्वारा दर्शन के लिए जाना नहीं चाहिए था? किसान आंदोलन की पृष्ठ्भूमी पर उभरे मतभेद के कारण हम यह यात्रा का मूल्यांकन नहीं कर सकते.  देश की वर्तमान परिस्थिति में जारी किसान आंदोलन पर नजर डाली जाए तो यह विषय हर किसी के लिए नाजुक समय चल रहा है जबकि केंद्र सरकार और किसानों के बीच एक टकराव जारी है. इस टकराव में कहीं ना कहीं किसानों के आंदोलन से जुड़े सिख समुदाय और सिख राजनीतिक समय की चक्की के दो पाटों में पीसे चले जा रहे हैं. ऐसे समय श्री नरेंद्र मोदी गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब पहुंचे है और उन्होंने प्रार्थना की है तो एक श्रद्धालु और प्रधानमंत्री के तौर पर यह उनका प्रथम अधिकार है. इस विषय को राजनीति से अधिक जोड़ा जाए तो सिख समाज को पाटे जाने से कोई नहीं रोक सकता. प्रधानमंत्री मोदी की गुरुद्वारा यात्रा का स्वागत होना चाहिए था. विधायक मनजिंदरसिंघ सिरसा को भी प्रधानमंत्री के प्रोटोकॉल के तहत उस समय गुरुद्वारा श्री रकाबगंज साहिब में उपस्थित रहना चाहिए था. अभी दो तीन माह पूर्व तक तो वें मोदी जी और भाजपा की तारीफ में कशीदे पढ़ते देखें जा रहें थे. अब क्या हो गया?  

https://youtu.be/1ldGtzGRh6Y

मोदी जी विदेशों में अपनी यात्राओं के दौरान वहाँ के गुरुद्वारों में मत्था टेकने गये थे. उस समय सभी ने उन्हें निष्पक्ष नेता और सिख धर्म का करीबी नेता कहकर छवि जारी की थीं. करतारपुर कॉरिडोर के समय भी मोदी जी की सराहना सभी ने की थीं और नवज्योतसिंघ सिद्धू की अधिक आलोचना की जारी थीं. लेकिन आज प्रधानमंत्री की गुरुद्वारा भेट को राजनीतिक दृष्टिकोण के पैमाने में नापना कहाँ तक जायज हैं?  

(प्रधानमंत्री साधसंगत से मुलाक़ात करते हुए)

देश में जारी किसान आंदोलन को सिख पंथ बड़ा समर्थन दिया हैं और यह समर्थन जारी हैं. देश में बहुत से लोग आज भी किसानों के लिए अच्छी सोंच रखते हैं. वो भावनाएं महत्वपूर्ण है. आंदोलन अनिश्चित है और संभव है कि किसान आंदोलन में प्रस्तुत मांगें सरकार किसी अर्थ में स्वीकार कर सकती है. यह विषय अलग हैं. श्री गुरु तेगबहादुर जी के शहीदी गुरपूरब का अपना अलग महत्त्व हैं. जिस स्थान पर नवम गुरु जी की शहीदी हुईं उस दिल्ली में रहकर भी प्रधानमंत्री गुरपूरब के समय वहाँ नहीं पहुँचते तो शायद सिखों के लिए वो घटना बहुत नकारात्मक साबित होती थीं. लेकिन प्रधानमंत्री ने घटना की अहमियत को जाना और गुरुद्वारा में उपस्थित होकर मत्था टिकाते हुए अरदास की. उन्होंने रुमाला भी चढ़ाया. सिख श्रद्धालुओं के साथ सेल्फी भी खिंचवाई. उन्होंने गुरुद्वारा में कोई राजनीतिक रौब का प्रदर्शन नहीं किया और ना ही कोई राजनीतिक भाष्य ही किया कि जिससे विवाद खड़ा हो सकें. ऐसे समय सिख पंथ को चाहिए कि वें, प्रधानमंत्री जी की गुरुद्वारा भेट को राजनीतिक मुद्दा ना बनने दें. देश के सर्वोच्च नेतृत्व के साथ धार्मिक क्षेत्र में सौजन्य बनाकर रखना समय की प्राथमिकता मानी जानी चाहिए. गुरुपूरब को लेकर कोई बाहरी व्यक्ति कितनी ही राजनीति कर ले, लेकिन हम सिख होने के नाते किसी को गुरुद्वारा आने से नहीं रोक सकते. 


 गुरुद्वारा बोर्ड का नया नोटिफिकेशन हो सकता है जारी 

नये सदस्यों की भर्ती को तवज्जो?

कलम ग्यारह को लेकर संस्पेंस बरकरार !

महाराष्ट्र सरकार के राजस्व मंत्रालय अंतर्गत गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड नांदेड़ संस्था का नया नोटिफिकेशन कभी भी जारी हो सकता है. हजूर साहिब ही नहीं पंजाब और चंडीगढ़ में भी नए नोटिफिकेशन को लेकर उत्सुकता कायम है. वहीं नये नामो में बीबी जगीर के नाम को सम्मिलित करने के भी प्रयास जारी है. हजूर साहिब के सचखंड हजूरी खालसा दीवान के चार नए नामों का नाम को भी नए नोटिफिकेशन में शामिल किया जायेगा. लेकिन बहुचर्चित और साधसंगत की मांगों में सबसे प्रबल मांग कलम ग्यारह के संशोधन और सुधार को लेकर संस्पेंस बना हुआ है. 

कहा जा रहा है कि, शिरोमणि अकाली दल के नेताओं द्वारा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे की हालिया मुलाक़ात के बाद गुरुद्वारा बोर्ड कानून 1956 के प्रस्तावित कानून में मूल सुधार और संशोधन पर फिलहाल रोक लगाई गई है. चर्चा है की, नए नोटिफिकेशन में केवल गुरुद्वारा बोर्ड के रिक्त पदों पर भर्ती की जायेगी. गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के महाराष्ट्र सरकार द्वारा नियुक्त वर्तमान प्रधान स. भूपिंदरसिंघ मनहास इस बात को लेकर पूरा जोर लगाएं हुए है कि सरकार उन्हें बोर्ड पर प्रधान पद पर कायम रखते हुए नया नोटिफिकेशन जारी करें. 

शिरोमणि अकाली दल के नेता भी महाराष्ट्र सरकार के सामने इस मांग को लेकर याचना करते देखें जा रहें हैं. नांदेड़ के नेताओं की गहरी चुप्पी भी बदलते राजनीतिक समीकरणों का चित्र स्पष्ट कर रहीं हैं. जिसे देखकर लग रहा हैं कि गुरुद्वारा बोर्ड पर संभवतः अकाली दल के प्रभाव की सत्ता जारी रहेगी. वर्तमान बोर्ड  तीन सालों (ता. 31-12-2021) तक चलाने की योजना पर सभी की छुपी सहमति तो नहीं यह भी प्रश्न उठ रहा हैं. अब नए नोटिफिकेशन की प्रतीक्षा रहेगी. 

रविंदरसिंघ मोदी 


शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

 गुरु तेगबहादुरजी का बलिदान प्रेरणास्रोत हैं !

आगामी 400 वां प्रकाशपर्व सुअवसर 

सिख पंथ के नवम गुरु, श्री तेगबहादुर जी किन कारणों से हुईं और किन हालातों में हुईं यह एक महान इतिहास हैं. बार - बार यह वर्णन होता आया हैं कि, कश्मीरी पंडितों का हिन्दू धर्म अबाधित रखने हेतु गुरु तेगबहादुर जी ने दिल्ली में शहीदी स्वीकार की थीं. गुरूजी के इस महान बलिदान से कश्मीरी पंडितों का धर्म अबाधित रहा और देश में यह उदाहरण प्रसिद्ध हो गया कि सिख धर्म गुरु द्वारा हिन्दू धर्म बचाने की खातिर अपने आपको कुर्बान कर दिया. बावजूद इसके सिख पंथ की ओर देखने हेतु तत्कालीन हिन्दू समुदाय को सकारात्मक दृष्टि नहीं मिल पाई. क्योंकि तत्काल में मोगल साम्राज्य बहुत प्रभावशाली, ताकतवर और क्रूर भी था. इस कारण कोई अन्य धर्म सिख धर्म की सराहना, सहायता के लिए अग्रसर नहीं हुआ होगा. उस समय हिन्दू धर्म अलग - अलग राज्यों और संस्थानों में बिखरा हुआ था. असंगठित हालातों के चलते भी गुरु तेगबहादुरजी के महान बलिदान की महानता प्रचारित नहीं हो पाई कहा जाए तो गलत नहीं होगा. पश्च्यात में गुरु तेगबहादुर जी के बलिदान की गाथा लिखने के लिए भी देश के इतिहासकार आगे नहीं आये. श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज ने इस गाथा को बाणी और साहित्यकारों के माध्यम से प्रचारित किया. खालसा पंथ की स्थापना के समय इस बलिदान गाथा को बहुत बल मिला. गुरु तेगबहादुर जी द्वारा किये गए धर्म संघठन के कार्यों से जुड़े लोग उस समय गुरु गोबिंदसिंघ जी से आकर मिले और अपना सहकार्य अर्पण किया. पश्च्यात लेखक और इतिहासकार भी बलिदान की दिशा में सकारात्मक लिखने लगे. दो से तीन स्क शताब्दियों के प्रचार के बावजूद भी आज देश के अधिकत्तर हिन्दू गुरु तेगबहादुर जी के बलिदान से अनभिज्ञ हैं कहा जाए तो गलत नहीं होगा. आज के दौर में प्रचार प्रसार का सबसे बड़ा तंत्र इंटरनेट और शोशल मीडिया उपलब्ध हैं. जिसकी सहायता से सकारात्मक प्रचार प्रसारित हो सकता हैं. आज विश्व के अनेक देशों में सिख हैं. उनके जरिये भी नवम गुरु के जीवन और बलिदान की गाथा को अमर किया जा सकता हैं. गुरूजी का चतुर्थ शताब्दी प्रकाशपर्व एप्रिल 2021 (ता. 12) को मनाया जायेगा. इस कार्यक्रम को लेकर प्रत्येक सिख की यह जिम्मेदारी बनती हैं कि वो गुरु तेगबहादुर के बलिदान की घटना को प्रचारित करें. यदि एक सिख द्वारा वर्ष भर में अन्य धर्म के दस लोगों तक भी गुरु तेगबहादुर जी की गाथा पहुंचाई गई तो उसका असर सिख धर्म को देखने की दृष्टि पर सकारात्मक छाप छोड़ेगा. इसलिए भी सिख धर्म को चार सौ वें प्रकाशपर्व को लेकर गंभीरता अपनानी होगी. सबसे पहले तो इस गाथा को शोशल मीडिया पर प्रचारित करने के लिए एक सामूहिक नीति को अपनाना होगा. इसलिए आनेवाले समय में इस विषय में को लेकर हमें नीति निर्धारण करना बेहद जरुरी हो जाता है. हमारे सिख धर्म के सामने सबसे बड़ी प्रेरणा के रूप गुरु तेगबहादुर जी का बलिदान है. आने वाले चार सौ सालाना प्रकाशपर्व को लेकर एक सोच और एक राय से कार्य किया जाए यहीं प्रार्थना हैं. 

रविंदरसिंघ मोदी



गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

 संत रामसिंघजी सिंगड़ा की आहुति !

(संत रामसिंघ जी सिंगड़ा, जिन्होंने किसान आंदोलन में आत्महत्या का मार्ग अपनाया)

किसान आंदोलन यज्ञ में करनाल, हयाना के संत रामसिंघजी  की आत्मा और देह आहुति के रूप में भेंट चढ़ गई. 'संत सिंगड़ा' के नाम से सुपरचित संत रामसिंघजी ने बुधवार, ता. 16-12-20 को सिंधु बॉर्डर पर आंदोलन के चलते ही कनपट्टी पर गोली मारकर आत्महत्या कर ली. इस समाचार से किसान आंदोलन में ही नहीं संपूर्ण देश में शोकसंवेदना प्रसारित हो उठीं. संत रामसिंघ जी ने जिसने भी यह खबर पढ़ीं या सुनी वो संवेदना से भर गया. लेकिन केंद्र सरकार के कान पर ज्यूं तक ना रेंगी. इससे पर्व भी धरने में शामिल एक किसान की मौत हो चूकी लेकिन उसकी मौत का कारण फूड पाइजन बताया जा रहा है. 

खैर ! सरकार ने संत रामसिंघजी की आत्महत्या को गंभीरता से नहीं लिया यह सत्य हैं. उक्त संबंध में कोई अफ़सोस भी व्यक्त नहीं हुआ. ये कृषकों का एक तरह से अपमान कहा जाना चाहिए. बाईस दिनों से सड़क पर आंदोलन की दुनिया स्थापित किये हुए अलग अलग राज्यों के किसानों ने वैसे एक इतिहास रच दिया. आंदोलन में सबकुछ हो रहा था, कमी थीं शहादत की तो संत रामसिंघ जी के रूप में वो भी पूर्ण हो गई. सरकार के मुखिया को अब तो चुप्पी तोड़नी ही पड़ेगी. इस आंदोलन ने अभी तक तीन से चार जानें ले ली हैं. आगे यह आंदोलन और भी तीव्र होने के आसार लग रहें हैं. 

अब जब सर्वोच्च न्यायलय ने भी किसानों के पक्ष को लेकर सरकार से आग्रह किया हैं कि बातचीत से समस्या को सुलझाने हेतु तुरंत कमेटी का गठन किया जाए. अब सरकार को किसानों के साथ बातचीत कर उनके सुझाव स्वीकार कर उन पर चिंतन करना चाहिए. 

रविंदरसिंह मोदी 

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मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

 सिखों पर टिप्पणियां करनेवालों पर अपराध दर्ज 

चंद्रपुर में अपराध दर्ज, एक गिरफ्तार !

रविंदरसिंह मोदी

(चंद्रपुर जिले के सिख पुलिस में शिकायत प्रस्तुत करते हुए)

चंद्रपुर निवासी सिखों की शिकायत के आधार पर पुलिस ने व्हाट्सअप ग्रुप में सिखों और किसानों के विरुद्ध अभद्र भाषा में टिप्पणियां कर रहें तत्वों के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया. चंद्रपुर निवासी स. जसबीरसिंघ सैनी और स्थानीय सिख समाज ने ता. 14-12-20 की देर शाम पुलिस थाना में सोशल मीडिया पर अपप्रचार को बढ़ावा दें रहें तत्वों के खिलाफ करवाई की मांग की थीं. पुलिस द्वारा एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया जबकि एक फरार बताया जा रहा है. पुलिस द्वारा व्हाट्सअप ग्रुप "उजाला" और वी. आई. पी. इन दोनों ग्रूपों को संचालित कर रहें एडमिन बलराम डोडानी के भी करवाई की जा रहीं है. 

शिकायतकर्ता जसबीरसिंघ सैनी ने आरोप लगाया है कि, देश में चल रहें किसान आंदोलन के चलते उपर्युक्त व्हाट्सप्प ग्रुप्स में सिखों के खिलाफ और किसानों के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा में दुष्प्रचार किया जा रहा. उनके प्रति अपशब्द और राष्ट्र विरोधी होने का प्रचार चलाया जा रहा है. पप्पू मल्लन, प्रदीप भीमनवाढ, अरविन्द सोनी, बजरंगसिंह और बलराम डोडानी आदि के खिलाफ करवाई करने की मांग की गई हैं. पुलिस द्वारा आई. पी. सी. की धारा 505(2) के तहत धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देने आदि आरोपों के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. 

(स. जसबीरसिंघ सैनी और चंद्रपुर की साधसंगत)

चंद्रपुर के सिख समाज ने कानूनी करवाई का सराहनीय कदम उठाया हैं. इस समय किसान आंदोलन की आड़ में सिखों को टारगेट किया जा रहा हैं. तरह तरह के वीडियो जारी कर खालिस्तानवाद के मुद्दे को ऊँचा कर देशभर के सिखों को उससे जोड़ने का एक तरह का षड्यंत्र किया जा रहा हैं. कुछ संघटनों से जुड़े कुछ सिख भी इस समय विषय को बगल देने के प्रयास में वीडियो और पोस्ट जारी किये जा रहें हैं. जब तक किसान आंदोलन किसी नतीजे पर नहीं पहुँचता तब तक सिखों को पोस्ट जारी नहीं करने चाहिए. किसी अन्य समाज या पार्टी की भूमिका को लेकर भी अभी से भूमिका तय नहीं होना चाहिए. यह आंदोलन इस समय नाजुक मोड़ पर हैं. बहुत सी बातें शोशल मीडिया पर नहीं होनी चाहिए. आंदोलन को समर्थन देना अलग है बात है और सिखों की बदनामी का विषय अलग है. यह भेद जानकर अगली दिशा तय करने की आवश्यकता है. 

यह भी आश्चर्यकारक चित्र हैं कि, पिछले समय में व्हाट्सप्प ग्रुप्स द्वारा बेकार के मुद्दों पर अपने स्वयं को "शेर" की उपमा देकर प्रसिद्धि प्राप्त कुछ राजनीतिक प्रवृत्ती की आकृतियाँ अब वर्तमान समय की राजनीतिक परिस्थितियों पर दोगली भूमिका में प्रस्तुत करते देखें जा रहें हैं. पार्टी में बनें रहने की मजबूरियों के तहत वें आज एक राजनीतिक पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं द्वारा सिखों पर की जा रहीं देशविरोधी, धर्मविरोधी  टिप्पणियों को देख और सुनकर भी खामोशी अपनाये दिखाई दें रहें हैं. क्या वें अपनी पार्टी के पास इस परिस्थिति के संबंध में शिकायत नहीं करेंगे?  क्या वें इस विषय को लेकर पुलिस के पास मामला प्रस्तुत नहीं करेंगे? सिखों के वोट मांगनेवाले अब सिखों की हो रहीं बदनामी को देखकर भी खामोश हैं. महाराष्ट्र के देशभक्त सिखों की प्रतिमा इस समय उज्वल होने की दृष्टि से कोई प्रयास करता दिखाई नहीं पड़ रहा हैं. महाराष्ट्र के सिख केवल किसान आंदोलन का समर्थन कर रहें हैं यह विषय आज मीडिया और सरकार के सामने स्पष्ट होना चाहिए. यह ऐसा समय है कि सिख नौजवानों को चाहिए कि शोशल मीडिया के पोस्ट से खिन्न होकर जवाब देने की बजाए पुलिस की सहायता लेनी चाहिए. 

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रविवार, 13 दिसंबर 2020

 महाराष्ट्र सरकार का दो दिवसीय शीतकालीन अधिवेशन सोमवार से 

गुरुद्वारा कानून संशोधन पर सस्पेंस!

रविंदरसिंह मोदी 


महाराष्ट्र सरकार विधानमंडल का दो दिवसीय शीतकालीन अधिवेशन सोमवार, ता. 14-12-20 से प्रारंभ हो रहा है. यह अधिवेशन मुंबई में ही होगा. अधिवेशन को लेकर सरकार पक्ष उत्साह में दिखाई पड़ रहा है. दूसरी ओर विपक्ष अधिवेशन की अवधि को लेकर नाराजी प्रकट कर रहीं है. अपनी नाराजी प्रकट करने के लिए विपक्ष द्वारा सरकार द्वारा आयोजित चायपान कार्यक्रम का आज बहिष्कार किया गया. यह अधिवेशन मात्र दो दिनों का होने के कारण इसमें राजस्व मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत होनेवाले ता. 14-12-20 के दिन प्रस्तुत होनेवाले प्रस्तावों की सूची में कहीं भी "दी सिख गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री अबचलनगर साहिब बोर्ड" कानून 1956 के संशोधन का विषय दिखाई नहीं पड़ रहा है. इसलिए इस बात का संदेह उत्पन्न हो रहा है कि कहीं गुरुद्वारा बोर्ड कानून 1956 के अंतर्गत कलम ग्यारह के पिछले संशोधन रद्द करने का विषय प्रस्तुत होगा अथवा नहीं. या सरकार की पूर्व मंशा के मुताबिक कानून में आवश्यक ऐसा संशोधन होगा कि नहीं? यह भी सुनने में आ रहा है कि शायद गुरुद्वारा बोर्ड कानून संशोधन का विषय अगले अधिवेशन तक प्रलंबित रखा जायेगा. अभी हाल ही में शिरोमणि अकाली दल के नेता स. प्रेमसिंघ चंदूमाजरा ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे से भेट कर गुरुद्वारा कानून में बदलाव नहीं किया जाए ऐसी मांग की थी. जिससे यह संदेह और बढ़ गया है. हजूर साहिब के स्थानीय नेता या विशेष कर स्थानीय सिख नेताओं का आलस्य भी साफ नजर आ रहा है. कहना ना होगा कि मुंबईया फील्डिंग बढ़िया जमाई गई थी. महाराष्ट्र सरकार के दो नॉमिनेशन में से एक सीट पर भूपिंदरसिंह मनहास प्रधान के रूप में कार्यरत है वहीं दूसरी सीट खाली है. पूर्व विधायक सरदार तारासिंह के निधन से यह सीट रिक्त हुईं है. इसके अतिरिक्त सिख सांसद के दो स्थान रिक्त हैं. इस तरह से इन तीनों सीटों पर सदस्य के तौर पर नियुक्ति पाने के लिए फिलहाल घमासान मचा हुआ है. मुंबई से नौ लोग प्रयत्नशील है. जबकि नांदेड़ से उन्नीस, पुणे से तीन, औरंगाबाद से पांच, परभणी से दो, नागपुर से दो, अमरावती से एक ऐसे चालीस से ज्यादा इच्छुक अपना जोरआजमाइश कर रहें हैं. शिवसेना, कांग्रेस, राष्ट्रवादी कॉंग्रेस सहित अन्य छोटी पार्टियां भी अपने कार्यकर्ताओं को नियुक्त करने के लिए प्रयत्नशील है. आगामी 31 दिसंबर तक रिक्त पदों पर नियुक्तिया संभव लग रहीं है. यदि कलम ग्यारह का पिछला संशोधन रद्द होता है तो तीन रिक्त पदों और एक मध्यप्रदेश की सीट पर चार नियुक्तियां संभव है. एसजीपीसी के अन्य तीन सदस्यों में से एक सीट पर परिवर्तन होने के आसार है. यदि कानून संशोधन होता हो तो निश्चित ही सब कुछ परिवर्तन हो जायेगा. सचखंड हजूरी खालसा दीवान की चार नियुक्तियां भी इसी अंतर्गत प्रस्तुत हो जायेगी. अगले दो सप्ताह में स्थिति स्पष्ट हो जायेगी. 


 बीबी जगीरकौर की सोंच कितनी सही, कितनी गलत! 

रविंदरसिंह मोदी 

(तखत श्री केशगढ़ साहिब, आनंदपुर साहिब में बयान जारी करते हुए बीबी जगीरकौर और एसजीपीसी के पदाधिकारी)

दैनिक दी ट्रिब्यून (अंग्रेजी) की एक ख़बर यदि सही है तो निश्चित ही सिख जगत की छवि को दाँव पर धरने वाली वो ख़बर साबित होगी. ट्रिब्यून ऑनलाइन समाचार में कहा गया है कि श्री आनंदपुर साहिब में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की नई प्रधान बीबी जगीरकौर ने पत्रकारों के सामने यह स्पष्ट किया कि, एसजीपीसी द्वारा आगामी अप्रैल माह में आयोजित होनेवाले गुरु श्री तेगबहादुर जी प्रकाशपर्व चार सौ सालाना शताब्दि कार्यक्रम का न्यौता प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को नहीं भेजा जायेगा ! 

यह समाचार पढ़कर और सुनकर हर कोई आवाक हुए बगैर नहीं रह सकता. बीबी जगीर कौर का यह वक्तव्य भले ही वर्तमान में चल रहें किसान आंदोलन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर जारी किया गया होगा. लेकिन उनका यह वक्तव्य सिख जगत की छवि पर प्रतिकूल असर डाल सकता है. बीबी जागीर कौर के इस वक्तव्य पर पंजाब में कोई हंगामा नहीं बरपा बल्कि स्तब्धता छा गई. उक्त विषय पर शिरोमणि अकाली दल के नेतागण भी चुप्पी साधे दिखाई दे रहें हैं. यानि बीबी जगीरकौर द्वारा की गई जल्दबाजी का शिरोमणि अकाली दल द्वारा समर्थन नहीं किया गया. लेकिन यह विषय इसलिए भी गंभीर लग रहा है कि बीबी जगीरकौर शिरोमणि अकाली दल कोर कमेटी की सदस्या भी है. उनका वक्तव्य भारतीय जनता पार्टी द्वारा गंभीरता से लिया जायेगा इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता. कहना ना होगा कि यह विषय 2022 में पंजाब में होनेवाले विधानसभा चुनावों के समय भी गहरा असर कर सकता है. 

बीबी जागीरकौर सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था का नेतृत्व कर रहीं है. उन्हें चाहिए कि, सिख पंथ की छवि को नुकसान पहुंचाएं, ऐसे वक्तव्य जारी ना करें. गुरु श्री तेगबहादुर जी का चार सौ सालाना प्रकाशपर्व केवल शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का निजी कार्यक्रम नहीं हैं बल्कि समस्त सिख जगत का कार्यक्रम हैं. गुरु तेगबहादुर जी का बलिदान "तिलक, जंझू राखा" यानि हिन्दू धर्म रक्षार्थ हुआ था. गुरूजी का आगामी प्रकाशपर्व सिख धर्म और अन्य धर्मों को एकत्र लाने का बढ़िया अवसर साबित होगा. यदि ऐसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम को लेकर अभी से नकारात्मक वक्तव्य जारी करना उस चतुर्थ शताब्दि को प्रभावित करना होगा. निश्चित ही अन्य राजनीतिक दल बीबी जागीरकौर के वक्तव्य को सिख पंत की राजनीतिक भूमिका मानकर चलेंगे. 

जैसे कि देश में इस समय वातावरण गर्म हैं. राजधानी दिल्ली को किसान आंदोलनकारियों ने चारों छोरों से घेरा हुआ है. किसान आंदोलन में पंजाब के भी कृषक बड़ी संख्या में सक्रिय भूमिका निभा रहें हैं. इन किसानों में सिख भी बड़ी संख्या में शामिल हैं. बीबी जागीरकौर द्वारा उन सिखों और किसानों को आकर्षित करने की दृष्टि से यह वक्तव्य जारी किया हो लेकिन इस समय तो यह गलत प्रतीत हो रहा हैं. देश के प्रधानमंत्री को कार्यक्रम का न्यौता नहीं दिया जाना एक गलत कदम साबित हो सकता हैं. इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में तो सभी राजनीतिक नेताओं और पार्टियों को न्यौता दिया जाना चाहिए. यह कार्यक्रम सिख पंत और समाज संघठन की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर सकता है. यदि शिरोमणि अकाली दल द्वारा बीबी जगीरकौर की इस सोंच का समर्थन किया जाता है तो सिख पंथ का इससे बड़ा दुर्भाग्य कोई और नहीं होगा. 

(आप भी अपनी राय भेज सकते हैं. )


बुधवार, 9 दिसंबर 2020

 अब "भाजपाई सिखों" को क्या करना चाहिए? 

हम आतंकवादी नहीं हैं 'माई बाप"!

रविंदरसिंह मोदी 

दिल्ली में चल रहें किसान आंदोलन में भारतीय जनता पार्टी का सिख विरोधी चेहरा सामने आ गया. भाजपा ने किसान आंदोलन में शामिल लाखों सिखों की एक ही पहचान प्रस्तुत की और वह पहचान "सिख आतंकवादी" धारणा के रूप में प्रस्तुत हुई या की गईं हैं. इससे पूर्व भी कुछ पार्टियों ने सिखों के लिए "खलिस्तानी", "आतंकवादी", "दहशतवादी" जैसे शब्दों का प्रयोग किया था. लेकिन देश उन संबोधनों को भूल चुका था. दूसरे यह कि उस दौर में सत्ता संघर्ष कर रहीं भाजपा "आतंकवादी" विषय पर अन्य राजनीतिक पार्टियों को कोसकर सिखों की सहानुभूति प्राप्त करती थीं. तब सिखों को लगता था कि यह हमारे विचारों की पार्टी हैं. इस कारण सिख भाजपा की ओर प्रभावित हुए. लेकिन भाजपा की वर्तमान सोंच ने सभी सिखों को हताश, निराश और अलग थलग कर रख दिया हैं.

(नांदेड़ की रैली में सिख अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करते हुए)

इस सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने किसान आंदोलन को विभाजित करने की राजनीति के तहत सिख कौम पर ही निशाना साध दिया. यदि सिख आतंकवादी होते तो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली सहित कई प्रदेशों में सभी सिख जेल में होते. यदि सिख आतंकवादी हैं तो पिछले छह वर्षों से भाजपा और सरकार मौन क्यों रहीं?  अब शिरोमणि अकाली दल के एनडीए से अलग होते ही सिख आतंकवादी लगने लगें? क्या भाजपा में कार्यरत सभी पदाधिकारी और कार्यकर्ता से सर्टिफिकट लिया गया हैं कि वो आतंकवादी नहीं हैं? भाजपा का शोशल मीडिया जिस तरह से खालिस्तान और आतंकवादी शब्दों का प्रयोग कर हैं वो देश में सिख पंथ की छवि ख़राब कर रहा हैं. 

(नांदेड़ में सिखों ने केवल किसानों के आंदोलन को समर्थन दिया)

उन राजनीतिक सिख कार्यकर्ताओं की हालत तो देखिएगा, आज जब कौम को आतंकवाद के पलड़े में तोला जा रहा हैं तो वो कुछ करने की हालात में भी नहीं हैं. राजनीतिक विवशता हैं! आज के समय में तो पार्टी ही "माईबाप" हैं. पार्टी ही भविष्य हैं और व्यवसाय भी. सबकुछ पार्टी ही है. वो भी ऐसी पार्टी जिसकी केंद्र में सत्ता हैं. जो पार्टी दावा कर रहीं हैं कि "2029" तक देश में उनकी ही सत्ता चलेगी. सत्ता से दूर कौन रहना चाहेगा. आज कुछ लोग आरएसएस को दोष दे रहें, कोस रहें. आरएसएस से अधिक गलती सिखों की हैं, क्योंकि उनका राजनीतिक स्वार्थ उन्हें खींच कर भाजपा में ले गया हैं. राजनीतिक कार्यकर्ताओं की अपनी विवशता हैं. आनेवाले बीस साल तक भी भाजपा के सच्चे कार्यकर्ता अपने नेताओं की ही बोली बोलेंगे, मन में भी रखेंगे कि, सिख आतंकवादी हैं ! 

(दिल्ली की सीमा पर विगत चौदह दिनों से धरना दे रहें किसान कार्यकर्ता सरकार द्वारा किये गए सम्बोधन से हैरान हो उठें हैं)

पहली बात तो यह कि भाजपा को सिखों की जरुरत ही क्या हैं. सिखों का अर्थ उनके लिए तो रक्षक से अधिक "अंगरक्षक" जैसा उपयुक्त प्रतीत होता हैं. चलो एक समय हमारे गुरुओं ने हिन्दू धर्म की रक्षा खातिर बलिदान दिया होगा. लेकिन इन सब विषय की जरुरत पांच साल में एक बार या दूसरी जाति या पार्टी से लड़वाने के लिए ही पडती हैं. सिखों को प्रभावित करने के लिए इतिहास के कुछ प्रसंग जीवित कर दिए जाते हैं और वोट बटोर लिए जाते हैं. सिख कार्यकर्ता पार्टी के लिए लड़ने, मारने और मरने के लिए भी तैयार रहता हैं. लेकिन हश्र क्या होता हैं ! महानगर पालिका के टिकट के लिए भी उन्हें प्राथमिकता नहीं मिलती. क्या किसी सिख को महाराष्ट्र में कभी एमएलसी मिल सकती हैं ? शायद आर. एस. एस. से जुड़ा कोई नागपुर या मुंबई का सिख पात्र ठहराया जा सकता हैं पर सिख होने की कसौटी पर चयन नामुमकिन होगा. किसी महानगर पालिका में कॉप मेंबर नहीं बनाया गया यहां ! इसका अर्थ तो यहीं हुआ कि सिखों की ही राजनीतिक मजबूरी हैं. 

मेरा प्रश्न यह है कि, भाजपा, महाराष्ट्र में सिखों को किस अर्थ से परिभाषित कर रहीं हैं. क्या यहां के सिख भी....?  फिर यहां वफादारी से भाजपा के लिए राजनीतिक माथापच्ची कर पार्टी के हर कदम को श्रेष्ठ दिखाने के लिए व्याकुल पदाधिकारी, कार्यकर्ता कौन हैं. क्या उन्होंने भाजपा में प्रवेश करते समय "राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र" पेश किया था?  दूसरी पार्टियों से आयात हुए भी क्या प्रमाणित हैं? सही तो यह है कि, भाजपा को अब पार्टी के भीतर काम कर रहें सिखों के विषय में भी "जाँचपड़ताल" कर लेनी चाहिए कि वें राष्ट्रभक्त ही हैं और खलिस्तानी नहीं हैं. 

(नांदेड़ में आयोजित धरना आंदोलन का दृश्य)

अभी दो दिन पूर्व ही नांदेड़ में बड़ी संख्या में हजूरी साधसंगत द्वारा रैली निकालकर किसान आंदोलन को समर्थन दिया गया. इस आंदोलन में कुछ भाजपा के पदाधिकारी दिखाई दिए अब उनके लिए भाजपा नेतृत्व क्या सोंच बनाए बैठेंगा कुछ कहा नहीं जा सकता. लेकिन जो भाजपा पदाधिकारी किसान आंदोलन के समर्थन वाले इस रैली और धरना कार्यक्रम से दूर रहकर लाइव देख रहें थे उनकी क्या भावनाएं थीं? जो भी हो मकसद केवल सिख कौम को आहत करना मात्र था. अब सिख नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्त्ता ही जानें की उनकी निष्ठा कहाँ हैं? हम यह स्पष्ट कर रहें कि हजूर साहिब के सिख ना आतंकवादी थे ना हैं. हम महाराष्ट्र में है और हमें यहीं रहना है. अंत में भाजपा के शीर्ष नेताओं को भी चाहिए कि वें "खलिस्तानी" और "आतंकवादी" जैसे शब्दों का प्रयोग ना करें. कल वोट मांगने तो सभी के पास आना हैं ! 






 


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