मेरी ब्लॉग सूची

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

 अब "भाजपाई सिखों" को क्या करना चाहिए? 

हम आतंकवादी नहीं हैं 'माई बाप"!

रविंदरसिंह मोदी 

दिल्ली में चल रहें किसान आंदोलन में भारतीय जनता पार्टी का सिख विरोधी चेहरा सामने आ गया. भाजपा ने किसान आंदोलन में शामिल लाखों सिखों की एक ही पहचान प्रस्तुत की और वह पहचान "सिख आतंकवादी" धारणा के रूप में प्रस्तुत हुई या की गईं हैं. इससे पूर्व भी कुछ पार्टियों ने सिखों के लिए "खलिस्तानी", "आतंकवादी", "दहशतवादी" जैसे शब्दों का प्रयोग किया था. लेकिन देश उन संबोधनों को भूल चुका था. दूसरे यह कि उस दौर में सत्ता संघर्ष कर रहीं भाजपा "आतंकवादी" विषय पर अन्य राजनीतिक पार्टियों को कोसकर सिखों की सहानुभूति प्राप्त करती थीं. तब सिखों को लगता था कि यह हमारे विचारों की पार्टी हैं. इस कारण सिख भाजपा की ओर प्रभावित हुए. लेकिन भाजपा की वर्तमान सोंच ने सभी सिखों को हताश, निराश और अलग थलग कर रख दिया हैं.

(नांदेड़ की रैली में सिख अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करते हुए)

इस सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने किसान आंदोलन को विभाजित करने की राजनीति के तहत सिख कौम पर ही निशाना साध दिया. यदि सिख आतंकवादी होते तो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली सहित कई प्रदेशों में सभी सिख जेल में होते. यदि सिख आतंकवादी हैं तो पिछले छह वर्षों से भाजपा और सरकार मौन क्यों रहीं?  अब शिरोमणि अकाली दल के एनडीए से अलग होते ही सिख आतंकवादी लगने लगें? क्या भाजपा में कार्यरत सभी पदाधिकारी और कार्यकर्ता से सर्टिफिकट लिया गया हैं कि वो आतंकवादी नहीं हैं? भाजपा का शोशल मीडिया जिस तरह से खालिस्तान और आतंकवादी शब्दों का प्रयोग कर हैं वो देश में सिख पंथ की छवि ख़राब कर रहा हैं. 

(नांदेड़ में सिखों ने केवल किसानों के आंदोलन को समर्थन दिया)

उन राजनीतिक सिख कार्यकर्ताओं की हालत तो देखिएगा, आज जब कौम को आतंकवाद के पलड़े में तोला जा रहा हैं तो वो कुछ करने की हालात में भी नहीं हैं. राजनीतिक विवशता हैं! आज के समय में तो पार्टी ही "माईबाप" हैं. पार्टी ही भविष्य हैं और व्यवसाय भी. सबकुछ पार्टी ही है. वो भी ऐसी पार्टी जिसकी केंद्र में सत्ता हैं. जो पार्टी दावा कर रहीं हैं कि "2029" तक देश में उनकी ही सत्ता चलेगी. सत्ता से दूर कौन रहना चाहेगा. आज कुछ लोग आरएसएस को दोष दे रहें, कोस रहें. आरएसएस से अधिक गलती सिखों की हैं, क्योंकि उनका राजनीतिक स्वार्थ उन्हें खींच कर भाजपा में ले गया हैं. राजनीतिक कार्यकर्ताओं की अपनी विवशता हैं. आनेवाले बीस साल तक भी भाजपा के सच्चे कार्यकर्ता अपने नेताओं की ही बोली बोलेंगे, मन में भी रखेंगे कि, सिख आतंकवादी हैं ! 

(दिल्ली की सीमा पर विगत चौदह दिनों से धरना दे रहें किसान कार्यकर्ता सरकार द्वारा किये गए सम्बोधन से हैरान हो उठें हैं)

पहली बात तो यह कि भाजपा को सिखों की जरुरत ही क्या हैं. सिखों का अर्थ उनके लिए तो रक्षक से अधिक "अंगरक्षक" जैसा उपयुक्त प्रतीत होता हैं. चलो एक समय हमारे गुरुओं ने हिन्दू धर्म की रक्षा खातिर बलिदान दिया होगा. लेकिन इन सब विषय की जरुरत पांच साल में एक बार या दूसरी जाति या पार्टी से लड़वाने के लिए ही पडती हैं. सिखों को प्रभावित करने के लिए इतिहास के कुछ प्रसंग जीवित कर दिए जाते हैं और वोट बटोर लिए जाते हैं. सिख कार्यकर्ता पार्टी के लिए लड़ने, मारने और मरने के लिए भी तैयार रहता हैं. लेकिन हश्र क्या होता हैं ! महानगर पालिका के टिकट के लिए भी उन्हें प्राथमिकता नहीं मिलती. क्या किसी सिख को महाराष्ट्र में कभी एमएलसी मिल सकती हैं ? शायद आर. एस. एस. से जुड़ा कोई नागपुर या मुंबई का सिख पात्र ठहराया जा सकता हैं पर सिख होने की कसौटी पर चयन नामुमकिन होगा. किसी महानगर पालिका में कॉप मेंबर नहीं बनाया गया यहां ! इसका अर्थ तो यहीं हुआ कि सिखों की ही राजनीतिक मजबूरी हैं. 

मेरा प्रश्न यह है कि, भाजपा, महाराष्ट्र में सिखों को किस अर्थ से परिभाषित कर रहीं हैं. क्या यहां के सिख भी....?  फिर यहां वफादारी से भाजपा के लिए राजनीतिक माथापच्ची कर पार्टी के हर कदम को श्रेष्ठ दिखाने के लिए व्याकुल पदाधिकारी, कार्यकर्ता कौन हैं. क्या उन्होंने भाजपा में प्रवेश करते समय "राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र" पेश किया था?  दूसरी पार्टियों से आयात हुए भी क्या प्रमाणित हैं? सही तो यह है कि, भाजपा को अब पार्टी के भीतर काम कर रहें सिखों के विषय में भी "जाँचपड़ताल" कर लेनी चाहिए कि वें राष्ट्रभक्त ही हैं और खलिस्तानी नहीं हैं. 

(नांदेड़ में आयोजित धरना आंदोलन का दृश्य)

अभी दो दिन पूर्व ही नांदेड़ में बड़ी संख्या में हजूरी साधसंगत द्वारा रैली निकालकर किसान आंदोलन को समर्थन दिया गया. इस आंदोलन में कुछ भाजपा के पदाधिकारी दिखाई दिए अब उनके लिए भाजपा नेतृत्व क्या सोंच बनाए बैठेंगा कुछ कहा नहीं जा सकता. लेकिन जो भाजपा पदाधिकारी किसान आंदोलन के समर्थन वाले इस रैली और धरना कार्यक्रम से दूर रहकर लाइव देख रहें थे उनकी क्या भावनाएं थीं? जो भी हो मकसद केवल सिख कौम को आहत करना मात्र था. अब सिख नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्त्ता ही जानें की उनकी निष्ठा कहाँ हैं? हम यह स्पष्ट कर रहें कि हजूर साहिब के सिख ना आतंकवादी थे ना हैं. हम महाराष्ट्र में है और हमें यहीं रहना है. अंत में भाजपा के शीर्ष नेताओं को भी चाहिए कि वें "खलिस्तानी" और "आतंकवादी" जैसे शब्दों का प्रयोग ना करें. कल वोट मांगने तो सभी के पास आना हैं ! 






 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

  होली हल्ला महल्ला यात्रा मार्ग की दुरुस्ती करें : मनबीरसिंघ ग्रंथी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार समूह) के युथ प्रदेश सचिव स. मनबीर...