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गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

 'हिन्दू - सिख' पाटने की राजनीति कारगर !!

दिल्ली की सीमा पर आज भी डटें हैं किसान आंदोलनकारी 

भारत सरकार द्वारा पारित नव कृषि कानून को लेकर दो से अढ़ाई माह से देश की राजधानी दिल्ली की सीमा को घेरकर किसान संघठन और किसान आंदोलन को हाँक रहें हैं. तारीख 26-11-2020 को आंदोलन का प्रारंभ हुआ था. शुरुआत से लेकर आज तारीख तक सरकार और किसान संघटनों के बीच दस से अधिक बार बैठकें हो चूकी हैं लेकिन कोई समाधान निष्कर्ष तक पहूंच नहीं पाया. सरकार की तटस्थ भूमिका और किसानों के दृढ़ इरादे के कारण यह आंदोलन अनेक बाधाओं से गुजरा हैं. अभी यात्रा जारी है. 

इस आंदोलन की बहुत सी विशेष बातें हैं. जिनमें एक बात यह भी है कि, किसान आंदोलन ने बहुत से नये नेता पैदा कर दिये. राकेश टिकेट, योगेंद्र यादव जैसे नेता ज़मीन से उठकर आसमान पर छप रहें हैं. वहीं आंदोलन से जुड़े, सभी सक्रिय सिख नेता उपेक्षित बैठें दिखाई दें रहें हैं. ना वें आंदोलन छोड़कर घर लौट सकते हैं ना आक्रामक भूमिका स्वीकार कर सकते हैं. जाहीर हैं कि समस्त सिख कौम राजनीति का शिकार हो गई हैं. सन 1984 के बाद सिखों को जो नकारात्मक विशेषण मिले थे उससे भी तीखें और असहनीय विशेषण इस आंदोलन ने सिखों को दिये. सिखों को अपनी पुरानी छवि को धोने में तीन दशकों से अधिक का समां बीता था. समस्त विश्व में सिखों को जब सेवाभावी कौम, जमात या समूह के रूप में पुकारा जा रहा हैं, मसीहा कहा जा रहा, ऐसे समय में सिखों को अपराधी छविवाली कौम बताकर सोशल मीडिया पर प्रचारित करने वाले कौन हैं?  

संसद में रेकॉर्ड में लाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां सिखों की कुर्बानियां गिनवाती हैं. लेकिन उनकी पार्टी के सोशल मीडिया सेल द्वारा सिख विरोधी पोस्ट और टिपण्णियों को रोकने का आदेश नहीं दिया जाता हैं. यह राजनीति केवल हिन्दू और सिखों को पाटने, डराने और मजबूर करने की अनैतिक राजनीति को अंजाम दिया जा रहा हैं. इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता अब भाजपा और अन्य हिंदुत्ववादी संघटनों को सिखों की जरुरत नहीं रह गई हैं. जब कभी बलिदान की जरुरत होगी तब याद कर लिया जायेगा. 

जो लोग इस समय ऐसी पार्टियों और संघटनों में सक्रिय अथवा निष्क्रिय बैठें हैं क्या वें कोई भूमिका अपनाएंगे ? उन्हें यह कैसे गवारा कर रहा हैं कि अपने धर्म, पंथ और धर्मानुयायीओं को अपमानित होता चुपचाप देखा जाएं. बड़े - बुजुर्ग मानते हैं कि, कोई पार्टी धर्म से बड़ी नहीं, कोई संघठन पंथ से बड़ा नहीं. लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा सभी तथ्यों को दरकिनार कर धर्म का लाभ राजनीतिक पार्टियों को दिलाने में अग्रसर हैं. इसलिए किसान आंदोलन को सफल होने में दीर्घ संघर्ष करना पड़ रहा हैं. आगे इस आंदोलन का जो भी हश्र हो लेकिन इस समय जो सिखों के प्रति जो दरार खींची दिखाई दे रहीं हैं वो दुर्भाग्यपूर्ण है. 

रविंदरसिंघ मोदी 





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