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शनिवार, 17 अप्रैल 2021

अमरीका में सिखों पर फिर नस्ली हमला ? 

चार सिखों सहित आठ की मौत !

हमलावर युवक ने खुद को गोली मारी !

रविंदरसिंघ मोदी

(अमरीका : इस स्थान पर हुईं गोलीबारी)

अमेरिका में ता. 16 अप्रैल की रात इंडियानापॉलीस FedEx facility में एक 20 वर्षीय अमरीका निवासी युवक द्वारा की गई अंधाधुन्द गोलीबारी की घटना में आठ लोगों की मौत हो गई जिनमें चार सिखों का समावेश हैं. अन्य कुछ लोग घायल हैं जिन्हें उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया हैं. इस घटना से अमेरिका के सिखों में रोष का वातावरण बन गया हैं. वहीं विश्वभर से इस घटना की निंदा की जा रहीं हैं. इसे सिखों के खिलाफ नस्ली हमलें के रूप में भी देखा जा रहा हैं. 

( Indianapolis FedEx कार्यालय )

प्राप्त जानकारी के मुताबिक इंडियानापॉलीस FedEx facility इस उद्योग समूह को एक सिख परिवार द्वारा संचालित किया जाता था. बड़ी संख्या में वहाँ कर्मचारी काम करते हैं. उस स्थान पर ब्रैंडेड होल नामक युवक कार्यरत था. जिसे वर्ष 2020 में ही किसी कारणवश काम से हटा दिया था. उस युवक ने ता. 16 अप्रैल की रात लगभग 11 बजे (भारतीय समय) उद्योगसमूह परिसर में प्रवेश कर अचानक से गन से गोलीबारी शुरू कर दी. 

हमलावर  : ब्रैंडेड होल (20 वर्ष)

गोलीबारी में स्थान पर ही आठ लोगों की मौत हो गई. जिनमें अमरजीत सिंघ जोहल (66), जसविंदर कौर जोहल (64), जसविंदरसिंघ (68), अमरजीतसिंघ सेखों (48),  मैथिव आर. अलेक्जेंडर (32), सामरिया ब्लॉक (19), कार्ली स्मिथ (19), जॉन वेशरत (74) का समावेश हैं. इस घटना को अंजाम देने के बाद इस बीस वर्षीय हमलावर ने घटनास्थल पर ही खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली. बहरहाल इस घटना से अमरीका में सिखों के असुरक्षित होने का विषय चर्चा में ला दिया हैं. जनवरी 2021 के बाद यह दूसरी घटना हैं जब सिखों पर इस तरह से नस्ली हमले को अंजाम दिया गया है. तीन - चार साल पहले विस्कॉन्सिन गुरुद्वारा में घटी घटना अभी भी स्मरण में हैं. 

मारनेवाले सभी भारतीय हैं जो व्यवसाय के लिए वहाँ रह रहे थे. बताया जाता है कि इस स्थान पर बड़ी संख्या में सिख कार्यरत हैं. घटना के बारह घंटे गुजर जाने पर भी भारत सरकार द्वारा अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया. 

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रविवार, 21 फ़रवरी 2021

 श्री गुरु तेगबहादुर जी के 400 सालाना प्रकाशपर्व को लेकर की गईं मांग !!






शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

 साका श्री ननकाणा साहिब की शताब्दी पर केंद्र सरकार की राजनीति !

क्या बीबी जगीर कौर कोई प्रेरणा लेगी ? 

हजूरसाहिब बोर्ड कब मुक्त करवाएंगे!

रविंदरसिंघ मोदी

(साका श्री ननकाणा साहिब - 20-02-1921)

पाकिस्तान स्थित श्री ननकाणा साहिब में घटित "शहीदी साका" या सिख नरसंहार की घटना को ता. 20 फरवरी के दिन एक सौ साल पूर्ण हो रहें हैं. सौ वर्ष पूर्व तत्कालीन हिन्दू महंत नरैणदास ने कत्त्लेआम करवाकर 260 से ज्यादा सिखों को शहीद करवा दिया था जिनमें महिला और बच्चों का भी समावेश था. उपरोक्त घटना के बाद ही श्री गुरु नानक देव जी की जन्मस्थली श्री ननकाणा साहिब और अन्य ऐतहासिक गुरुद्वारों को तत्कालीन अंग्रेज प्रशासन ने सिखों को सौंपा था. 

शहीदी साका श्री ननकाणा साहिब की पहली शताब्दी का आयोजन पाकिस्तान स्थित शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा आयोजित किया गया हैं. इस कार्यक्रम में शामिल होने का न्यौता मिला तब लगभग आठ हजार श्रद्धालु सिखों ने पाकिस्तान यात्रा की अनुमति के लिए सरकार के पास आवेदन दिया. लेकिन केंद्र सरकार द्वारा सिख श्रद्धालुओं को अनुमति नकार दीं गईं. जिससे इस शहीदी साका कार्यक्रम में अब भारतीय सिख शामिल नहीं हो पा रहें हैं. दुर्भाग्य हैं कि अब सरकार निर्धारण कर रहीं हैं कि सिख कौनसे कार्यक्रम में शामिल हो और कौनसे कार्यक्रम में शामिल ना हो. 


केंद्र सरकार की इस राज-नीति पर अब पंजाब के सभी राजनीतिक दल खुलकर बोल रहें हैं. भारतीय जनता पार्टी के मित्र दल भी अब केंद्र की नीतियों की आलोचना करते देखें जा रहें हैं. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी भी रोष जता रहीं हैं. अभी हाल ही में एसजीपीसी कार्यालय के सामने धरना दें रहें सिखों पर लाठियां बरसाएं जानें की घटना से शर्मसार हुईं एसजीपीसी संस्था के लिए सिखों का रोष दूर करने के लिए साका ननकाणा साहिब का कार्यक्रम मददगार साबित हो सकता था. लेकिन केंद्र सरकार ने ऐसी राजनीतिक चाल चलीं कि बादल साहब मात खा गए. 

केंद्र सरकार नहीं चाहती थीं कि हिन्दूं के खिलाफ मनाये जाने वाले इस कार्यक्रम में सिख शामिल हो. इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार की कुछ और भी सोंच हो सकती हैं. सुरक्षा का कारण पाकिस्तान सरकार को देना चाहिए था लेकिन केंद्र सरकार स्वयं कारण प्रस्तुत कर रहीं हैं. जबकि करतारपुर कॉरिडोर का श्रेय अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया के सामने लेना था तब बड़ी संख्या में सिखों को ननकाणा साहिब जाने की अनुमति बहाल की गईं थीं. 


शहीदी साका श्री ननकाणा साहिब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर संस्था के इतिहास में सबसे बड़ा मील का पत्थर हैं यदि इसे ठीक तरह से सोचा जाएं. इस शहीदी साका की घटना के बाद ही सही मायने में एसजीपीसी संस्था के गठन को आधिकारिक बल और स्वायत्ता प्राप्त हुईं. पूर्व में गुरुद्वारों के एकछत्र केन्द्रीकरण के लिए शुरू एसजीपीसी के प्रयासों को 'अकाली लहर' का संबोधन दिया जा रहा था. 

शहीदी साका की घटना के बाद अकाली लहर को मजबूती प्राप्त हुईं. ननकाणा साहिब में हुए सिख विरोधी नरसंहार में 260 से ज्यादा सिखों को मौत के घाट उतारा गया था. सिख नेताओं को पेड़ से बांधकर जिन्दा जला दिया गया. लाशों के टुकड़े कर ईंटों की भट्टी में जलाया गया था. यह आंदोलन गुरुद्वारों पर किये गए अवैध अधिग्रहण (कब्ज़ा) के खिलाफ था. यदि यह बड़े बलिदान की घटना नहीं होती तो शायद बहुत से गुरुद्वारों का प्रबंधन उदासी और अन्य सम्रदायों के अधीन होता. इस घटना के बाद ही एसजीपीसी गठन और विस्तार को राह दर्शाई. 

अपनी स्थापना का इस साल शताब्दी जश्न मना रहीं एसजीपीसी संस्था की सुदृढ़ शुरुआत ने तत्कालीन संयुक्त पंजाब में राजनीतिक पार्टी के रूप में अकाली दल का गठन प्रोत्साहित किया. पश्च्यात में शिरोमणि अकाली दल रौशनी में आया. पहले एसजीपीसी का गठन हुआ था यह इतिहास हैं. आज यह भी इतिहास हैं की राजनीतिक पार्टी शिरोमणि दल की संप्रभुता में एसजीपीसी संस्था काम कर रहीं हैं. आज की एसजीपीसी में यह मादा भी नहीं कि सरकार के अधीन हो चलें धार्मिक संस्थाओं को सरकार से मुक्त करवाएं. श्री हजूर साहिब की धार्मिक संस्था महाराष्ट्र सरकार के अधीन हैं. इस विषय में एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल की राजनीति किस निचलेस्तर पर पहूंच गईं हैं. शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की नवनियुक्त प्रधान बीबी जगीरकौर साका ननकाणा साहिब की घटना को लेकर केंद्र सरकार पर आरोप - प्रत्यारोप कर रहीं हैं, बीबी जगीर कौर महाराष्ट्र सरकार की नीति पर भी कुछ बोले ना ! भाई गोबिंदसिंघ लोंगोवाल बहुत वायदे कर मुकर गए. अब बीबी जगीरकौर क्या कदम उठाएंगी?  क्या वे साका ननकाना साहिब की शताब्दीपूर्ति के अवसर पर कोई प्रेरणा लेगी ? 




गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

 'हिन्दू - सिख' पाटने की राजनीति कारगर !!

दिल्ली की सीमा पर आज भी डटें हैं किसान आंदोलनकारी 

भारत सरकार द्वारा पारित नव कृषि कानून को लेकर दो से अढ़ाई माह से देश की राजधानी दिल्ली की सीमा को घेरकर किसान संघठन और किसान आंदोलन को हाँक रहें हैं. तारीख 26-11-2020 को आंदोलन का प्रारंभ हुआ था. शुरुआत से लेकर आज तारीख तक सरकार और किसान संघटनों के बीच दस से अधिक बार बैठकें हो चूकी हैं लेकिन कोई समाधान निष्कर्ष तक पहूंच नहीं पाया. सरकार की तटस्थ भूमिका और किसानों के दृढ़ इरादे के कारण यह आंदोलन अनेक बाधाओं से गुजरा हैं. अभी यात्रा जारी है. 

इस आंदोलन की बहुत सी विशेष बातें हैं. जिनमें एक बात यह भी है कि, किसान आंदोलन ने बहुत से नये नेता पैदा कर दिये. राकेश टिकेट, योगेंद्र यादव जैसे नेता ज़मीन से उठकर आसमान पर छप रहें हैं. वहीं आंदोलन से जुड़े, सभी सक्रिय सिख नेता उपेक्षित बैठें दिखाई दें रहें हैं. ना वें आंदोलन छोड़कर घर लौट सकते हैं ना आक्रामक भूमिका स्वीकार कर सकते हैं. जाहीर हैं कि समस्त सिख कौम राजनीति का शिकार हो गई हैं. सन 1984 के बाद सिखों को जो नकारात्मक विशेषण मिले थे उससे भी तीखें और असहनीय विशेषण इस आंदोलन ने सिखों को दिये. सिखों को अपनी पुरानी छवि को धोने में तीन दशकों से अधिक का समां बीता था. समस्त विश्व में सिखों को जब सेवाभावी कौम, जमात या समूह के रूप में पुकारा जा रहा हैं, मसीहा कहा जा रहा, ऐसे समय में सिखों को अपराधी छविवाली कौम बताकर सोशल मीडिया पर प्रचारित करने वाले कौन हैं?  

संसद में रेकॉर्ड में लाने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां सिखों की कुर्बानियां गिनवाती हैं. लेकिन उनकी पार्टी के सोशल मीडिया सेल द्वारा सिख विरोधी पोस्ट और टिपण्णियों को रोकने का आदेश नहीं दिया जाता हैं. यह राजनीति केवल हिन्दू और सिखों को पाटने, डराने और मजबूर करने की अनैतिक राजनीति को अंजाम दिया जा रहा हैं. इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता अब भाजपा और अन्य हिंदुत्ववादी संघटनों को सिखों की जरुरत नहीं रह गई हैं. जब कभी बलिदान की जरुरत होगी तब याद कर लिया जायेगा. 

जो लोग इस समय ऐसी पार्टियों और संघटनों में सक्रिय अथवा निष्क्रिय बैठें हैं क्या वें कोई भूमिका अपनाएंगे ? उन्हें यह कैसे गवारा कर रहा हैं कि अपने धर्म, पंथ और धर्मानुयायीओं को अपमानित होता चुपचाप देखा जाएं. बड़े - बुजुर्ग मानते हैं कि, कोई पार्टी धर्म से बड़ी नहीं, कोई संघठन पंथ से बड़ा नहीं. लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा सभी तथ्यों को दरकिनार कर धर्म का लाभ राजनीतिक पार्टियों को दिलाने में अग्रसर हैं. इसलिए किसान आंदोलन को सफल होने में दीर्घ संघर्ष करना पड़ रहा हैं. आगे इस आंदोलन का जो भी हश्र हो लेकिन इस समय जो सिखों के प्रति जो दरार खींची दिखाई दे रहीं हैं वो दुर्भाग्यपूर्ण है. 

रविंदरसिंघ मोदी 





मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

 

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के गुरुद्वारा दर्शन का स्वागत होना चाहिए!

रविंदरसिंह मोदी 

(प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी गुरुद्वारा श्री रकाबगंज साहिब में मत्था टेकते हुए)

सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी के शहीदी गुरुपूरब के अवसर पर भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र जी मोदी ने दिल्ली स्थित गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब पहुंचकर दर्शन लिए. यह घटना सिख जगत के लिए एक तरह से सकारात्मक है और उसके दीर्घ परिणाम भी सामने आएंगे. कुछ लोग इस घटना को किसान आंदोलन से जोड़कर देख रहे हैं. राजनीतिक समीक्षक, पत्रकार, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर सकारात्मक और नकारात्मक विचार जारी है. इस विषय को लेकर एक राजनीतिक दृष्टिकोण से मंथन जारी है. यदि कोई और समय होता तो शायद इस विषय की चर्चा इतनी नहीं होती जैसे कि अब हो रही है. यह पहला मौका नहीं है कि, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी किसी गुरुपूरब को लेकर गुरुद्वारा पहुंचे हैं. अति विशेष मौकों पर और गुरपुरब के अवसर पर श्री नरेंद्र जी मोदी अक्सर धार्मिक स्थलों की यात्राएं करते आए हैं. एक तरह से यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि धार्मिक स्थलों को भेट देना जैसे मंदिर, गुरुद्वारे आदि यह उनके स्वभाव में शामिल है. 

(प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी रुमाला भेंट करते हुए)

लेकिन गुरुद्वारा श्री रकाबगंज साहिब दर्शन की घटना को विवाद में खींचा जा रहा है. जो लोग इस घटना को लेकर अपना विरोध प्रकट कर रहें क्या वें स्पष्ट कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री को गुरुद्वारा दर्शन के लिए जाना नहीं चाहिए था? किसान आंदोलन की पृष्ठ्भूमी पर उभरे मतभेद के कारण हम यह यात्रा का मूल्यांकन नहीं कर सकते.  देश की वर्तमान परिस्थिति में जारी किसान आंदोलन पर नजर डाली जाए तो यह विषय हर किसी के लिए नाजुक समय चल रहा है जबकि केंद्र सरकार और किसानों के बीच एक टकराव जारी है. इस टकराव में कहीं ना कहीं किसानों के आंदोलन से जुड़े सिख समुदाय और सिख राजनीतिक समय की चक्की के दो पाटों में पीसे चले जा रहे हैं. ऐसे समय श्री नरेंद्र मोदी गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब पहुंचे है और उन्होंने प्रार्थना की है तो एक श्रद्धालु और प्रधानमंत्री के तौर पर यह उनका प्रथम अधिकार है. इस विषय को राजनीति से अधिक जोड़ा जाए तो सिख समाज को पाटे जाने से कोई नहीं रोक सकता. प्रधानमंत्री मोदी की गुरुद्वारा यात्रा का स्वागत होना चाहिए था. विधायक मनजिंदरसिंघ सिरसा को भी प्रधानमंत्री के प्रोटोकॉल के तहत उस समय गुरुद्वारा श्री रकाबगंज साहिब में उपस्थित रहना चाहिए था. अभी दो तीन माह पूर्व तक तो वें मोदी जी और भाजपा की तारीफ में कशीदे पढ़ते देखें जा रहें थे. अब क्या हो गया?  

https://youtu.be/1ldGtzGRh6Y

मोदी जी विदेशों में अपनी यात्राओं के दौरान वहाँ के गुरुद्वारों में मत्था टेकने गये थे. उस समय सभी ने उन्हें निष्पक्ष नेता और सिख धर्म का करीबी नेता कहकर छवि जारी की थीं. करतारपुर कॉरिडोर के समय भी मोदी जी की सराहना सभी ने की थीं और नवज्योतसिंघ सिद्धू की अधिक आलोचना की जारी थीं. लेकिन आज प्रधानमंत्री की गुरुद्वारा भेट को राजनीतिक दृष्टिकोण के पैमाने में नापना कहाँ तक जायज हैं?  

(प्रधानमंत्री साधसंगत से मुलाक़ात करते हुए)

देश में जारी किसान आंदोलन को सिख पंथ बड़ा समर्थन दिया हैं और यह समर्थन जारी हैं. देश में बहुत से लोग आज भी किसानों के लिए अच्छी सोंच रखते हैं. वो भावनाएं महत्वपूर्ण है. आंदोलन अनिश्चित है और संभव है कि किसान आंदोलन में प्रस्तुत मांगें सरकार किसी अर्थ में स्वीकार कर सकती है. यह विषय अलग हैं. श्री गुरु तेगबहादुर जी के शहीदी गुरपूरब का अपना अलग महत्त्व हैं. जिस स्थान पर नवम गुरु जी की शहीदी हुईं उस दिल्ली में रहकर भी प्रधानमंत्री गुरपूरब के समय वहाँ नहीं पहुँचते तो शायद सिखों के लिए वो घटना बहुत नकारात्मक साबित होती थीं. लेकिन प्रधानमंत्री ने घटना की अहमियत को जाना और गुरुद्वारा में उपस्थित होकर मत्था टिकाते हुए अरदास की. उन्होंने रुमाला भी चढ़ाया. सिख श्रद्धालुओं के साथ सेल्फी भी खिंचवाई. उन्होंने गुरुद्वारा में कोई राजनीतिक रौब का प्रदर्शन नहीं किया और ना ही कोई राजनीतिक भाष्य ही किया कि जिससे विवाद खड़ा हो सकें. ऐसे समय सिख पंथ को चाहिए कि वें, प्रधानमंत्री जी की गुरुद्वारा भेट को राजनीतिक मुद्दा ना बनने दें. देश के सर्वोच्च नेतृत्व के साथ धार्मिक क्षेत्र में सौजन्य बनाकर रखना समय की प्राथमिकता मानी जानी चाहिए. गुरुपूरब को लेकर कोई बाहरी व्यक्ति कितनी ही राजनीति कर ले, लेकिन हम सिख होने के नाते किसी को गुरुद्वारा आने से नहीं रोक सकते. 


 गुरुद्वारा बोर्ड का नया नोटिफिकेशन हो सकता है जारी 

नये सदस्यों की भर्ती को तवज्जो?

कलम ग्यारह को लेकर संस्पेंस बरकरार !

महाराष्ट्र सरकार के राजस्व मंत्रालय अंतर्गत गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड नांदेड़ संस्था का नया नोटिफिकेशन कभी भी जारी हो सकता है. हजूर साहिब ही नहीं पंजाब और चंडीगढ़ में भी नए नोटिफिकेशन को लेकर उत्सुकता कायम है. वहीं नये नामो में बीबी जगीर के नाम को सम्मिलित करने के भी प्रयास जारी है. हजूर साहिब के सचखंड हजूरी खालसा दीवान के चार नए नामों का नाम को भी नए नोटिफिकेशन में शामिल किया जायेगा. लेकिन बहुचर्चित और साधसंगत की मांगों में सबसे प्रबल मांग कलम ग्यारह के संशोधन और सुधार को लेकर संस्पेंस बना हुआ है. 

कहा जा रहा है कि, शिरोमणि अकाली दल के नेताओं द्वारा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे की हालिया मुलाक़ात के बाद गुरुद्वारा बोर्ड कानून 1956 के प्रस्तावित कानून में मूल सुधार और संशोधन पर फिलहाल रोक लगाई गई है. चर्चा है की, नए नोटिफिकेशन में केवल गुरुद्वारा बोर्ड के रिक्त पदों पर भर्ती की जायेगी. गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के महाराष्ट्र सरकार द्वारा नियुक्त वर्तमान प्रधान स. भूपिंदरसिंघ मनहास इस बात को लेकर पूरा जोर लगाएं हुए है कि सरकार उन्हें बोर्ड पर प्रधान पद पर कायम रखते हुए नया नोटिफिकेशन जारी करें. 

शिरोमणि अकाली दल के नेता भी महाराष्ट्र सरकार के सामने इस मांग को लेकर याचना करते देखें जा रहें हैं. नांदेड़ के नेताओं की गहरी चुप्पी भी बदलते राजनीतिक समीकरणों का चित्र स्पष्ट कर रहीं हैं. जिसे देखकर लग रहा हैं कि गुरुद्वारा बोर्ड पर संभवतः अकाली दल के प्रभाव की सत्ता जारी रहेगी. वर्तमान बोर्ड  तीन सालों (ता. 31-12-2021) तक चलाने की योजना पर सभी की छुपी सहमति तो नहीं यह भी प्रश्न उठ रहा हैं. अब नए नोटिफिकेशन की प्रतीक्षा रहेगी. 

रविंदरसिंघ मोदी 


शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

 गुरु तेगबहादुरजी का बलिदान प्रेरणास्रोत हैं !

आगामी 400 वां प्रकाशपर्व सुअवसर 

सिख पंथ के नवम गुरु, श्री तेगबहादुर जी किन कारणों से हुईं और किन हालातों में हुईं यह एक महान इतिहास हैं. बार - बार यह वर्णन होता आया हैं कि, कश्मीरी पंडितों का हिन्दू धर्म अबाधित रखने हेतु गुरु तेगबहादुर जी ने दिल्ली में शहीदी स्वीकार की थीं. गुरूजी के इस महान बलिदान से कश्मीरी पंडितों का धर्म अबाधित रहा और देश में यह उदाहरण प्रसिद्ध हो गया कि सिख धर्म गुरु द्वारा हिन्दू धर्म बचाने की खातिर अपने आपको कुर्बान कर दिया. बावजूद इसके सिख पंथ की ओर देखने हेतु तत्कालीन हिन्दू समुदाय को सकारात्मक दृष्टि नहीं मिल पाई. क्योंकि तत्काल में मोगल साम्राज्य बहुत प्रभावशाली, ताकतवर और क्रूर भी था. इस कारण कोई अन्य धर्म सिख धर्म की सराहना, सहायता के लिए अग्रसर नहीं हुआ होगा. उस समय हिन्दू धर्म अलग - अलग राज्यों और संस्थानों में बिखरा हुआ था. असंगठित हालातों के चलते भी गुरु तेगबहादुरजी के महान बलिदान की महानता प्रचारित नहीं हो पाई कहा जाए तो गलत नहीं होगा. पश्च्यात में गुरु तेगबहादुर जी के बलिदान की गाथा लिखने के लिए भी देश के इतिहासकार आगे नहीं आये. श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज ने इस गाथा को बाणी और साहित्यकारों के माध्यम से प्रचारित किया. खालसा पंथ की स्थापना के समय इस बलिदान गाथा को बहुत बल मिला. गुरु तेगबहादुर जी द्वारा किये गए धर्म संघठन के कार्यों से जुड़े लोग उस समय गुरु गोबिंदसिंघ जी से आकर मिले और अपना सहकार्य अर्पण किया. पश्च्यात लेखक और इतिहासकार भी बलिदान की दिशा में सकारात्मक लिखने लगे. दो से तीन स्क शताब्दियों के प्रचार के बावजूद भी आज देश के अधिकत्तर हिन्दू गुरु तेगबहादुर जी के बलिदान से अनभिज्ञ हैं कहा जाए तो गलत नहीं होगा. आज के दौर में प्रचार प्रसार का सबसे बड़ा तंत्र इंटरनेट और शोशल मीडिया उपलब्ध हैं. जिसकी सहायता से सकारात्मक प्रचार प्रसारित हो सकता हैं. आज विश्व के अनेक देशों में सिख हैं. उनके जरिये भी नवम गुरु के जीवन और बलिदान की गाथा को अमर किया जा सकता हैं. गुरूजी का चतुर्थ शताब्दी प्रकाशपर्व एप्रिल 2021 (ता. 12) को मनाया जायेगा. इस कार्यक्रम को लेकर प्रत्येक सिख की यह जिम्मेदारी बनती हैं कि वो गुरु तेगबहादुर के बलिदान की घटना को प्रचारित करें. यदि एक सिख द्वारा वर्ष भर में अन्य धर्म के दस लोगों तक भी गुरु तेगबहादुर जी की गाथा पहुंचाई गई तो उसका असर सिख धर्म को देखने की दृष्टि पर सकारात्मक छाप छोड़ेगा. इसलिए भी सिख धर्म को चार सौ वें प्रकाशपर्व को लेकर गंभीरता अपनानी होगी. सबसे पहले तो इस गाथा को शोशल मीडिया पर प्रचारित करने के लिए एक सामूहिक नीति को अपनाना होगा. इसलिए आनेवाले समय में इस विषय में को लेकर हमें नीति निर्धारण करना बेहद जरुरी हो जाता है. हमारे सिख धर्म के सामने सबसे बड़ी प्रेरणा के रूप गुरु तेगबहादुर जी का बलिदान है. आने वाले चार सौ सालाना प्रकाशपर्व को लेकर एक सोच और एक राय से कार्य किया जाए यहीं प्रार्थना हैं. 

रविंदरसिंघ मोदी



गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

 संत रामसिंघजी सिंगड़ा की आहुति !

(संत रामसिंघ जी सिंगड़ा, जिन्होंने किसान आंदोलन में आत्महत्या का मार्ग अपनाया)

किसान आंदोलन यज्ञ में करनाल, हयाना के संत रामसिंघजी  की आत्मा और देह आहुति के रूप में भेंट चढ़ गई. 'संत सिंगड़ा' के नाम से सुपरचित संत रामसिंघजी ने बुधवार, ता. 16-12-20 को सिंधु बॉर्डर पर आंदोलन के चलते ही कनपट्टी पर गोली मारकर आत्महत्या कर ली. इस समाचार से किसान आंदोलन में ही नहीं संपूर्ण देश में शोकसंवेदना प्रसारित हो उठीं. संत रामसिंघ जी ने जिसने भी यह खबर पढ़ीं या सुनी वो संवेदना से भर गया. लेकिन केंद्र सरकार के कान पर ज्यूं तक ना रेंगी. इससे पर्व भी धरने में शामिल एक किसान की मौत हो चूकी लेकिन उसकी मौत का कारण फूड पाइजन बताया जा रहा है. 

खैर ! सरकार ने संत रामसिंघजी की आत्महत्या को गंभीरता से नहीं लिया यह सत्य हैं. उक्त संबंध में कोई अफ़सोस भी व्यक्त नहीं हुआ. ये कृषकों का एक तरह से अपमान कहा जाना चाहिए. बाईस दिनों से सड़क पर आंदोलन की दुनिया स्थापित किये हुए अलग अलग राज्यों के किसानों ने वैसे एक इतिहास रच दिया. आंदोलन में सबकुछ हो रहा था, कमी थीं शहादत की तो संत रामसिंघ जी के रूप में वो भी पूर्ण हो गई. सरकार के मुखिया को अब तो चुप्पी तोड़नी ही पड़ेगी. इस आंदोलन ने अभी तक तीन से चार जानें ले ली हैं. आगे यह आंदोलन और भी तीव्र होने के आसार लग रहें हैं. 

अब जब सर्वोच्च न्यायलय ने भी किसानों के पक्ष को लेकर सरकार से आग्रह किया हैं कि बातचीत से समस्या को सुलझाने हेतु तुरंत कमेटी का गठन किया जाए. अब सरकार को किसानों के साथ बातचीत कर उनके सुझाव स्वीकार कर उन पर चिंतन करना चाहिए. 

रविंदरसिंह मोदी 

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मंगलवार, 15 दिसंबर 2020

 सिखों पर टिप्पणियां करनेवालों पर अपराध दर्ज 

चंद्रपुर में अपराध दर्ज, एक गिरफ्तार !

रविंदरसिंह मोदी

(चंद्रपुर जिले के सिख पुलिस में शिकायत प्रस्तुत करते हुए)

चंद्रपुर निवासी सिखों की शिकायत के आधार पर पुलिस ने व्हाट्सअप ग्रुप में सिखों और किसानों के विरुद्ध अभद्र भाषा में टिप्पणियां कर रहें तत्वों के खिलाफ अपराध दर्ज कर लिया. चंद्रपुर निवासी स. जसबीरसिंघ सैनी और स्थानीय सिख समाज ने ता. 14-12-20 की देर शाम पुलिस थाना में सोशल मीडिया पर अपप्रचार को बढ़ावा दें रहें तत्वों के खिलाफ करवाई की मांग की थीं. पुलिस द्वारा एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया जबकि एक फरार बताया जा रहा है. पुलिस द्वारा व्हाट्सअप ग्रुप "उजाला" और वी. आई. पी. इन दोनों ग्रूपों को संचालित कर रहें एडमिन बलराम डोडानी के भी करवाई की जा रहीं है. 

शिकायतकर्ता जसबीरसिंघ सैनी ने आरोप लगाया है कि, देश में चल रहें किसान आंदोलन के चलते उपर्युक्त व्हाट्सप्प ग्रुप्स में सिखों के खिलाफ और किसानों के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा में दुष्प्रचार किया जा रहा. उनके प्रति अपशब्द और राष्ट्र विरोधी होने का प्रचार चलाया जा रहा है. पप्पू मल्लन, प्रदीप भीमनवाढ, अरविन्द सोनी, बजरंगसिंह और बलराम डोडानी आदि के खिलाफ करवाई करने की मांग की गई हैं. पुलिस द्वारा आई. पी. सी. की धारा 505(2) के तहत धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देने आदि आरोपों के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. 

(स. जसबीरसिंघ सैनी और चंद्रपुर की साधसंगत)

चंद्रपुर के सिख समाज ने कानूनी करवाई का सराहनीय कदम उठाया हैं. इस समय किसान आंदोलन की आड़ में सिखों को टारगेट किया जा रहा हैं. तरह तरह के वीडियो जारी कर खालिस्तानवाद के मुद्दे को ऊँचा कर देशभर के सिखों को उससे जोड़ने का एक तरह का षड्यंत्र किया जा रहा हैं. कुछ संघटनों से जुड़े कुछ सिख भी इस समय विषय को बगल देने के प्रयास में वीडियो और पोस्ट जारी किये जा रहें हैं. जब तक किसान आंदोलन किसी नतीजे पर नहीं पहुँचता तब तक सिखों को पोस्ट जारी नहीं करने चाहिए. किसी अन्य समाज या पार्टी की भूमिका को लेकर भी अभी से भूमिका तय नहीं होना चाहिए. यह आंदोलन इस समय नाजुक मोड़ पर हैं. बहुत सी बातें शोशल मीडिया पर नहीं होनी चाहिए. आंदोलन को समर्थन देना अलग है बात है और सिखों की बदनामी का विषय अलग है. यह भेद जानकर अगली दिशा तय करने की आवश्यकता है. 

यह भी आश्चर्यकारक चित्र हैं कि, पिछले समय में व्हाट्सप्प ग्रुप्स द्वारा बेकार के मुद्दों पर अपने स्वयं को "शेर" की उपमा देकर प्रसिद्धि प्राप्त कुछ राजनीतिक प्रवृत्ती की आकृतियाँ अब वर्तमान समय की राजनीतिक परिस्थितियों पर दोगली भूमिका में प्रस्तुत करते देखें जा रहें हैं. पार्टी में बनें रहने की मजबूरियों के तहत वें आज एक राजनीतिक पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं द्वारा सिखों पर की जा रहीं देशविरोधी, धर्मविरोधी  टिप्पणियों को देख और सुनकर भी खामोशी अपनाये दिखाई दें रहें हैं. क्या वें अपनी पार्टी के पास इस परिस्थिति के संबंध में शिकायत नहीं करेंगे?  क्या वें इस विषय को लेकर पुलिस के पास मामला प्रस्तुत नहीं करेंगे? सिखों के वोट मांगनेवाले अब सिखों की हो रहीं बदनामी को देखकर भी खामोश हैं. महाराष्ट्र के देशभक्त सिखों की प्रतिमा इस समय उज्वल होने की दृष्टि से कोई प्रयास करता दिखाई नहीं पड़ रहा हैं. महाराष्ट्र के सिख केवल किसान आंदोलन का समर्थन कर रहें हैं यह विषय आज मीडिया और सरकार के सामने स्पष्ट होना चाहिए. यह ऐसा समय है कि सिख नौजवानों को चाहिए कि शोशल मीडिया के पोस्ट से खिन्न होकर जवाब देने की बजाए पुलिस की सहायता लेनी चाहिए. 

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रविवार, 13 दिसंबर 2020

 महाराष्ट्र सरकार का दो दिवसीय शीतकालीन अधिवेशन सोमवार से 

गुरुद्वारा कानून संशोधन पर सस्पेंस!

रविंदरसिंह मोदी 


महाराष्ट्र सरकार विधानमंडल का दो दिवसीय शीतकालीन अधिवेशन सोमवार, ता. 14-12-20 से प्रारंभ हो रहा है. यह अधिवेशन मुंबई में ही होगा. अधिवेशन को लेकर सरकार पक्ष उत्साह में दिखाई पड़ रहा है. दूसरी ओर विपक्ष अधिवेशन की अवधि को लेकर नाराजी प्रकट कर रहीं है. अपनी नाराजी प्रकट करने के लिए विपक्ष द्वारा सरकार द्वारा आयोजित चायपान कार्यक्रम का आज बहिष्कार किया गया. यह अधिवेशन मात्र दो दिनों का होने के कारण इसमें राजस्व मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत होनेवाले ता. 14-12-20 के दिन प्रस्तुत होनेवाले प्रस्तावों की सूची में कहीं भी "दी सिख गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री अबचलनगर साहिब बोर्ड" कानून 1956 के संशोधन का विषय दिखाई नहीं पड़ रहा है. इसलिए इस बात का संदेह उत्पन्न हो रहा है कि कहीं गुरुद्वारा बोर्ड कानून 1956 के अंतर्गत कलम ग्यारह के पिछले संशोधन रद्द करने का विषय प्रस्तुत होगा अथवा नहीं. या सरकार की पूर्व मंशा के मुताबिक कानून में आवश्यक ऐसा संशोधन होगा कि नहीं? यह भी सुनने में आ रहा है कि शायद गुरुद्वारा बोर्ड कानून संशोधन का विषय अगले अधिवेशन तक प्रलंबित रखा जायेगा. अभी हाल ही में शिरोमणि अकाली दल के नेता स. प्रेमसिंघ चंदूमाजरा ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे से भेट कर गुरुद्वारा कानून में बदलाव नहीं किया जाए ऐसी मांग की थी. जिससे यह संदेह और बढ़ गया है. हजूर साहिब के स्थानीय नेता या विशेष कर स्थानीय सिख नेताओं का आलस्य भी साफ नजर आ रहा है. कहना ना होगा कि मुंबईया फील्डिंग बढ़िया जमाई गई थी. महाराष्ट्र सरकार के दो नॉमिनेशन में से एक सीट पर भूपिंदरसिंह मनहास प्रधान के रूप में कार्यरत है वहीं दूसरी सीट खाली है. पूर्व विधायक सरदार तारासिंह के निधन से यह सीट रिक्त हुईं है. इसके अतिरिक्त सिख सांसद के दो स्थान रिक्त हैं. इस तरह से इन तीनों सीटों पर सदस्य के तौर पर नियुक्ति पाने के लिए फिलहाल घमासान मचा हुआ है. मुंबई से नौ लोग प्रयत्नशील है. जबकि नांदेड़ से उन्नीस, पुणे से तीन, औरंगाबाद से पांच, परभणी से दो, नागपुर से दो, अमरावती से एक ऐसे चालीस से ज्यादा इच्छुक अपना जोरआजमाइश कर रहें हैं. शिवसेना, कांग्रेस, राष्ट्रवादी कॉंग्रेस सहित अन्य छोटी पार्टियां भी अपने कार्यकर्ताओं को नियुक्त करने के लिए प्रयत्नशील है. आगामी 31 दिसंबर तक रिक्त पदों पर नियुक्तिया संभव लग रहीं है. यदि कलम ग्यारह का पिछला संशोधन रद्द होता है तो तीन रिक्त पदों और एक मध्यप्रदेश की सीट पर चार नियुक्तियां संभव है. एसजीपीसी के अन्य तीन सदस्यों में से एक सीट पर परिवर्तन होने के आसार है. यदि कानून संशोधन होता हो तो निश्चित ही सब कुछ परिवर्तन हो जायेगा. सचखंड हजूरी खालसा दीवान की चार नियुक्तियां भी इसी अंतर्गत प्रस्तुत हो जायेगी. अगले दो सप्ताह में स्थिति स्पष्ट हो जायेगी. 


 बीबी जगीरकौर की सोंच कितनी सही, कितनी गलत! 

रविंदरसिंह मोदी 

(तखत श्री केशगढ़ साहिब, आनंदपुर साहिब में बयान जारी करते हुए बीबी जगीरकौर और एसजीपीसी के पदाधिकारी)

दैनिक दी ट्रिब्यून (अंग्रेजी) की एक ख़बर यदि सही है तो निश्चित ही सिख जगत की छवि को दाँव पर धरने वाली वो ख़बर साबित होगी. ट्रिब्यून ऑनलाइन समाचार में कहा गया है कि श्री आनंदपुर साहिब में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की नई प्रधान बीबी जगीरकौर ने पत्रकारों के सामने यह स्पष्ट किया कि, एसजीपीसी द्वारा आगामी अप्रैल माह में आयोजित होनेवाले गुरु श्री तेगबहादुर जी प्रकाशपर्व चार सौ सालाना शताब्दि कार्यक्रम का न्यौता प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को नहीं भेजा जायेगा ! 

यह समाचार पढ़कर और सुनकर हर कोई आवाक हुए बगैर नहीं रह सकता. बीबी जगीर कौर का यह वक्तव्य भले ही वर्तमान में चल रहें किसान आंदोलन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर जारी किया गया होगा. लेकिन उनका यह वक्तव्य सिख जगत की छवि पर प्रतिकूल असर डाल सकता है. बीबी जागीर कौर के इस वक्तव्य पर पंजाब में कोई हंगामा नहीं बरपा बल्कि स्तब्धता छा गई. उक्त विषय पर शिरोमणि अकाली दल के नेतागण भी चुप्पी साधे दिखाई दे रहें हैं. यानि बीबी जगीरकौर द्वारा की गई जल्दबाजी का शिरोमणि अकाली दल द्वारा समर्थन नहीं किया गया. लेकिन यह विषय इसलिए भी गंभीर लग रहा है कि बीबी जगीरकौर शिरोमणि अकाली दल कोर कमेटी की सदस्या भी है. उनका वक्तव्य भारतीय जनता पार्टी द्वारा गंभीरता से लिया जायेगा इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता. कहना ना होगा कि यह विषय 2022 में पंजाब में होनेवाले विधानसभा चुनावों के समय भी गहरा असर कर सकता है. 

बीबी जागीरकौर सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था का नेतृत्व कर रहीं है. उन्हें चाहिए कि, सिख पंथ की छवि को नुकसान पहुंचाएं, ऐसे वक्तव्य जारी ना करें. गुरु श्री तेगबहादुर जी का चार सौ सालाना प्रकाशपर्व केवल शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का निजी कार्यक्रम नहीं हैं बल्कि समस्त सिख जगत का कार्यक्रम हैं. गुरु तेगबहादुर जी का बलिदान "तिलक, जंझू राखा" यानि हिन्दू धर्म रक्षार्थ हुआ था. गुरूजी का आगामी प्रकाशपर्व सिख धर्म और अन्य धर्मों को एकत्र लाने का बढ़िया अवसर साबित होगा. यदि ऐसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम को लेकर अभी से नकारात्मक वक्तव्य जारी करना उस चतुर्थ शताब्दि को प्रभावित करना होगा. निश्चित ही अन्य राजनीतिक दल बीबी जागीरकौर के वक्तव्य को सिख पंत की राजनीतिक भूमिका मानकर चलेंगे. 

जैसे कि देश में इस समय वातावरण गर्म हैं. राजधानी दिल्ली को किसान आंदोलनकारियों ने चारों छोरों से घेरा हुआ है. किसान आंदोलन में पंजाब के भी कृषक बड़ी संख्या में सक्रिय भूमिका निभा रहें हैं. इन किसानों में सिख भी बड़ी संख्या में शामिल हैं. बीबी जागीरकौर द्वारा उन सिखों और किसानों को आकर्षित करने की दृष्टि से यह वक्तव्य जारी किया हो लेकिन इस समय तो यह गलत प्रतीत हो रहा हैं. देश के प्रधानमंत्री को कार्यक्रम का न्यौता नहीं दिया जाना एक गलत कदम साबित हो सकता हैं. इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में तो सभी राजनीतिक नेताओं और पार्टियों को न्यौता दिया जाना चाहिए. यह कार्यक्रम सिख पंत और समाज संघठन की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर सकता है. यदि शिरोमणि अकाली दल द्वारा बीबी जगीरकौर की इस सोंच का समर्थन किया जाता है तो सिख पंथ का इससे बड़ा दुर्भाग्य कोई और नहीं होगा. 

(आप भी अपनी राय भेज सकते हैं. )


बुधवार, 9 दिसंबर 2020

 अब "भाजपाई सिखों" को क्या करना चाहिए? 

हम आतंकवादी नहीं हैं 'माई बाप"!

रविंदरसिंह मोदी 

दिल्ली में चल रहें किसान आंदोलन में भारतीय जनता पार्टी का सिख विरोधी चेहरा सामने आ गया. भाजपा ने किसान आंदोलन में शामिल लाखों सिखों की एक ही पहचान प्रस्तुत की और वह पहचान "सिख आतंकवादी" धारणा के रूप में प्रस्तुत हुई या की गईं हैं. इससे पूर्व भी कुछ पार्टियों ने सिखों के लिए "खलिस्तानी", "आतंकवादी", "दहशतवादी" जैसे शब्दों का प्रयोग किया था. लेकिन देश उन संबोधनों को भूल चुका था. दूसरे यह कि उस दौर में सत्ता संघर्ष कर रहीं भाजपा "आतंकवादी" विषय पर अन्य राजनीतिक पार्टियों को कोसकर सिखों की सहानुभूति प्राप्त करती थीं. तब सिखों को लगता था कि यह हमारे विचारों की पार्टी हैं. इस कारण सिख भाजपा की ओर प्रभावित हुए. लेकिन भाजपा की वर्तमान सोंच ने सभी सिखों को हताश, निराश और अलग थलग कर रख दिया हैं.

(नांदेड़ की रैली में सिख अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करते हुए)

इस सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने किसान आंदोलन को विभाजित करने की राजनीति के तहत सिख कौम पर ही निशाना साध दिया. यदि सिख आतंकवादी होते तो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली सहित कई प्रदेशों में सभी सिख जेल में होते. यदि सिख आतंकवादी हैं तो पिछले छह वर्षों से भाजपा और सरकार मौन क्यों रहीं?  अब शिरोमणि अकाली दल के एनडीए से अलग होते ही सिख आतंकवादी लगने लगें? क्या भाजपा में कार्यरत सभी पदाधिकारी और कार्यकर्ता से सर्टिफिकट लिया गया हैं कि वो आतंकवादी नहीं हैं? भाजपा का शोशल मीडिया जिस तरह से खालिस्तान और आतंकवादी शब्दों का प्रयोग कर हैं वो देश में सिख पंथ की छवि ख़राब कर रहा हैं. 

(नांदेड़ में सिखों ने केवल किसानों के आंदोलन को समर्थन दिया)

उन राजनीतिक सिख कार्यकर्ताओं की हालत तो देखिएगा, आज जब कौम को आतंकवाद के पलड़े में तोला जा रहा हैं तो वो कुछ करने की हालात में भी नहीं हैं. राजनीतिक विवशता हैं! आज के समय में तो पार्टी ही "माईबाप" हैं. पार्टी ही भविष्य हैं और व्यवसाय भी. सबकुछ पार्टी ही है. वो भी ऐसी पार्टी जिसकी केंद्र में सत्ता हैं. जो पार्टी दावा कर रहीं हैं कि "2029" तक देश में उनकी ही सत्ता चलेगी. सत्ता से दूर कौन रहना चाहेगा. आज कुछ लोग आरएसएस को दोष दे रहें, कोस रहें. आरएसएस से अधिक गलती सिखों की हैं, क्योंकि उनका राजनीतिक स्वार्थ उन्हें खींच कर भाजपा में ले गया हैं. राजनीतिक कार्यकर्ताओं की अपनी विवशता हैं. आनेवाले बीस साल तक भी भाजपा के सच्चे कार्यकर्ता अपने नेताओं की ही बोली बोलेंगे, मन में भी रखेंगे कि, सिख आतंकवादी हैं ! 

(दिल्ली की सीमा पर विगत चौदह दिनों से धरना दे रहें किसान कार्यकर्ता सरकार द्वारा किये गए सम्बोधन से हैरान हो उठें हैं)

पहली बात तो यह कि भाजपा को सिखों की जरुरत ही क्या हैं. सिखों का अर्थ उनके लिए तो रक्षक से अधिक "अंगरक्षक" जैसा उपयुक्त प्रतीत होता हैं. चलो एक समय हमारे गुरुओं ने हिन्दू धर्म की रक्षा खातिर बलिदान दिया होगा. लेकिन इन सब विषय की जरुरत पांच साल में एक बार या दूसरी जाति या पार्टी से लड़वाने के लिए ही पडती हैं. सिखों को प्रभावित करने के लिए इतिहास के कुछ प्रसंग जीवित कर दिए जाते हैं और वोट बटोर लिए जाते हैं. सिख कार्यकर्ता पार्टी के लिए लड़ने, मारने और मरने के लिए भी तैयार रहता हैं. लेकिन हश्र क्या होता हैं ! महानगर पालिका के टिकट के लिए भी उन्हें प्राथमिकता नहीं मिलती. क्या किसी सिख को महाराष्ट्र में कभी एमएलसी मिल सकती हैं ? शायद आर. एस. एस. से जुड़ा कोई नागपुर या मुंबई का सिख पात्र ठहराया जा सकता हैं पर सिख होने की कसौटी पर चयन नामुमकिन होगा. किसी महानगर पालिका में कॉप मेंबर नहीं बनाया गया यहां ! इसका अर्थ तो यहीं हुआ कि सिखों की ही राजनीतिक मजबूरी हैं. 

मेरा प्रश्न यह है कि, भाजपा, महाराष्ट्र में सिखों को किस अर्थ से परिभाषित कर रहीं हैं. क्या यहां के सिख भी....?  फिर यहां वफादारी से भाजपा के लिए राजनीतिक माथापच्ची कर पार्टी के हर कदम को श्रेष्ठ दिखाने के लिए व्याकुल पदाधिकारी, कार्यकर्ता कौन हैं. क्या उन्होंने भाजपा में प्रवेश करते समय "राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र" पेश किया था?  दूसरी पार्टियों से आयात हुए भी क्या प्रमाणित हैं? सही तो यह है कि, भाजपा को अब पार्टी के भीतर काम कर रहें सिखों के विषय में भी "जाँचपड़ताल" कर लेनी चाहिए कि वें राष्ट्रभक्त ही हैं और खलिस्तानी नहीं हैं. 

(नांदेड़ में आयोजित धरना आंदोलन का दृश्य)

अभी दो दिन पूर्व ही नांदेड़ में बड़ी संख्या में हजूरी साधसंगत द्वारा रैली निकालकर किसान आंदोलन को समर्थन दिया गया. इस आंदोलन में कुछ भाजपा के पदाधिकारी दिखाई दिए अब उनके लिए भाजपा नेतृत्व क्या सोंच बनाए बैठेंगा कुछ कहा नहीं जा सकता. लेकिन जो भाजपा पदाधिकारी किसान आंदोलन के समर्थन वाले इस रैली और धरना कार्यक्रम से दूर रहकर लाइव देख रहें थे उनकी क्या भावनाएं थीं? जो भी हो मकसद केवल सिख कौम को आहत करना मात्र था. अब सिख नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्त्ता ही जानें की उनकी निष्ठा कहाँ हैं? हम यह स्पष्ट कर रहें कि हजूर साहिब के सिख ना आतंकवादी थे ना हैं. हम महाराष्ट्र में है और हमें यहीं रहना है. अंत में भाजपा के शीर्ष नेताओं को भी चाहिए कि वें "खलिस्तानी" और "आतंकवादी" जैसे शब्दों का प्रयोग ना करें. कल वोट मांगने तो सभी के पास आना हैं ! 






 


रविवार, 6 दिसंबर 2020

कलम ग्यारह की शरण में एसजीपीसी ?   

क्या शिवसेना अपमान भुलाने को तैयार है ? 

नई खिचड़ी पक रहीं है !

रविंदरसिंघ मोदी 

(शिवसेना, कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल एक साथ? नई खिचड़ी हांडी पर चढ़ेगी)

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी यानी एसजीपीसी भयभीत दिखाई पड़ रहीं हैं. कारण ! एसजीपीसी का अस्तित्व महाराष्ट्र में खतरे में पड़ गया हैं. शिरोमणि दल के शिष्टमंडल अब महाराष्ट्र मंत्रालय के चक्कर काट रहें हैं ! मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे को अब अपमान के बजाये गुलदस्तें भेट कर रहें हैं! ये वहीं शिरोमणि अकाली दल है जो दो माह पूर्व शिवसेना पर शाब्दिक हमले दागकर केंद्र में बैठे भाजपा नेताओं से वफ़ादारी निभा रहा था. कंगना के समर्थन में शोशल मीडिया में ट्वीट पर ट्वीट और वीडियो पर वीडियो जारी हो रहें थे. संजय राउत के पास तो लेखा जोखा होगा ही. 

गत दिनों शिरोमणि अकाली दल के नेताओं ने अभिनेता शुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद अभिनेत्री कंगना राणावत के पक्ष में उतर कर जिस तरह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, शिवसेना और महाराष्ट्र सरकार पर आरोपों की झड़ें लगा दीं थी उससे महाराष्ट्र सरकार नाराज हो गई. शिरोमणि अकाली दल के विधायक स. मनजिंदर सिंह सिरसा ने "उड़ता बॉलीवुड" कहकर महाराष्ट्र सरकार को आड़े हाथों लिया था. लेकिन अब शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना में कोई खिचड़ी पकनी शुरू हो गई हैं. 

कहा जा रहा हैं कि केंद्र सरकार के खिलाफ दोनों राजनीतिक दल भविष्य में कोई नई चुनौति प्रस्तुत कर सकते हैं. इसलिए पंजाब से बादल साहब ने "प्रेम" का सन्देश यानी श्री प्रेमसिंघ चंदूमाजरा को दूत बनाकर शिवसेना के भेजा हैं. किसान आंदोलन की आड़ में क्या गुल खिलाने की योजना बन रहीं हैं विचारणीय हैं ! क्या शिवसेना, शिरोमणि अकाली दल द्वारा गत दिनों किया गया अपमान पचाने को तैयार हैं? 

वैसे, विधायक सिरसा की बयानबाजी के समय महाराष्ट्र के प्रभावी नेता और कैबिनेट मंत्री श्री अशोकराव चव्हाण भी कुछ नाराज दिखाई दें रहे थे. क्योंकि श्री चव्हाण ने सदैव अभिनय, कला, संगीत और सांस्कृतिक क्षेत्र की तरक्की में योगदान दिया हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री रहते बॉलीवुड उद्योग की उन्नति की नीति अपनाई थी. मराठी रंगभूमि, मराठी फिल्मों को अनुदान वृद्धि जैसे कदम उठाये थे. कहीं न कहीं श्री अशोकराव चव्हाण को भी उन तत्वों के प्रति नाराजगी हैं जो महाराष्ट्र के खिलाफ अपनी भूमिका जाहीर रूप से बयां करते हैं. उनमें शिरोमणि अकाली दल भी हैं जो केंद्र सरकार को "गुरु मानकर" वर्तमान महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोले हुए हैं. 

श्री चव्हाण को यह भी जानकारी हैं कि शिरोमणि अकाली दल प्रोत्साहित एस.जी.पी.सी. का एक घटक नांदेड़ स्थित गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड संस्था पर सत्ता जमाये बैठा हैं. पिछली भाजपा सरकार के समय शिरोमणि अकाली दल को गुरुद्वारा बोर्ड की सरकार स्थापित करने का सुनहरा अवसर उपलब्ध हुआ था. शिरोमणि अकाली दल इस बात पर बहुत इतरा रहा हैं कि श्री अशोकराव चव्हाण के क्षेत्र में उनका राजनीतिक दबदबा कायम हैं. मुंबई के कुछ व्यावसायिक और एसजीपीसी के नेता पिछले दो सालों से अपने सत्ता के अहम में छाती ठोकें जा रहें हैं. वैसे शिरोमणि अकाली दल के इस दावे की पुष्टि नांदेड़ के स्थानीय कांग्रेसी पदाधिकारी ईमानदारी से बयां कर सकते हैं. समय आ गया हैं कि इस सच्चाई से पर्दा उठाया जाए कि आखिर यह संस्था हजूरसाहब वासियों की हैं या एसजीपीसी वालों की. 

चर्चा हैं कि महाराष्ट्र में अब गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड नांदेड़ संस्था के कानून संशोधन को लेकर एसजीपीसी पर गाज गिरनेवाली हैं ! महाराष्ट्र सरकार द्वारा गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था कानून 1956 में बहुत शीघ्र संशोधन कर बाहर के अनावश्यक सदस्यों की नियुक्तियों को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है. बहुचर्चित गुरुद्वारा बोर्ड की कलम ग्यारह का पिछला संशोधन रद्द करते हुए स्थानीय सिख नेतृत्व को बढ़ावा देने की हजूरी साधसंगत की मांग पूरी होती लग रहीं थीं. लेकिन चंदूमाजरा प्रकट हो गए.



एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल के होश इस कारण उड़े हुए हैं. एसजीपीसी को सत्ता खोने के साथ - साथ अब उनके प्रतिनिधित्व के कम होने की भी चिंता सताए जा रहीं हैं. यदि महाराष्ट्र के गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड से एसजीपीसी की सत्ता समाप्त हो जाती है तब पांचों तखत साहब (सिख धर्म नेतृत्व पीठ) को अपने नियंत्रण में रखने के मनसूबे से पानी फिर सकता हैं. इसलिए अब सिर्फ कलम ग्यारह को रद्द करने के लिए नए से मांग प्रस्तुत की गई हैं. 

दो से तीन सप्ताह पूर्व नांदेड़ में भी एक शिष्टमंडल द्वारा कांग्रेस के दिग्गज नेता श्री अशोकराव चव्हाण के पास नये से मांग प्रस्तुत हुईं कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था के कानून संशोधन अंतर्गत केवल और केवल कलम ग्यारह का संशोधन दुरुस्त किया जाए. बहुचर्चित भाटिया समिति की सिफारिशों को नहीं माना जाए.  जिन तत्वों द्वारा पिछले दो सालों से गुरुद्वारा बोर्ड में एसजीपीसी की सत्ता स्थापित करने में "प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहायक" भूमिका निभाई जा रहीं हैं, वो तत्व भी अब कलम ग्यारह को रद्द करने या अथवा अन्य मात्र कलम ग्यारह का पिछला संशोधन रद्द करने के लिए अपनी स्वीकृति प्रदान कर रहे हैं. हजूरसाहब के सिखों की कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने मांग जायज थी. इस मांग में कितनी सार्थकता थीं अब यह साबित हो गया हैं. यह हजूर साहब के सिखों की क़ामयाबी की दिशा में सबसे बड़ा कदम हैं. आंदोलन की धारणा और मंशा दोनों ही सही थे. अब गेंद नेताओं के पाले में हैं. शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल में क्या खिचड़ी पक रहीं हैं और श्री अशोकराव चव्हाण गुरुद्वारा एक्ट को लेकर क्या भूमिका अदा करेंगे ये वक्त बताएगा. मामला सचमुच सीरियस हैं. 

सोचिये, जिस एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल ने कानून संशोधन के तहत कलम ग्यारह के सरकारी प्रभाव का लाभ उठाकर हजूर साहब के सिखों को समूह - समूह में बाँटने की राजनीति को बढ़ावा दिया था, जिसने हजुरसाहब के सिख प्रतिनिधियों (मेंबर साहिबान) को उनकी अपनी संस्था से बेदखल करने का प्रयास किया, वो एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल अब कलम ग्यारह से संरक्षण चाह रहे हैं. इस छुपे मनसूबे को पूर्ण करने के लिए भी अब उन्हें हजूरसाहब के लोगों के कंधों की जरुरत पड़ रहीं हैं. मुंबई के एसजीपीसी के नेता (व्यापारी) श्री उद्धव ठाकरे और श्री अशोकराव चव्हाण के सामने याचना का स्वर लेकर प्रस्तुत हो रहें हैं. सुनने में आ रहा हैं कि एसजीपीसी के प्रतिनिधि आए दिन महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री श्री बालासाहब थोरात के मंत्रालय के चक्कर काट रहें हैं ! 



मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

 पेट्रोल और डीजल की कीमतें क्यों चढ़ीं हुईं हैं !

छह महीनों से स्थिर हैं मूल्य 

रविंदरसिंह मोदी 


देश महामारी से जूझ रहा हैं. नागरिकों को राशन बांट कर सरकार दरियादिली का आलम प्रस्तुत किये हैं. दूसरी ओर नागरिकों को कहीं से भी कोई रियायत या राहत नहीं हैं. अब देखिए, पिछले छह माह से पेट्रोल और डीजल के मूल्य लगभग स्थिर हैं और 90 रूपये प्रति लीटर से कम होने का नाम नहीं ले रहें हैं. नांदेड़ शहर में जून 2020 में 89.05 रूपये लीटर मूल्य था और आज 1 दिसंबर 2020 के दिन 91.25 रु प्रति लीटर मूल्य हैं. नांदेड़ शहर के मूल्य देश में सबसे अधिक हैं जिसका एक कारण महानगर पालिका टैक्स का सर्वोच्च दर भी हैं. यहाँ फ्यूल टैक्स सबसे अधिक रखा गया हैं जिसका परिणाम जनता की जेब पर देखा जाता हैं. लेकिन देश स्तर पर भी विचार किया जाएं तो फ्यूल के मूल्य पिछले छह माह से स्थिर हैं. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बैरल के मूल्य का क्या फ्यूल पर प्रभाव नहीं होना चाहिए?  क्या अंतर्राष्ट्रीय बाजार के मूल्यों के तहत सरकार मूल्य कम - ज्यादा नहीं करतीं ? वहीं नांदेड़ और अन्य शहरों में तुलना की जाएं तो यह तथ्य उभर कर सामने आ रहा हैं कि नांदेड़ में फ्यूल के दर देश के बड़े महानगर की तुलना में बहुत अधिक हैं. 

पेट्रोल मूल्य (अधिकतम मूल्य)

जून 20      -      89.05 रु 

जुलाई 20   -      89.05 रु 

अगस्त 20   -      90.74  रु 

सितंबर 20   -     90.79 रु 

अक्टूबर 20   -    89.81 रु 

नवंबर 20     -     91.25 रु 

दिसंबर 20    -     91.25 रु (01-12-2020)

उपर्युक्त अनुसार पैट्रोल के मूल्य में पिछले छह माह में मात्र एक रुपया 40 पैसे का मूल प्रभाव मूल्यों पर हुआ हैं. कोरोना संक्रमण से जूझ रहीं जनता को कोई राहत या रियायत नहीं मिल पा रहीं हैं. पेट्रोल के साथ साथ डीजल के मूल्यों में भी अधिक कोई बदलाव नहीं हुआ हैं. छह माह से मूल्य एक से दो रुपयों के बीच घूम रहें हैं. 

डीजल मूल्य 

जून 20     -    79.45 रु 

जुलाई 20  -    80.70 रु 

अगस्त 20  -    80.91 रु 

सितम्बर 20 -   80.91 रु 

अक्टूबर 20  -   77.91 रु 

नवंबर 20     -   79.96 रु  (कम मूल्य 77.74 रु )

मूल्यों के स्थिरता के पीछे क्या कारण है समझ नहीं आ रहा हैं. संक्रमण काल में सरकार को चाहिए कि वो नागरिकों के सिर से टैक्स के वजन को कम करें. लेकिन जिस तरह से फ्यूल के मूल्य स्थिर हैं और उनकी तुलना अंतर्राष्ट्रीय बैरल के मूल्य से प्रतिदिन नहीं की जा रहीं हैं ऐसा संदेह उभारना स्वाभाविक बात हैं. 

पिछले दस दिनों के मूल्य एकदम से स्थिर दिखाई दे रहें हैं. नीचे तखते में देखिएगा. ता. 22-11-20 से ता. 01-12-20 के दौरान पैट्रोल के मूल्य. 


नांदेड़ महानगर पालिका क्षेत्र में पिछले दस दिनों से डीजल के मूल्य निम्न अनुसार हैं. 

अब देखिए देश में पैट्रोल के आज के और बीते कल को संयुक्त मूल्य इस तरह से हैं. जो दर्शा रहें हैं कि नांदेड़ की जनता से किस तरह से अधिक राजस्व की वसूली हो रहीं हैं. 



रविवार, 29 नवंबर 2020

श्री गुरु नानक देवजी को वैश्विक संत की उपाधि मिले 

लंगर सेवा संकल्पना विश्व में प्रसारित हो !

रविंदरसिंह मोदी


सिख पंथ के संस्थापक सतगुरु नानकदेवजी महाराज का हम 551 वां प्रकाशपर्व मना रहें हैं. पिछले वर्ष को साढ़े पांच शताब्दी के रूप में मनाया गया. पिछला वर्ष दिक्कतों से भरपूर रहा. समस्त मानवता पर संक्रमण संकट कायम रहा. ऐसे समय में गुरु नानकदेव जी के तत्वों ने समस्त सिख पंत की अलख जगाये रखी. कोरोना संक्रमण काल में सिख पंथ द्वारा लाखों, करोड़ों लोगों की लंगर के माध्यम से सेवा की गईं. आज भी यह सेवा जारी है. आज हम जब गुरु नानक देव जी महाराज का प्रकाशपर्व मना रहें हैं तब गौरवांतित भी हैं. सिख पंथ अपनी धर्म - धारणाओं से कहीं दूर नहीं रहा. गुरु नानकदेव जी की विचारधारा के अनुरूप सिख पंथ की सेवाएं जारी हैं. भारत देश में ही नहीं बल्कि विश्व के बड़े - बड़े देशों में सिख पंथ ने लंगर सेवा का प्रचार प्रसार प्रत्यक्ष कृति के जरिये कर दिखाया. अब समय आ गया हैं कि, श्री गुरु नानक देव जी और उनकी विचारधारा को वैश्विक मान्यता दिलाये. श्री गुरु नानकदेवजी को विश्व संत की उपाधि दिलाई जाएं. साथ ही लंगर सेवा की प्रथा को वैश्विक सेवा प्रथा के रूप में मान्यता भी दिलाई जाएं. 

इस कार्य के लिए विश्व के सभी सिख एक विचारधारा को लेकर आज से ही कार्य में जुट जाएं. भारत सहित उन सभी देशों में जहां सिखों ने गुरुद्वारों की स्थापना की हैं, उन सभी स्थानों से यह पहल शुरू होनी चाहिए कि श्री गुरु नानकदेव जी महाराज को विश्व गुरु संत के रूप में प्रचारित किया जाए. यह मिशन सिखों को पूरा करना चाहिए. आनेवाले 552 वें प्रकाशपर्व तक श्री गुरु नानकदेव जी के संतत्व को पूर्ण क्षमता से हर सिख को यह मिशन लेकर चलना चाहिए और समय - समय पर उसे प्रचारित करते रहना होगा. उम्मीद हैं आप इस मांग और संकल्पना का स्वागत करेंगे. आपकी राय अवगत कराए. धन्यवाद. इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर कीजियेगा. 


शनिवार, 28 नवंबर 2020

गुरुद्वारा तखत सचखड़ बोर्ड कानून 1956 में सुधार की मांग लेकर दैनिक नांदेड़ वार्ता में प्रकाशित मेरा लेख : 28-11-2020.



 किसान भाइयों की मंगल कामनाओं के लिए

 'तखत सचखंड साहब' भी पहल करें !

रविंदरसिंघ मोदी 

पंजाब का सिख, जाट किसान समुदाय परोपकारी भूमिका निभाता हैं. श्री हजूर साहब और पंजाब की दूरी भले दो हजार किलोमीटर से अधिक हो लेकिन हजूर साहिब के लंगर की सेवा के लिए किसानों का योगदान बहुत मायने रखता हैं. पंजाब से भेजे गए गेहूं, चावल, घी और चढ़ावा का सीधा संबंध हजूर साहिब के स्थानीय समुदाय से जुड़ता हैं. इसलिए आज दिल्ली में चल रहें किसान आंदोलन को लेकर हजूर साहिब में चिंतन जरुरी हो जाता हैं. पंजाब यह सिक्खी का गढ़ है और श्री हजूर साहिब सिखों का ऊर्जा स्थान है. श्री गुरु ग्रंथसाहिब की पावन ऊर्जा से पंजाब के सभी किसानों को भी शक्ति और सामर्थ्य मिलना चाहिए. हजूर साहिब की साधसंगत भी किसानों के लिए कुछ करना चाह रहीं हैं. यह बात सर्वसामान्य तक भी पहुंचनी चाहिए. उन किसानों तक भी पहुंचनी चाहिए जो अपना घर बार छोड़ कर कई रातों से रेल की पटरी पर तो कहीं सड़को पर आंदोलन लिए बैठे हैं. 

उत्तर भारत के किसान विगत एकमाह से नये कृषि कानून को लेकर मूलभूत सुधार की दुहाई दे रहें हैं. आंदोलन और धरना लगातार जारी हैं. केंद्र सरकार कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं. किसान भी अड़े हैं. आज दिल्ली की सीमा में ऐसे तैसे प्रवेश मिल पाया. अब शहर के भीतर आंदोलन शुरू है. सरकार कह रहीं है बात करेंगी लेकिन कौन बात करेगा तय नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी जी देश में वैक्सीन की तैयारी का जायजा लेने के लिए अहमदाबाद, हैदराबाद और पुणे का दौरा कर रहें हैं. 

दिल्ली के गुरुद्वारा और सिख समुदाय किसानों की सहायता के लिए अग्रसर हुए हैं. हर तरफ से किसान वर्ग के लिए मंगल कामनाये की जा रहीं हैं. ऐसे समय में तखत सचखंड श्री हजूर साहिब इस पवित्र पावन स्थान से पहल जरुरी हो जाती हैं. तखत साहब, गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड अथवा हजूर साहिब की साधसंगत किसानों के लिए मंगल कामनायें कर सकते हैं. श्री अखण्ड पाठ साहिब का आयोजन किया जाएं तो बहुत शुभ सन्देश प्रसारित हो सकता हैं. या सिख भाइयों को चाहिए कि सिमरन दिवस के तर्ज पर ऑनलाइन दस मिनिट का मूलमंत्र जाप का देशस्तर पर आयोजन किया जाएं तो लाभकारी साबित होगा. कोरोना संक्रमण काल में किसी तरह के धरना, आंदोलन के लिए यहाँ अनुकूलता नहीं हैं यह हम सभी को अहसास हैं. इसलिए ऑनलाइन मूलमंत्र जाप बेहतर मार्ग होगा सन्देश पहुंचाने के लिए. 


किसानों की भी नहीं सुनोगे !

27 नवंबर 2020 का दिन इतिहास में दर्ज होगा. पंजाब, हरियाणा, यू. पी., दिल्ली सहित अन्य क्षेत्रों के किसानों का दिल्ली की दिशा में सीमोलंघन भी वैश्विक स्तर पर दर्ज होगा. साथ ही भारतीय किसानों के दिलोदिमाग में दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर किसानों से दूरी साधनेवाले प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का मौन भी यक़ीनन दर्ज होगा. ऐसा भी क्या कारण है कि प्रधानमंत्री मंत्री जी साधन सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद भी किसानों से सीधी बात करना नहीं चाह रहें हैं. विडंबना है कि, केंद्रीय कृषि मंत्री जी की बात किसान सुनना नहीं चाह रहें हैं ! एक माह से जारी किसान आंदोलन के संकट पर देश के शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के लिए भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहीं है. 

भारत देश के 68 % लोग आज भी ग्रामीण जीवन में रहते है और किसी न किसी तालुक से उनका जीवन कृषि उद्योग आधारित है. वर्ष 2021 की जनगणना में आंकड़ों की सच्चाई खुलकर उजागर हो जायेगी. कृषि क्षेत्र जिस तेजी से शहरीकरण और औधोगिकरण की भेंट चढ़ रहा है वो देश की राष्ट्रीय किसान नीति के लिए भी चिंता की बात है. सिमटते संसाधन एक दिन 130 करोड़ की आबादी वाले भारत देश को विदेशों से होने वाले खाद्य वस्तुओं पर निर्भर कर देंगे. इसलिए आज सरकार को सोचना होगा कि किसान और कृषि क्षेत्र को कितना जीवित रखा जाएं? 

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसान आंदोलन को लेकर इतने आक्रामक हुए हैं. देश में बहुत बार किसान आंदोलन हुए हैं. सत्तर के दशक में बहुत बार किसान आंदोलन हुए थे. पंजाब में अंग्रेज शासनकाल में सन 1938 में आज के किसान एजेंडे की तर्ज पर बड़ा किसान आंदोलन हुआ था. जिसके नायक के रूप में चौधरी चरणसिंह उभरकर आये थे. वो आंदोलन पंजाब प्रांत विधानसभा में राजस्व मंत्री सर छोटूराम की सूझबूझ से देश में पहली बार "कृषि उत्पाद मंडी अधिनियम" के रूप में प्रस्तुत हुआ जो तारीख 5 मई 1939 को अमल में लाया गया कानून था.

आज के परिवेश में सरकार एमएसपी जैसे विषय समझा पाने में असमर्थ क्यों हैं? श्रीमती हरसिमरत कौर बादल के त्यागपत्र और इस आंदोलन का क्या सम्बन्ध है?  क्या नये कृषि कानून से जीडीपी में उद्योग क्षेत्र पर कृषि उत्पाद का प्रमाण हावी रहेगा? पंजाब के किसानों को पंगु बनाने वाली यह सरकारी नीति तो नहीं? प्रश्न अनुत्तरित हैं क्योंकि सरकार मौनव्रत पर हैं ! कभी मनमोहनसिंह जी का मौन उन्हें भी खासा खलता था ! खैर ! सरकार को सही बोलना चाहिए और किसान प्रताड़ना बंद होनी चाहिए. 

बीती रात किसान आंदोलक तमाम यातना सहने के दिल्ली में प्रवेश कर पाए. लेकिन प्रधानमंत्री जी वैक्सीन की खोज में दिल्ली से बाहर निकल गए. किसानों से बात करेगा कौन? पुलिस?  मीडिया? आम नागरिक? यह विषय इसलिए भी विचाराधीन नहीं होगा क्योंकि आंदोलन में सिख राज्य पंजाब के किसान सम्मिलित हैं. पंजाब का किसान पिछले सौ वर्षों से भारत देश का अन्नदाता बना हुआ हैं. इस आंदोलन में साढ़े तीन लाख किसान और खेतिहर मजदूर भी शामिल होने की बात सामने आई हैं. जिनमें बड़ी संख्या में सिख किसान शामिल हैं. 




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