किसानों की भी नहीं सुनोगे !
27 नवंबर 2020 का दिन इतिहास में दर्ज होगा. पंजाब, हरियाणा, यू. पी., दिल्ली सहित अन्य क्षेत्रों के किसानों का दिल्ली की दिशा में सीमोलंघन भी वैश्विक स्तर पर दर्ज होगा. साथ ही भारतीय किसानों के दिलोदिमाग में दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर किसानों से दूरी साधनेवाले प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का मौन भी यक़ीनन दर्ज होगा. ऐसा भी क्या कारण है कि प्रधानमंत्री मंत्री जी साधन सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद भी किसानों से सीधी बात करना नहीं चाह रहें हैं. विडंबना है कि, केंद्रीय कृषि मंत्री जी की बात किसान सुनना नहीं चाह रहें हैं ! एक माह से जारी किसान आंदोलन के संकट पर देश के शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के लिए भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहीं है.
भारत देश के 68 % लोग आज भी ग्रामीण जीवन में रहते है और किसी न किसी तालुक से उनका जीवन कृषि उद्योग आधारित है. वर्ष 2021 की जनगणना में आंकड़ों की सच्चाई खुलकर उजागर हो जायेगी. कृषि क्षेत्र जिस तेजी से शहरीकरण और औधोगिकरण की भेंट चढ़ रहा है वो देश की राष्ट्रीय किसान नीति के लिए भी चिंता की बात है. सिमटते संसाधन एक दिन 130 करोड़ की आबादी वाले भारत देश को विदेशों से होने वाले खाद्य वस्तुओं पर निर्भर कर देंगे. इसलिए आज सरकार को सोचना होगा कि किसान और कृषि क्षेत्र को कितना जीवित रखा जाएं?
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसान आंदोलन को लेकर इतने आक्रामक हुए हैं. देश में बहुत बार किसान आंदोलन हुए हैं. सत्तर के दशक में बहुत बार किसान आंदोलन हुए थे. पंजाब में अंग्रेज शासनकाल में सन 1938 में आज के किसान एजेंडे की तर्ज पर बड़ा किसान आंदोलन हुआ था. जिसके नायक के रूप में चौधरी चरणसिंह उभरकर आये थे. वो आंदोलन पंजाब प्रांत विधानसभा में राजस्व मंत्री सर छोटूराम की सूझबूझ से देश में पहली बार "कृषि उत्पाद मंडी अधिनियम" के रूप में प्रस्तुत हुआ जो तारीख 5 मई 1939 को अमल में लाया गया कानून था.
आज के परिवेश में सरकार एमएसपी जैसे विषय समझा पाने में असमर्थ क्यों हैं? श्रीमती हरसिमरत कौर बादल के त्यागपत्र और इस आंदोलन का क्या सम्बन्ध है? क्या नये कृषि कानून से जीडीपी में उद्योग क्षेत्र पर कृषि उत्पाद का प्रमाण हावी रहेगा? पंजाब के किसानों को पंगु बनाने वाली यह सरकारी नीति तो नहीं? प्रश्न अनुत्तरित हैं क्योंकि सरकार मौनव्रत पर हैं ! कभी मनमोहनसिंह जी का मौन उन्हें भी खासा खलता था ! खैर ! सरकार को सही बोलना चाहिए और किसान प्रताड़ना बंद होनी चाहिए.
बीती रात किसान आंदोलक तमाम यातना सहने के दिल्ली में प्रवेश कर पाए. लेकिन प्रधानमंत्री जी वैक्सीन की खोज में दिल्ली से बाहर निकल गए. किसानों से बात करेगा कौन? पुलिस? मीडिया? आम नागरिक? यह विषय इसलिए भी विचाराधीन नहीं होगा क्योंकि आंदोलन में सिख राज्य पंजाब के किसान सम्मिलित हैं. पंजाब का किसान पिछले सौ वर्षों से भारत देश का अन्नदाता बना हुआ हैं. इस आंदोलन में साढ़े तीन लाख किसान और खेतिहर मजदूर भी शामिल होने की बात सामने आई हैं. जिनमें बड़ी संख्या में सिख किसान शामिल हैं.



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