समाज रचनाकार नहीं होने का अफ़सोस !
आज का सिख, योद्धा नहीं बल्कि राजनीतिक गुलाम है
रविंदर सिंघ मोदी
मनुष्य को आदिम जीवन से सामाजिक जीवन तक पहुँचने में हजारों साल लग गए. सामाजिक जीवन तक पहुँचने के लिए मनुष्य को कई सभ्यताओं से गुजरना पड़ा, कई संस्कृतियों की अनुपालना करनी पड़ी, तरह-तरह के धर्म और जातियों के नियमों को अपनाना पड़ा. कदम-कदम पर संघर्ष झेलने पड़े. बहुत बार बलिदान देना पड़ा, कई बार आहुतियाँ देनी पड़ी तब जाकर एक सुरक्षित सामाजिक जीवन हमें प्राप्त हुआ. सामाजिक जीवन का भी एक दायरा होता है. उस दायरे में जाति, प्रथा, रस्मों - रिवाज और उत्तरदायित्व असीमित होते हैं. उत्तरदायित्व का वहन कर जो समाज रचना में योगदान देते हैं वे इतिहास में स्थान पाने के भी हक़दार होते हैं. आमतौर पर इतिहास दो तरह का लिखा जाता हैं. एक इतिहास नायक पद प्रदान करता है तो दूसरा खलनायक की उपाधि देता हैं. समाज हित के पक्षधर नायक की श्रेणी में अग्रक्रम में होते हैं. खलनायकों का इतिहास विध्वंसक, लुटेरा, बेईमान और अमानवीय मूल्यों को तक पर रखनेवाले के रूप में लिखा जाता है. यह जरुरी नहीं की नायक और खलनायक ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी. उसके कर्म और दूरदृष्टि उसका स्थान तय करती है. इसीलिए तो बादशाह सिकंदर भी इतिहास रचने के बाद भी खाली हाथ चला गया.
श्री गुरु नानक देवजी ने दौलत, संपत्ति का संग्रह नहीं किया लेकिन उन्होंने अच्छे और पवित्र कर्म करते हुए अपनी इहलोक यात्रा को भी स्वर्ग यात्रा में परिवर्तित कर दिया. आज गुरु नानकदेवजी के श्रद्धालु करोड़ों की संख्या में हैं, लेकिन सिकंदर के भक्त कितने हैं. सिकंदर को लोग केवल बल, छल का प्रतिक और एक बादशाह के रूप में ही जानते हैं. जबकि गुरु नानक देवजी, एक समाज रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं. सिकंदर ने कई देश जीतें और वो शासक बना. लेकिन किसी भी देश में उसका नाम समाज रचनाकार के रूप में नहीं लिया जाता. जबकि गुरु नानक देवजी ने फकीरों के वेश में विश्वभ्रमण कर मानवों के दिलों में स्थान पाया. वे बाबर जैसे बादशाह से भी नहीं डरे. जेल में जाकर चक्की चलाई। निडर होकर बादशाह बाबर को जाबर कहने का साहस किया. गुरु नानक देवजी की निडरता, निस्वार्थ जीवन ही आगे चलकर सिख धर्म की मूल नींव बनी. उनकी निडरता सिक्खी जीवन में सिद्धान्त के रूप में जीवित रही. आगे चलकर जब संत परंपरा के बावजूद भी शस्त्र उठाना पड़ा तब सिख गुरुओं ने उसी निडरता सिद्धांत को सर्वपरि माना.
सिख धर्म की रचना में गुरु नानक देव जी ने एक अभियंता की भूमिका निभाई हैं. गुरु जी ने केवल उपदेश नहीं दिया, केवल वाणी नहीं रची बल्कि समाज को रचने, बसने, फलने और फूलने की पर्याप्त व्यवस्था की. गुरूजी ने गांव और नगर बसाएँ. गुरूजी पानी की व्यवस्था के लिए कुएं खुदवाएं, सरोवरों का निर्माण करवाया. धर्म (समाज) को संचालित करने के लिए खेती में स्वयं परिश्रम किया. धार्मिक शोध, खोज और भक्तों के सेवा के लिए सिखों से दसवंध लेने की प्रथा शुरू की. उसी दसवंध से सिख धामों और गुरुद्वारों का निर्माण हुआ. दसवँध नाम की संकल्पना धार्मिक प्रयोजनों के लिए व्यवस्था का हिस्सा बनीं थी.
कालांतर बाद, दशम पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज तक ये प्रथा अविरत चलती रहीं. उनके बाद भी तीन शताब्दियों से सिखों ने दसवंध की प्रथा जीवित रखीं हुई हैं. गुरु की गोलक में साध संगत की किर्त-कमाई का संग्रहण होता है. ये कमाई केवल धार्मिक कार्यों और सामाजिक उद्देशों की पूर्ति के लिए खर्च होनी चाहिए. लेकिन वर्तमान में दसवंध केवल कमाई का साधन बन गया है. गुरुघर, सेवा नहीं बल्कि सत्ता केंद्र बन गए हैं. गुरुघर को राजनीति के अड्डों के रूप में उपयोग में लाया जा रहा हैं. गुरुघर का नियंत्रण आज सेवक नहीं बल्कि राजनेता कर रहे हैं. जिनके लिए दसवंध केवल उनके ऐशोआराम का साधन हो गया.
पंजाब से लेकर हजूर साहिब नांदेड़ तक और नांदेड़ से लेकर इंग्लैंड, कॅनडा जैसे देशों में भी दशवंध का अधिकतर स्थानों पर दुरुपयोग ही हो रहा हैं. क्योंकि सिक्खी सिद्धांतों को अमल में नहीं लाया जा रहा हैं. हमारे दस गुरुओं ने सिक्खी सिद्धांतों को प्रचारित किया और उनको सिक्खी जीवन का हिस्सा बनाया. आज समाज बिखरा हुआ हैं. सिख गुटगुटों में बिखरें हुए हैं. केवल सर पर पगड़ी धारण कर सिख होने का दिखावा मात्र कर रहे हैं. समाज की भलाई के लिए कोई काम नहीं कर रहा हैं. सभी की सोच केवल ग्राहक (संगत) बढाकर गोलक भरने मात्र तक सिमित रह गई हैं.
आज गुरुघरों के सेवादार बनने की होड़ तो मची हैं लेकिन कोई भी सच्चा सिख बनने को तैयार नहीं है. आज भी सिख धर्म और समाज को एक सशक्त रचनाकार की जरुरत है. जहां - जहां समाज विघटित हैं वहां - वहां समाज रचनाकारों की जरुरत हैं. लेकिन कोई उद्यमी व्यक्ति समाज के लिए उद्योग करने को तैयार नहीं. राजनीति के लिए सिखों का उपयोग करने के लिए सभी तैयार हैं. लेकिन राजनीति से सिख समाज को बृहद बनाने के लिए कोई कुछ करना नहीं चाहता. सिख धर्म का अनुयाई अपने पूर्व समाज रचनाकारों का इतिहास, योगदान भुला चुके हैं. स्वार्थ के आगे सभी नग्न होकर खड़े हैं. सिक्खी सिद्धांतों का चोला कब शरीर से छूट गया किसी को अहसास तक नहीं. वर्तमान में सिख नाम का प्राणि न आपने गुरु घर की रक्षा के लिए सक्षम दिखाई दे रहा है और न उसमें कहीं सिद्धांतों के जीवित होने के लक्षण ही शेष दिखाई दे रहे हैं.
यदि यही हाल रहा तो वर्ष २०५० तक विश्व में सिखों की संख्या घटकर एक करोड़ से भी कम हो जाएगी. जब तक सिक्खी सिद्धांत जीवित रहेंगे तब तक सिक्खी स्वाभिमान खड़ा रहेगा. सिख धर्म (पंथ) को सिक्खी सिद्धांतों से ही चलाया जाना चाहिए ना कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्र सोच से चलाया जाना चाहिए. आज जिनकी सोच से गुरुघरों का सञ्चालन हो रहा हैं उनकी सोच केवल व्यक्तिगत, राजनीतिक और महत्वकांशी है. उस सोच से आज किसी की जेब गर्म रह सकती हैं. गुजरा के लिए भत्ता मिल सकता हैं लेकिन धर्म साबित नहीं रह सकता. जब तक समाज को निष्पक्ष और निस्वार्थ समाज रचनाकार नहीं मिल जाते तब तक सिक्खी खतरें में हैं. हर सिख खतरे में हैं. टक्के-टक्के में बिकनेवाले यदि आज समाज के संचालन का श्रेय लेना चाह रहे है तो यह केवल जुगाड़ की भाषा है. जुगाड़ और तोड़मरोड़ से राजनिति चल सकती है. समाज और गुरु घर नहीं. क्या हर्ज है कि आज सिखों को ज्ञानवान की जगह आदिम कहा जाये. क्या होगा यदि आज के परिवेश में सिखों को योद्धा नहीं बल्कि राजनीतिक गुलाम कहा जाएं?
श्री गुरु नानक देवजी ने दौलत, संपत्ति का संग्रह नहीं किया लेकिन उन्होंने अच्छे और पवित्र कर्म करते हुए अपनी इहलोक यात्रा को भी स्वर्ग यात्रा में परिवर्तित कर दिया. आज गुरु नानकदेवजी के श्रद्धालु करोड़ों की संख्या में हैं, लेकिन सिकंदर के भक्त कितने हैं. सिकंदर को लोग केवल बल, छल का प्रतिक और एक बादशाह के रूप में ही जानते हैं. जबकि गुरु नानक देवजी, एक समाज रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं. सिकंदर ने कई देश जीतें और वो शासक बना. लेकिन किसी भी देश में उसका नाम समाज रचनाकार के रूप में नहीं लिया जाता. जबकि गुरु नानक देवजी ने फकीरों के वेश में विश्वभ्रमण कर मानवों के दिलों में स्थान पाया. वे बाबर जैसे बादशाह से भी नहीं डरे. जेल में जाकर चक्की चलाई। निडर होकर बादशाह बाबर को जाबर कहने का साहस किया. गुरु नानक देवजी की निडरता, निस्वार्थ जीवन ही आगे चलकर सिख धर्म की मूल नींव बनी. उनकी निडरता सिक्खी जीवन में सिद्धान्त के रूप में जीवित रही. आगे चलकर जब संत परंपरा के बावजूद भी शस्त्र उठाना पड़ा तब सिख गुरुओं ने उसी निडरता सिद्धांत को सर्वपरि माना.
सिख धर्म की रचना में गुरु नानक देव जी ने एक अभियंता की भूमिका निभाई हैं. गुरु जी ने केवल उपदेश नहीं दिया, केवल वाणी नहीं रची बल्कि समाज को रचने, बसने, फलने और फूलने की पर्याप्त व्यवस्था की. गुरूजी ने गांव और नगर बसाएँ. गुरूजी पानी की व्यवस्था के लिए कुएं खुदवाएं, सरोवरों का निर्माण करवाया. धर्म (समाज) को संचालित करने के लिए खेती में स्वयं परिश्रम किया. धार्मिक शोध, खोज और भक्तों के सेवा के लिए सिखों से दसवंध लेने की प्रथा शुरू की. उसी दसवंध से सिख धामों और गुरुद्वारों का निर्माण हुआ. दसवँध नाम की संकल्पना धार्मिक प्रयोजनों के लिए व्यवस्था का हिस्सा बनीं थी.
कालांतर बाद, दशम पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज तक ये प्रथा अविरत चलती रहीं. उनके बाद भी तीन शताब्दियों से सिखों ने दसवंध की प्रथा जीवित रखीं हुई हैं. गुरु की गोलक में साध संगत की किर्त-कमाई का संग्रहण होता है. ये कमाई केवल धार्मिक कार्यों और सामाजिक उद्देशों की पूर्ति के लिए खर्च होनी चाहिए. लेकिन वर्तमान में दसवंध केवल कमाई का साधन बन गया है. गुरुघर, सेवा नहीं बल्कि सत्ता केंद्र बन गए हैं. गुरुघर को राजनीति के अड्डों के रूप में उपयोग में लाया जा रहा हैं. गुरुघर का नियंत्रण आज सेवक नहीं बल्कि राजनेता कर रहे हैं. जिनके लिए दसवंध केवल उनके ऐशोआराम का साधन हो गया.
पंजाब से लेकर हजूर साहिब नांदेड़ तक और नांदेड़ से लेकर इंग्लैंड, कॅनडा जैसे देशों में भी दशवंध का अधिकतर स्थानों पर दुरुपयोग ही हो रहा हैं. क्योंकि सिक्खी सिद्धांतों को अमल में नहीं लाया जा रहा हैं. हमारे दस गुरुओं ने सिक्खी सिद्धांतों को प्रचारित किया और उनको सिक्खी जीवन का हिस्सा बनाया. आज समाज बिखरा हुआ हैं. सिख गुटगुटों में बिखरें हुए हैं. केवल सर पर पगड़ी धारण कर सिख होने का दिखावा मात्र कर रहे हैं. समाज की भलाई के लिए कोई काम नहीं कर रहा हैं. सभी की सोच केवल ग्राहक (संगत) बढाकर गोलक भरने मात्र तक सिमित रह गई हैं.
आज गुरुघरों के सेवादार बनने की होड़ तो मची हैं लेकिन कोई भी सच्चा सिख बनने को तैयार नहीं है. आज भी सिख धर्म और समाज को एक सशक्त रचनाकार की जरुरत है. जहां - जहां समाज विघटित हैं वहां - वहां समाज रचनाकारों की जरुरत हैं. लेकिन कोई उद्यमी व्यक्ति समाज के लिए उद्योग करने को तैयार नहीं. राजनीति के लिए सिखों का उपयोग करने के लिए सभी तैयार हैं. लेकिन राजनीति से सिख समाज को बृहद बनाने के लिए कोई कुछ करना नहीं चाहता. सिख धर्म का अनुयाई अपने पूर्व समाज रचनाकारों का इतिहास, योगदान भुला चुके हैं. स्वार्थ के आगे सभी नग्न होकर खड़े हैं. सिक्खी सिद्धांतों का चोला कब शरीर से छूट गया किसी को अहसास तक नहीं. वर्तमान में सिख नाम का प्राणि न आपने गुरु घर की रक्षा के लिए सक्षम दिखाई दे रहा है और न उसमें कहीं सिद्धांतों के जीवित होने के लक्षण ही शेष दिखाई दे रहे हैं.
यदि यही हाल रहा तो वर्ष २०५० तक विश्व में सिखों की संख्या घटकर एक करोड़ से भी कम हो जाएगी. जब तक सिक्खी सिद्धांत जीवित रहेंगे तब तक सिक्खी स्वाभिमान खड़ा रहेगा. सिख धर्म (पंथ) को सिक्खी सिद्धांतों से ही चलाया जाना चाहिए ना कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्र सोच से चलाया जाना चाहिए. आज जिनकी सोच से गुरुघरों का सञ्चालन हो रहा हैं उनकी सोच केवल व्यक्तिगत, राजनीतिक और महत्वकांशी है. उस सोच से आज किसी की जेब गर्म रह सकती हैं. गुजरा के लिए भत्ता मिल सकता हैं लेकिन धर्म साबित नहीं रह सकता. जब तक समाज को निष्पक्ष और निस्वार्थ समाज रचनाकार नहीं मिल जाते तब तक सिक्खी खतरें में हैं. हर सिख खतरे में हैं. टक्के-टक्के में बिकनेवाले यदि आज समाज के संचालन का श्रेय लेना चाह रहे है तो यह केवल जुगाड़ की भाषा है. जुगाड़ और तोड़मरोड़ से राजनिति चल सकती है. समाज और गुरु घर नहीं. क्या हर्ज है कि आज सिखों को ज्ञानवान की जगह आदिम कहा जाये. क्या होगा यदि आज के परिवेश में सिखों को योद्धा नहीं बल्कि राजनीतिक गुलाम कहा जाएं?
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(१५ सितंबर की तारीख अभियंता दिवस के रूप में मनाई जाती है. ऐसे समय रचनाकारों की भूमिका और दायित्व के सम्बन्ध में विचार ताजा हो जाना स्वाभाविक सी बात है.)






















