निवृत्ति लेने की सोंच रहा हूँ !
रविंदरसिंघ मोदी
तीन दशकों से अधिक का एक दीर्घ समय मैंने पत्रकारिता, समाज सेवा, शिक्षा क्षेत्र, साहित्य सेवा क्षेत्र में व्यतीत किया हैं. इस कार्यावधि में मैंने कभी किसी राजनीतिक विचारधारा को अपनाये बगैर लगातार हजुरसाहिब के लिए अलग - अलग माध्यम से स्वयं को आंदोलन बनकर सेवा निभाता रहा. तखत साहिब के उपक्रम, धार्मिक कार्यक्रम, त्यौहार, उत्सव और स्थानीय सिखों की प्रतिमा को सकारात्मक आकार देने के लिए मैं झुजता रहा, प्रयत्नशील रहा. बदलते हुए, तब्दील होते हुए हजुरसाहिब के जनजीवन, इतिहास और मार्गक्रमण का मैं एक प्रमाण हूँ. मैं, अब विचार कर रहा हूँ कि सभी तरह के जारी उपक्रमों से निवृत्ति प्राप्त कर लूँ. केवल समाचार पत्रों का संपादन और दृश्य पत्रकारिता में कार्यरत रहूँ. सभी तरह के सामाजिक और धार्मिक आंदोलन से अब निवृत्ति प्राप्त कर लूँ. इस सोंच के पीछे बहुत से कारण हैं. जिनमें एक प्रमुख कारण स्वास्थ्य का हैं. पिछले दो से तीन वर्षों में लगातार स्वास्थ्य समस्याएं जारी हैं. आगे लंबे समय तक मैं काम नहीं कर पाउँगा शायद. हालिया कोविड संक्रमण काल में मुझ सामान्य सिख पर दशमेश पिता, श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज की छत्र-छाया अबाधित रहीं जिसके कारण हर समय, हर विपरीत परस्थिति में मैं सुरक्षित रह पाया. संतों का आशीर्वाद और सभी हितचिंतकों की सदिच्छा से मैं कठिन दौर से बाहर निकल पाया हूँ. मुझे अहसास हैं कि आनेवाले समय में परिस्थिति किसी भी करवट बैठ सकती हैं. आगे क्या दौर आएगा कोई कह नहीं सकता.
राजनीति क्षेत्र में जाने की मेरी कोई इच्छा नहीं हैं, हालांकि कुछ प्रस्ताव मेरे पास हैं. विकल्प पहले भी थे, आज भी हैं लेकिन मेरी अपनी विचारधारा के चलते मैंने युवावस्था से ही राजनीति का परहेज किया हैं. इस कारण मैंने सदा राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों का समय - समय पर तिरस्कार, ईर्ष्या, द्वेष और सौतेलापन झेला हैं. कई बार कूटनीतियों का शिकार भी रहा हूँ.
मैंने, जिन - जिन क्षेत्रों में कार्य किया हैं, उन क्षेत्रों में मेरा कोई "गॉड फादर" नहीं रहा हैं. हां बहुत से लोग मेरे लिए आदर्श जरुर रहे हैं. खुद में थोड़ा बहुत हुनर था. काम के प्रति समर्पण था. सदा सकारात्मक दृष्टिकोण साथ था. किसी को गलत राह पर भेजनें की कभी मंशा नहीं रहीं. कभी किसी युवा को उग्रता की ओर मोड़ने का या भटकाने का काम नहीं किया. अभी तक खुद के नाम पर कोई संस्था खड़ी नहीं की. ना कभी हजूरसाहिब की गरिमा को कम किया हैं. लेखन के माध्यम से मैंने सदैव यहाँ का गुणगान किया हैं. हजूरसाहिब की वर्तमान परिस्थितियों में मेरा कोई स्थान मुझे दिखाई नहीं देता हैं. अब यहाँ कुछ करने के लिए अनुकूल माहौल उपलब्ध नहीं हैं. समाज की डोर "होनहार" लोगों के हाथ हैं. बाहरी नेतृत्व बहुतों की मंशा हो! यहाँ हमारी सलाह काम नहीं करेंगी. इसलिए निर्णय पर सोचना योग्य होगा.
हजूर साहिब के समाज का सामाजिक विज्ञान को मैं कभी समझ नहीं पाया. लोग बौद्धिकता को जेब में रखने की हिमाकत चाहते हैं. कुछ बुद्धिजीवि मेरे साथ प्रतियोगिता करना चाहते हैं. बहुत से राजनीतिक चेहरों का मेरे प्रति यह प्रयास रहा हैं कि, समाज में मेरा स्थान केवल एक लेखक का रह जाएं. यह सामूहिक प्रयास (दांव) भी रहा हैं. जब तक आप लिख - लिख कर लोगों को लाभान्वित करते रहते हो, लोग आपके आपके पीछे - पीछे रहते हैं. सम्मान परोसते हैं. लोगों को चुनाव जितवाते हो तब तक ठीक. जब आप किसी के लिए सेवाएं संक्षिप्त कर देते हो तो तब अभिलाषी सभी द्वेष, बदनामी और अपमान तक पर उतारू हो जाते हैं. आपके खिलाफ अभियान चलाते हैं. पिछले दो सालों में मुझे सभी अनुभव प्राप्त हो गए हैं. मेरे बहुत से भ्रम, संभ्रम भी टूटे. यहाँ, नेता और नेतृत्व बनने के लिए व्यक्ति के पास संघटन, बड़ी रिश्तेदारी (टब्बर), बड़ा मित्रवर्ग और पैसा जैसी योग्यता चाहिए हैं. टिकने और टिकाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीति अमल में लाने की सक्षमता चाहिए. मैं ऐसी बड़ी औकात नहीं रखता. इस बात का अहसास होने से अपने आपको सारे राजनीतिक प्रपंचों से सदैव मुक्त रखा. अलग ही रखा. जिसने प्यार और सम्मान से गुरुफतेह बुलाई मै नतमस्तक हो गया. जिन्होंने हिकारत दिखाई, बदनामी की, ईर्ष्या दिखाई, मेरी प्रतिमा को मलिन करने के अभियान चलाये उन्हें कभी कोई शिकायत नहीं की. नफरत करें यह उनका अधिकार हैं ! इसलिए समाज के किसी वर्ग से कोई शिकायत नहीं हैं. सबकी अपनी - अपनी सफलताएं हैं, मेरी अपनी सफलता या नाकामी सही. समाज में और भी सेवाभावी, बुद्धिजीवि, कर्मशील उपजाने की क्षमता हैं. अच्छे लोगों को, अच्छे विचारों का वलय दृष्टिगोचर होकर रहेगा यह विश्वास हैं.
विगत 32 वर्षों में मैंने मेरे कार्य और पेशे को लेकर प्रमाणिकता के साथ काम किया हैं. जो घटित हुआ उसे कोई बदल नहीं सकता ! सब इतिहास हैं ! लेकिन उसका मूल्यांकन करने का हौसला और नियत किसी की नहीं होगी. मेरे द्वारा संचालित पांच से छह बड़े आंदोलन इस बात के साक्षी हैं. पूरी ईमानदारी से यह भी स्वीकार करता हूँ कि मैं अभी तक सफल नहीं हो पाया, वो है, कलम ग्यारह के संशोधन को रद्द करवाने का आंदोलन! यह आंदोलन अभी समाप्त नहीं हुआ हैं! सच्चाई यह हैं कि, यह आंदोलन मेरे हाथ नहीं रखा गया हैं. इस विषय के निराकरण को लेकर गठित समिति का उत्तरदायित्व बड़ा हैं. सात मेंबर साहिबान की एक समिति "सात सदस्यीय समिति " द्वारा ड्राफ्ट बनाकर, उसे महाराष्ट्र सरकार को भेजना हैं. बोर्ड के सदस्यों का शिष्टमंडल सरकार से मिलकर "संशोधन" रद्द करवाने की मांग करेगा ऐसा उस समय निर्धार किया गया था. दुर्भाग्यवश या राजनीतिवश मैं उस समिति में नहीं हूँ. मेरे लड़ने के सभी अधिकार उस समिति ने दो साल पहले ही अपने अधीन कर लिए हैं. वर्ष 2015 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा बगैर हमारी सलाह लिए गुरुद्वारा बोर्ड के एक्ट में कलम ग्यारह का संशोधन लादा गया था. उस विषय को हजूर साहिब से विरोध दर्शाने वाला मै पहला व्यक्ति था. इस विषय को प्रस्तुत कर जनभावना का रूप देनेवाला मै था. पर मुझे समिति में स्थान नहीं देकर "समिति" ने आंदोलन का दायित्व खुद स्वीकार कर लिया. एक तरह से मुझे दुत्कार कर आंदोलन से बाहर कर दिया गया. मेरे जीवन में यह अपमान का सबसे बड़ा क्षण था ! मुझे आंदोलन से उठाकर बाहर फेंक दिया गया.
मुझे कलम ग्यारह का वादा याद दिलाने वाले, तानें मारने वाले, बदनाम करने वाले "सज्जन" कभी यह क्यों नहीं सोच पाए कि उस समिति में रविंदरसिंघ मोदी को क्यों नहीं शामिल किया गया? उन्होंने बीते दो सालों में उस "समिति" से कभी प्रश्न किया हैं कि "कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने वाला ड्राफ्ट " सरकार को अभी तक क्यों नहीं भेजा गया?" इस समिति पर साधसंगत का विश्वास हैं इसलिए मैं खामोश रहा और खामोश हूँ. अपने स्तर पर सरकार से मेरी मांग लगातार जारी हैं. इस आंदोलन के अभी तक की असफलता की जिम्मेदारी मै अपने ऊपर लेने को तैयार हूँ क्योंकि मैं चंद सत्ताधीशों से उनकी सत्ता लालसा में बाधा नहीं बनना चाहता हूँ. मैं व्यक्तिगत रूप से यह अलाव ज्वलित रखने का प्रयास करूँगा. वर्तमान बोर्ड तीन साल चलाये या पांच साल कुछ साध्य नहीं होनेवाला. हजुरसाहिब की साधसंगत के अनुकूल गुरुद्वारा बोर्ड का कानून रहे यह मेरी मंशा हैं. यह अपराध है तो बताइये? कौन क्या करें, क्या भूमिका लें यह मेरे कहने की बात नहीं रह जाती. सभी राजनीति के माहिर हैं, जानकर हैं. उस लिहाज से मेरी सलाह के कोई मायने नहीं हो शायद. हजुरसाहिब की सेवा का जिन्होंने व्रत लिया हैं, साधसंगत को जिन्होंने वचननामे परोसे हैं उन सभी के लिए मैं भी एक मामूली सिख ही हूँ. सही मायने में मेरी यहीं पहचान भी हैं. एक सामान्य और मामूली सिख बनें रहने से संतुष्टि प्राप्त हो ऐसी शुरू से अभिलाषा कायम हैं. इसलिए मैं चाह रहा हूँ कि बहुत सारे दायित्वों से अब मैं मुक्त हो जाऊ. मेरे कारण किसी को कष्ट पहुंचा हो, किसी की भावनाएं व्यथित हुईं हो तो मैं अपराधबोध स्वीकार कर आपसे माफी मांगता हूँ. नये लोग काम करें, समाज की प्रतिमा उज्वल करें और समाज को विकसित करें यहीं मेरी मनोकामनायें रहेगी.
दूसरी ओर मेरा पत्रकार परिवार, साहित्य क्षेत्र परिवार और मित्र परिवार हमेशा मेरी जीवनयात्रा में साथ रहा. इस कारण एक संस्मरणीय संघर्ष यात्रा यहाँ तक आ पहुंची हैं. दस सालों की गुरुद्वारा बोर्ड की नौकरी, 34 वर्षों की साहित्य लिखाण सेवा, 28 सालों की अर्ध (6 वर्ष) और पूर्णसमय (22 वर्ष) की पत्रकारिता, देश के बड़े समाचार पत्र उद्योगों के लिए सेवा पात्रता और कार्य, साथ समाज के लिए अलग - अलग विषयों को लेकर सरकार और प्रशासन से मैं एक मामूली व्यक्ति संघर्षरत रहा. चार लोगों के लिए काम आ पाया यह मेरे लिए एक संतुष्टि का विषय हैं. अब सक्रियता को छोड़ कर केवल संक्षिप्त पत्रकारिता के लिए मैं समय देना चाह रहा हूँ. ब्लॉग के माध्यम से मैं सभी हितचिंतकों से, सीनियर लोगों से और सभी उम्र के मित्र वर्ग से उनकी राय, सलाह चाहता हूँ कि वें मुझे अपने विचारों से अवगत करवाएं कि मुझे क्या निर्णय लेना चाहिए? मेरा व्हाट्सप्प नंबर 9420654574. आप सभी की भावनाएं मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं.
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