गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पर छाया आर्थिक संकट ?
डेलीवेजस, बिलमुक्ता रोजंदारी कर्मचारियों को राहत दीजिए
रविंदरसिंघ मोदी
गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड हजुरसाहिब नांदेड़ धार्मिक संस्था की वार्षिक बजट बैठक ता. 13-06-2021 को ऑनलाइन प्रणाली से संपन्न हुई. यह मीटिंग मार्च में स्थगित करनी पड़ गई थी. हालिया संपन्न बोर्ड मीटिंग में बीस विषयों के अलावा फुटकल विषयों पर भी चर्चा हुईं. लगभग सभी मुद्दें घुमाफिराकर पास कर लिए गए. एक - दो निर्णय जो बोर्ड प्रशासन को दिक्कत में डाल सकते थे, उन्हें पूरा या अधूरा रद्द कर दिया गया. वैसे वर्ष 2020 - 2021 के वार्षिक बजट में प्रस्तावित बजट की अनुमानित आमदानी में 70 से 80 करोड़ का सीधा नुकसान (घाटा) दिखाई दें रहा हैं. पिछले वर्ष के प्रस्तावित बजट में 125 करोड़ की आय अनुमानित रखी गई थीं. लेकिन वर्षपूर्ति पर कुल आय ऐसे - तैसे 32 करोड़ रूपये के आसपास ही हो पाई. कोरोना संकट कालावधि में गोलक और अन्य आमदानी बुरी तरह से प्रभावित हुईं हैं. इसलिए वर्ष 2021 - 2022 का आर्थिक प्रारूप पत्र (बजट) केवल 65 करोड़ ही प्रस्तावित करना पड़ गया. यांनी आर्थिक मामलों में गुरुद्वारा बोर्ड संस्था गहरे संकट में घिर गई हैं कहा जाए तो गलत नहीं होगा.
इस विषय में शायद गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान, पदाधिकारी, समन्वयक और मेंबर साहिबान खुलकर कुछ बताने में असमर्थ प्रतीत हो रहे हैं. इस बजट को किसने कितनी गंभीरता से लिया हम कह नहीं सकते लेकिन इस विकट परिस्थिति में वार्षिक बजट को लेकर चाहिए थीं, वैसी गंभीर चर्चा भी देखने को नहीं मिली हैं. कारण ! कारण यहीं कि बजट से ज्यादा पदाधिकारी और मेंबर साहिबान को अपने अपने व्यक्तिगत मुद्दों को पास करवाने तक ही जिज्ञासा थीं कही जाएं तो गलत नहीं होगा. बोर्ड की आमदानी में वृद्धि को लेकर किसी के पास कोई नया प्रस्ताव नहीं था. मेंबर साहिबान विषय पत्रिका में शामिल अधिकतर विषयों को लेकर वैसे आपसी सहमति में ही दिखाई दिए. नौ में से आठ मेंबर साहिबान ऑनलाइन मीटिंग में हाजिर थे. एक मेंबर साहब अनुपस्थित थे.
प्रधान भूपिंदरसिंघ मनहास को ग्यारह महीनों के अंतराल के बाद एक मीटिंग पूर्ण सफल होने की संतुष्टि तो हुईं होगी. लेकिन एक नई बात यह देखने को मिली कि सेक्रेटरी स. रविंदरसिंघ बुंगाई द्वारा डेलीवेजस कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने की गई मांग को प्रधान भूपिंदरसिंघ मनहास द्वारा अस्वीकार (ख़ारिज) कर दिया गया! यह बात चमत्कार हैं या केवल एक दृश्यम मात्र हैं? सभी के देखने में यह आया हैं कि अभी तक गुरुद्वारा बोर्ड की सत्ता को सेक्रेटरी रविंदरसिंघ बुंगाई एकतरफा चला रहे हैं. मुंबई या औरंगाबाद में बैठें प्रधान साहब कोई दैनंदिन निर्णय लेने से पहले या ऑफिस आर्डर पर दस्तखत करने से पहले सेक्रेटरी रविंदरसिंघ बुंगाई या समन्वयक स. परमज्योत सिंघ चाहल का परामर्श जरूर लेते हैं. इस विषय में क्या हो गया?
आश्चर्य की बात तो यह हैं कि हालिया बोर्ड मीटिंग के एजैंडा में कर्मचारियों को पक्का करने का विषय एजैंडा में शामिल ही नहीं करवाया गया था! यह देखकर इस तरह का संदेह मन में उठना स्वाभाविक सी बात हैं. यदि विषय पत्रिका में यह विषय रखकर उसे आर्थिक परेशानियों का हवाला देकर अस्वीकार कर दिया जाता तो शायद कुछ समझा जा सकता हैं. पिछले चार से पाँच माह से बोर्ड कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का विषय लेकर खुद इलेक्टेड मेंबर साहिबान मांग करते आ रहे थे. कभी लेटर के माध्यम से, कभी वीडियो के माध्यम से, कभी मीडिया के माध्यम से मांग और आश्वासन का दौर चलता आया हैं. तीनों सदस्य एक मंच पर आ गए थे. लेकिन क्यों वो विषय एजैंडा में स्थान पा नहीं सका? इतना अहम विषय एजैंडा में क्यों नहीं रखा गया यह सवाल कर्मचारियों को भी खल रहा हैं. कुछ कर्मचारियों ने हमारे साथ भी इस विषय में चर्चा की और अपनी परेशानियों से अवगत करवाया.
बोर्ड मीटिंग में रविंदरसिंघ बुंगाई ने आवाज उठाई थी कि बड़ी संख्या कर्मचारी पांच सालों से डेलीवेजस पर कार्यरत हैं और नियमों के तहत दो सालों की सेवा के बाद उन्हें सेवा में पक्का किया जाना चाहिए. वैसे बोर्ड एक्ट में पक्का करने को लेकर कोई लिखित नियम नहीं हैं, "दो साल" शब्द केवल एक प्रैक्टिस के तहत चला आ रहा हैं. इस लिहाज से जाहीर है सभी डेलीवेजस कर्मचारी आशावाद में थे. लेकिन प्रधान साहब ने सेक्रेटरी साहब का मौखिक प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया! अन्य सदस्य क्या चर्चा करते? आर्थिक संकट के संबंध में शायद उन्हें पूर्व कल्पना होगी. यदि सभी पात्र कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का निर्णय लिया जाता तो गुरुद्वारा बोर्ड की तिजोरी पर प्रतिमाह 34 लाख से 36 तक का अतिरिक्त खर्च बढ़ जाता. यानी एक वर्ष में साढे चार करोड़ तक का बजट बढ़ जाता. कोरोना के हालात में यह निर्णय संभव नहीं था. इसलिए एजैंडा में मुद्दा शामिल नहीं हो पाया होगा. लेकिन सीधा तथ्य परोसने की बजाए उस विषय को मोड़ देने का प्रयास योग्य नहीं होगा. वैसे देखा जाएं तो पिछले दो ढाई सालों में कर्मचारी पक्के क्यों नहीं किये गए. जिन्हें दो वर्ष हुए उन्हें बोर्ड मीटिंग के आस पर पक्का किया जाना कोई गैर नहीं होता.
हमारी सलाह है कि बोर्ड भले अभी कुछ समय के लिए कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का विषय आगे बढ़ा दें. लेकिन डेलीवेजस, बिलमुक्ता और रोजंदारी में वेतन वृद्धि जरुर करें. हमारा प्रस्ताव हैं कि कोरोना और महंगाई का वर्तमान समय देखते हुए कलर्क के वेतन में प्रतिदिन एक सौ रूपये (₹ 100/-) और सेवादार के वेतन में प्रतिदिन पिचहत्तर रूपये (₹ 75/-) की वेतनवृद्धि की राहत दी जाएं. वहीं आज्ञा आदेश के लिए भी रोजंदारी में प्रतिदिन 75/- रूपये मजदूरी बढ़ाई जाएं. यदि प्रधान साहब और मेंबर साहिबान इस निर्णय पर सहमति बनाते हैं तो निश्चित ही चार से पंच सौ कर्मचारियों को राहत मिलेगी. वहीं जो मामले अनुकंपा से जुड़े हैं उनका निराकरण तो किया जा सकता हैं. उनको प्रलंबित रखा जाना कर्मचारियों के अधिकार और हक पर अन्याय हैं. अनुकंपा और ससपेंड कर्मचारियों के विषय में बोर्ड की भूमिका कर्मचारियों को प्रताड़ित करने जैसी हैं. क्या यह मामला लटकाकर रखने का निर्णय प्रधान साहब का व्यक्तिगत हैं? अब इलेक्टेड मेंबर साहिबान भूमिका क्यों नहीं अपनाते?
अंतिम बात यह कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था आर्थिक संकट में घिर गई हैं. भूपिंदरसिंघ मनहास के पास कोई जादू की छड़ी नहीं हैं कि घुमाई और तिजोरी भर गई. श्री मनहास पिछले दो से ढाई सालों में बोर्ड के लिए नैतिक मार्गों से कोई बड़ी उगराई करने में भी असफल रहे हैं. कोरोना तो मार्च 2020 में आया और अप्रेल 2020 में लॉकडाउन जारी हुआ. भूपिंदर सिंघ मनहास ने मार्च 2019 में पद संभाला. मार्च 2019 से अप्रैल 2020 तक 13 माह में आमदानी बढ़ाने के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं हो पाए. केवल बातें, प्रदर्शन और विवाद में उन्होंने समय गंवाया कहा जाएं तो गलत नहीं होगा.
बीते 14 महीनों में तखत साहब की गोलक में चढ़ावा निरंतर घटता चला गया. उस पर हर माह कोई ना कोई काम के बहाने खर्च जारी हैं. लॉकडाउन में भी टेंडर जारी होते रहे हैं ! खर्च जारी है लेकिन आमदानी कम हो रही हैं. क्या बोर्ड के प्रधान और मेंबर साहिबान आमदानी वृद्धि के लिए या चढ़ावा जमा करने के लिए प्रयास नहीं कर सकते? यदि बोर्ड द्वारा मीडिया के जरिये विश्व के सिखों से या सिख संस्थाओं से दसवंध की अपील की जाएं तो संस्था आर्थिक संकट से उबर सकती हैं. बोर्ड संस्था में कार्यरत डेढ़ हजार कर्मचारियों की शक्ति व्यर्थ हो रही हैं. हर स्वाभिमानी सिख चाहेगा कि गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पर छाये आर्थिक संकट के बादल दूर हटाने में भूमिका निभाएं.
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