गुरुद्वारा बोर्ड के जिम्मेदारानं की चुप्पी योग्य नहीं हैं !
ज्ञानी हरिंदरसिंघ जी अलवर वाले का चिंतन
रविंदरसिंघ मोदी
मैं कल से इन्ही विचारों में कहीं व्यस्त था कि हजूर साहिब की वर्तमान सामाजिक स्तब्धता पर क्या भाष्य किया जाएं. इन विचारों की तंद्रा उस समय और भी आवेग में पहूंच गई जब पंथ के बुद्धिजीवि, संजीदा व्यक्तित्व और हज़ूर साहिब की सिक्खी और सिखों पर नितांत प्रेम करने वाले ज्ञानी हरिंदरसिंघ जी अलवर वाले का मुझे आज सुबह व्हाट्सअप कॉल आया. ज्ञानी जी हमेशा हज़ूर साहिब की हलचल और मार्गक्रमण की सुध लेते रहते हैं. मेरे साथ उनका फोन पर संपर्क जुड़ा रहता हैं. पंत के एक बुद्धिजीवि के रूप में उनकी सेवाएं बहुत अहम हैं जिसके संबंध में कभी विस्तार से चर्चा जरूर करूँगा. लेकिन विगत 45 वर्षों से ज्ञानी जी का हज़ूर साहिब के साथ रिश्ता बना हुआ हैं. दशमेश पिता जी की उनके सिर खास मेहर बनी हुईं हैं.
ज्ञानी हरिंदरसिंघ जी ने आज फोन पर हुईं चर्चा में हजुरसाहिब बोर्ड के वर्तमान हालात और दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी से जुड़े विषयों पर भी चिंता व्यक्त की. होली हल्ला महल्ला की घटना और पुलिस द्वारा दर्ज मामलों से विस्थापित सिख बच्चों के प्रति उनकी चिंता और इन मामलों के शीघ्र समाधान को लेकर उनकी व्याकुलता सराहनीय प्रतीत हुईं. उन्होंने मुझसे प्रश्न किया कि, "समाज के लोगों के सामने एक बड़ा कानूनी संकट खड़ा हैं, सिख परिवार, बच्चे, माता - पिता परेशान हैं ! ऐसे में गुरुद्वारा बोर्ड के जिम्मेदारान सामने क्यों नहीं आ रहे हैं? साधसंगत की समस्याओं के विषय में पहल क्यों नहीं कर रहे हैं? पिछले तीन महीनों से ज्यादा समय जेल में बंद लोगों और अन्य लोगों की जमानत और अन्य कानूनी करवाई के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाएं जा रहे हैं? पुलिस प्रशासन के साथ बातचीत का सिलसिला क्यों नहीं किया जा रहा हैं? आदि... !
ज्ञानी जी के प्रश्न, चिंता और सद्कामना योग्य हैं. पुलिस प्रशासन और जिला प्रशासन के साथ वैसे दो से तीन बार चर्चा भी हुईं हैं. जिलाधीश डॉ. विपीन इटनकर, पुलिस अधीक्षक डॉ प्रमोद शेवाले और पुलिस के अन्य अधिकारियों से साधसंगत से चर्चा और गुहार जारी हैं. स्थानीय समाज में शांति और कानून व्यवस्था के परिसंचालन के लिए पुलिस और सिख समाज की सामाजिक संयुक्त पहल भी संपन्न हुईं. लेकिन तीनों केसेस में व्याप्त कानूनी दिक्कतों का निपटारा अब पूरी तरह से पुलिस के अधिकार में नहीं रहा शायद! नांदेड़ न्यायालय में प्रकरण में गिरफ्तार लोगों की जमानत अर्जी को सुना गया और अगली तारीख के तहत बढ़ाया गया. संभव है कि इस महीने जमानत को लेकर अच्छी खबर मिले. लेकिन प्रश्न यह हैं कि गुरुद्वारा बोर्ड के जिम्मेदारान आखिर कर क्या रहे हैं? गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड द्वारा कुछ बोर्ड पदाधिकारियों के लिए हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल करवाई गई. गुरुद्वारा बोर्ड द्वारा दो से तीन लोगों का ही केस लड़ा जा रहा हैं? बाकी समाज की सुध लेनेवाला कोई नहीं हैं ! एक गरीब चाहे भी तो आज ज़मानत करवाने का भारी भरकम खर्च उठा नहीं सकता. सच्चाई यह भी हो सकती हैं कि गिरफ्तार होने के बाद पता नहीं कितने दिनों तक जमानत ना मिले और जेल में ही भुगतना पड़े, इस डर से बहुत से अभियुक्त फरार हैं. लेकिन कब तक यह सामाजिक विस्थापन जारी रहेगा!
आज घटना घटित होकर सौ दिन पूर्ण हो गए हैं. बोर्ड के प्रधान स. भूपिंदर सिंघ मिनहास ने अभी तक हज़ूर साहिब में अपने कार्यालय को भेट नहीं दीं. हालांकि उनका मुंबई और औरंगाबाद के बीच निरंतर आवागमन जारी हैं. इतनी बड़ी घटना के बाद भी वो सिख समाज की सुध नहीं ले पाते तो "वो" काहे के हज़ूर साहब के सेवक हुए. सरकार और पुलिस विभाग भी नैतिक पहलु के तहत उनसे पूछे कि जिस स्थान से जुड़ी संस्था के वें सरकार द्वारा अध्यक्ष है, उनकी घटना के बारे में कोई पहल क्यों नहीं है. क्या प्रधान साहब ने पुलिस, जिला प्रशासन, महाराष्ट्र सरकार को "होली हल्ला महल्ला" घटना की अध्यक्ष होने के नाते नियमानुसार रिपोर्ट प्रस्तुत की है? प्रशासन को कम से कम गुरुद्वारा बोर्ड का लिखित पक्ष तो जान लेना चाहिए ऐसी इस घटना की प्राथमिकता भी है. गुरुद्वारा बोर्ड को भी चाहिए कि होली के समय घटित घटनाओं की रिपोर्ट उस समय के प्रभारी अधीक्षक स. जसविंदर सिंघ दिनपुर से भी मंगवाए. क्या ये रिपोर्ट न्यायालयीन दिक्कतों की खामियाँ दूर करने में कारगर साबित हो सकती है. प्रश्न यहीं है कि स. भूपिंदरसिंघ मिनहास नांदेड़ क्यों नहीं आना चाह रहे हैं?
इस समय हज़ूर साहिब के सिखों के सामने दो से तीन सामाजिक समस्याएं कायम हैं. एक तो कोरोना संक्रमण के कारण समाज में हो रहीं निरंतर मृत्यु से मृतक परिवार का आर्थिक विवेचन और जीवन जीने के लिए संघर्ष का विषय हैं. गरीब परिवारों के लिए लड़कियों के विवाह का एक प्रश्न उठ रहा हैं. तीसरी बात यह कि आये दिन सिख युवकों, विद्यार्थियों का शिक्षा एवं रोजगार के लिए संघर्ष. चौथी बात होली हल्ला महल्ला के समय हुईं घटनाओं में कानूनी शिकंजे में घीरें, गिरफ्तार और फरार (अभियुक्त) लोगों के परिवारों पर छाएं संकट का विषय. इस समय स्थानीय सिख समाज में यहीं मुद्दे चर्चा में व्याप्त हैं जिनके कारण समस्त समाज पर स्तब्धता का आवरण छाया हुआ हैं. कानूनी रूप से तीनों एफ. आई. आर. का न्यायायिक परिसंचालन बहुत ही जटिल और पेचीदा हैं. पुलिस और कानून ने अपना काम शिद्दत से किया हैं क्योंकि पुलिस विभाग की वो जिम्मेदारी हैं. एक एफ.आई.आर. की चार्जशीट न्यायालय में प्रस्तुत भी हुईं हैं. कुछ लोगों को राहत मिली हैं तो असंख्य लोग मामलों में लिप्त हैं. जिसके कारण बहुत से परिवारों में बच्चों के विवाह टाल दिए गए हैं. बहुत से परिवारों के घर के कमाऊ पुरुष जेल में हैं या फरार हैं, जिनके परिवारों का भूख से संघर्ष जारी हैं. दवाई गोलिया और उपचार की जद्दोजहद जारी हैं.
होली घटना के बाद तमाम राजनीतिक पार्टियों ने सिख समाज के साथ दूरिया बढ़ा लीं हैं. कोई नेता सिख समाज की समस्याओं के निराकरण के लिए आगे नहीं आया हैं. हां, कुछ लोकल सिख नेता जरूर राजनीतिक नेताओं की चौखट पर खड़े दिखाई दे रहें हैं. लेकिन वें अपने व्यक्तिगत काम और मंशाओं तक ही सिमित हैं. समाज की समस्या पर हल निकालने के लिए कोई पहल नहीं करना चाह रहा हैं. यदि आसपास कोई चुनाव होते तो शायद किसी को ज्यादा मिन्नतें नहीं करनी पड़तीं. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कोई चुनाव निकट नहीं हैं. इसलिए सिख समाज का आशावाद भी समाप्त होता हैं.
बहुत ही मार्मिक तथ्य हैं कि ज्ञानी हरिंदरसिंघ जी हज़ार मील दूर बैठ कर हजूर साहिब के लिए चिंता व्यक्त करते हैं, लेकिन तीन सौ किलोमीटर या छह सौ किलोमीटर दूर बैठे सत्ताधीशों के मन नहीं पिघलते. आज बुद्धिजीवि को समाप्त करने की सोच और षड़यंत्र स्थानीय राजनीतिक प्रवृत्ति के लोग कर रहे हैं. सिख समाज के अच्छे बुद्धिजीवि काल में समा चूके हैं. कुछ हैं लेकिन उन्हें चुप कराने के लिए सामूहिक बल और छल की नीति अपनाई जा रहीं हैं. यदि समाज के तथाकथित लीडर बहुत जानकर, अभ्यासु और परिस्थितिपूरक औरा से परिपूर्ण होते शायद किसी बुद्धिजीवि को राजनीति जैसे क्षेत्र पर भाष्य करने की जरुरत नहीं होती. जिस समाज में नेतृत्व पतन हो जाता हैं वहां समाज के बुद्धिजीवि वर्ग को बोलना और लिखना पड़ता हैं. कड़वी सच्चाई ये भी है कि समाज और राष्ट्र के लिए आवाज़ उठानेवाला कोई बुद्धिजीवि बहुत बार अकेला पड़ जाता है या षड़यंत्र के तहत उसे समाप्त करने की मोहिम छेड़ी जाती हैं. उनका यह सामाजिक अपराध परदे के पीछे छिप जाता हैं. ऐसे समय में समाज का प्रबुद्ध वर्ग भी अनभिज्ञ बन जाता हैं.
मैंने, अपने आप को लेकर कभी "कुछ होने" का दावा नहीं किया हैं. सही बयान करूं तो मैं कुछ भी नहीं हूँ. लेकिन सामान्य होने के नाते, समाज का घटक होने के नाते अपनी जिम्मेदारी मैं समझता हूँ. मेरे प्रति तथाकथित घृणा करने की प्रेरणा जगाने वाले कभी यह भी सोचें कि मैं आपकी "वोट की राजनीति" से हमेशा दूर ही रहा. लेकिन अच्छे और सेवाभावी लोगों के लिए मैंने हमेशा संघर्ष किया हैं. यदि किसी के "कारोबार" पर पत्रकारिता करनी होती तो अच्छे - अच्छे को अपात्र साबित करने की क्षमता मैं भी उपयोग में लाता. पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक लाभ की दृष्टि से मैंने पत्रकारिता को अंजाम दिया हैं. मैंने बहुत लोगों को बनते और ढहते देखा हैं. समाज के सामने के चरित्र और परदे के पीछे के चरित्र का संज्ञान होने के बावजूद भी मैंने किसी का समाज के सामने वस्त्रहरण नहीं किया. क्योंकि मैं समाज निर्माण का महत्व समझता हूँ. व्यक्तित्व निर्माण की कीमत समझता हूँ. स्थानीय समाज और अन्य समाज की तुलना करने और सामाजिक विकास को लेकर मेरी तड़प रहीं हैं. यदि किसी को इस विषय में शुद्ध ठेकेदारी करनी हो तो खुलकर बताएं मैं आपकी "क्रांति" को मार्ग देकर अलग हो जाऊंगा. मैं इस कार्य से निवृत्त होने के लिए तैयार हूँ लेकिन पहले अपनी क्षमता से तो परिचित करवाओ कि आप यह सब कर सकते हो ! अपने आपको जाँच लें. युवा पीढ़ी को उकसाने के अलावा आप किस तरह से अच्छे समाज का निर्माण कर सकते हो. कोई भी चीज ढाहना आसान हैं पर निर्माण मुश्किल हैं. तथाकथित नेताओं के पिछले कुछ घोषणापत्रों पर यकीन कर समाज भी घोर निराशा महसूस कर रहा हैं. आज समाज की आवश्यकताओं पर उनको खरा उतरने की जरुरत हैं. आज ! आज का वर्तमान बदलना हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं. इन विषयों के प्रति जब संजीदगी नहीं तो काहे का समाज और काहे का "बोर्ड"!
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रविंदरसिंघ मोदी.





































