"ये अधिवेशन और ये चुप्पी !"
रविंदरसिंघ मोदी
महाराष्ट्र सरकार का दो दिवसीय विधानसभा अधिवेशन ता. 5 जुलाई 2021 से प्रारंभ हो रहा है. उम्मीद की जा रहीं हैं कि इस अधिवेशन के सत्र में सरकार 'गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड नांदेड़ संस्था कानून 1956' की कलम ग्यारह में करवाया गया पिछला संशोधन (ता. 18-02-2015) रद्द करवा दें. पिछला संशोधन माजी मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस और भाजपा के पूर्व विधायक स्व. तारासिंघजी के प्रयत्नों से साध्य हुआ था. भाजपा - शिवसेना की गठबंधन वाली पिछली सरकार ने बहुमत के बल पर वह एकतर्फा संशोधन पारित करवा लिया था. कलम ग्यारह में संशोधन कर गुरुद्वारा बोर्ड संस्था के प्रधान पद (अध्यक्ष) पर सीधी नियुक्ति करने का निर्णय लादा गया था. जो एक तरह से हजूरसाहिब के सिखों पर घोर अन्याय था. साधसंगत जी द्वारा उक्त निर्णय का बड़ा विरोध किया गया था. लेकिन फडणवीस सरकार के कानों पर ज्यूं तक नहीं रेंगी थीं ! सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था पर फडणवीस सरकार द्वारा बलपूर्वक निर्णय अमल में लाया गया था. उस समय शिवसेना भी नांदेड़ के सिखों के समर्थन में खड़ी नहीं हो पाई. अन्य राजनीतिक पार्टियां भी यह कहकर अलग - थलग रहीं कि यह सिखों की धार्मिक संस्था का विषय हैं, हमें क्या लेना !
गुरुद्वारा बोर्ड में अपने कार्यकाल की शुरुआत की पहली मीटिंग (अप्रैल 2015) करवाने में असफल साबित हुए कलम ग्यारह से नियुक्त पहले प्रधान स्व. तारासिंह अगली बैठक (जून 2015) में पूर्ण बहुमत और शक्ति के साथ उभरकर सामने आये. नांदेड़ के तत्कालीन कुछ स्थानीय बोर्ड सदस्यों का समर्थन प्राप्त कर उन्होंने अपने बहुमत का आकड़ा प्राप्त कर लिया था. उस कार्य में उन्हें भाजपा और हिंदुत्व संघटनों की विचारधारा का भी सहारा मिला था. यहीं से गुरुद्वारा बोर्ड बाहरी शक्तियों के हाथ चला गया कहा जाएं तो गलत नहीं होगा. वर्ष 2015 से आज तक ! छह साल !! किस आधार पर हम कह सकते हैं कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड हजुरसाहिब के सिखों की संस्था हैं? संभ्रम का पर्दा हटना चाहिए.
हज़ूरसाहिब में महाराष्ट्र सरकार के आनेवाले अधिवेशन को लेकर उत्सुकता कायम हैं. लेकिन एक प्रश्नार्थक सन्नाटा छाया हुआ हैं ! सिख समाज के अनुभवी नेतागण खामोश हैं ! कोई एक शब्द भी कहने की मनःस्थिति में दिखाई नहीं दें रहा हैं. बहुत से लोग खुद कुछ नहीं कहना चाह रहे और कोशिश कर रहे हैं कि दूसरा कोई बोले. किस चीज का भय? किस बात का संकुचन? यह पता तो चले. कलम ग्यारह की दुहाई पर पिछले चुनाव लड़ने वाले और प्रचार करने वाले भी चुप हैं ! वोट देने वाले भी चुप हैं ! यह ख़ामोशी और सन्नाटा केवल समीकरण और संबंधों की हतबलता तो नहीं ऐसा प्रश्न अब उठ रहा हैं. कहीं राजनीतिक संबंध बिगड़ न जाएं. आने वाले चुनावों में टिकट कट न जाएं? खाली समय वीडियो निकालकर प्रपंच करने वाले अब सरकार से मांग भी नहीं कर रहे हैं कि आगामी अधिवेशन में प्रस्ताव रखकर कलम ग्यारह का पिछला संशोधन रद्द करवाया जाएं. "हजूरी क्रांति" और "हजूरी प्रधान" की भाषा बोलने वाले साधी रीतसर और नियमों के तहत सरकार और प्रशासन से मांग भी नहीं कर पा रहे हैं. इसका अर्थ यहीं हुआ कि वर्तमान परिस्थिति सभी को स्वीकार्य हैं. जो चल रहा हैं, चलने दीजिये ! ऐसी सामाजिक हतबलता का कोई कारण तो जरूर होगा.
महाराष्ट्र सरकार का यह अधिवेशन बहुत अहम हैं. क्योंकि यह अधिवेशन केवल दो दिवसीय होगा. जिसमें विधानसभा अध्यक्ष चुनने और नियुक्ति विषयों पर ही सरकार का अधिक ध्यान केंद्रित होगा. इसलिए ऐसे अधिवेशन में राजस्व विभाग के माध्यम से संस्था कानून संशोधन से संबंधित "संशोधन प्रस्ताव" प्रस्तुत किये जाने की उम्मीद कम ही हैं. यदि प्रस्तुत होते हैं तो नांदेड़ के नेतागण गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड से जुड़ा कलम ग्यारह का पिछला संशोधन रद्द करने अथवा गुरुद्वारा संस्था के नये कानून प्रारूप को मंजूरी देने का प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकते हैं. यह एक अहम और महत्वपूर्ण ऐसा प्रसंग होने के नाते नांदेड़ के स्थानीय सिख नेताओं को एकजुट होकर नांदेड़ के राजनीतिक नेताओं से बातचित कर उन्हें कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाने के लिए आग्रह करना चाहिए ऐसी मेरी एक औपचारिक सोंच और सलाह हैं. यहाँ कॉंग्रेस, शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, भाजपा जैसी पार्टियों में बड़ी संख्या में सिख भाई - बहन शामिल हैं. बहुत से लोगों के पास बड़े - बड़े पद भी हैं. ऐसे जिम्मेदार लोगों को अपने नेताओं को लिखित मांग करनी चाहिए. लेकिन यह कदम उठाने के लिए कोई अग्रसर होना नहीं चाह रहा हैं. सभी के सामूहिक प्रयत्नों से यह संभव हैं. लेकिन इस कार्य के लिए कोई भी राजनीतिक नेता, कार्यकर्ता कदम उठाने के लिए तैयार नहीं हैं. इस कारण शायद यह अधिवेशन भी हमारे पक्ष में कोई सकारात्मक निर्णय लेकर आये इस बात की उम्मीद कम हैं. लेकिन आशाएं पल्लवित हैं. बाकी परमात्मा "वाहेगुरु" की मर्जी हैं.
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