कोरोना त्रासदी और सिख समाज !
रविंदरसिंघ मोदी
पिछले कुछ वर्षों में सिख समाज के सामाजिक वर्तन का अवलोकन यदि करूं तो मैं इस निष्कर्ष पर आ पहुँचा हूँ कि मानव सेवा में सिख समुदाय एक वैश्विक सेवा संघठन के रूप में उभरा है. भारत ही नहीं यूरोप, अफ्रीका और अन्य खंडों तक सिख समुदाय का सेवा तत्व समर्पित हुआ है. यदि सिखों का कोई वैश्विक पंजीयन सेवा संघटन आकार प्राप्त करें तो मेरा दावा है कि वर्तमान में कार्यरत रेडक्रॉस सोसाइटी या अन्य किसी सहायता संघठन से बड़ा इसका स्वरुप उभर कर सामने आ सकता है. भारत में पिछले सवा साल की कोरोना कोविड - 19 संक्रमण त्रासदी में सिखों का सेवाभाव खुलकर सामने आया हैं. आज सही समय भी हैं कि उन सभी सिख संघटनों, संस्थाओं, समूह और गुरुधामों का हौसलाअफजाई किया जाएं जो स्वयं के जीवन की परवाह किये बगैर लोगों को मौत की मुँह से बचाने में लगें हुए हैं. देश की राजधानी दिल्ली और गाज़ियाबाद महानगर में ही करीब डेढ़ लाख लोगों का जीवन बचाने में सिख संस्था और सिख व्यक्तियों ने योगदान दिया हैं. चाहे वर्तमान में उभरे ऑक्सीजन संकट की बात की जाएं या गुरुद्वारों में शुरू मल्टीस्पेशलिस्ट सेवा केंद्रों की शुरुआत और उनके संचालन सेवा की बात की जाएं, सिखों ने सरकार की और भारतीय जनमानस की सेवा में समर्पण प्रस्तुत किया हैं. क्या विश्व स्वस्थ संघठन या मानव अधिकार संघठन, सिख समुदाय की इस निस्वार्थ सेवा का मूल्यांकन कर रहें हैं? क्या दुनिया के सभी बड़े संपन्न राष्ट्र और विशेषतौर पर भारतीय सरकार कहीं सिख समुदाय की सेवाओं का मूल्यांकन दर्ज कर रहीं हैं?
दूसरा पहलू यह कि क्या भारतीय जनमानस सिखों की इस सेवा को किस सन्दर्भ में देख देख रहा हैं. कोरोना संकट की घड़ी में सिख समुदाय का वास्तविक सेवा भाव पंथ के लिए एक नई छवि को शिल्पित कर रहा हैं. सिख पंथ की सबसे बड़ी छवि यानी देश के सीमाप्रहरी की थीं उससे एक कदम और आगे यह सेवाभाव विस्तारित हुआ है. सोलह - सतरह वर्ष आयु के सिख बच्चें, सिख नौजवान, प्रौढ़, सेवानिवृत्त सिख और सिख महिलाएं भी अपने प्राणों की परवाह किये बगैर आज सेवा का तत्व लेकर एक जानलेवा संक्रमण से जूझ रहें हैं. दिल्ली के हर गुरुद्वारा, हर नगर, हर गलीं तक सिखों की एम्बुलेंस, लंगर, दवाइयां और ऑक्सीजन पहूंच रहें हैं. लॉकडाउन में लोग जीवन की सलामती के लिए खुद को घरों में कैद किये हुए हैं, वहाँ सिख मौत से आँखें मिलाकर संघर्ष कर रहें हैं. यहीं चित्र देश के बहुत से प्रदेशों का है जहाँ सिख संस्थाएं, संघठन, समूह मानवता की सेवा में प्रस्थ हैं. इस दृष्टि से सिखों के इस सेवा बल का सामाजिक योगदान राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर दर्ज करवाना समय की सबसे बड़ी मांग हैं.
दसवंध का सही उपयोग :
सिख धर्म की स्थापना के तत्वों में सबसे दार्शनिक पहलु सेवा के रूप में ही प्रस्थ किया गया. सद्गुरु श्री नानकदेव जी द्वारा "नाम जपो, किरत करो और वंड छको " यह मूल नित्यकर्म सिखों की झोली में डाले गए हैं. प्रभु परमात्मा का नाम जपना यानी भक्ति से जुड़े रहना. किरत (कीर्त) कमाई करना यानी मेहनत और परिश्रम से कमाया धन और उससे जीविका निर्वहन करना. तीसरा वंड छकना ! बांटकर खाना. चाहे वो लंगर के माध्यम से हो अथवा दुविधा और संकट में घीरें लोगों तक सहायता पहुँचाना. सिख को सहायता देकर सेवा योग्य बनाना आदि. सिख धर्म की स्थापना से लेकर आज तक की पंथ (धर्म) की यात्रा में यह पहला अवसर हैं जब सिखों के दसवंध का उपयोग पूर्ण क्षमता के साथ हो रहा हैं. लगभग सवा साल तक अविरत सेवा करने यदि सिख संस्थाएं सफल हुईं हैं तो निश्चित ही सिखों का दसवंध चढ़ाने और खर्च करने की आस्था आज के परिवेश में सभी तरह के सामाजिक सेवा सिद्धातों से ऊपर हैं.
बीते सवा साल में देशांतर्गत कोरोना काल में गुरुद्वारा, सिख संस्था, समूहों द्वारा चार सौ करोड़ से अधिक राशि की लंगर सेवा समर्पित की गई हैं. वर्तमान में भी वैद्यकीय सेवा क्षेत्र में लगभग डेढ़ सौ करोड़ के संसाधन सिखों ने खड़े किये हैं. सिखों के इस सेवाभाव का मूल्यांकन विश्व के अर्थशास्त्री अब किस सिद्धांत में सन्दर्भित करेंगे यह एक नई चुनौती मात्र हैं. सामाजिक शास्त्रों के पुनर्लेखन की आवश्यकता पर मैं भाष्य कर रहा हूँ जो विश्व के समक्ष नए सिद्धांत रचनाओं का नया सूत्रपात हैं. सिख पंथ, मेरा आशय समझ लें कि वर्तमान में सिखों के योगदान और सेवा को शीर्ष पर पहुंचाने का यह उपलब्ध अवसर कहीं खो ना जाएं. सिख पंथ ने सद्गुरु श्री गुरु नानक के वंड छको तत्व को आज सही मायने में सार्थक किया हैं.
सिख पंथ हर रोज अरदास करते समय सरबत का भला का प्रामाणिक भाव प्रस्तुत करता हैं. हे परमात्मा ! श्री अकाल पुरख के सामने हर सिख रोज प्रार्थना करें कि, कोरोना संक्रमण की त्रासदी समाप्त हो जाएं. जब तक यह संकट खड़ा है तब तक इससे लड़ने की जिम्मेदारी सभी की हैं. हर सिख अपनी यथा क्षमता से अपना योगदान प्रस्तुत करें ऐसी उम्मीद बनीं रहेगी. सरकार भी सिखों को फ्रंट वॉरियर के रूप मान्यता प्रदान करें ऐसी मांग आज प्रस्तुत कर रहा हूँ. योग्य लगें तो आगे शेयर कीजिए.
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