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रविवार, 13 दिसंबर 2020

 महाराष्ट्र सरकार का दो दिवसीय शीतकालीन अधिवेशन सोमवार से 

गुरुद्वारा कानून संशोधन पर सस्पेंस!

रविंदरसिंह मोदी 


महाराष्ट्र सरकार विधानमंडल का दो दिवसीय शीतकालीन अधिवेशन सोमवार, ता. 14-12-20 से प्रारंभ हो रहा है. यह अधिवेशन मुंबई में ही होगा. अधिवेशन को लेकर सरकार पक्ष उत्साह में दिखाई पड़ रहा है. दूसरी ओर विपक्ष अधिवेशन की अवधि को लेकर नाराजी प्रकट कर रहीं है. अपनी नाराजी प्रकट करने के लिए विपक्ष द्वारा सरकार द्वारा आयोजित चायपान कार्यक्रम का आज बहिष्कार किया गया. यह अधिवेशन मात्र दो दिनों का होने के कारण इसमें राजस्व मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत होनेवाले ता. 14-12-20 के दिन प्रस्तुत होनेवाले प्रस्तावों की सूची में कहीं भी "दी सिख गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री अबचलनगर साहिब बोर्ड" कानून 1956 के संशोधन का विषय दिखाई नहीं पड़ रहा है. इसलिए इस बात का संदेह उत्पन्न हो रहा है कि कहीं गुरुद्वारा बोर्ड कानून 1956 के अंतर्गत कलम ग्यारह के पिछले संशोधन रद्द करने का विषय प्रस्तुत होगा अथवा नहीं. या सरकार की पूर्व मंशा के मुताबिक कानून में आवश्यक ऐसा संशोधन होगा कि नहीं? यह भी सुनने में आ रहा है कि शायद गुरुद्वारा बोर्ड कानून संशोधन का विषय अगले अधिवेशन तक प्रलंबित रखा जायेगा. अभी हाल ही में शिरोमणि अकाली दल के नेता स. प्रेमसिंघ चंदूमाजरा ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे से भेट कर गुरुद्वारा कानून में बदलाव नहीं किया जाए ऐसी मांग की थी. जिससे यह संदेह और बढ़ गया है. हजूर साहिब के स्थानीय नेता या विशेष कर स्थानीय सिख नेताओं का आलस्य भी साफ नजर आ रहा है. कहना ना होगा कि मुंबईया फील्डिंग बढ़िया जमाई गई थी. महाराष्ट्र सरकार के दो नॉमिनेशन में से एक सीट पर भूपिंदरसिंह मनहास प्रधान के रूप में कार्यरत है वहीं दूसरी सीट खाली है. पूर्व विधायक सरदार तारासिंह के निधन से यह सीट रिक्त हुईं है. इसके अतिरिक्त सिख सांसद के दो स्थान रिक्त हैं. इस तरह से इन तीनों सीटों पर सदस्य के तौर पर नियुक्ति पाने के लिए फिलहाल घमासान मचा हुआ है. मुंबई से नौ लोग प्रयत्नशील है. जबकि नांदेड़ से उन्नीस, पुणे से तीन, औरंगाबाद से पांच, परभणी से दो, नागपुर से दो, अमरावती से एक ऐसे चालीस से ज्यादा इच्छुक अपना जोरआजमाइश कर रहें हैं. शिवसेना, कांग्रेस, राष्ट्रवादी कॉंग्रेस सहित अन्य छोटी पार्टियां भी अपने कार्यकर्ताओं को नियुक्त करने के लिए प्रयत्नशील है. आगामी 31 दिसंबर तक रिक्त पदों पर नियुक्तिया संभव लग रहीं है. यदि कलम ग्यारह का पिछला संशोधन रद्द होता है तो तीन रिक्त पदों और एक मध्यप्रदेश की सीट पर चार नियुक्तियां संभव है. एसजीपीसी के अन्य तीन सदस्यों में से एक सीट पर परिवर्तन होने के आसार है. यदि कानून संशोधन होता हो तो निश्चित ही सब कुछ परिवर्तन हो जायेगा. सचखंड हजूरी खालसा दीवान की चार नियुक्तियां भी इसी अंतर्गत प्रस्तुत हो जायेगी. अगले दो सप्ताह में स्थिति स्पष्ट हो जायेगी. 


 बीबी जगीरकौर की सोंच कितनी सही, कितनी गलत! 

रविंदरसिंह मोदी 

(तखत श्री केशगढ़ साहिब, आनंदपुर साहिब में बयान जारी करते हुए बीबी जगीरकौर और एसजीपीसी के पदाधिकारी)

दैनिक दी ट्रिब्यून (अंग्रेजी) की एक ख़बर यदि सही है तो निश्चित ही सिख जगत की छवि को दाँव पर धरने वाली वो ख़बर साबित होगी. ट्रिब्यून ऑनलाइन समाचार में कहा गया है कि श्री आनंदपुर साहिब में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की नई प्रधान बीबी जगीरकौर ने पत्रकारों के सामने यह स्पष्ट किया कि, एसजीपीसी द्वारा आगामी अप्रैल माह में आयोजित होनेवाले गुरु श्री तेगबहादुर जी प्रकाशपर्व चार सौ सालाना शताब्दि कार्यक्रम का न्यौता प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को नहीं भेजा जायेगा ! 

यह समाचार पढ़कर और सुनकर हर कोई आवाक हुए बगैर नहीं रह सकता. बीबी जगीर कौर का यह वक्तव्य भले ही वर्तमान में चल रहें किसान आंदोलन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर जारी किया गया होगा. लेकिन उनका यह वक्तव्य सिख जगत की छवि पर प्रतिकूल असर डाल सकता है. बीबी जागीर कौर के इस वक्तव्य पर पंजाब में कोई हंगामा नहीं बरपा बल्कि स्तब्धता छा गई. उक्त विषय पर शिरोमणि अकाली दल के नेतागण भी चुप्पी साधे दिखाई दे रहें हैं. यानि बीबी जगीरकौर द्वारा की गई जल्दबाजी का शिरोमणि अकाली दल द्वारा समर्थन नहीं किया गया. लेकिन यह विषय इसलिए भी गंभीर लग रहा है कि बीबी जगीरकौर शिरोमणि अकाली दल कोर कमेटी की सदस्या भी है. उनका वक्तव्य भारतीय जनता पार्टी द्वारा गंभीरता से लिया जायेगा इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता. कहना ना होगा कि यह विषय 2022 में पंजाब में होनेवाले विधानसभा चुनावों के समय भी गहरा असर कर सकता है. 

बीबी जागीरकौर सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था का नेतृत्व कर रहीं है. उन्हें चाहिए कि, सिख पंथ की छवि को नुकसान पहुंचाएं, ऐसे वक्तव्य जारी ना करें. गुरु श्री तेगबहादुर जी का चार सौ सालाना प्रकाशपर्व केवल शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का निजी कार्यक्रम नहीं हैं बल्कि समस्त सिख जगत का कार्यक्रम हैं. गुरु तेगबहादुर जी का बलिदान "तिलक, जंझू राखा" यानि हिन्दू धर्म रक्षार्थ हुआ था. गुरूजी का आगामी प्रकाशपर्व सिख धर्म और अन्य धर्मों को एकत्र लाने का बढ़िया अवसर साबित होगा. यदि ऐसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम को लेकर अभी से नकारात्मक वक्तव्य जारी करना उस चतुर्थ शताब्दि को प्रभावित करना होगा. निश्चित ही अन्य राजनीतिक दल बीबी जागीरकौर के वक्तव्य को सिख पंत की राजनीतिक भूमिका मानकर चलेंगे. 

जैसे कि देश में इस समय वातावरण गर्म हैं. राजधानी दिल्ली को किसान आंदोलनकारियों ने चारों छोरों से घेरा हुआ है. किसान आंदोलन में पंजाब के भी कृषक बड़ी संख्या में सक्रिय भूमिका निभा रहें हैं. इन किसानों में सिख भी बड़ी संख्या में शामिल हैं. बीबी जागीरकौर द्वारा उन सिखों और किसानों को आकर्षित करने की दृष्टि से यह वक्तव्य जारी किया हो लेकिन इस समय तो यह गलत प्रतीत हो रहा हैं. देश के प्रधानमंत्री को कार्यक्रम का न्यौता नहीं दिया जाना एक गलत कदम साबित हो सकता हैं. इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में तो सभी राजनीतिक नेताओं और पार्टियों को न्यौता दिया जाना चाहिए. यह कार्यक्रम सिख पंत और समाज संघठन की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर सकता है. यदि शिरोमणि अकाली दल द्वारा बीबी जगीरकौर की इस सोंच का समर्थन किया जाता है तो सिख पंथ का इससे बड़ा दुर्भाग्य कोई और नहीं होगा. 

(आप भी अपनी राय भेज सकते हैं. )


बुधवार, 9 दिसंबर 2020

 अब "भाजपाई सिखों" को क्या करना चाहिए? 

हम आतंकवादी नहीं हैं 'माई बाप"!

रविंदरसिंह मोदी 

दिल्ली में चल रहें किसान आंदोलन में भारतीय जनता पार्टी का सिख विरोधी चेहरा सामने आ गया. भाजपा ने किसान आंदोलन में शामिल लाखों सिखों की एक ही पहचान प्रस्तुत की और वह पहचान "सिख आतंकवादी" धारणा के रूप में प्रस्तुत हुई या की गईं हैं. इससे पूर्व भी कुछ पार्टियों ने सिखों के लिए "खलिस्तानी", "आतंकवादी", "दहशतवादी" जैसे शब्दों का प्रयोग किया था. लेकिन देश उन संबोधनों को भूल चुका था. दूसरे यह कि उस दौर में सत्ता संघर्ष कर रहीं भाजपा "आतंकवादी" विषय पर अन्य राजनीतिक पार्टियों को कोसकर सिखों की सहानुभूति प्राप्त करती थीं. तब सिखों को लगता था कि यह हमारे विचारों की पार्टी हैं. इस कारण सिख भाजपा की ओर प्रभावित हुए. लेकिन भाजपा की वर्तमान सोंच ने सभी सिखों को हताश, निराश और अलग थलग कर रख दिया हैं.

(नांदेड़ की रैली में सिख अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करते हुए)

इस सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने किसान आंदोलन को विभाजित करने की राजनीति के तहत सिख कौम पर ही निशाना साध दिया. यदि सिख आतंकवादी होते तो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली सहित कई प्रदेशों में सभी सिख जेल में होते. यदि सिख आतंकवादी हैं तो पिछले छह वर्षों से भाजपा और सरकार मौन क्यों रहीं?  अब शिरोमणि अकाली दल के एनडीए से अलग होते ही सिख आतंकवादी लगने लगें? क्या भाजपा में कार्यरत सभी पदाधिकारी और कार्यकर्ता से सर्टिफिकट लिया गया हैं कि वो आतंकवादी नहीं हैं? भाजपा का शोशल मीडिया जिस तरह से खालिस्तान और आतंकवादी शब्दों का प्रयोग कर हैं वो देश में सिख पंथ की छवि ख़राब कर रहा हैं. 

(नांदेड़ में सिखों ने केवल किसानों के आंदोलन को समर्थन दिया)

उन राजनीतिक सिख कार्यकर्ताओं की हालत तो देखिएगा, आज जब कौम को आतंकवाद के पलड़े में तोला जा रहा हैं तो वो कुछ करने की हालात में भी नहीं हैं. राजनीतिक विवशता हैं! आज के समय में तो पार्टी ही "माईबाप" हैं. पार्टी ही भविष्य हैं और व्यवसाय भी. सबकुछ पार्टी ही है. वो भी ऐसी पार्टी जिसकी केंद्र में सत्ता हैं. जो पार्टी दावा कर रहीं हैं कि "2029" तक देश में उनकी ही सत्ता चलेगी. सत्ता से दूर कौन रहना चाहेगा. आज कुछ लोग आरएसएस को दोष दे रहें, कोस रहें. आरएसएस से अधिक गलती सिखों की हैं, क्योंकि उनका राजनीतिक स्वार्थ उन्हें खींच कर भाजपा में ले गया हैं. राजनीतिक कार्यकर्ताओं की अपनी विवशता हैं. आनेवाले बीस साल तक भी भाजपा के सच्चे कार्यकर्ता अपने नेताओं की ही बोली बोलेंगे, मन में भी रखेंगे कि, सिख आतंकवादी हैं ! 

(दिल्ली की सीमा पर विगत चौदह दिनों से धरना दे रहें किसान कार्यकर्ता सरकार द्वारा किये गए सम्बोधन से हैरान हो उठें हैं)

पहली बात तो यह कि भाजपा को सिखों की जरुरत ही क्या हैं. सिखों का अर्थ उनके लिए तो रक्षक से अधिक "अंगरक्षक" जैसा उपयुक्त प्रतीत होता हैं. चलो एक समय हमारे गुरुओं ने हिन्दू धर्म की रक्षा खातिर बलिदान दिया होगा. लेकिन इन सब विषय की जरुरत पांच साल में एक बार या दूसरी जाति या पार्टी से लड़वाने के लिए ही पडती हैं. सिखों को प्रभावित करने के लिए इतिहास के कुछ प्रसंग जीवित कर दिए जाते हैं और वोट बटोर लिए जाते हैं. सिख कार्यकर्ता पार्टी के लिए लड़ने, मारने और मरने के लिए भी तैयार रहता हैं. लेकिन हश्र क्या होता हैं ! महानगर पालिका के टिकट के लिए भी उन्हें प्राथमिकता नहीं मिलती. क्या किसी सिख को महाराष्ट्र में कभी एमएलसी मिल सकती हैं ? शायद आर. एस. एस. से जुड़ा कोई नागपुर या मुंबई का सिख पात्र ठहराया जा सकता हैं पर सिख होने की कसौटी पर चयन नामुमकिन होगा. किसी महानगर पालिका में कॉप मेंबर नहीं बनाया गया यहां ! इसका अर्थ तो यहीं हुआ कि सिखों की ही राजनीतिक मजबूरी हैं. 

मेरा प्रश्न यह है कि, भाजपा, महाराष्ट्र में सिखों को किस अर्थ से परिभाषित कर रहीं हैं. क्या यहां के सिख भी....?  फिर यहां वफादारी से भाजपा के लिए राजनीतिक माथापच्ची कर पार्टी के हर कदम को श्रेष्ठ दिखाने के लिए व्याकुल पदाधिकारी, कार्यकर्ता कौन हैं. क्या उन्होंने भाजपा में प्रवेश करते समय "राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र" पेश किया था?  दूसरी पार्टियों से आयात हुए भी क्या प्रमाणित हैं? सही तो यह है कि, भाजपा को अब पार्टी के भीतर काम कर रहें सिखों के विषय में भी "जाँचपड़ताल" कर लेनी चाहिए कि वें राष्ट्रभक्त ही हैं और खलिस्तानी नहीं हैं. 

(नांदेड़ में आयोजित धरना आंदोलन का दृश्य)

अभी दो दिन पूर्व ही नांदेड़ में बड़ी संख्या में हजूरी साधसंगत द्वारा रैली निकालकर किसान आंदोलन को समर्थन दिया गया. इस आंदोलन में कुछ भाजपा के पदाधिकारी दिखाई दिए अब उनके लिए भाजपा नेतृत्व क्या सोंच बनाए बैठेंगा कुछ कहा नहीं जा सकता. लेकिन जो भाजपा पदाधिकारी किसान आंदोलन के समर्थन वाले इस रैली और धरना कार्यक्रम से दूर रहकर लाइव देख रहें थे उनकी क्या भावनाएं थीं? जो भी हो मकसद केवल सिख कौम को आहत करना मात्र था. अब सिख नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्त्ता ही जानें की उनकी निष्ठा कहाँ हैं? हम यह स्पष्ट कर रहें कि हजूर साहिब के सिख ना आतंकवादी थे ना हैं. हम महाराष्ट्र में है और हमें यहीं रहना है. अंत में भाजपा के शीर्ष नेताओं को भी चाहिए कि वें "खलिस्तानी" और "आतंकवादी" जैसे शब्दों का प्रयोग ना करें. कल वोट मांगने तो सभी के पास आना हैं ! 






 


रविवार, 6 दिसंबर 2020

कलम ग्यारह की शरण में एसजीपीसी ?   

क्या शिवसेना अपमान भुलाने को तैयार है ? 

नई खिचड़ी पक रहीं है !

रविंदरसिंघ मोदी 

(शिवसेना, कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल एक साथ? नई खिचड़ी हांडी पर चढ़ेगी)

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी यानी एसजीपीसी भयभीत दिखाई पड़ रहीं हैं. कारण ! एसजीपीसी का अस्तित्व महाराष्ट्र में खतरे में पड़ गया हैं. शिरोमणि दल के शिष्टमंडल अब महाराष्ट्र मंत्रालय के चक्कर काट रहें हैं ! मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे को अब अपमान के बजाये गुलदस्तें भेट कर रहें हैं! ये वहीं शिरोमणि अकाली दल है जो दो माह पूर्व शिवसेना पर शाब्दिक हमले दागकर केंद्र में बैठे भाजपा नेताओं से वफ़ादारी निभा रहा था. कंगना के समर्थन में शोशल मीडिया में ट्वीट पर ट्वीट और वीडियो पर वीडियो जारी हो रहें थे. संजय राउत के पास तो लेखा जोखा होगा ही. 

गत दिनों शिरोमणि अकाली दल के नेताओं ने अभिनेता शुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद अभिनेत्री कंगना राणावत के पक्ष में उतर कर जिस तरह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, शिवसेना और महाराष्ट्र सरकार पर आरोपों की झड़ें लगा दीं थी उससे महाराष्ट्र सरकार नाराज हो गई. शिरोमणि अकाली दल के विधायक स. मनजिंदर सिंह सिरसा ने "उड़ता बॉलीवुड" कहकर महाराष्ट्र सरकार को आड़े हाथों लिया था. लेकिन अब शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना में कोई खिचड़ी पकनी शुरू हो गई हैं. 

कहा जा रहा हैं कि केंद्र सरकार के खिलाफ दोनों राजनीतिक दल भविष्य में कोई नई चुनौति प्रस्तुत कर सकते हैं. इसलिए पंजाब से बादल साहब ने "प्रेम" का सन्देश यानी श्री प्रेमसिंघ चंदूमाजरा को दूत बनाकर शिवसेना के भेजा हैं. किसान आंदोलन की आड़ में क्या गुल खिलाने की योजना बन रहीं हैं विचारणीय हैं ! क्या शिवसेना, शिरोमणि अकाली दल द्वारा गत दिनों किया गया अपमान पचाने को तैयार हैं? 

वैसे, विधायक सिरसा की बयानबाजी के समय महाराष्ट्र के प्रभावी नेता और कैबिनेट मंत्री श्री अशोकराव चव्हाण भी कुछ नाराज दिखाई दें रहे थे. क्योंकि श्री चव्हाण ने सदैव अभिनय, कला, संगीत और सांस्कृतिक क्षेत्र की तरक्की में योगदान दिया हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री रहते बॉलीवुड उद्योग की उन्नति की नीति अपनाई थी. मराठी रंगभूमि, मराठी फिल्मों को अनुदान वृद्धि जैसे कदम उठाये थे. कहीं न कहीं श्री अशोकराव चव्हाण को भी उन तत्वों के प्रति नाराजगी हैं जो महाराष्ट्र के खिलाफ अपनी भूमिका जाहीर रूप से बयां करते हैं. उनमें शिरोमणि अकाली दल भी हैं जो केंद्र सरकार को "गुरु मानकर" वर्तमान महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोले हुए हैं. 

श्री चव्हाण को यह भी जानकारी हैं कि शिरोमणि अकाली दल प्रोत्साहित एस.जी.पी.सी. का एक घटक नांदेड़ स्थित गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड संस्था पर सत्ता जमाये बैठा हैं. पिछली भाजपा सरकार के समय शिरोमणि अकाली दल को गुरुद्वारा बोर्ड की सरकार स्थापित करने का सुनहरा अवसर उपलब्ध हुआ था. शिरोमणि अकाली दल इस बात पर बहुत इतरा रहा हैं कि श्री अशोकराव चव्हाण के क्षेत्र में उनका राजनीतिक दबदबा कायम हैं. मुंबई के कुछ व्यावसायिक और एसजीपीसी के नेता पिछले दो सालों से अपने सत्ता के अहम में छाती ठोकें जा रहें हैं. वैसे शिरोमणि अकाली दल के इस दावे की पुष्टि नांदेड़ के स्थानीय कांग्रेसी पदाधिकारी ईमानदारी से बयां कर सकते हैं. समय आ गया हैं कि इस सच्चाई से पर्दा उठाया जाए कि आखिर यह संस्था हजूरसाहब वासियों की हैं या एसजीपीसी वालों की. 

चर्चा हैं कि महाराष्ट्र में अब गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड नांदेड़ संस्था के कानून संशोधन को लेकर एसजीपीसी पर गाज गिरनेवाली हैं ! महाराष्ट्र सरकार द्वारा गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था कानून 1956 में बहुत शीघ्र संशोधन कर बाहर के अनावश्यक सदस्यों की नियुक्तियों को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है. बहुचर्चित गुरुद्वारा बोर्ड की कलम ग्यारह का पिछला संशोधन रद्द करते हुए स्थानीय सिख नेतृत्व को बढ़ावा देने की हजूरी साधसंगत की मांग पूरी होती लग रहीं थीं. लेकिन चंदूमाजरा प्रकट हो गए.



एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल के होश इस कारण उड़े हुए हैं. एसजीपीसी को सत्ता खोने के साथ - साथ अब उनके प्रतिनिधित्व के कम होने की भी चिंता सताए जा रहीं हैं. यदि महाराष्ट्र के गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड से एसजीपीसी की सत्ता समाप्त हो जाती है तब पांचों तखत साहब (सिख धर्म नेतृत्व पीठ) को अपने नियंत्रण में रखने के मनसूबे से पानी फिर सकता हैं. इसलिए अब सिर्फ कलम ग्यारह को रद्द करने के लिए नए से मांग प्रस्तुत की गई हैं. 

दो से तीन सप्ताह पूर्व नांदेड़ में भी एक शिष्टमंडल द्वारा कांग्रेस के दिग्गज नेता श्री अशोकराव चव्हाण के पास नये से मांग प्रस्तुत हुईं कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था के कानून संशोधन अंतर्गत केवल और केवल कलम ग्यारह का संशोधन दुरुस्त किया जाए. बहुचर्चित भाटिया समिति की सिफारिशों को नहीं माना जाए.  जिन तत्वों द्वारा पिछले दो सालों से गुरुद्वारा बोर्ड में एसजीपीसी की सत्ता स्थापित करने में "प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहायक" भूमिका निभाई जा रहीं हैं, वो तत्व भी अब कलम ग्यारह को रद्द करने या अथवा अन्य मात्र कलम ग्यारह का पिछला संशोधन रद्द करने के लिए अपनी स्वीकृति प्रदान कर रहे हैं. हजूरसाहब के सिखों की कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने मांग जायज थी. इस मांग में कितनी सार्थकता थीं अब यह साबित हो गया हैं. यह हजूर साहब के सिखों की क़ामयाबी की दिशा में सबसे बड़ा कदम हैं. आंदोलन की धारणा और मंशा दोनों ही सही थे. अब गेंद नेताओं के पाले में हैं. शिवसेना और शिरोमणि अकाली दल में क्या खिचड़ी पक रहीं हैं और श्री अशोकराव चव्हाण गुरुद्वारा एक्ट को लेकर क्या भूमिका अदा करेंगे ये वक्त बताएगा. मामला सचमुच सीरियस हैं. 

सोचिये, जिस एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल ने कानून संशोधन के तहत कलम ग्यारह के सरकारी प्रभाव का लाभ उठाकर हजूर साहब के सिखों को समूह - समूह में बाँटने की राजनीति को बढ़ावा दिया था, जिसने हजुरसाहब के सिख प्रतिनिधियों (मेंबर साहिबान) को उनकी अपनी संस्था से बेदखल करने का प्रयास किया, वो एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल अब कलम ग्यारह से संरक्षण चाह रहे हैं. इस छुपे मनसूबे को पूर्ण करने के लिए भी अब उन्हें हजूरसाहब के लोगों के कंधों की जरुरत पड़ रहीं हैं. मुंबई के एसजीपीसी के नेता (व्यापारी) श्री उद्धव ठाकरे और श्री अशोकराव चव्हाण के सामने याचना का स्वर लेकर प्रस्तुत हो रहें हैं. सुनने में आ रहा हैं कि एसजीपीसी के प्रतिनिधि आए दिन महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री श्री बालासाहब थोरात के मंत्रालय के चक्कर काट रहें हैं ! 



मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

 पेट्रोल और डीजल की कीमतें क्यों चढ़ीं हुईं हैं !

छह महीनों से स्थिर हैं मूल्य 

रविंदरसिंह मोदी 


देश महामारी से जूझ रहा हैं. नागरिकों को राशन बांट कर सरकार दरियादिली का आलम प्रस्तुत किये हैं. दूसरी ओर नागरिकों को कहीं से भी कोई रियायत या राहत नहीं हैं. अब देखिए, पिछले छह माह से पेट्रोल और डीजल के मूल्य लगभग स्थिर हैं और 90 रूपये प्रति लीटर से कम होने का नाम नहीं ले रहें हैं. नांदेड़ शहर में जून 2020 में 89.05 रूपये लीटर मूल्य था और आज 1 दिसंबर 2020 के दिन 91.25 रु प्रति लीटर मूल्य हैं. नांदेड़ शहर के मूल्य देश में सबसे अधिक हैं जिसका एक कारण महानगर पालिका टैक्स का सर्वोच्च दर भी हैं. यहाँ फ्यूल टैक्स सबसे अधिक रखा गया हैं जिसका परिणाम जनता की जेब पर देखा जाता हैं. लेकिन देश स्तर पर भी विचार किया जाएं तो फ्यूल के मूल्य पिछले छह माह से स्थिर हैं. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बैरल के मूल्य का क्या फ्यूल पर प्रभाव नहीं होना चाहिए?  क्या अंतर्राष्ट्रीय बाजार के मूल्यों के तहत सरकार मूल्य कम - ज्यादा नहीं करतीं ? वहीं नांदेड़ और अन्य शहरों में तुलना की जाएं तो यह तथ्य उभर कर सामने आ रहा हैं कि नांदेड़ में फ्यूल के दर देश के बड़े महानगर की तुलना में बहुत अधिक हैं. 

पेट्रोल मूल्य (अधिकतम मूल्य)

जून 20      -      89.05 रु 

जुलाई 20   -      89.05 रु 

अगस्त 20   -      90.74  रु 

सितंबर 20   -     90.79 रु 

अक्टूबर 20   -    89.81 रु 

नवंबर 20     -     91.25 रु 

दिसंबर 20    -     91.25 रु (01-12-2020)

उपर्युक्त अनुसार पैट्रोल के मूल्य में पिछले छह माह में मात्र एक रुपया 40 पैसे का मूल प्रभाव मूल्यों पर हुआ हैं. कोरोना संक्रमण से जूझ रहीं जनता को कोई राहत या रियायत नहीं मिल पा रहीं हैं. पेट्रोल के साथ साथ डीजल के मूल्यों में भी अधिक कोई बदलाव नहीं हुआ हैं. छह माह से मूल्य एक से दो रुपयों के बीच घूम रहें हैं. 

डीजल मूल्य 

जून 20     -    79.45 रु 

जुलाई 20  -    80.70 रु 

अगस्त 20  -    80.91 रु 

सितम्बर 20 -   80.91 रु 

अक्टूबर 20  -   77.91 रु 

नवंबर 20     -   79.96 रु  (कम मूल्य 77.74 रु )

मूल्यों के स्थिरता के पीछे क्या कारण है समझ नहीं आ रहा हैं. संक्रमण काल में सरकार को चाहिए कि वो नागरिकों के सिर से टैक्स के वजन को कम करें. लेकिन जिस तरह से फ्यूल के मूल्य स्थिर हैं और उनकी तुलना अंतर्राष्ट्रीय बैरल के मूल्य से प्रतिदिन नहीं की जा रहीं हैं ऐसा संदेह उभारना स्वाभाविक बात हैं. 

पिछले दस दिनों के मूल्य एकदम से स्थिर दिखाई दे रहें हैं. नीचे तखते में देखिएगा. ता. 22-11-20 से ता. 01-12-20 के दौरान पैट्रोल के मूल्य. 


नांदेड़ महानगर पालिका क्षेत्र में पिछले दस दिनों से डीजल के मूल्य निम्न अनुसार हैं. 

अब देखिए देश में पैट्रोल के आज के और बीते कल को संयुक्त मूल्य इस तरह से हैं. जो दर्शा रहें हैं कि नांदेड़ की जनता से किस तरह से अधिक राजस्व की वसूली हो रहीं हैं. 



रविवार, 29 नवंबर 2020

श्री गुरु नानक देवजी को वैश्विक संत की उपाधि मिले 

लंगर सेवा संकल्पना विश्व में प्रसारित हो !

रविंदरसिंह मोदी


सिख पंथ के संस्थापक सतगुरु नानकदेवजी महाराज का हम 551 वां प्रकाशपर्व मना रहें हैं. पिछले वर्ष को साढ़े पांच शताब्दी के रूप में मनाया गया. पिछला वर्ष दिक्कतों से भरपूर रहा. समस्त मानवता पर संक्रमण संकट कायम रहा. ऐसे समय में गुरु नानकदेव जी के तत्वों ने समस्त सिख पंत की अलख जगाये रखी. कोरोना संक्रमण काल में सिख पंथ द्वारा लाखों, करोड़ों लोगों की लंगर के माध्यम से सेवा की गईं. आज भी यह सेवा जारी है. आज हम जब गुरु नानक देव जी महाराज का प्रकाशपर्व मना रहें हैं तब गौरवांतित भी हैं. सिख पंथ अपनी धर्म - धारणाओं से कहीं दूर नहीं रहा. गुरु नानकदेव जी की विचारधारा के अनुरूप सिख पंथ की सेवाएं जारी हैं. भारत देश में ही नहीं बल्कि विश्व के बड़े - बड़े देशों में सिख पंथ ने लंगर सेवा का प्रचार प्रसार प्रत्यक्ष कृति के जरिये कर दिखाया. अब समय आ गया हैं कि, श्री गुरु नानक देव जी और उनकी विचारधारा को वैश्विक मान्यता दिलाये. श्री गुरु नानकदेवजी को विश्व संत की उपाधि दिलाई जाएं. साथ ही लंगर सेवा की प्रथा को वैश्विक सेवा प्रथा के रूप में मान्यता भी दिलाई जाएं. 

इस कार्य के लिए विश्व के सभी सिख एक विचारधारा को लेकर आज से ही कार्य में जुट जाएं. भारत सहित उन सभी देशों में जहां सिखों ने गुरुद्वारों की स्थापना की हैं, उन सभी स्थानों से यह पहल शुरू होनी चाहिए कि श्री गुरु नानकदेव जी महाराज को विश्व गुरु संत के रूप में प्रचारित किया जाए. यह मिशन सिखों को पूरा करना चाहिए. आनेवाले 552 वें प्रकाशपर्व तक श्री गुरु नानकदेव जी के संतत्व को पूर्ण क्षमता से हर सिख को यह मिशन लेकर चलना चाहिए और समय - समय पर उसे प्रचारित करते रहना होगा. उम्मीद हैं आप इस मांग और संकल्पना का स्वागत करेंगे. आपकी राय अवगत कराए. धन्यवाद. इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर कीजियेगा. 


शनिवार, 28 नवंबर 2020

गुरुद्वारा तखत सचखड़ बोर्ड कानून 1956 में सुधार की मांग लेकर दैनिक नांदेड़ वार्ता में प्रकाशित मेरा लेख : 28-11-2020.



 किसान भाइयों की मंगल कामनाओं के लिए

 'तखत सचखंड साहब' भी पहल करें !

रविंदरसिंघ मोदी 

पंजाब का सिख, जाट किसान समुदाय परोपकारी भूमिका निभाता हैं. श्री हजूर साहब और पंजाब की दूरी भले दो हजार किलोमीटर से अधिक हो लेकिन हजूर साहिब के लंगर की सेवा के लिए किसानों का योगदान बहुत मायने रखता हैं. पंजाब से भेजे गए गेहूं, चावल, घी और चढ़ावा का सीधा संबंध हजूर साहिब के स्थानीय समुदाय से जुड़ता हैं. इसलिए आज दिल्ली में चल रहें किसान आंदोलन को लेकर हजूर साहिब में चिंतन जरुरी हो जाता हैं. पंजाब यह सिक्खी का गढ़ है और श्री हजूर साहिब सिखों का ऊर्जा स्थान है. श्री गुरु ग्रंथसाहिब की पावन ऊर्जा से पंजाब के सभी किसानों को भी शक्ति और सामर्थ्य मिलना चाहिए. हजूर साहिब की साधसंगत भी किसानों के लिए कुछ करना चाह रहीं हैं. यह बात सर्वसामान्य तक भी पहुंचनी चाहिए. उन किसानों तक भी पहुंचनी चाहिए जो अपना घर बार छोड़ कर कई रातों से रेल की पटरी पर तो कहीं सड़को पर आंदोलन लिए बैठे हैं. 

उत्तर भारत के किसान विगत एकमाह से नये कृषि कानून को लेकर मूलभूत सुधार की दुहाई दे रहें हैं. आंदोलन और धरना लगातार जारी हैं. केंद्र सरकार कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं. किसान भी अड़े हैं. आज दिल्ली की सीमा में ऐसे तैसे प्रवेश मिल पाया. अब शहर के भीतर आंदोलन शुरू है. सरकार कह रहीं है बात करेंगी लेकिन कौन बात करेगा तय नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी जी देश में वैक्सीन की तैयारी का जायजा लेने के लिए अहमदाबाद, हैदराबाद और पुणे का दौरा कर रहें हैं. 

दिल्ली के गुरुद्वारा और सिख समुदाय किसानों की सहायता के लिए अग्रसर हुए हैं. हर तरफ से किसान वर्ग के लिए मंगल कामनाये की जा रहीं हैं. ऐसे समय में तखत सचखंड श्री हजूर साहिब इस पवित्र पावन स्थान से पहल जरुरी हो जाती हैं. तखत साहब, गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड अथवा हजूर साहिब की साधसंगत किसानों के लिए मंगल कामनायें कर सकते हैं. श्री अखण्ड पाठ साहिब का आयोजन किया जाएं तो बहुत शुभ सन्देश प्रसारित हो सकता हैं. या सिख भाइयों को चाहिए कि सिमरन दिवस के तर्ज पर ऑनलाइन दस मिनिट का मूलमंत्र जाप का देशस्तर पर आयोजन किया जाएं तो लाभकारी साबित होगा. कोरोना संक्रमण काल में किसी तरह के धरना, आंदोलन के लिए यहाँ अनुकूलता नहीं हैं यह हम सभी को अहसास हैं. इसलिए ऑनलाइन मूलमंत्र जाप बेहतर मार्ग होगा सन्देश पहुंचाने के लिए. 


किसानों की भी नहीं सुनोगे !

27 नवंबर 2020 का दिन इतिहास में दर्ज होगा. पंजाब, हरियाणा, यू. पी., दिल्ली सहित अन्य क्षेत्रों के किसानों का दिल्ली की दिशा में सीमोलंघन भी वैश्विक स्तर पर दर्ज होगा. साथ ही भारतीय किसानों के दिलोदिमाग में दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर किसानों से दूरी साधनेवाले प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का मौन भी यक़ीनन दर्ज होगा. ऐसा भी क्या कारण है कि प्रधानमंत्री मंत्री जी साधन सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद भी किसानों से सीधी बात करना नहीं चाह रहें हैं. विडंबना है कि, केंद्रीय कृषि मंत्री जी की बात किसान सुनना नहीं चाह रहें हैं ! एक माह से जारी किसान आंदोलन के संकट पर देश के शीर्ष नेतृत्व की चुप्पी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के लिए भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहीं है. 

भारत देश के 68 % लोग आज भी ग्रामीण जीवन में रहते है और किसी न किसी तालुक से उनका जीवन कृषि उद्योग आधारित है. वर्ष 2021 की जनगणना में आंकड़ों की सच्चाई खुलकर उजागर हो जायेगी. कृषि क्षेत्र जिस तेजी से शहरीकरण और औधोगिकरण की भेंट चढ़ रहा है वो देश की राष्ट्रीय किसान नीति के लिए भी चिंता की बात है. सिमटते संसाधन एक दिन 130 करोड़ की आबादी वाले भारत देश को विदेशों से होने वाले खाद्य वस्तुओं पर निर्भर कर देंगे. इसलिए आज सरकार को सोचना होगा कि किसान और कृषि क्षेत्र को कितना जीवित रखा जाएं? 

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसान आंदोलन को लेकर इतने आक्रामक हुए हैं. देश में बहुत बार किसान आंदोलन हुए हैं. सत्तर के दशक में बहुत बार किसान आंदोलन हुए थे. पंजाब में अंग्रेज शासनकाल में सन 1938 में आज के किसान एजेंडे की तर्ज पर बड़ा किसान आंदोलन हुआ था. जिसके नायक के रूप में चौधरी चरणसिंह उभरकर आये थे. वो आंदोलन पंजाब प्रांत विधानसभा में राजस्व मंत्री सर छोटूराम की सूझबूझ से देश में पहली बार "कृषि उत्पाद मंडी अधिनियम" के रूप में प्रस्तुत हुआ जो तारीख 5 मई 1939 को अमल में लाया गया कानून था.

आज के परिवेश में सरकार एमएसपी जैसे विषय समझा पाने में असमर्थ क्यों हैं? श्रीमती हरसिमरत कौर बादल के त्यागपत्र और इस आंदोलन का क्या सम्बन्ध है?  क्या नये कृषि कानून से जीडीपी में उद्योग क्षेत्र पर कृषि उत्पाद का प्रमाण हावी रहेगा? पंजाब के किसानों को पंगु बनाने वाली यह सरकारी नीति तो नहीं? प्रश्न अनुत्तरित हैं क्योंकि सरकार मौनव्रत पर हैं ! कभी मनमोहनसिंह जी का मौन उन्हें भी खासा खलता था ! खैर ! सरकार को सही बोलना चाहिए और किसान प्रताड़ना बंद होनी चाहिए. 

बीती रात किसान आंदोलक तमाम यातना सहने के दिल्ली में प्रवेश कर पाए. लेकिन प्रधानमंत्री जी वैक्सीन की खोज में दिल्ली से बाहर निकल गए. किसानों से बात करेगा कौन? पुलिस?  मीडिया? आम नागरिक? यह विषय इसलिए भी विचाराधीन नहीं होगा क्योंकि आंदोलन में सिख राज्य पंजाब के किसान सम्मिलित हैं. पंजाब का किसान पिछले सौ वर्षों से भारत देश का अन्नदाता बना हुआ हैं. इस आंदोलन में साढ़े तीन लाख किसान और खेतिहर मजदूर भी शामिल होने की बात सामने आई हैं. जिनमें बड़ी संख्या में सिख किसान शामिल हैं. 




शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

 बीबी जगीर कौर की वापसी !

एसजीपीसी की तीसरी बार प्रधान बनीं 

रविंदरसिंघ मोदी 

सिखों की सर्वोच्च शीर्ष धार्मिक संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, अमृतसर के नये प्रधान के रूप में शिरोमणि अकाली दल बादल की तेजतर्रार नेता और विधायक बीबी जगीर कौर का चयन हुआ है. उन्होंने तीसरी बार यह पद प्राप्त किया है. इससे पूर्व बीबी जगीर कौर सन 1999 और वर्ष 2004 में प्रधान पद पर कार्यरत रह चूकी है. यह तीसरा मौका है जब उन्हें प्रधान चुन लिया गया. 

शुक्रवार, ता. 27-11-2020 को अमृतसर स्थित तेजसिंघ समुद्री हाल में एसजीपीसी की जनरल बॉडी की बैठक संपन्न हुईं. जिसमें नये प्रधान के चयन का प्रस्ताव प्रस्तुत हुआ. बैठक में 191 सदस्यों में से 143 उपस्थित थे. कार्यकारी प्रधान अलविन्दर सिंघ पखोके ने प्रधान पद के लिए बीबी जगीर कौर के नाम का प्रस्ताव रखा. उनके विरोध में मिठू सिंघ कहनके का नाम प्रस्तुत हुआ. मतदान के दौरान बीबी जगीर कौर को 122 वोट मिले और उन्हें विजेता घोषित किया गया. मिठूसिंघ कहनके को मात्र 21 वोट ही मिल पाए. 

सीनियर मीत प्रधान के रूप में स. सुरजीत सिंघ भिटवड का चयन हुआ. जबकि जूनियर मीत प्रधान के रूप में स. बूटा सिंघ का चयन संपन्न हुआ. स. बलवंत सिंघ सिआलका को जनरल सेक्रेटरी बनाया गया और कार्यकारिणी सदस्य के रूप में स. बलदेवसिंघ चूंघा, चरणजीत सिंघ जसोवाल,  नवतेज सिंघ कावनी, सतविंदरसिंघ तोहरा, अजमेर सिंघ खेड़ा, दर्शनसिंघ शेर खां, भूपिंदर सिंघ भलवान, हरभजन सिंघ समाना, बीबी मलकीत कौर कमालपुरा, मिठू सिंघ कहनके, अमरीक सिंघ शाहपुर की नियुक्ति की गई. पिछले प्रधान भाई गोबिंदसिंघ लोंगोवाल तीन सालों तक प्रधान कार्यरत थे. गत कुछ समय से लोंगोवाल लगातार विवादों में बनें हुए थे. 

माना जा रहा है कि पंजाब विधानसभा के आगामी चुनावों की रणनीति के तहत बीबी जगीर कौर की नियुक्ति अहम बताई जा रहीं हैं. उम्मीद की जा रहीं हैं कि पंजाब विधानसभा के चुनाव अवधिपूर्व हो सकते हैं. इसलिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में आमूलाग्र बदलाव किया गया हैं. श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी के 328 स्वरूपों के गायब हो जाने के विषय को लेकर साधसंगत में पिछली कार्यकारिणी को लेकर खासा रोष का वातावरण बना हुआ था. भाई गोबिंदसिंघजी लोंगोवाल को हटाए जाने के बाद एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल को लेकर रोष कम होगा अथवा नहीं यह तो आनेवाला समय ही बताएगा. 



मंगलवार, 24 नवंबर 2020

 जत्थेदार जी का वक्तव्य स्वागतार्ह है !

मेडिकल कॉलेज खुलना चाहिए 

रविंदरसिंघ मोदी 

तखत सचखंड श्री हजूर साहब के आदरणीय जत्थेदार साहिब संत बाबा कुलवंतसिंघजी द्वारा किया गया हालिया वक्तव्य स्वागतार्ह माना जाना चाहिए. संत बाबा कुलवंतसिंघ जी ने तखत सचखंड श्री हजूर साहब द्वारा आयोजित श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी के गुरुतागद्दी समागम अंतर्गत परलोकगमन दिवस के दिन साधसंगत को संबोधित करते हुए कहा कि, समाज में उच्च शिक्षा के केंद्र शुरू होने चाहिए जैसे इंजिनियरींग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज आदि. जत्थेदार साहिब द्वारा व्यक्त मंशा आज के समय की सबसे बड़ी सार्थकता का बोधमात्र हैं. सिख समाज के पास आज मेडिकल कॉलेज अथवा इंजीनियरिंग कॉलेज, एमबीए कॉलेज या फॉर्मेसी कॉलेज जैसी संस्थाएं नहीं होने के कारण हमारी सम्पन्नता में कहीं न कहीं कमी सी प्रतीत हो रहीं हैं. इसलिए जत्थेदार जी के वक्तव्य के मायने हैं. 

हम सभी लोग विगत नौ माह से कोरोना संक्रमण जैसी त्रासदी का सामना कर रहें हैं. सिख समाज के बहुत से नागरिकों ने इस संक्रमण के साथ जीवित संघर्ष किया हैं. कुछ सिख भाई, बहन और वरिष्ठ सिख नागरिक दुर्भाग्यशाली भी रहें जिन्हें जान गंवानी पड़ीं. हमने जहाँ संक्रमण काल में लॉकडाउन, कर्फ्यू और उपेक्षाओं का सामना किया वहीं अस्वस्थ लोगों ने उपचार पाने के लिए कठिन संघर्ष भी किया. लोग अस्पतालों में बेड प्राप्त करने के लिए भागदौड़ करते रहें. उपचार के लिए सिफारिशें करवातें रहें. उपचार के लिए पैसों का जुगाड़ करते रहें. उपेक्षा बर्दाश्त कर ऐसे तैसे कुछ लोगों को उपचार मिल पाया. कोविड केंद्रों में बहुत से लोगों को अच्छा बर्ताव नहीं मिला. यह सब हमें बीतें समय ने बताया हैं. बीतें दिनों में यदि दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज की अनुकंपा प्राप्त नहीं हुईं होती तो शायद समाज की ऐसी दुर्गति होती कि उसे बयान करना भी मुश्किल हो जाता. मैंने यह अनुभव साक्षात् जिया हैं. वो गुरु महाराज ही थे जिन्होंने आपातकाल में मुझे आज तक सुरक्षित रखा हैं. इसलिए जैसे ही जत्थेदार साहब के मुख से यह विचार बिखरें मेरे भीतर के छुपे यह जज़्बात बाहर निकलने शुरू हो गए हैं. जत्थेदार साहब द्वारा संतों, गुणी, ज्ञानी और प्रतिष्ठित सज्जनों की उपस्थिति में अपने विचार रखें गये. जिसे लाइव टीवी के माध्यम से विश्व भर में सिख श्रद्धालु भी सुन रहें थे. श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी की हाजरी में सोना और पुराने शस्त्र भी सजें हुए थे. पंजप्यारे साहिबान और संत बाबा बलविंदरसिंघजी कारसेवा वाले बाबाजी भी शांतचित से जत्थेदार के वक्तव्य का श्रवण कर रहें थे. यह दृश्य समस्त सिख विश्व देख रहा था. ऐसे समय में तखत साहिब के मंच से सकारात्मक और शुभ विचारों का व्यक्त होना मात्र संयोग नहीं हो सकता वरन गुरु महाराज जी का ही कोई संकेत हो सकता हैं. 


हमारे पंथ के पास सौ करोड़ की धार्मिक संस्था हैं. गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था का एक महत्व है और यह संस्था दक्षिण भारतीय सिखों का नेतृत्व कर रहीं हैं. जब यह संस्था सरकार के पास गठित नहीं थी उस समय यहाँ के सिखों ने खालसा स्कूल उपक्रम शुरू करवाया था. लगभग सवा सौ वर्ष शायद 1896 में हजूर साहब में प्राथमिक शिक्षा के लिए स्कूल शुरू किया गया था ऐसा मेरी जानकारी में आया हैं. बोर्ड रजिस्ट्रेशन के बाद खालसा हाईस्कूल, आई. टी. आई. आदि उपक्रम शुरू किये गए. बोर्ड द्वारा पिछले तीस वर्षों में दो से तीन बार मेडिकल कॉलेज के लिए प्रयास किये गए थे. लेकिन अंतर्गत मतभेद के चलते और इच्छाशक्ति के आभाव में यह कार्य सिद्धि को प्राप्त नहीं हो पाया. लेकिन आज के समय की मांग है कि सिखों के पास उनका स्वयं का मेडिकल कॉलेज और एक मल्टी स्पेशिलिस्ट सुविधायुक्त अस्पताल होना जरुरी हैं. यदि आने वाले समय में कोई आपदा आती हैं तो सिखों के पास उनका कोई सुरक्षित स्थान होना चाहिए जहाँ वें विश्वास के साथ उपचार करवा सकें. वहीं उपचार करने वाले डॉक्टर, नर्सिंग स्टॉफ भी अपना हो तो और भी बेहतर उपचार उपलब्ध हो सकता हैं. इसलिए आज के समय में हजूर साहिब में एक अच्छा मल्टीस्पेशिलिस्ट हॉस्पिटल या कॉलेज खोला जाना एक सार्थक कदम साबित होगा. हजूर साहब में गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के साथ साथ गुरुद्वारा श्री लंगर साहिब और गुरुद्वारा माता साहब देवाजी जैसी धार्मिक संस्थाएं भी कार्यरत हैं. सभी संस्थाओं के पास जमीनें भी उपलब्ध हैं. सिख पंथ में हर वर्ष,  दस से बीस डॉक्टर्स बनाने की जिम्मेदारी यदि यह उपर्युक्त संस्थाएं स्वीकार करती हैं तो भविष्य में हजूर साहब का सिख समाज समृद्ध, संपन्न, जागरूक और स्वस्थ समाज होगा इसमें कोई दोराय नहीं हैं. वहीं हमारे संतों का आशीर्वाद प्राप्त हो जाएं तो नामी स्वस्थ केंद्र शुरू हो सकता है. 

जत्थेदार साहब का वक्तव्य स्वागतार्ह हैं. समाज के सकारात्मक प्रवृत्तिवाले लोगों द्वारा भी इस वक्तव्य का संज्ञान लिया जाना चाहिए. साथ समाज में रजिस्टर्ड सामाजिक और शिक्षा संस्थाओं द्वारा भी उच्च शिक्षा केंद्र शुरू करने के लिए प्रयासरत होना चाहिए. एमबीए, लॉ, जर्नलिज्म, स्कील डेवलपमेंट जैसी विद्या के केंद्र स्थापित होना समय की बड़ी मांग हैं. आनेवाले दस वर्षों में सामाजिक चित्र बदलना हो तो आज ही शिक्षा क्षेत्र में विकास कार्य शुरू किया जाना चाहिए ऐसा बार बार आभास हो रहा हैं. इस विषय में पिछला सब कुछ भुलाकर मानयोग जत्थेदार साहब की बात पर नए से चिंतन किया जाना चाहिए. धन्यवाद सहित. 

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रविवार, 22 नवंबर 2020

 उद्धव ठाकरे : कोरोना की त्सुनामी संभव 

लॉकडाउन लगाने का अभी निर्णय नहीं 

वाक्सिनेशन आसान नहीं होगा 

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे ने रविवार की रात जनता से साधे गए संवाद में चिंता व्यक्त की कि, कोरोना की दूसरी लहर त्सुनामी साबित हो सकती है. उन्होंने आज टीवी और सोशल मीडिया के माध्यम से अपील की कि जब तक हाथों में वैक्सीन नहीं आ जाती तब तक नागरिक न सिर्फ सतर्कता बरतें बल्कि सरकार के सभी निर्देशों का पालन किया जाएं. 

मुख्यमंत्री ने आगे कहा, पिछले समय में महाराष्ट्र में श्री गणेशोत्सव, दशहरा और दीपावली जैसे त्यौहार मनाये गए. अभी हाल में ही त्योहारों के समय बाजारों में भीड़ एकत्रित थीं. लोगों ने सावधानी नहीं बरतीं जिससे मैं नाराज भी हूँ. अब आगे सरकार को क्या कदम उठाना चाहिए! लॉकडाउन और नाईट कर्फ्यू लगाने के लिए सरकार को बाध्य ना करें ऐसी मेरी अपील हैं. कुछ लोग बार बार मांग कर रहें हैं कि यह खोल दिया जाएं, वो खोल दिया जाएं, लेकिन बिगड़े हालात की जिम्मेदारी कौन लेगा?  जिम्मेदारी लेने की लिए सामने आये मैं सब कुछ शुरू करने की अनुमति देने के लिए तैयार हूँ. उन्होंने आगे कहा, जनता सरकार की जिम्मेदारी भी समझें. 

श्री ठाकरे ने वर्तमान में देश में कोरोना के ताजे हालातों का जायजा लेते हुए कहा अभी हमारे पास वैक्सीन उपलब्ध नहीं हैं. यह वैक्सीन कब हाथ आएगी कहा नहीं जा सकता. इसलिए सभी को सावधानी बरतने के अलावा कोई अन्य विकल्प शेष नहीं हैं. उन्होंने कहा, महाराष्ट्र में बारह से साढ़े बारह करोड़ नागरिकों को वैक्सीन का टीकाकरण करना आसान बात नहीं हैं. यह प्रक्रिया लंबी चल सकती हैं. इसलिए आज ही हम स्वयं उपाय योजना शुरू कर दें. 

मुख्यमंत्री ने स्कूल शुरू करने के विषय में ठोस भाष्य नहीं किया. उन्होंने भाषण के दौरान पुलिस विभाग, स्वस्थ विभाग, राजस्व कर्मचारी और प्रशासन को धन्यवाद दिया. विगत आठ माह से सभी विभाग दिन रात, अपनी जान दांव पर लगाकर कोरोना संक्रमण का मुकाबला कर रहें हैं. उन्हें भी आराम की आवश्यकता हैं लेकिन उनका पेशा उन्हें इस बात की इज्जाजत नहीं देता. यदि कोरोना की अगली लहर आती हैं तो बड़ी तबाही मचेगी. वो त्सुनामी साबित होंगी. इसलिए सभी नागरिक सावधानी बरतें. मास्क का उपयोग करें. धार्मिक स्थानों और बाजारों में भीड़ ना करें. आवश्यक ना हो तो बाहर ना निकले. अन्यथा लॉकडाउन के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा. 

 महाराष्ट्र में रात का कर्फ्यू संभव !

महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण का पलटवार और उससे होने वाली संभाव्य क्षति का संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र में अगले कुछ दिनों में नाईट कर्फ्यू संभव है. एक ओर राज्य में स्कूल शुरू करने की तैयारी जारी है लेकिन गत चार से पांच दिनों में प्रदेश में कोरोना के मामलों में वृद्धि भी जारी है. मुंबई, पुणे और पश्चिम महाराष्ट्र कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर महसूस हो रहीं हैं. उत्तर भारत में भी कोरोना के मामलों में खासी वृद्धि देखने को मिल रहीं हैं. जिसे देखते हुए महाराष्ट्र सरकार भी नाईट कर्फ्यू यानी धारा 144 लागु करने का निर्णय लागु कर सकती हैं. उसी तरह से राज्य में स्कूलों को शुरू करने का निर्णय जानवरी तक बढ़ाया जा सकता हैं. कोरोना संक्रमण का प्रसार रोकने की जिम्मेदारी जितनी सरकार की हैं उससे कहीं अधिक जिला प्रशासन और नागरिकों की भी हैं. 



शनिवार, 21 नवंबर 2020

तैयार रहिएगा संभाव्य इमरजेंसी के लिए!

कोरोना केसेस 90 लाख 50 हजार 

दूसरी लहर आने से हड़कंप 

रविंदर सिंह मोदी 

देश और विदेशों में कोरोना संक्रमण का दूसरा अटैक यानी दूसरी लहर का प्रारंभ हो चुका है. भारत देश में पिछले दस दिनों से कोरोना के केसेस में लगातार वृध्दि देखने को मिल रहीं हैं. आज देश में कोरोना संक्रमितों के आँकड़े बढ़कर 90 लाख 50 हजार पार हुए हैं जो सबसे बड़ी चिंता का कारण हैं. दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, मध्यप्रदेश राज्यों के ताज़ा हालात देखकर हम यह तैयारी कर सकते हैं कि बहुत जल्द देश में कोरोना संक्रमण के प्रसार से आपदा की स्थिति बन जायेगी. एक अघोषित और संभाव्य आपातकाल हमें आगाह कर रहा हैं. इसलिए भारत के हर राज्य को संभाव्य आपातकाल के मुकाबले के लिए तैयार हो जाना चाहिए. 

राजस्थान में कोरोना संक्रमण के हालातों की वजह से सावधानी बरतते हुए हर जिले में धारा 144 (कर्फ्यू) लागु कर दिया गया. गुजरात के अहमदाबाद में रात का कर्फ्यू जारी हैं. हरियाणा में दूसरी लहर के कारण शिक्षा संस्थाओं को फिर से बंद कर दिया गया. महाराष्ट्र में भी पुणे और अन्य जिलों में संक्रमण में हल्की वृद्धि जारी हैं. जिसे देखकर लग रहा हैं कि दिसंबर माह में दुबारा से सरकार कड़क उपाय योजना लागु कर सकती हैं. यह भी कड़वी सच्चाई है कि आगामी 2021 का साल पाबंदियों के अधीन ही होगा. 

अमरीका में चुनावों के बाद कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर तबाही मचा रहीं है. प्रति दिन दो लाख पॉजिटिव मरीजों की वृद्धि हो रहीं हैं. अन्य देशों में भी कोरोना संक्रमण तेजी से प्रसारित हो रहा हैं. पिछले 24 घंटों में कोरोना से 11 हजार से अधिक मौतें होने के समाचार हैं, अकेले अमेरिका में पिछले चौबीस घंटों में मारने वालों का अकड़ा दो हजार से अधिक हैं. भारत कोरोना संक्रमण में छठे स्थान पर हैं और पिछले 24 घंटों के दौरान 548 लोगों ने जानें गंवाई हैं. 

कहा जा रहा हैं कि, कोरोना संक्रमण की वापसी का कारण हालिया त्योहारों का बीता काल कारणीभूत हैं. लोग त्योहारों में सारी सावधानी, सतर्कता दांव पर लगाकर बाजारों में शामिल हुए थे. जिससे संक्रमण में वृद्धि हुईं. दूसरे देश के अलग अलग राज्यों में चुनावों के कारण भी लोगों ने सार्वजनिक स्थानों पर जमघट लगाकर संक्रमण को बढ़ावा दिया. मतदान प्रकिया के दौरान भी सोशल डिस्टेंस मन्त्र को तिलांजलि दीं गईं. इसके अतिरिक्त पब्लिक ट्रांसपोर्ट के शुरू हो जाने के कारण भी संक्रमण विस्तारित हो रहा है. हवाई यात्रा के बढ़ जाने से स्थिति में परिवर्तन हो रहा है. रेल यात्रा के दौरान सावधानी नहीं बरतने से संक्रमण प्रसारित हो रहा हैं. 

महाराष्ट्र में इस बात का चिंतन शुरू हो गया हैं कि, आगामी दिसंबर में सर्दी और ठण्ड का मौसम कोरोना संक्रमण को बढ़ावा दें सकता हैं. आनेवाले दो से तीन माह कोरोना संक्रमण के लिए पोषक वातावरण पैदा कर सकते हैं. इसलिए सामाजिक कार्यक्रम, सभा, सांस्कृतिक आयोजन, रैली आदि पर अंकुश कस सकता हैं. 

महाराष्ट्र में पिछले 24 घंटों में 5640 नये केसेस की वृद्धि हुईं हैं. सबसे बड़ी चिंता की बात तो यह हैं कि, संक्रमण के चलते एक दिन में 155 मरीजों की मौत हुईं हैं. अब तक राज्य में संक्रमित मरीजों की संख्या 17 लाख 69 हजार पार होने के समाचार हैं. ऐसे हालातों के चलते इस दूसरी लहर का डर सरकार को सता रहा हैं. संभव हैं कि ता. 30-11-2020 को महाराष्ट्र सरकार लॉकडाउन को लेकर कोई नया कदम उठाये. इस दृष्टि से नागरिकों को संभाव्य आपात स्थिति के मुकाबले के लिए अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए. विदेशों में दुबारा से लॉकडाउन लागु हो चला हैं. भारत में भी आपातकाल संभव दिखाई दें रहा हैं. 

 

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

 कोरोना संक्रमण फिर आक्रमण पर !

दूसरी लहर लौट आई 

अहमदाबाद, इंदौर और दिल्ली अस्वस्थ 


जैसे कि बार बार दूसरी लहर की चेतावनी दीं जा रहीं थीं, वह डर सही साबित हो रहा हैं ! जाते - जाते कोरोना संक्रमण फिर आक्रामक हो उठा हैं. दिल्ली, मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा और अन्य राज्यों में कोरोना की दूसरी लहर लौट आई हैं. एक ही दिन में देशभर में 38 हजार 617 केसेस दर्ज हुए हैं जो चिंता की सबसे बड़ी वजह बताई जा रहीं हैं. गुजरात के अहमदाबाद में कोरोना के संक्रमण की विभीषिका को देखते हुए रात का कर्फ्यू लागु कर दिया गया हैं. वहीं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चव्हाण ने भी इंदौर और अन्य शहरों की स्थिति का जायजा लिया हैं और वहाँ फिर से लॉकडाउन लगने की संभावना बढ़ गईं. 

देश की राजधानी दिल्ली में कोरोना का संक्रमण तेजी से प्रसारित हो रहा हैं. पिछले 24 घंटों में दिल्ली में कोरोना के चौबीस हजार से ज्यादा केसेस बढ़ गए हैं. इस दौरान 131 लोगों की एक ही दिन में मौत का मामला भी सामने आया हैं. मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने गुरुवार को प्रेस कॉनफेरेन्स लेकर चेतावनी जारी की हैं कि लोग सतर्कता बरतें. केजरीवाल ने मास्क का उपयोग नहीं करनेवाले लोगों से दो हजार रूपये जुर्माना वसूलने का कानून भी लागु कर दिया. उसी तरह से कोरोना से निपटने के लिए 1400 बेड की व्यवस्था करने के निर्देश भी उन्होंने जारी किये गए. 

हरियाणा में स्कूलों के खुलने के विपरीत परिणाम सामने आ रहें हैं. जींद में लगभग सौ स्कूली बच्चों में संक्रमण पाया गया. जिसके बाद स्कूलों को बंद करने पर सरकार द्वारा विचार शुरू कर दिया गया. इंदौर के एक ज्वेलर्स शॉप में एक वक्त 31 लोग संक्रमित पाए जाने से हड़कंप मच गया हैं. कहा जा रहा हैं, देश में कोरोना की दूसरी लहर लौट आई हैं. 

दीपावली त्यौहार के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के घर से बाहर निकलने के कारण संक्रमण में तेजी आई हैं. सर्द मौसम में संक्रमण प्रसार और भी बढ़ सकता हैं. धार्मिक, सामाजिक आयोजनों के कारण भी संक्रमण में तेजी आने की संभावना बढ़ सकती हैं. भारत में कोरोना की दूसरी लहर खासी तबाही मचा सकती हैं. क्योंकि कोरोना संक्रमण पर प्रभावकारी उपचार वैक्सीन अभी भी बाजार में उपलब्ध नहीं हैं. ऑक्सफ़ोर्ड की वैक्सीन जनवरी में अमल में लाने की तैयारी की जा रहीं है. भारत में जनवरी में ही वैक्सीन वितरण कार्य प्रारम्भ होने की संभावना दिखाई दें रहीं हैं. देश में आज कोरोना स संक्रमण का अंक 89 लाख 13 हजार के लगभग हैं वहीं मरनेवालों का अंक एक लाख 31 हजार को छू रहा हैं. 



मंगलवार, 17 नवंबर 2020

 एसजीपीसी की उपलब्धि का हजुरसाहिब में ठंडा स्वागत !

शुभकामनायें भी नहीं दीं ? 

रविंदरसिंह मोदी 

अभी हाल ही में तारीख 15-11-2020 सिखों की सर्वोच्च प्रतिनिधिक संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने संस्था गठन के एक सौ वर्ष पुरे कर लिए. सिख पंथ के लिए यह बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए. लेकिन हजूर साहिब नांदेड़, महाराष्ट्र में एसजीपीसी की इस उपलब्धि का ठंडा स्वागत हुआ है.  वो भी ऐसे समय, जब गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड पर एसजीपीसी के प्रतिनिधि प्रधान और मीत प्रधान के रूप में नियुक्त हैं. गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड औपचारिक रूप से एसजीपीसी की इस उपलब्धि पर शुभकामनायें भी प्रेषित नहीं की गईं ! हजूर साहब बोर्ड के किसी भी पदाधिकारी अथवा मेंबर द्वारा सोशल मीडिया पर भी शुभकामनायें जारी नहीं की गईं. इस हताशा के पीछे क्या कारण हो सकता हैं यह साधसंगत में चर्चा का विषय बना हुआ हैं. गुरुद्वारा बोर्ड कार्यालय द्वारा भी कोई प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की गईं. 


गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड में एसजीपीसी के चार सदस्य प्रतिनिधित्व कर रहें हैं. चीफ खालसा दीवान संस्था का भी एक प्रतिनिधि यहाँ नियुक्त हैं. ऐसे में हजूर साहिब में एसजीपीसी की उपलब्धि को नजर अंदाज कर दिया गया. यूँ भी हुआ होगा कि शायद किसी को यह याद ही नहीं आया हो कि यह काम भी किया जा सकता हैं. एसजीपीसी के प्रधान भाई गोबिंदसिंघजी लोंगोवाल भी इस बात से थोड़े चिंतित हुए ही होंगे. श्री लोंगोवाल हजूर साहिब की साधसंगत की भावनाएं इस ख़ामोशी में खूब महसूस कर सकते हैं. खैर, इस मौके पर एसजीपीसी संस्था की इस खास उपलब्धि पर हम एसजीपीसी के प्रधान, मीत प्रधान, सेक्रेटरी, पदाधिकारी और सदस्यों को शुभकामनायें और बधाई प्रेषित करते हुए अरदास करते हैं कि गुरु महाराज सभी को सद्धबुद्धि, विवेक और सच्ची सेवा का बल बक्शे. 




सोमवार, 16 नवंबर 2020

 श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी के 312 वें गुरुतागद्दी दिवस की शुभकामनायें !

रविंदरसिंह मोदी 

(श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी गुरुतागद्दी 2020,  तखत सचखंड श्री हजूरसाहिब, नांदेड़)

तीन सौ बारह वर्ष पूर्व, तिथिनुसार, आज के दिन युगदृष्टा गुरु, परम तेजस्वी, दुष्ट दमन दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज ने हजूर साहिब नांदेड़ की पावन धरती पर श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी को गुरुत्व यांनी गुरुतागद्दी प्रदान की थीं. गुरुतागद्दी प्रदान करते समय श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज ने आत्मिक भाव व्यक्त करते हुए आदेश दिया था, "आगिया भई अकाल की तबै चलायो पंथ, सभ सिखन को हुकूम हैं गुरु मानियो ग्रन्थ."

उस दिव्य और आलौकिक घटना को 312 वर्ष पूर्ण होने पर तखत सचखंड श्री हजुरसाहिब में श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी का गुरुतागद्दी पर्व श्रद्धा और उत्साह के वातावरण में मनाया गया. हर वर्ष गुरुतागद्दी का समारोह उत्साह के वातावरण में ही संपन्न होता आया है. लेकिन इस वर्ष तकनीकि दिक्कतों का व्यवधान सामने था. पर गुरु महाराज की अनुकंपा और आशीर्वाद से उत्साह के माहौल में पर्व संपन्न हुआ. 

श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी हमारे पथप्रदर्शक गुरु है. श्री हजूर साहिब की पावन धरती पर उनका अस्तित्व विराट आभा प्रसारित कर रहा है. गुरु ग्रंथसाहिब जी के अलौकिक ज्ञान और मार्गदर्शन से हजुर साहिब में सदैव दिव्यता का परम अहसास मिलता आया है. आज तीन सौ बारह वर्षों बाद हम वैज्ञानिक आधार पर भी गुरुबाणी की सार्थकता को महसूस करवा सकते हैं. यदि हजूर साहब से श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी की विचारधारा का प्रचार और प्रसार प्रमाणिकता से किया जाएं तो सिख धर्म को सर्वधर्मीय हृदय में सम्मान का स्थान प्राप्त होगा. श्री गुरु ग्रंथसाहिबजी की विचारधारा हमारे पंथ के संकुचन में ठहर गईं हैं. इस विचारधारा को प्रसारित करने के लिए हजूर साहब की धरती से ही सक्षम मंच की स्थापना होनी चाहीए. राजनीतिक मनोवृत्ति के चलते धर्म की विचारधारा को अधोगति की ओर छोड़ देना किसी भी धर्म की सबसे बड़ी हानि होती है. यदि श्री गुरु ग्रंथसाहिब की विचारधारा वैश्विक नहीं होती तो शायद मैं राजनीतिक अपप्रवृत्ति को छेड़ने का कदापि अट्ठहास न करता. लेकिन सत्य यहीं है कि 64 वर्ष पुरानी हमारी धार्मिक संस्था में धर्मप्रचार कार्यों को लेकर गहरी उदासीनता छाई हुईं हैं. 

सिख धर्म का प्रचार प्रसार सिख पंथ के अंतर्गत ही हैं. यह प्रचार प्रसार और समागम भी केवल अंतर्गत सौजन्य परोसने का माध्यम हैं. यहीं तक सीमित रहने का यह प्रपंच हैं. श्री गुरु नानकदेव जी की आध्यात्मिक विचारधारा आज खुलकर उन उदासियों का भी वास्ता देने से कतरा रहीं हैं जो सिख पंथ के भीतर नहीं अपितु संपूर्ण एशिया खंड को सिक्खी का उजला आशावाद दिखाकर लौटी थीं. सिख गुरुओं, संतों, महापुरुषों और प्रामाणिक सिखों की भक्ति, अध्यात्म, सीख, मार्गदर्शन शांत सफहों में समाधिस्थ हैं. साल में एक बार, कुछ धार्मिक विचार जागृत कर बाद में वर्ष भर का अवसाद अपनाना कोई नियति नहीं हो सकती. सभी को श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी गुरुतागद्दी दिवस की कोटि कोटि शुभकामनायें और बधाई. 

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रविवार, 15 नवंबर 2020

क्या भला किया हैं सिखों का एसजीपीसी ने ? 

 शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सौ साल

रविंदरसिंघ मोदी 


सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था होने का सम्मान शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (अमृतसर) संस्था के नाम हैं. किसी धार्मिक संस्था का एक सौ वर्ष पूर्ण करना अपने आप में एक सुनहरा इतिहास होता है. इतिहास में यह यात्रा मील का एक पत्थर मानी जानी चाहिए. सन 1920 में 15 नवंबर का दिन संस्था का स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है. लेकिन वर्ष 1925 में सेंट्रल गुरुद्वारा एक्ट का पंजाब सरकार द्वारा गैज़ेट जारी किया गया. उस समय पंजाब सरकार के गवर्नर के रूप में मालकम हैले थे जिन्होंने इस संस्था के कानून बनाने में अच्छी भूमिका अदा की थीं. उन्होंने उस कार्य के लिए सिखों की पांच सदस्यीय समिति का गठन भी किया था. सन 1920 से सन 1926 तक संस्था के कानून संशोधन होते रहें और संस्था को सिखों के नेतृत्व अधिकार बढ़ाने की दृष्टि से समय समय पर प्रावधान होते रहें. बड़ी बड़ी हस्तियों ने इस संस्था से अपनी राजनीति की यात्रा शुरू की थीं यह भी एक अलग इतिहास हैं. 

खैर, इस वर्ष (2020) शातकपूर्ति होने से एसजीपीसी संस्था का उत्साह वैसे सिर चढ़कर बोल रहा है. संस्था के पहले प्रधान भाई स्व. सुन्दरसिंघ मंजिठिया से लेकर अभी तक जितने प्रधान संस्था पर सेवारत रहें सभी को संस्था की प्रगति और उतार - चढ़ाव का श्रेय पहुँचता हैं. यह संस्था एक युग, एक इतिहास की साक्षी रहीं हैं. 

सिख पंथ की सर्वोच्च धार्मिक संस्था के एक सौ वर्ष पूर्ण होना वैसे एक नये आशावाद को जन्म देना है. ऐसे समय यह प्रश्न उठना स्वाभाविक भी है कि, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति से देश अथवा विश्व के सिखों से क्या अपेक्षाएं रखनी चाहिए? आखिर क्या भला किया हैं एसजीपीसी ने सिखों का? इस प्रश्न का उत्तर एसजीपीसी निष्पक्षता से दें नहीं पायेगी. सच्चाई यह हैं कि, पिछले सौ वर्षों में सिखों ने बहुत कुछ खोया हैं. पिछले सौ वर्षों में संस्था के कई अंग अलग हुए हैं. एक सौ पिचहत्तर (175) सदस्योंवाली इस संस्था का दायरा तंग और तंग होता चला गया. सिखों के बलिदान के इतिहास बनें. पाकिस्तान अलग हुआ. हमारे गुरुओं के सभी ऐतिहासिक स्थान अलग हो गए. पंजाब राज्य भी छोटा और छोटा होता चला गया. एसजीपीसी धीरे धीरे ऐतिहासिक स्थान और गुरूद्वारे खोतीं रहीं. दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी अख्तियार में नहीं रहीं. सिक्खी का पतन पंजाब में ज्यादा होता रहा, एसजीपीसी रोक नहीं पायी. 


(स्व. मास्टर तारा सिंघजी)

जिसके कारण भी आज देश में सिखों की जनसंख्या बहुत कम हैं. पिछले सौ वर्षों में अंदाजा दस से पंद्रह लाख सिखों की हत्याएं हुईं. देश विभाजन में सर्वाधिक कत्तल सिखों के हुए. सन 1984 के सिख नरसंहार तक सिखों का दमन होता ही रहा. एसजीपीसी ने क्या भूमिका अदा की हर सिख को सोचना चाहिए. केवल चढ़ावा जमा करना और पंजाब की राजनीतिक पार्टियों की हौसलाअफजाई करना संस्था का छुपा एजैंडा बन कर रह गया. स्व. मास्टर तारासिंघजी इस संस्था के लगभग अठारह (18) वर्ष प्रधान थे, जो कि सिखों के सबसे विद्यवान नेता माने जाते थे. जत्थेदार स्व. गुरचरनसिंघजी तोहरा अंदाजा सताइस (27) प्रधान के रूप में कार्यरत थे. अभी हाल में स्व. सरदार अवतारसिंघ मक्कड़ ग्यारह (11) वर्ष प्रधान की कुर्सियों पर कार्यरत थे. 

(जत्थेदार स्व. गुरचरनसिंघजी तोहरा)

विगत तीन वर्षों से भाई गोबिंदसिंघजी लोंगोवाल एसजीपीसी के प्रधान हैं. लोंगोवाल के कार्यकाल में सिखों का क्या भला हो रहा हैं सही मायने में यह एक खुली बहस का विषय है. इस संस्था के दायरे से श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी के पावन 328 स्वरुप गायब हो जाने की घटना क्या एसजीपीसी का गौरव बढ़ाने वाली घटना हैं?  

(स्व. अवतारसिंघजी मक्कड़)

एससजीपीसी संस्था का वार्षिक आर्थिक बजट बारह सौ पांच करोड़ (1205 caror) हैं जो इस वर्ष कोविड त्रासदी के कारण 18.5% प्रतिशत कम होकर 981 करोड़ अपेक्षित किया गया हैं. एसजीपीसी सिखों की शिक्षा के नाम पर 120 से 125 करोड़ का वार्षिक आर्थिक प्रावधान करती हैं. आज देशस्तर पर कौनसी शिक्षा संस्था जानी जाती हैं?  उन संस्थाओं पर कौन पदाधिकारी हैं और उनके क्या चरित्र हैं? चर्चा है कि, शराब के प्रमोटर और बार चलाने वाले भी ऐसी संस्था के हस्तक बनें हुए हैं ! 

एसजीपीसी संस्था द्वारा लगभग 60 करोड़ का प्रावधान धर्मप्रचार पर किया जाता हैं. एक तो यह राशि धर्मप्रचार के लिए कम हैं. दूसरा यह कि संस्था ऐसा क्या धर्मप्रचार कर रहीं हैं कि पंजाब से सिख, सिक्खी से दूर भागते नजर आ रहें हैं ! धर्म सिद्धांतों को ख़ारिज कर सिख नशों की लत में मरें जा रहें हैं ! आपके धर्मप्रचार के बावजूद भी पंजाब के शिक्षा में सिक्खी इतिहास के पृष्ठ कम और कम होते चलें जा रहें हैं ! धर्म को लेकर कितनी शताब्दियां मनाईं गईं, क्या "आउटपुट" सामने आया हैं. क्यों सिखों की जनसंख्या आज कम है? काम में कितनी ईमानदारी थीं खुलासा कीजिए. पिछले सौ सालों में धर्म प्रचार पर कितनी राशि खर्च हुईं? जवाब तो एक हजार करोड़ से ऊपर का हो सकता है ! क्या हासिल हुआ?  क्या भला हुआ?  एक नहीं, दो नहीं बल्कि दस सिख गुरुओं के अमर इतिहास से सींची हुईं पंजाब की धरती पर पिछले सौ वर्षों में सिक्खी इतिहास की अमर यात्रा कैसे रहीं. इस शातकपूर्ति पर बहुत से सवालों का उठना और उठाया जाना भी स्वाभाविक हैं. 

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