एसजीपीसी बनाम बिहार के स्थानीय सिख?
राजिंदरसिंघजी की मौत से सिहरन !
| (दिवंगत : भाई राजिंदर सिंघजी, हेड ग्रंथी, पटना) |
श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज की जन्मस्थली तखत श्री हरिमंदर साहब, पटना में हेडग्रंथि भाई राजिंदरसिंघजी की मौत की घटना ने सिख जगत में एक सिहरन पैदा कर दी है. इस घटना के बाद एक बार फिर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के प्रबंधन नीति पर सवाल उठने लगें हैं. जहाँ - जहाँ शिरोमणि अकाली दल प्रणीत एसजीपीसी संस्था का प्रबंधन (सत्ता) विद्यमान हैं, वहां - वहां प्रबंधन और कार्यालयीन व्यवस्था को लेकर काफी विवाद की स्थिति बनीं देखीं जा रहीं हैं. एसजीपीसी के प्रबंधन में साम दाम दंड भेद मंत्र भी आम है, ऐसे आरोप होने लगें हैं. एक पवित्र तखत साहब के स्थान पर यूँ हिंसक घटना उजागर होने से उसका एक नकारात्मक संदेश समस्त विश्व में प्रसारित हो रहा हैं. यहाँ, आत्महत्या और हत्या से आगे जाकर यह यह सवाल सिहरन पैदा कर रहा हैं कि एक पूजास्थली पर ऐसी परिस्थिति क्यों बन गईं कि एक वयोवृद्ध ग्रंथी का जीवन अंतिम दिनों में दुर्गति में तब्दील हो गया.
पटना साहब जैसे पूजनीय स्थल पर कार्यरत मुख्य ग्रंथी भाई राजिंदरसिंघजी की मौत के बाद पटना शहर में राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गईं हैं और वहां एक बार फिर एसजीपीसी प्रबंधन पर यह आरोप लगने शुरू हो गए हैं कि एसजीपीसी द्वारा पंजाब के लोगों को तखत साहब की नौकरियां देने के उद्देश से बिहार के स्थानीय सिखों को नौकरियों से हटाया जा रहा हैं. प्रबंधन के सभी बड़े पदों पर पंजाब से लोग लाकर बिठाये जा रहें हैं, वहीं पटना के स्थानीय निवासियों को छोटे ओहदो पर नौकरियां दी गईं हैं. स. त्रिलोकी सिंघ जो कि पटना के स्थानीय निवासी हैं, उनका लगातार एसजीपीसी प्रोत्साहित पटना प्रबंधन कमेटी के प्रधान सरदार अवतारसिंघजी हित के साथ संघर्ष जारी हैं. उनके द्वारा किये गए अब तक के इन आरोपों के बाद एसजीपीसी के प्रबंधन को लेकर भी सवाल खड़े हो रहें हैं. पिछले दशहरा के समय पटना कमेटी द्वारा 63 वर्ष उम्र पार किये गए ओहदेदार और सेवादारों को निवृत्त करने का निर्णय लिया गया था. जिसके बाद से स्थानीय बिहारी बनाम एसजीपीसी (पंजाबी) विवाद पैदा हो गया था. राजिंदरसिंघजी की मौत का उस घटना के साथ कहीं ना कहीं संबंध होने का दावा प्रस्तुत हो रहा हैं.
पांचों के तखतों के प्रबंधन पर एसजीपीसी की सत्ता :
इस समय शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) की पांचों तखत पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सत्ता कायम हैं. पंजाब से दो हजार किलोमीटर दूर स्थित तखत सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहब बोर्ड प्रबंधन समिती पर भी एसजीपीसी का नियंत्रण और प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा रहा हैं. वर्ष 2018 के मार्च माह में एसजीपीसी के सदस्य व तत्कालीन मीत प्रधान स. भूपिंदरसिंघ मिनहास की हजूर साहब बोर्ड पर "प्रधान" के रूप में नियुक्ति की गईं. यह नियुक्ति तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस (भाजपा) के कार्यकाल में हुईं थी.
तखत सचखंड हजूर साहब बोर्ड का प्रबंधन भी शिरोमणि अकाली दल की राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित और एसजीपीसी के सत्ता प्रभाव से छायांकित प्रतीत होता रहा हैं. हजूर साहब बोर्ड द्वारा भी बोर्ड में ओएसडी पद पर पंजाब से जसविंदर सिंह दिनपुर की नियुक्ति कर हजूर साहब बोर्ड का प्रबंधन उनके निरिक्षण में सौंप दिया गया था. बाद में गुरविंदर सिंह वाधवा को पद से हटाकर जसविंदर सिंघ दिनपुर को बोर्ड का सुपरिन्टेन्डेन्ट भी बनाया गया. पटना साहब में उठाये जा रहें सवालों के बाद यह मामला हजूर साहब के लिए भी सोंच का विषय बन जाता हैं कि हजूर साहब में भी पंजाब से लोग आयात कर स्थानीय सिखों के रोजगार का हक तो नहीं मारा जा रहा हैं? हजूर साहब बोर्ड द्वारा भी स्थानीय शिक्षित युवकों को सेवादार (चतुर्थ श्रेणी) के रूप में नियुक्तियां दें कर "सेवक संख्या" बढ़ाने की नीति अपनाई गई हैं. बोर्ड में उच्च ओहदों पर "साहब" तो पंजाब वाले और बाहर के होने चाहिए! स्थानीय लोग सेवक बनकर ही समाधानी रहें इतियादी आदि... !
एसजीपीसी की सत्ता अधीन पांचों तखत साहब की प्रबंधन समितियों के कार्यप्रणाली की समीक्षा होनी चाहिए. बिहार के स्थानीय सिखों को अधिकार मिलना चाहिए कि वहां का पूजा - पाठ, प्रबंधन में स्थानीय लोग ओहदेदार पद पर नियुक्त रहें. वहीं सूत्र हजूर साहब के बारे में उपयोगी होगा. "पटना" और "हजूर साहब" को लेकर एसजीपीसी की सौतेली नीति कई प्रश्नं खड़े कर रहीं हैं. सिखों की सर्वोच्च संस्था होने के नाते संस्था द्वारा पंजाब के बाहर के गुरुधाम और सिखों के प्रति सहानुभूति की नीति होनी चाहिए. लेकिन सबकुछ विपरीत चल रहा हैं. भाई राजिंदरसिंघजी की मौत से व्याप्त सिहरन से यदि एसजीपीसी और शिरोमणि अकाली दल नेता संज्ञान नहीं लेते हैं तब भारतीय सिखों के हितों की रक्षा का दायित्व कौन उठाएगा?
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