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मंगलवार, 11 जनवरी 2022

गरीब कर्मचारियों की बद्दुआएं ना लीजिए !

जता जताकर और सता सताकर ! 

दिया जाए तो उसका मोल क्या ? 

रविंदरसिंघ मोदी 

(तखत सचखंड श्री हजूर साहब जो मुरादों की पूर्ति का दर हैं !)

गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड के अलिप्त प्रधान साहब और उनके "मंत्री मंडल" से मुखातिब होने के ऐसे में अवसर ही नहीं मिल पा रहे हैं. मुद्दत हो गईं है कि माननीय प्रधान साहब हजूर साहब का रुख नहीं कर रहे हैं. उनके दायित्व के अधीन बोर्ड कार्यालय, पॉलिसी मैटर, त्योहारात, पूजा पाठ, कर्मचारी, मैनेजमेंट, कार्यप्रणाली और बोर्ड से जुड़ी संभावनाओं की भी वे सुध ले रहे हैं कि नहीं, पता नहीं. संस्था का सारा दायित्व अपने "मंत्री मण्डल" पर छोड़ कर वें मुंबई, औरंगाबाद आदि स्थानों से ईमेल द्वारा मंजूरी देने का काम जारी रखें हुए हैं. बहुत महीनों से वें हजूर साहिबवालों के फोन भी रिसीव नहीं कर रहे हैं. उनकी व्यस्तता, व्यवसाय और स्वास्थ्य आदि का विचार कर हम भी महीनों में कभी एखाद बार उन्हें फोन पर संपर्क करते हैं पर वें उठाते ही नहीं. साहब जिद्द के बड़े पक्के है. जो धारणा मन में बना लेते हैं उस पर अडिग रहते हैं. एक संपन्न और अच्छे व्यवसायी होने के उनके तमाम गुणों का मैं व्यक्तिगत रूप से प्रशंसक रहा हूँ. यद्यपि ऐसा हो भी, तब भी, उनमें और उनके मंत्री मंडल के कामकाज और निर्णय आदि को लेकर बहुत बड़ा अंतर नजर भी आ रहा हैं. अंत में प्रधान साहब का निर्णय वहीं होता है जो मंत्री मंडल का होता हैं. नौ लोगों में बोर्ड का कामकाज चलाकर वैसे भी उन्होंने अपनी राजनीतिक सूझबूझ भी सुदृढ़ होने का संकेत दें दिया हैं. अब बाबा रामदेव और देवेंद्र का दिव्य साथ मिल जाए और उद्धव जी की सरकार पर पासे बैठ जाए तो निश्चित ही अगली सत्ता भी उनकी ही होंगी. उन्हें शुभकामनायें !

डेली वेजस, बिलमुक्ता और पर्मनन्ट कर्मचारियों की समस्याओं को सुनता कौन हैं !

यह पोस्ट ! प्रधान साहब की सेवा में एक खुले पत्र के रूप में बहुत ही नम्रतापूर्वक प्रस्तुत कर रहा हूँ. आशा इस पत्र का अस्वाद प्रधान साहब ही नहीं उनका मंत्रिमंडल भी उठाएगा. महाराष्ट्र सरकार द्वारा तारीख 8 मार्च, 2018 के मुहूर्त पर प्रधान साहब को गुरुद्वारा बोर्ड का "अध्यक्ष" इसलिए नियुक्त किया गया था कि वें अपनी प्रबलता, यथाशक्ति, बुद्धि कौशल्य से बोर्ड संचालन की "सेवा" का दायित्व निभाए. श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज के इस पावन स्थान (तखत साहब) की सेवा और प्रबंध निभाए. लेकिन प्रधान साहब जी द्वारा बोर्ड संचालन के दायित्व और अधिकार जैसे बांट दिए गए है. पिछले तीन सालों में बार - बार यह अहसास भी यदा कदा महसूस होता ही रहा कि सरकार द्वारा नियुक्त प्रधान साहब के अलावा कोई और शक्तियां बोर्ड की व्यवस्था देख रहीं हैं. मेरे जैसे एक सामान्य सिख व्यक्ति के मन में बहुत बार यह बात मुँह तक आ जाती हैं कि, यह बोर्ड "अध्यक्षीय नेतृत्व" वाला लग नहीं रहा! साहब! बोर्ड का प्रत्यक्ष में "वाली" कौन है? यह प्रश्न हमने किया भी था ! न्यूज़ पेपर्स तो शायद आप पढ़ते ही नहीं. दूसरा यह कि सवाल के जवाब नहीं देने का आपका कथित अनुशासन भी बाधाएं खड़ी किये हुए हैं. खैर छोड़िए!8

आस्था का घर ! उम्मीदों का दर !!

प्रधान साहब से यहीं एक प्रश्न पूछने की मनोकामना थी कि बोर्ड में सेवारत अस्थाई और स्थाई कर्मचारियों के प्रलंबित प्रश्नों को आप कब तक टालते रहोगे? और कितने समय तक गरीब परिवारों को रुसवा करते रहोगे? संस्था के एक नंबर के प्रमुख होने के नाते आपसे इस विषय में प्रश्न करने का अभिव्यक्ति अधिकार हमें प्राप्त है. डेली वेजस और बिलमुक्ता कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का विषय पिछले पांच से छह सालों से प्रलंबित है. तीन - चार सौ से ज्यादा अस्थाई कर्मचारी महज सात से आठ हजार रुपयों के अल्प वेतन में अपना घर चला रहे हैं. अल्प वेतन में वें बीमारी, संक्रमण, बच्चों की पढ़ाई आदि समस्याओं से जूझ रहे हैं. दो साल की सेवा के बाद अस्थाई कर्मचारी अथवा बीलमुक्ता कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने की शुरू से प्रैक्टिस चलीं आ रहीं हैं. सरकारी नियमों के तहत एक साल की निरंतर सेवा के बदले अस्थाई कर्मचारी को सेवा में पक्का करने के प्रावधान भी उपलब्ध हैं. आपके बोर्ड में डेलीवेजस और बिलमुक्ता हैसियत पर क्लर्क या सेवादार के रूप में पिछले पांच से छह सालों से कर्मचारी सेवा निभा रहे हैं. बार - बार आपको ज्ञापन, निवेदन दिए जाते हैं, भेजें जाते हैं. लेकिन उन पर कोई सुनवई नहीं होती हैं. क्या आप में निर्णय क्षमता नहीं है? क्या आपके निर्णय लेने के अधिकार किसी अन्य ओहदेदार के अधीन हो चले हैं? सच मानिये ऐसी चर्चाएं आए दिन सुनने को मिल रहीं हैं! इसलिए सोचा आपको सीधे ही प्रश्न कर लिया जाएं कि "सच्चाई क्या है? " आप ही परिस्थिति का सत्यकथन कर सकते हो. 

प्रधान साहब, पिछले छह सालों से छह से सात हजार रूपये अल्प वेतन में सेवाएं निभा रहे यह अस्थाई कर्मचारी हर मेंबर साहब के पास अर्जियां देकर, हाथ जोड़कर प्रार्थना करते आ रहे हैं कि उन्हें सेवा में पक्का किया जाएं. 80 % से 90 % कर्मचारी विवाहित है. परिवार वाले हैं. उनकी भी आर्थिक समस्याएं हैं. कर्मचारियों की या उनके परिवारों की बद्दुआएं मत लीजिए. परमात्मा ने आपको सब कुछ दिया हुआ हैं. आपके परोपकारी चरित्र पर बद्दुआओं की छाया ना पड़ने दीजिए. तीन साल का समय देखते - देखते निकल गया! क्या साध्य हुआ? आप सरकार नियुक्त प्रधान हो. आपको इन कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का अधिकार प्राप्त है. "बोर्ड मीटिंग की आस" पर भी पक्का किया जा सकता हैं. या विशेष प्रस्ताव बनाकर आप सहित सभी नौ लोगों की दस्तखत लेकर आप आदेश जारी कर सकते हो. कुछ विषयों को लेकर फिल-हाल न्यायालयीन दिक्कत की परिस्थिति संभव हो सकती हैं. लेकिन आनेवाले दो से तीन सप्ताह में बाद न्यायालयीन स्थिति भी स्पष्ट हो जायेगी. 

आप प्रधान (प्रमुख) होने के नाते आपको अधिकार प्राप्त है कि आप कर्मचारियों के हितों के विषय में निर्णय पारित करें. बीच में दो साल पहले आपने एक मीटिंग में मात्र एक कर्मचारी को सेवा में पक्का किया गया था! उस समय स्वयं मेंबर साहिबान ने भी सवाल उठाये थे! कौनसी इमरजेंसी थी, कौन से नियम और पात्र कर्मचारियों को सेवा में पक्का नहीं करने के क्या कारण थे आदि सवाल आप तक पहुँचाएँ गए थे. कर्मचारी भाई सुपरिन्टेन्डेन्ट कार्यालय के बाहर धरने पर भी बैठें थे. सेवा में पक्का करने के आश्वासन देकर तब उन्हें धरने पर से उठाया गया था. मेंबर साहिबान भी उस समय उपस्थित थे, वें आपको प्रसंग वर्णन कर सकते हैं. बाद में आश्वासन पुरे नहीं किये गए. दो साल निकल गए. 

प्रधान साहब ! हम तो चाह रहे हैं कि आपके कार्यकाल में यह पात्र सभी कर्मचारी सेवा पक्का होकर आपको दुआएं दें. इन परिवारों की दुआएं आपको मिले. सोचिए साहब, इन गरीब कर्मचारियों को बाद में (इलेक्शन के मौके पर) जता जताकर और सता सताकर सेवा में पक्का किया भी जायेगा ना साहब. उससे ना आपको दुआएं मिलेगी ना आपके साथियों को वोट मिलेंगे. डेली वेजस और बिलमुक्ता कर्मचारियों के और उनसे संबंधित परिवारों के वोटों की संख्या 2700 से 2900 के लगभग है! कोई संभ्रम में ना रहे कि सताए गए कर्मचारियों की आगे मानसिकता क्या हो सकती. पत्रकारिता में स्टैटिस्टिक्स पर ध्यान देना ही होता है. ग्राफ किसी भी करवट जा सकता है. अब 4500 हजार वोट संख्या पाकर (जुगाड़ कर) इलेक्शन जीता जा सकता हैं. नांदेड़ शहर के 2900 वोट कम नहीं हैं. गुरु महाराज जी के आशीर्वाद से हमारे कर्मचारी भाई - बहन आज इस परिस्थिति में नजर आ रहे हैं कि किसी का भी ग्राफ ऊपर चढ़ा दें या किसी का भी ग्राफ नीचे उतार दें ! 

साहब जी! आपकी प्रधानगी में वरिष्ठ कर्मचारी वर्ग के साथ भी बहुत सौतेला व्यवहार देखने को मिला हैं. वरिष्ठ पात्र कर्मचारियों को समय पर ग्रेड नहीं मिल पाए, पदोन्नति में अन्याय, पोस्टिंग में अन्याय होता देखा गया हैं. कुछ पात्र वरिष्ठ कर्मचारी तो सेवानिवृत्त हो चले हैं. महिला कर्मचारियों के साथ पदोन्नत्ति में भेदभाव के आरोप भी लगते रहे हैं. एक वरिष्ठ महिला कर्मचारी अभी सेवानिवृत्ति के निकट है. परिश्रमी होने के बावजूद भी उस सीनियर बहन को ना प्रमोशन ना ग्रेड हीं दिया गया ! न पदोन्नति! जिन पर मंत्रिमंडल की मेहेरबानी वालों को आसानी से मिल गया है. जिनका अधिकार मारा गया, जिनकी पात्रता नजरअंदाज की गईं, वें तो बद्दुआएं ही देंगे ना साहब ! 

आपके तीन सालों के टर्म में सस्पैंड कर्मचारियों के विषय लटका कर रखें गए हैं. सालों हो गए ! कुछ तो सेवानिवृत्त हो चले. पर उनके भविष्य और जीवन के बारे में निर्णय नहीं लिए गए. 2015 से लेकर अभी तक, सस्पैंड कर्मचारी मामलों के संबंध में कितनी जाँच कमेटियां बनीं और जाँच अधूरी रह गई. सालों - साल निर्णय लटके हुए. जो कर्मचारी निर्दोष है, जिन पर परिवार की जिम्मेदारी है वें इस समय कितने दबाव में हैं आप अंदाजा नहीं लगा सकते. इन कर्मचारियों के विषय में कोई ना कोई निर्णय लेना ही होगा. पर आप कोई ठोस कदम उठाने को राजी ही नहीं है. आपके सुपेरियर प्रबंधन का कोई अस्तित्व है भी कि नहीं ! 

उम्मीद है साहब, जो हो गया उसे भूलकर, आप स्वस्थ और उदार मन से कर्मचारी वर्ग के हितों की रक्षा में निर्णय लेंगे. अब तो आदरणीय संतों ने भी गुहार लगाई है. उनका सम्मान किस तरह से रखना है विचार कीजियेगा बाकी इन कर्मचारियों के साथ हम यहाँ आशावादी बनें हुए हैं. मेरी कोई बात असहज प्रतीत हो रहीं हैं तो वें इन कर्मचारी भाई और बहनों के आत्मा की आवाज मानकर क्षमा कीजियेगा. धन्यवाद !

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सोमवार, 10 जनवरी 2022

श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी का प्रकाशपर्व 2022

 श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज का प्रकाशपर्व मनाया !

नगरकीर्तन खेलकर मनाई खुशियाँ!

(तखत सचखंड श्री हजुरसाहिब, नांदेड़ )

तखत सचखंड श्री हजूर साहब नांदेड़ के पावन स्थान पर रविवार, 9 जनवरी, 2022 की सुबह तड़के, तिथिनुसार, खालसा पंथ के संस्थापक, दशम पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज का प्रकाश पर्व मनाया गया. आदरणीय जत्थेदार जी संतबाबा कुलवंतसिंघजी, मीत जत्थेदार संतबाबा ज्योतिंदरसिंघजी, सहायक जत्थेदार संतबाबा रामसिंघजी, हेड ग्रंथी सिंघसाहिब भाई कश्मीरसिंघजी, मीत ग्रंथी सिंघसाहब भाई गुरमीतसिंघजी ने गुरु महाराजजी के पावन प्रकाशपर्व दिहाड़े के सभी धार्मिक विधियों का संचालन किया. सुबह प्रकाश पर्व की अरदास की गईं. श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी का हुकुमनामा पठन किया. साथ ही कीर्तन, श्री आसां-दी-वार साहब के पाठ, कथा, आरती, भोग और अरदास कार्यक्रम संपन्न हुए. संतबाबा कुलवंतसिंघजी ने साधसंगत जी को गुरु महाराज जी के प्रकाशपर्व के उपलक्ष्य में बधाई और शुभकामनायें प्रेषित की. 

(प्रकाशपर्व के उपलक्ष्य में सुबह तड़के दर्शन को पहुँचे श्रद्धालु)

दोपहर 4 बजे के समय तखत सचखंड हजूर साहिब स्थान से प्रकाश पर्व दिहाड़े को समर्पित नगरकीर्तन यात्रा का आयोजन किया गया था. यह यात्रा पिछली यात्रा के मुताबिक पारंपरिक मार्ग पर निकाली गई. नगरकीर्तन यात्रा में विशेष पालकी वाहन में धन धन श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी के पावन स्वरुप प्रकाशमान किये गए थे. श्री निशान साहब और गुरु महाराज जी के घोड़े (अश्व) यात्रा में शामिल थे. साथ ही कीर्तन जत्थे, गतका जत्थे, भजन मंडली और रागी जत्थे यात्रा में शामिल थे. 

(श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज की यह नई तस्वीर खासी लुभा रहीं हैं. इस चित्र के निर्माता को भी प्रणाम !)

नगरकीर्तन यात्रा में श्रद्धालुओं द्वारा गतका खेलकर खुशियाँ मनाई गईं. बड़ी संख्या में साधसंगत द्वारा पालकी वाहन के मार्ग की स्वछता कर मार्गपर फूलों का बिछौना तैयार करने की सेवाएं अर्पित की. बड़ी संख्या में सेवाभावी युवकों द्वारा मिठाइयां वितरण कर सेवाएं की गईं. दूध और पुरी-छोलों के लंगर का भी वितरण किया गया. तखत साहब में रात में विशेष कीर्तन भी संपन्न हुआ. 

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रविवार, 22 अगस्त 2021

सिख नौजवानों ने बेअदबी रोकी 

गुरुद्वारा की जमीनों पर स्थापित निशान साहब को किया गया संरक्षित!

(हिंगोली गेट स्थित गुरुद्वारा बोर्ड की जमीनों पर निशानसाहब की विधिवत बस्तर बंधाई करते हुए सिख नौजवान)

हजूर साहब, नांदेड़ नगरी में गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड की मिलकियत जमीनों पर स्थापित निशान साहब (धर्मध्वज प्रतीक) की अवमानना की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए आखिर सेवाभावी सिख नौजवानों को ही सामने आना पड़ा. शनिवार, तारीख 21 अगस्त, 2021 को जागरूक सिख युवा द्वारा शोशल मिडिया पर हिंगोली गेट के निकट स्थित गुरुद्वारा बोर्ड की जमीनों पर स्थापित निशानसाहब के अवमानना के फोटो जारी किये गए थे. उन चित्रों को देख कर रोष व्यक्त होने लगा था. व्हाट्सप्प ग्रुप में व्यक्त रोष का प्रभाव संप्रेषित होने के बाद दस से पंद्रह युवकों द्वारा बेअदबी की घटनाओं पर विराम लगाने के लिए कमर कसीं गईं. 

(स. पाली सिंघ और सिख भाई सेवा निभाते हुए )

घटना की गंभीरता देखते हुए कुछ लोगों ने यह विषय गुरुद्वारा बोर्ड के अधीक्षक स. गुरविंदरसिंघ वाधवा के कानों पर भी डाला. दरम्यान सिख सेवाभावी युवा स. पाली सिंघ (नंदीग्राम सोसायटी) और कुछ नवयुवकों द्वारा निशान साहब की बेअदबी रोकने के लिए जे. सी. बी. मशीन लगवा कर जमीन की साफसफाई की गई. निशान साहब के आसपास की झाड़ियाँ भी तोड़कर साफ की गई. जमीनों की चतुर्सीमा पर जे. सी. बी. की सहायता से गड्ढे खोदकर रास्तें बंद करवाएं गए. 

(निशान साहब इस अवस्था में थे )

इस जमीन पर स्थापित निशान साहब के परिसर को साफ कर निशान साहब को नये चोले (वस्त्र) अर्पित किये गये. पुराने चोले जर्जर हो चले थे. जिसके लिए सिख मर्यादा के तहत पाठ और अरदास विधिवत रूप से संपन्न की गई. नारियल बताशों का प्रसाद चढ़ाया गया. नवयुवाओं की जागरूकता के कारण धर्मध्वज बेअदबी की घटनाओं पर पूर्ण रोक लगाने में क़ामयाबी मिली. सोशल मीडिया  पर सभी सेवाभावी नवजवानों की जमकर सराहना हो रहीं हैं जिन्होंने पूरा दिन परिश्रम कर बेअदबी की घटनाओं को रोकने के लिए पहल की. 


(निशान साहब चोला पहनाते हुए स्थानीय सिख समुदाय )

गुरुद्वारा बोर्ड की जमीनों पर जहाँ जहाँ निशान साहब स्थापित हैं, वहां आसपास सरंक्षण की सुविधा रहनी चाहिए. बोर्ड के इस्टेट और सिक्योरिटी विभाग द्वारा प्रतिदिन जमीनों का निरिक्षण (पेट्रोलिंग) जरुरी हैं.  


स. रविंदरसिंघ मोदी 





बुधवार, 4 अगस्त 2021

 सालाना बरसी गुरुद्वारा श्री लंगर साहिब 

प्रकाशित लेख : 


दैनिक प्रजावाणी 
दैनिक नांदेड वार्ता 


दैनिक वृत्त टाइम्स औरंगाबाद 


शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

Sirsa visited Hazursahib

शिरोमणि अकाली दल के विधायक और दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के प्रधान स. मनजिंदरसिंघ सिरसा ने नांदेड़ के सिख परिवारों के साथ चर्चा की. पिछले तीन से चार माह पूर्व हुईं निर्दोष सिखों की गिरफ्तारियों और जमानत जारी नहीं होने से सिख परिवारों में चिंता और दुःख का वातावरण छाया हुआ है. इस विषय में विधायक सिरसा ने आश्वस्त करवाया कि शीघ्र जमानत मिले यह प्रयास किये जायेंगे. 👇👇



 

शनिवार, 10 जुलाई 2021

Gyani harindersingh alwarwale on hazursahib 's current situation

 गुरुद्वारा बोर्ड के जिम्मेदारानं की चुप्पी योग्य नहीं हैं !

ज्ञानी हरिंदरसिंघ जी अलवर वाले का चिंतन 

रविंदरसिंघ मोदी 

( ज्ञानी हरिंदरसिंघ जी अलवर वाले )

मैं कल से इन्ही विचारों में कहीं व्यस्त था कि हजूर साहिब की वर्तमान सामाजिक स्तब्धता पर क्या भाष्य किया जाएं. इन विचारों की तंद्रा उस समय और भी आवेग में पहूंच गई जब पंथ के बुद्धिजीवि, संजीदा व्यक्तित्व और हज़ूर साहिब की सिक्खी और सिखों पर नितांत प्रेम करने वाले ज्ञानी हरिंदरसिंघ जी अलवर वाले का मुझे आज सुबह व्हाट्सअप कॉल आया. ज्ञानी जी हमेशा हज़ूर साहिब की हलचल और मार्गक्रमण की सुध लेते रहते हैं. मेरे साथ उनका फोन पर संपर्क जुड़ा रहता हैं. पंत के एक बुद्धिजीवि के रूप में उनकी सेवाएं बहुत अहम हैं जिसके संबंध में कभी विस्तार से चर्चा जरूर करूँगा. लेकिन विगत 45 वर्षों से ज्ञानी जी का हज़ूर साहिब के साथ रिश्ता बना हुआ हैं. दशमेश पिता जी की उनके सिर खास मेहर बनी हुईं हैं. 

ज्ञानी हरिंदरसिंघ जी ने आज फोन पर हुईं चर्चा में हजुरसाहिब बोर्ड के वर्तमान हालात और दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी से जुड़े विषयों पर भी चिंता व्यक्त की. होली हल्ला महल्ला की घटना और पुलिस द्वारा दर्ज मामलों से विस्थापित सिख बच्चों के प्रति उनकी चिंता और इन मामलों के शीघ्र समाधान को लेकर उनकी व्याकुलता सराहनीय प्रतीत हुईं. उन्होंने मुझसे प्रश्न किया कि, "समाज के लोगों के सामने एक बड़ा कानूनी संकट खड़ा हैं, सिख परिवार, बच्चे, माता - पिता परेशान हैं ! ऐसे में गुरुद्वारा बोर्ड के जिम्मेदारान सामने क्यों नहीं आ रहे हैं? साधसंगत की समस्याओं के विषय में पहल क्यों नहीं कर रहे हैं? पिछले तीन महीनों से ज्यादा समय जेल में बंद लोगों और अन्य लोगों की जमानत और अन्य कानूनी करवाई के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाएं जा रहे हैं? पुलिस प्रशासन के साथ बातचीत का सिलसिला क्यों नहीं किया जा रहा हैं?  आदि... ! 

ज्ञानी जी के प्रश्न, चिंता और सद्कामना योग्य हैं. पुलिस प्रशासन और जिला प्रशासन के साथ वैसे दो से तीन बार चर्चा भी हुईं हैं. जिलाधीश डॉ. विपीन इटनकर, पुलिस अधीक्षक डॉ प्रमोद शेवाले और पुलिस के अन्य अधिकारियों से साधसंगत से चर्चा और गुहार जारी हैं. स्थानीय समाज में शांति और कानून व्यवस्था के परिसंचालन के लिए पुलिस और सिख समाज की सामाजिक संयुक्त  पहल भी संपन्न हुईं. लेकिन तीनों केसेस में व्याप्त कानूनी दिक्कतों का निपटारा अब पूरी तरह से पुलिस के अधिकार में नहीं रहा शायद! नांदेड़ न्यायालय में प्रकरण में गिरफ्तार लोगों की जमानत अर्जी को सुना गया और अगली तारीख के तहत बढ़ाया गया. संभव है कि इस महीने जमानत को लेकर अच्छी खबर मिले. लेकिन प्रश्न यह हैं कि गुरुद्वारा बोर्ड के जिम्मेदारान आखिर कर क्या रहे हैं? गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड द्वारा कुछ बोर्ड पदाधिकारियों के लिए हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल करवाई गई. गुरुद्वारा बोर्ड द्वारा दो से तीन लोगों का ही केस लड़ा जा रहा हैं? बाकी समाज की सुध लेनेवाला कोई नहीं हैं ! एक गरीब चाहे भी तो आज ज़मानत करवाने का भारी भरकम खर्च उठा नहीं सकता. सच्चाई यह भी हो सकती हैं कि गिरफ्तार होने के बाद पता नहीं कितने दिनों तक जमानत ना मिले और जेल में ही भुगतना पड़े, इस डर से बहुत से अभियुक्त फरार हैं. लेकिन कब तक यह सामाजिक विस्थापन जारी रहेगा! 

आज घटना घटित होकर सौ दिन पूर्ण हो गए हैं. बोर्ड के प्रधान स. भूपिंदर सिंघ मिनहास ने अभी तक हज़ूर साहिब में अपने कार्यालय को भेट नहीं दीं. हालांकि उनका मुंबई और औरंगाबाद के बीच निरंतर आवागमन जारी हैं. इतनी बड़ी घटना के बाद भी वो सिख समाज की सुध नहीं ले पाते तो "वो" काहे के हज़ूर साहब के सेवक हुए. सरकार और पुलिस विभाग भी नैतिक पहलु के तहत उनसे पूछे कि जिस स्थान से जुड़ी संस्था के वें सरकार द्वारा अध्यक्ष है, उनकी घटना के बारे में कोई पहल क्यों नहीं है. क्या प्रधान साहब ने पुलिस, जिला प्रशासन, महाराष्ट्र सरकार को "होली हल्ला महल्ला" घटना की अध्यक्ष होने के नाते नियमानुसार रिपोर्ट प्रस्तुत की है? प्रशासन को कम से कम गुरुद्वारा बोर्ड का लिखित पक्ष तो जान लेना चाहिए ऐसी इस घटना की प्राथमिकता भी है. गुरुद्वारा बोर्ड को भी चाहिए कि होली के समय घटित घटनाओं की रिपोर्ट उस समय के प्रभारी अधीक्षक स. जसविंदर सिंघ दिनपुर से भी मंगवाए. क्या ये रिपोर्ट न्यायालयीन दिक्कतों की खामियाँ दूर करने में कारगर साबित हो सकती है. प्रश्न यहीं है कि स. भूपिंदरसिंघ मिनहास नांदेड़ क्यों नहीं आना चाह रहे हैं? 

इस समय हज़ूर साहिब के सिखों के सामने दो से तीन सामाजिक समस्याएं कायम हैं. एक तो कोरोना संक्रमण के कारण समाज में हो रहीं निरंतर मृत्यु से मृतक परिवार का आर्थिक विवेचन और जीवन जीने के लिए संघर्ष का विषय हैं. गरीब परिवारों के लिए लड़कियों के विवाह का एक प्रश्न उठ रहा हैं. तीसरी बात यह कि आये दिन सिख युवकों, विद्यार्थियों का शिक्षा एवं रोजगार के लिए संघर्ष. चौथी बात होली हल्ला महल्ला के समय हुईं घटनाओं में कानूनी शिकंजे में घीरें, गिरफ्तार और फरार (अभियुक्त) लोगों के परिवारों पर छाएं संकट का विषय. इस समय स्थानीय सिख समाज में यहीं मुद्दे चर्चा में व्याप्त हैं जिनके कारण समस्त समाज पर स्तब्धता का आवरण छाया हुआ हैं. कानूनी रूप से तीनों एफ. आई. आर. का न्यायायिक परिसंचालन बहुत ही जटिल और पेचीदा हैं. पुलिस और कानून ने अपना काम शिद्दत से किया हैं क्योंकि पुलिस विभाग की वो जिम्मेदारी हैं. एक एफ.आई.आर. की चार्जशीट न्यायालय में प्रस्तुत भी हुईं हैं. कुछ लोगों को राहत मिली हैं तो असंख्य लोग मामलों में लिप्त हैं. जिसके कारण बहुत से परिवारों में बच्चों के विवाह टाल दिए गए हैं. बहुत से परिवारों के घर के कमाऊ पुरुष जेल में हैं या फरार हैं, जिनके परिवारों का भूख से संघर्ष जारी हैं. दवाई गोलिया और उपचार की जद्दोजहद जारी हैं. 

होली घटना के बाद तमाम राजनीतिक पार्टियों ने सिख समाज के साथ दूरिया बढ़ा लीं हैं. कोई नेता सिख समाज की समस्याओं के निराकरण के लिए आगे नहीं आया हैं. हां, कुछ लोकल सिख नेता जरूर राजनीतिक नेताओं की चौखट पर खड़े दिखाई दे रहें हैं. लेकिन वें अपने व्यक्तिगत काम और मंशाओं तक ही सिमित हैं. समाज की समस्या पर हल निकालने के लिए कोई पहल नहीं करना चाह रहा हैं. यदि आसपास कोई चुनाव होते तो शायद किसी को ज्यादा मिन्नतें नहीं करनी पड़तीं. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कोई चुनाव निकट नहीं हैं. इसलिए सिख समाज का आशावाद भी समाप्त होता हैं.  

बहुत ही मार्मिक तथ्य हैं कि ज्ञानी हरिंदरसिंघ जी हज़ार मील दूर बैठ कर हजूर साहिब के लिए चिंता व्यक्त करते हैं, लेकिन तीन सौ किलोमीटर या छह सौ किलोमीटर दूर बैठे सत्ताधीशों के मन नहीं पिघलते. आज बुद्धिजीवि को समाप्त करने की सोच और षड़यंत्र स्थानीय राजनीतिक प्रवृत्ति के लोग कर रहे हैं. सिख समाज के अच्छे बुद्धिजीवि काल में समा चूके हैं. कुछ हैं लेकिन उन्हें चुप कराने के लिए सामूहिक बल और छल की नीति अपनाई जा रहीं हैं. यदि समाज के तथाकथित लीडर बहुत जानकर, अभ्यासु और परिस्थितिपूरक औरा से परिपूर्ण होते शायद किसी बुद्धिजीवि को राजनीति जैसे क्षेत्र पर भाष्य करने की जरुरत नहीं होती. जिस समाज में नेतृत्व पतन हो जाता हैं वहां समाज के बुद्धिजीवि वर्ग को बोलना और लिखना पड़ता हैं. कड़वी सच्चाई ये भी है कि समाज और राष्ट्र के लिए आवाज़ उठानेवाला कोई बुद्धिजीवि बहुत बार अकेला पड़ जाता है या षड़यंत्र के तहत उसे समाप्त करने की मोहिम छेड़ी जाती हैं. उनका यह सामाजिक अपराध परदे के पीछे छिप जाता हैं. ऐसे समय में समाज का प्रबुद्ध वर्ग भी अनभिज्ञ बन जाता हैं. 

मैंने, अपने आप को लेकर कभी "कुछ होने" का दावा नहीं किया हैं. सही बयान करूं तो मैं कुछ भी नहीं हूँ. लेकिन सामान्य होने के नाते, समाज का घटक होने के नाते अपनी जिम्मेदारी मैं समझता हूँ. मेरे प्रति तथाकथित घृणा करने की प्रेरणा जगाने वाले कभी यह भी सोचें कि मैं आपकी "वोट की राजनीति" से हमेशा दूर ही रहा. लेकिन अच्छे और सेवाभावी लोगों के लिए मैंने हमेशा संघर्ष किया हैं. यदि किसी के "कारोबार" पर पत्रकारिता करनी होती तो अच्छे - अच्छे को अपात्र साबित करने की क्षमता मैं भी उपयोग में लाता. पत्रकारिता के माध्यम से सामाजिक लाभ की दृष्टि से मैंने पत्रकारिता को अंजाम दिया हैं. मैंने बहुत लोगों को बनते और ढहते देखा हैं. समाज के सामने के चरित्र और परदे के पीछे के चरित्र का संज्ञान होने के बावजूद भी मैंने किसी का समाज के सामने वस्त्रहरण नहीं किया. क्योंकि मैं समाज निर्माण का महत्व समझता हूँ. व्यक्तित्व निर्माण की कीमत समझता हूँ. स्थानीय समाज और अन्य समाज की तुलना करने और सामाजिक विकास को लेकर मेरी तड़प रहीं हैं. यदि किसी को इस विषय में शुद्ध ठेकेदारी करनी हो तो खुलकर बताएं मैं आपकी "क्रांति" को मार्ग देकर अलग हो जाऊंगा. मैं इस कार्य से निवृत्त होने के लिए तैयार हूँ लेकिन पहले अपनी क्षमता से तो परिचित करवाओ कि आप यह सब कर सकते हो ! अपने आपको जाँच लें. युवा पीढ़ी को उकसाने के अलावा आप किस तरह से अच्छे समाज का निर्माण कर सकते हो. कोई भी चीज ढाहना आसान हैं पर निर्माण मुश्किल हैं. तथाकथित नेताओं के पिछले कुछ घोषणापत्रों पर यकीन कर समाज भी घोर निराशा महसूस कर रहा हैं. आज समाज की आवश्यकताओं पर उनको खरा उतरने की जरुरत हैं. आज ! आज का वर्तमान बदलना हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता हैं. इन विषयों के प्रति जब संजीदगी नहीं तो काहे का समाज और काहे का "बोर्ड"!

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नोट :  इस blog के पोस्ट को आप जैसे का तैसा फॉरवर्ड कर सकते हो. Link share कर सकते हो. लेकिन इस मैटर की कॉपी पेस्ट की अनुमति नहीं हैं. यदि कोई मैटर से छेड़छाड़ करता हो तो करनेवालों के खिलाफ सख्त कानूनी करवाई करने के लिए हम स्वतंत्र हैं. न्यायिक क्षेत्र नांदेड़ होगा. 

रविंदरसिंघ मोदी. 




शनिवार, 3 जुलाई 2021

 "ये अधिवेशन और ये चुप्पी !"

रविंदरसिंघ मोदी 

महाराष्ट्र सरकार का दो दिवसीय विधानसभा अधिवेशन ता. 5 जुलाई 2021 से प्रारंभ हो रहा है. उम्मीद की जा रहीं हैं कि इस अधिवेशन के सत्र में सरकार 'गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड नांदेड़ संस्था कानून 1956' की कलम ग्यारह में करवाया गया पिछला संशोधन (ता. 18-02-2015) रद्द करवा दें. पिछला संशोधन माजी मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस और भाजपा के पूर्व विधायक स्व. तारासिंघजी के प्रयत्नों से साध्य हुआ था. भाजपा - शिवसेना की गठबंधन वाली पिछली सरकार ने बहुमत के बल पर वह एकतर्फा संशोधन पारित करवा लिया था. कलम ग्यारह में संशोधन कर गुरुद्वारा बोर्ड संस्था के प्रधान पद (अध्यक्ष) पर सीधी नियुक्ति करने का निर्णय लादा गया था. जो एक तरह से हजूरसाहिब के सिखों पर घोर अन्याय था. साधसंगत जी द्वारा उक्त निर्णय का बड़ा विरोध किया गया था. लेकिन फडणवीस सरकार के कानों पर ज्यूं तक नहीं रेंगी थीं ! सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था पर फडणवीस सरकार द्वारा बलपूर्वक निर्णय अमल में लाया गया था. उस समय शिवसेना भी नांदेड़ के सिखों के समर्थन में खड़ी नहीं हो पाई. अन्य राजनीतिक पार्टियां भी यह कहकर अलग - थलग रहीं कि यह सिखों की धार्मिक संस्था का विषय हैं, हमें क्या लेना ! 

गुरुद्वारा बोर्ड में अपने कार्यकाल की शुरुआत की पहली मीटिंग (अप्रैल 2015) करवाने में असफल साबित हुए कलम ग्यारह से नियुक्त पहले प्रधान स्व. तारासिंह अगली बैठक (जून 2015) में पूर्ण बहुमत और शक्ति के साथ उभरकर सामने आये. नांदेड़ के तत्कालीन कुछ स्थानीय बोर्ड सदस्यों का समर्थन प्राप्त कर  उन्होंने अपने बहुमत का आकड़ा प्राप्त कर लिया था. उस कार्य में उन्हें भाजपा और हिंदुत्व संघटनों की विचारधारा का भी सहारा मिला था. यहीं से गुरुद्वारा बोर्ड बाहरी शक्तियों के हाथ चला गया कहा जाएं तो गलत नहीं होगा. वर्ष 2015 से आज तक ! छह साल !! किस आधार पर हम कह सकते हैं कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड हजुरसाहिब के सिखों की संस्था हैं? संभ्रम का पर्दा हटना चाहिए. 

हज़ूरसाहिब में महाराष्ट्र सरकार के आनेवाले अधिवेशन को लेकर उत्सुकता कायम हैं. लेकिन एक प्रश्नार्थक सन्नाटा छाया हुआ हैं ! सिख समाज के अनुभवी नेतागण खामोश हैं ! कोई एक शब्द भी कहने की मनःस्थिति में दिखाई नहीं दें रहा हैं. बहुत से लोग खुद कुछ नहीं कहना चाह रहे और कोशिश कर रहे हैं कि दूसरा कोई बोले. किस चीज का भय? किस बात का संकुचन? यह पता तो चले. कलम ग्यारह की दुहाई पर पिछले चुनाव लड़ने वाले और प्रचार करने वाले भी चुप हैं ! वोट देने वाले भी चुप हैं ! यह ख़ामोशी और सन्नाटा केवल समीकरण और संबंधों की हतबलता तो नहीं ऐसा प्रश्न अब उठ रहा हैं. कहीं राजनीतिक संबंध बिगड़ न जाएं. आने वाले चुनावों में टिकट कट न जाएं? खाली समय वीडियो निकालकर प्रपंच करने वाले अब सरकार से मांग भी नहीं कर रहे हैं कि आगामी अधिवेशन में प्रस्ताव रखकर कलम ग्यारह का पिछला संशोधन रद्द करवाया जाएं. "हजूरी क्रांति" और "हजूरी प्रधान" की भाषा बोलने वाले साधी रीतसर और नियमों के तहत सरकार और प्रशासन से मांग भी नहीं कर पा रहे हैं. इसका अर्थ यहीं हुआ कि वर्तमान परिस्थिति सभी को स्वीकार्य हैं. जो चल रहा हैं, चलने दीजिये ! ऐसी सामाजिक हतबलता का कोई कारण तो जरूर होगा. 

महाराष्ट्र सरकार का यह अधिवेशन बहुत अहम हैं. क्योंकि यह अधिवेशन केवल दो दिवसीय होगा. जिसमें विधानसभा अध्यक्ष चुनने और नियुक्ति विषयों पर ही सरकार का अधिक ध्यान केंद्रित होगा. इसलिए ऐसे अधिवेशन में राजस्व विभाग के माध्यम से संस्था कानून संशोधन से संबंधित "संशोधन प्रस्ताव" प्रस्तुत किये जाने की उम्मीद कम ही हैं. यदि प्रस्तुत होते हैं तो नांदेड़ के नेतागण गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड से जुड़ा कलम ग्यारह का पिछला संशोधन रद्द करने अथवा गुरुद्वारा संस्था के नये कानून प्रारूप को मंजूरी देने का प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकते हैं. यह एक अहम और महत्वपूर्ण ऐसा प्रसंग होने के नाते नांदेड़ के स्थानीय सिख नेताओं को एकजुट होकर नांदेड़ के राजनीतिक नेताओं से बातचित कर उन्हें कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाने के लिए आग्रह करना चाहिए ऐसी मेरी एक औपचारिक सोंच और सलाह हैं. यहाँ कॉंग्रेस, शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, भाजपा जैसी पार्टियों में बड़ी संख्या में सिख भाई - बहन शामिल हैं. बहुत से लोगों के पास बड़े - बड़े पद भी हैं. ऐसे जिम्मेदार लोगों को अपने नेताओं को लिखित मांग करनी चाहिए. लेकिन यह कदम उठाने के लिए कोई अग्रसर होना नहीं चाह रहा हैं. सभी के सामूहिक प्रयत्नों से यह संभव हैं. लेकिन इस कार्य के लिए कोई भी राजनीतिक नेता, कार्यकर्ता कदम उठाने के लिए तैयार नहीं हैं. इस कारण शायद यह अधिवेशन भी हमारे पक्ष में कोई सकारात्मक निर्णय लेकर आये इस बात की उम्मीद कम हैं. लेकिन आशाएं पल्लवित हैं. बाकी परमात्मा "वाहेगुरु" की मर्जी हैं. 

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गुरुवार, 24 जून 2021

ravindersingh modi warned about the unauthorised post s

 गुमराह करनेवालों से सावधान !!

रविंदरसिंघ मोदी 

अभी - अभी पता चला हैं कि खुरापाती दिमाग़ के कुछ लोग मेरे नाम (रविंदरसिंघ मोदी) और मेरे ब्लॉग (हजुरसाहिब टुडे) के नाम से कुछ मजकूर कॉपीपेस्ट पोस्ट कर रहे हैं. और सभी को गुमराह कर रहे हैं. अभी हाल ही में मैंने "हजूरसाहिब टुडे" ब्लॉग पर लिखा था कि गुरुद्वारा बोर्ड के डेली वेजस, बिलमुक्ता और डेली रोजंदारी कर्मचारियों के दैनिक वेतन में वेतनवृद्धि की जाएं. कलर्क को प्रतिदिन एक सौ रूपये और सेवादार और रोजंदार कर्मचारियों को प्रतिदिन 75/- रूपये बढाकर दिए जाएं. लेकिन कुछ लोगों ने समाज में मेरी प्रतिमा ख़राब करने की नियत से मैटर में काटछांट, छेड़छाड़ कर और गलत मनघढ़ंत बातें लिखकर व्हाट्सप्प और सोशल मीडिया पर लोगों को गुमराह करने का प्रयास किया हैं. कर्मचारियों की संख्या कम करने जैसे घटिया प्रस्ताव मेरे नाम के जरिये पोस्ट हो रहे हैं ऐसी बातें सुनने में आ रहीं हैं. जो कि एक गंभीर साइबर क्राइम हैं. प्रार्थना हैं, बोर्ड के कर्मचारी भाई - बहन ऐसे अनर्गल मैटर पर या मेरे नाम से फ़ॉरवर्डेड नकली पोस्ट पर यकीन ना करें. कुछ डेलीवेजस कर्मचारी भाइयों ने मुझसे मिलकर उक्त विषय पर प्रश्न कर बताया कि ऐसा मैटर उन्होंने पढ़ा हैं. मैंने मेरे ब्लॉग पर लिखा मैटर पढ़कर सुनाया तब उनका समाधान हुआ और उन्होंने मुझे शुभकामनायें दीं कि आगे भी समाज और विशेष कर गुरुद्वारा बोर्ड कर्मचारियों की मांगें उठाते रहें. मैं यह बता दूँ कि डैलीवेजस को पर्मनंट किया जाना चाहिए. मुझ पर विश्वास जताने के लिए कर्मचारी भाइयों का शुक्रिया. 

मैं अपनी भूमिका मेरे ब्लॉग के जरिये सार्वजनिक रूप से जाहीर करता आया हूँ. व्हाट्सअप मेरा प्रमुख माध्यम नहीं हैं. वो मैं केवल सूचना और पत्रकारिता के लिए उपयोग में लाता हूँ. मैं, गुरुद्वारा बोर्ड कर्मचारियों की मांगों को लेकर पिछले बीस से बाईस सालों से कर्मचारियों के पक्ष में खड़ा हूँ. आगे भी तत्पर रहूँगा. कर्मचारी जल्दी पर्मनंट हो जाएं यह मेरी पिछले दो से तीन सालों की मांगें हैं. कोई एक कर्मचारी बता दें कि कर्मचारियों के खिलाफ मैंने कोई लिखित प्रस्ताव गुरुद्वारा बोर्ड में प्रस्तावित किया हैं क्या. क्या कभी किसी के प्रमोशन या ग्रेड का विरोध किया हैं? बताएं या मेरी लिखीं कोई न्यूज़ बताएं. इसलिए प्रार्थना हैं कि अफवाह फैलाने वाले तथ्यों से सावधानी बरतें. मैटर पर मुझसे चर्चा जरूर करें. 

कुछ लोगों ने पिछले एक दो सालों से मुझे बदनाम करने का, समाज में मेरी प्रतिमा ख़राब करने का जैसे अभियान शुरू किया हुआ हैं. मेरे बारे में झूठी अफवाह फैलाकर युवा लोगों को भड़का रहे हैं ऐसा सुनने में आ रहा हैं. जबकि मैंने हजूर साहिब और हजूरी साधसंगत के खिलाफ कभी कोई भाष्य नहीं किया हैं. कोई बात अयोग्य लगीं या जँची नहीं तो उसका प्रोपोगेंडा ना करते हुए खामोश रहा. अपने लिखान से मैं सदा धर्मप्रचार और समाज की अच्छी बातों को ही प्रचारित करता आया हूँ. बहुत से लोगों के चरित्रनिर्माण में मैंने भरपूर सहयोग भी दिया हैं. अच्छे नेताओं का सदैव साथ दिया हैं और आगे भी करेंगे. लेकिन कुछ राजनीतिक प्रवृत्ति के "सफ़ेद लिबासपोश" मेरे नाम को धुंधला करने का प्रयास कर रहे हैं. व्हाट्सप्प पर भी छुपे और झूठे नामों का प्रयोग कर रहे हैं. सुनने में आ रहा हैं कि मेरे नाम से मैसेज लिखकर कॉपीपेस्ट कर फॉरवर्ड किये जा रहें हैं. क्या ऐसा करने से वें गुरुद्वारा बोर्ड का चुनाव जीत जायेंगे? क्या महानगर पालिका का चुनाव जीत जायेंगे? यदि मुझे "टारगेट" कर आप अपना मनसूबा पूरा करना चाहते हो तो जरूर करें. प्रार्थना हैं कि मेरे बारे में जो कहना हैं अपने नाम से कहो, बुरा मानने वाली कोई बात नहीं हैं. मेरे जैसे सामान्य व्यक्ति के लिए "छुपे एजैंडा" चलाने की कोई जरुरत नहीं हैं. लिखना हो तो ऐसा लिखो कि समाज के काम आ पाए. आगे आप को ही समाज की बागडोर संभालनी हैं. चुनाव भी करीब आ रहे हैं. समाज के लिए तन मन धन से काम करें यहीं शुभकामनायें. मै अपनी निवृत्ति लेने पर विचार कर रहा हूँ. 


(नोट : इस ब्लॉग के मैटर का कॉपी राइट मेरा हैं. इसका मैटर कॉपी करना या उसमें कांटछांट करना गैरकानूनी हैं. इस पोस्ट को आप जैसे का तैसा पोस्ट करें कोई एतराज नहीं. लेकिन मैटर में छेड़छाड़ कर गुमराह ना करें. वकील साहब मेरे साथ भी हैं. )






बुधवार, 23 जून 2021

 "ग्रहण" वेब-सीरीज सिखों के प्रति साजिश तो नहीं? 

रविंदरसिंघ मोदी 

ता. 24 जून 2021 को वेब -सीरीज "ग्रहण" का नया सिलसिला शुरू किया जा रहा हैं. "ग्रहण" का प्रचार प्रसार भी बड़ेस्तर का हैं. ग्रहण के ट्रेलर विज्ञापन में एक पगड़ीधारी सिख को हिंसक रूप में प्रदर्शित किया जा रहा हैं. इस विषय में सिखों के सभी संघटनों द्वारा विरोध शुरू किया गया हैं. संदेह हो रहा हैं कि फ़िल्म, वेब सीरीज और राजनीतिक मीडिया में सिखों की प्रतिमा को ख़राब करने का प्रयास किया जा रहा है. 

बताया जा रहा हैं कि वेब सीरीज "ग्रहण" की कहानी वर्ष 2016 में घटित बोकारो घटना पर आधारित हैं. जो आई. पी. एस. अधिकारी अमृता सिंह के इर्दगिर्द घूमती हैं. कहानी के अन्य पात्र जो पगड़ीधारी सिख हैं, वें सन 1984 के सिख विरोधी घटनाओं का बदला लेने के लिए प्रयास करते हैं. लेकिन जब तक यह कहानी आँखों से नहीं देखीं जाती तब तक शायद हमें मूल धारणा और 'कंटैन्स' का पता नहीं चल पायेगा. 

मेरी व्यक्तिगत सोंच यह हैं कि पिछले छह से सात वर्षों में फ़िल्म निर्माता, फ़िल्म निर्देशक, कहानीकार, राजनीतिक मीडिया द्वारा सिखों की मूल प्रतिमा को खलनायक और कमजोर सख्शियत के रूप में उभरने का पूरा प्रयास किया जा रहा हैं. सिखों का व्यक्तित्व सेवाभावी, सीमा का प्रहरी और मददगार के रूप में प्रदर्शित होता आया हैं. बहादुरी, शौर्य और ईमानदारी में सिखों को प्रतीक के रूप में जाना जाता रहा हैं. अब सिखों की प्रतिमा कमजोर और नकारात्मक दर्शाने का एक षड़यंत्र सा खेला जा रहा हैं. "ग्रहण के बहाने सिख समाज की प्रतिमा पर ग्रहण लगाने का यह प्रयास हो रहा हैं. 

आपको याद होगा कि संजय बारू की पुस्तक "दि एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर" फ़िल्म (मूवी) बनाकर डॉ. मनमोहनसिंघ जी की प्रतिमा को कमजोर बताया गया. ऐसे दृश्य पेश किये गए, ऐसे तथ्य परोसे गए जिससे डॉ मनमोहन सिंघ एक अशक्त और लाचार प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित हो. उन्हे नोबल पुरस्कार या अन्य कोई पुरस्कार नहीं मिले इसलिए शायद राजनीतिक मिडिया का यह पैतरा खेला गया था. अनुपम खेर ने बहुत दिल लगाकर डॉ मनमोहन सिंघ जी की भूमिका फ़िल्म में निभाई थीं. और भी बहुत सी फ़िल्में हैं जिनमें सिखों की प्रतिमा को कमजोर आंका गया हैं. सेंसर बोर्ड "धर्म का मर्म" कब समझेगा? मैं ऐसी मानसिकता का तीव्र निषेध करता हूँ जो किसी धर्म, जाति और व्यक्तित्व की प्रतिमा से खिलवाड़ करते हैं. डॉ मनमोहन सिंह एक बुद्धिजीवि हैं. उनके खिलाफ बुद्धिजीवियों का षड़यंत्र योग्य नहीं. इससे देश की प्रतिमा भी बिगाड़ने का दुःसाहस कहा जाएं तो गलत नहीं होगा.  


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मंगलवार, 22 जून 2021

निवृत्ति लेने की सोंच रहा हूँ ! Ravindersingh modi

 निवृत्ति लेने की सोंच रहा हूँ ! 

रविंदरसिंघ मोदी 


तीन दशकों से अधिक का एक दीर्घ समय मैंने पत्रकारिता, समाज सेवा, शिक्षा क्षेत्र, साहित्य सेवा क्षेत्र में व्यतीत किया हैं. इस कार्यावधि में मैंने कभी किसी राजनीतिक विचारधारा को अपनाये बगैर लगातार हजुरसाहिब के लिए अलग - अलग माध्यम से स्वयं को आंदोलन बनकर सेवा निभाता रहा. तखत साहिब के उपक्रम, धार्मिक कार्यक्रम, त्यौहार, उत्सव और स्थानीय सिखों की प्रतिमा को सकारात्मक आकार देने के लिए मैं झुजता रहा, प्रयत्नशील रहा. बदलते हुए, तब्दील होते हुए हजुरसाहिब के जनजीवन, इतिहास और मार्गक्रमण का मैं एक प्रमाण हूँ. मैं, अब विचार कर रहा हूँ कि सभी तरह के जारी उपक्रमों से निवृत्ति प्राप्त कर लूँ. केवल समाचार पत्रों का संपादन और दृश्य पत्रकारिता में कार्यरत रहूँ. सभी तरह के सामाजिक और धार्मिक आंदोलन से अब निवृत्ति प्राप्त कर लूँ. इस सोंच के पीछे बहुत से कारण हैं. जिनमें एक प्रमुख कारण स्वास्थ्य का हैं. पिछले दो से तीन वर्षों में लगातार स्वास्थ्य समस्याएं जारी हैं. आगे लंबे समय तक मैं काम नहीं कर पाउँगा शायद. हालिया कोविड संक्रमण काल में मुझ सामान्य सिख पर दशमेश पिता, श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज की छत्र-छाया अबाधित रहीं जिसके कारण हर समय, हर विपरीत परस्थिति में मैं सुरक्षित रह पाया. संतों का आशीर्वाद और सभी हितचिंतकों की सदिच्छा से मैं कठिन दौर से बाहर निकल पाया हूँ. मुझे अहसास हैं कि आनेवाले समय में परिस्थिति किसी भी करवट बैठ सकती हैं. आगे क्या दौर आएगा कोई कह नहीं सकता. 

राजनीति क्षेत्र में जाने की मेरी कोई इच्छा नहीं हैं, हालांकि कुछ प्रस्ताव मेरे पास हैं. विकल्प पहले भी थे, आज भी हैं लेकिन मेरी अपनी विचारधारा के चलते मैंने युवावस्था से ही राजनीति का परहेज किया हैं. इस कारण मैंने सदा राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों का समय - समय पर तिरस्कार, ईर्ष्या, द्वेष और सौतेलापन झेला हैं. कई बार कूटनीतियों का शिकार भी रहा हूँ. 

मैंने, जिन - जिन क्षेत्रों में कार्य किया हैं, उन क्षेत्रों में मेरा कोई "गॉड फादर" नहीं रहा हैं. हां बहुत से लोग मेरे लिए आदर्श जरुर रहे हैं. खुद में थोड़ा बहुत हुनर था. काम के प्रति समर्पण था. सदा सकारात्मक दृष्टिकोण साथ था. किसी को गलत राह पर भेजनें की कभी मंशा नहीं रहीं. कभी किसी युवा को उग्रता की ओर मोड़ने का या भटकाने का काम नहीं किया. अभी तक खुद के नाम पर कोई संस्था खड़ी नहीं की. ना कभी हजूरसाहिब की गरिमा को कम किया हैं. लेखन के माध्यम से मैंने सदैव यहाँ का गुणगान किया हैं. हजूरसाहिब की वर्तमान परिस्थितियों में मेरा कोई स्थान मुझे दिखाई नहीं देता हैं. अब यहाँ कुछ करने के लिए अनुकूल माहौल उपलब्ध नहीं हैं. समाज की डोर "होनहार" लोगों के हाथ हैं. बाहरी नेतृत्व बहुतों की मंशा हो! यहाँ हमारी सलाह काम नहीं करेंगी. इसलिए निर्णय पर सोचना योग्य होगा. 

हजूर साहिब के समाज का सामाजिक विज्ञान को मैं कभी समझ नहीं पाया. लोग बौद्धिकता को जेब में रखने की हिमाकत चाहते हैं. कुछ बुद्धिजीवि मेरे साथ प्रतियोगिता करना चाहते हैं. बहुत से राजनीतिक चेहरों का मेरे प्रति यह प्रयास रहा हैं कि, समाज में मेरा स्थान केवल एक लेखक का रह जाएं. यह सामूहिक प्रयास (दांव) भी रहा हैं. जब तक आप लिख - लिख कर लोगों को लाभान्वित करते रहते हो, लोग आपके आपके पीछे - पीछे रहते हैं. सम्मान परोसते हैं. लोगों को चुनाव जितवाते हो तब तक ठीक. जब आप किसी के लिए सेवाएं संक्षिप्त कर देते हो तो तब अभिलाषी सभी द्वेष, बदनामी और अपमान तक पर उतारू हो जाते हैं. आपके खिलाफ अभियान चलाते हैं. पिछले दो सालों में मुझे सभी अनुभव प्राप्त हो गए हैं. मेरे बहुत से भ्रम, संभ्रम भी टूटे. यहाँ, नेता और नेतृत्व बनने के लिए व्यक्ति के पास संघटन, बड़ी रिश्तेदारी (टब्बर), बड़ा मित्रवर्ग और पैसा जैसी योग्यता चाहिए हैं. टिकने और टिकाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीति अमल में लाने की सक्षमता चाहिए. मैं ऐसी बड़ी औकात नहीं रखता. इस बात का अहसास होने से अपने आपको सारे राजनीतिक प्रपंचों से सदैव मुक्त रखा. अलग ही रखा. जिसने प्यार और सम्मान से गुरुफतेह बुलाई मै नतमस्तक हो गया. जिन्होंने हिकारत दिखाई, बदनामी की, ईर्ष्या दिखाई, मेरी प्रतिमा को मलिन करने के अभियान चलाये उन्हें कभी कोई शिकायत नहीं की. नफरत करें यह उनका अधिकार हैं ! इसलिए समाज के किसी वर्ग से कोई शिकायत नहीं हैं. सबकी अपनी - अपनी सफलताएं हैं, मेरी अपनी सफलता या नाकामी सही. समाज में और भी सेवाभावी, बुद्धिजीवि, कर्मशील उपजाने की क्षमता हैं. अच्छे लोगों को, अच्छे विचारों का वलय दृष्टिगोचर होकर रहेगा यह विश्वास हैं. 

विगत 32 वर्षों में मैंने मेरे कार्य और पेशे को लेकर प्रमाणिकता के साथ काम किया हैं. जो घटित हुआ उसे कोई बदल नहीं सकता ! सब इतिहास हैं ! लेकिन उसका मूल्यांकन करने का हौसला और नियत किसी की नहीं होगी. मेरे द्वारा संचालित पांच से छह बड़े आंदोलन इस बात के साक्षी हैं. पूरी ईमानदारी से यह भी स्वीकार करता हूँ कि मैं अभी तक सफल नहीं हो पाया, वो है, कलम ग्यारह के संशोधन को रद्द करवाने का आंदोलन! यह आंदोलन अभी समाप्त नहीं हुआ हैं! सच्चाई यह हैं कि, यह आंदोलन मेरे हाथ नहीं रखा गया हैं. इस विषय के निराकरण को लेकर गठित समिति का उत्तरदायित्व बड़ा हैं. सात मेंबर साहिबान की एक समिति "सात सदस्यीय समिति " द्वारा ड्राफ्ट बनाकर, उसे महाराष्ट्र सरकार को भेजना हैं. बोर्ड के सदस्यों का शिष्टमंडल सरकार से मिलकर "संशोधन" रद्द करवाने की मांग करेगा ऐसा उस समय निर्धार किया गया था. दुर्भाग्यवश या राजनीतिवश मैं उस समिति में नहीं हूँ. मेरे लड़ने के सभी अधिकार उस समिति ने दो साल पहले ही अपने अधीन कर लिए हैं. वर्ष 2015 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा बगैर हमारी सलाह लिए गुरुद्वारा बोर्ड के एक्ट में कलम ग्यारह का संशोधन लादा गया था. उस विषय को हजूर साहिब से विरोध दर्शाने वाला मै पहला व्यक्ति था. इस विषय को प्रस्तुत कर जनभावना का रूप देनेवाला मै था. पर मुझे समिति में स्थान नहीं देकर "समिति" ने आंदोलन का दायित्व खुद स्वीकार कर लिया. एक तरह से मुझे दुत्कार कर आंदोलन से बाहर कर दिया गया. मेरे जीवन में यह अपमान का सबसे बड़ा क्षण था ! मुझे आंदोलन से उठाकर बाहर फेंक दिया गया. 

मुझे कलम ग्यारह का वादा याद दिलाने वाले, तानें मारने वाले, बदनाम करने वाले "सज्जन" कभी यह क्यों नहीं सोच पाए कि उस समिति में रविंदरसिंघ मोदी को क्यों नहीं शामिल किया गया? उन्होंने बीते दो सालों में उस "समिति" से कभी प्रश्न किया हैं कि "कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने वाला ड्राफ्ट " सरकार को अभी तक क्यों नहीं भेजा गया?" इस समिति पर साधसंगत का विश्वास हैं इसलिए मैं खामोश रहा और खामोश हूँ. अपने स्तर पर सरकार से मेरी मांग लगातार जारी हैं. इस आंदोलन के अभी तक की असफलता की जिम्मेदारी मै अपने ऊपर लेने को तैयार हूँ क्योंकि मैं चंद सत्ताधीशों से उनकी सत्ता लालसा में बाधा नहीं बनना चाहता हूँ. मैं व्यक्तिगत रूप से यह अलाव ज्वलित रखने का प्रयास करूँगा. वर्तमान बोर्ड तीन साल चलाये या पांच साल कुछ साध्य नहीं होनेवाला. हजुरसाहिब की साधसंगत के अनुकूल गुरुद्वारा बोर्ड का कानून रहे यह मेरी मंशा हैं. यह अपराध है तो बताइये? कौन क्या करें, क्या भूमिका लें यह मेरे कहने की बात नहीं रह जाती. सभी राजनीति के माहिर हैं, जानकर हैं. उस लिहाज से मेरी सलाह के कोई मायने नहीं हो शायद. हजुरसाहिब की सेवा का जिन्होंने व्रत लिया हैं, साधसंगत को जिन्होंने वचननामे परोसे हैं उन सभी के लिए मैं भी एक मामूली सिख ही हूँ. सही मायने में मेरी यहीं पहचान भी हैं. एक सामान्य और मामूली सिख बनें रहने से संतुष्टि प्राप्त हो ऐसी शुरू से अभिलाषा कायम हैं. इसलिए मैं चाह रहा हूँ कि बहुत सारे दायित्वों से अब मैं मुक्त हो जाऊ. मेरे कारण किसी को कष्ट पहुंचा हो, किसी की भावनाएं व्यथित हुईं हो तो मैं अपराधबोध स्वीकार कर आपसे माफी मांगता हूँ. नये लोग काम करें, समाज की प्रतिमा उज्वल करें और समाज को विकसित करें यहीं मेरी मनोकामनायें रहेगी. 

दूसरी ओर मेरा पत्रकार परिवार, साहित्य क्षेत्र परिवार और मित्र परिवार हमेशा मेरी जीवनयात्रा में साथ रहा. इस कारण एक संस्मरणीय संघर्ष यात्रा यहाँ तक आ पहुंची हैं. दस सालों की गुरुद्वारा बोर्ड की नौकरी, 34 वर्षों की साहित्य लिखाण सेवा, 28 सालों की अर्ध (6 वर्ष) और पूर्णसमय (22 वर्ष) की पत्रकारिता, देश के बड़े समाचार पत्र उद्योगों के लिए सेवा पात्रता और कार्य, साथ समाज के लिए अलग - अलग विषयों को लेकर सरकार और प्रशासन से मैं एक मामूली व्यक्ति संघर्षरत रहा. चार लोगों के लिए काम आ पाया यह मेरे लिए एक संतुष्टि का विषय हैं. अब सक्रियता को छोड़ कर केवल संक्षिप्त पत्रकारिता के लिए मैं समय देना चाह रहा हूँ. ब्लॉग के माध्यम से मैं सभी हितचिंतकों से, सीनियर लोगों से और सभी उम्र के मित्र वर्ग से उनकी राय, सलाह चाहता हूँ कि वें मुझे अपने विचारों से अवगत करवाएं कि मुझे क्या निर्णय लेना चाहिए? मेरा व्हाट्सप्प नंबर 9420654574. आप सभी की भावनाएं मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं. 

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शुक्रवार, 18 जून 2021

 गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पर छाया आर्थिक संकट ? 

डेलीवेजस, बिलमुक्ता रोजंदारी कर्मचारियों को राहत दीजिए

रविंदरसिंघ मोदी 

      गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड हजुरसाहिब नांदेड़ धार्मिक संस्था की वार्षिक बजट बैठक ता. 13-06-2021 को ऑनलाइन प्रणाली से संपन्न हुई. यह मीटिंग मार्च में स्थगित करनी पड़ गई थी. हालिया संपन्न बोर्ड मीटिंग में बीस विषयों के अलावा फुटकल विषयों पर भी चर्चा हुईं. लगभग सभी मुद्दें घुमाफिराकर पास कर लिए गए. एक - दो निर्णय जो बोर्ड प्रशासन को दिक्कत में डाल सकते थे, उन्हें पूरा या अधूरा रद्द कर दिया गया. वैसे वर्ष 2020 - 2021 के वार्षिक बजट में प्रस्तावित बजट की अनुमानित आमदानी में 70 से 80 करोड़ का सीधा नुकसान (घाटा) दिखाई दें रहा हैं. पिछले वर्ष के प्रस्तावित बजट में 125 करोड़ की आय अनुमानित रखी गई थीं. लेकिन वर्षपूर्ति पर कुल आय ऐसे - तैसे 32 करोड़ रूपये के आसपास ही हो पाई. कोरोना संकट कालावधि में गोलक और अन्य आमदानी बुरी तरह से प्रभावित हुईं हैं. इसलिए वर्ष 2021 - 2022 का आर्थिक प्रारूप पत्र (बजट) केवल 65 करोड़ ही प्रस्तावित करना पड़ गया. यांनी आर्थिक मामलों में गुरुद्वारा बोर्ड संस्था गहरे संकट में घिर गई हैं कहा जाए तो गलत नहीं होगा. 

इस विषय में शायद गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान, पदाधिकारी, समन्वयक और मेंबर साहिबान खुलकर कुछ बताने में असमर्थ प्रतीत हो रहे हैं. इस बजट को किसने कितनी गंभीरता से लिया हम कह नहीं सकते लेकिन इस विकट परिस्थिति में वार्षिक बजट को लेकर चाहिए थीं, वैसी गंभीर चर्चा भी देखने को नहीं मिली हैं. कारण ! कारण यहीं कि बजट से ज्यादा पदाधिकारी और मेंबर साहिबान को अपने अपने व्यक्तिगत मुद्दों को पास करवाने तक ही जिज्ञासा थीं कही जाएं तो गलत नहीं होगा. बोर्ड की आमदानी में वृद्धि को लेकर किसी के पास कोई नया प्रस्ताव नहीं था. मेंबर साहिबान विषय पत्रिका में शामिल अधिकतर विषयों को लेकर वैसे आपसी सहमति में ही दिखाई दिए. नौ में से आठ मेंबर साहिबान ऑनलाइन मीटिंग में हाजिर थे. एक मेंबर साहब अनुपस्थित थे. 

प्रधान भूपिंदरसिंघ मनहास को ग्यारह महीनों के अंतराल के बाद एक मीटिंग पूर्ण सफल होने की संतुष्टि तो हुईं होगी. लेकिन एक नई बात यह देखने को मिली कि सेक्रेटरी स. रविंदरसिंघ बुंगाई द्वारा डेलीवेजस कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने की गई मांग को प्रधान भूपिंदरसिंघ मनहास द्वारा अस्वीकार (ख़ारिज) कर दिया गया! यह बात चमत्कार हैं या केवल एक दृश्यम मात्र हैं? सभी के देखने में यह आया हैं कि अभी तक गुरुद्वारा बोर्ड की सत्ता को सेक्रेटरी रविंदरसिंघ बुंगाई एकतरफा चला रहे हैं. मुंबई या औरंगाबाद में बैठें प्रधान साहब कोई दैनंदिन निर्णय लेने से पहले या ऑफिस आर्डर पर दस्तखत करने से पहले सेक्रेटरी रविंदरसिंघ बुंगाई या समन्वयक स. परमज्योत सिंघ चाहल का परामर्श जरूर लेते हैं. इस विषय में क्या हो गया? 

आश्चर्य की बात तो यह हैं कि हालिया बोर्ड मीटिंग के एजैंडा में कर्मचारियों को पक्का करने का विषय एजैंडा में शामिल ही नहीं करवाया गया था! यह देखकर इस तरह का संदेह मन में उठना स्वाभाविक सी बात हैं. यदि विषय पत्रिका में यह विषय रखकर उसे आर्थिक परेशानियों का हवाला देकर अस्वीकार कर दिया जाता तो शायद कुछ समझा जा सकता हैं. पिछले चार से पाँच माह से बोर्ड कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का विषय लेकर खुद इलेक्टेड मेंबर साहिबान मांग करते आ रहे थे. कभी लेटर के माध्यम से, कभी वीडियो के माध्यम से, कभी मीडिया के माध्यम से मांग और आश्वासन का दौर चलता आया हैं. तीनों सदस्य एक मंच पर आ गए थे. लेकिन क्यों वो विषय एजैंडा में स्थान पा नहीं सका? इतना अहम विषय एजैंडा में क्यों नहीं रखा गया यह सवाल कर्मचारियों को भी खल रहा हैं. कुछ कर्मचारियों ने हमारे साथ भी इस विषय में चर्चा की और अपनी परेशानियों से अवगत करवाया. 

बोर्ड मीटिंग में रविंदरसिंघ बुंगाई ने आवाज उठाई थी कि बड़ी संख्या कर्मचारी पांच सालों से डेलीवेजस पर कार्यरत हैं और नियमों के तहत दो सालों की सेवा के बाद उन्हें सेवा में पक्का किया जाना चाहिए. वैसे बोर्ड एक्ट में पक्का करने को लेकर कोई लिखित नियम नहीं हैं, "दो साल" शब्द केवल एक प्रैक्टिस के तहत चला आ रहा हैं. इस लिहाज से जाहीर है सभी डेलीवेजस कर्मचारी आशावाद में थे. लेकिन प्रधान साहब ने सेक्रेटरी साहब का मौखिक प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया! अन्य सदस्य क्या चर्चा करते? आर्थिक संकट के संबंध में शायद उन्हें पूर्व कल्पना होगी. यदि सभी पात्र कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का निर्णय लिया जाता तो गुरुद्वारा बोर्ड की तिजोरी पर प्रतिमाह 34 लाख से 36 तक का अतिरिक्त खर्च बढ़ जाता. यानी एक वर्ष में साढे चार करोड़ तक का बजट बढ़ जाता. कोरोना के हालात में यह निर्णय संभव नहीं था. इसलिए एजैंडा में मुद्दा शामिल नहीं हो पाया होगा. लेकिन सीधा तथ्य परोसने की बजाए उस विषय को मोड़ देने का प्रयास योग्य नहीं होगा. वैसे देखा जाएं तो पिछले दो ढाई सालों में कर्मचारी पक्के क्यों नहीं किये गए. जिन्हें दो वर्ष हुए उन्हें बोर्ड मीटिंग के आस पर पक्का किया जाना कोई गैर नहीं होता. 

हमारी सलाह है कि बोर्ड भले अभी कुछ समय के लिए कर्मचारियों को सेवा में पक्का करने का विषय आगे बढ़ा दें. लेकिन डेलीवेजस, बिलमुक्ता और रोजंदारी में वेतन वृद्धि जरुर करें. हमारा प्रस्ताव हैं कि कोरोना और महंगाई का वर्तमान समय देखते हुए कलर्क के वेतन में प्रतिदिन एक सौ रूपये (₹ 100/-) और सेवादार के वेतन में प्रतिदिन पिचहत्तर रूपये (₹ 75/-) की वेतनवृद्धि की राहत दी जाएं. वहीं आज्ञा आदेश के लिए भी रोजंदारी में प्रतिदिन 75/- रूपये मजदूरी बढ़ाई जाएं. यदि प्रधान साहब और मेंबर साहिबान इस निर्णय पर सहमति बनाते हैं तो निश्चित ही चार से पंच सौ कर्मचारियों को राहत मिलेगी. वहीं जो मामले अनुकंपा से जुड़े हैं उनका निराकरण तो किया जा सकता हैं. उनको प्रलंबित रखा जाना कर्मचारियों के अधिकार और हक पर अन्याय हैं. अनुकंपा और ससपेंड कर्मचारियों के विषय में बोर्ड की भूमिका कर्मचारियों को प्रताड़ित करने जैसी हैं. क्या यह मामला लटकाकर रखने का निर्णय प्रधान साहब का व्यक्तिगत हैं? अब इलेक्टेड मेंबर साहिबान भूमिका क्यों नहीं अपनाते? 

अंतिम बात यह कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था आर्थिक संकट में घिर गई हैं. भूपिंदरसिंघ मनहास के पास कोई जादू की छड़ी नहीं हैं कि घुमाई और तिजोरी भर गई. श्री मनहास पिछले दो से ढाई सालों में बोर्ड के लिए नैतिक मार्गों से कोई बड़ी उगराई करने में भी असफल रहे हैं. कोरोना तो मार्च 2020 में आया और अप्रेल 2020 में लॉकडाउन जारी हुआ. भूपिंदर सिंघ मनहास ने मार्च 2019 में पद संभाला. मार्च 2019 से अप्रैल 2020 तक 13 माह में आमदानी बढ़ाने के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं हो पाए. केवल बातें, प्रदर्शन और विवाद में उन्होंने समय गंवाया कहा जाएं तो गलत नहीं होगा. 

बीते 14 महीनों में तखत साहब की गोलक में चढ़ावा निरंतर घटता चला गया. उस पर हर माह कोई ना कोई काम के बहाने खर्च जारी हैं. लॉकडाउन में भी टेंडर जारी होते रहे हैं ! खर्च जारी है लेकिन आमदानी कम हो रही हैं. क्या बोर्ड के प्रधान और मेंबर साहिबान आमदानी वृद्धि के लिए या चढ़ावा जमा करने के लिए प्रयास नहीं कर सकते? यदि बोर्ड द्वारा मीडिया के जरिये विश्व के सिखों से या सिख संस्थाओं से दसवंध की अपील की जाएं तो संस्था आर्थिक संकट से उबर सकती हैं. बोर्ड संस्था में कार्यरत डेढ़ हजार कर्मचारियों की शक्ति व्यर्थ हो रही हैं. हर स्वाभिमानी सिख चाहेगा कि गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पर छाये आर्थिक संकट के बादल दूर हटाने में भूमिका निभाएं. 

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शनिवार, 12 जून 2021

सिख विद्यार्थियों का वजीफा ना रोका जाएं !

 गुरुद्वारा बोर्ड को सिख विद्यार्थियों का वजीफा रोकना नहीं चाहिए !

रविंदरसिंघ मोदी 


(Bhupinder singh manhas, president, GSB)

श्री हजूर साहिब नांदेड़ स्थित गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था द्वारा सिख विद्यार्थियों के वजीफा (स्कॉलरशिप) के विषय में अनदेखी नहीं करनी चाहिए. गुरुद्वारा बोर्ड द्वारा पिछले आर्थिक वर्ष 2020-2021 में सिख विद्यार्थियों को वजीफा देने के लिए अर्थसंकल्प (बजट) प्रावधान किया गया था. लेकिन कोविड 19 संक्रमण का बहाना कर वजीफा वितरित नहीं किया गया जबकि सरकार ने शैक्षणिक वर्ष कानूनन पूर्ण कर लिया. 50% से ज्यादा बच्चों को फीस भरनी पड़ी वहीं 50% विद्यार्थियों की शैक्षणिक फीस भरना शेष है. बारहवीं के छात्रों ने भी अलग अलग परीक्षाओं की फीस भरी हुई हैं. कुछ परीक्षाएं रद्द हो गई लेकिन फीस तो अदा हो चूकी हैं. 

जिन विद्यार्थियों फरवरी 2020 में टूशन लगाया उनको भी फीस चुकानी पड़ी. कॉलेज में भी फीस भरनी पड़ गई. उच्च शिक्षा स्नातक और उच्च स्नातक वर्गों के विद्यार्थियों को भी फीस चुकानी पड़ी. इस वर्ष कोविड की विभीषिका के बावजूद सभी यूनिवर्सिटी द्वारा फीस में भारी बढ़ोतरी की गई हैं. अब वर्ष 2021-2022 शैक्षणिक सत्र के लिए विद्यार्थियों को प्रवेश लेना हैं और अकादमीक फीस भरना हैं. इस वर्ष जून में लॉकडाउन शिथिल हो जाने से स्कूल और कॉलेज के लिए प्रवेश शुरू हो रहें हैं. विद्यार्थियों को टूशन क्लास लगवाने. लॉकडाउन की विभीषिका के चलते आज बहुत से सिख परिवार हताहत हैं. बहुत से सिख परिवारों में कोविड संक्रमण का प्रादुर्भाव रहा हैं. समाज में पिछले साल भर में डेढ़ सौ के लगभग मौतें हुई हैं. बहुत से घरों ने कमानेवाले प्रमुख को खो दिया हैं. कोरोना के उपचार में बहुत से परिवारों को ब्याज से पैसे लेकर जरूरतें पूर्ण करनी पड़ रहीं हैं. ऐसे में बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो गई हैं. 

जाहीर हैं कि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड द्वारा जारी वर्ष के अर्थसंकल्प में वजीफा फण्ड का एक करोड़ राशि का प्रावधान तो करेगा. पिछले वर्ष के फण्ड प्रावधान का शेष अनुशेष वितरित नहीं किया गया. यांनी वजीफा के फण्ड में दो करोड़ की राशि का समायोजन करने की संभावना और गुंजाईश हैं. लेकिन उदासीनता और राजनीतिक सोंच के कारण गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड सिख विद्यार्थियों के साथ न्याय नहीं कर पा रहा हैं. जिसके चलते सिख विद्यार्थियों का नुकसान हो रहा हैं. बोर्ड को चाहिए कि कम से कम विद्या (शिक्षा) जैसे क्षेत्र में राजनीति ना करें. सिख समाज के नेता, खासकर गुरुद्वारा बोर्ड की राजनीति से जुड़े नेतागण इस संबंध में गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान साहब के सामने खुलकर चर्चा क्यों नहीं करते हैं? प्रधान साहब के करीब और खास कहलाने वाले नेतागण वजीफा नीति को लेकर खुलकर बहस क्यों नहीं करते? यदि गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड सिख विद्यार्थियों की पढ़ाई को प्रोत्साहित नहीं कर रहा हैं तो बहुत बड़ा दुर्भाग्य हैं. सिख विद्यार्थी अपना अधिकार लेने के लिए आंदोलन करें इससे पूर्व गुरुद्वारा बोर्ड के अर्थसंकल्प में वजीफा फण्ड का प्रावधान करने के साथ साथ जुलाई अथवा अगस्त माह में बच्चों को वजीफ़े का वितरण किया जाएं. ऐसी सभी से प्रार्थना हैं. 

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 गुरुद्वारा बोर्ड की मीटिंग के मायने !

भूपिंदरसिंघ मनहास 'दरबार साहब' की इमारत का मूल्य बताए ! या माफी मांगे !

रविंदरसिंघ मोदी 

( तखत सचखंड श्री हजूर साहिब दरबार साहिब )

आनेवाली तारीख 13 जून 2021 को गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड नांदेड़ संस्था की बोर्ड बैठक झूम ऑनलाइन प्रणाली द्वारा संपन्न होने जा रहीं हैं. पिछली बोर्ड बैठक ता. 20-07-2020 को संपन्न हुई थीं जो खासी चर्चाओं में रहीं थीं. उसके पश्च्यात आयोजित पिछली बजट बैठक हो नहीं पाई थी. गुरुद्वारा बोर्ड यह धार्मिक संस्था होने के कारण और उसका आर्थिक व्यवहार (बजट) अनुमानित एक सौ करोड़ होने के कारण संस्था के आर्थिक व्यवहार नहीं रुकने चाहिए ऐसा मेरा स्वतंत्र मत हैं. क्योंकि दैनंदिन पूजापाठ, दीयाबाती, व्यवस्था, कर्मचारियों का वेतन, बिजली बिलों का भुगतान जैसे बहुत से खर्च मायने रखते हैं. साथ ही लंगरसेवा, हॉस्पिटल सेवा, यात्रीनिवास व्यवस्था के लिए भी रोजाना खर्च करना पड़ता हैं. ऐसे दैनंदिन खर्च रोजाना करना अपरिहार्यता हैं. इस विषय को समझा जा सकता हैं. लेकिन बजट मीटिंग नहीं होने की बात का हो-हल्ला मचाने के बजाए मंथली बजट जिलाधीश साहब की अनुमति से करवाने का भी विकल्प मौजूद है. सन 1991 के बाद ऐसे प्रयोग होते आये हैं. इन विकल्पों का उपयोग नहीं करने से बोर्ड के एक हजार से ज्यादा पक्के कर्मचारियों को आर्थिक मुसीबतों से रूबरू होना पड़ा. नियम तो यह है कि मीटिंग होने के बाद की प्रोसेडिंग जारी होने तक पास किये गए मुद्दों को अमल में नहीं लाया जा सकता. मीटिंग ख़त्म होते ही बोर्ड वेतन कैसे जारी कर सकता हैं? वर्ष 2021-2022 के आर्थिक बजट को मान्यता की प्रोसिडिंग की तकनीक दिक्कत तो हैं. लेकिन श्रेयवाद को दरकिनार कर समाज की आवश्यकता के सभी मुद्दों के साथ न्याय जरुरी हैं. फटाफट निर्णय नहीं लेकर उसका राजनीतिकरण किये जाना घातक है और एक धार्मिक संस्था में कार्यप्रणली में अवरोध पैदा करने का दुःसाहस भी. 

सात या नौ सदस्यों के सीमित अधिकार हैं !

ता. 13-06-2021 को आयोजित बोर्ड बैठक का ज्यादा विरोध नहीं हुआ है यह बात गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान के हित में हैं. वैसे भी भोपाल एसजीपीसी की मनोनीत रिक्त सीट पर स. हरपालसिंघ स्व. गुरदीपसिंघ भाटिया की सदस्य के तौर पर नियुक्ति से बोर्ड का संतुलन 50 प्रतिशत सदस्य संख्या के नियमों की पूर्ति करता है. इसलिए बैठक जायज हैं. बोर्ड के प्रधान के पास आज बैठक के लिए जरुरी गणपूर्ति संख्या (7) उपलब्ध हैं. जिसे हम कोरम कहते हैं. इस समय बोर्ड में 17 में से नौ सदस्य मौजूद हैं. जिसके पास कोरम उपलब्ध हो वो हर तरह के निर्णय पास करवा सकता हैं. जाहीर हैं ग्यारह महीनों के अंतराल के बाद मीटिंग हो रहीं है विषय पत्रिका में मुद्दे तो होंगे ही. लेकिन बोर्ड को ऐसे मुद्दे पास करने की तकनीकि दिक्कत है कि जिन मुद्दों को पास करवाने के लिए बोर्ड एक्ट (17 सदस्यीय बोर्ड) के दो तिहाई सदस्यों की सहमति जरुरी है. उदाहरण के लिए गुरुद्वारा की खेती लीज पर देने या किरायेनामे पर देने के लिए बोर्ड के सतरह सदस्यों के अस्तित्ववाले बोर्ड के ही अधिकार हो. आज के नौ सदस्यों में से दो तिहाई संख्या का समीकरण धोखाधड़ी जैसा है. इस विषय पर बोर्ड के अन्य सदस्य बात क्यों नहीं कर रहे हैं? आपसी सहमति के मुद्दें या किसी व्यक्तिविशेष को सहायता पहुंचाने की मंशा से पास किये गए निर्णय से बोर्ड का नुकसान हो सकता हैं. जमीनों के संबंध में अभी निर्णय लेना अनुचित होगा. यदि ऐसे निर्णय लिए जाते हो तो जमीन विवाद से जुड़े न्यायालयीन मामलों में गुरुद्वारा बोर्ड का खर्च गुरु की गोलक से नहीं करवाकर उसकी पूर्ण जिम्मेदारी और दायित्व बोर्ड अध्यक्ष की होनी चाहिए. बोर्ड अध्यक्ष वैसा लिखित करार करके दें सकते हैं क्या?  

अब सबसे गंभीर बात ! 

बैठक एजैंडा सूची में 20 नंबर पर एक मुद्दा रखा गया हैं कि गुरुद्वारा बोर्ड के सभी इमारतों का बीमा करवाया जाएं. साथ ही दरबार साहब की इमारत का बीमा करवाया जाएं. यात्री निवास और कार्यालयों की इमारतों का बीमा करवाएं जाने के लिए हमारा पूर्ण समर्थन हैं. लेकिन यदि श्री गुरु गोबिंद सिंघजी महाराज के कायम निवास तखत सचखंड श्री हजूर साहिब 'दरबार साहब' की इमारत का बीमा करवाने और दरबार साहब का मूल्यांकन करवाने जैसी अविवेकपूर्ण पेशकश बोर्ड के माध्यम से की जा रहीं हैं तो मै, स. रविंदरसिंघ मोदी, पत्रकार हजूर साहब व्यक्तिगतरूप से इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध करता हूँ. आशा करता हूँ जो भी गुरु का सच्चा सिख इस विषय में गौर करेगा निश्चित ही मेरे द्वारा प्रोत्साहित तत्वतः निषेध में शामिल हो जायेगा. 

(आक्षेप पत्र)

स. भूपिंदरसिंघ मनहास क्या इतने बड़े व्यवसायी हो गए कि उन्होंने दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज के घर 'दरबार साहब' का मूल्यांकन करना शुरू कर दिया हैं ! उनकी, कौनसी बीमा कंपनी से बात हुई जो हजूर साहब के पवित्र पावन दरबार साहब की सही कीमत तय करेंगी? मनहास साहब, बताइये 'दरबार साहब' का मूल्य (कीमत) क्या तय किया है आपने? बीमा करवाने के लिए दस्तावेज पर कितना आंकड़ा भरोगे? दरबार साहब का बीमा करवाने के लिए कंपनी को कोई कीमत तो तय करनी होगी! किश्त भी भरनी होगी! शेर-ए-पंजाब महाराज रणजीतसिंघजी द्वारा सेवाभाव से निर्मित गुरुघर के दरबार साहब का निर्माण करवाया गया था. यह दरबार साहब भवन अमूल्य हैं. श्रद्धा और आस्था के इस धरोहर का मोल लगाने का गुनाह आपने किया हैं और उसके लिए आपको तखत साहब में माफी मांगनी चाहिए.  

बोर्ड का एजैंडा 👇

( देखिए 20 नंबर का मुद्दा )🖕



(मुद्दा नंबर 20🖕)

शहंशाह दशमेश पिता जी के सचखंड दरबार साहब की इमारत करोड़ों सिखों का सबसे अंतिम 'आस्था केंद्र' है. यह दरबार साहब हमारा उर्जास्थान है, जहाँ दशमपिता श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज ने ग्यारहवें और युगोंयुग अटल श्री गुरुग्रंथ साहिब जी को गुरुगद्दी प्रदान की है. यह दरबार साहब सिख इतिहास की ऐतहासिक और सांस्कृतिक धरोहर हैं. इनका मूल्यांकन कैसे हो सकता हैं? दाम किस प्रणाली से तय होंगे? यह ईमारत आस्था, सेवा और उस दौर से इस दौर तक की साधसंगत के योगदान से निर्मित है. गुरु महाराज के अंगीठा साहब का क्या मूल्य तय करोगे? दरबार साहब के सौंदर्यकरण के लिए कितना सोना लगा, कितनी चांदी लगी, दीवारें कितनी बनीं है, कलश कितने हैं, क्या सभी का मूल्य तय किया जायेगा? जिस दौर में दरबार साहब की ईमारत जर्जर होगी उस समय दरबार साहब के नवनिर्माण अथवा सौंदर्यकरण के लिए साधसंगत सक्षम होगी. श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज स्वयं अपने स्थान की सेवा करवा लेंगे. 

मैं, गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के मौजूदा सभी सदस्य और व्यवस्थापन समिती के सदस्यों से प्रश्न करना चाहता हूँ कि आप सभी ने तो विषय पत्रिका में 20 नंबर का मुद्दा पढ़ा होगा ? क्या इस विषय में आप लिखित आक्षेप नहीं लें सकते थे? साधसंगत की सेवा का दायित्व और तखत साहब की महानता का निवर्हन सभी सदस्यों की जिम्मेदारी हैं. वोट की राजनीति के अलावा धार्मिक मूल्यों को अबाधित रखने के लिए विवेक जागरूक रखना जरुरी हैं. 

मै गुरुद्वारा बोर्ड के सरकार द्वारा नियुक्त जिम्मेदार प्रधान सरदार भूपिंदर सिंघ मनहास (मुंबई) से शिकायत करना चाहूंगा कि, प्रधानसाहब, यह एक अटल सच्चाई हैं कि, आपके गुरुद्वारा बोर्ड के अभी तक के ढाई वर्ष के कार्यकाल में हजुरसाहब बोर्ड पूर्णरूप से अस्थिर हो गया हैं. दक्खन प्रदेश की सिख नुमाइंदगी आपके कार्यकाल में पूर्णरूप से ख़त्म हो गई हैं. गुरुद्वारा परिसर में बार - बार तनाव और हिंसा घटित हो रहीं हैं. राजनीति के चलते ही सिख नौजवानों पर आपराधिक मामले दर्ज हुए हैं. गुरुद्वारा परिसर में हमेशा लॉ एंड आर्डर भंग हुआ हैं. आपकी दम्भ नीति से आज हजूर साहिब के कितने परिवार त्रस्त हैं. सबसे पहले आपके कार्यकाल का मूल्यांकन होना चाहिए. मैं, एसजीपीसी की प्रधान बीबी जगीरकौर जी से निवेदन करूँगा कि वो स्वयं सरदार भूपिंदरसिंघ मनहास के कार्यकाल का मूल्यांकन करवाए. 

यदि गुरुद्वारा बोर्ड के मेंबर साहिबान और व्यवस्थापन समिती सदस्यों का विवेक जागरूक हैं और आप गुरुघर के वफादार हो, साधसंगत के सेवक हो, किसी बीमा कंपनी से आपका व्यक्तिगत लालच नहीं है तो तुरंत मीटिंग एजैंडा के मुद्दा नंबर 20 में संशोधन करवाकर 'दरबार साहब' का बीमा करवाने का विषय हटा दें. और इस तरह की सोच के लिए भूपिंदर सिंघ मनहास को चाहिए कि वें एक सच्चे सिख की नैतिकता और कर्तव्यपरायणता के तहत श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज के सच्चे दरबार में उपस्थित होकर गुरु महाराज से माफी मांगे. 

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गुरुवार, 20 मई 2021

 न्यू सॉउथ वेल्स के स्कूलों में "कृपाण" पाबंद !

रविंदरसिंह मोदी 


ऑस्ट्रेलिया के न्यू सॉउथ वेल्स स्टेट प्रशासन द्वारा वहाँ के सरकारी स्कूलों में सिख विद्यार्थियों के कृपाण धारण कर स्कूल आने पर पाबंदी के आदेश जारी किये गए. न्यू सॉउथ मिनिस्टर साराह मिशेल द्वारा ता. 18-05-2021 को आदेश जारी किया गया जिसकी अनुपालना ता. 19-05-2021 से अमल में लाई गई. ऑस्ट्रिलयन सरकार के निर्णय के बाद वहाँ के सिख समुदाय ने सरकार के प्रति नाराजी व्यक्त कर शासन आदेश पर पुनर्विचार करने की अपील की हैं. 


न्यू सॉउथ वेल्स प्रांत के सिडनी स्थित ग्लेनवुड स्कूल में ता. 06-05-2021 को एक घटना घटित हुई थी जिसमें एक 14 वर्षीय सिख विद्यार्थी का स्कूल की कक्षा में वहाँ के अन्य विद्यार्थियों से किसी विषय को लेकर झगड़ा हो गया. तीन से चार विद्यार्थियों द्वारा जब उस सिख विद्यार्थी के साथ मारपीट की गई तब उस सिख विद्यार्थी द्वारा कृपाण निकाल कर अपना बचाव किया गया. इस समय एक सोलह वर्षीय विद्यार्थी कृपाण से घायल हो गया.  

घटना के बाद पुलिस को मामला सौंपा गया. पश्च्यात में कुछ अभिभावकों द्वारा स्कूलों में कृपाण के उपयोग पर पाबंदी लगाने की मांग की. ऑस्ट्रेलिया सरकार ने घटना की समीक्षा के पश्च्यात ता. 19 मई से स्कूलों में कृपाण के उपयोग पर पाबंदी लागु कर दी. सिखों के एक प्रतिनिधि मंडल ने सरकारी निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील सरकार से की. साथ ही कृपाण को धार्मिक अनुपालना सिद्धांत का प्रमुख आधार बताकर खालसा पंथ के अमृतपान का ऐतहासिक प्रसंग और उससे जुड़े सभी धार्मिक तथ्यों को प्रस्तुत किया हैं. पर अभी तक ऑस्ट्रेलिया सरकार द्वारा निर्णय को लेकर कोई भी नई टिप्पणी या पुनर्विचार की तैयारी दर्शाई नहीं गई. 

ऑस्ट्रेलिया सरकार के निर्णय का भारत में सिख संस्थाओं द्वारा विरोध प्रकट किया गया. इस घटना को लेकर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने भी बयान जारी किया हैं कि सिखों की धार्मिक स्वतंत्रता पर यह अगाध है. ऑस्ट्रेलिया सरकार को यह निर्णय रद्द करना चाहिए. 

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बुधवार, 19 मई 2021

 श्री दशमेश हॉस्पीटल में कोरोना वैक्सीन उपलब्ध करवाई जाएं 

रविंदरसिंह मोदी 

नांदेड़ महाराष्ट्र 

यहाँ के तखत सचखंड श्री हज़ूर साहब बोर्ड द्वारा संचालित श्री दशमेश हॉस्पिटल अंतर्गत शुरू किया गया कोरोना कोविड 19 संक्रमण रोकथाम वैक्सीन केंद्र (टीका केंद्र) में विगत बीस दिनों से कोवैक्सीन टीकाकरण प्रक्रिया बंद हैं. वैक्सीन का कोटा उपलब्ध नहीं होने से प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो रहीं है. दूसरी ओर पहली डोज प्राप्त कर चूके नागरिक अब दूसरी डोज पाने के लिए संघर्ष कर रहें हैं. नागरिकों की सुविधा हेतु श्री दशमेश हॉस्पिटल में कोरोना टीकाकरण कार्य दुबारा से शुरू किये जाना चाहिए ऐसी मांग जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, महानगर पालिका, जिला अस्पताल प्रशासन और जिला स्वास्थ अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत है. 

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के श्री दशमेश हॉस्पिटल में ता. 03-04-2021 को कोरोना कोविड 19 टीकाकरण शुरू किया गया था. कोवैक्सीन का टीका यहाँ लगवाना शुरू किया गया था जिससे नागरिकों को बहुत सुविधा उपलब्ध हो गई थीं. हॉस्पिटल में तज्ञ डॉक्टर और स्टाफ होने के कारण और अन्य सभी उपचार सुविधाएं उपलब्ध होने की वजह से नागरिकों को बहुत आसानी हो रहीं थीं. लेकिन ता. 28-04-2021 से वैक्सीन सेवा बंद हो गई क्योंकि वैक्सीन कोटे की किल्लत प्रस्तुत हो गई. 

उल्लेखनीय है कि, ता. 29-04-2021 से वैक्सीन के डोज दशमेश हॉस्पीटल में उपलब्ध नहीं हो पाए हैं. लगातार बीस दिनों से यह किल्लत प्रस्तुत हो रहीं हैं. जिससे आम नागरिकों की परेशानी हो रहीं हैं. पहली डोज प्राप्त कर चूके लोगों को 30 से 42 दिनों के दौरान दूसरी डोज लेना अनिवार्य है. इसलिए नागरिकों में चिंता का वातावरण बना हुआ हैं. वैक्सीन टीकाकरण लगभग एक साल चलने वाला है. इसलिए श्री दशमेश हॉस्पीटल का केंद्र अबाधित रूप से शुरू रखा जाएं ऐसी मांग प्रस्तुत हो रहीं हैं. 


मंगलवार, 11 मई 2021

 सोचा आज 'मंटो' को याद कर लूँ..!

रविंदरसिंह मोदी

(सादत हुसैन "मंटो)

भारत में पैदा हुए लेकिन पाकिस्तान में अंतिम साँसे लेने वाले मशहूर लेखक, शायर, कहानीकार सादत हसन 'मंटो' ने भारत - पाकिस्तान बंटवारे को लेकर काफ़ी कुछ लिखा हैं. बंटवारे की त्रासदी पर बहुत चिंतन भी किया था लेकिन शायद नियति ने उन्हें ज्यादा मोहलत नहीं बख़्शी. मात्र 43 साल की उम्र में मंटो ने सन 1955 में दुनिया को अलविदा कह दिया. उनकी पैदाइश ता. 10 मई, सन 1912 की है. जलंधर पंजाब में उनका जन्म हुआ था. यदि मंटो उम्रदराज होते तो एक नए तरह का साहित्यसृजन निश्चित ही हमें पढ़ने को  मिलता. 

सादत हसन मंटो की उर्दू कहानी तोबा टेकसिंह को मैंने कोई बाईस - तेईस साल पहले पढ़ा होगा. यह कहानी दो बार पढ़ीं. क्योंकि सन 2012 में मंटो की जन्मशताब्दी मनाई गई थी उस वक्त, तब दोबारा से तोबा टेकसिंह कहानी पढ़ लीं. उस कहानी में बंटवारा होने के बाद की परिस्थितयों का मार्मिक चित्रण देखने को मिलता है. सिख किसान सरदार बिशनसिंह जमींदार के  सत्य चरित्र पर आधारित यह कहानी बहुत कुछ सीखा जाती है. 

(स्व. तोबा टेक सिंह उर्फ़ बिशन सिंह जमींदार : यह कहानी हर सिख को भी  पड़नी चाहिए.)

मंटो को करोड़ों लोगों ने पढ़ा होगा, उनको पसंद करने वाले भी करोड़ों में ही होंगे. लेकिन मैं मंटो को लेकर कुछ तय नहीं कर पाया. जो बेबाकी मै अपने भीतर या अन्य साहित्यिकों में तलाशता रहा वो मंटो में बहुत हदतक उपलब्ध भी है लेकिन पता नहीं क्यों मंटो ज़माने के प्रति किसी दुश्मनी पर उतारू तो नहीं थे ऐसे ख़्यालात उठने लगें तब मैंने अपने आपको 'मंटो' से दूर कर लिया. अभी तक दूर ही रहा. पर आज अचानक आज कुछ महसूस हुआ कि 'चीर निंद्रा' में सोये 'मंटो' को याद कर लूँ. 'मंटो' को याद करने के लिए साहित्य की प्रमाणिकता और बर्दाश्त करने की इंतेहा से गुजरना पड़ता हैं. भारत देश में सादत हसन मंटो के साहित्य को लेकर अक्सर मंथन होता आया हैं. इसलिए मंटो यहाँ जीवित रहें, वे मरे नहीं ! मंटो इसलिए भी ज़िन्दा रहें कि उनके साहित्य को लेकर बहुत से लोगों ने रोजगार ज़िन्दा रखा. बॉलीवुड की मूवी खलनायक का वो मशहूर गीत "चोली के पीछे क्या है... "  मंटो की उस बात पर आधारित भी है कि, मैं किसी को कपड़े नहीं पहना सकता, ये काम तो दर्जी का है! मुझे इन विषयों में कहीं रिश्ता नजर आया था. क्या गीतकार आनंद बख़्शी ने मंटो को पढ़ा होगा? 

'मंटो', दोनों सरकारों के रवैय्ये पर तंज करते थे इसलिए पाकिस्तान में वे पिछड़ गए, या उन्हें पिछड़ा रखा गया. यदि भारत में रहते तो इतिहास कुछ अलग होता. 'मंटो' को आज याद करने की वजह शायद ये भी है कि मंटो ऐसे शख्स भी है जिन्होंने देश बंटवारे के समय लाखों लोगों की लाशें उस सरजमीं पर बिखरी हुई देखीं थीं. वे उन घटनाओं के साक्षी है, गवाह भी थे. उन्होंने खुलकर उन घटनाओं का मातम भी मनाया था. लाखों लोगों की एक साथ मौत की त्रासदी को उन्होंने तमाशा कहा था. आज विश्व में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न है कि लोग जंग में तो नहीं पर वाइरस संक्रमण से मर रहें हैं. आज हम सभी गवाह हैं कि किस तरह लाखों लोग मर रहें हैं. आज के हालात में मौत कितना बड़ा तमाशा बन गईं हैं. मानवता के चेहरे पर यह किसी मानसिक विकृति का तमाशा नहीं तो क्या हैं. जिसने ऐसा वाइरस बनाया और लाखों लोगों को मौत का शिकार बनाया, जिसने करोड़ों लोगों की जानें संकट में डाली, क्या यह तमाशा नहीं हैं? आज करोड़ों लोगों की साँसों में उत्पन्न घुटन का गुनहगार कौन है, यह भी खुलकर नहीं कहा जाता ! फिर तो यह तय हुआ कि मंटो की ज़माने के प्रति नाराजी सही थीं. उनकी बेबाकी ने एक समय की सियासत को ललकारा था. आज का साहित्य जगत जाने क्यों खामोश हैं. किस तमाशे की इंतेहा की प्रतीक्षा हैं? 'मंटो' का 'ठंडा गोश्त' शायद कभी गर्म नहीं होगा. देश में छाई परिस्तिथियों में भारतीय साहित्य क्षेत्र अब भी धुर्वीकरण को ही मुख्य रखकर कलम चला रहा हैं. आज हम यह मार्मिक तंज कर सकते हैं कि जितनी कलम साहित्यिक वर्ग नहीं घिस पा रहा हैं, उससे ज्यादा तो अस्पताल और डॉक्टर अपनी कलम घीस रहें हैं. मैं दुआओं में गहरा विश्वास रखता हूँ लेकिन खेद के साथ कह रहा हूँ कि यह दुनिया अब 'दवा - दारू' पर निर्भर होती चलीं जा रहीं हैं. 'मंटो' याद आ गए उनका शुक्रिया ! जिन्हें दिल कभी भुला ही नहीं था उन्हें 'मंटो' के बहाने एक बार फिर याद करने का जैसे बहाना मिल गया. आज की परिस्थितियां एक मानसिक द्वन्द को आमंत्रण दें रहीं हैं. 'मंटो' जैसा इंकलाब चाहते हैं वैसा तो संभव नहीं पर एक राष्ट्रीय संघर्ष की आपात भावना की सुगबुगाहट देश में शुरू होगी यह उम्मीद ज़िन्दा कर रहा हूँ.  .

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(रविंदरसिंह मोदी)

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