आखरी मीटिंग, आखरी दाँव ?
कलम ग्यारह पर तारासिंह की नकारात्मक भूमिका
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रविन्दरसिंघ मोदी
फरवरी के अंतिम सप्ताह में महाराष्ट्र विधानसभा का अधिवेशन दो दिनों में लपेट दिया गया. हम सोंच रहे थे कि अधिवेशन में गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड कानून में संशोधित और बहुचर्चित कलम ग्यारह (११) का विषय चर्चा पटल पर रखकर हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जायेगा. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. अधिवेशन और चलता और राजस्व विभाग के विषयों में ये विषय रखकर या प्रश्न पूछकर उसपर चर्चा कर संशोधन रद्द करने का निर्णय लिया जाता.
दूसरा कारण ये भी कहा जा सकता है कि, गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान और आदरणीय विधायक तारा सिंह द्वारा कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाने के लिए कोई पहल नहीं की गई. उन्होंने कलम ग्यारह हटाने के लिए महाराष्ट्र सरकार को कोई लिखित प्रस्ताव भी नहीं दिया. उन्हें एक सिख विधायक कहा जाता है, लेकिन सभागृह के एकमात्र सिख विधायक ने कोई स्पष्ट भूमिका नहीं अपनाई, बल्कि कलम ग्यारह के विषय से बचने के लिए उन्होंने शायद लीलावती अस्पताल का उपयोग कर लिया. लीलावती अस्पताल वैसे तारा सिंह का आरामगाह कहा जाना चाहिए. जब भी तबियत ख़राब होती है या कोई टेंशन होता है तो वे लीलावती की शरण में चले जाते हैं.
अबकी बार तारासिंह जी लम्बे समय के लिए उपचार करवाने के लिए अस्पताल में दाखिल हुए. उन्होंने उपचार लेते-लेते ही ता. १७ मार्च, २०१९ को आयोजित होनेवाली गुरुद्वारा बोर्ड मीटिंग का एजेंडा भी तय किया. वही लेटे - लेटे कर्मचारियों के निलंबन की झड़ी भी लगा दी. यहीं से जैसे उन्होंने आखरी मीटिंग का आखरी दॉँव भी खेल लिया ऐसा हम नहीं कहते बल्कि यह गुरुद्वारा बोर्ड के राजीनीतिक गलियारे में चल रही घमासान चर्चा में सबसे चर्चित मुद्दा है. कुछ मेंबर तो कानाफूसी कर रहे हैं कि तारासिंह जी कलम ग्यारह के मुद्दे का सामना नहीं करना चाह रहे थे. उन्हें कलम ग्यारह के विषय में चर्चा के दौरान स्पष्टीकरण भी देना पड़ सकता था. अधिवेशन के बहार मंत्रिमंडल की बैठक में भी कलम ग्यारह का विषय समाप्त हो सकता था. है ये बात तारासिंह जी को समझ आणि चाहिए.
आदरणीय पंजप्यारे साहिबान ने कलम ग्यारह के विषय में सकारात्मक आदेश देने के बाद और कलम ग्यारह रद्द करवाने के आंदोलन के सूत्र संतबाबा बलविंदरसिंघजी कारसेवा वाले और संतबाबा प्रेमसिंघजी द्वारा सँभालने के बाद तो तारासिंह जी को कलम ग्यारह के लिए पहल करना चाहिए था. बल्कि तखत साहिब का हुकुम मानकर एक सिख होने के नाते कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाने के लिए लिखित प्रस्ताव पेश करना चाहिए था. लेकिन उन्होंने सरल मार्ग तय कर लिया और बजट मीटिंग का आखरी दाँव खेलने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी. बजट मीटिंग के एजेंडे में उन्होने ता. २८-०७-२०१८ की उस बैठक की प्रौढ़ता को मान्यता देने का विषय भी राजनीतिक रूप से पेश किया गया हैं. जिस बैठक का स्थानीय आठ सदस्यों ने एकजुट होकर विरोध किया था. देखना हैं कि जिस मीटिंग का विरोध किया गया था उसकी फुटकल मांगों को कौन सदस्य प्रौढ़ता देता हैं. उस बैठक का विरोध कलम ग्यारह के लिए किया गया था. स्थानीय मेंबर साहिब इस विषय में नैतिकता अपनाएंगे या तारासिंह के प्रभाव में पास पास पास कहेंगे ये देखना होगा.
ये भी इक कड़वी सच्चाई हैं कि तारासिंह ने अपने चार वर्षों के लम्बे कार्यकाल में कई भूमिपूजन तो कर लिए लेकिन कोई मार्किट खड़ा नहीं किया. इतना बड़ा बजट ब्लॉक कर रखा. इस कार्यकाल में पास होने के बाद चार मार्किट तो खड़े हो जाने चाहिए थे. अंत अंत में संतबाबा जोगिन्दर सिंघजी मोनी सीवन क्लास की बिल्डिंग काम ज्यादा दर पर स्वीकार की गई. काम देने के लिए भी तारा सिंह जी का एकाधिकार चर्चा का विषय रहा था. खैर....... अब फिर से नए मार्किट का विषय बैठक में रखा गया हैं! उम्मीद हैं, ता. १७ मार्च की बैठक में मुंबई के सिविल कांट्रेक्टर बड़ी संख्या में मीटिंग स्थल पर मुंबई में उपस्थित रहेंगे.
कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाकर बोर्ड पर अधिपत्य भोगनेवाले तारासिंह का कार्यकाल दक्खन के सिखों के लिए खासा नकारात्मक साबित किया जा सकता हैं. और हैं भी. बोर्ड का प्रधान बनने के लिए इस विधायक ने सभी को गुमराह करके रख दिया. सुना हैं कि कलम ग्यारह के संशोधन रद्द करने के लिए महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग को बड़ी कसरत करनी पड़ रही हैं. तारासिंह द्वारा करवाया गया संशोधन संवैधानिक रूप से बड़ी गलती है ये अब बात सामने आ रही हैं. इसे गलती कहा जाए फिर स्वार्थ की खुरापात. अब अपनी अंतिम मीटिंग में तारासिंह को क्या पास करवाना हैं?
बहुत बार ऐसा हुआ है पहले की बजट मीटिंग हुई ही नहीं और कलेक्टर के आदेश से बजट के लिए अनुमति प्राप्त कर ली गई. सामने लोकसभा चुनावों की अचार संहिता लगने का वातावरण है. बजट मीटिंग से पहले ही अचार संहिता प्रभाव में आ सकती हैं. इसलिए भी मीटिंग की कोई जरुरत नहीं होनी चाहिए. मंत्री मंडल की बैठक में गुरुद्वारा बोर्ड कलम ग्यारह का विषय समाप्त कर दिया जा सकता था. लेकिन उसके लिए प्रयास नहीं किया गया. मुख्यमंत्री शायद इस विषय की गंभीरता को जान ले और घोषित कर दे कि कलम ग्यारह रद्द कर दी गई है.
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