एक नयी पहल का सूत्रपात ;
जत्थेदार जी और पंजप्यारे साहिबान को धन्यवाद
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गुरुद्वारा बोर्ड कानून के सभी संशोधन रद्द करने की मांग
जयकारों से गूंज उठी हजूर साहिब नगरी
तखत सचखंड श्री हजूर साहिब की पावन धरती से तारीख २१ जनवरी २०१९ के दिन एक नयी पहल का सूत्रपात हुआ. गुरुद्वारा बोर्ड को महाराष्ट्र सरकार के चुंगल से मुक्त करवाने के लिए आखिर पंथ के जत्थेदार संतबाबा कुलवंतसिंघजी और आदरणीय पंजप्यारे साहिबान को कदम उठाना पड़ गया. पंजप्यारे साहिबान ने तखत साहिब के सान्निध्य में गुरुमत्ता लेकर सरकारी संशोधन बर्खास्त करने की मांग रखी. साथ ही इस मांग को पूरा करने शुरू किये गए आंदोलन का नेतृत्व संतबाबा बलविंदर सिंघजी कारसेवा वाले और संतबाबा प्रेमसिंघजी माता साहेब वालों को सौंपा.
पंजप्यारे साहिबान की इस मांग को हजूरी साधसंगत ने हाथोहाथ लेकर हजूर साहिब नगरी में भव्य रैली निकालकर गुरुद्वारा बोर्ड कानून १९५६ में वर्ष २०१५ से अबतक किये गए सभी सरकारी संशोधन रद्द करने की मांग की. जिलाधीश श्री अरुण डोंगरे को एक ज्ञापन भी प्रस्तुत किया. संत बाबा बलविंदर सिंघजी और संतबाबा प्रेमसिंघजी मातासाहिब वालों के नेतृत्व में आंदोलन को आज एक नई दिशा प्राप्त हुई कहा जाए तो गलत नहीं होगा. पंजप्यारे साहिबान के आदेश के बाद साधसंगत का जोश भी चरम पर रहा. जयकारों से नगरी गूंज गई.
इस नयी पहल से मुंबई में हलचल मच गई. सरकार के अधीन गुरुद्वारा बोर्ड कानून की धारा ग्यारह (११ ) का आधार लेकर मुंबई के कुछ विवादित मेंबर हजूर साहिब बोर्ड का प्रधान बनने के लिए मंत्रालय की सीढियां घिसने में लगे हुए है. उनकी अरमानों को अब ठेस लगी होगी. लेकिन क्या ये अपनी नापाक हरकतों से बाज आएंगे? आइये आज आपको एक शरीफ मुम्बईया की कहानी बताते है.
दो-तीन माह पहले की घटना है, जब एसजीपीसी के सदस्य और गुरुद्वारा बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदरसिंघ मिन्हास गुरुद्वारा परिसर के ए विंग ब्लॉक के एक कमरे में आकर ठहरे थे. उनके साथ उनके पुत्र भी थे. उनके यहाँ होने की सुचना भाई देवेंद्रसिंघ मोटरावाले ने दी. तब सरदार लड्डूसिंघ महाजन, जसपालसिंघ लांगरी, अवतारसिंघ पहरेदार, देवेंद्रसिंह विष्णुपुरीकर, तेजपालसिंघ खेड़ और मैं स्वयं भूपिंदर सिंघ मिन्हास से मिलने पहुंचे. तारासिंह द्वारा बुलाई गई बैठक में उपस्थित होने का उनसे कारण पूछा तो शुरू में कुछ गर्मागर्मी हुई. बाद जब चर्चा पटरी पर लौटी मीत मिन्हास ने हमें आश्वासन दिया कि, कलम ग्यारह रद्द करवाने के लिए अब वो हमारा साथ देंगे. यहीं नहीं बल्कि हमारे शिष्टमंडल को मुख्यमंत्री का समय दिलवाएंगे. भला मनुष्य मानकर हमने साहब की बात पर यकीन कर लिया और रास्ता ताकते रहे कि कब मिन्हास साहब हमें मुख्यमंत्री के पास लेकर चलते हैं.
मिन्हास साहब मुख्यमंत्री से मिलने तो गए लेकिन हमारे शिष्टमंडल को समय दिलाने के लिए नहीं बल्कि प्रधान पद पर अपना टांका फिट करने के लिए. उन्होंने मुख्यमंत्री से मिलकर तारासिंह के बारे में हजुरसाहिब में उठे असंतोष का हवाला देकर अगलीबार कलम ग्यारह का उपयोग कर अपने को हजूर साहिब बोर्ड का प्रधान नियुक्त करने की मांग कर डाली. यही नहीं प्रधान पद के बदले कुछ सौदेबाजी के पैतरे बिछा दिए.
मुख्यमंत्री महोदय ने तारासिंघ को बुलाकर उनका त्यागपत्र मांग लिया. उसके बाद भूपिंदर सिंह मिन्हास ने गुरुद्वारा बोर्ड के तीन सदस्यों के चुनाव के दौरान संगत का ध्यान बटाकर अपने पासे मजबूत करने शुरू कर दिए. एसजीपीसी से मेंबरशिप त्यागकर सांठगांठ कर सरकारी प्रधान बनने की नीति अपना ली. एसजीपीसी के सदस्य के रूप में गुरविंदरसिंघ बावा, परमज्योत सिंघ चाहल को अपना समर्थक रखा. औरंगाबाद में मीटिंग लेकर वहां से अपना समर्थक मेंबर चुनकर लाने का असफल प्रयास किया. यांनी मुंबई मैं बैठकर कैसे कोरम पूर्ण कर लिया जाएं इसकी सभी व्यवस्थाएं जुटा ली. तारासिंह भी उनके साथ और इकबालसिंघ भी उनके साथ. बस नांदेड़ के एक दो मेम्बरों को अपनी ओर करने की कोशिश और मुंबई में बैठकर शासन चलने की पूरी योजना लगभग पूर्ण.
मिन्हास जी ने तखत साहब के परिसर में बैठकर हमसे वादा किया और मुकर गए. यही नहीं तखत का प्रधान बनने के लिए उन्होंने जो पैंतरे अपनाएं, वो हजुरसाहिब के लोगों को नीचे दबाने का बंदोबस्त हैं. ये सब किसलिए. क्या एस.जी.पी.सी. का यह अंदरूनी खेल हैं? या मिन्हास एस.जी.पी.सी. को भी उपयोग में ला रहे हैं? छल और बल का प्रयोग कर तखत साहब का प्रधान बनने की यह नीति सरकार की आदतें बिगाड़ने वाली हैं. क्या मोल दे रहे हैं वो प्रधान पद का सरकार को? तारासिंह की बातों पर यकीन किया जाएं तो बेहद शर्मसार करनेवाले तथ्य सामने आ रहे हैं. ऐसी ओछी राजनीति करनेवाले और झूठे वायदे कर धोखेबाजी करनेवालों को यहाँ का प्रधान बनने की कोई जरुरत नहीं हैं. प्रधान तो क्या उन्हें बोर्ड का मेंबर भी नहीं बनना चाहिए.
तखत साहब की पवित्रता का बनाये रखने के लिए संत बाबा बलविंदर सिंघजी और संत बाबा प्रेमसिंघजी की अगुवाई में हजुरसाहिब के अमृतधारी सिखों ने गुरुद्वारा बोर्ड कानून की कलम ग्यारह हटाने के लिए आंदोलन का मार्ग अपना लिया हैं. रहत मर्यादा की उपेक्षा करनेवालों ने अब इस बोर्ड की तरफ बुरी नजर डालने से पहले अपनी नियत के विषय में सोच लेना चाहिए.
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