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बुधवार, 2 जनवरी 2019

बुंगई, कुंजीवाले और महाजन मेंबर बनें !


रविंदर सिंघ बुंगई, मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले और गुरमीत सिंघ महाजन चुनाव में सफल 

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के नतीजे मिले-जुले
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क्या पाया हजुरसाहिब के सिखों ने चुनावों से? 
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रविंदर सिंघ मोदी 

तखत सचखंड श्री हजूर अपचलनगर साहिब बोर्ड के चुनावों के नतीजें ता. ३१ दिसंबर, २०१८ को साधसंगत के सामने प्रस्तुत हुए हैं. तीन सीटों के चुनाव के नतीजें मिलेजुले आये हैं. मतदाताओं ने अपने प्रतिनिधि के रूप में सरदार रविन्दरसिंघ बुंगई, मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले और गुरमीतसिंघ महाजन को चुना हैं. जनता जनार्दन हैं इसलिए नतीजों पर कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. 
मतदान से पूर्व ही रविन्दरसिंघ बुंगई ने प्रचारतंत्र प्रभावी रखते हुए मानों जीत दर्ज कर ली थी. सर्वाधिक वोट लेकर उन्होंने बड़ी जीत हासिल की. सरदार गुरमीत सिंघ महाजन ने लगातार दूसरीबार जीत दर्ज कर अपना सिक्का मनवाया. वहीँ नए चेहरे के रूप में सरदार मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले ने मतदाताओं का विश्वास जीत लिया. हमें युवा नेतृत्व मिला हैं. तीनों ऊर्जावान हैं और उनके पास संघटन शक्ति हैं. यदि योजना और दृढ़ निश्चय कर लिए जाये तो ये युवा नेता बहुत कुछ सकारात्मक कर सकते हैं. तीनों सदस्यों को नए पर्व के लिए हार्दिक शुभकामनाएं. 
विगत सव्वा महीने से तीन सदस्य चुनाव को लेकर चली राजनीतिक गहमागहमी अब समाप्त हो चली हैं. इस बार देखा गया कि बड़ी संख्या में युवा वर्ग ने चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया. रिश्तेदार, मित्र और परिचित सव्वा महीने तक व्यस्त दिखाई दिए. गुरुद्वारा बोर्ड के चुनावों ने इस बार विधानसभा के प्रचार को भी पीछे छोड़ दिया लगता. सम्पूर्ण नांदेड़ नगरी बैनर और पोस्टरों से पट गई थी. गुरुद्वारा के चारों ओर चुनाव प्रचार की धूम मची हुई थी. चुनाव प्रचार के लोभ से विधायक तारासिंह एंड कंपनी भी खुद को रोक नहीं पायी. मुंबई से मतदाताओं से संपर्क जारी था. दूसरी ओर इस चुनाव में साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल भरपूर दिखाई दिया. पानी की तरह पैसा बहाया गया. युवा वर्ग को चुनाव प्रचार का अच्छा तजुर्बा मिल गया कहा जाये तो गलत नहीं होगा. लेकिन चुनाव समाप्त होते ही कुछ लोग जरूर बेरोजगार हो गए हैं. 
चुनाव जीतकर सदस्य बने नए तीनों नवसदस्यों को फिर एक बार मुबारकबाद. तीनों सदस्यों पर हजूरी सिखों के नेतृत्व के एक जिम्मेदारी हैं. यदि सभी स्थानीय सदस्य एकजुट होकर रहते हैं तो निश्चित ही स्थानीय सिखों का और विशेषकर गुरुघर का भला कर सकते हैं. किसी भी सदस्य को यह समझाने की जरुरत नहीं कि उसकी जिम्मेदारी क्या हैं और गुरु महाराज से वफ़ादारी क्या हैं. साधसंगत की अपेक्षाएं बहुताधिक नहीं हैं. लेकिन फिर भी उन अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं हो पा रही हैं क्योंकि गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पराधीन हो चली हैं. जब तक इस संस्था के अध्यक्ष पद पर सरकारी नियुक्त प्रधान बैठा हैं तब तक कोई भी सदस्य छाती ठोंककर ये नहीं कह सकता कि यह संस्था उनकी हैं. जिसका मुख्य कारण है वर्ष २०१५ में हुए गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट संशोधन अनुसार कलम ग्यारह  (११) में हुआ बदलाव और सत्तांतर. बाद में स्थानिक सिखों के साथ किया गया सरकारी अध्यक्ष द्वारा की गई दो गुटों की राजनीती. हूकूमशाह की तरह गुरुद्वारा एक्ट में दुबारा कलम ६ में संशोधन की खुरापात. दूसरे हजूर साहिब की स्थानिक संस्था में बढ़ा सरकारी हस्तक्षेप. भविष्य में भी ये खुरापाती प्रवृत्ति के लोग तखत सचखंड श्री हजूर साहिब का नेतृत्व बाहरी शक्तियों को सौंप देंगे इसमें कोई दो राय नहीं हैं. ऐसे में १९५६ में हजूर साहिब के वफादार सिखों द्वारा पंजीकृत करवाई गई संस्था मुंबइयाँ नेता और व्यापारियों का सत्ता केंद्र बन गई हैं. अब नए सदस्यों की जिम्मेदारी बनती हैं की वे न बाहरी लोगों के चुंगल में फंसी हमारी संस्था को स्वतंत्र करें. साथ ही यहाँ की गरिमा कायम रखने के लिए बोर्ड की छवि भी स्वच्छ और सुन्दर बनायें. जैसे कि सभी ने कलम ग्यारह के खिलाफ लड़ने का आश्वासन अपने मेनिफेस्टो में दिया हैं. उस अनुसार उनके द्वारा कलम ग्यारह के संशोधन को पूर्ववत कर अपना प्रधान चुनने का विकल्प उपलब्ध करवाएं. 
मैं बहुत ही जिम्मेदारी के साथ और दुःखी मन से ये बात कह रहा हूँ कि किसी भी सन्माननीय मेंबर के नाम के साथ किसी का मोहरा या किसी का प्यादा या किसी का आदमी जैसे विशेषण योग्य प्रतीत नहीं होते. हर सदस्य की अपनी गरिमा हो तो हजूरी सिखों का मस्तक भी शान से ऊँचा उठ जाता है. यदि कोई पद और टेंडर की लाचारी में अपने माथे पर किसी का लेबल लगाकर स्वयं को गुरु घर का सेवक या प्रतिनिधि जताने की हिमाकत करता हैं तो निश्चित ही बीते चुनावों का कोई अर्थ नहीं रह जाता. आपको प्रतिनिधि या नेता चुनकर साधसंगत ने क्या पाया इस पर गहरा मंथन जरुरी हो जाता हैं. 
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