गुरुद्वारा बोर्ड संस्था से हाथ धोएगा हजूरी समाज?
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| तखत सचखंड श्री हजूर अबचल नगर साहिब, नांदेड़ |
रविंदरसिंघ मोदी
मैंने अपनी पत्रकारिता के तीस वर्षों में हजूर साहिब के हजूरी समाज को इतना बेबस और कमजोर कभी नहीं देखा. हजुरसाहिब के बाशिंदों में राजनीतिक एवं सामाजिक बिखराव स्पष्ट रूप से झलक रहा हैं. पिछले सात - आठ वर्षों से गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था का संचालन बाहरी लोगों के हाथ होने से समाज का अर्थकारण भी प्रभावित हो गया हैं. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बोर्ड की सत्ता हांकनेवालों ने प्रबंधन के नाम पर अधिक गोरखधंदा ही संचालित किया. सन 2018 - 19 के चुनावों ने समाज को दो से तीन धड़ों में विभाजित कर दिया था. जिससे एक लंबे समय से समाज बँटा हुआ देख रहा हूँ. राजनेताओं के लिए कुछ नया करने हेतु कोई माध्यम उपलब्ध नहीं रहा. समाज से संबंधित कोई सामाजिक प्रोजेक्ट भी नहीं है इसलिए एक बिखरे हुए समाज का चित्रण अभिव्यक्त करना कठिन नहीं होगा.
मैं स्पष्ट रूप से यह आकलन कर पा रहा हूँ कि हजुरसाहिब के स्थानीय बाशिंदों के हाथों से गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड संस्था छीन ली जा रहीं हैं. हमें कलम ग्यारह के विषय में उलझाएं रखकर मुंबई की षडयंत्रकारी शक्तियां बोर्ड कानून का सबसे घातक संशोधन करवाने की योजना पर काम कर रही हैं. मुंबई और ठाणे के सदस्य भर्ती के साथ बारह का बहुमत हाथ रखने का षड्यंत्र! जिसके चलते, अब हजुरसाहब के लोगों के हाथों से बोर्ड का प्रबंधन हमेशा हमेशा के लिए निकल जाने वाला है मानलो! आनेवाले समय में सिंघ सभा गुरुद्वारों से बोर्ड की सत्ता हाँकी जायेगी और हजुरसाहिब के लोग विवशता के घूँट पीकर रह जायेंगे. वह दौर लादने की जिद्दी कोशिश मुंबई और ठाणे से की जा रहीं हैं. जिनके बाल - बच्चे सिर मुंडे हैं, जिनके घर शराब बंटती हैं वें लोग हजुरसाहिब का प्रशासन चलाने के लिए दंड बैठकें पेल रहें हैं.
हजुरसाहिब के स्थानीय लोगों में और मुंबई के हाईप्रोफाइल सिखों की जीवनशैली और सोंच में काफी अंतर है. कुछ बातें कड़वी लग सकती हैं लेकिन सच कहना ही होगा. नांदेड़ के सिखों की कोई राजनीतिक पहचान कायम नहीं हैं. नांदेड़ में राजनीतिक पार्टियों ने सिखों को पार्टी में कोई अच्छा ओहदा भी नहीं दें रखा हैं. शहर उपाध्यक्ष पद से ज्यादा क्या दिया गया हैं. ऐसे पद नाम के लिए होते हैं. पार्टियों के पास चार से छह उपाध्यक्ष, चार से पांच सेक्रेटरी या अन्य कनिष्ठ पद होते हैं. उससे ज्यादा कुछ नहीं दिया जाता हैं. यह पद भी इसलिए कि आगे पीछे घूमने और सिखों की शक्ति का इस्तेमाल किया जा सकें. सिखों की पहुँच यहाँ के नेताओं के घर तक ही बन पाती हैं.
दूसरी ओर मुंबई, ठाणे और पुणे के सिखों की राजनीतिक पहुँच बहुत बड़ी होती हैं. उनके संबंध सीधे मंत्रियों और मुख्यमंत्री तक होते हैं. उन्हें बादल, सिरसा और धामी जैसे नेताओं का सहयोग प्राप्त हो जाता हैं. यहाँ हम एक विधायक नहीं खोज पाए कलम ग्यारह के प्रस्ताव को विधानसभा में प्रस्तुत करने के लिए और उधर उनके लिए मुख्यमंत्री या उपमुख्यमंत्री के घर पहुंचना आसान हैं. उनके लिए रामदेव बाबा भी योग छोड़कर सिफारिशें करने के लिए दौड़ते हैं. उन राजनीतिक प्रवृत्ती के सिखों के पास पैसों का जुगाड़ भी कठिन नहीं हैं. उनके साथ हमारी प्रतियोगिता हो नहीं सकती. ऐसे बाहरी लोग चाह रहें हैं कि हजुरसाहिब बोर्ड उनके अख्तियार में रहें. हमेशा, हमेशा के लिए रहें.
हजुरसाहिब की धरती पर सन 1708 से ही सिखों का निवास हैं. दशमेश पिताजी की उर्जास्थली की सेवा और रख-रखाव पंजप्यारे भाई दयासिंघजी और भाई धरमसिंघजी के मार्गदर्शन में होता रहा. उनके पश्च्यात भी सिखों ने यहाँ समर्पण के साथ अपनी सेवाएं प्रदान की. सन 1831 के बाद शेर - ए - पंजाब महाराजा रणजीतसिंघजी की लाहोरी खालसा फौज का यहाँ आगमन हुआ और सिखों की आबादी में थोड़ा इजाफा हुआ. कालान्तर से सिख समुदाय मराठवाड़ा, तेलंगाना, कर्नाटका तक विस्तारित होता चला गया. जिसे हम दक्खन देश कहते हैं और इस क्षेत्र के निवासी दक्खनी !
हजुरसाहिब के सिक्खों को दक्खनी नाम पंजाबियों ने दिया. हजूरी तो हम स्वयंघोषित हैं. हजूरी संस्कृति का कोई मजबूत खाका अमल में नहीं होने से हम यह कह सकते हैं कि अभी हमारी संस्कृति युवा नहीं हुईं है. हमें अभी लंबा सफ़र तय करना है. सफ़र आसान नहीं हैं. हजूरी अथवा दक्खनी संस्कृति पर बस आक्रमण ही आक्रमण होने हैं. दक्खन को पंजाब बनाने की कोशिशें हर पल होती रहेगी. कालान्तर से हम हजूरी बनें रह पाएंगे क्या यह भी प्रश्नचिन्ह है? सबसे पहले आपकी संस्था छीन लीं जायेगी पश्च्यात संस्कृति.
आप सभी का दर्द कलम ग्यारह का वो संशोधन है जिसके आधार पर गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड पर सीधे सरकारी प्रधान लादें जा रहें हैं. सरकार ने सन 2015 में स्व. तारा सिंघ (तत्कालीन विधायक, मुंबई) को पहला प्रधान बनाकर भेजा. तीव्र विरोध हुआ. लेकिन एसजीपीसी की अंदरूनी सहायता से तारासिंह सफल रहा. एसजीपीसी का मीत प्रधान साथ में लेकर उसने खूब दादागिरी से प्रशासन चलाया. कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने के चॉकलेट तारासिंह बार - बार देता था. लेकिन उसने कलम का संशोधन पीछे लेने के बजाय कलम 6 का विस्तार कर मुंबई और ठाणे के सदस्य बढ़ाने का ख़तरनाक खेल खेला था. उस समय हजुरसाहिब की साधसंगत को मैंने समय पर अगाह किया और अख़बारों में लेख लिखकर जागरूकता बधाई. स्थानीय सिखों के बहुत विरोध के बाद कलम 6 का बिल सरकार ने बगैर कन्फर्मेशन किये छोड़ दिया. तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि वो बिल अपने आप लैप्स हो जायेगा. पता नहीं चल पाया कि आगे क्या हुआ. उस बिल को छह माह में अपने आप लैप्स हो जाना चाहिए था. कानून है! यह विषय सबसे बड़ा ख़तरा बना हुआ हैं. मुंबई स्थित एसजीपीसी के सदस्य उसी पुराने बिल को फिर से जिन्दा करने की कोशिश कर रहें हैं. ऐसे में कलम ग्यारह तो हर हाल में रद्द करवानी पड़ेगी, क्योंकि उसे हटाकर ही बोर्ड पर बाहरी लोग सत्ता कर पाएंगे. इस तरह से एक लंबी सोंच मुंबई की इन हस्तियों द्वारा अपनाई जा रहीं हैं.
पिछले आठ साल में बार - बार वायदे कर मुकर जाने वाले लोग अब मीटींग करवाकर समाज को उलझाने के प्रयास में हैं. एसजीपीसी वाले हर हाल में बैठक करवाने पर आमदा है. उन्होंने अभी हाल ही मुंबई में बैठक करवाने का प्रयास किया था पर हजुरसाहिब से वहां कोई गया नहीं. पश्च्यात अब रणजीतसिंह कामठेकर के माध्यम से नांदेड़ के सीटी प्राइड होटल में एक मीटींग रखीं गई हैं. हम यह तर्क रख सकते है कि सरदार रणजीतसिंह कामठेकर हजूरी संस्कृति अंश है. फिर भी यह विश्वास के साथ कहा नहीं जा सकता कि वें हजुरसाहब के पक्ष में पहल करेंगे या एसजीपीसी के पैटर्न का. रणजीतसिंह कामठेकर कभी भी, किसी हाल में सरदार परमज्योतसिंघ के खिलाफ भूमिका नहीं अपना सकते, यह शाश्वत सत्य है. जब यह आलम है, तब सिटी प्राइड की बैठक आयोजन के पीछे का मकसद क्या होगा इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है.
दिलचस्पी इस बात की रह जाती है कि बैठक में उपस्थित होने वाले सभी लोग उस हजूरी संस्कृति की आन लेकर बैठक में बैठनेवाले हैं क्या? ये लोग एसजीपीसी की खूँटी पर कहीं दक्खनी संस्कृति टांगने तो नहीं चलें हैं? हमारी समस्याएं, हमारे प्रश्नं यहीं छटपटा रहें हैं. समाज के बहुत सारे ज्वलंत प्रश्नं हैं. सवाल है कि ऐसी बैठक स्थानीय हजूरी लोगों द्वारा रखीं जानी चाहिए थीं. जिसमें एसजीपीसी का कोई तत्व उपस्थित ना होने पाए. हमें खुलकर दक्खनी सिखों की समस्या पर बोलने का मौका तो मिलें! हजुरसाहिब के स्थानीय लोगों को चाहिए कि वें पुरी क्षमता के साथ कलम ग्यारह के पिछले संशोधन को रद्द कर बोर्ड 1956 एक्ट को पहले की जैसा करें. इसके लिए हजुरसाहिब के लोगों को एकजुटता का परिचय देते हुए स्वतंत्र पहल करनी चाहिए.
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