लेख : हिन्दी दिवस
उपराष्ट्रपति जी का वो हिंदी में दिया गया संस्मरणीय भाषण !!
भाषा के प्रति सोच में बदलाव जरुरी
हिंदी समृद्धि की ओर !
रविंदरसिंह मोदी
बात वर्ष 2017 की है. मैं, हैदराबाद स्थित दक्षिण भारत हिंदी प्रचारसभा (विश्वविद्यालय) द्वारा खैरताबाद के श्री सत्यसाई ऑडिटोरियम में आयोजित दीक्षांत समारोह में पत्रकार दीर्घा में आमंत्रित पत्रकार अतिथि के रूप में उपस्थित था. दीक्षांत समारोह को महामहिम उपराष्ट्रपति श्री व्यंकय्या नायडू संबोधित कर रहे थे. उनका हिंदी में दिया गया भाषण सुन कर मैं तो क्या वहाँ उपस्थित हर कोई अभिभूत हो उठा.
लगभग सौ वर्ष पूर्व महात्मा गांधीजी द्वारा स्थापित संस्था दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा का यह सोलहवां दीक्षांत समारोह था. कार्यक्रम में आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और अन्य स्थानों से प्रतिनिधि, विद्यार्थी और शिक्षा क्षेत्र की बड़ी बड़ी हस्तियां उपस्थित थीं. उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू की उपस्थिति उस कार्यक्रम की गरिमा बढ़ा रहीं थीं. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व कुलपति एवं पूर्व राज्य सभा सांसद श्री एच. हनुमंत्तपा, तेलंगाना प्रदेश के उप मुख्यमंत्री श्री महमूद अली, खैरताबाद के विधायक श्री चिन्तल रेड्डी, द.भा.हि.प्र. सभा के समकुलपति श्री आर.आफ. निरलकट्टी, द.भा.हि.प्र. सभा के तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के अध्यक्ष श्री पी. ओबय्या, जनरल सेक्रेटरी एस.जयराम, द.भा.हि.प्र. सभा के सचिव सी.यस. होसगौडर ने मंच साँझा कर हिंदी भाषा की समृद्धि और विकास को लेकर अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं. जो हिन्दी भाषा के प्रचार को समर्पित प्रतीत हुईं.
लेकिन उस भव्य सभा में उपराष्ट्रपति नायडू द्वारा हिंदी में दिया अभिभाषण सुनना मेरे लिए सचमुच जीवन का एक संस्मरणीय समय रहा. उस कार्यक्रम में तेलगु, तमिल भाषा और हिंदी भाषा के जानकर उपस्थित थे जो अपनी जगह सतर्क होकर उनका अभिभाषण सुन रहें थे. श्री नायडू ने अपने संबोधन में निष्पक्ष और प्रामाणिक विचार रखते हुए कहा था, 'दक्षिण भारत के कुछ प्रदेशों में हिंदी भाषा को लेकर आज भी अनावश्यक रूप से विरोध दर्शाया जा रहा हैं. हिंदी भाषा का विरोध करनेवाले, क्यों नहीं समझते कि, हिंदी भाषा में ही वो सामर्थ्य है कि भारत जैसे बहुभाषी छवि वाले देश की संपर्क भाषा के रूप में अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर नेतृत्व करें. हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जो देश और विदेशों में एक तरल और सरल भाषा बनकर सभी का पक्ष प्रस्तुत कर सकें. हिंदी भाषा परिपूर्ण और संवाद के लिए आसान जान पड़ती है.इसलिए, वास्तविकता यह है कि हिंदी भाषा में विश्व नेतृत्व करने की पूर्ण क्षमता व्याप्त है.'
श्री नायडू ने अपने बचपन का प्रसंग स्मरण करते हुए उसे सुनाया था जो दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी को लेकर किये गए विरोध का चित्रण था. नायडू सुना रहे थे, 'जिस समय हमारे पास (दक्षिण) हिंदी का विरोध शुरू हुआ था तब उस आंदोलन में मैं भी शामिल हो गया था. मैं, आंध्रप्रदेश के नेल्लूर जिले के चावतापलेम गांव में पढ़ाई कर रहा था. पता नहीं कैसे हिंदी विरोधी आंदोलन की तीव्रता हमारे उस छोटे से गांव तक आ पहुंची और हम सब उसमें शामिल हो गए. हमें पता नहीं था कि गांव-गांव हिंदी का विरोध क्यों किया जा रहा था. हम उत्सुकता के प्रवाह में कहिए, उस आंदोलन में कूद पड़े. हमने पता किया कि हिंदी को लेकर हमारे गांव में कहां-कहां कार्य हो रहे हैं. खोजबीन की तो पाया कि, हमारे गांव में केवल दो स्थानों पर ही हिंदी भाषा में लिखीं हुई तख्तियां उपलब्ध थीं. एक तख्ती डाकघर लगी हुई थी और दूसरी रेलवे स्थानक पर. उन तख्तियों पर हिंदी में गांव और स्टेशन के नाम लिखें हुए थें. हमने उस समय आंदोलन कर हिंदी भाषा में लिखीं उन दो तख्तियों पर कालिख मल दी. लेकिन उस घटना पर मन ही मन अफ़सोस उस समय हुआ, जब मैंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा. मुझे आज वो सोचकर बहुत अफ़सोस होता है की मैं उस आंदोलन का हिस्सा क्यों बना था. आज लगता है मैंने उन तख्तियों पर नहीं बल्कि अपने ही मुँह पर कालिख मल दी थी शायद.'
वेंकैया नायडू ने जब प्रमाणिकता से उपर्युक्त बात स्वीकार की, तब उस ऑडिटोरियम में एक अजीब सी शांति छा गई थी. सब लोग टकटकी लगाएं श्री नायडू को देख रहे थे. नायडू भी कुछ गंभीर भाव से सदन को निहार रहे थे. दो पल मौन रहकर श्री नायडू ने अपनी बात आगे बढ़ाई और बोले, 'मैं, आगे चलकर राजनीति में सक्रिय हो गया. राजनीति क्षेत्र में कार्य करते समय मैं यह देखकर हैरान रह गया कि देश में हर स्थान पर हिंदी भाषा का कितना महत्व है. पश्च्यात हिंदी भाषा के प्रति मन में व्याप्त मेरी भावनाएं भी बदलने लगीं. भाषा द्वेष को लेकर मेरी सोच बदल गई. उसके बाद मैंने हिंदी सीखना आरंभ कर दिया. १९९३ के बाद मैंने अच्छे से हिंदी भाषा का अध्ययन शुरू कर दिया. अच्छी हिन्दी सिखने के कारण ही भारतीय जनता पार्टी ने मुझे देश के कई राज्यों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ प्रदान की. आगे चलकर मैं, भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाया गया.'
श्री नायडू ने उस भाषण में , हिंदी भाषा के प्रति प्रचलित गलतफहमियां को लेकर चिंता भी जताई थीं. उन्होंने कहा था, 'हमें 'भाषा विरोध' के बजाय अन्य भाषा सिखने के प्रयास करने चाहिए. देशवासियों को तमिल, मराठी, तेलगु, बंगाली, कन्नड़, उड़िया जैसी भाषाएँ भी सीखनी चाहिए. क्योंकि हमारा देश बहु संस्कृतियों से लबालब है. हमें दो से तीन प्रादेशिक भाषाएँ भी आनी जरुरी हैं. मैं अंग्रेजी का समर्थक नहीं हूँ लेकिन एक भाषा के महत्व और अस्तित्व को समझता हूँ. इसलिए कहूंगा कि, अंग्रेजी से परहेज करने के बजाय अंग्रेजी मानसिकता से परहेज करना बेहतर होगा.
उपराष्ट्रपति श्री व्यंकय्या नायडू ने एक महत्वपूर्ण बात कही थी जो मेरे संस्मरण में है. उन्होंने कहा था, "मैं जीवन में चार बातों को बहुत महत्व देता हूँ, एक माँ, दूसरी जन्मभूमि, तीसरी मातृभाषा और चौथी बात मातृदेश. यह बातें उच्चारी जाये तो भीतर से आवाज निकलती है. जबकि मम्मी-डैडी जैसे शब्द होठों के सहायता से बोले जाते हैं. हमें सबसे पहले अपनी माँ से प्रेम करना चाहिए, उसका सम्मान करना चाहिए, बाद में मातृभाषा से प्रेम करन चाहिए. यह बातें हमें देशभक्ति सिखाते हैं. मैं, इस विषय में सरकार से भी बात करूँगा कि यू.पी.एस. सी. और बैंकों की परीक्षाएं अलग-अलग राज्यों में उनकी मातृभाषाओं में भी हो. हमारे प्रधानमंत्री हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए दिन-रात प्रयत्न करते रहते हैं. हिंदी के प्रचार - प्रसार के लिए जो आवश्यक होगा वो जरूर किया जायेगा. हमें महात्मा गाँधी और दिनदयाल उपाध्याय जैसे लोग, जिन्होंने हिंदी के लिए काम किया हैं उनके विचार भी पढ़ने चाहिए."
श्री नायडू द्वारा अभिव्यक्त वो भाषण, हिंदी भाषा, संस्कृति, देशभक्ति और चरित्र का प्रामाणिक स्पष्टीकरण प्रतीत हुआ था. उनके द्वारा दिया भाषण हिंदी भाषा के प्रचार - प्रसार के लिए बहुत उपयोगी प्रतीत होता है और एक उदाहरण भी कि हिंदी भाषा के समर्थन में मानसिकता में परिवर्तन भी संभव हैं. सन 1918 में महात्मा गांधी द्वारा इंदौर में पहली बार हिंदी भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने की दिशा में पहल शुरू की गईं थीं. उसी समय हैदराबाद संस्थान में भी प्रचंड विरोध के बावजूद दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा का कार्य महात्मा गांधी द्वारा प्रोत्साहित किया गया था. देश स्वतंत्र होने के बाद तिथि 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में संविधान सभा ने स्वीकार किया लेकिन पहली बार हिंदी दिवस मनाने की प्रथा सन 1953 से प्रारंभ हुई जो आज भी जारी हैं.
देश और विदेशो में हिंदी भाषा विस्तारित हो रहीं हैं. आज विश्व की दस सशक्त भाषाओं में हिंदी का भी समावेश माना जा रहा हैं. सन 2001 के भाषा सर्वेक्षण के मुताबिक विश्व में हिंदी बोलने वालों का प्रमाण 41.03 प्रतिशत था, जो सन 2011 के सर्वेक्षण में 43.63 प्रतिशत पाया गया. विगत नौ वर्षों में यह प्रमाण 50 प्रतिशत होने की संभावना मानी जा रहीं हैं लेकिन इसका स्पस्टीकरण वर्ष 2021 में ही घोषित होगा. इसमें कोई दोराय नहीं कि हिंदी भाषा का प्रचलन विश्व में बढ़ रहा हैं. हिंदी अब व्यवहार, व्यापार और सरकार की भाषा बन गई हैं. हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी जब अमरीका में हजारों, लाखों लोगों को हिंदी में सम्बोधित करते हैं, तब विदेश की धरती पर हिंदी भाषा की समृद्धि का अपने आप सूत्रपात हो ही जाता हैं. इसलिए हिंदी भाषा की समृद्धि, विस्तार और विकास के लिए देश के प्रत्येक नागरिक को सकारात्मक होना जरुरी हैं. उपराष्ट्रपति महामहिम श्री व्यंकय्या नायडू ने जिस तरह से हिंदी भाषा को लेकर सकारात्मक सोच अपनाई हैं वो देश के नागरिकों के सामने एक सक्षम उदाहरण है.
स. रविंदरसिंह मोदी
नांदेड़ (महाराष्ट्र)