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शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

श्री दशम ग्रन्थ साहब की कथा का विरोध क्यों?

 श्री दशम ग्रन्थ साहब की कथा का विरोध क्यों? 

रविंदरसिंघ मोदी 

तिथि 1/09/2020 से 8/09/2020 के दरम्यान गुरुद्वारा श्री बंगलासाहब, दिल्ली में श्री दशम ग्रंथसाहब अंतर्गत दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज की आत्मकथा पर आधारित कथा करवाई गईं. दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा यह कथा दरबार आयोजित करवाया गया था. इसलिए इस धार्मिक संस्था की सराहना होनी चाहिए, इस कार्य के लिए संस्था के अध्यक्ष विधायक मनजिंदर सिंघ सिरसा भी बधाई के पात्र है. 

श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज खालसा पंथ के सृजनहार है. उन्होंने अमृत की दात के साथ पांच ककार अंगीकृत एक विशेष पहरावा भी प्रदान किया. जिसके कारण आज भीड़ में खड़ा सिख (खालसा) आसानी से पहचाना जा सकता है. ऐसे गुरु के आत्मचरित्र 'बचित्र नाटक' की कथा का विरोध तखत श्री दमदमा साहब के पूर्व जत्थेदार (विज्ञानी) भाई केवलसिंघजी द्वारा किया गया है. अखबारों में बयान जारी कर इस कथा का विरोध और श्री दशम ग्रन्थ साहब का विरोध उन्होंने शुरू किया है. वें पंत के विद्धवान माने जाते है ! मुझे लगता है, उनका विरोध संकुचित बुद्धि का उदाहरण माना जाना चाहिए. 

तखत दमदमा साहब वो स्थान है जहाँ श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज ने श्री आदि गुरु ग्रंथसाहब की दुबारा से संपादन करवाई थीं. गुरु जी दमदमा साहब में लगभग चार वर्ष का समय लगाकर गुरूजी ने दुबारा से श्री आदि गुरु ग्रन्थ साहब जी का स्वरुप पूर्ण करवाया था. कहा जाता है कि वहां तैयार की गईं प्रतियों में से एक मुख्य स्वरुप को गुरूजी अपने साथ लेकर श्री हजुरसाहब पहुंचे थे जिस पर महाराज के दस्तखत भी मौजूद थे. तखत दमदमा साहब का इतिहास बहुत कुछ कहता है लेकिन वहां के जत्थेदार रह चूके भाई केवलसिंघ जी उस इतिहास को सुनना नहीं चाहते. लग गए अपने ही गुरु की आत्मकथा का विरोध करने! 

श्री दशम ग्रन्थ साहब सिखों के अमर इतिहास की सबसे बड़ी साक्ष्य है. यह सिख इतिहास का सबसे प्रामाणिक संदर्भ ग्रन्थ है. इससे प्रामाणिक विरासत कोई दूसरी नहीं हो सकती. अपने अंतिम समय में श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज ने श्री आदि गुरु ग्रन्थ साहब को गुरुता प्रदान कर सिखों को आदेश दिया था "अगिया भई अकाल की तबै चलायो पंथ, सभ सिखन को हुकूम हैं गुरु मानियो ग्रन्थ "

यह संदर्भ जाँच लीजिए भाई केवलसिंघ जी ! गुरु जी ने कहीं भी यह नहीं कहा कि श्री दशम ग्रन्थ को "गुरु" का संबोधन दिया जाये. ग्यारहवें गुरु तो वहीं है जिनका चयन गुरु जी ने गुरुतागद्दी के लिए कहा था. हम सब भी वहीं आदेश मानते हैं. लेकिन गुरु जी ने यह भी नहीं कहा कि उनके द्वारा रचे गए श्री दशम ग्रन्थ का तिरस्कार करो. गुरु जी द्वारा बहुत परिश्रम के साथ श्री दशम ग्रन्थ साहब की रचना की गईं जिसमें 1428 पृष्ठ शामिल हैं. इस अद्धभुत ग्रन्थ में सभी धर्मो की जानकारी प्रदान की गईं हैं. गुरूजी के जीवन काल के समय में अध्यात्म क्षेत्र में जितने अवतार और धार्मिक कथाएं प्रचलित थीं, उनको गुरूजी ने अध्यन कर सिखों के लिए इस ग्रन्थ के माध्यम से प्रस्तुत की जो साहित्य का अद्धभुत और बहुगुणी उद्धारहण माना जाना चाहिए. 

खालसा पंथ की दीक्षा में जो अमृतपान करवाया जाता हैं, वो अमृत पांच बाणियों के मंथन से सृजित करने की प्रथा हैं. उन पांच बाणियों से श्री दशम ग्रन्थ साहब की तीन बाणिया भी शामिल हैं, जहाँ तक श्री हजूर साहब की अमृतपान शैली का समावेश हैं. भाई केवलसिंघजी को अमृत की दात प्राप्त करते समय ही विचार करना चाहिए था कि खालसा जीवन शैली का बुनियादी मापदंड श्री दशम ग्रन्थ साहब की नींव पर निर्भर हैं. अब इस उम्र में, क्या सिक्खी त्यागोगे? 


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