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बुधवार, 20 मार्च 2019

मनहास का हजुरसाहिब में पहला कदम ही राजनीतिपूर्ण 
मनहास और उनके समर्थकों से हैं आंदोलनकारियों की जान को खतरा !
रविंदर सिंघ मोदी 


तखत साहब के आदरणीय पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता का उल्लंघन कर भूपिंदर सिंघ मिनिहास ने महाराष्ट्र सरकार से गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड का प्रधान पद मांगकर ले लिया. ता. २१ जनवरी, २०१९ को आदरणीय पंजप्यारे साहिबान ने गुरुद्वारा बोर्ड कानून की धारा ग्यारह का संशोधन रद्द करने का गुरुमत्ता पास किया था. साथ ही कलम ग्यारह से कोई गुरु सिख प्रधान पद प्राप्त न करे यह भी कहा गया था. पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता को हजूर साहिब के अधिकत्तर उत्साही सिखों ने श्रद्धा सहित मान लिया. कुछ समीकरण वाले और लालची लोग समीकरण में व्यस्त हो गए. जिनमें भूपिंदर सिंघ मिनिहास सबसे अग्रणी रहे. क्योंकि वें शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के गुप्त एजंडा पर चल रहे थे. हरसिमरत कौर बादल, सुखबीर सिंघ बादल और प्रकाश सिंघ बादल ने कलम ग्यारह के विषय को और पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता का राजनीतिक उपयोग कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर दबाव डालकर कलम ग्यारह के तहत भूपिंदर सिंह मिनिहास को गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनाने के समीकरण सामने किया. विधायक सिरसा (दिल्ली) की भूमिका भी संदिग्ध रही. देवेंद्र फडणवीस ने हजूर साहिब सिखों की जनभावना को दरकिनार कर, जनांदोलन की घोर उपेक्षा कर कलम ग्यारह को नहीं हटाया बल्कि उसके जरिये ही जबरन भूपिंदर सिंघ मिनिहास को प्रधान बनाया. महाराष्ट्र सरकार ने एक तरह से नौ सदस्यों का बोर्ड घोषित कर असंवैधानिक रूप से बोर्ड घोषित किया. क्योंकि बोर्ड कानून की अनुपालना के तहत महाराष्ट्र सरकार ने सरकार मनोनीत दो सदस्यों की संख्या होते हुए भी उसमें से एक पद पर मिनिहास की नियुक्ति कर डाली. अन्य एक पद क्यों घोषित नहीं किया गया ? हैदराबाद प्रतिनिधि का नाम उपलब्ध होते हुए भी उस नाम को बोर्ड में स्थान नहीं दिया गया. मुख्यमंत्री ने वैसा बोर्ड घोषित किया जैसा कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को चाहिए था. यह एक तरह से नांदेड़ के भूमिपुत्रों के साथ अन्याय नहीं तो क्या ? मुख्यमंत्री ने दस बार आश्वसन दिया लेकिन कलम ग्यारह रद्द नहीं की. खैर, भूपिंदर सिंघ मिनिहास गुरुमत्ता का उल्लंघन कर प्रधान बन गए. इसका अर्थ ये होता हैं की वे तनखैया सजा के भी पत्र हो गए. लेकिन बोर्ड के कुछ सदस्यों को ढाल बनाकर मिनिहास हजूर साहिब भी पहुंच गए. ता. १८ मार्च २०१९ को उनका हजूर साहिब आगमन हुआ. उससे पहले नांदेड़ की पुलिस ने कलम ग्यारह से जुड़े तेरह लोगों को ये कहकर पाबंद करने की कार्यवाई शुरू की कि , उनसे मिनिहास को खतरा हैं. ये शिकायत गुरुद्वारा बोर्ड कार्यालय द्वारा की गई. भूपिंदर सिंघ मिनिहास ने चार्ज भी नहीं संभाला कि राजनीती शुरू कर दी. गुरुद्वारा कार्यालय के उस दिन के प्रभारी अधीक्षक रणजीत सिंघ चिरागिया और प्रशासकीय अधिकारी डी. पी. सिंघ ने शिकायत कर समाज के तरह लोगों को जैसे अपराधी के कटघरे में खड़ा कर दिया. जिसका उद्देश्य क्या था और क्यों ये अधिकारी इतने राजनीतिक रूप से समाज के खिलाफ भूमिका में उतर आये, उनका क्या हित था इस विषय का चिंतन होना चाहिए. मिनिहास का कहना था की उन्होंने कोई शिकायत नहीं की थी और ना गुरुद्वारा कार्यालय को निर्देश कदिया था. फिर इस घटना के पीछे कौन है ? अधीक्षक गुरविंदर सिंघ वाधवा उस दिन छुट्टी पर थे या जानबूझकर साइड में रहकर ये करवा रहे थे ये भी सोचना होगा. एक तनखैया पत्र व्यक्ति के लिए इतना सब ? उससे बड़ी बात ये कि कलम ग्यारह रद्द करने के लिए पंजप्यारे साहिबान ने जीन सात सदस्यों की समिति का गठन किया उसमें भी मिनिहास सदस्य हैं. हजुरसाहिब आने के बाद मिनिहास द्वारा कलम ग्यारह रद्द करने के लिए मीटिंग लेना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने गुरुमत्ता की उल्लंघना विषय में भी पंजप्यारे साहिबान से माफ़ी नहीं मांगी. ना हजूर साहिब के लोगों से माफ़ी मांगी. मिनिहास का होली मनाने आने की बात कहकर सभी यात्री निवासों की इमारतों का निरिक्षण करना, गुरु नानक मार्केट की ईमारत का निरिक्षण करना और कुछ मार्किट गिराकर नए बनाने जैसे बातें करना ये सब को संकेत करता है कि मिनिहास ने हजुरसाहिब के कुछ लोगों को मैनेजिंग कमिटी का मेंबर बनाने का लालच देकर कलम ग्यारह के आंदोलन को कुचलने की  पूरी योजना बनाई थी और उसके ऊपर ही वे अमल कर रहे हैं. अब नांदेड़ के जिन सिखों के खिलाफ पुलिस में करवाई की शिकायत की गई उसका अर्थ कुछ लोगों को डराना और आंदोलन से जुड़े अच्छे चरित्र के लोगों की छवि ख़राब करना था. जिस तरह की राजनीति भूपिंदर सिंघ मिनिहास और  उनके समर्थकों ने शुरू की हैं वो हजूर साहिब के लोगों के लिए घातक हैं. प्रत्यक्ष में कलम  ग्यारह के आंदोलन में सक्रीय कार्यकर्तों के लिए तो बहुत घातक हैं. एक तरह से आंदोलनकारियों पर अत्याचार और दादागिरी हैं. मुख्यमंत्री की निकटता का लाभ उठाकर मिनिहास ये सब कर रहे हैं. उनके पास आंदोलनकारियों से निपटने के लिए करोड़ों और अरबों रूपये हैं. बड़े - बड़े लोग उनके इर्द गिर्द हैं. जिन लोगों के सहारे नांदेड़ में भूपिंदर सिंह मिनिहास ने  अपने पहले कदम पर ही दादागिरी की राजनीति  की शुरुवात की हैं वो कलम ग्यारह के आंदोलन से जुड़े सक्रीय कार्यकर्तों के लिए जान से खतरे के संकेत हैं. मेरे जैसे सक्रिय और बुद्धिजीवि तो इनके लिए राह का सबसे बड़ा कांटा माना जा रहा हैं. निश्चित ही भूपिंदर सिंघ मिनिहास हजूर साहिब बोर्ड की सत्ता  पाने के लिए हम जैसे कार्यकर्ताओं का घात करवा सकते हैं. गुरुद्वारा बोर्ड के संगत  में  से निर्वाचित दो सदस्यों को भी भविष्य में खतरें पेश आ सकते हैं. क्योंकि नांदेड़ के इस बोर्ड की बैठकें मुंबई में रखी जाती हैं. कुलमिलाकर हजूर साहिब के इस गरिमामय बोर्ड पर बाहर के लोगोंने साम दाम और दंड भेद से कब्ज़ा कर लिया हैं. महाराष्ट्र सरकार ने हजुरसाहिब के लोगों को न्याय देना चाहिए. वहीँ नांदेड़ और मुंबई के पुलिस विभाग द्वारा भी नांदेड़ के सिखों को न्याय देकर उनकी रक्षा करनी चाहिए ऐसी मांग हजूर साहिब से उठ रही हैं. 
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मंगलवार, 12 मार्च 2019

मोदी - राज में महाराष्ट्र सरकार कर रहीं हैं सिखों पर अत्याचार 
नांदेड़ गुरुद्वारा पर फिर लादा गया सरकारी अध्यक्ष
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प्रधानमंत्री मोदी भी प्रश्न करे कि सिखों की संस्था का लोकतंत्र क्यों छिन लिया गया 
रविंदर सिंघ मोदी 

देश में सभी तरफ मोदी के कार्यों की प्रशंसा करने के लिए लोग प्रतियोगिता कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर मोदी के प्रसंशक उनकी तारीफ का कोई मौका नहीं चूकते. लेकिन दूसरी ओर मोदी सरकार के राज में महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार का सिखों पर अत्याचार जारी हैं. ता. ९ मार्च, २०१९ के दिन महाराष्ट्र सरकार ने नांदेड़ के गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड संस्था पर दुबारा से सरकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया. जबकि विगत चार सालों से नांदेड़ के सिख बराबर से गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पर सरकार द्वारा किये जा रहे अध्यक्ष नियुक्ति का विरोध उठाकर रखा हुआ हैं. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्वयं आठ से दस बार सिख समाज को आश्वासन दिया था कि गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड संस्था कानून १९५६ की धारा ग्यारह में किया गया संशोधन रद्द कर दिया जायेगा. लेकिन मुख्यमंत्री ने सभी आश्वासनों से मुकरते हुए अपने करीबी,  व्यवसायी भूपिंदर सिंघ मिन्हास को गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान नियुक्त कर दिया. 
फाइल फोटो 
मुख्यमंत्री ने इस समय अल्पसंख्यक सिखों पर रौब कसने और "हम करें सो कायदा" का उदाहरण प्रस्तुत किया जो लोकतंत्र की प्रतिमा मलिन करता हैं. साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में ये स्पष्ट संकेत भी देता हैं कि नांदेड़ के सिखों पर सरकार इतने सालों से कैसे अत्याचार कर रही हैं. देवेंद्र फडणवीस ने एकतरफा निर्णय लेते हुए साबित कर दिया की वे जनमानस का नहीं सुनते बल्कि बिज़नेस मन ही उन्हें प्रिय हैं. 
देवेंद्र फडणवीस द्वारा कलम ग्यारह का दुबारा से प्रयोग नांदेड़ के सिखों के गले नहीं उतर रहा हैं. देश में प्रजातंत्र रहते हुए भी देवेंद्र फडणवीस ने क्यों नांदेड़ स्थित सिखों के पवित्र पावन तखत साहब श्री गुरुद्वारा तखत सचखंड हजूर साहिब संस्था को सरकार के नियंत्रण में कर लिया. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने ता. १८ फरवरी, २०१५ के दिन गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड कानून १९५६ की धारा ग्यारह में बदलाव करते हुए संस्था पर अध्यक्ष नियुक्त करने का निर्णय अपने अधीन कर लिया. जबकि १९५६ से बोर्ड के सत्रह सदस्य मिलकर अपना प्रधान चुनते थे. इस बात की गंभीरता देखते हुए जनमानस (साधसंगत) की मांग पर तखत साहब के आदरणीय पंजप्यारे साहिबान ने संस्था को सरकारी अधिपत्य निकालकर लोकतंत्र बहाल करने के लिए धार्मिक गुरुमत्ता भी पारित किया. उस गुरुमत्ता के तहत संतबाबा बलविंदर सिंघजी कारसेवा वाले और संत बाबा प्रेमसिंघजी माता साहेब वाले इस आंदोलन के नेतृत्व कर रहे हैं. लेकिन इतने आंदोलन होने के बावजूद भी सरकार ने सिखों की नहीं सुनी. 
उल्लेखीनय हैं कि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वयोवृद्ध विधायक तारासिंह को संस्था का प्रधान बनाने के लिए जबरन ये कानून पास करवाया था. यह कानून पारित होने के बाद से जनमानस द्वारा लगातार सरकारी निर्णय और कानून संशोधन का विरोध किया जाता रहा. लेकिन राजनीतिक क्षमता का उपयोग कर मुख्यमंत्री और भाजपा द्वारा हमेशा सिखों की मांगों को दरकिनार कर दिया गया. अब जबकि कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने का समय था तो मुख्यमंत्री ने आश्वासन देकर भी फिर से अपने निकटवर्तीय को प्रधान बनाया और नांदेड़ ही नहीं मराठवाड़ा के सक\सिखों पर अत्याचार कर दिया. आखिर मुख्यमंत्री यह संस्था अपने अधीन क्यों रखना चाहते हैं? नांदेड़ के सिख तो पूछ ही रहे हैं. लोकप्रिय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी श्री देवेंद्र फडणवीस से पूछे कि सिखों के प्रति लोकतंत्र क्यों समाप्त कर दिया गया हैं. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने क्यों ये संस्था अपने कब्जे कर रखी हैं? अल्पसंख्यंकों के साथ सौतेला व्यव्हार क्यों हो रहा हैं? सरकार होने का अर्थ क्या किसी एक जातिसमूह पर दादागिरी होता है? महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने गुरुघर के साथ और नांदेड़ के सिखों के साथ आक्रांताओं जैसा व्यवहार शुरू किया हुआ हैं. मोदी जी क्या आप कुछ नहीं कर सकतें?   

गुरुवार, 7 मार्च 2019

आखरी मीटिंग, आखरी दाँव ?
कलम ग्यारह पर तारासिंह की नकारात्मक भूमिका 
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रविन्दरसिंघ मोदी 

फरवरी के अंतिम सप्ताह में महाराष्ट्र विधानसभा का अधिवेशन दो दिनों में लपेट दिया गया. हम सोंच रहे थे कि अधिवेशन में गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड कानून में संशोधित और बहुचर्चित कलम ग्यारह (११) का विषय चर्चा पटल पर रखकर हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जायेगा. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. अधिवेशन और चलता और राजस्व विभाग के विषयों में ये विषय रखकर या प्रश्न पूछकर उसपर चर्चा कर संशोधन रद्द करने का निर्णय लिया जाता. 
दूसरा कारण ये भी कहा जा सकता है कि, गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान और आदरणीय विधायक तारा सिंह द्वारा कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाने के लिए कोई पहल नहीं की गई. उन्होंने कलम ग्यारह हटाने के लिए महाराष्ट्र सरकार को कोई लिखित प्रस्ताव भी नहीं दिया. उन्हें एक सिख विधायक कहा जाता है, लेकिन सभागृह के एकमात्र सिख विधायक ने कोई स्पष्ट भूमिका नहीं अपनाई, बल्कि कलम ग्यारह के विषय से बचने के लिए उन्होंने शायद लीलावती अस्पताल का उपयोग कर लिया. लीलावती अस्पताल वैसे तारा सिंह का आरामगाह कहा जाना चाहिए. जब भी तबियत ख़राब होती है या कोई टेंशन होता है तो वे लीलावती की शरण में चले जाते हैं.  
अबकी बार तारासिंह जी लम्बे समय के लिए उपचार करवाने के लिए अस्पताल में दाखिल हुए. उन्होंने उपचार लेते-लेते ही ता. १७ मार्च, २०१९ को आयोजित होनेवाली गुरुद्वारा बोर्ड मीटिंग का एजेंडा भी तय किया. वही लेटे - लेटे कर्मचारियों के निलंबन की झड़ी भी लगा दी. यहीं से जैसे उन्होंने आखरी मीटिंग का आखरी दॉँव भी खेल लिया ऐसा हम नहीं कहते बल्कि यह गुरुद्वारा बोर्ड के राजीनीतिक गलियारे में चल रही घमासान चर्चा में सबसे चर्चित मुद्दा है. कुछ मेंबर तो कानाफूसी कर रहे हैं कि तारासिंह जी कलम ग्यारह के मुद्दे का सामना नहीं करना चाह रहे थे. उन्हें कलम ग्यारह के विषय में चर्चा के दौरान स्पष्टीकरण भी देना पड़ सकता था. अधिवेशन के बहार मंत्रिमंडल की बैठक में भी कलम ग्यारह का विषय समाप्त हो सकता था. है ये बात तारासिंह जी को समझ आणि चाहिए. 
आदरणीय पंजप्यारे साहिबान ने कलम ग्यारह के विषय में सकारात्मक आदेश देने के बाद और कलम ग्यारह रद्द करवाने के आंदोलन के सूत्र संतबाबा बलविंदरसिंघजी कारसेवा वाले और संतबाबा प्रेमसिंघजी द्वारा सँभालने के बाद तो तारासिंह जी को कलम ग्यारह के लिए पहल करना चाहिए था. बल्कि तखत साहिब का हुकुम मानकर एक सिख होने के नाते कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाने के लिए लिखित प्रस्ताव पेश करना चाहिए था. लेकिन उन्होंने सरल मार्ग तय कर लिया और बजट मीटिंग का आखरी दाँव खेलने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी. बजट मीटिंग के एजेंडे में उन्होने ता. २८-०७-२०१८ की उस बैठक की प्रौढ़ता को मान्यता देने का विषय भी राजनीतिक रूप से पेश किया गया हैं. जिस बैठक का स्थानीय आठ सदस्यों ने एकजुट होकर विरोध किया था. देखना हैं कि जिस मीटिंग का विरोध किया गया था उसकी फुटकल मांगों को कौन सदस्य प्रौढ़ता देता हैं. उस बैठक का विरोध कलम ग्यारह के लिए किया गया था. स्थानीय मेंबर साहिब इस विषय में नैतिकता अपनाएंगे या तारासिंह के प्रभाव में पास पास पास कहेंगे ये देखना होगा.  
ये भी इक कड़वी सच्चाई हैं कि तारासिंह ने अपने चार वर्षों के लम्बे कार्यकाल में कई भूमिपूजन तो कर लिए लेकिन कोई मार्किट खड़ा नहीं किया. इतना बड़ा बजट ब्लॉक कर रखा. इस कार्यकाल में पास होने के बाद चार मार्किट तो खड़े हो जाने चाहिए थे. अंत अंत में संतबाबा जोगिन्दर सिंघजी मोनी सीवन क्लास की बिल्डिंग काम ज्यादा दर पर स्वीकार की गई. काम देने के लिए भी तारा सिंह जी का एकाधिकार चर्चा का विषय रहा था. खैर....... अब फिर से नए मार्किट का विषय बैठक में रखा गया हैं! उम्मीद हैं, ता. १७ मार्च की बैठक में मुंबई के सिविल कांट्रेक्टर बड़ी संख्या में मीटिंग स्थल पर मुंबई में उपस्थित रहेंगे. 
कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाकर बोर्ड पर अधिपत्य भोगनेवाले तारासिंह का कार्यकाल दक्खन के सिखों के लिए खासा नकारात्मक साबित किया जा सकता हैं. और हैं भी. बोर्ड का प्रधान बनने के लिए इस विधायक ने सभी को गुमराह करके रख दिया. सुना हैं कि कलम ग्यारह के संशोधन रद्द करने के लिए महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग को बड़ी कसरत करनी पड़ रही हैं. तारासिंह द्वारा करवाया गया संशोधन संवैधानिक रूप से बड़ी गलती है ये अब बात सामने आ रही हैं. इसे गलती कहा जाए फिर स्वार्थ की खुरापात. अब अपनी अंतिम मीटिंग में तारासिंह को क्या पास करवाना हैं? 
बहुत बार ऐसा हुआ है पहले की बजट मीटिंग हुई ही नहीं और कलेक्टर के आदेश से बजट के लिए अनुमति प्राप्त कर ली गई. सामने लोकसभा चुनावों की अचार संहिता लगने का वातावरण है. बजट मीटिंग से पहले ही अचार संहिता प्रभाव में आ सकती हैं. इसलिए भी मीटिंग की कोई जरुरत नहीं होनी चाहिए. मंत्री मंडल की बैठक में गुरुद्वारा बोर्ड कलम ग्यारह का विषय समाप्त कर दिया जा सकता था. लेकिन उसके लिए प्रयास नहीं किया गया. मुख्यमंत्री शायद इस विषय की गंभीरता को जान ले और घोषित कर दे कि कलम ग्यारह रद्द कर दी गई है. 
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शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

राजिंदरसिंघ पुजारी तनखैया घोषित !

समाचार 

रजिंदरसिंघ पुजारी तनखैया घोषित 
पंज तख्तों पर सेवा लगाई 
 
नांदेड़, हजूर साहिब, २२ फरवरी - 
शुक्रवार की शाम गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजूर अबिचलनगर साहिब बोर्ड के मेंबर राजिंदर सिंघ नरिंदर सिंघ पुजारी को तखत साहब के पंजप्यारे साहिबान ने तनखैया (बहिष्कृत) घोषित करते हुए उन्हें पांचों तखत साहब पर उपस्थित होकर लंगर और जोड़ेघर में पांच पांच दिनों की सेवा सुनाई. यह सजा शुक्रवार की शाम तखत साहब पर रहिरास का पाठ समाप्त  होने के बाद मीत जत्थेदार संत बाबा ज्योतिंदर सिंघ द्वारा सुनाई गई. इस समय जत्थेदार संतबाबा कुलवंत सिंघजी, हैडग्रंथि सिंघसाहब भाई कश्मीर सिंघजी, मीत ग्रंथि सिंघसाहब भाई अवतार सिंघजी शीतल, सिंघसाहब भाई राम सिंघजी धूपिया भी उपस्थित थे. 
उपर्युक्त संबंध में अधिक जानकारी यह है कि, ता. १९ फरवरी की सुबह ९ बजे के समय तखत सचखंड श्री हजूर साहिब में प्रधान तारसिंघ और मेंबर साहिबान द्वारा पुलवामा में शहीद हुए सी.आर.पी.एफ. के जवानों को श्रद्धांजलि देने हेतु श्री अखंडपाठ साहिब की समाप्ति रखी गई थी. उस कार्यक्रम में तखत साहिब पर बोर्ड के मेंबर साहिबान भी उपस्थित थे. समाप्ति अरदास उपरांत जब कीर्तन शुरू होना था कि मेंबर राजिंदर सिंघ पुजारी ने ऊँची आवाज में पंजप्यारे साहिबान को सम्बोधित करते सवाल पूछा कि तखत साहब पर इस तरह का पाठ रखते समय मर्यादा का ख्याल नहीं रखा गया है. तखत साहब पर कभी भी सन १९८४ में शहीद हुए परिवारों के प्रति श्री अखंडपाठ साहिब नहीं करवाएं गए. उन्होंने एक से डेढ़ मिनिट की बात की जिससे कीर्तन में रुकावट पहुंची ऐसा पंजप्यारे साहिबान को प्रतीत हुआ. 
गुरुद्वारा बोर्ड के मेंबर और कांग्रेस के स्थानीय नेता रविंदरसिंघ बुंगई ने उपर्युक्त सम्बन्ध में जत्थेदार साहिब संतबाबा कुलवंत सिंघजी को ज्ञापन देकर राजिंदर सिंघ पुजारी के अभद्र व्यवहार के प्रति शिकायत कर उन्हें तनखैया घोषित करने की मांग की. जिसके बाद २० फरवरी को राजिंदर सिंघ पुजारी से लिखित स्पस्टीकरण माँगा गया. राजिंदर सिंघ पुजारी ने पंजप्यारे साहिबान के पत्र को स्वीकार कर अपनी लिखित सफाई पेश की जिसमे उन्होंने कहा कि , मेरा आशय पंजप्यारे साहिबान का अपमान करना नहीं था और ना मैंने पूजापाठ में कोई खलल डाला है. मैंने सिर्फ मांग की है कि जिस तरह से पुलवामा के शहीदों की आत्मक शांति के लिए पाठ रखकर अरदास की गई वैसे ही सन १९८४ में शहीद हुए सिखों के लिए भी किया जाये. 
पुजारी द्वारा दिए गए स्पस्टीकरण पर ता. २२ फरवरी की सुबह ११. ४५ बजे आयोजित पंजप्यारे साहिबान की बैठक में विचार किया गया. बैठक में जत्थेदार संतबाबा कुलवंतसिंघजी, संतबाबा ज्योतिंदर सिंघजी, भाई कश्मीर सिंघजी , भाई अवतारसिंघजी शीतल और भाई रामसिंघजी धूपिया उपस्थित थे. साथ ही सुपरडैंट गुरविंदर सिंघ वाधवा भी उपस्थित थे. बैठक में विचार विमर्श उपरांत पंजप्यारे साहिबान द्वारा एक पत्र भेजकर राजिंदर सिंघ पुजारी को शुक्रवार, २२ फरवरी की शाम ६. ३० बजे तखत साहब पर उपस्थित रहने के आदेश दिए गए. 
पत्र प्राप्त होने पर राजिंदर सिंघ पुजारी समय पर तखत साहब पर उपस्थित हुआ. श्री रहिरास साहब के पाठ और अरदास के बाद मीत जत्थेदार ज्योतिंदर सिंघजी ने सजा पढ़कर सुनाई. पंजप्यारे साहिबान ने आदेश में कहा कि राजिंदर सिंघ पुजारी ने जिस ऊँची आवाज में बात की उससे कीर्तन में खलल पेश हुआ. पुलवामा के शहीदों के लिए अरदास रखी गई थी. ऐसे समय ऐतराज जताना योग्य नहीं हैं. आगे से तखत साहब पर कोई इस तरह का व्यव्हार नहीं करे इस बात को दायरे में रखकर राजिंदर सिंघ पुजारी को पांचों तखतसाहिब पर उपस्थित होकर प्रत्येक स्थान पर पांच दिनों की लंगर और जोड़ेघर की सेवा करनी होगी. अंत में तखत साहिब पर श्री अखंडपाठ साहिब रखकर बख्शाने के लिए अरदास करनी होगी. 
राजिंदर सिंघ पुजारी ने सजा सुनकर हाथ जोड़े और मत्था टेककर और परिक्रमा कर बाहर निकल गए. 
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राजिंदर सिंह पुजारी ने कहा, तखत साहब के प्रति और मर्यादा के प्रति मेरे मन में पूरा सम्मान है. पंजप्यारे साहिबान का आदेश सिर आँखों पर रखा हैं. मैंने किसी को अपमानित करने के लिए कुछ नहीं कहा. मैं अभी जवाब देने की स्थिति में नहीं हूँ. 
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राजिंदर सिंघ पुजारी वर्ष २०१२ से गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के मेंबर हैं. भारतीय जनता पार्टी के वे नांदेड़ के जिला उपाध्यक्ष भी हैं. आक्रामक कार्यकर्ता की उनकी छवि रही हैं. 
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रविंदर सिंघ मोदी. 

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

गुरुद्वारा कानून संशोधन रद्द करो आंदोलन को मिल रहा हैं समर्थन  
सर्वपक्षीय समर्थन की जरुरत
नांदेड़ के नेतागण हैं खामोश !!
  रविंदर सिंघ मोदी 
श्री हजूरसाहिब की पवित्र भूमि में गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड कानून १९५६ (दी सिख गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजूर अपचल नगर साहिब) की धारा ११ में हुए सरकारी संशोधन के खिलाफ शुरू आंदोलन महाराष्ट्र सरकार के लिए गले में फंसी हड्डी की तरह हो गया है. महाराष्ट्र सरकार पर दिन पर दिन सर्वपक्षीय दबाव तो बन ही रहा हैं साथ भारतीय जनता पार्टी अंतर्गत भी शीर्ष नेताओं द्वारा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से उक्त मामले में सवाल पूछे जा रहे हैं. 
दिल्ली और पंजाब से लगातार गुरुद्वारा बोर्ड कानून में हुए संशोधन रद्द करने के लिए मांग उठ रही हैं. इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया और प्रिंट मीडिया में नांदेड़ गुरुद्वारा बोर्ड का विषय खासा चर्चा में प्रस्तुत हुआ हैं. जिससे महाराष्ट्र सरकार को अपनी गलती पर पछतावा भी हो रहा है. वहीं सिखों को नीतिगत रूप से पीछे धकेलने का मनसूबा पाले हुए कुछ जातिवादी षडयंत्रकारी संगठन गुरुद्वारा बोर्ड कानून की धारा ११ में हुए संशोधन को योग्य बताकर अल्पसंख्यंक सिखों की संस्था में अपने मनसूबे पूर्ण करने की राजनीति कर रहे हैं.
संस्था नांदेड़ की होने के कारण यहाँ पहला अधिकार नांदेड़ के सिखों को मिलना चाहिए ये मेरा मत है. संस्था पर सरकारी नियंत्रण नहीं होना चाहिए. यही मत हजारों की संख्या में हजूरसाहिब के सिखों द्वारा व्यक्त किया जा रहा हैं. अपने हक़ और अधिकारों के लिए हजूर साहिब सिख संघर्ष के मैदान में सक्रीय है, ऐसे में किसी बाहर के संघटन को तखत सचखंड श्री हजूर साहिब के विषय में बयानबाजी में नहीं पड़ना चाहिए. 
आंदोलन अब चरम पर  हैं. महाराष्ट्र सरकार ने भी संज्ञान लिया है. जिसे देखकर लग रहा हैं कि निकट समय में कलम ११ का संशोधन रद्द हो जायेगा. साथ ही नया बोर्ड भी घोषित कर दिया जायेगा. 

इस आंदोलन को अभी तक महाराष्ट्र के किसी भी राजनीतिक पार्टी या संघटन ने अपना समर्थन घोषित नहीं किया हैं. देशभर में जहां आंदोलन को लेकर सिख संस्थाएं अपना समर्थन दे रही हैं वही महाराष्ट्र के विशेष कर नांदेड़ के राजनितिक संघटनों की चुप्पी दुखद हैं. यहाँ के राजनितिक संघटन और पार्टियां केवल गुरुतागद्दी विकास का मुद्दा अपने मैनुफेस्टो में शामिल कर विकास का प्रचार करने के लिए है ऐसा लग रहा हैं. नांदेड़ जिले के सांसद, विधायक और राजनीतिक दलों के पदाधिकारी केवल सिखों का तमाशा देख रहे हैं. ऐसा प्रतीत हो रहा हैं की गुरुद्वारा बोर्ड संस्था सरकार के अधीन रहे ऐसी इच्छा सभी राजनीतिक पार्टियों की हैं. गुरुद्वारा बोर्ड की जमीनों पर बूरी नजर रखनेवाले कुछ तथ्य भला कैसे सिखों की संस्था को स्वतंत्र करने का विचार रख सकते हैं ? जब तक नांदेड़ के सभी नेता इस आंदोलन को अपना समर्थन घोषित नहीं करते तब तक आंदोलन को बल नहीं मिल सकता. इस बात की गंभीरता के मद्दे नजर विविध राजनितिक पार्टियों में कार्यरत सभी सिख पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी अपनी पार्टियों पर दबाव डालने का प्रयास करें. यदि नहीं मानते हैं तो ऐसी राजनीतिक पार्टियों के लिए वे प्रचार में भी शामिल ना हो ऐसी प्रार्थना हैं. 
 

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

Railway news 1 st feb 2019

समाचार : 


"सचखंड" और "श्रीगंगानगर" को एक नंबर प्लेटफार्म पर उतारा जाएं 

रेलवे प्रशासन को ज्ञापन प्रस्तुत 


हजुरसाहिब, नांदेड़। १ फरवरी
तखत सचखंड श्री हजूर साहिब के दर्शनों के लिए नांदेड़ से अमृतसर साहिब के बीच विशेष रूप से चलाई जा रही "सचखंड एक्सप्रेस" रेलवे गाड़ी और हजूर साहिब से श्रीगंगानगर के बीच दौड़ रही "श्रीगंगानगर एक्सप्रेस" को नांदेड़ रेलवे स्टेशन पर प्लेटफार्म नंबर एक पर स्थान देने की मांग लेकर शुक्रवार (ता. १ फरवरी) की दोपहर स्थानीय हजूरी साधसंगत और गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड प्रशासन द्वारा दक्षिण मध्य रेल विभाग के अतिरिक्त प्रबंधक विश्वनाथ एरा को ज्ञापन प्रस्तुत किया गया. 

प्रस्तुत ज्ञापन में कहा गया हैं, गुरु की नगरी अमृतसर से हजुरसाहिब नांदेड़ रेलवे स्टेशन तक सचखंड एक्स्प्रेस की ३६ से ४० घंटों की लम्बी यात्रा कर श्रद्धालुगण दर्शानों के लिए पहुँचते हैं. यात्रियों में छोटे बच्चों से लेकर महिलाएं, वृद्ध भी होते हैं. नांदेड़ स्टेशन पर प्रशासन द्वारा तकनीकी कारण दिखाकर प्लेटफार्म नंबर चार पर स्थान दिया जाता हैं. जबकि तखत सचखंड श्री हजूर साहिब पहुँचने के लिए प्लेटफार्म नंबर एक अधिक अनुकूल है. यात्रियों को अपने भरी लगेज लेकर प्लेटफार्म नंबर चार से एक तक पहुंचकर स्टेशन के बाहर निकलना पड़ता हैं. 

दूसरी ओर प्लेटफार्म नंबर चार की दिशा में उतरने पर लंबा चक्कर काटकर गुरुद्वारा साहिब तक पहुंचना पड रहा है. क्षेत्र में आपराधिक गतिविधियां अधिक हैं. साथ ही ऑटो रिक्शा चालक, टैक्सी चालक यात्रियों से अधिक भाड़ा वसूलते हैं. इसलिए यात्रियों की सुविधा हेतु सचखंड एक्सप्रेस रेलगाड़ी को प्लेटफार्म नंबर एक पर जगह देना उचित होगा ऐसा ज्ञापन में कहा गया हैं. साथ ही मांग पूर्ण नहीं होने पर नांदेड़ से लेकर अमृतसर तक हर जगह सिख समुदाय रेलवे प्रशासन के खिलाफ तीव्र आंदोलन करेंगा ऐसी चेतावनी भी दी गई हैं.
इस अवसर पर गुरुद्वारा बोर्ड के मेंबर गुरमीत सिंघ महाजन, मानप्रीतसिंघ कुँजीवाले,  राजिंदर सिंह पुजारी, अधीक्षक गुरविंदर सिंघ वाधवा, रवींदर सिंघ मोदी, जसपाल सिंघ लांगरी, रविंदर सिंघ पुजारी, परमजीत सिंघ पेशकर, रणजीत सिंघ गिल, बीरेंदरसिंघ बेदी, सतनामसिंघ गिल, जरनेलसिंघ गाड़ीवाले, ठाकुर सिंघ परभणी, मान सिंघ, मनप्रीत सिंघ कारागीर, करणसिंघ खालसा, बलजीत सिंघ शाह, नरेंदर सिंघ खालसा, सुरजीत सिंघ टाक सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित थे. 
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सभी साधसंगत हजुरसाहिब से लेकर पंजाब तक यह मांग प्रस्तुत करें. 

बुधवार, 30 जनवरी 2019

हजूर साहिब रेलवे स्टेशन पर श्रद्धालु यात्री परेशान 
हजूर साहिब में रेलवे समस्या पर आंदोलन की तैयारी 
रविंदर सिंघ मोदी 

महाराष्ट्र के नांदेड़ शहर स्थित श्री हजूर साहिब स्टेशन पर पंजाब और अन्य प्रांतों से पहुँचनेवाले श्रद्धालु यात्रीगण यहाँ पहुँचकर खासे परेशान हो रहे हैं. वजह है सभी गाड़ियाँ का प्लेटफार्म पर आगमन. हजूर साहिब के दर्शनों का पहुंचनेवाले यात्रीगण अपना लगेज लेकर तीन प्लेटफार्म लांघकर स्टेशन के बहार पहुंच रहे हैं. छोटे बच्चे और बुजुर्गों के लिए तो यह कसरत से बड़ा काम हो रहा हैं. रेलवे प्रशासन को इस समस्या से बार-बार अवगत करवाने पर भी रेलवे प्रशासन द्वारा इस समस्या पर विचार नहीं किया जा रहा हैं. जिससे हजूर साहिब के सेवाभावी युवक अब इस समस्या को लेकर आंदोलन की राह तलाश रहें है.  
दक्षिण मध्य रेलवे ज़ोन अंतर्गत सचखंड एक्सप्रेस (१२७१५) सबसे सफल रेलवे गाड़ी है जो श्री हजूर साहब नांदेड़ से श्री अमृतसर स्टेशन का रोजाना सफर तय करती हैं. इस रेलवे गाड़ी से रोजाना डेढ़ से दो हजार श्रद्धालु और यात्री यात्रा करते हैं. इस गाड़ी के टिकट आरक्षण में वर्ष भर तेजी रहती हैं. कभी गाड़ी खाली नहीं दौड़ती है. श्री हजूर साहिब के दर्शन हेतु पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, मध्यप्रदेश के यात्रियों के लिए सचखंड एक्सप्रेस बहुत अनुकूल है. उसी तरह से महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के यात्रियों के पंजाब और जम्मू के तीर्थस्थलों के दर्शनों के लिए यह रेलवे गाड़ी बहुत उपयोगी है. 


सचखंड एक्सप्रेस १९९५ से नांदेड़ और अमृतसर के बीच दौड़ रही है. पहले साप्ताहिक के रूप में शुरू हुई यह गाड़ी वर्ष १९९७ में सप्ताह में पांच दिन चलाई गई. वर्ष २००७ से यह गाड़ी सप्ताह के सात दिन दौड़ रही है. इस धार्मिक यात्रा में छोटे बच्चें, महिलाएं, बुजुर्ग भी यात्रा करते हैं. यह यात्रा ३६ से ४० घंटों की होती हैं. जिससे यात्रीगण काफी तक जातें हैं. उसी तरह से श्री हजूर साहिब से श्री गंगानगर के बीच भी गाड़ी नंबर १२४८५ दौड़ती है. यह गाड़ी भी अब रोजाना दौड़ रही हैं. 
दोनों रेलगाड़ियों के समस्या लगभग एक जैसी हैं. नांदेड़ के श्री हजूर साहिब रेलवे स्टेशन पर पहुंचनेवाली सभी गाड़ियों का आगमन प्लेटफार्म नंबर चार (४) पर हो रहा हैं. जबकि तखत सचखंड श्री हजूर साहिब तीर्थस्थल प्लेटफार्म नंबर एक (१) की दिशा में हैं. प्लेटफार्म नंबर चार पर सुविधाएँ नहीं हैं. यहाँ से तखत सचखंड पहुँचने के लिए आसान रास्ता उपलब्ध नहीं हैं. गोकुल नगर से विष्णुनगर रस्ते से गुरुद्वारा की बसें गुजरने के लिए दिक्क़ते ही दिक्कतें हैं. बारिश में तो रेलवे अंडर ब्रिज में पानी भरने के कारण चार से पांच माह रास्ता बंद रहता हैं. गोकुल नगर का हिस्सा आपराधिक गतिविधियों का केंद्र माना जाता है. 
दूसरा रास्ता बहुत घुमाकर जाता हैं. स्टेडियम रोड और वी.आई.पी. रोड, से होकर घूमकर जाना होता हैं.  यात्रियों को बसें नहीं मिलती उनको ऑटो रिक्शावाले बहुत परेशान करते हैं. दुगना, तिगना किराया हड़पते हैं. बहुत बार यात्रियों का सामान भी चोरी हो जाता हैं. ऐसी परिस्थिति में ३६ से ४० घंटों की यात्रा करने बाद भी यात्री को बड़ी दिक्कतों को सामना करना पड़ता हैं. यदि यह रेलवे गाड़ियां चार नंबर के बजाय एक नंबर प्लेटफार्म पर पहुँचती हैं तो यात्रियों को अधिक सुविधाएँ उपलब्ध होगी. लेकिन यह बात दक्षिण मध्य रेल विभाग प्रशासन सुनने को तैयार नहीं हैं. 
इस विषय में हजूर साहिब के सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा डी.आर.एम. (नांदेड़) को ज्ञापन प्रस्तुत कर सचखंड एक्सप्रेस और श्री गंगानगर एक्सप्रेस को प्लेटफार्म नंबर एक पर लेने की मांग की गई हैं. गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कार्यालय द्वारा भी पत्राचार किया गया हैं. संत बाबा बलविंदर सिंघजी ने भी रेलवे के डी.आर.एम. से चर्चा कर मांग प्रस्तुत की लेकिन रेलवे प्रशासन सुनने को तैयार नहीं. इसलिए अब हजुरसाहिब के युवा, सामाजिक कार्यकर्ता और बोर्ड मेंबर एक सामाजिक आंदोलन करने का विचार कर रहे हैं. 

ता. २९ जनवरी को एक बैठक लेकर तय किया गया कि ता. १ फरवरी , २०१९ को रेलवे डी.आर.एम. को एक ज्ञापन पेशकर आंदोलन के लिए आगाह किया जाए. यह भी तय किया गए कि नांदेड़ से लेकर अमृतसर तक के हर स्टेशन अंतर्गत वहां के सिख रेलवे प्रशासन को ज्ञापन पेशकर मांग करें कि सचखंड एक्सप्रेस गाड़ी को प्लेटफार्म नंबर एक पर ही रोका जाएँ. दिल्ली के सिखों से विशेष निवेदन हैं कि वे रेल मंत्रालय को ज्ञापन देकर मांग प्रस्तुत करें. रेलवे बोर्ड चेयरमैन को भी दिल्ली के सिख ज्ञापन देकर मांग मानवाएँ. 
हजुरसाहिब के सभी सेवाभावी सिख जत्थे, संघटन और युवा मिलकर रूपरेखा के तहत आंदोलन करें. गुरुद्वारा के दर्शनों को आनेवाले यात्रीगण यहाँ की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हैं. यात्रियों के योगदान से ही गुरुद्वारा के कर्मचारी, आसपास के व्यापारी, रिक्शावाले, टैक्सीवाले और अन्यों के पेट निर्भर हैं. इसलिए रेलवे से आनेवाले यात्रियों को सुविधाएँ दिलवाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए. इसके लिए गुरुद्वारा बोर्ड प्रशासन को भी आंदोलन में पूर्ण सहयोग करना चाहिए. साथ ही उधर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर को भी भूमिका लेनी होगी. सभी के सहयोग से यह आंदोलन सफल हो सकता हैं. पहले चरण में ता. १ फ़रवरी को ज्ञापन (निवेदन) प्रस्तुत करने की सभी कृपा करें. सुबह ११. ३० बजे नांदेड़ रेल प्रशासन को ज्ञापन प्रस्तुत करना तय हुआ हैं. नांदेड़ से लेकर दिल्ली तक सभी स्टेशन के परिवेश में रहनेवाले सिख वहां के रेलवे प्रशासन के सामने मांग रखें यह प्राथना हैं. 
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रविवार, 27 जनवरी 2019

सिख रेजिमेंट की शानदार वापसी 
देश के सिखों में ख़ुशी की लहर 
रविंदर सिंघ मोदी 

भारतीय गणतंत्र दिवस के अवसर पर देश की राजधानी दिल्ली में ता. २६ जनवरी, २०१९ के दिन आयोजित राष्ट्रिय परेड (संचलन) में जब सिख रेजिमेंट के सशस्त्र दस्ते ने अपनी पारंपरिक वर्दी में पथ संचालन किया तो देश के सिखों का सीना एक बार फिर फूलकर चौड़ा हो गया. देश में सन १८४६ से सेवारत सिख रेजिमेंट को सन २०१६ में अचानक से पथ संचलन परेड में हिस्सा लेने से रोक दिया गया था. 
सिख रेजिमेंट का इतिहास लगभग १७२ वर्षों का है. सिखों ने हर मोर्चे पर युद्ध में हिस्सा लिया और अपना जौहर दिखाया. पाकिस्तान, चीन, बांगलादेश सहित अनेक स्थानों पर सिख रेजिमेंट ने युद्ध में हिस्सा लेकर अपनी वीरता का परिचय दिया. सन १९९९ में हुए कारगिल युद्ध में सिख रेजिमेंट की बटालियन द्वारा टाइगर हिल से पाकिस्तानी सेना को हटाकर वहां कब्ज़ा किया था. जिसमें १० सिख जवानों ने अपनी जानें गँवाई थी. 
सिख रेजिमेंट के पास ७२ लड़ाईयों के सम्मान प्राप्त हैं. शहादत देकर रेजिमेंट द्वारा दो परमवीर चक्र, १४ महावीर, ५ कीर्ति चक्र, ६७ वीर चक्र सहित लगभग १६०० सम्मान प्राप्त हैं.
सिख राज्य के लुप्त होने के बाद महाराजा रणजीत सिंघजी की प्रेरणा पर सिख सैनिकों को एकत्र कर अंग्रेजों ने सिख रेजिमेंट की स्थापना की थी. बाद में प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के समय भी विदेशों में सिख रेजिमेंट ने अपनी वीरता से सभी को स्तब्ध कर दिया था. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सिख रेजिमेंट को भारतीय सेना में प्रमुख फौजी रेजिमेंट के रूप में शामिल किया गया. स्वंत्रता के बाद अचानक हुए सीमा पर आक्रमण के समय सिख रेजिमेंट ने दुश्मनों के सभी आक्रमण विफल किये. सिख गुरुओं की शिक्षाओं पर मार्गक्रमण करनेवाली सिख रेजिमेंट को जब गणतंत्र दिवस के परेड में शामिल नहीं किया गया था तो देशभर के सिखों की भावनाएँ आहत हुई थी.
अब जब २०१९ की परेड में लाल रंग की प्रभावी वर्दी में सिख रेजिमेंट के दस्ते ने मार्च परेड किया तो तालियों की गड़गड़ाहट से उनका स्वागत हुआ. साथ ही परेड देख रहें लोगों में उत्साह का वातावरण बन गया. टी.वी. पर ये दृश्य देखनेवालों ने सिख रेजिमेंट की भूरी-भूरी प्रसंशा कर डाली. देश की रक्षा में सिख रेजिमेंट का योगदान सदा गौरवशाली रहा हैं. हर मोर्चे पर सिख रेजिमेंट अग्रसर रही हैं. ऐसी बहादुर रेजिमेंट के परेड में शामिल नहीं रहने से दुश्मनों के लिए कई तरह की चर्चाओं को अवसर मिल गया. सिख कौम में देशभक्ति का प्राकृतिक गुण है. देश की रक्षा, संस्कृति की रक्षा के सभी गुण सिख गुरुओं की शिक्षा से सृजित हैं. ऐसी सिख रेजिमेंट पर सिख ही क्या  नागरिक को फक्र होना चाहिए. गणतंत्र दिवस की परेड में पथ संचलन के बाद निश्चित ही रेजिमेंट का मनोबल ऊँचा हुआ होगा. सिख रेजिमेंट के पथ संचलन के बाद देश के सभी सिखों में जज्बात जाग गए हैं. देश के लिए मर मिटने के लिए सिख युवा फिर अग्रसर हो उठे हैं. 
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बुधवार, 23 जनवरी 2019

आंदोलन की धमक अब देशभर

आंदोलन की धमक अब देशभर 
मुख्यमंत्री को सौंपा गया ज्ञापन 
गुरुद्वारा बोर्ड कानून के संशोधन जल्द होंगे पूर्ववत
रविन्दरसिंघ मोदी 

श्री हजूर साहिब की धरती से उठा आंदोलन अब महाराष्ट्र के सीमाएँ लाँघकर पंजाब और अन्य राज्यों में पहुँच चूका हैं. हर स्थान से कलम ग्यारह के उस संशोधन का विरोध किया जा रहा हैं. महाराष्ट्र सरकार अब दबाव में है और बहुत जल्द हमें यह समाचार सुनने में मिल सकता है कि सरकार द्वारा ता. १८ फरवरी, २०१५ को किये गुरुद्वारा बोर्ड कानून में किये गए बदलाव का संशोधन वापिस लिया जा रहा हैं. 
इस बात का पहला श्रेय आदरणीय जत्थेदार संतबाबा कुलवंतसिंघजी और सम्मानीय पंजप्यारे साहिबान को जाता हैं. पंज प्यारेसाहिबान द्वारा गुरुमत्ता पारित करने के बाद हजुरसाहिब ही नहीं महाराष्ट्र, तेलंगाना, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश और कर्नाटका के सिखों ने जगह-जगह विरोध और प्रदर्शन शुरू कर दिया हैं. आंदोलन का दूसरा श्रेय हमारे पूज्य संत बाबा बलविंदर सिंघजी कारसेवा वाले और शिरोमणि पंथ अकाली बूढ़ा दल ९६ करोड़ी के जत्थेदार संत बाबा प्रेमसिंघजी माता साहेब वालों को जाता हैं. जिन्होंने साधसंगत का नेतृत्व स्वीकार कर ता. २१ जनवरी, २०१९  को एक भव्य आंदोलन को अंजाम दिया. 

इस आंदोलन ने नांदेड़ से लेका मुंबई तक हलचल मचा दी. इस आंदोलन से हजुरसाहिब के सभी सामाजिक संघठन जुड़ गए. साधसंगत से चुनकर आए तीनों सदस्यों ने भरपूर परिश्रम किया. हजूर साहिब के अन्य बोर्ड सदस्यों ने भी सकारात्मक भूमिका को अंजाम दिया. हजूर साहिब के नवजवानों ने जोश और उत्साह दिखाकर संघठन का परिचय दिया. यदि आपस में एकता हो तो हर आंदोलन सफल हो जाता हैं. नांदेड़ के साथ-साथ परभणी, परतुर, औरंगाबाद, श्रीरामपुर, अहमदनगर, मुंबई में आंदोलन की तीव्रता पहुंची और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. 
मुंबई में शिष्ट मंडल 


सबसे बड़ा काम ये हुआ कि हजुरसाहिब के एक शिष्ट मंडल ने ता. २२ जनवरी, २०१९ को मुंबई पहूँचकर मंत्रालय में मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर उन्हें हजुरसाहिब की साधसंगत की मांग का एक ज्ञापन सौंपा. शिष्ट मंडल में गुरुद्वारा सदस्य गुरमीत सिंघ महाजन, राजेंद्र सिंघ पुजारी, गुरप्रीत सिंघ सोखी थे. वहीं बोर्ड के प्रधान और विधायक तारासिंह को शिष्ट मंडल की अगुवाई करनी पड़ी. बोर्ड के सचिव परमज्योत सिंह चाहल भी शिष्ट मंडल में शामिल हुए. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ज्ञापन को सकारात्मक लेकर कानून संशोधन को रद्द करने की अनुकूलता दिखाई. जिससे उन अनैतिक तत्वों की गतिविधियों पर भी ब्रेक लग गया जो कलम ग्यारह का लाभ उठाकर बोर्ड का सीधा प्रधान बनने के लिए प्रयासरत थे. 
उधर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के प्रधान भाई गोबिंदसिंघ जी लोंगोवाल ने हजूर साहिब की साधसंगत की मांग के बाद व्यक्तिगत रूप से इस आंदोलन को अपना समर्थन जाहिर करते हुए महाराष्ट्र सरकार को ज्ञापन भेजकर मांग करने का निर्णय लिया. लेकिन दूसरी ओर श्रोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के मुंबई के सदस्यों ने लेकिन कलम ग्यारह को अपना समर्थन जारी रखा हुआ हैं. 
केंद्रीय मंत्री श्रीमती हरसिमरत कौर बादल ने आंदोलन को गंभीरता से लेते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को ट्वीट कर विषय से अवगत कराया और मांग प्रस्तुत की. जिसके बाद देवेंद्र फडणवीस द्वारा ट्वीट का तुरंत जवाब दिया गया और एक्ट संशोधन के विषय में सकारात्मक जवाब दिया गया. ये ट्वीट भी खासा चर्चा में रहा. मंजिंदरसिंघ सिरसा (दिल्ली) और मंजीत सिंह जी.के. द्वारा भी मांग उठाई गई. 
कुलमिलाकर गुरुद्वारा बोर्ड कानून १९५६ की कलम ग्यारह के एक्ट संशोधन को रद्द करने की मांग देशभर पहुँच गई. अब हर स्तर से विरोध उठ रहा हैं. सरकार की मंशा और मुंबई के कुछ लोगों की कारगुजारियां साधसंगत के सामने खुलकर उजागर हो चुकी है. जो अनैतिक तत्त्व बोर्ड का प्रधान पद खरीदने की भाषा कर रहे थे उन्हें भी करारा जवाब मिला है. हजूर साहिब के नौजवानों में उन व्यापारी प्रवृत्ति के लोगों के प्रति खासा रोष व्याप्त हैं. होना भी चाहिए. बहरहाल ख़ुशी इस बात की है कि हजूर साहिब की साधसंगत के आंदोलन के साथ अब देश के सभी घटक जुड़ रहे हैं. आनेवाले दिनों में हजूर साहिब का बोर्ड सरकार के नियंत्रण से मुक्त होने के पुरे आसार दिखाई दे रहे हैं. 
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सोमवार, 21 जनवरी 2019

एक नयी पहल का सूत्रपात ;
जत्थेदार जी और पंजप्यारे साहिबान को धन्यवाद 
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गुरुद्वारा बोर्ड कानून के सभी संशोधन रद्द करने की मांग 
जयकारों से गूंज उठी हजूर साहिब नगरी 
रविंदर सिंघ मोदी 


तखत सचखंड श्री हजूर साहिब की पावन धरती से तारीख २१ जनवरी २०१९ के दिन एक नयी पहल का सूत्रपात हुआ. गुरुद्वारा बोर्ड को महाराष्ट्र सरकार के चुंगल से मुक्त करवाने के लिए आखिर पंथ के जत्थेदार संतबाबा कुलवंतसिंघजी और आदरणीय पंजप्यारे साहिबान को कदम उठाना पड़ गया. पंजप्यारे साहिबान ने तखत साहिब के सान्निध्य में गुरुमत्ता लेकर सरकारी संशोधन बर्खास्त करने की मांग रखी. साथ ही इस मांग को पूरा करने  शुरू किये गए आंदोलन का नेतृत्व संतबाबा बलविंदर सिंघजी कारसेवा वाले और संतबाबा प्रेमसिंघजी माता साहेब वालों को सौंपा.

पंजप्यारे साहिबान की इस मांग को हजूरी साधसंगत ने हाथोहाथ लेकर हजूर साहिब नगरी में भव्य रैली निकालकर गुरुद्वारा बोर्ड कानून १९५६ में वर्ष २०१५ से अबतक किये गए सभी सरकारी संशोधन रद्द करने की मांग की. जिलाधीश श्री अरुण डोंगरे को एक ज्ञापन भी प्रस्तुत किया. संत बाबा बलविंदर सिंघजी और संतबाबा प्रेमसिंघजी मातासाहिब वालों के नेतृत्व में आंदोलन को आज एक नई दिशा प्राप्त हुई कहा जाए तो गलत नहीं होगा. पंजप्यारे साहिबान के आदेश के बाद साधसंगत का जोश भी चरम पर रहा. जयकारों से नगरी गूंज गई. 
इस नयी पहल से मुंबई में हलचल मच गई. सरकार के अधीन गुरुद्वारा बोर्ड कानून की धारा ग्यारह (११ ) का आधार लेकर मुंबई के कुछ विवादित मेंबर हजूर साहिब बोर्ड का प्रधान बनने के लिए मंत्रालय की सीढियां  घिसने में लगे हुए है. उनकी अरमानों को अब ठेस लगी होगी. लेकिन क्या ये अपनी नापाक हरकतों से बाज आएंगे? आइये आज आपको एक शरीफ मुम्बईया की कहानी बताते है.

दो-तीन माह पहले की घटना है, जब एसजीपीसी के सदस्य और गुरुद्वारा बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदरसिंघ मिन्हास गुरुद्वारा परिसर के ए विंग ब्लॉक के एक कमरे में आकर ठहरे थे. उनके साथ उनके पुत्र भी थे. उनके यहाँ होने की सुचना भाई देवेंद्रसिंघ मोटरावाले ने दी. तब सरदार लड्डूसिंघ महाजन, जसपालसिंघ लांगरी, अवतारसिंघ पहरेदार, देवेंद्रसिंह विष्णुपुरीकर, तेजपालसिंघ खेड़ और मैं स्वयं भूपिंदर सिंघ मिन्हास से मिलने पहुंचे. तारासिंह द्वारा बुलाई गई बैठक में उपस्थित होने का उनसे कारण पूछा तो शुरू में कुछ गर्मागर्मी हुई. बाद जब चर्चा पटरी पर लौटी मीत मिन्हास ने हमें आश्वासन दिया कि, कलम ग्यारह रद्द करवाने के लिए अब वो हमारा साथ देंगे. यहीं नहीं बल्कि हमारे शिष्टमंडल को मुख्यमंत्री का समय दिलवाएंगे. भला मनुष्य मानकर हमने साहब की बात पर यकीन कर लिया और रास्ता ताकते रहे कि कब मिन्हास साहब हमें मुख्यमंत्री के पास लेकर चलते हैं. 
मिन्हास साहब मुख्यमंत्री से मिलने तो गए लेकिन हमारे शिष्टमंडल को समय दिलाने के लिए नहीं बल्कि प्रधान पद पर अपना टांका फिट करने के लिए. उन्होंने मुख्यमंत्री से मिलकर तारासिंह के बारे में हजुरसाहिब में उठे असंतोष का हवाला देकर अगलीबार कलम ग्यारह का उपयोग कर अपने को हजूर साहिब बोर्ड का प्रधान नियुक्त करने की मांग कर डाली. यही नहीं प्रधान पद के बदले कुछ सौदेबाजी के पैतरे बिछा दिए. 
मुख्यमंत्री महोदय ने तारासिंघ को बुलाकर उनका त्यागपत्र मांग लिया. उसके बाद भूपिंदर सिंह मिन्हास ने गुरुद्वारा बोर्ड के तीन सदस्यों के चुनाव के दौरान संगत का ध्यान बटाकर अपने पासे मजबूत करने शुरू कर दिए. एसजीपीसी से मेंबरशिप त्यागकर सांठगांठ कर सरकारी प्रधान बनने की नीति अपना ली. एसजीपीसी के सदस्य के रूप में गुरविंदरसिंघ बावा, परमज्योत सिंघ चाहल को अपना समर्थक रखा. औरंगाबाद में मीटिंग लेकर वहां से अपना समर्थक मेंबर चुनकर लाने का असफल प्रयास किया. यांनी मुंबई मैं बैठकर कैसे कोरम पूर्ण कर लिया जाएं इसकी सभी व्यवस्थाएं जुटा ली. तारासिंह भी उनके साथ और इकबालसिंघ भी उनके साथ. बस नांदेड़ के एक दो मेम्बरों को अपनी ओर करने की कोशिश और मुंबई में बैठकर शासन चलने की पूरी योजना लगभग पूर्ण. 
मिन्हास जी ने तखत साहब के परिसर में बैठकर हमसे वादा किया और मुकर गए. यही नहीं तखत का प्रधान बनने के लिए उन्होंने जो पैंतरे अपनाएं, वो हजुरसाहिब के लोगों को नीचे दबाने का बंदोबस्त हैं. ये सब किसलिए. क्या एस.जी.पी.सी. का यह अंदरूनी खेल हैं? या मिन्हास एस.जी.पी.सी. को भी उपयोग में ला रहे हैं? छल और बल का प्रयोग कर तखत साहब का प्रधान बनने की यह नीति सरकार की आदतें बिगाड़ने वाली हैं. क्या मोल दे रहे हैं वो प्रधान पद का सरकार को? तारासिंह की बातों पर यकीन किया जाएं तो बेहद शर्मसार करनेवाले तथ्य सामने आ रहे हैं. ऐसी ओछी राजनीति करनेवाले और झूठे वायदे कर धोखेबाजी करनेवालों को यहाँ का प्रधान बनने की कोई जरुरत नहीं हैं. प्रधान तो क्या उन्हें बोर्ड का मेंबर भी नहीं बनना चाहिए.
तखत साहब की पवित्रता का बनाये रखने के लिए संत बाबा बलविंदर सिंघजी और संत बाबा प्रेमसिंघजी की अगुवाई में हजुरसाहिब के अमृतधारी सिखों ने गुरुद्वारा बोर्ड कानून की कलम ग्यारह हटाने के लिए आंदोलन का मार्ग अपना लिया हैं. रहत मर्यादा की उपेक्षा करनेवालों ने अब इस बोर्ड की तरफ बुरी नजर डालने से पहले  अपनी नियत के विषय में सोच लेना चाहिए.

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बुधवार, 16 जनवरी 2019

समय आ गया है अब आवाज बुलंद हो 
हजूरी प्रधान के लिए बड़े आंदोलन की जरुरत 
रविंदर सिंघ मोदी 

मुंबई मंत्रालय में गुरुद्वारा के नए बोर्ड गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है. तीन सदस्यों के चुनाव के बाद अब बाहरवालों का रास्ता साफ़ है. अब बोर्ड की नए से रचना कर, नया अध्यक्ष (प्रधान) नियुक्त करने की पहल जारी है. उधर प्रक्रिया में तेजी है. इधर हजूरी प्रधान के सपने देखनेवाले हम सब सुस्त हैं. हजूर साहिब से कोई बड़ी पहल तो मायने रखती है. केवल निवेदन देने मात्र और अख़बारों में सुर्खियाँ बटोरने से हजूरी प्रधान की नियुक्ति नहीं हो जाती. जरुरत हैं एक नई पहल और एक नए आंदोलन की. 
यह अपेक्षा हम साधसंगत में चुनकर आए हमारे तीनों सम्मानीय सदस्यों से कर सकते हैं कि वे संघटित होकर एक बड़ा आंदोलन करें जिसमें बड़ी संख्या में साधसंगत भी जुड़े. चुनकर आएं सदस्यों ने साढ़े तीन हजार से साढ़े चार हजार वोट प्राप्त किये हैं. यह कोई छोटी बात नहीं हैं. इसका अर्थ यही निकलता हैं कि साध संगत ने उन्हें अपना नुमाइंदा मान लिया हैं. अब तीनों सदस्यों की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि वे गुरुद्वारा बोर्ड कानून १९५६ की कलम ११ में हुए संशोधन को रद्द करवा कर हजूरी प्रधान का चयन करवाने का रास्ता साफ़ करें. यहाँ के व्यवस्थापन में हजूर साहिब का नुमाइंदा प्रधान के रूप में प्रस्तुत करें अथवा करवाएं.
एक बार सरकार द्वारा अध्यक्ष नियुक्त करने के बाद यह लड़ाई बहुत मुश्किल हो जाएगी. क्योंकि बड़े बड़े दिग्गज प्रधान पद पाने के लिए पासे बिछाये हुए हैं. दिल्ली, मुंबई और नागपुर की शक्तियां इस कार्य में जुटी हुई हैं. इस बात को गंभीरता से लेते हुए चुनकर आएं तीनों सदस्य और बोर्ड के में मनोनीत अन्य सदस्य मिलकर बैठक का आयोजन कर आंदोलन की दिशा तय करें. यदि सभी सदस्य हजूरी प्रधान और कलम ११ रद्द करवाने के विषय में एकजुट होते हैं तो निश्चित ही एक बड़ा जनांदोलन खड़ा हो सकता है. 
जाहिर हैं कि संभाव्य आंदोलन में स्थानीय साध संगत की पूर्ण शक्ति भी प्राप्त हो सकती हैं. यदि यहाँ मौका चूक गए तो आनेवाले पच्चीस सालों में भी हजूरी प्रधान नहीं बन पायेगा. इसलिए २६ जनवरी से पहले ही यहाँ शांतता पूर्ण आंदोलन कर बोर्ड पर हमारा प्रधान मांगना चाहिए. लोकतंत्र में हमारा प्रधान चुनने का अधिकार हमें होना चाहिए. जिस  तरह से बोर्ड का काम चल रहा हैं उसे देखकर ये लग रहा हैं कि सन १९७५ की तर्ज पर गुरुद्वारा बोर्ड में भी आपातकाल लागु कर दिया गया हैं. इस अघोषित आपातकाल के ख़िलाफ़ लड़ने का यही सबसे उपयुक्त समय आ गया हैं. यदि मौका चूक गए तो साधसंगत से किये गए वायदे  झूठ का पुलिंदा साबित होंगे इसमें कोई दो राय नहीं हैं. 
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रविंदर सिंघ मोदी 

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

क्या गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड प्रधान पद की सौदेबाजी हो रही है?
कौन गद्दार दशमेश पिता का स्थान कब्ज़ाना चाह रहा है? 
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हजूरी प्रधान का सपना दिखानेवालों का संघर्ष शुरू !
रविंदर सिंघ मोदी 

(यह लेख हजूर साहिब के उन लोगों के लिए हैं जो जागृत नहीं हैं. 
यदि पढ़कर सो जाना हैं या व्यर्थ ही चर्चा करना है 
तो शायद लेख लिखना एक शोकांतिका मात्र माना जाना चाहिए. 
यदि लेख पसंद पड़े तो निश्चित ही आपके हक और अधिकार की लड़ाई में महत्वपूर्ण प्रतीत होगा. )

मुंबई के कुछ व्यावसायिक और आधे राजनीतिक लगातार गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड के ख़िलाफ़ हथकंडे अपना रहे हैं. किसी तरह से गुरुद्वारा बोर्ड का सदस्य पद मिल जाये इस मंशा से वहां का एक समूह पहले कार्य करता था. लेकिन अब उनकी मंशा गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड का प्रधान पद पाना है. क्योंकि हमारी गुरुद्वारा बोर्ड नामक धार्मिक संस्था १९५६ एक्ट में कलम ११ के संशोधन के बाद सरकार के अधीन जो है. सीधी बात है कि ये संस्था अब सरकारी मिलकियत बन गई है. सरकार जिसे चाहिए उसे प्रधान बना सकती हैं. जिसे चाहिए उसे मेंबर बना सकती है. लड़कर तो नांदेड़ के सिखों को मेंबर बनना पड़ता हैं. 
बड़े शर्म की बात है कि जिस संस्था का गठन नान्देड़ के वफादार अमृतधारी गुरु सिखों ने करवाया था और उसे सत्ता के रूप में बाहर वाले उपयोग कर रहे हैं. अक्सर चर्चा में सुनने को मिल रहा है कि, मुंबई और नागपुर के लोगों ने मुख्यमंत्री के नाक में दम कर रखा है कि हमें संस्था का प्रधान बनाओ, सदस्य बनाओ. अब तो गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान बनने के लिए वर्तमान मीत प्रधान और मुंबई के व्यवसायी भूपिंदर सिंघ मिन्हास साम, दाम, दंड और भेद अपनाकर मुख्यमंत्री के पीछे लगे हुए हैं कि एकबार मुझे नांदेड़ के गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बना दो. वे मुख्यमंत्री से कह  हैं कि फिर एकबार कलम ११ का उपयोग कर मुझे प्रधान बना दीजिये. जाहिर हैं एस.जी.पी.सी. भी इस बात का समर्थन कर रही होगी कि हजूर साहिब तखत पर उनके दो मुंबई निवासी मेम्बरों की सत्ता स्थापित हो जाये. चर्चा है कि मुंबई के ये लोग प्रधान पद पाने के लिए कोई भी दाम चुकाने को तैयार है.  विगत दो दिनों से नांदेड़ में इस तरह की चर्चा उफ़ान पर हैं. 
ये भी एक संयोग है कि बोर्ड के प्रधान और मिन्हास साहब के साथी सरदार तारा सिंघ भी विगत दो दिनों से नांदेड़ में गुरुद्वारा बोर्ड को लेकर चिंतन कर रहे हैं, क्या उनका पत्ता कटने वाला हैं? तारासिंह चिंतित है इसीलिए कि उनके राजनीतिक भविष्य का अब क्या होगा. नांदेड़ के बहुत से सदस्य उनकी सांत्वना कर रहे थे कि हम आपके साथ हैं. जहाँ - जहाँ तारा सिंह निकले सब उनके आगे पीछे दिखाई देते. अभी भी बहुत से लोगों को उम्मीद है कि तारा सिंह में इस.जी.पी.सी. के मुम्बइया सदस्यों का दांव पलटने का सामर्थ्य है. मुख्यमंत्री के अधिक करीब तो आमदार तारा सिंघ ही हैं फिर भूपिंदर सिंघ मिन्हास की मुख्यमंत्री से निकटता कैसे? वजह गहरी लग रही है. मिन्हास जब भी नांदेड़ पहुंचते है तब मीठी मुस्कान बिखरकर कहते हैं कि कलम ११ और कलम ६ के संशोधन की लड़ाई में मैं आपके साथ हूँ. एकबार तो गुरुद्वारा परिसर के कमरे में उन्होंने हमसे हुई बातचीत में  मुख्यमंत्री  देवेंद्र फडणवीस से मिलवाने का वायदा भी किया था. लेकिन मुख्यमंत्री से मिलवाना तो दूर अब कलम ११ का आधार लेकर स्वयं गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनने की फील्डिंग लगा चुके है ऐसा स्पष्ट हो रहा है.
यदि कोई सिख गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनने के लिए सरकार के साथ सांठ - गांठ के चक्कर में है तो वो हजूर साहिब का गद्दार माना जाये. क्या पद खरीदना वफादार सिखों की परंपरा में शुमार है?  एस.जी.पी.सी. इस बात से इत्तेफाक रखती है कि कोई गुरु घर के सीटों की बोली लगाएं ? हजूर साहिब बोर्ड के लिए वर्तमान समय कठिन बना हुआ हैं. महाराष्ट्र सरकार ने  गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कानून में जबरन संशोधन कर बोर्ड पर अपना अधिकार कर लिया जो नांदेड़ के सिखों का अधिकार छीनने जैसा हैं. मुखयमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस जी को वर्ष २०१५ में किये गए कलम ११ का संशोधन रद्द करना चाहिए. वहीं कलम ६ और कलम १५ के प्रस्तावित संशोधन भी पीछे लेने चाहिए. 
मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे संशोधन रद्द करवाकर नांदेड़ के सिखों के हवाले बोर्ड कर दे. कुछ व्यापारियों ने बोर्ड और रैंन सभाई के नाम पर यहाँ एक कारोबार शुरू किया हैं. तखत के नाम पर कारोबार हरगिज बर्दाश्त नहीं होना चाहिए. यदि कुछ सदस्य चाहते हैं कि मुम्बइया लॉबी की सत्ता यहाँ बनी रहे तो उन्हें हजूरी प्रधान का तुन्तुना बजाने कोई जरुरत नहीं. दूसरी ओर यह जाहिर सी बात है कि हजूर साहिब के जागरूक लोग यदि सोते रह जायेंगे तो गुरुद्वारा बोर्ड के पदों का कारोबार कर, बाहर के लोग सत्ता में आ जायेंगे. चुनावों के बाद तो आपकी नींद खुलनी चाहिए ऐसी अपेक्षा की जा सकती हैं. 
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बुधवार, 2 जनवरी 2019

बुंगई, कुंजीवाले और महाजन मेंबर बनें !


रविंदर सिंघ बुंगई, मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले और गुरमीत सिंघ महाजन चुनाव में सफल 

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के नतीजे मिले-जुले
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क्या पाया हजुरसाहिब के सिखों ने चुनावों से? 
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रविंदर सिंघ मोदी 

तखत सचखंड श्री हजूर अपचलनगर साहिब बोर्ड के चुनावों के नतीजें ता. ३१ दिसंबर, २०१८ को साधसंगत के सामने प्रस्तुत हुए हैं. तीन सीटों के चुनाव के नतीजें मिलेजुले आये हैं. मतदाताओं ने अपने प्रतिनिधि के रूप में सरदार रविन्दरसिंघ बुंगई, मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले और गुरमीतसिंघ महाजन को चुना हैं. जनता जनार्दन हैं इसलिए नतीजों पर कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. 
मतदान से पूर्व ही रविन्दरसिंघ बुंगई ने प्रचारतंत्र प्रभावी रखते हुए मानों जीत दर्ज कर ली थी. सर्वाधिक वोट लेकर उन्होंने बड़ी जीत हासिल की. सरदार गुरमीत सिंघ महाजन ने लगातार दूसरीबार जीत दर्ज कर अपना सिक्का मनवाया. वहीँ नए चेहरे के रूप में सरदार मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले ने मतदाताओं का विश्वास जीत लिया. हमें युवा नेतृत्व मिला हैं. तीनों ऊर्जावान हैं और उनके पास संघटन शक्ति हैं. यदि योजना और दृढ़ निश्चय कर लिए जाये तो ये युवा नेता बहुत कुछ सकारात्मक कर सकते हैं. तीनों सदस्यों को नए पर्व के लिए हार्दिक शुभकामनाएं. 
विगत सव्वा महीने से तीन सदस्य चुनाव को लेकर चली राजनीतिक गहमागहमी अब समाप्त हो चली हैं. इस बार देखा गया कि बड़ी संख्या में युवा वर्ग ने चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया. रिश्तेदार, मित्र और परिचित सव्वा महीने तक व्यस्त दिखाई दिए. गुरुद्वारा बोर्ड के चुनावों ने इस बार विधानसभा के प्रचार को भी पीछे छोड़ दिया लगता. सम्पूर्ण नांदेड़ नगरी बैनर और पोस्टरों से पट गई थी. गुरुद्वारा के चारों ओर चुनाव प्रचार की धूम मची हुई थी. चुनाव प्रचार के लोभ से विधायक तारासिंह एंड कंपनी भी खुद को रोक नहीं पायी. मुंबई से मतदाताओं से संपर्क जारी था. दूसरी ओर इस चुनाव में साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल भरपूर दिखाई दिया. पानी की तरह पैसा बहाया गया. युवा वर्ग को चुनाव प्रचार का अच्छा तजुर्बा मिल गया कहा जाये तो गलत नहीं होगा. लेकिन चुनाव समाप्त होते ही कुछ लोग जरूर बेरोजगार हो गए हैं. 
चुनाव जीतकर सदस्य बने नए तीनों नवसदस्यों को फिर एक बार मुबारकबाद. तीनों सदस्यों पर हजूरी सिखों के नेतृत्व के एक जिम्मेदारी हैं. यदि सभी स्थानीय सदस्य एकजुट होकर रहते हैं तो निश्चित ही स्थानीय सिखों का और विशेषकर गुरुघर का भला कर सकते हैं. किसी भी सदस्य को यह समझाने की जरुरत नहीं कि उसकी जिम्मेदारी क्या हैं और गुरु महाराज से वफ़ादारी क्या हैं. साधसंगत की अपेक्षाएं बहुताधिक नहीं हैं. लेकिन फिर भी उन अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं हो पा रही हैं क्योंकि गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पराधीन हो चली हैं. जब तक इस संस्था के अध्यक्ष पद पर सरकारी नियुक्त प्रधान बैठा हैं तब तक कोई भी सदस्य छाती ठोंककर ये नहीं कह सकता कि यह संस्था उनकी हैं. जिसका मुख्य कारण है वर्ष २०१५ में हुए गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट संशोधन अनुसार कलम ग्यारह  (११) में हुआ बदलाव और सत्तांतर. बाद में स्थानिक सिखों के साथ किया गया सरकारी अध्यक्ष द्वारा की गई दो गुटों की राजनीती. हूकूमशाह की तरह गुरुद्वारा एक्ट में दुबारा कलम ६ में संशोधन की खुरापात. दूसरे हजूर साहिब की स्थानिक संस्था में बढ़ा सरकारी हस्तक्षेप. भविष्य में भी ये खुरापाती प्रवृत्ति के लोग तखत सचखंड श्री हजूर साहिब का नेतृत्व बाहरी शक्तियों को सौंप देंगे इसमें कोई दो राय नहीं हैं. ऐसे में १९५६ में हजूर साहिब के वफादार सिखों द्वारा पंजीकृत करवाई गई संस्था मुंबइयाँ नेता और व्यापारियों का सत्ता केंद्र बन गई हैं. अब नए सदस्यों की जिम्मेदारी बनती हैं की वे न बाहरी लोगों के चुंगल में फंसी हमारी संस्था को स्वतंत्र करें. साथ ही यहाँ की गरिमा कायम रखने के लिए बोर्ड की छवि भी स्वच्छ और सुन्दर बनायें. जैसे कि सभी ने कलम ग्यारह के खिलाफ लड़ने का आश्वासन अपने मेनिफेस्टो में दिया हैं. उस अनुसार उनके द्वारा कलम ग्यारह के संशोधन को पूर्ववत कर अपना प्रधान चुनने का विकल्प उपलब्ध करवाएं. 
मैं बहुत ही जिम्मेदारी के साथ और दुःखी मन से ये बात कह रहा हूँ कि किसी भी सन्माननीय मेंबर के नाम के साथ किसी का मोहरा या किसी का प्यादा या किसी का आदमी जैसे विशेषण योग्य प्रतीत नहीं होते. हर सदस्य की अपनी गरिमा हो तो हजूरी सिखों का मस्तक भी शान से ऊँचा उठ जाता है. यदि कोई पद और टेंडर की लाचारी में अपने माथे पर किसी का लेबल लगाकर स्वयं को गुरु घर का सेवक या प्रतिनिधि जताने की हिमाकत करता हैं तो निश्चित ही बीते चुनावों का कोई अर्थ नहीं रह जाता. आपको प्रतिनिधि या नेता चुनकर साधसंगत ने क्या पाया इस पर गहरा मंथन जरुरी हो जाता हैं. 
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मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

यह सैक्रिफाइस इलेक्शन है - रविंदर सिंघ मोदी

यह सैक्रिफाइस इलेक्शन है - रविंदर सिंघ मोदी 

आपका अंतिम मौका चला गया !!!
गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर साहिब मंडल (बोर्ड ) के चुनाव ता. 28 दिसंबर 2018 को हो रहे हैं. मराठवाड़ा के सिख मतदाता अपने तीन सदस्यों का चयन करेंगे. अपने प्यारे प्रतिनिधि चुनेगे. उन्हें गुरुद्वारा बोर्ड में जिम्मेदारियों सहित भेजेंगे. हमारी आकांक्षाएं बहुत हैं. हम बहुत आशावाद पाल रहे हैं. लेकिन हकीकत से रूबरू होना भी जरुरी है. 

आज मैं यह खुलासा करना चाहता हूँ कि वास्तविकता हमारी सोच और अपेक्षाओं से कुछ अलग है. हकीकत यह है कि ये चुनाव साधसंगत की मांग पर नहीं हो रहे हैं. बल्कि भाजपा विधायक तारा सिंह की रणनीति का ही यह एक हिस्सा है. तारा सिंह को अपना नया बोर्ड स्थापित करने की जल्दी है. उसने गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट की कलम 6 का संशोधन अभी तक भी रद्द नहीं करवाया हैं. क्योंकि सरकार जो योजनाबद्ध तरीके से करना चाह रही है तारा सिंह बखूबी वही अंजाम दे रहा हैं. बोर्ड का कानून पूरी तरह बदल कर सरकार हजूर साहिब के सिखों के हाथों से बोर्ड छीनना चाह रही है. दूसरा यह कि मुम्बईया लॉबी यहाँ अपना एकाधिकार स्थापित करना चाह रही हैं. ये चुनाव मात्र बाहरवालों की यहाँ सत्ता स्थापित करने की योजना हैं. तारा सिंह अपने भांझे - भतीजे और मुंबई के पैसे वालों के साथ ताजपोशी के लिए तैयार है. जैसे हि 31 दिसंबर को तीन सीटों के चुनाव नतीजे घोषित हो जायेंगे वैसे ही नए बोर्ड गठन की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएंगी. 
मैंने इन चुनावों को "सैक्रिफाइस चुनाव" का नाम दिया है. बलिदान!! जिसका मुख्य कारण यह है कि हजूर साहिब के सिखों की इस चुनाव को दिल खोलकर दी गई स्वीकृति. सरकार ने चुनाव लादे और सभी ने उत्साह के साथ उसे स्वीकार कर लिया ! किसी ने चुनाव का बहिष्कर नही किया. प्रशासन ने प्रक्रिया शुरू की तो मतदाता सूचि में नाम डालने की जल्दबाजी भी हुई. क्योंकि बहुत से लोगों को मेंबर बनने की जल्दी थी. किसी ने यह नहीं सोचा कि आगे क्या होगा?
चुनाव प्रक्रिया को लेकर जहां लोगों में उत्साह देखा जा रहा है, वो उत्साह कलम 11 और कलम 6 के संशोधन के ख़िलाफ़ नहीं देखा गया. बहुत अफ़सोस की बात है कि हजूरी संगत अपने बोर्ड को बचाना छोड़ कर उस तारा सिंह के चुंगल में फंस गए जिसने आपके पवित्र स्थल के प्रबंधन के सूत्र सरकार को सौंप दिए. आपकी सिक्खी को इसलिए प्रणाम कि आपने छिन्नेवालों को ही अपना नेता कबूल कर लिया. जिनका तन मन हजूरी बोर्ड के लिए समर्पित है उनका नेता तारा सिंह कैसे हो सकता हैं? यह नहीं होना चाहिए था.  

तारा सिंह द्वारा लादे गए चुनाव अपनाकर और उसका फिर से बोर्ड गठित कर हजूर साहिब के वफ़ादार सिख क्या साबित कर रहे हैं ? ये चुनाव अंतिम अवसर है इसके बाद तो चुनाव होना भी मुश्किल है. इसीलिए मैंने इसे सैक्रिफाइस चुनाव कहा है कि हमने वो सबकुछ कर दिया जो बाहर वाले चाहते हैं. हजूरी सिखों ने इन चुनावों के माध्यम से बोर्ड का बलिदान कर दिया ये मानकर चले. यह एक कड़वी सच्चाई हैं. अब आपके हाथ सिर्फ नौकरियां मांगना रह गया है. प्रतिकार नहीं करने, नहीं लड़ने की कोई तो किंमत चुकानी होगी. आगे चलकर ये कहावत मशहूर हो जाएगी कि "हाथ का बोर्ड गंवाना कोई हजूर साहिब के निष्ठावान सिखों से सीखे". 



गुरुतागद्दी त्रिशताब्दी के समय भी बहुत सी समस्याएं प्रस्तुत हुई थी पर कोई नहीं लड़ा था. जिसका परिणाम ये हुआ कि हजूर साहिब के सिखों में लड़ने की प्रवृत्ति ही समाप्त हो गई. एकबार फिर साबित हो गया हैं कि हम केवल एकदूसरे के साथ ही लड़ सकते हैं. सरकार के खिलाफ संघर्ष तक नहीं कर सकते. लड़ने वालों की टाँगे खींच सकते हैं. जो होना था वही हो रहा हैं? किसी को कोई खबर नहीं हैं. इसीलिए तो मैं कह रहा हूँ कि यह "बलिदान चुनाव" हैं. जो लोग चुनाव में जीत कर आएंगे उनमें से कोई भी ये मादा नहीं रखता कि हजूरी प्रधान वो बनाएगा. यहाँ तारासिंह को हटाना हमारे बस में नहीं है. क्योंकि हमें अब तक लगता था कि तारासिंह अकेला सब कुछ कर रहा हैं. लेकिन अब यह तथ्य सामने आ रहा हैं कि तारा सिंह ने भी जैसे बोर्ड को सरकार के अधीन करने की सुपारी उठाई हैं. बाद में यहाँ का बजट, सत्ता, आराम, चापलूस, चाकर और सुविधाएँ देखकर उसने कायम का यहां सत्ता में रहने का मन बना लिया हो. कुछ भी हो हमने अंतिम अवसर भी खो दिया हैं यह मानकर चलिए. ये खरी-खरी बातें बुरी लग रही हो तो लगे, क्षमा मांगना भी एक तरह से पक्के हजूरी विचारों से बेमानी होगी.   
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रविंदर सिंघ मोदी

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

तारासिंह अब तक का सबसे निष्क्रिय प्रधान !
लगभग २०० करोड़ के बजट का नहीं क्या गया उपयोग 
क्या हजूर साहिब बोर्ड को शिरडी ट्रस्ट जैसा बनाया जा रहा हैं?
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रविन्दरसिंह मोदी

इससे पूर्व भी मैंने बेबाक तौर पर यह बात कही है कि विधायक तारा सिंह की प्रधानगी नांदेड़ के सिखों के लिए अभिशाप से कम नहीं है. अब मेरी यह बात भी तारा सिंह के समर्थक वर्ग को अप्रिय प्रतीत हो सकती है, जब मैं यह तर्क प्रस्तुत करूँ कि सन १९५६ से अब तक के गुरुद्वारा बोर्ड कार्यकाल में तारा सिंह का विगत पौने चार वर्षों का कार्यकाल सबसे निष्क्रिय साबित हुआ है. पिछले तीन वर्षों में गुरुद्वारा बोर्ड के बजट का ठीक से उपयोग करने में भी तारासिंह बुरी तरह से विफल साबित हुआ है. मैं बेबाक और खरी खरी कह रहा हूँ आप खुद जाँच कर देख लीजिये. 
विधायक तारा सिंह ने अप्रैल २०१५ में महाराष्ट्र सरकार के आदेश से गुरुद्वारा सचखंड मंडल (बोर्ड) का अध्यक्ष पद प्राप्त किया था. पद पर बैठने के बाद जब तारासिंह ने गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड (मंडल) के आर्थिक मामलों का निरिक्षण किया तो उसके अधिपत्य में ६० करोड़ राशि के बजट की संस्था थी. उसके बाद वर्ष २०१६ - २०१७ आर्थिक वर्ष का बजट प्रस्तुत हुआ तो वह बढ़कर ६८ करोड़ हो गया. वर्ष २०१७-२०१८ में बजट की राशि ८८ करोड़ इतनी दर्शाई गई थी. अभी वर्ष २०१८ - २०१९ का जब वार्षिक बजट प्रस्तुत हुआ तो यह अकड़ा बढ़कर ९५ करोड़ हो गया. वर्ष २०१५-१६ से वर्ष २०१८-१९ इन चार सालों का आर्थिक प्रारूप कहता हैं कि चार वर्षों में दो सौ करोड़ से तीन सौ करोड़ की राशि खर्च करने का अवसर था. जो तारा सिंह ने गंवाया हैं. इस राशि के उपयोग से नांदेड़ शहर में छह भव्य मार्केट इमारतों का निर्माण हो सकता था. वही लगभग ५० एकड़ जमीन खरीदी जा सकती थी. तारा सिंह ने कोई संपत्ति खड़ी नहीं की. क्यों? सोचिए?

तारासिंह के कार्यकाल में प्रस्तावित और अनुमानित आर्थिक व्यवहार की संभावित सीमा तीन सौ करोड़ (३०० करोड़) से ज्यादा की है. उसी तरह से पिछले तीन वर्षों का शुद्ध बजट देखा जाए तो लगभग २०० करोड़ रूपयों का व्यवहार प्रभावित हुआ है. बोर्ड के पास इतना बड़ा विकल्प होने के बावजूद भी तारासिंह ने अध्यक्ष के नाते इस बजट का उपयोग ठीक तरह से नहीं किया. तारासिंह ने भूमिपूजन तो दो से तीन स्थानों पर किये लेकिन प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हुए. तारासिंह के कार्यकाल में गुरुद्वारा बोर्ड के धन राशि से कोई नयी ईमारत, मार्किट, काम्प्लेक्स, गुरुद्वारा, डेवढ़ी, बाथरूम, रोड या कोई छत का निर्माण हुआ हो तो बताइयेगा. इतनी जमीनें उपलब्ध होने के बावजूद उसने कोई भी स्ट्रक्चर खड़ा नहीं किया. क्योंकि एक तो उसके पास विज़न (दूरदृष्टि) नहीं, दूसरे इच्छाशक्ति नहीं, तीसरे फुट डालों झगडे कराओ की राजनीति और चौथे केवल सरकारी अध्यक्ष होने का रौब. इस कारण उसने कोई गुरु घर का पैसा बैंकों में ब्लॉक रखा.
अब जायजा लेते है उन कुछ कामों का जो उसने करवाएं. पहले नम्बर पर चिल्ड्रन पार्क का काम. यह कार्य उसने मुंबई के अपने निकटतम व्यक्ति से करवाया. यह विषय भी काफी चर्चा में रहा था. तारा सिंह ने दूसरा काम करने में रूचि दिखाई वो है श्री गुरु गोबिंद सिंघजी म्यूजियम के अधूरे कार्यों के विषय में. तारा सिंह के पद लेने के बाद खर्च की कोई सीमा ही नहीं रही. जो वस्तु १० रुपयों की थी वो मान लीजिये ५० रुपयों में खरीदी गई. खर्च और मरम्मत कार्यों का खर्च लाखों में होने की बात सामने आयी हैं. जिसमे ठेकेदार को अग्रिम धन देने का मामला भी चर्चा में रहा हैं. म्युझियम में कितने के कार्य करवाएं गएँ, किसके ऑब्जरवेशन में करवाएं गए, अभी और कितना खर्च करना हैं जैसे प्रश्न खड़े हैं. जाहिर हैं तारा सिंह तो जवाब नहीं देगा. सरकार भी धांधलियों की जाँच नहीं करवाएंगी. 
खैर मुद्दे पर आते हैं, दशमेश अस्पताल में संसाधन बढ़ाने के पहले के बोर्ड के निर्णय पर उसने कुछ खर्च किया. छोटे-मोटे स्लाइडिंग, पार्टीशन, बॉउंड्री वॉल, खालसा हाई स्कूल , सचखंड पब्लिक स्कूल रिनिवेशन, वृद्ध आश्रम के कमरों को अधिकारियों  का निवास स्थान बनाने के लिए रेनोवशन में खर्च, तोड़फोड़ आदि कार्य कर उसने कुछ करोड़ व्यर्थ किये ऐसा आरोप स्वयं बोर्ड के मेंबर ही लगा रहे हैं. तारा सिंह ने कोई ईमारत खड़ी नहीं की.  यात्री निवास नहीं बनाया.  उत्पन्न बढ़ाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की. 
बोर्ड की बैठकें मुंबई में लेकर तीन से साढ़े तीन वर्षों में करोड़ों का खर्च करवाया. मुंबई  बैठकें हुई, उनमें क्या प्रभावी निर्णय हुए? बोर्ड का उत्पन्न तो नहीं बढ़ा उलटे खर्च ज्यादा हुए. तारा सिंह जब जब नांदेड़ दौरे पर आया तो दौरा खर्च भी बढ़ गया. अख़बारों में विज्ञापन छपवाकर गुरुघर में खुद का दरबार आयोजित किया गया. बैनर और पोस्टर में भी अब तक करोड़ के निकट खर्च हुए होंगे. अभी भी आवश्यक खर्च जारी हैं. 
उसने अपने रिश्तेदारों को ऊँचे पैकेज पर डायरेक्टर बनाया. जहां जगह नहीं थी वहां भर्ती करवाई. चार महीनों में चार सौ कर्मचारी भर्ती करते समय बोर्ड मीटिंग में किसी तरह का कोई प्रस्ताव पास नहीं किया. नयी भर्ती किये गए कर्मचारियों का प्रति माह अंदाजा ३३ लाख रुपयों के वेतन की अतिरिक्त व्यवस्था नहीं की गई बल्कि गोलक से ही वो खर्च किया जा रहा हैं. ऊपर से इतने कर्मचारियों को भविष्य में स्थाई (परमानेंट) नौकरी का आश्वाशन भी नहीं दिया गया, क्योंकि सभी को डेलीवेजस पर नहीं बल्कि कॉन्ट्रैक्ट टाइप नौकरिया बांटी गई. किसी भी कर्मचारी को भर्ती के साथ पद बहाल नहीं किये गए. स्थाई कर्मचारियों को रोटेशनल प्रमोशन नहीं दिए गए जो कि उनका हक्क और अधिकार बनता हैं. वरिष्ठ कर्मचारी प्रमोशन से वंचित हैं. उनके साथ सरासर अन्याय किया गया. तारा सिंह ने उनकी बात तक नहीं सुनी. बोर्ड में कार्यरत महिला कर्मचारियों को प्रमोशन में न्याय नहीं दिया गया. उल्टा महिला शोषण बढ़ने के समाचार सुनने में आते रहे हैं. तारा सिंह के निकटवर्तीय की जाँच के लिए महिला और बाल उत्पीड़न पथक ने छानबीन भी की हैं. यानी तखत की गरिमा बनाये रखने में वो पूरी तरह से विफल साबित हुआ हैं. 
क्या निष्क्रिय प्रवृत्ति का व्यक्ति दुबारा प्रधान बनना चाहिए?
तारा सिंह के प्रधान राज्य में क्या विकास किया गया साध संगत को आज खुलकर बताया जाये यह सभी की मांग हैं. सरकारी नुमाईंदा होने और चार सालों का आर्थिक बजट हाथ में रहते हुए भी उसने कोई बड़ा काम नहीं किया. इतना बजट उसने ब्लॉक क्यों रखा उसका सच बाहर आना चाहिए. आगे भी तारा सिंह प्रधान बनने के लिए पासे बिछा चूका हैं. जो लोग गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव लढ रहे हैं, उन्होंने हजूरी प्रधान का विषय गंभीरता से लेते हुए तारा सिंह से सवाल करना चाहिए कि पिछले पौने चार सालों में उसने बजट ब्लॉक क्यों रखा? क्या शिरडी ट्रस्ट की तरह ही सरकार को लोन देने की कोई गुप्त योजना हैं? क्या फिक्स डिपॉजिट्स पर किसी को लोन की सिफारिश की गई हैं? विकास नहीं करना था तो पद पर बैठकर हजूर साहिब  झगडे लगाने की क्या जरुरत थी? तखत साहब पर मेम्बरों को कसम खिलने की क्या जरुरत थी?
हजूर साहिब के लोगों का दुर्भाग्य कहा जाना चाहिए की १९५६ से लेकर आज तारीख तक केवल १६ साल ही हजूरी प्रधान पद पर रहे. जिनमें से नांदेड़ के केवल दो ही प्रधान रहे जिन्होंने साढ़े नौ साल प्रधान पद पर निकला. बाकी समय यानी पचास वर्षों के करीब बाहरवालों ने, कलेक्टर ने और प्रशासकों ने यहाँ की सत्ता संभाली हैं. फिर भी हजूर साहिब के बाशिंदे जो कहते हैं कि गुरु हाजिर नजीर हैं, वो नहीं चाहते कि गुरुघर में स्थानीय प्रधान बनें. गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव में २२ उम्मीदवार खड़े हैं जिनमे से कुछ डम्मी माना जाएं तो भी आठ से नौ उम्मीदवार मैदान में हैं. सभी योग्य हैं और राजनीती समझते हैं. मैं किसी उम्मीदवार के लिए व्यक्तिगत नहीं कह रहा हूँ चयन संगत का अधिकार हैं. सभी उम्मीदवार चाहते हैं हजूरी प्रधान बनें. लेकिन प्रत्यक्ष में बनाने के हालत में कोई नहीं दिखता. क्योंकि उनकी मानसिकता स्थिर हो गई हैं कि बोर्ड पर बाहर वालों का राज कायम रखना है. जाहिर हैं सरकारी नियुक्ति की प्रथा के रहते यहाँ का प्रधान चुनने का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता. इस समस्या का हल किसके पास हैं? जो सबसे योग्य उम्मीदवार है वो यह जाहिर करें. 
क्या वर्तमान में त्यागपत्र देकर भी गद्दी पर बैठा निष्क्रिय प्रधान दुबारा से प्रधान बनना चाहिए? क्या सरकार यहाँ निष्क्रिय व्यक्ति लादकर सचखंड बोर्ड को भी शिरडी ट्रस्ट जैसा बना रही जहां सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहे? और तारा सिंह इसी छुपे अजेंडे पर काम कर रहा हैं?
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