गुरुद्वारा तखत सचखंड मंडल (बोर्ड) के प्रधान
तारा सिंह ने मुख्यमंत्री को आखिर प्रधानगी का त्यागपत्र सौंपा
रविंदर सिंघ मोदी
तखत सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब मंडल (बोर्ड) के सरकार नियुक्त प्रधान विधायक तारा सिंह को आखिर अपने प्रधानगी का त्यागपत्र मुख्यमंत्री को सौंपना पड़ा. या यह कहिए मुख्यमंत्री के मांगने पर त्यागपत्र देने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं था. इस त्यागपत्र मामले की दो प्रमुख वजह सामने आ रही हैं.
एक तो आगामी दिसम्बर माह में गुरुद्वारा मंडल के तीन सदस्य पदों के चुनाव होने का पूर्ण अनुमान है. चुनाव मतदाता सूचियों के निर्माण की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है. चुनाव करवाने के लिए एक्ट १९५६ के तहत बोर्ड बर्खास्त करना अनिवार्य है. बोर्ड बर्खास्त करने के लिए प्रधान और वर्तमान सदस्यों को जिम्मेदारी से मुक्त करना भी आवश्यक हो जाता हैं.
दूसरी वजह ये है कि विगत तीन साल सात माह और कुछ दिनों के कार्यकाल में तारासिंह खासे विवादित रहे हैं. उनके द्वारा गुरुद्वारा बोर्ड और विधानसभा के कार्यकाल में कोई अंतर नहीं किया गया. एक धार्मिक संस्था की गरिमा को राजनीतिकस्तर प्रदान किया. गुरुद्वारा बोर्ड के कार्यकाल में सर्वाधिक विरोध का सामना करनेवाले वे अग्रणी प्रधान है. उनके ख़िलाफ़ कई आरोप लगे. जिनमें अफरातफरी और धांधलियों के आरोप भी शामिल है. अपने निकटवर्तीय रिश्तेदारों को डायरेक्टर नियक्त कर ६० हजार रुपए वेतन (मानधन) देने का विषय हो, कर्मचारी नियुक्ति और प्रमोशन में अनियमितता का विषय हो अथवा टेंडर प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी हो. या फिर दखनी साधसंगत के विरोध का विषय हो. सबकुछ तारासिंह के विपरीत दिखाई देते हैं. तारासिंह द्वारा गुरुद्वारा बोर्ड में कांग्रेस स्थानीय पदाधिकारियों और मेम्बरों की ताल में ताल मिलाने के कारण भी मुख्यमंत्री खासे नाराज होने की बात सामने आ रही हैं. स्थानीय भाजपाई इस बात को लेकर परेशान थे कि तारासिंह ने कोंग्रेसियों के हाथ में स्थानीय व्यवस्थाएं सौप दी है. यहाँ तक कि गुरुद्वारा बोर्ड के सदस्यों भी बोर्ड के कामकाज से दूर कर दिया था. इस विषय में बहुत सी शिकायतें मुंबई पहुँच रही थीं. साथ ही एक अहम् विषय यह भी रहा कि, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस तारीख ३१ दिसम्बर २०१७ के दिन गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजुरसाहिब में संपन्न हुए एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए थे. उस समय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अपने भाषण में गुरुद्वारा बोर्ड पर स्थित सरकारी कर्ज की ६२ करोड़ की राशि माफ़ करने का आश्वासन दिया था. विगत दस माह में इस आश्वासन की पूर्ति नहीं हो पायी. हाल ही में यह विषय दैनिक सकाल (सकाळ) समाचार पत्र में प्रकाशित भी हुआ था. इस विषय में भी तारासिंह को जिम्मेदार माना जा रहा है की उन्होंने इस विषय की तकनीकी पहलुओं को सरकार के सामने उजागर नहीं किया. तारा सिंह का त्यागपत्र एक तरह से सही समय पर आया है. गुरुद्वारा के चुनाव निष्पक्ष हो इस बात के लिए बोर्ड का बर्खास्त होना जरुरी हो गया है. कुछ लोगों ने गुरुद्वारा बोर्ड के सम्भाव्य चुनाव के लिए गुरुद्वारा बोर्ड कार्यालय का जबरदस्त इस्तेमाल शुरू कर दिया था. तारासिंह के त्यागपत्र के बाद गुरुद्वारा प्रशासन अनुशासन से कार्य करने लगेगा ऐसे कयास लगाएं जा रहे हैं.
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