क्या भला किया हैं सिखों का एसजीपीसी ने ?
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सौ साल
रविंदरसिंघ मोदी
सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था होने का सम्मान शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (अमृतसर) संस्था के नाम हैं. किसी धार्मिक संस्था का एक सौ वर्ष पूर्ण करना अपने आप में एक सुनहरा इतिहास होता है. इतिहास में यह यात्रा मील का एक पत्थर मानी जानी चाहिए. सन 1920 में 15 नवंबर का दिन संस्था का स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है. लेकिन वर्ष 1925 में सेंट्रल गुरुद्वारा एक्ट का पंजाब सरकार द्वारा गैज़ेट जारी किया गया. उस समय पंजाब सरकार के गवर्नर के रूप में मालकम हैले थे जिन्होंने इस संस्था के कानून बनाने में अच्छी भूमिका अदा की थीं. उन्होंने उस कार्य के लिए सिखों की पांच सदस्यीय समिति का गठन भी किया था. सन 1920 से सन 1926 तक संस्था के कानून संशोधन होते रहें और संस्था को सिखों के नेतृत्व अधिकार बढ़ाने की दृष्टि से समय समय पर प्रावधान होते रहें. बड़ी बड़ी हस्तियों ने इस संस्था से अपनी राजनीति की यात्रा शुरू की थीं यह भी एक अलग इतिहास हैं.
खैर, इस वर्ष (2020) शातकपूर्ति होने से एसजीपीसी संस्था का उत्साह वैसे सिर चढ़कर बोल रहा है. संस्था के पहले प्रधान भाई स्व. सुन्दरसिंघ मंजिठिया से लेकर अभी तक जितने प्रधान संस्था पर सेवारत रहें सभी को संस्था की प्रगति और उतार - चढ़ाव का श्रेय पहुँचता हैं. यह संस्था एक युग, एक इतिहास की साक्षी रहीं हैं.
सिख पंथ की सर्वोच्च धार्मिक संस्था के एक सौ वर्ष पूर्ण होना वैसे एक नये आशावाद को जन्म देना है. ऐसे समय यह प्रश्न उठना स्वाभाविक भी है कि, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति से देश अथवा विश्व के सिखों से क्या अपेक्षाएं रखनी चाहिए? आखिर क्या भला किया हैं एसजीपीसी ने सिखों का? इस प्रश्न का उत्तर एसजीपीसी निष्पक्षता से दें नहीं पायेगी. सच्चाई यह हैं कि, पिछले सौ वर्षों में सिखों ने बहुत कुछ खोया हैं. पिछले सौ वर्षों में संस्था के कई अंग अलग हुए हैं. एक सौ पिचहत्तर (175) सदस्योंवाली इस संस्था का दायरा तंग और तंग होता चला गया. सिखों के बलिदान के इतिहास बनें. पाकिस्तान अलग हुआ. हमारे गुरुओं के सभी ऐतिहासिक स्थान अलग हो गए. पंजाब राज्य भी छोटा और छोटा होता चला गया. एसजीपीसी धीरे धीरे ऐतिहासिक स्थान और गुरूद्वारे खोतीं रहीं. दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी अख्तियार में नहीं रहीं. सिक्खी का पतन पंजाब में ज्यादा होता रहा, एसजीपीसी रोक नहीं पायी.
जिसके कारण भी आज देश में सिखों की जनसंख्या बहुत कम हैं. पिछले सौ वर्षों में अंदाजा दस से पंद्रह लाख सिखों की हत्याएं हुईं. देश विभाजन में सर्वाधिक कत्तल सिखों के हुए. सन 1984 के सिख नरसंहार तक सिखों का दमन होता ही रहा. एसजीपीसी ने क्या भूमिका अदा की हर सिख को सोचना चाहिए. केवल चढ़ावा जमा करना और पंजाब की राजनीतिक पार्टियों की हौसलाअफजाई करना संस्था का छुपा एजैंडा बन कर रह गया. स्व. मास्टर तारासिंघजी इस संस्था के लगभग अठारह (18) वर्ष प्रधान थे, जो कि सिखों के सबसे विद्यवान नेता माने जाते थे. जत्थेदार स्व. गुरचरनसिंघजी तोहरा अंदाजा सताइस (27) प्रधान के रूप में कार्यरत थे. अभी हाल में स्व. सरदार अवतारसिंघ मक्कड़ ग्यारह (11) वर्ष प्रधान की कुर्सियों पर कार्यरत थे.
(जत्थेदार स्व. गुरचरनसिंघजी तोहरा)
विगत तीन वर्षों से भाई गोबिंदसिंघजी लोंगोवाल एसजीपीसी के प्रधान हैं. लोंगोवाल के कार्यकाल में सिखों का क्या भला हो रहा हैं सही मायने में यह एक खुली बहस का विषय है. इस संस्था के दायरे से श्री गुरु ग्रंथसाहिब जी के पावन 328 स्वरुप गायब हो जाने की घटना क्या एसजीपीसी का गौरव बढ़ाने वाली घटना हैं?
एसजीपीसी संस्था द्वारा लगभग 60 करोड़ का प्रावधान धर्मप्रचार पर किया जाता हैं. एक तो यह राशि धर्मप्रचार के लिए कम हैं. दूसरा यह कि संस्था ऐसा क्या धर्मप्रचार कर रहीं हैं कि पंजाब से सिख, सिक्खी से दूर भागते नजर आ रहें हैं ! धर्म सिद्धांतों को ख़ारिज कर सिख नशों की लत में मरें जा रहें हैं ! आपके धर्मप्रचार के बावजूद भी पंजाब के शिक्षा में सिक्खी इतिहास के पृष्ठ कम और कम होते चलें जा रहें हैं ! धर्म को लेकर कितनी शताब्दियां मनाईं गईं, क्या "आउटपुट" सामने आया हैं. क्यों सिखों की जनसंख्या आज कम है? काम में कितनी ईमानदारी थीं खुलासा कीजिए. पिछले सौ सालों में धर्म प्रचार पर कितनी राशि खर्च हुईं? जवाब तो एक हजार करोड़ से ऊपर का हो सकता है ! क्या हासिल हुआ? क्या भला हुआ? एक नहीं, दो नहीं बल्कि दस सिख गुरुओं के अमर इतिहास से सींची हुईं पंजाब की धरती पर पिछले सौ वर्षों में सिक्खी इतिहास की अमर यात्रा कैसे रहीं. इस शातकपूर्ति पर बहुत से सवालों का उठना और उठाया जाना भी स्वाभाविक हैं.
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