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शनिवार, 19 सितंबर 2020

सरदार तारा सिंह नहीं रहे !!

सरदार तारासिंह ने दुनिया को अलविदा कहा!

मुलुंड मुंबई क्षेत्र के पूर्व विधायक और भारतीय जनता पार्टी नेता सरदार तारासिंह जी ने तिथि 19-09-2020 की सुबह 8 बजे, मुंबई के लीलावती अस्पताल में अंतिम सांस लीं. अंतिम समय उनकी आयु 81वर्ष थी. वें गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड नांदेड़ संस्था के प्रधान के रूप में भी अपनी सेवाएं प्रदान कर चूके हैं. उनके निधन की वार्ता से हजूर साहब, नांदेड़ में भी दुःख प्रकट किया गया. 


(स. तारासिंह पूर्व विधायक)

सरदार तारासिंह जी बीस वर्षों तक पार्षद थे. वहीं तीन बार वें जनता में से विधायक निर्वाचित हुए थे. विधानसभा में उनके कामकाज की शैली सबसे अलग थी. भारतीय जनता पार्टी में उनको उच्चस्तर का नेता माना जाता था. पार्टी की स्थापना के साथ ही वें भाजपा से जुड़े थे. उनके निधन से भाजपा को भी क्षति पहुंची हैं. 

महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें वर्ष 2015 में गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया था. साढे तीन वर्षों तक वें प्रधान बने रहें थे. 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में उन्हें टिकिट नकारा गया. जिसके कारण वें राजनीति में थोड़ा पिछड़ गए. लेकिन वें अंतिम समय में भी गुरुद्वारा बोर्ड के सदस्य थे. 

तारासिंह का स्वाभाव मित्रतापूर्ण था और सभी को स्नेह से जोड़ लेना का उनमें हुनर था. नांदेड़ से उनके परिवार का पुराना संबंध था. सभी राजनीतिक पार्टियों के शीर्ष नेताओं के साथ उनके सुदृढ़ संबंध थे. उनके निधन पर सभी ओर से दुःख प्रकट किया जा रहा हैं. 

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गुरुवार, 17 सितंबर 2020

हरसिमरत के इस्तीफे की घोषणा

 हरसिमरत बादल ने इस्तीफा सौंपा  !

सुखबीरसिंह बादल : किसान विरोधी विधेयक का विरोध 

रविंदरसिंघ मोदी 

 

केंद्र सरकार अंतर्गत एन. डी. ए. का पुराना सहयोगी घटक दल शिरोमणि अकाली दल ने आज भाजपा सरकार द्वारा प्रस्तुत किसान विधेयक (आर्डिनेंस) को किसान विरोधी विधेयक कहकर विरोध जताया साथ ही केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने अपने मंत्री पद से इस्तीफा देने का एलान कर दिया. हालाँकि अकाली दल ने एन. डी. ए. से नाता नहीं तोड़ा हैं. शिरोमणि अकाली दल अपनी पार्टी की बैठक में राजनीतिक हालातों की समीक्षा करेगा. उसके बाद ही एन. डी. ए. से अलग होने अथवा साथ रहने का फैसला करेगा. सुखबीरसिंघ बादल ने भाजपा सरकार का विधेयक पास करने के विषय में कहा कि, ये निर्णय किसान विरोधी हैं. इसका विरोध जारी रखेंगे. हरसिमरत बादल के इस्तीफे पर पंजाब भाजपा ने बयान जारी कर कहा कि, शिरोमणि अकाली दल की अपनी मजबूरी हो सकती हैं. उधर दूसरी ओर, इस कदम के पीछे सन 2022 में होनेवाले पंजाब विधानसभा चुनावों की सोची समझी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा हैं. कल ही शिरोमणि अकाली दल के सर्वोसर्वा स. प्रकाशसिंह बादल ने प्रस्तुत विधेयक की सराहना कर उसे किसानों का हितकारी बताया था. लेकिन आज लोकसभा और राजयसभा में अकाली दल के नेताओं ने विधेयक का विरोध कर दिया. हरसिमरतकौर बादल ने सदन समाप्त होने के पश्च्यात पत्रकारों को जानकारी दी कि, उन्होंने लिखित स्वरुप में अपना त्यागपत्र दे दिया हैं. हालांकि केंद्र सरकार ने अभी तक उसे मंजूर नहीं किया हैं. यह इस्तीफा मामला पंजाब में नई राजनीतिक सरगर्मियां पैदा करने के लिए पर्याप्त है. मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदरसिंह ने देरी से उठाया गया एक छोटा सा कदम बताया है. उन्होंने कहा, कांग्रेस तो पहले ही इस बिल का विरोध कर चूकी है. 


महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ शिरोमणि अकाली दल मैदान में !!

महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ उतरा शिरोमणि अकाली दल !

सिरसा ने कंगना का खुलकर समर्थन किया

 

उड़ता बॉलीवुड !!

रविंदरसिंघ मोदी 

बॉलीवुड में ड्रग के प्रचलन की बात लेकर शिरोमणि अकाली दल बादल के नेता और दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदरसिंह सिरसा ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र सरकार और महाराष्ट्र पुलिस को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया. वहीं नैशनल चैनल्स पर कंगना राणावत का खुलकर समर्थक भी किया. 

श्री सिरसा ने बॉलीवुड में नशे की बात का प्रचलन होने का आरोप लगाकर कहा कि, मैंने महाराष्ट्र पुलिस को एक साल पहले एक वीडियो पेशकर उसमें पार्टी कर रहें बॉलीवुड कलाकारों के खिलाफ नशा प्रतिबंध कानून के तहत करवाई करने की मांग की थी. लेकिन मुंबई पुलिस ने कोई करवाई नहीं की. सिरसा ने करण जोहर, शहीद कपूर और अन्य बॉलीवुड हस्तियों के खिलाफ भी आरोप जड़े कि उन्होंने "उड़ता पंजाब" मूवी बनाकर पंजाब की बदनामी की. 

श्री सिरसा ने कहा, हकीकत में तो उड़ता बॉलीवुड का नजारा देश देख रहा हैं. शिवसेना की सरकार एक महिला (कंगना) का ड्रग्स मामले मे बयान लेना चाह रहीं हैं. इस सरकार में मर्दानगी वाली बात नहीं नजर आ रहीं. आजतक न्यूज़ चैनल पर बृहस्पति वार को हुए दंगल इस चर्चा सत्र में भी सिरसा ने आक्रामक तेवर अपनाते शिवसेना प्रवक्ता श्री किशोर तिवारी को उकसाते हुए कहा, क्या एक महिला के पीछे पड़े हो. तुम (शिवसेना) क्या कर लेगी. रास्ते पर उतर कर दिखाओ ! 

उल्लेखनीय है कि, शिरोमणि अकाली दल, केंद्र सरकार में भागीदार है. उड़ता पंजाब फिल्म प्रदर्शित होने के बाद शिरोमणि अकाली दल के पंजाब, दिल्ली और महाराष्ट्र के नेताओं ने बॉलीवुड के खिलाफ प्रदर्शन किया था. लेकिन उस समय महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार थी और श्री देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री थे. इसलिए अकाली नेताओं का प्रदर्शन सिमित ही रहा था. पंजाब में फिल्म की रिलीज पर असर हुआ था लेकिन उड़ता पंजाब ने विदेशो में बड़ी कमाई की थी. ये भी एक संयोग है कि शिवसेना के मुखपत्र सामना ने भी उड़ता पंजाब फिल्म के शीर्षक पर आलोचना की थी. एक तरह से शिवसेना की भूमिका उस समय शिरोमणि अकाली दल के समर्थन में दिखाई दी थी. लेकिन आज की उत्पन्न परिस्थिति में शिरोमणि अकाली दल ने शिवसेना के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया हैं. 

मनजिंदरसिंह सिरसा का बयान लगभग सभी समाचार चैनल्स ने मुख्य समाचार के रूप में दिखाया. सभी बड़े चैनल्स ने उन्हें बहस के लिए आमंत्रित किया. जाहिर इसके पीछे किस शक्ति का हाथ हैं ! सिरसा के बयान और उनकी शिवसेना को लेकर भाषा देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि शिरोमणि अकाली दल केंद्र की किस तरह से सेवा कर रहा हैं. यह ड्रग्स का विषय बॉलीवुड के लिए समस्या तो बना हुआ हैं लेकिन शिरोमणि अकाली दल इस बात से भी असहमति नहीं जता सकता कि पंजाब में नशे का प्रचलन और कारोबार खत्म हो गया हैं. 




मंगलवार, 15 सितंबर 2020

जम्मू - कश्मीर में "पंजाबी" को सरकारी भाषा का सम्मान मिलना चाहिए

 जम्मू - कश्मीर में "पंजाबी" को सरकारी भाषा का सम्मान मिलना चाहिए 

रविंदरसिंघ मोदी 


इन दिनों जम्मू - कश्मीर में कार्यालयीन भाषा के रूप में पंजाबी भाषा (गुरुमुखी लिपि) को मान्यता देने की व्यापक मांग हो रहीं हैं. पहले जम्मू से उठीं मांग धीरे धीरे पंजाब, हरियाणा होते हुए दिल्ली पहूंच गईं. ता. 2 सितंबर 20 के दिन जम्मू कश्मीर कैबिनेट में भाषा आर्डिनेंस प्रस्तुत हुआ जिसमें प्रदेश के कार्यालयीन सरकारी भाषा के तौर पर कश्मीरी, डोंगरी और हिन्दी को मान्यता प्रदान की गईं. इससे पूर्व वहाँ उर्दू, अंग्रेजी को कामकाज की भाषा के रूप में अधिक प्रयोग में लाया जाता रहा था. यह भाषा आर्डिनेंस (bill) मंजूरी के लिए सांसद में प्रस्तुत किया गया. 

जम्मू - कश्मीर में उपर्युक्त सरकारी भाषाओं में पंजाबी भाषा को शामिल करने की मांग बहुत जोर पकड़ रहीं हैं. शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीरसिंह बादल ने भी उपर्युक्त विषय में अपना पक्ष प्रस्तुत किया. डॉ. फारुख अब्दुल्लाह ने भी अपनी ख़ामोशी में एक तरह से एनओसी प्रदान कर दी. अब मामला प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के हाथ हैं. भारतीय संविधान में अध्याय 17 अंतर्गत धारा 343 से 351 तक राष्ट्रीय भाषा और प्रादेशिक भाषाओं की रचना, अस्तित्व, उपयोगी और व्यवहार का समायोजन अधिकार प्रस्तुत किये गये हैं. धारा 345 द्वारा प्रस्तुत अधिकारों के वर्णन के मुताबिक धारा 346 और 347 के प्रभाव में प्रदेश (state) की आधिकारिक भाषा प्रस्तावित करने के पूर्ण अधिकार राज्यों को सौपें गए हैं. 

देश में अभी तक 22 भाषाओं को मुख्य भाषा के रूप में चुना गया हैं जिनका किसी भी राज्य में वहाँ की सरकार इच्छित भाषा को सरकारी कामकाज के लिए स्वीकार कर सकती हैं. लेकिन उसके लिए संसद में विशेष ऑर्डिनेंस पास करवाना जरुरी है. उस ऑर्डनेन्स को महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा भी मान्यता प्रदान करना आवश्यक है.  पंजाबी भाषा का शुमार देश की 22 भाषाओं में होने के कारण जम्मू कश्मीर राज्य में उसे आधिकारिक सरकारी भाषा के रूप में मान्यता प्रदान हो सकती है.

पंजाबी भाषा उत्तर पश्चिम में विस्तारित बोली भाषा के रूप में कई सदियों से प्रचलित थीं और आज भी है. पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, पाकिस्तान अंतर्गत पंजाब, अफगानिस्तान तक पंजाबी बोली भाषा व्यवहार में प्रस्तुत थीं. साढ़े पांच सौ वर्षों में इस बोली भाषा को गुरुमुखी लिपि भी उपलब्ध हो गईं. पंजाब और हरियाणा राज्यों में पंजाबी को आधिकारिक सरकारी भाषा का स्तर प्रदान हैं. पूर्व में कश्मीर राज्य पर सिख राजा महाराजा हरी सिंघ का साम्राज्य था. जिन्होंने कश्मीर का विलय स्वतंत्रता पश्च्यात भारत गणराज्य में करवाया था. उनके समय में वहाँ पंजाबी भाषा प्रचलित थीं और व्यवहार का हिस्सा थीं. सिखों के षष्ठ गुरु, श्री हरिगोबिन्द साहिब की कर्मभूमि बहुत समय तक कश्मीर रहीं थीं. उससे भी सक्षम पहलु यह माना जाना चाहिए कि, कश्मीरी पंडितों के धर्म को बचाने के लिए सिखों के नवम गुरु श्री तेगबहादुर जी ने अपने शीश का बलिदान दिया था. क्या यह ऐतिहासिक पहलु वर्तमान केंद्र सरकार नजर अंदाज कर सकती हैं?  

आज पंजाब से लेकर दिल्ली तक पंजाबी भाषा प्रचलन में हैं. पूर्व में महाराजा रणजीतसिंघजी के साम्राज्य काल में पंजाबी भाषा अफगानिस्तान तक विस्तारित हुईं थीं. 1960 तक अफगानिस्तान और पाकिस्तान में पंजाबी भाषा और गुरुमुखी लिपि का प्रचलन था. लेकिन बाद में वहाँ के राजनीतिक हालात में परिवर्तन होने के बाद भाषा भी सिमटकर रह गईं. लेकिन कश्मीर के बहाने अब पंजाबी भाषा को विस्तारित करने का एक अवसर उपलब्ध हो रहा हैं. अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर दो राज्यों में विभाजित कर उसमें से लद्दाख को अलग राज्य बनाया गया. जिसके कारण कश्मीर में दुबारा से राज्य की आधिकारिक भाषा की पुनर्रचना हो रहीं हैं. पंजाबी भाषा को कश्मीर और जम्मू में आधिकारिक भाषा का स्तर मिलना न्यायोचित होगा. 





एसजीपीसी टॉस्क फोर्स द्वारा धरना दे रहें जत्थेबंदियों की पिटाई !

 एसजीपीसी टॉस्क फोर्स द्वारा धरना दे रहें जत्थेबंदियों की पिटाई !

मीडिया कर्मियों के साथ हाथापाई 

रविंदरसिंघ मोदी 

अमृतसर श्री दरबार साहब परिसर से सलग्न श्रोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी कार्यालय के बाहर आज एसजीपीसी टॉस्क फ़ोर्स द्वारा वहाँ धरने पर बैठें जत्थेबंदियों पर हमला कर उनकी पिटाई कर देने का एक मामला सामने आया हैं. टॉस्क फ़ोर्स कर्मियों द्वारा पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की भी पिटाई कर दी गईं. इस मारपीट घटना को लेकर जहाँ एसजीपीसी के प्रधान भाई गोबिंदसिंघ लोंगोवाल को लेकर रोष का वातावरण बन गया है वहीं घटना के पीछे शिरोमणि अकाली दल के नेताओं की साजिश होने के भी आरोप लगाएं जा रहें हैं. 

उल्लेखनीय है कि, विगत कुछ दिनों से श्री गुरु ग्रंथसाहब जी के 328 बीड साहब के गायब (चोरी) होने का मामला सुर्खियों में हैं. इस विषय में सिख जत्थेबंदियों द्वारा एसजीपीसी से सवाल किये जा रहें हैं. उक्त मामले को लेकर सिख जत्थेबंदियां धरना धरे बैठीं हैं. घटना की गंभीरता देखकर एसजीपीसी कार्यालय के बाहर टॉस्क फोर्स को तैनात कर दिया गया. सोमवार ता. 14 सितंबर को जत्थेबंदियों द्वारा प्रधान भाई गोबिंदसिंघ लोंगोवाल को एक ज्ञापन भी सौंपा गया था. उस समय तनाव का वातावरण बन गया था. 

लेकिन मंगलवार ता. 15 सितंबर की दोपहर के समय अचानक से टॉस्क फोर्स द्वारा धरने पर बैठे लोगों को उठाने का प्रयास किया. जिसके बाद मामला दो गुटों में झड़प और मारपीट तक पहूंच गया. टॉस्क फोर्स द्वारा इस समय घटना का कवरेज कर रहें मीडिया कर्मियों पर भी हमला कर उनकी पिटाई कर दी गईं. पत्रकारों के साथ की गईं हाथापाई की घटना के बाद एसजीपीसी के खिलाफ रोष व्यक्त हो रहा हैं. 

दूसरी ओर श्री गुरु ग्रंथसाहिब के पावन स्वरूपों की चोरी मामले में एसजीपीसी की चुप्पी रहस्य बढ़ा रहीं हैं. आरोप लगाएं जा रहें हैं कि, आज धरना दे रहें जत्थेबंदियों के साथ किये गए दुर्व्यवहार के पीछे शिरोमणि अकाली दल के शीर्ष नेताओं का हाथ हैं. आज हुईं झड़प और मारपीट मामले में भाई गोबिंदसिंघ लोंगोवाल की छवि पर भी सवाल उठ रहें हैं. 

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सोमवार, 14 सितंबर 2020

हिन्दी समृद्धि की ओर

 लेख : हिन्दी दिवस 

उपराष्ट्रपति जी का वो हिंदी में दिया गया संस्मरणीय भाषण !!

भाषा के प्रति सोच में बदलाव जरुरी 

हिंदी समृद्धि की ओर !

रविंदरसिंह मोदी 


बात वर्ष 2017 की है. मैं, हैदराबाद स्थित दक्षिण भारत हिंदी प्रचारसभा  (विश्वविद्यालय) द्वारा खैरताबाद के श्री सत्यसाई ऑडिटोरियम में आयोजित दीक्षांत समारोह में पत्रकार दीर्घा में आमंत्रित पत्रकार अतिथि के रूप में उपस्थित था.  दीक्षांत समारोह को महामहिम उपराष्ट्रपति श्री व्यंकय्या नायडू संबोधित कर रहे थे. उनका हिंदी में दिया गया भाषण सुन कर मैं तो क्या वहाँ उपस्थित हर कोई अभिभूत हो उठा. 

लगभग सौ वर्ष पूर्व महात्मा गांधीजी द्वारा स्थापित संस्था दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा का यह सोलहवां दीक्षांत समारोह था. कार्यक्रम में आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और अन्य स्थानों से प्रतिनिधि, विद्यार्थी और शिक्षा क्षेत्र की बड़ी बड़ी हस्तियां उपस्थित थीं. उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू की उपस्थिति उस कार्यक्रम की गरिमा बढ़ा रहीं थीं. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के पूर्व कुलपति एवं पूर्व राज्य सभा सांसद श्री एच. हनुमंत्तपा, तेलंगाना प्रदेश के उप मुख्यमंत्री श्री महमूद अली, खैरताबाद के विधायक श्री चिन्तल रेड्डी,  द.भा.हि.प्र. सभा के समकुलपति श्री आर.आफ. निरलकट्टी, द.भा.हि.प्र. सभा के तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के अध्यक्ष श्री पी. ओबय्या, जनरल सेक्रेटरी एस.जयराम, द.भा.हि.प्र. सभा के सचिव सी.यस. होसगौडर ने मंच साँझा कर हिंदी भाषा की समृद्धि और विकास को लेकर अपनी भावनाएं व्यक्त की थीं. जो हिन्दी भाषा के प्रचार को समर्पित प्रतीत हुईं. 

लेकिन उस भव्य सभा में उपराष्ट्रपति नायडू द्वारा हिंदी में दिया अभिभाषण सुनना मेरे लिए सचमुच जीवन का एक संस्मरणीय समय रहा. उस कार्यक्रम में तेलगु, तमिल भाषा और हिंदी भाषा के जानकर उपस्थित थे जो अपनी जगह सतर्क होकर उनका अभिभाषण सुन रहें थे. श्री नायडू ने अपने संबोधन में निष्पक्ष और प्रामाणिक विचार रखते हुए कहा था, 'दक्षिण भारत के कुछ प्रदेशों में हिंदी भाषा को लेकर आज भी अनावश्यक रूप से विरोध दर्शाया जा रहा हैं. हिंदी भाषा का विरोध करनेवाले, क्यों नहीं समझते कि, हिंदी भाषा में ही वो सामर्थ्य है कि भारत जैसे बहुभाषी छवि वाले देश की संपर्क भाषा के रूप में अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर नेतृत्व करें. हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जो देश और विदेशों में एक तरल और सरल भाषा बनकर सभी का पक्ष प्रस्तुत कर सकें. हिंदी भाषा परिपूर्ण और संवाद के लिए आसान जान पड़ती है.इसलिए, वास्तविकता यह है कि हिंदी भाषा में विश्व नेतृत्व करने की पूर्ण क्षमता व्याप्त है.' 

श्री नायडू ने अपने बचपन का प्रसंग स्मरण करते हुए उसे सुनाया था जो दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंदी को लेकर किये गए विरोध का चित्रण था. नायडू सुना रहे थे, 'जिस समय हमारे पास (दक्षिण) हिंदी का विरोध शुरू हुआ था तब उस आंदोलन में मैं भी शामिल हो गया था. मैं,  आंध्रप्रदेश के नेल्लूर जिले के चावतापलेम गांव में पढ़ाई कर रहा था. पता नहीं कैसे हिंदी विरोधी आंदोलन की तीव्रता हमारे उस छोटे से गांव तक आ पहुंची और हम सब उसमें शामिल हो गए. हमें पता नहीं था कि गांव-गांव हिंदी का विरोध क्यों किया जा रहा था. हम उत्सुकता के प्रवाह में कहिए, उस आंदोलन में कूद पड़े. हमने पता किया कि हिंदी को लेकर हमारे गांव में कहां-कहां कार्य हो रहे हैं. खोजबीन की तो पाया कि, हमारे गांव में केवल दो स्थानों पर ही हिंदी भाषा में लिखीं हुई तख्तियां उपलब्ध थीं. एक तख्ती डाकघर लगी हुई थी और दूसरी रेलवे स्थानक पर. उन तख्तियों पर हिंदी में गांव और स्टेशन के नाम लिखें हुए थें. हमने उस समय आंदोलन कर हिंदी भाषा में लिखीं उन दो तख्तियों पर कालिख मल दी. लेकिन उस घटना पर मन ही मन अफ़सोस उस समय हुआ, जब मैंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा. मुझे आज वो सोचकर बहुत अफ़सोस होता है की मैं उस आंदोलन का हिस्सा क्यों बना था. आज लगता है मैंने उन तख्तियों पर नहीं बल्कि अपने ही मुँह पर कालिख मल दी थी शायद.'  

वेंकैया नायडू ने जब प्रमाणिकता से उपर्युक्त बात स्वीकार की, तब उस ऑडिटोरियम में एक अजीब सी शांति छा गई थी. सब लोग टकटकी लगाएं श्री नायडू को देख रहे थे. नायडू भी कुछ गंभीर भाव से सदन को निहार रहे थे. दो पल मौन रहकर श्री नायडू ने अपनी बात आगे बढ़ाई और बोले, 'मैं, आगे चलकर राजनीति में सक्रिय हो गया. राजनीति क्षेत्र में कार्य करते समय मैं यह देखकर हैरान रह गया कि देश में हर स्थान पर हिंदी भाषा का कितना महत्व है. पश्च्यात हिंदी भाषा के प्रति मन में व्याप्त मेरी भावनाएं भी बदलने लगीं. भाषा द्वेष को लेकर मेरी सोच बदल गई. उसके बाद मैंने हिंदी सीखना आरंभ कर दिया. १९९३ के बाद मैंने अच्छे से हिंदी भाषा का अध्ययन शुरू कर दिया. अच्छी हिन्दी सिखने के कारण ही भारतीय जनता पार्टी ने मुझे देश के कई राज्यों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ प्रदान की. आगे चलकर मैं, भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाया गया.'

श्री नायडू ने उस भाषण में , हिंदी भाषा के प्रति प्रचलित गलतफहमियां को लेकर चिंता भी जताई थीं. उन्होंने कहा था, 'हमें 'भाषा विरोध' के बजाय अन्य भाषा सिखने के प्रयास करने चाहिए. देशवासियों को तमिल, मराठी, तेलगु, बंगाली, कन्नड़, उड़िया जैसी भाषाएँ भी सीखनी चाहिए. क्योंकि हमारा देश बहु संस्कृतियों से लबालब है. हमें दो से तीन प्रादेशिक भाषाएँ भी आनी जरुरी हैं. मैं अंग्रेजी का समर्थक नहीं हूँ लेकिन एक भाषा के महत्व और अस्तित्व को समझता हूँ. इसलिए कहूंगा कि, अंग्रेजी से परहेज करने के बजाय अंग्रेजी मानसिकता से परहेज करना बेहतर होगा. 

उपराष्ट्रपति श्री व्यंकय्या नायडू ने एक महत्वपूर्ण बात कही थी जो मेरे संस्मरण में है. उन्होंने कहा था, "मैं जीवन में चार बातों को बहुत महत्व देता हूँ, एक माँ, दूसरी जन्मभूमि, तीसरी मातृभाषा और चौथी बात मातृदेश. यह बातें उच्चारी जाये तो भीतर से आवाज निकलती है. जबकि मम्मी-डैडी जैसे शब्द होठों के सहायता से बोले जाते हैं. हमें सबसे पहले अपनी माँ से प्रेम करना चाहिए, उसका सम्मान करना चाहिए, बाद में मातृभाषा से प्रेम करन चाहिए. यह बातें हमें देशभक्ति सिखाते हैं. मैं, इस विषय में सरकार से भी बात करूँगा कि यू.पी.एस. सी. और बैंकों की परीक्षाएं अलग-अलग राज्यों में उनकी मातृभाषाओं में भी हो. हमारे प्रधानमंत्री हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के लिए दिन-रात प्रयत्न करते रहते हैं. हिंदी के प्रचार - प्रसार के लिए जो आवश्यक होगा वो जरूर किया जायेगा. हमें महात्मा गाँधी और दिनदयाल उपाध्याय जैसे लोग, जिन्होंने हिंदी के लिए काम किया हैं उनके विचार भी पढ़ने चाहिए."

श्री नायडू द्वारा अभिव्यक्त वो भाषण, हिंदी भाषा, संस्कृति, देशभक्ति और चरित्र का प्रामाणिक स्पष्टीकरण प्रतीत हुआ था. उनके द्वारा दिया भाषण हिंदी भाषा के प्रचार - प्रसार के लिए बहुत उपयोगी प्रतीत होता है और एक उदाहरण भी कि हिंदी भाषा के समर्थन में मानसिकता में परिवर्तन भी संभव हैं. सन 1918 में महात्मा गांधी द्वारा इंदौर में पहली बार हिंदी भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने की दिशा में पहल शुरू की गईं थीं. उसी समय हैदराबाद संस्थान में भी प्रचंड विरोध के बावजूद दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा का कार्य महात्मा गांधी द्वारा प्रोत्साहित किया गया था. देश स्वतंत्र होने के बाद तिथि 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में संविधान सभा ने स्वीकार किया लेकिन पहली बार हिंदी दिवस मनाने की प्रथा सन 1953 से प्रारंभ हुई जो आज भी जारी हैं. 

देश और विदेशो में हिंदी भाषा विस्तारित हो रहीं हैं. आज विश्व की दस सशक्त भाषाओं में हिंदी का भी समावेश माना जा रहा हैं. सन 2001 के भाषा सर्वेक्षण के मुताबिक विश्व में हिंदी बोलने वालों का प्रमाण 41.03 प्रतिशत था, जो सन 2011 के सर्वेक्षण में 43.63 प्रतिशत पाया गया. विगत नौ वर्षों में यह प्रमाण 50 प्रतिशत होने की संभावना मानी जा रहीं हैं लेकिन इसका स्पस्टीकरण वर्ष 2021 में ही घोषित होगा. इसमें कोई दोराय नहीं कि हिंदी भाषा का प्रचलन विश्व में बढ़ रहा हैं. हिंदी अब व्यवहार, व्यापार और सरकार की भाषा बन गई हैं. हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी जब अमरीका में हजारों, लाखों लोगों को हिंदी में सम्बोधित करते हैं, तब विदेश की धरती पर हिंदी भाषा की समृद्धि का अपने आप सूत्रपात हो ही जाता हैं. इसलिए हिंदी भाषा की समृद्धि, विस्तार और विकास के लिए देश के प्रत्येक नागरिक को सकारात्मक होना जरुरी हैं. उपराष्ट्रपति महामहिम श्री व्यंकय्या नायडू ने जिस तरह से हिंदी भाषा को लेकर सकारात्मक सोच अपनाई हैं वो देश के नागरिकों के सामने एक सक्षम उदाहरण है. 

स. रविंदरसिंह मोदी 
नांदेड़ (महाराष्ट्र)

रविवार, 13 सितंबर 2020

मेरी ख़ामोशी को मेरी कमजोरी ना समझें - उद्धव ठाकरे

 मेरी ख़ामोशी को, मेरी कमजोरी ना समझें - उद्धव ठाकरे

कोविड की दूसरी लहर !

(श्री उद्धव ठाकरे, मुख्यमंत्री)

रविंदरसिंघ मोदी 

महाराष्ट्र में बढ़ती जा रहीं राजनीतिक गतिविधियों और विपक्ष के तेज होते हमलों को जवाब देते हुए मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि कुछ लोग राजनीति की हद पार कर महाराष्ट्र सरकार और महाराष्ट्र प्रदेश को बदनाम कर रहें हैं. उन्हें अपनी राजनीति से बाज़ आ जाना चाहिए. ये सब बर्दाश्त नहीं किया जायेगा. मेरी ख़ामोशी को कोई मेरी कमजोरी कह कर ना आंके. उद्धव ठाकरे रविवार की दोपहर टेलीविजन मीडिया पर सभी नागरिकों को संबोधित कर रहें थे. उद्धव ठाकरे ने मराठा आरक्षण को लेकर अपनी भूमिका भी स्पष्ट की. बहुत दिनों बाद उद्धव ने आज महाराष्ट्र की जनता और मीडिया का सामना किया. उनका स्वागत है. 

जाहिर हैं कि उद्धव ने अपनी बात रखते हुए इशारों इशारों में दिल्ली में शतरंज की बाजी सजाये बैठें राजनीति के पासेबाजो को भी सीधी चेतावनी दे डाली. दूसरी ओर महाराष्ट्र में राजनीति कर रहें स्थानीय नेताओं को भी अपनी भूमिका से अवगत करवा दिया. विगत दो - तीन माह से महाराष्ट्र राजनीतिक पटल पर अशांत हैं. अभिनेता सुशांतसिंह राजपूत की आत्महत्या मामला, अभिनेत्री रेहा चक्रवर्ती की सी. बी. आई. जाँच का मामला, फिल्म अभिनेत्री कंगना राणावत द्वारा प्रस्तुत की जा रहीं राजनीतिक चुनौतियों का ताजा मामला, विपक्ष की आक्रामकता, अधिवेशन के संसदीय कामकाज का तनाव, सरकार में शामिल मित्र दलों का रवैय्या और मीडिया पर उछाली जा रहीं शिवसेना की छवि जैसे मुद्दों से मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे चिंता में हैं. 

ऐसे में अभी मुंबई में शिवसैनिकों द्वारा एक पूर्व नेवी अधिकार की गई पिटाई का मामला भी शिवसेना को क्षति पहुंचा गया. मराठा आरक्षण भी विषय सरकार के खिलाफ माहौल दिखाई दे रहा हैं.  गली से लेकर दिल्ली तक शिवसेना को आहत करने का प्रयास हो रहा हैं. ऐसे हालातों में शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत अकेले ही बोले जा रहे हैं. उद्धव ठाकरे उपर्युक्त विषयों पर चुप्पी साधे बैठें थे. 

आज उद्धव ठाकरे को अपनी उपस्थिति दर्ज करानी पड़ गई कि, है, मैं भी हूँ राजनीति में. मैं भी सवालों का जवाब दे सकता हूँ. सही समय पर उद्धव ठाकरे ने अपनी बात कही. जिसका एक असर तो राज्यपाल महामहिम से मिलने पहुंची कंगना राणावत के व्यवहार में भी देखने को मिला. राज्यपाल से मिलने के कंगना राणावत ने यह कहा कि, मैं एक नागरिक की हैसियत से महामहिम राज्यपाल से मिलने आई थी. उनसे मिलकर मैंने अपने घर पर हुईं बी.एम. सी. की करवाई की शिकायत की हैं. कंगना द्वारा कोई अन्य राजनीतिक बयान नहीं दिया गया. उद्धव के मीडिया में सक्रिय होने का इसे परिणाम कहा जा सकता हैं. 

श्री ठाकरे ने आज महाराष्ट्र में व्याप्त कोरोना संक्रमण के हालातों पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि कोरोना की यह दूसरी लहर लौट आई है और नागरिक इससे सुरक्षित रहे. उन्होंने अस्पतालों में साहित्य सामग्री उपलब्ध करवाने और कोविड संक्रमण का डटकर सामना करने का आश्वासन दिया. महाराष्ट्र में हालात चिंताजनक होने की बात उन्होंने स्वीकार की. प्रदेश के इन हालातों में कुछ लोग सत्ता का खेल, खेलकर महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन का दांव लगा रहे हैं. इसके लिए बाहर से मोहरे आयात किये जा रहे हैं. 

सुशांतसिंह राजपूत की मौत महाराष्ट्र की सरकार पर प्रहार करने और बिहार के चुनाव अपने पक्ष में प्रभावित करने का अच्छा खेल शुरू हैं. विपक्ष के नेता अपने राज्य से अधिक दिल्ली से अधिक लगाव रखते हैं यह अलग से कहने की बात तो नहीं हैं. लेकिन मुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख के रूप में उद्धव ठाकरे की मीडिया में वापसी जरुरी हो गई थी. यदि उद्धव ठाकरे इस बात का अहसास नहीं करवाएंगे कि शिवसेना एक आक्रामक राजनीतिक पार्टी है, तो विपक्ष प्रति पल शिवसेना को नोचता रहेगा इसमें संदेह नहीं है. ख़ामोशी में अक्सर बहुत से सवालों के जवाब दबकर रह जाते हैं. फब्तियां कसने वाले ऐसे समय राजनीतिक भड़ास निकाल लेते हैं. उद्धव ठाकरे को अपनी "पुरानी शिवसेना छवि" जागृत करनी होगी. अन्यथा पार्टी का राजनीतिक आधार घट जायेगा. इसलिए इस वापसी का संज्ञान उन लोगों को भी लेना चाहिए जो अपने घर बैठकर शल मीडिया को हथियार बनाने में लगे हुए हैं. शिवसेना पार्टी को पिछले 60 वर्षों का इतिहास हैं. पार्टी का कार्य महाराष्ट्र की बुनियादी मुद्दों से सलग्न हैं. विचलन, संकट और विरोधाभास में भी स्वर्गीय बालासाहब ठाकरे ने शिवसेना की आक्रामकता कम नहीं होने दी थीं यह इतिहास अलग से अवगत करवाने की आवश्यकता नहीं हैं. 


शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमण चरम पर

 महाराष्ट्र में कोरोना चरम पर 

पॉजिटिव मरीजों की संख्या 10 लाख पार !

रविंदरसिंघ मोदी 

कोरोना संक्रमितों की संख्या को लेकर महाराष्ट्र अब विश्व में पांचवें स्थान पर पहूंच गया है. महाराष्ट्र प्रदेश में 11सितंबर 20 के दिन संक्रमितों की संख्या दस लाख को पार कर गईं. वहीं विगत छह माह से उत्पन्न इस त्रासदी में राज्य में जान गंवा चूके लोगों का आकड़ा 28, 282 हो गया हैं. आज 448 लोगों की जानें चली गईं. वहीं नये मरीजों की आज की संख्या 23446 बताई जा रही हैं. कुलमिलाकर महाराष्ट्र प्रदेश कोरोना के संक्रमण से सराबोर हो चला हैं. 

दूसरी ओर भारत (देश) में शुक्रवार को संक्रमित मरीजों का आकड़ा 46 लाख 46 हजार से अधिक हो चला हैं. सबसे अधिक चिंतावाली बात यह हैं कि एक दिन में 86 हजार 344 केसेस सकारात्मक पाए गए. एक दिन में देश में 1052 मौतें हुई और छह माह की इस त्रासदी में मरनेवालों का अंक 77 हजार 336 पर पहूंच गया. यह चित्र देखने के बाद देश में महाराष्ट्र की स्थिति किस तरह से गंभीर हो गईं हैं उसका अंदाजा लगाया जा सकता हैं. सितंबर का यह माह गंभीर परिणाम दे रहा हैं. इसलिए सभी से यह अपेक्षा की जा सकती हैं कि जितना अधिक समय आप घर पर रहोगे, उतना सुरक्षित रहोगे. 

दूसरी ओर अमरीका में कोरोना संक्रमितों का आकड़ा 65 लाख 98 हजार से अधिक हैं. अमरीका में पॉजिटिव केसेस अब घटने लगे हैं. भले ही वहां मरनेवालों का आकड़ा 1 लाख 96 हजार 470 हैं लेकिन आज के दिन 24 घंटों में मौतों का अंक 152 तक नियंत्रित करने में उन्हें सफलता अर्जित हुई हैं. अमरीका आज कोरोना केसेस में भले एक नंबर पर हैं, लेकिन कोरोना संक्रमण का डटकर मुकाबला किया जा रहा हैं. भारत दूसरे स्थान पर हैं. वहीं तीसरे स्थान पर ब्राजील और चौथे स्थान पर रूस हैं. 

पेरू, कोलम्बिया, दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, स्पेन आदि देशों ने कोरोना संक्रमितों में मरनेवालों का आकड़ा शून्य पर लाया हैं. भारत में भी अन्य देशो की तरह उपाय योजना आवश्यक हैं. विशेषकर महाराष्ट्र की बिगड़ती चली जा रहीं परिस्थिति को नियंत्रित किया जाना जरुरी हैं. 

श्री दशम ग्रन्थ साहब की कथा का विरोध क्यों?

 श्री दशम ग्रन्थ साहब की कथा का विरोध क्यों? 

रविंदरसिंघ मोदी 

तिथि 1/09/2020 से 8/09/2020 के दरम्यान गुरुद्वारा श्री बंगलासाहब, दिल्ली में श्री दशम ग्रंथसाहब अंतर्गत दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज की आत्मकथा पर आधारित कथा करवाई गईं. दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा यह कथा दरबार आयोजित करवाया गया था. इसलिए इस धार्मिक संस्था की सराहना होनी चाहिए, इस कार्य के लिए संस्था के अध्यक्ष विधायक मनजिंदर सिंघ सिरसा भी बधाई के पात्र है. 

श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज खालसा पंथ के सृजनहार है. उन्होंने अमृत की दात के साथ पांच ककार अंगीकृत एक विशेष पहरावा भी प्रदान किया. जिसके कारण आज भीड़ में खड़ा सिख (खालसा) आसानी से पहचाना जा सकता है. ऐसे गुरु के आत्मचरित्र 'बचित्र नाटक' की कथा का विरोध तखत श्री दमदमा साहब के पूर्व जत्थेदार (विज्ञानी) भाई केवलसिंघजी द्वारा किया गया है. अखबारों में बयान जारी कर इस कथा का विरोध और श्री दशम ग्रन्थ साहब का विरोध उन्होंने शुरू किया है. वें पंत के विद्धवान माने जाते है ! मुझे लगता है, उनका विरोध संकुचित बुद्धि का उदाहरण माना जाना चाहिए. 

तखत दमदमा साहब वो स्थान है जहाँ श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज ने श्री आदि गुरु ग्रंथसाहब की दुबारा से संपादन करवाई थीं. गुरु जी दमदमा साहब में लगभग चार वर्ष का समय लगाकर गुरूजी ने दुबारा से श्री आदि गुरु ग्रन्थ साहब जी का स्वरुप पूर्ण करवाया था. कहा जाता है कि वहां तैयार की गईं प्रतियों में से एक मुख्य स्वरुप को गुरूजी अपने साथ लेकर श्री हजुरसाहब पहुंचे थे जिस पर महाराज के दस्तखत भी मौजूद थे. तखत दमदमा साहब का इतिहास बहुत कुछ कहता है लेकिन वहां के जत्थेदार रह चूके भाई केवलसिंघ जी उस इतिहास को सुनना नहीं चाहते. लग गए अपने ही गुरु की आत्मकथा का विरोध करने! 

श्री दशम ग्रन्थ साहब सिखों के अमर इतिहास की सबसे बड़ी साक्ष्य है. यह सिख इतिहास का सबसे प्रामाणिक संदर्भ ग्रन्थ है. इससे प्रामाणिक विरासत कोई दूसरी नहीं हो सकती. अपने अंतिम समय में श्री गुरु गोबिंदसिंघ जी महाराज ने श्री आदि गुरु ग्रन्थ साहब को गुरुता प्रदान कर सिखों को आदेश दिया था "अगिया भई अकाल की तबै चलायो पंथ, सभ सिखन को हुकूम हैं गुरु मानियो ग्रन्थ "

यह संदर्भ जाँच लीजिए भाई केवलसिंघ जी ! गुरु जी ने कहीं भी यह नहीं कहा कि श्री दशम ग्रन्थ को "गुरु" का संबोधन दिया जाये. ग्यारहवें गुरु तो वहीं है जिनका चयन गुरु जी ने गुरुतागद्दी के लिए कहा था. हम सब भी वहीं आदेश मानते हैं. लेकिन गुरु जी ने यह भी नहीं कहा कि उनके द्वारा रचे गए श्री दशम ग्रन्थ का तिरस्कार करो. गुरु जी द्वारा बहुत परिश्रम के साथ श्री दशम ग्रन्थ साहब की रचना की गईं जिसमें 1428 पृष्ठ शामिल हैं. इस अद्धभुत ग्रन्थ में सभी धर्मो की जानकारी प्रदान की गईं हैं. गुरूजी के जीवन काल के समय में अध्यात्म क्षेत्र में जितने अवतार और धार्मिक कथाएं प्रचलित थीं, उनको गुरूजी ने अध्यन कर सिखों के लिए इस ग्रन्थ के माध्यम से प्रस्तुत की जो साहित्य का अद्धभुत और बहुगुणी उद्धारहण माना जाना चाहिए. 

खालसा पंथ की दीक्षा में जो अमृतपान करवाया जाता हैं, वो अमृत पांच बाणियों के मंथन से सृजित करने की प्रथा हैं. उन पांच बाणियों से श्री दशम ग्रन्थ साहब की तीन बाणिया भी शामिल हैं, जहाँ तक श्री हजूर साहब की अमृतपान शैली का समावेश हैं. भाई केवलसिंघजी को अमृत की दात प्राप्त करते समय ही विचार करना चाहिए था कि खालसा जीवन शैली का बुनियादी मापदंड श्री दशम ग्रन्थ साहब की नींव पर निर्भर हैं. अब इस उम्र में, क्या सिक्खी त्यागोगे? 


बुधवार, 9 सितंबर 2020

आज मेरा घर टूटा है..

आज मेरा घर टूटा है, 

कल तुम्हारा घमंड टूटेगा!

मुंबई बनीं राजनीति की युद्धभूमि 

रविंदरसिंघ मोदी 


फिल्म अभिनेत्री कंगना राणावत का मुंबई पहुँचने के बाद जारी किया गया बयान बहुत मार्मिक है. कंगना ने अपने बयान में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का नाम लिए बगैर कहा, "आज मेरा घर टूटा है, कल तेरा घमंड टूटेगा. जो हुआ अच्छा ही हुआ है मुझे कश्मीरी पड़ितों के दर्द का पता तो चला. मै, अब कश्मीर पर भी एक फिल्म बनाउंगी. " 

जाहिर है कि जिसका मकान टूटता है, उसे तो दर्द होता ही है. शिवसेना सरकार द्वारा कंगना के खिलाफ उठाया गया कदम एक तरह से उसे सहानुभूति प्रदान कर गया. हालांकि बीएमसी ने मकान का कुछ हिस्सा ही ढाया है, लेकिन कंगना को उस करवाई से शोहरत और सहानुभूति मिल गईं. अब कंगना केवल फिल्म अभिनेत्री नहीं बल्कि एक नेता और एक्टिविस्ट के रूप जाने जानी लगी है. इस घटना से कंगना के दिल्ली (गुजरात) कनेक्शन मजबूत हो गए हैं. 


कंगना विषय में शिवसेना पार्टी अब प्रदेश में भी अलग थलग होती नजर आ रही हैं. बीएमसी की करवाई से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सुप्रीमो श्री शरद पवार भी नाराज दिखाई दे रहे हैं. वहीं कांग्रेस पार्टी मौन धारण किये हुए है. मुंबई में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया डेरा डाले हुए हैं. एक तरह से मुंबई युद्धभूमि बनीं हुई हैं. आगे क्या होगा इस बात की उत्कंठा सभी को हैं. 

कंगना की बेछूट बयानबाजी ने शिवसेना को आहत कर रखा हैं. मुंबई पहुँचने के बाद पहले बयान में ही उसने उद्धव ठाकरे का नाम लिए बगैर "घमंडी" करार दिया. साथ ही चुनौती भी पेश की कि, आनेवाला कल तुम्हारे लिए ठीक नहीं होगा. कंगना ने आज ही "बाबर " और "बाबर की सेना" जैसे शब्द प्रयोग किये थे. जिससे यदि कोई आहत हुआ होगा तो निश्चित ही श्री उद्धव ठाकरे और उनके निकटतम सहयोगी श्री संजय राउत का नाम अग्रणी हैं. अब कंगना मुंबई पहुँच चुकी हैं तो निश्चित ही मुंबई में उनकी सुरक्षा को लेकर सारी जिम्मेदारी भी महाराष्ट्र सरकार की ही होगी. इसलिए जब तक कंगना मुंबई में रहेगी, तब तक मुंबई राजनीति की युद्धभूमि बनीं रहेगी इसमें कोई दोराय नहीं हैं. 


चल गया हथौड़ा... !

 चल गया हथौड़ा.... !!

रविंदरसिंघ मोदी 

मराठी में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है, "सत्ते पुढे शहाणपण चालत नाही. ". सत्ता जब हाथ हो तो सारे नियम, कानून, कार्यालय, पुलिस और प्रशासन सब कुछ अपने हाथ ! देखिए कंगना राणावत के मुंबई पहुंचने से पहले ही उनके मुंबई के पाली हिल स्थित कार्यालय (बंगले) पर महानगर पालिका ने हथौड़ा चला दिया. अवैध निर्माण और निश्चित लेआउट में बदलाव कर निर्माण कार्य करने के आरोप में यह करवाई की गई हैं ऐसा प्रथमदृश्यनी मामला सामने आया है अथवा लाया गया है. 

जैसे कि विगत कुछ दिनों से कंगना राणावत और महाराष्ट्र सरकार के बीच आरोप - प्रत्यारोप का दौर जारी हैं. इस दरम्यान तिथि 9 सितंबर को कंगना राणावत मुंबई पहुँचने वाली थीं. महाराष्ट्र की तुलना पीओके से करने और मुंबई पुलिस की तुलना बाबर सेना से करने के बाद कंगना ने बुधवार की सुबह चंडीगढ़ से फ्लाइट पकड़ने के बाद इधर मुंबई बीएमसी द्वारा उनके बंगले पर दल - बल के साथ पहुंचकर बुलडोजरयुक्त हथौड़ा चला दिया. 


बीएमसी का कहना हैं कि, कंगना ने बीएमसी में प्रस्तुत निश्चित लेआउट में बदलाव करते हुए निर्माण कार्य किया. जिसकी जानकारी कंगना द्वारा बीएमसी को प्रस्तुत नहीं की गईं. कल अवैध निर्माण कार्य के लिए बीएमसी द्वारा कंगना के कार्यालय पर नोटिस चिपकाई गईं थीं. इससे पहले कि कंगना मुंबई पहुंचती अथवा उनके वकील मुंबई न्यायलय पहुँच पाते, बीएमसी द्वारा करवाई को अंजाम देते हुए अवैध निर्माण के खिलाफ हथौड़ा चला दिया गया. 

बीएमसी की करवाई पर कंगना द्वारा "ऑफिस वहीं बनायेंगे" की बात कही गईं. शिवसेना की तिकड़ी सरकार द्वारा नियोजित रूप से करवाई को अंजाम दिया गया इसमें संदेह नहीं हैं. कंगना ने अवैध निर्माण की बात से साफ इंकार किया हैं. दूसरी ओर महाराष्ट्र सरकार इसे बीएमसी की करवाई बता कर पल्ला झाड़ रहीं हैं. लेकिन जाहिर हैं कि बगैर सरकारी बल के यह सबकुछ संभव नहीं हैं. 

भाजपा नेता आशीष शेलार ने बीएमसी की करवाई पर आक्षेप प्रकट करते हुए मांग की कि, मुंबई के अवैध निर्माण वाले सभी इमारतों की सूची बीएमसी को प्रस्तुत की जाएगी. उन सभी स्थानों पर तुरंत करवाई की जानी चाहिए. भाजपा अब प्रतिदिन अवैध निर्माण के सन्दर्भ में सूचनाएं और सूची बीएमसी को सौंपी जाएगी. नेता प्रवीण दरेकर ने भी शहर के सभी अवैध निर्माण कार्यों पर करवाई करने की मांग की. दूसरी ओर शिवसेना प्रवक्ताओं ने मामले पर मौन धर लिया हैं. 

मंगलवार, 8 सितंबर 2020

"अर्नब" के बहाने "सामना" पर निशाना !

 "अर्नब" के बहाने "सामना" पर निशाना !

रविंदरसिंघ मोदी 

रिपब्लिकन भारत चैनल के सर्वोसर्वा अर्नब गोस्वामी के तेवर इन दिनों देखने योग्य हैं. उनकी भाषा की दबंगई और स्वर में ललकार हैं. ये किसी आम इंसान के लिए नहीं बल्कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और शिवसेना के सुप्रीमो श्री उद्धव ठाकरे के लिए प्रयोग हो रहीं हैं. ये भाषा, यह दबंगई प्रदेश के गृहमंत्री श्री अनिल देशमुख के खिलाफ उपयोग में लाई जा रहीं हैं. 

पत्रकारिता के शीर्ष पर पहुंचकर अर्नब गोस्वामी का महाराष्ट्र के नेताओं के प्रति यह ढ़ीठ रवैय्या स्पष्ट संकेत कर रहा हैं कि यह बोल किसी ने अर्नब गोस्वामी को उधार में दिए हैं. वहीं महाराष्ट्र विधानसभा अधिवेशन में आज नेता विपक्ष श्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा यह कहकर अर्नब गोस्वामी का बचाव करना कि, दैनिक सामना में भी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ अपमानित भाषा का प्रयोग किया जाता हैं ! यह सुनकर बात स्पष्ट हो जाती है कि "अर्नब' को वहीं से बल मिल रहा है, जहाँ से कंगना को "वाई" सिक्योरिटी मिली हैं. 

माजरा स्पष्ट हैं कि दैनिक सामना पर निशाना साधने के लिए अर्नब गोस्वामी के 'बोल' को हथियार बनाया गया हैं. भाजपा के पास महाराष्ट्र की तिकड़ी सरकार को घेरने के लिए एक हाथ में 'अर्नब' तो दूसरे हाथ में 'कंगना' हैं. ये भी तय लग रहा हैं कि 'अर्नब' और 'कंगना' को कमसे कम राज्यसभा का टिकट तो पक्का हो गया हैं. यह दोनों हथियार महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार को जितना "डैमेज" करेंगे, उतना दिल्ली में बैठे मोटा भाई खुश हो जायेंगे. मानना पड़ेगा कि मोटा भाई गजब की राजनीति खेल रहे हैं. 


महाराष्ट्र सरकार ने आज अर्नब के खिलाफ विधानसभा में "हक्कभंग" प्रस्ताव पास किया. वहीं कंगना को रोकने के लिए भी कदम उठाये हैं. कल (9 सितम्बर ) को कंगना मुंबई पहुँच रहीं हैं. यदि कंगना मुंबई यात्रा पर पहुँचती हैं तो राजनीतिक उथल पुथल संभव हैं. कल का दिन सामना के संपादक संजय राउत के लिए बहुत अहम हैं. करो अथवा मरो जैसे हालात उनके सामने हैं. देखना होगा कि अब संजय राउत हालात का मुकाबला करने के लिए किस किस हथियार का प्रयोग करते हैं. 

लेकिन यहाँ महाराष्ट्र सरकार कुछ घिरी हुई नजर आ रहीं हैं. पत्रकारों के खिलाफ सरकारीस्तर से दबावतंत्र का प्रयोग होने के आरोप दिल्ली का मीडिया लगा रहा हैं. देश के अन्य हिस्सों से भी यहीं सवाल उठ रहे हैं. ऐसे में मुख्यमंत्री श्री उद्धव ठाकरे अब क्या तिकड़म भिड़ाते हैं देखना होगा. दिल्ली वालों का दांव तो चल गया है. कल क्या होनेवाला है वो भी विशेष ही होगा !

रविंदरसिंघ मोदी 

फिर एक नई शुरुआत

 फिर एक नई शुरुआत..!


विगत एक वर्ष में मैं, पत्रकारिता कार्य में कुछ अलिप्त सा रहा. कुछ लेख लिखने के अलावा पत्रकारिता क्षेत्र में ज्यादा कुछ योगदान नहीं कर पाया. वजह थीं, सितंबर 2019 से अगस्त 2020 तक मैं गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड नांदेड़ (श्री हजूरसाहब) इस धार्मिक संस्था में मानद पद पर 'मीडिया एडवाइजर' की भूमिका निभा रहा था. जिसके चलते पूर्ण एक वर्ष जैसे एक्टिव पत्रकारिता को मैंने विराम सा दे दिया था. अब जबकि मै, मीडिया एडवाइज़र की जिम्मेदारी से मुक्त होकर फिर से पत्रकारिता में प्रवेश कर रहा हूँ, तब सभी के साथ और सहकार्य की पूर्ण अपेक्षा कर रहा हूँ.


दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज के परम आशीर्वाद से मै अपने आप में एक नई चेतना महसूस कर रहा हूँ. इस पावन भूमि के स्पर्श और संतों के आशीर्वाद से मै, अपने पुराने क्षेत्र में कार्य शुरू कर रहा हूँ. सन 1993 से लेकर आज तक लगभग 27 वर्षों की प्रदीर्घ पत्रकारिता में कायम रहना एक कसौटी मानी जानी चाहिए. यह सब गुरु महाराज के आशीर्वाद और संतों के आशीर्वाद से पूर्ण हुआ हैं. आगे भी मेरा भविष्य उन्हीं के आशीर्वाद पर निर्भर रहेगा इसका मुझे अहसास हैं.

आज के दौर में पत्रकारिता क्षेत्र में कार्य करना जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष माना जा रहा हैं. कोरोना कोविड - 19 के संक्रमण से समस्त विश्व त्रस्त हैं. आज नौकरियां नहीं मिल रहीं हैं. प्रदेश में लगभग डेढ़ हजार अख़बार इस कोरोना संघर्ष काल में बंद हो चुके हैं. बड़ी संख्या में पत्रकारों ने अपनी नौकरियां गंवाई हैं. प्रिंट मीडिया के प्रचलन पर भी आंच आई हैं. संक्रमण काल में 'ई - पेपर' समाचार पत्र प्रसार प्रणाली को बढ़ावा मिला हैं. ब्लॉग, बुलेटेन, यूट्यूब चॅनेल्स की चलती हो गई. 

इस दौर में मैं भी आज आम पत्रकारों की तरह संघर्षरत हूँ यह कहने में परहेज नहीं करूँगा. लेकिन संतोष इस बात का हैं कि मेरे पास अभी काम उपलब्ध हैं. मराठी, हिंदी और पंजाबी समाचार पत्रों के लिए कार्य आरंभ कर दिया हैं. साथ ही मेरा अपना यू - ट्यूब चैनल "hazursahib today" को भी संचालित कर दिया हैं. आज से ब्लॉग लेखन भी शुरू कर दिया हैं. इसलिए सभी संपादक साहब, वरिष्ठ पत्रकार, मेरे सभी पत्रकार सहकारी, पत्रकार संगठन के पदाधिकारी और सदस्यों के साथ फिर एक नई शुरुआत करते हुए सभी से सहकार्य की अपील करता हूँ. 

बीते एक वर्ष में कुछ लोगों ने मेरी पत्रकारिता की प्रमाणिकता पर अप्रत्यक्षरूप से सवाल उठाये थे. उन्हें यहीं कहना चाहूंगा कि पिछले  एक वर्ष मैं पत्रकारिता कार्य से अलिप्त था. क्योंकि मै एक धार्मिक संस्था में, एक महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी निभा रहा था. उस पद पर बैठकर बयानबाजी करना मैंने टाल रखा था. क्योंकि उस पद की गरिमा बनाये रखना एक जिम्मेदार और प्रामाणिक अधिकारी का फ़र्ज था. लेकिन अब पुन्हा पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उपलब्ध हैं. ऐसे में अपने क्षेत्र, अपने प्रदेश और सामाजिक एवं विकासात्मक मुद्दों को लेकर मेरी पत्रकारिता जारी रहेगी. पुन्हा आप सबसे सहकार्य की अपील कर नया लेखन प्रारंभ कर रहा हूँ. 

धन्यवाद !"

स. रविंदरसिंघ मोदी, हजुरसाहब. 

........ 

बुधवार, 20 मार्च 2019

मनहास का हजुरसाहिब में पहला कदम ही राजनीतिपूर्ण 
मनहास और उनके समर्थकों से हैं आंदोलनकारियों की जान को खतरा !
रविंदर सिंघ मोदी 


तखत साहब के आदरणीय पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता का उल्लंघन कर भूपिंदर सिंघ मिनिहास ने महाराष्ट्र सरकार से गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड का प्रधान पद मांगकर ले लिया. ता. २१ जनवरी, २०१९ को आदरणीय पंजप्यारे साहिबान ने गुरुद्वारा बोर्ड कानून की धारा ग्यारह का संशोधन रद्द करने का गुरुमत्ता पास किया था. साथ ही कलम ग्यारह से कोई गुरु सिख प्रधान पद प्राप्त न करे यह भी कहा गया था. पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता को हजूर साहिब के अधिकत्तर उत्साही सिखों ने श्रद्धा सहित मान लिया. कुछ समीकरण वाले और लालची लोग समीकरण में व्यस्त हो गए. जिनमें भूपिंदर सिंघ मिनिहास सबसे अग्रणी रहे. क्योंकि वें शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के गुप्त एजंडा पर चल रहे थे. हरसिमरत कौर बादल, सुखबीर सिंघ बादल और प्रकाश सिंघ बादल ने कलम ग्यारह के विषय को और पंजप्यारे साहिबान के गुरुमत्ता का राजनीतिक उपयोग कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर दबाव डालकर कलम ग्यारह के तहत भूपिंदर सिंह मिनिहास को गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनाने के समीकरण सामने किया. विधायक सिरसा (दिल्ली) की भूमिका भी संदिग्ध रही. देवेंद्र फडणवीस ने हजूर साहिब सिखों की जनभावना को दरकिनार कर, जनांदोलन की घोर उपेक्षा कर कलम ग्यारह को नहीं हटाया बल्कि उसके जरिये ही जबरन भूपिंदर सिंघ मिनिहास को प्रधान बनाया. महाराष्ट्र सरकार ने एक तरह से नौ सदस्यों का बोर्ड घोषित कर असंवैधानिक रूप से बोर्ड घोषित किया. क्योंकि बोर्ड कानून की अनुपालना के तहत महाराष्ट्र सरकार ने सरकार मनोनीत दो सदस्यों की संख्या होते हुए भी उसमें से एक पद पर मिनिहास की नियुक्ति कर डाली. अन्य एक पद क्यों घोषित नहीं किया गया ? हैदराबाद प्रतिनिधि का नाम उपलब्ध होते हुए भी उस नाम को बोर्ड में स्थान नहीं दिया गया. मुख्यमंत्री ने वैसा बोर्ड घोषित किया जैसा कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को चाहिए था. यह एक तरह से नांदेड़ के भूमिपुत्रों के साथ अन्याय नहीं तो क्या ? मुख्यमंत्री ने दस बार आश्वसन दिया लेकिन कलम ग्यारह रद्द नहीं की. खैर, भूपिंदर सिंघ मिनिहास गुरुमत्ता का उल्लंघन कर प्रधान बन गए. इसका अर्थ ये होता हैं की वे तनखैया सजा के भी पत्र हो गए. लेकिन बोर्ड के कुछ सदस्यों को ढाल बनाकर मिनिहास हजूर साहिब भी पहुंच गए. ता. १८ मार्च २०१९ को उनका हजूर साहिब आगमन हुआ. उससे पहले नांदेड़ की पुलिस ने कलम ग्यारह से जुड़े तेरह लोगों को ये कहकर पाबंद करने की कार्यवाई शुरू की कि , उनसे मिनिहास को खतरा हैं. ये शिकायत गुरुद्वारा बोर्ड कार्यालय द्वारा की गई. भूपिंदर सिंघ मिनिहास ने चार्ज भी नहीं संभाला कि राजनीती शुरू कर दी. गुरुद्वारा कार्यालय के उस दिन के प्रभारी अधीक्षक रणजीत सिंघ चिरागिया और प्रशासकीय अधिकारी डी. पी. सिंघ ने शिकायत कर समाज के तरह लोगों को जैसे अपराधी के कटघरे में खड़ा कर दिया. जिसका उद्देश्य क्या था और क्यों ये अधिकारी इतने राजनीतिक रूप से समाज के खिलाफ भूमिका में उतर आये, उनका क्या हित था इस विषय का चिंतन होना चाहिए. मिनिहास का कहना था की उन्होंने कोई शिकायत नहीं की थी और ना गुरुद्वारा कार्यालय को निर्देश कदिया था. फिर इस घटना के पीछे कौन है ? अधीक्षक गुरविंदर सिंघ वाधवा उस दिन छुट्टी पर थे या जानबूझकर साइड में रहकर ये करवा रहे थे ये भी सोचना होगा. एक तनखैया पत्र व्यक्ति के लिए इतना सब ? उससे बड़ी बात ये कि कलम ग्यारह रद्द करने के लिए पंजप्यारे साहिबान ने जीन सात सदस्यों की समिति का गठन किया उसमें भी मिनिहास सदस्य हैं. हजुरसाहिब आने के बाद मिनिहास द्वारा कलम ग्यारह रद्द करने के लिए मीटिंग लेना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने गुरुमत्ता की उल्लंघना विषय में भी पंजप्यारे साहिबान से माफ़ी नहीं मांगी. ना हजूर साहिब के लोगों से माफ़ी मांगी. मिनिहास का होली मनाने आने की बात कहकर सभी यात्री निवासों की इमारतों का निरिक्षण करना, गुरु नानक मार्केट की ईमारत का निरिक्षण करना और कुछ मार्किट गिराकर नए बनाने जैसे बातें करना ये सब को संकेत करता है कि मिनिहास ने हजुरसाहिब के कुछ लोगों को मैनेजिंग कमिटी का मेंबर बनाने का लालच देकर कलम ग्यारह के आंदोलन को कुचलने की  पूरी योजना बनाई थी और उसके ऊपर ही वे अमल कर रहे हैं. अब नांदेड़ के जिन सिखों के खिलाफ पुलिस में करवाई की शिकायत की गई उसका अर्थ कुछ लोगों को डराना और आंदोलन से जुड़े अच्छे चरित्र के लोगों की छवि ख़राब करना था. जिस तरह की राजनीति भूपिंदर सिंघ मिनिहास और  उनके समर्थकों ने शुरू की हैं वो हजूर साहिब के लोगों के लिए घातक हैं. प्रत्यक्ष में कलम  ग्यारह के आंदोलन में सक्रीय कार्यकर्तों के लिए तो बहुत घातक हैं. एक तरह से आंदोलनकारियों पर अत्याचार और दादागिरी हैं. मुख्यमंत्री की निकटता का लाभ उठाकर मिनिहास ये सब कर रहे हैं. उनके पास आंदोलनकारियों से निपटने के लिए करोड़ों और अरबों रूपये हैं. बड़े - बड़े लोग उनके इर्द गिर्द हैं. जिन लोगों के सहारे नांदेड़ में भूपिंदर सिंह मिनिहास ने  अपने पहले कदम पर ही दादागिरी की राजनीति  की शुरुवात की हैं वो कलम ग्यारह के आंदोलन से जुड़े सक्रीय कार्यकर्तों के लिए जान से खतरे के संकेत हैं. मेरे जैसे सक्रिय और बुद्धिजीवि तो इनके लिए राह का सबसे बड़ा कांटा माना जा रहा हैं. निश्चित ही भूपिंदर सिंघ मिनिहास हजूर साहिब बोर्ड की सत्ता  पाने के लिए हम जैसे कार्यकर्ताओं का घात करवा सकते हैं. गुरुद्वारा बोर्ड के संगत  में  से निर्वाचित दो सदस्यों को भी भविष्य में खतरें पेश आ सकते हैं. क्योंकि नांदेड़ के इस बोर्ड की बैठकें मुंबई में रखी जाती हैं. कुलमिलाकर हजूर साहिब के इस गरिमामय बोर्ड पर बाहर के लोगोंने साम दाम और दंड भेद से कब्ज़ा कर लिया हैं. महाराष्ट्र सरकार ने हजुरसाहिब के लोगों को न्याय देना चाहिए. वहीँ नांदेड़ और मुंबई के पुलिस विभाग द्वारा भी नांदेड़ के सिखों को न्याय देकर उनकी रक्षा करनी चाहिए ऐसी मांग हजूर साहिब से उठ रही हैं. 
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मंगलवार, 12 मार्च 2019

मोदी - राज में महाराष्ट्र सरकार कर रहीं हैं सिखों पर अत्याचार 
नांदेड़ गुरुद्वारा पर फिर लादा गया सरकारी अध्यक्ष
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प्रधानमंत्री मोदी भी प्रश्न करे कि सिखों की संस्था का लोकतंत्र क्यों छिन लिया गया 
रविंदर सिंघ मोदी 

देश में सभी तरफ मोदी के कार्यों की प्रशंसा करने के लिए लोग प्रतियोगिता कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर मोदी के प्रसंशक उनकी तारीफ का कोई मौका नहीं चूकते. लेकिन दूसरी ओर मोदी सरकार के राज में महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार का सिखों पर अत्याचार जारी हैं. ता. ९ मार्च, २०१९ के दिन महाराष्ट्र सरकार ने नांदेड़ के गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड संस्था पर दुबारा से सरकारी अध्यक्ष नियुक्त कर दिया. जबकि विगत चार सालों से नांदेड़ के सिख बराबर से गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पर सरकार द्वारा किये जा रहे अध्यक्ष नियुक्ति का विरोध उठाकर रखा हुआ हैं. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्वयं आठ से दस बार सिख समाज को आश्वासन दिया था कि गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड संस्था कानून १९५६ की धारा ग्यारह में किया गया संशोधन रद्द कर दिया जायेगा. लेकिन मुख्यमंत्री ने सभी आश्वासनों से मुकरते हुए अपने करीबी,  व्यवसायी भूपिंदर सिंघ मिन्हास को गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान नियुक्त कर दिया. 
फाइल फोटो 
मुख्यमंत्री ने इस समय अल्पसंख्यक सिखों पर रौब कसने और "हम करें सो कायदा" का उदाहरण प्रस्तुत किया जो लोकतंत्र की प्रतिमा मलिन करता हैं. साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में ये स्पष्ट संकेत भी देता हैं कि नांदेड़ के सिखों पर सरकार इतने सालों से कैसे अत्याचार कर रही हैं. देवेंद्र फडणवीस ने एकतरफा निर्णय लेते हुए साबित कर दिया की वे जनमानस का नहीं सुनते बल्कि बिज़नेस मन ही उन्हें प्रिय हैं. 
देवेंद्र फडणवीस द्वारा कलम ग्यारह का दुबारा से प्रयोग नांदेड़ के सिखों के गले नहीं उतर रहा हैं. देश में प्रजातंत्र रहते हुए भी देवेंद्र फडणवीस ने क्यों नांदेड़ स्थित सिखों के पवित्र पावन तखत साहब श्री गुरुद्वारा तखत सचखंड हजूर साहिब संस्था को सरकार के नियंत्रण में कर लिया. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने ता. १८ फरवरी, २०१५ के दिन गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड कानून १९५६ की धारा ग्यारह में बदलाव करते हुए संस्था पर अध्यक्ष नियुक्त करने का निर्णय अपने अधीन कर लिया. जबकि १९५६ से बोर्ड के सत्रह सदस्य मिलकर अपना प्रधान चुनते थे. इस बात की गंभीरता देखते हुए जनमानस (साधसंगत) की मांग पर तखत साहब के आदरणीय पंजप्यारे साहिबान ने संस्था को सरकारी अधिपत्य निकालकर लोकतंत्र बहाल करने के लिए धार्मिक गुरुमत्ता भी पारित किया. उस गुरुमत्ता के तहत संतबाबा बलविंदर सिंघजी कारसेवा वाले और संत बाबा प्रेमसिंघजी माता साहेब वाले इस आंदोलन के नेतृत्व कर रहे हैं. लेकिन इतने आंदोलन होने के बावजूद भी सरकार ने सिखों की नहीं सुनी. 
उल्लेखीनय हैं कि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वयोवृद्ध विधायक तारासिंह को संस्था का प्रधान बनाने के लिए जबरन ये कानून पास करवाया था. यह कानून पारित होने के बाद से जनमानस द्वारा लगातार सरकारी निर्णय और कानून संशोधन का विरोध किया जाता रहा. लेकिन राजनीतिक क्षमता का उपयोग कर मुख्यमंत्री और भाजपा द्वारा हमेशा सिखों की मांगों को दरकिनार कर दिया गया. अब जबकि कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करने का समय था तो मुख्यमंत्री ने आश्वासन देकर भी फिर से अपने निकटवर्तीय को प्रधान बनाया और नांदेड़ ही नहीं मराठवाड़ा के सक\सिखों पर अत्याचार कर दिया. आखिर मुख्यमंत्री यह संस्था अपने अधीन क्यों रखना चाहते हैं? नांदेड़ के सिख तो पूछ ही रहे हैं. लोकप्रिय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी श्री देवेंद्र फडणवीस से पूछे कि सिखों के प्रति लोकतंत्र क्यों समाप्त कर दिया गया हैं. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने क्यों ये संस्था अपने कब्जे कर रखी हैं? अल्पसंख्यंकों के साथ सौतेला व्यव्हार क्यों हो रहा हैं? सरकार होने का अर्थ क्या किसी एक जातिसमूह पर दादागिरी होता है? महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने गुरुघर के साथ और नांदेड़ के सिखों के साथ आक्रांताओं जैसा व्यवहार शुरू किया हुआ हैं. मोदी जी क्या आप कुछ नहीं कर सकतें?   

गुरुवार, 7 मार्च 2019

आखरी मीटिंग, आखरी दाँव ?
कलम ग्यारह पर तारासिंह की नकारात्मक भूमिका 
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रविन्दरसिंघ मोदी 

फरवरी के अंतिम सप्ताह में महाराष्ट्र विधानसभा का अधिवेशन दो दिनों में लपेट दिया गया. हम सोंच रहे थे कि अधिवेशन में गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड कानून में संशोधित और बहुचर्चित कलम ग्यारह (११) का विषय चर्चा पटल पर रखकर हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जायेगा. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. अधिवेशन और चलता और राजस्व विभाग के विषयों में ये विषय रखकर या प्रश्न पूछकर उसपर चर्चा कर संशोधन रद्द करने का निर्णय लिया जाता. 
दूसरा कारण ये भी कहा जा सकता है कि, गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान और आदरणीय विधायक तारा सिंह द्वारा कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाने के लिए कोई पहल नहीं की गई. उन्होंने कलम ग्यारह हटाने के लिए महाराष्ट्र सरकार को कोई लिखित प्रस्ताव भी नहीं दिया. उन्हें एक सिख विधायक कहा जाता है, लेकिन सभागृह के एकमात्र सिख विधायक ने कोई स्पष्ट भूमिका नहीं अपनाई, बल्कि कलम ग्यारह के विषय से बचने के लिए उन्होंने शायद लीलावती अस्पताल का उपयोग कर लिया. लीलावती अस्पताल वैसे तारा सिंह का आरामगाह कहा जाना चाहिए. जब भी तबियत ख़राब होती है या कोई टेंशन होता है तो वे लीलावती की शरण में चले जाते हैं.  
अबकी बार तारासिंह जी लम्बे समय के लिए उपचार करवाने के लिए अस्पताल में दाखिल हुए. उन्होंने उपचार लेते-लेते ही ता. १७ मार्च, २०१९ को आयोजित होनेवाली गुरुद्वारा बोर्ड मीटिंग का एजेंडा भी तय किया. वही लेटे - लेटे कर्मचारियों के निलंबन की झड़ी भी लगा दी. यहीं से जैसे उन्होंने आखरी मीटिंग का आखरी दॉँव भी खेल लिया ऐसा हम नहीं कहते बल्कि यह गुरुद्वारा बोर्ड के राजीनीतिक गलियारे में चल रही घमासान चर्चा में सबसे चर्चित मुद्दा है. कुछ मेंबर तो कानाफूसी कर रहे हैं कि तारासिंह जी कलम ग्यारह के मुद्दे का सामना नहीं करना चाह रहे थे. उन्हें कलम ग्यारह के विषय में चर्चा के दौरान स्पष्टीकरण भी देना पड़ सकता था. अधिवेशन के बहार मंत्रिमंडल की बैठक में भी कलम ग्यारह का विषय समाप्त हो सकता था. है ये बात तारासिंह जी को समझ आणि चाहिए. 
आदरणीय पंजप्यारे साहिबान ने कलम ग्यारह के विषय में सकारात्मक आदेश देने के बाद और कलम ग्यारह रद्द करवाने के आंदोलन के सूत्र संतबाबा बलविंदरसिंघजी कारसेवा वाले और संतबाबा प्रेमसिंघजी द्वारा सँभालने के बाद तो तारासिंह जी को कलम ग्यारह के लिए पहल करना चाहिए था. बल्कि तखत साहिब का हुकुम मानकर एक सिख होने के नाते कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाने के लिए लिखित प्रस्ताव पेश करना चाहिए था. लेकिन उन्होंने सरल मार्ग तय कर लिया और बजट मीटिंग का आखरी दाँव खेलने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी. बजट मीटिंग के एजेंडे में उन्होने ता. २८-०७-२०१८ की उस बैठक की प्रौढ़ता को मान्यता देने का विषय भी राजनीतिक रूप से पेश किया गया हैं. जिस बैठक का स्थानीय आठ सदस्यों ने एकजुट होकर विरोध किया था. देखना हैं कि जिस मीटिंग का विरोध किया गया था उसकी फुटकल मांगों को कौन सदस्य प्रौढ़ता देता हैं. उस बैठक का विरोध कलम ग्यारह के लिए किया गया था. स्थानीय मेंबर साहिब इस विषय में नैतिकता अपनाएंगे या तारासिंह के प्रभाव में पास पास पास कहेंगे ये देखना होगा.  
ये भी इक कड़वी सच्चाई हैं कि तारासिंह ने अपने चार वर्षों के लम्बे कार्यकाल में कई भूमिपूजन तो कर लिए लेकिन कोई मार्किट खड़ा नहीं किया. इतना बड़ा बजट ब्लॉक कर रखा. इस कार्यकाल में पास होने के बाद चार मार्किट तो खड़े हो जाने चाहिए थे. अंत अंत में संतबाबा जोगिन्दर सिंघजी मोनी सीवन क्लास की बिल्डिंग काम ज्यादा दर पर स्वीकार की गई. काम देने के लिए भी तारा सिंह जी का एकाधिकार चर्चा का विषय रहा था. खैर....... अब फिर से नए मार्किट का विषय बैठक में रखा गया हैं! उम्मीद हैं, ता. १७ मार्च की बैठक में मुंबई के सिविल कांट्रेक्टर बड़ी संख्या में मीटिंग स्थल पर मुंबई में उपस्थित रहेंगे. 
कलम ग्यारह का संशोधन रद्द करवाकर बोर्ड पर अधिपत्य भोगनेवाले तारासिंह का कार्यकाल दक्खन के सिखों के लिए खासा नकारात्मक साबित किया जा सकता हैं. और हैं भी. बोर्ड का प्रधान बनने के लिए इस विधायक ने सभी को गुमराह करके रख दिया. सुना हैं कि कलम ग्यारह के संशोधन रद्द करने के लिए महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग को बड़ी कसरत करनी पड़ रही हैं. तारासिंह द्वारा करवाया गया संशोधन संवैधानिक रूप से बड़ी गलती है ये अब बात सामने आ रही हैं. इसे गलती कहा जाए फिर स्वार्थ की खुरापात. अब अपनी अंतिम मीटिंग में तारासिंह को क्या पास करवाना हैं? 
बहुत बार ऐसा हुआ है पहले की बजट मीटिंग हुई ही नहीं और कलेक्टर के आदेश से बजट के लिए अनुमति प्राप्त कर ली गई. सामने लोकसभा चुनावों की अचार संहिता लगने का वातावरण है. बजट मीटिंग से पहले ही अचार संहिता प्रभाव में आ सकती हैं. इसलिए भी मीटिंग की कोई जरुरत नहीं होनी चाहिए. मंत्री मंडल की बैठक में गुरुद्वारा बोर्ड कलम ग्यारह का विषय समाप्त कर दिया जा सकता था. लेकिन उसके लिए प्रयास नहीं किया गया. मुख्यमंत्री शायद इस विषय की गंभीरता को जान ले और घोषित कर दे कि कलम ग्यारह रद्द कर दी गई है. 
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शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

राजिंदरसिंघ पुजारी तनखैया घोषित !

समाचार 

रजिंदरसिंघ पुजारी तनखैया घोषित 
पंज तख्तों पर सेवा लगाई 
 
नांदेड़, हजूर साहिब, २२ फरवरी - 
शुक्रवार की शाम गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजूर अबिचलनगर साहिब बोर्ड के मेंबर राजिंदर सिंघ नरिंदर सिंघ पुजारी को तखत साहब के पंजप्यारे साहिबान ने तनखैया (बहिष्कृत) घोषित करते हुए उन्हें पांचों तखत साहब पर उपस्थित होकर लंगर और जोड़ेघर में पांच पांच दिनों की सेवा सुनाई. यह सजा शुक्रवार की शाम तखत साहब पर रहिरास का पाठ समाप्त  होने के बाद मीत जत्थेदार संत बाबा ज्योतिंदर सिंघ द्वारा सुनाई गई. इस समय जत्थेदार संतबाबा कुलवंत सिंघजी, हैडग्रंथि सिंघसाहब भाई कश्मीर सिंघजी, मीत ग्रंथि सिंघसाहब भाई अवतार सिंघजी शीतल, सिंघसाहब भाई राम सिंघजी धूपिया भी उपस्थित थे. 
उपर्युक्त संबंध में अधिक जानकारी यह है कि, ता. १९ फरवरी की सुबह ९ बजे के समय तखत सचखंड श्री हजूर साहिब में प्रधान तारसिंघ और मेंबर साहिबान द्वारा पुलवामा में शहीद हुए सी.आर.पी.एफ. के जवानों को श्रद्धांजलि देने हेतु श्री अखंडपाठ साहिब की समाप्ति रखी गई थी. उस कार्यक्रम में तखत साहिब पर बोर्ड के मेंबर साहिबान भी उपस्थित थे. समाप्ति अरदास उपरांत जब कीर्तन शुरू होना था कि मेंबर राजिंदर सिंघ पुजारी ने ऊँची आवाज में पंजप्यारे साहिबान को सम्बोधित करते सवाल पूछा कि तखत साहब पर इस तरह का पाठ रखते समय मर्यादा का ख्याल नहीं रखा गया है. तखत साहब पर कभी भी सन १९८४ में शहीद हुए परिवारों के प्रति श्री अखंडपाठ साहिब नहीं करवाएं गए. उन्होंने एक से डेढ़ मिनिट की बात की जिससे कीर्तन में रुकावट पहुंची ऐसा पंजप्यारे साहिबान को प्रतीत हुआ. 
गुरुद्वारा बोर्ड के मेंबर और कांग्रेस के स्थानीय नेता रविंदरसिंघ बुंगई ने उपर्युक्त सम्बन्ध में जत्थेदार साहिब संतबाबा कुलवंत सिंघजी को ज्ञापन देकर राजिंदर सिंघ पुजारी के अभद्र व्यवहार के प्रति शिकायत कर उन्हें तनखैया घोषित करने की मांग की. जिसके बाद २० फरवरी को राजिंदर सिंघ पुजारी से लिखित स्पस्टीकरण माँगा गया. राजिंदर सिंघ पुजारी ने पंजप्यारे साहिबान के पत्र को स्वीकार कर अपनी लिखित सफाई पेश की जिसमे उन्होंने कहा कि , मेरा आशय पंजप्यारे साहिबान का अपमान करना नहीं था और ना मैंने पूजापाठ में कोई खलल डाला है. मैंने सिर्फ मांग की है कि जिस तरह से पुलवामा के शहीदों की आत्मक शांति के लिए पाठ रखकर अरदास की गई वैसे ही सन १९८४ में शहीद हुए सिखों के लिए भी किया जाये. 
पुजारी द्वारा दिए गए स्पस्टीकरण पर ता. २२ फरवरी की सुबह ११. ४५ बजे आयोजित पंजप्यारे साहिबान की बैठक में विचार किया गया. बैठक में जत्थेदार संतबाबा कुलवंतसिंघजी, संतबाबा ज्योतिंदर सिंघजी, भाई कश्मीर सिंघजी , भाई अवतारसिंघजी शीतल और भाई रामसिंघजी धूपिया उपस्थित थे. साथ ही सुपरडैंट गुरविंदर सिंघ वाधवा भी उपस्थित थे. बैठक में विचार विमर्श उपरांत पंजप्यारे साहिबान द्वारा एक पत्र भेजकर राजिंदर सिंघ पुजारी को शुक्रवार, २२ फरवरी की शाम ६. ३० बजे तखत साहब पर उपस्थित रहने के आदेश दिए गए. 
पत्र प्राप्त होने पर राजिंदर सिंघ पुजारी समय पर तखत साहब पर उपस्थित हुआ. श्री रहिरास साहब के पाठ और अरदास के बाद मीत जत्थेदार ज्योतिंदर सिंघजी ने सजा पढ़कर सुनाई. पंजप्यारे साहिबान ने आदेश में कहा कि राजिंदर सिंघ पुजारी ने जिस ऊँची आवाज में बात की उससे कीर्तन में खलल पेश हुआ. पुलवामा के शहीदों के लिए अरदास रखी गई थी. ऐसे समय ऐतराज जताना योग्य नहीं हैं. आगे से तखत साहब पर कोई इस तरह का व्यव्हार नहीं करे इस बात को दायरे में रखकर राजिंदर सिंघ पुजारी को पांचों तखतसाहिब पर उपस्थित होकर प्रत्येक स्थान पर पांच दिनों की लंगर और जोड़ेघर की सेवा करनी होगी. अंत में तखत साहिब पर श्री अखंडपाठ साहिब रखकर बख्शाने के लिए अरदास करनी होगी. 
राजिंदर सिंघ पुजारी ने सजा सुनकर हाथ जोड़े और मत्था टेककर और परिक्रमा कर बाहर निकल गए. 
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राजिंदर सिंह पुजारी ने कहा, तखत साहब के प्रति और मर्यादा के प्रति मेरे मन में पूरा सम्मान है. पंजप्यारे साहिबान का आदेश सिर आँखों पर रखा हैं. मैंने किसी को अपमानित करने के लिए कुछ नहीं कहा. मैं अभी जवाब देने की स्थिति में नहीं हूँ. 
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राजिंदर सिंघ पुजारी वर्ष २०१२ से गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के मेंबर हैं. भारतीय जनता पार्टी के वे नांदेड़ के जिला उपाध्यक्ष भी हैं. आक्रामक कार्यकर्ता की उनकी छवि रही हैं. 
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रविंदर सिंघ मोदी. 

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

गुरुद्वारा कानून संशोधन रद्द करो आंदोलन को मिल रहा हैं समर्थन  
सर्वपक्षीय समर्थन की जरुरत
नांदेड़ के नेतागण हैं खामोश !!
  रविंदर सिंघ मोदी 
श्री हजूरसाहिब की पवित्र भूमि में गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड कानून १९५६ (दी सिख गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजूर अपचल नगर साहिब) की धारा ११ में हुए सरकारी संशोधन के खिलाफ शुरू आंदोलन महाराष्ट्र सरकार के लिए गले में फंसी हड्डी की तरह हो गया है. महाराष्ट्र सरकार पर दिन पर दिन सर्वपक्षीय दबाव तो बन ही रहा हैं साथ भारतीय जनता पार्टी अंतर्गत भी शीर्ष नेताओं द्वारा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से उक्त मामले में सवाल पूछे जा रहे हैं. 
दिल्ली और पंजाब से लगातार गुरुद्वारा बोर्ड कानून में हुए संशोधन रद्द करने के लिए मांग उठ रही हैं. इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया और प्रिंट मीडिया में नांदेड़ गुरुद्वारा बोर्ड का विषय खासा चर्चा में प्रस्तुत हुआ हैं. जिससे महाराष्ट्र सरकार को अपनी गलती पर पछतावा भी हो रहा है. वहीं सिखों को नीतिगत रूप से पीछे धकेलने का मनसूबा पाले हुए कुछ जातिवादी षडयंत्रकारी संगठन गुरुद्वारा बोर्ड कानून की धारा ११ में हुए संशोधन को योग्य बताकर अल्पसंख्यंक सिखों की संस्था में अपने मनसूबे पूर्ण करने की राजनीति कर रहे हैं.
संस्था नांदेड़ की होने के कारण यहाँ पहला अधिकार नांदेड़ के सिखों को मिलना चाहिए ये मेरा मत है. संस्था पर सरकारी नियंत्रण नहीं होना चाहिए. यही मत हजारों की संख्या में हजूरसाहिब के सिखों द्वारा व्यक्त किया जा रहा हैं. अपने हक़ और अधिकारों के लिए हजूर साहिब सिख संघर्ष के मैदान में सक्रीय है, ऐसे में किसी बाहर के संघटन को तखत सचखंड श्री हजूर साहिब के विषय में बयानबाजी में नहीं पड़ना चाहिए. 
आंदोलन अब चरम पर  हैं. महाराष्ट्र सरकार ने भी संज्ञान लिया है. जिसे देखकर लग रहा हैं कि निकट समय में कलम ११ का संशोधन रद्द हो जायेगा. साथ ही नया बोर्ड भी घोषित कर दिया जायेगा. 

इस आंदोलन को अभी तक महाराष्ट्र के किसी भी राजनीतिक पार्टी या संघटन ने अपना समर्थन घोषित नहीं किया हैं. देशभर में जहां आंदोलन को लेकर सिख संस्थाएं अपना समर्थन दे रही हैं वही महाराष्ट्र के विशेष कर नांदेड़ के राजनितिक संघटनों की चुप्पी दुखद हैं. यहाँ के राजनितिक संघटन और पार्टियां केवल गुरुतागद्दी विकास का मुद्दा अपने मैनुफेस्टो में शामिल कर विकास का प्रचार करने के लिए है ऐसा लग रहा हैं. नांदेड़ जिले के सांसद, विधायक और राजनीतिक दलों के पदाधिकारी केवल सिखों का तमाशा देख रहे हैं. ऐसा प्रतीत हो रहा हैं की गुरुद्वारा बोर्ड संस्था सरकार के अधीन रहे ऐसी इच्छा सभी राजनीतिक पार्टियों की हैं. गुरुद्वारा बोर्ड की जमीनों पर बूरी नजर रखनेवाले कुछ तथ्य भला कैसे सिखों की संस्था को स्वतंत्र करने का विचार रख सकते हैं ? जब तक नांदेड़ के सभी नेता इस आंदोलन को अपना समर्थन घोषित नहीं करते तब तक आंदोलन को बल नहीं मिल सकता. इस बात की गंभीरता के मद्दे नजर विविध राजनितिक पार्टियों में कार्यरत सभी सिख पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी अपनी पार्टियों पर दबाव डालने का प्रयास करें. यदि नहीं मानते हैं तो ऐसी राजनीतिक पार्टियों के लिए वे प्रचार में भी शामिल ना हो ऐसी प्रार्थना हैं. 
 

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

Railway news 1 st feb 2019

समाचार : 


"सचखंड" और "श्रीगंगानगर" को एक नंबर प्लेटफार्म पर उतारा जाएं 

रेलवे प्रशासन को ज्ञापन प्रस्तुत 


हजुरसाहिब, नांदेड़। १ फरवरी
तखत सचखंड श्री हजूर साहिब के दर्शनों के लिए नांदेड़ से अमृतसर साहिब के बीच विशेष रूप से चलाई जा रही "सचखंड एक्सप्रेस" रेलवे गाड़ी और हजूर साहिब से श्रीगंगानगर के बीच दौड़ रही "श्रीगंगानगर एक्सप्रेस" को नांदेड़ रेलवे स्टेशन पर प्लेटफार्म नंबर एक पर स्थान देने की मांग लेकर शुक्रवार (ता. १ फरवरी) की दोपहर स्थानीय हजूरी साधसंगत और गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड प्रशासन द्वारा दक्षिण मध्य रेल विभाग के अतिरिक्त प्रबंधक विश्वनाथ एरा को ज्ञापन प्रस्तुत किया गया. 

प्रस्तुत ज्ञापन में कहा गया हैं, गुरु की नगरी अमृतसर से हजुरसाहिब नांदेड़ रेलवे स्टेशन तक सचखंड एक्स्प्रेस की ३६ से ४० घंटों की लम्बी यात्रा कर श्रद्धालुगण दर्शानों के लिए पहुँचते हैं. यात्रियों में छोटे बच्चों से लेकर महिलाएं, वृद्ध भी होते हैं. नांदेड़ स्टेशन पर प्रशासन द्वारा तकनीकी कारण दिखाकर प्लेटफार्म नंबर चार पर स्थान दिया जाता हैं. जबकि तखत सचखंड श्री हजूर साहिब पहुँचने के लिए प्लेटफार्म नंबर एक अधिक अनुकूल है. यात्रियों को अपने भरी लगेज लेकर प्लेटफार्म नंबर चार से एक तक पहुंचकर स्टेशन के बाहर निकलना पड़ता हैं. 

दूसरी ओर प्लेटफार्म नंबर चार की दिशा में उतरने पर लंबा चक्कर काटकर गुरुद्वारा साहिब तक पहुंचना पड रहा है. क्षेत्र में आपराधिक गतिविधियां अधिक हैं. साथ ही ऑटो रिक्शा चालक, टैक्सी चालक यात्रियों से अधिक भाड़ा वसूलते हैं. इसलिए यात्रियों की सुविधा हेतु सचखंड एक्सप्रेस रेलगाड़ी को प्लेटफार्म नंबर एक पर जगह देना उचित होगा ऐसा ज्ञापन में कहा गया हैं. साथ ही मांग पूर्ण नहीं होने पर नांदेड़ से लेकर अमृतसर तक हर जगह सिख समुदाय रेलवे प्रशासन के खिलाफ तीव्र आंदोलन करेंगा ऐसी चेतावनी भी दी गई हैं.
इस अवसर पर गुरुद्वारा बोर्ड के मेंबर गुरमीत सिंघ महाजन, मानप्रीतसिंघ कुँजीवाले,  राजिंदर सिंह पुजारी, अधीक्षक गुरविंदर सिंघ वाधवा, रवींदर सिंघ मोदी, जसपाल सिंघ लांगरी, रविंदर सिंघ पुजारी, परमजीत सिंघ पेशकर, रणजीत सिंघ गिल, बीरेंदरसिंघ बेदी, सतनामसिंघ गिल, जरनेलसिंघ गाड़ीवाले, ठाकुर सिंघ परभणी, मान सिंघ, मनप्रीत सिंघ कारागीर, करणसिंघ खालसा, बलजीत सिंघ शाह, नरेंदर सिंघ खालसा, सुरजीत सिंघ टाक सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित थे. 
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सभी साधसंगत हजुरसाहिब से लेकर पंजाब तक यह मांग प्रस्तुत करें. 

बुधवार, 30 जनवरी 2019

हजूर साहिब रेलवे स्टेशन पर श्रद्धालु यात्री परेशान 
हजूर साहिब में रेलवे समस्या पर आंदोलन की तैयारी 
रविंदर सिंघ मोदी 

महाराष्ट्र के नांदेड़ शहर स्थित श्री हजूर साहिब स्टेशन पर पंजाब और अन्य प्रांतों से पहुँचनेवाले श्रद्धालु यात्रीगण यहाँ पहुँचकर खासे परेशान हो रहे हैं. वजह है सभी गाड़ियाँ का प्लेटफार्म पर आगमन. हजूर साहिब के दर्शनों का पहुंचनेवाले यात्रीगण अपना लगेज लेकर तीन प्लेटफार्म लांघकर स्टेशन के बहार पहुंच रहे हैं. छोटे बच्चे और बुजुर्गों के लिए तो यह कसरत से बड़ा काम हो रहा हैं. रेलवे प्रशासन को इस समस्या से बार-बार अवगत करवाने पर भी रेलवे प्रशासन द्वारा इस समस्या पर विचार नहीं किया जा रहा हैं. जिससे हजूर साहिब के सेवाभावी युवक अब इस समस्या को लेकर आंदोलन की राह तलाश रहें है.  
दक्षिण मध्य रेलवे ज़ोन अंतर्गत सचखंड एक्सप्रेस (१२७१५) सबसे सफल रेलवे गाड़ी है जो श्री हजूर साहब नांदेड़ से श्री अमृतसर स्टेशन का रोजाना सफर तय करती हैं. इस रेलवे गाड़ी से रोजाना डेढ़ से दो हजार श्रद्धालु और यात्री यात्रा करते हैं. इस गाड़ी के टिकट आरक्षण में वर्ष भर तेजी रहती हैं. कभी गाड़ी खाली नहीं दौड़ती है. श्री हजूर साहिब के दर्शन हेतु पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, मध्यप्रदेश के यात्रियों के लिए सचखंड एक्सप्रेस बहुत अनुकूल है. उसी तरह से महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के यात्रियों के पंजाब और जम्मू के तीर्थस्थलों के दर्शनों के लिए यह रेलवे गाड़ी बहुत उपयोगी है. 


सचखंड एक्सप्रेस १९९५ से नांदेड़ और अमृतसर के बीच दौड़ रही है. पहले साप्ताहिक के रूप में शुरू हुई यह गाड़ी वर्ष १९९७ में सप्ताह में पांच दिन चलाई गई. वर्ष २००७ से यह गाड़ी सप्ताह के सात दिन दौड़ रही है. इस धार्मिक यात्रा में छोटे बच्चें, महिलाएं, बुजुर्ग भी यात्रा करते हैं. यह यात्रा ३६ से ४० घंटों की होती हैं. जिससे यात्रीगण काफी तक जातें हैं. उसी तरह से श्री हजूर साहिब से श्री गंगानगर के बीच भी गाड़ी नंबर १२४८५ दौड़ती है. यह गाड़ी भी अब रोजाना दौड़ रही हैं. 
दोनों रेलगाड़ियों के समस्या लगभग एक जैसी हैं. नांदेड़ के श्री हजूर साहिब रेलवे स्टेशन पर पहुंचनेवाली सभी गाड़ियों का आगमन प्लेटफार्म नंबर चार (४) पर हो रहा हैं. जबकि तखत सचखंड श्री हजूर साहिब तीर्थस्थल प्लेटफार्म नंबर एक (१) की दिशा में हैं. प्लेटफार्म नंबर चार पर सुविधाएँ नहीं हैं. यहाँ से तखत सचखंड पहुँचने के लिए आसान रास्ता उपलब्ध नहीं हैं. गोकुल नगर से विष्णुनगर रस्ते से गुरुद्वारा की बसें गुजरने के लिए दिक्क़ते ही दिक्कतें हैं. बारिश में तो रेलवे अंडर ब्रिज में पानी भरने के कारण चार से पांच माह रास्ता बंद रहता हैं. गोकुल नगर का हिस्सा आपराधिक गतिविधियों का केंद्र माना जाता है. 
दूसरा रास्ता बहुत घुमाकर जाता हैं. स्टेडियम रोड और वी.आई.पी. रोड, से होकर घूमकर जाना होता हैं.  यात्रियों को बसें नहीं मिलती उनको ऑटो रिक्शावाले बहुत परेशान करते हैं. दुगना, तिगना किराया हड़पते हैं. बहुत बार यात्रियों का सामान भी चोरी हो जाता हैं. ऐसी परिस्थिति में ३६ से ४० घंटों की यात्रा करने बाद भी यात्री को बड़ी दिक्कतों को सामना करना पड़ता हैं. यदि यह रेलवे गाड़ियां चार नंबर के बजाय एक नंबर प्लेटफार्म पर पहुँचती हैं तो यात्रियों को अधिक सुविधाएँ उपलब्ध होगी. लेकिन यह बात दक्षिण मध्य रेल विभाग प्रशासन सुनने को तैयार नहीं हैं. 
इस विषय में हजूर साहिब के सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा डी.आर.एम. (नांदेड़) को ज्ञापन प्रस्तुत कर सचखंड एक्सप्रेस और श्री गंगानगर एक्सप्रेस को प्लेटफार्म नंबर एक पर लेने की मांग की गई हैं. गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कार्यालय द्वारा भी पत्राचार किया गया हैं. संत बाबा बलविंदर सिंघजी ने भी रेलवे के डी.आर.एम. से चर्चा कर मांग प्रस्तुत की लेकिन रेलवे प्रशासन सुनने को तैयार नहीं. इसलिए अब हजुरसाहिब के युवा, सामाजिक कार्यकर्ता और बोर्ड मेंबर एक सामाजिक आंदोलन करने का विचार कर रहे हैं. 

ता. २९ जनवरी को एक बैठक लेकर तय किया गया कि ता. १ फरवरी , २०१९ को रेलवे डी.आर.एम. को एक ज्ञापन पेशकर आंदोलन के लिए आगाह किया जाए. यह भी तय किया गए कि नांदेड़ से लेकर अमृतसर तक के हर स्टेशन अंतर्गत वहां के सिख रेलवे प्रशासन को ज्ञापन पेशकर मांग करें कि सचखंड एक्सप्रेस गाड़ी को प्लेटफार्म नंबर एक पर ही रोका जाएँ. दिल्ली के सिखों से विशेष निवेदन हैं कि वे रेल मंत्रालय को ज्ञापन देकर मांग प्रस्तुत करें. रेलवे बोर्ड चेयरमैन को भी दिल्ली के सिख ज्ञापन देकर मांग मानवाएँ. 
हजुरसाहिब के सभी सेवाभावी सिख जत्थे, संघटन और युवा मिलकर रूपरेखा के तहत आंदोलन करें. गुरुद्वारा के दर्शनों को आनेवाले यात्रीगण यहाँ की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करते हैं. यात्रियों के योगदान से ही गुरुद्वारा के कर्मचारी, आसपास के व्यापारी, रिक्शावाले, टैक्सीवाले और अन्यों के पेट निर्भर हैं. इसलिए रेलवे से आनेवाले यात्रियों को सुविधाएँ दिलवाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए. इसके लिए गुरुद्वारा बोर्ड प्रशासन को भी आंदोलन में पूर्ण सहयोग करना चाहिए. साथ ही उधर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर को भी भूमिका लेनी होगी. सभी के सहयोग से यह आंदोलन सफल हो सकता हैं. पहले चरण में ता. १ फ़रवरी को ज्ञापन (निवेदन) प्रस्तुत करने की सभी कृपा करें. सुबह ११. ३० बजे नांदेड़ रेल प्रशासन को ज्ञापन प्रस्तुत करना तय हुआ हैं. नांदेड़ से लेकर दिल्ली तक सभी स्टेशन के परिवेश में रहनेवाले सिख वहां के रेलवे प्रशासन के सामने मांग रखें यह प्राथना हैं. 
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