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बुधवार, 23 जनवरी 2019

आंदोलन की धमक अब देशभर

आंदोलन की धमक अब देशभर 
मुख्यमंत्री को सौंपा गया ज्ञापन 
गुरुद्वारा बोर्ड कानून के संशोधन जल्द होंगे पूर्ववत
रविन्दरसिंघ मोदी 

श्री हजूर साहिब की धरती से उठा आंदोलन अब महाराष्ट्र के सीमाएँ लाँघकर पंजाब और अन्य राज्यों में पहुँच चूका हैं. हर स्थान से कलम ग्यारह के उस संशोधन का विरोध किया जा रहा हैं. महाराष्ट्र सरकार अब दबाव में है और बहुत जल्द हमें यह समाचार सुनने में मिल सकता है कि सरकार द्वारा ता. १८ फरवरी, २०१५ को किये गुरुद्वारा बोर्ड कानून में किये गए बदलाव का संशोधन वापिस लिया जा रहा हैं. 
इस बात का पहला श्रेय आदरणीय जत्थेदार संतबाबा कुलवंतसिंघजी और सम्मानीय पंजप्यारे साहिबान को जाता हैं. पंज प्यारेसाहिबान द्वारा गुरुमत्ता पारित करने के बाद हजुरसाहिब ही नहीं महाराष्ट्र, तेलंगाना, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश और कर्नाटका के सिखों ने जगह-जगह विरोध और प्रदर्शन शुरू कर दिया हैं. आंदोलन का दूसरा श्रेय हमारे पूज्य संत बाबा बलविंदर सिंघजी कारसेवा वाले और शिरोमणि पंथ अकाली बूढ़ा दल ९६ करोड़ी के जत्थेदार संत बाबा प्रेमसिंघजी माता साहेब वालों को जाता हैं. जिन्होंने साधसंगत का नेतृत्व स्वीकार कर ता. २१ जनवरी, २०१९  को एक भव्य आंदोलन को अंजाम दिया. 

इस आंदोलन ने नांदेड़ से लेका मुंबई तक हलचल मचा दी. इस आंदोलन से हजुरसाहिब के सभी सामाजिक संघठन जुड़ गए. साधसंगत से चुनकर आए तीनों सदस्यों ने भरपूर परिश्रम किया. हजूर साहिब के अन्य बोर्ड सदस्यों ने भी सकारात्मक भूमिका को अंजाम दिया. हजूर साहिब के नवजवानों ने जोश और उत्साह दिखाकर संघठन का परिचय दिया. यदि आपस में एकता हो तो हर आंदोलन सफल हो जाता हैं. नांदेड़ के साथ-साथ परभणी, परतुर, औरंगाबाद, श्रीरामपुर, अहमदनगर, मुंबई में आंदोलन की तीव्रता पहुंची और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. 
मुंबई में शिष्ट मंडल 


सबसे बड़ा काम ये हुआ कि हजुरसाहिब के एक शिष्ट मंडल ने ता. २२ जनवरी, २०१९ को मुंबई पहूँचकर मंत्रालय में मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर उन्हें हजुरसाहिब की साधसंगत की मांग का एक ज्ञापन सौंपा. शिष्ट मंडल में गुरुद्वारा सदस्य गुरमीत सिंघ महाजन, राजेंद्र सिंघ पुजारी, गुरप्रीत सिंघ सोखी थे. वहीं बोर्ड के प्रधान और विधायक तारासिंह को शिष्ट मंडल की अगुवाई करनी पड़ी. बोर्ड के सचिव परमज्योत सिंह चाहल भी शिष्ट मंडल में शामिल हुए. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ज्ञापन को सकारात्मक लेकर कानून संशोधन को रद्द करने की अनुकूलता दिखाई. जिससे उन अनैतिक तत्वों की गतिविधियों पर भी ब्रेक लग गया जो कलम ग्यारह का लाभ उठाकर बोर्ड का सीधा प्रधान बनने के लिए प्रयासरत थे. 
उधर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के प्रधान भाई गोबिंदसिंघ जी लोंगोवाल ने हजूर साहिब की साधसंगत की मांग के बाद व्यक्तिगत रूप से इस आंदोलन को अपना समर्थन जाहिर करते हुए महाराष्ट्र सरकार को ज्ञापन भेजकर मांग करने का निर्णय लिया. लेकिन दूसरी ओर श्रोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के मुंबई के सदस्यों ने लेकिन कलम ग्यारह को अपना समर्थन जारी रखा हुआ हैं. 
केंद्रीय मंत्री श्रीमती हरसिमरत कौर बादल ने आंदोलन को गंभीरता से लेते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को ट्वीट कर विषय से अवगत कराया और मांग प्रस्तुत की. जिसके बाद देवेंद्र फडणवीस द्वारा ट्वीट का तुरंत जवाब दिया गया और एक्ट संशोधन के विषय में सकारात्मक जवाब दिया गया. ये ट्वीट भी खासा चर्चा में रहा. मंजिंदरसिंघ सिरसा (दिल्ली) और मंजीत सिंह जी.के. द्वारा भी मांग उठाई गई. 
कुलमिलाकर गुरुद्वारा बोर्ड कानून १९५६ की कलम ग्यारह के एक्ट संशोधन को रद्द करने की मांग देशभर पहुँच गई. अब हर स्तर से विरोध उठ रहा हैं. सरकार की मंशा और मुंबई के कुछ लोगों की कारगुजारियां साधसंगत के सामने खुलकर उजागर हो चुकी है. जो अनैतिक तत्त्व बोर्ड का प्रधान पद खरीदने की भाषा कर रहे थे उन्हें भी करारा जवाब मिला है. हजूर साहिब के नौजवानों में उन व्यापारी प्रवृत्ति के लोगों के प्रति खासा रोष व्याप्त हैं. होना भी चाहिए. बहरहाल ख़ुशी इस बात की है कि हजूर साहिब की साधसंगत के आंदोलन के साथ अब देश के सभी घटक जुड़ रहे हैं. आनेवाले दिनों में हजूर साहिब का बोर्ड सरकार के नियंत्रण से मुक्त होने के पुरे आसार दिखाई दे रहे हैं. 
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सोमवार, 21 जनवरी 2019

एक नयी पहल का सूत्रपात ;
जत्थेदार जी और पंजप्यारे साहिबान को धन्यवाद 
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गुरुद्वारा बोर्ड कानून के सभी संशोधन रद्द करने की मांग 
जयकारों से गूंज उठी हजूर साहिब नगरी 
रविंदर सिंघ मोदी 


तखत सचखंड श्री हजूर साहिब की पावन धरती से तारीख २१ जनवरी २०१९ के दिन एक नयी पहल का सूत्रपात हुआ. गुरुद्वारा बोर्ड को महाराष्ट्र सरकार के चुंगल से मुक्त करवाने के लिए आखिर पंथ के जत्थेदार संतबाबा कुलवंतसिंघजी और आदरणीय पंजप्यारे साहिबान को कदम उठाना पड़ गया. पंजप्यारे साहिबान ने तखत साहिब के सान्निध्य में गुरुमत्ता लेकर सरकारी संशोधन बर्खास्त करने की मांग रखी. साथ ही इस मांग को पूरा करने  शुरू किये गए आंदोलन का नेतृत्व संतबाबा बलविंदर सिंघजी कारसेवा वाले और संतबाबा प्रेमसिंघजी माता साहेब वालों को सौंपा.

पंजप्यारे साहिबान की इस मांग को हजूरी साधसंगत ने हाथोहाथ लेकर हजूर साहिब नगरी में भव्य रैली निकालकर गुरुद्वारा बोर्ड कानून १९५६ में वर्ष २०१५ से अबतक किये गए सभी सरकारी संशोधन रद्द करने की मांग की. जिलाधीश श्री अरुण डोंगरे को एक ज्ञापन भी प्रस्तुत किया. संत बाबा बलविंदर सिंघजी और संतबाबा प्रेमसिंघजी मातासाहिब वालों के नेतृत्व में आंदोलन को आज एक नई दिशा प्राप्त हुई कहा जाए तो गलत नहीं होगा. पंजप्यारे साहिबान के आदेश के बाद साधसंगत का जोश भी चरम पर रहा. जयकारों से नगरी गूंज गई. 
इस नयी पहल से मुंबई में हलचल मच गई. सरकार के अधीन गुरुद्वारा बोर्ड कानून की धारा ग्यारह (११ ) का आधार लेकर मुंबई के कुछ विवादित मेंबर हजूर साहिब बोर्ड का प्रधान बनने के लिए मंत्रालय की सीढियां  घिसने में लगे हुए है. उनकी अरमानों को अब ठेस लगी होगी. लेकिन क्या ये अपनी नापाक हरकतों से बाज आएंगे? आइये आज आपको एक शरीफ मुम्बईया की कहानी बताते है.

दो-तीन माह पहले की घटना है, जब एसजीपीसी के सदस्य और गुरुद्वारा बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदरसिंघ मिन्हास गुरुद्वारा परिसर के ए विंग ब्लॉक के एक कमरे में आकर ठहरे थे. उनके साथ उनके पुत्र भी थे. उनके यहाँ होने की सुचना भाई देवेंद्रसिंघ मोटरावाले ने दी. तब सरदार लड्डूसिंघ महाजन, जसपालसिंघ लांगरी, अवतारसिंघ पहरेदार, देवेंद्रसिंह विष्णुपुरीकर, तेजपालसिंघ खेड़ और मैं स्वयं भूपिंदर सिंघ मिन्हास से मिलने पहुंचे. तारासिंह द्वारा बुलाई गई बैठक में उपस्थित होने का उनसे कारण पूछा तो शुरू में कुछ गर्मागर्मी हुई. बाद जब चर्चा पटरी पर लौटी मीत मिन्हास ने हमें आश्वासन दिया कि, कलम ग्यारह रद्द करवाने के लिए अब वो हमारा साथ देंगे. यहीं नहीं बल्कि हमारे शिष्टमंडल को मुख्यमंत्री का समय दिलवाएंगे. भला मनुष्य मानकर हमने साहब की बात पर यकीन कर लिया और रास्ता ताकते रहे कि कब मिन्हास साहब हमें मुख्यमंत्री के पास लेकर चलते हैं. 
मिन्हास साहब मुख्यमंत्री से मिलने तो गए लेकिन हमारे शिष्टमंडल को समय दिलाने के लिए नहीं बल्कि प्रधान पद पर अपना टांका फिट करने के लिए. उन्होंने मुख्यमंत्री से मिलकर तारासिंह के बारे में हजुरसाहिब में उठे असंतोष का हवाला देकर अगलीबार कलम ग्यारह का उपयोग कर अपने को हजूर साहिब बोर्ड का प्रधान नियुक्त करने की मांग कर डाली. यही नहीं प्रधान पद के बदले कुछ सौदेबाजी के पैतरे बिछा दिए. 
मुख्यमंत्री महोदय ने तारासिंघ को बुलाकर उनका त्यागपत्र मांग लिया. उसके बाद भूपिंदर सिंह मिन्हास ने गुरुद्वारा बोर्ड के तीन सदस्यों के चुनाव के दौरान संगत का ध्यान बटाकर अपने पासे मजबूत करने शुरू कर दिए. एसजीपीसी से मेंबरशिप त्यागकर सांठगांठ कर सरकारी प्रधान बनने की नीति अपना ली. एसजीपीसी के सदस्य के रूप में गुरविंदरसिंघ बावा, परमज्योत सिंघ चाहल को अपना समर्थक रखा. औरंगाबाद में मीटिंग लेकर वहां से अपना समर्थक मेंबर चुनकर लाने का असफल प्रयास किया. यांनी मुंबई मैं बैठकर कैसे कोरम पूर्ण कर लिया जाएं इसकी सभी व्यवस्थाएं जुटा ली. तारासिंह भी उनके साथ और इकबालसिंघ भी उनके साथ. बस नांदेड़ के एक दो मेम्बरों को अपनी ओर करने की कोशिश और मुंबई में बैठकर शासन चलने की पूरी योजना लगभग पूर्ण. 
मिन्हास जी ने तखत साहब के परिसर में बैठकर हमसे वादा किया और मुकर गए. यही नहीं तखत का प्रधान बनने के लिए उन्होंने जो पैंतरे अपनाएं, वो हजुरसाहिब के लोगों को नीचे दबाने का बंदोबस्त हैं. ये सब किसलिए. क्या एस.जी.पी.सी. का यह अंदरूनी खेल हैं? या मिन्हास एस.जी.पी.सी. को भी उपयोग में ला रहे हैं? छल और बल का प्रयोग कर तखत साहब का प्रधान बनने की यह नीति सरकार की आदतें बिगाड़ने वाली हैं. क्या मोल दे रहे हैं वो प्रधान पद का सरकार को? तारासिंह की बातों पर यकीन किया जाएं तो बेहद शर्मसार करनेवाले तथ्य सामने आ रहे हैं. ऐसी ओछी राजनीति करनेवाले और झूठे वायदे कर धोखेबाजी करनेवालों को यहाँ का प्रधान बनने की कोई जरुरत नहीं हैं. प्रधान तो क्या उन्हें बोर्ड का मेंबर भी नहीं बनना चाहिए.
तखत साहब की पवित्रता का बनाये रखने के लिए संत बाबा बलविंदर सिंघजी और संत बाबा प्रेमसिंघजी की अगुवाई में हजुरसाहिब के अमृतधारी सिखों ने गुरुद्वारा बोर्ड कानून की कलम ग्यारह हटाने के लिए आंदोलन का मार्ग अपना लिया हैं. रहत मर्यादा की उपेक्षा करनेवालों ने अब इस बोर्ड की तरफ बुरी नजर डालने से पहले  अपनी नियत के विषय में सोच लेना चाहिए.

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बुधवार, 16 जनवरी 2019

समय आ गया है अब आवाज बुलंद हो 
हजूरी प्रधान के लिए बड़े आंदोलन की जरुरत 
रविंदर सिंघ मोदी 

मुंबई मंत्रालय में गुरुद्वारा के नए बोर्ड गठन की प्रक्रिया शुरू हो गई है. तीन सदस्यों के चुनाव के बाद अब बाहरवालों का रास्ता साफ़ है. अब बोर्ड की नए से रचना कर, नया अध्यक्ष (प्रधान) नियुक्त करने की पहल जारी है. उधर प्रक्रिया में तेजी है. इधर हजूरी प्रधान के सपने देखनेवाले हम सब सुस्त हैं. हजूर साहिब से कोई बड़ी पहल तो मायने रखती है. केवल निवेदन देने मात्र और अख़बारों में सुर्खियाँ बटोरने से हजूरी प्रधान की नियुक्ति नहीं हो जाती. जरुरत हैं एक नई पहल और एक नए आंदोलन की. 
यह अपेक्षा हम साधसंगत में चुनकर आए हमारे तीनों सम्मानीय सदस्यों से कर सकते हैं कि वे संघटित होकर एक बड़ा आंदोलन करें जिसमें बड़ी संख्या में साधसंगत भी जुड़े. चुनकर आएं सदस्यों ने साढ़े तीन हजार से साढ़े चार हजार वोट प्राप्त किये हैं. यह कोई छोटी बात नहीं हैं. इसका अर्थ यही निकलता हैं कि साध संगत ने उन्हें अपना नुमाइंदा मान लिया हैं. अब तीनों सदस्यों की सामूहिक जिम्मेदारी बनती है कि वे गुरुद्वारा बोर्ड कानून १९५६ की कलम ११ में हुए संशोधन को रद्द करवा कर हजूरी प्रधान का चयन करवाने का रास्ता साफ़ करें. यहाँ के व्यवस्थापन में हजूर साहिब का नुमाइंदा प्रधान के रूप में प्रस्तुत करें अथवा करवाएं.
एक बार सरकार द्वारा अध्यक्ष नियुक्त करने के बाद यह लड़ाई बहुत मुश्किल हो जाएगी. क्योंकि बड़े बड़े दिग्गज प्रधान पद पाने के लिए पासे बिछाये हुए हैं. दिल्ली, मुंबई और नागपुर की शक्तियां इस कार्य में जुटी हुई हैं. इस बात को गंभीरता से लेते हुए चुनकर आएं तीनों सदस्य और बोर्ड के में मनोनीत अन्य सदस्य मिलकर बैठक का आयोजन कर आंदोलन की दिशा तय करें. यदि सभी सदस्य हजूरी प्रधान और कलम ११ रद्द करवाने के विषय में एकजुट होते हैं तो निश्चित ही एक बड़ा जनांदोलन खड़ा हो सकता है. 
जाहिर हैं कि संभाव्य आंदोलन में स्थानीय साध संगत की पूर्ण शक्ति भी प्राप्त हो सकती हैं. यदि यहाँ मौका चूक गए तो आनेवाले पच्चीस सालों में भी हजूरी प्रधान नहीं बन पायेगा. इसलिए २६ जनवरी से पहले ही यहाँ शांतता पूर्ण आंदोलन कर बोर्ड पर हमारा प्रधान मांगना चाहिए. लोकतंत्र में हमारा प्रधान चुनने का अधिकार हमें होना चाहिए. जिस  तरह से बोर्ड का काम चल रहा हैं उसे देखकर ये लग रहा हैं कि सन १९७५ की तर्ज पर गुरुद्वारा बोर्ड में भी आपातकाल लागु कर दिया गया हैं. इस अघोषित आपातकाल के ख़िलाफ़ लड़ने का यही सबसे उपयुक्त समय आ गया हैं. यदि मौका चूक गए तो साधसंगत से किये गए वायदे  झूठ का पुलिंदा साबित होंगे इसमें कोई दो राय नहीं हैं. 
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रविंदर सिंघ मोदी 

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

क्या गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड प्रधान पद की सौदेबाजी हो रही है?
कौन गद्दार दशमेश पिता का स्थान कब्ज़ाना चाह रहा है? 
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हजूरी प्रधान का सपना दिखानेवालों का संघर्ष शुरू !
रविंदर सिंघ मोदी 

(यह लेख हजूर साहिब के उन लोगों के लिए हैं जो जागृत नहीं हैं. 
यदि पढ़कर सो जाना हैं या व्यर्थ ही चर्चा करना है 
तो शायद लेख लिखना एक शोकांतिका मात्र माना जाना चाहिए. 
यदि लेख पसंद पड़े तो निश्चित ही आपके हक और अधिकार की लड़ाई में महत्वपूर्ण प्रतीत होगा. )

मुंबई के कुछ व्यावसायिक और आधे राजनीतिक लगातार गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड के ख़िलाफ़ हथकंडे अपना रहे हैं. किसी तरह से गुरुद्वारा बोर्ड का सदस्य पद मिल जाये इस मंशा से वहां का एक समूह पहले कार्य करता था. लेकिन अब उनकी मंशा गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड का प्रधान पद पाना है. क्योंकि हमारी गुरुद्वारा बोर्ड नामक धार्मिक संस्था १९५६ एक्ट में कलम ११ के संशोधन के बाद सरकार के अधीन जो है. सीधी बात है कि ये संस्था अब सरकारी मिलकियत बन गई है. सरकार जिसे चाहिए उसे प्रधान बना सकती हैं. जिसे चाहिए उसे मेंबर बना सकती है. लड़कर तो नांदेड़ के सिखों को मेंबर बनना पड़ता हैं. 
बड़े शर्म की बात है कि जिस संस्था का गठन नान्देड़ के वफादार अमृतधारी गुरु सिखों ने करवाया था और उसे सत्ता के रूप में बाहर वाले उपयोग कर रहे हैं. अक्सर चर्चा में सुनने को मिल रहा है कि, मुंबई और नागपुर के लोगों ने मुख्यमंत्री के नाक में दम कर रखा है कि हमें संस्था का प्रधान बनाओ, सदस्य बनाओ. अब तो गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान बनने के लिए वर्तमान मीत प्रधान और मुंबई के व्यवसायी भूपिंदर सिंघ मिन्हास साम, दाम, दंड और भेद अपनाकर मुख्यमंत्री के पीछे लगे हुए हैं कि एकबार मुझे नांदेड़ के गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बना दो. वे मुख्यमंत्री से कह  हैं कि फिर एकबार कलम ११ का उपयोग कर मुझे प्रधान बना दीजिये. जाहिर हैं एस.जी.पी.सी. भी इस बात का समर्थन कर रही होगी कि हजूर साहिब तखत पर उनके दो मुंबई निवासी मेम्बरों की सत्ता स्थापित हो जाये. चर्चा है कि मुंबई के ये लोग प्रधान पद पाने के लिए कोई भी दाम चुकाने को तैयार है.  विगत दो दिनों से नांदेड़ में इस तरह की चर्चा उफ़ान पर हैं. 
ये भी एक संयोग है कि बोर्ड के प्रधान और मिन्हास साहब के साथी सरदार तारा सिंघ भी विगत दो दिनों से नांदेड़ में गुरुद्वारा बोर्ड को लेकर चिंतन कर रहे हैं, क्या उनका पत्ता कटने वाला हैं? तारासिंह चिंतित है इसीलिए कि उनके राजनीतिक भविष्य का अब क्या होगा. नांदेड़ के बहुत से सदस्य उनकी सांत्वना कर रहे थे कि हम आपके साथ हैं. जहाँ - जहाँ तारा सिंह निकले सब उनके आगे पीछे दिखाई देते. अभी भी बहुत से लोगों को उम्मीद है कि तारा सिंह में इस.जी.पी.सी. के मुम्बइया सदस्यों का दांव पलटने का सामर्थ्य है. मुख्यमंत्री के अधिक करीब तो आमदार तारा सिंघ ही हैं फिर भूपिंदर सिंघ मिन्हास की मुख्यमंत्री से निकटता कैसे? वजह गहरी लग रही है. मिन्हास जब भी नांदेड़ पहुंचते है तब मीठी मुस्कान बिखरकर कहते हैं कि कलम ११ और कलम ६ के संशोधन की लड़ाई में मैं आपके साथ हूँ. एकबार तो गुरुद्वारा परिसर के कमरे में उन्होंने हमसे हुई बातचीत में  मुख्यमंत्री  देवेंद्र फडणवीस से मिलवाने का वायदा भी किया था. लेकिन मुख्यमंत्री से मिलवाना तो दूर अब कलम ११ का आधार लेकर स्वयं गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनने की फील्डिंग लगा चुके है ऐसा स्पष्ट हो रहा है.
यदि कोई सिख गुरुद्वारा बोर्ड का प्रधान बनने के लिए सरकार के साथ सांठ - गांठ के चक्कर में है तो वो हजूर साहिब का गद्दार माना जाये. क्या पद खरीदना वफादार सिखों की परंपरा में शुमार है?  एस.जी.पी.सी. इस बात से इत्तेफाक रखती है कि कोई गुरु घर के सीटों की बोली लगाएं ? हजूर साहिब बोर्ड के लिए वर्तमान समय कठिन बना हुआ हैं. महाराष्ट्र सरकार ने  गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कानून में जबरन संशोधन कर बोर्ड पर अपना अधिकार कर लिया जो नांदेड़ के सिखों का अधिकार छीनने जैसा हैं. मुखयमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस जी को वर्ष २०१५ में किये गए कलम ११ का संशोधन रद्द करना चाहिए. वहीं कलम ६ और कलम १५ के प्रस्तावित संशोधन भी पीछे लेने चाहिए. 
मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे संशोधन रद्द करवाकर नांदेड़ के सिखों के हवाले बोर्ड कर दे. कुछ व्यापारियों ने बोर्ड और रैंन सभाई के नाम पर यहाँ एक कारोबार शुरू किया हैं. तखत के नाम पर कारोबार हरगिज बर्दाश्त नहीं होना चाहिए. यदि कुछ सदस्य चाहते हैं कि मुम्बइया लॉबी की सत्ता यहाँ बनी रहे तो उन्हें हजूरी प्रधान का तुन्तुना बजाने कोई जरुरत नहीं. दूसरी ओर यह जाहिर सी बात है कि हजूर साहिब के जागरूक लोग यदि सोते रह जायेंगे तो गुरुद्वारा बोर्ड के पदों का कारोबार कर, बाहर के लोग सत्ता में आ जायेंगे. चुनावों के बाद तो आपकी नींद खुलनी चाहिए ऐसी अपेक्षा की जा सकती हैं. 
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बुधवार, 2 जनवरी 2019

बुंगई, कुंजीवाले और महाजन मेंबर बनें !


रविंदर सिंघ बुंगई, मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले और गुरमीत सिंघ महाजन चुनाव में सफल 

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के नतीजे मिले-जुले
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क्या पाया हजुरसाहिब के सिखों ने चुनावों से? 
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रविंदर सिंघ मोदी 

तखत सचखंड श्री हजूर अपचलनगर साहिब बोर्ड के चुनावों के नतीजें ता. ३१ दिसंबर, २०१८ को साधसंगत के सामने प्रस्तुत हुए हैं. तीन सीटों के चुनाव के नतीजें मिलेजुले आये हैं. मतदाताओं ने अपने प्रतिनिधि के रूप में सरदार रविन्दरसिंघ बुंगई, मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले और गुरमीतसिंघ महाजन को चुना हैं. जनता जनार्दन हैं इसलिए नतीजों पर कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. 
मतदान से पूर्व ही रविन्दरसिंघ बुंगई ने प्रचारतंत्र प्रभावी रखते हुए मानों जीत दर्ज कर ली थी. सर्वाधिक वोट लेकर उन्होंने बड़ी जीत हासिल की. सरदार गुरमीत सिंघ महाजन ने लगातार दूसरीबार जीत दर्ज कर अपना सिक्का मनवाया. वहीँ नए चेहरे के रूप में सरदार मनप्रीत सिंघ कुँजीवाले ने मतदाताओं का विश्वास जीत लिया. हमें युवा नेतृत्व मिला हैं. तीनों ऊर्जावान हैं और उनके पास संघटन शक्ति हैं. यदि योजना और दृढ़ निश्चय कर लिए जाये तो ये युवा नेता बहुत कुछ सकारात्मक कर सकते हैं. तीनों सदस्यों को नए पर्व के लिए हार्दिक शुभकामनाएं. 
विगत सव्वा महीने से तीन सदस्य चुनाव को लेकर चली राजनीतिक गहमागहमी अब समाप्त हो चली हैं. इस बार देखा गया कि बड़ी संख्या में युवा वर्ग ने चुनाव प्रचार में हिस्सा लिया. रिश्तेदार, मित्र और परिचित सव्वा महीने तक व्यस्त दिखाई दिए. गुरुद्वारा बोर्ड के चुनावों ने इस बार विधानसभा के प्रचार को भी पीछे छोड़ दिया लगता. सम्पूर्ण नांदेड़ नगरी बैनर और पोस्टरों से पट गई थी. गुरुद्वारा के चारों ओर चुनाव प्रचार की धूम मची हुई थी. चुनाव प्रचार के लोभ से विधायक तारासिंह एंड कंपनी भी खुद को रोक नहीं पायी. मुंबई से मतदाताओं से संपर्क जारी था. दूसरी ओर इस चुनाव में साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल भरपूर दिखाई दिया. पानी की तरह पैसा बहाया गया. युवा वर्ग को चुनाव प्रचार का अच्छा तजुर्बा मिल गया कहा जाये तो गलत नहीं होगा. लेकिन चुनाव समाप्त होते ही कुछ लोग जरूर बेरोजगार हो गए हैं. 
चुनाव जीतकर सदस्य बने नए तीनों नवसदस्यों को फिर एक बार मुबारकबाद. तीनों सदस्यों पर हजूरी सिखों के नेतृत्व के एक जिम्मेदारी हैं. यदि सभी स्थानीय सदस्य एकजुट होकर रहते हैं तो निश्चित ही स्थानीय सिखों का और विशेषकर गुरुघर का भला कर सकते हैं. किसी भी सदस्य को यह समझाने की जरुरत नहीं कि उसकी जिम्मेदारी क्या हैं और गुरु महाराज से वफ़ादारी क्या हैं. साधसंगत की अपेक्षाएं बहुताधिक नहीं हैं. लेकिन फिर भी उन अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं हो पा रही हैं क्योंकि गुरुद्वारा बोर्ड संस्था पराधीन हो चली हैं. जब तक इस संस्था के अध्यक्ष पद पर सरकारी नियुक्त प्रधान बैठा हैं तब तक कोई भी सदस्य छाती ठोंककर ये नहीं कह सकता कि यह संस्था उनकी हैं. जिसका मुख्य कारण है वर्ष २०१५ में हुए गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट संशोधन अनुसार कलम ग्यारह  (११) में हुआ बदलाव और सत्तांतर. बाद में स्थानिक सिखों के साथ किया गया सरकारी अध्यक्ष द्वारा की गई दो गुटों की राजनीती. हूकूमशाह की तरह गुरुद्वारा एक्ट में दुबारा कलम ६ में संशोधन की खुरापात. दूसरे हजूर साहिब की स्थानिक संस्था में बढ़ा सरकारी हस्तक्षेप. भविष्य में भी ये खुरापाती प्रवृत्ति के लोग तखत सचखंड श्री हजूर साहिब का नेतृत्व बाहरी शक्तियों को सौंप देंगे इसमें कोई दो राय नहीं हैं. ऐसे में १९५६ में हजूर साहिब के वफादार सिखों द्वारा पंजीकृत करवाई गई संस्था मुंबइयाँ नेता और व्यापारियों का सत्ता केंद्र बन गई हैं. अब नए सदस्यों की जिम्मेदारी बनती हैं की वे न बाहरी लोगों के चुंगल में फंसी हमारी संस्था को स्वतंत्र करें. साथ ही यहाँ की गरिमा कायम रखने के लिए बोर्ड की छवि भी स्वच्छ और सुन्दर बनायें. जैसे कि सभी ने कलम ग्यारह के खिलाफ लड़ने का आश्वासन अपने मेनिफेस्टो में दिया हैं. उस अनुसार उनके द्वारा कलम ग्यारह के संशोधन को पूर्ववत कर अपना प्रधान चुनने का विकल्प उपलब्ध करवाएं. 
मैं बहुत ही जिम्मेदारी के साथ और दुःखी मन से ये बात कह रहा हूँ कि किसी भी सन्माननीय मेंबर के नाम के साथ किसी का मोहरा या किसी का प्यादा या किसी का आदमी जैसे विशेषण योग्य प्रतीत नहीं होते. हर सदस्य की अपनी गरिमा हो तो हजूरी सिखों का मस्तक भी शान से ऊँचा उठ जाता है. यदि कोई पद और टेंडर की लाचारी में अपने माथे पर किसी का लेबल लगाकर स्वयं को गुरु घर का सेवक या प्रतिनिधि जताने की हिमाकत करता हैं तो निश्चित ही बीते चुनावों का कोई अर्थ नहीं रह जाता. आपको प्रतिनिधि या नेता चुनकर साधसंगत ने क्या पाया इस पर गहरा मंथन जरुरी हो जाता हैं. 
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मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

यह सैक्रिफाइस इलेक्शन है - रविंदर सिंघ मोदी

यह सैक्रिफाइस इलेक्शन है - रविंदर सिंघ मोदी 

आपका अंतिम मौका चला गया !!!
गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर साहिब मंडल (बोर्ड ) के चुनाव ता. 28 दिसंबर 2018 को हो रहे हैं. मराठवाड़ा के सिख मतदाता अपने तीन सदस्यों का चयन करेंगे. अपने प्यारे प्रतिनिधि चुनेगे. उन्हें गुरुद्वारा बोर्ड में जिम्मेदारियों सहित भेजेंगे. हमारी आकांक्षाएं बहुत हैं. हम बहुत आशावाद पाल रहे हैं. लेकिन हकीकत से रूबरू होना भी जरुरी है. 

आज मैं यह खुलासा करना चाहता हूँ कि वास्तविकता हमारी सोच और अपेक्षाओं से कुछ अलग है. हकीकत यह है कि ये चुनाव साधसंगत की मांग पर नहीं हो रहे हैं. बल्कि भाजपा विधायक तारा सिंह की रणनीति का ही यह एक हिस्सा है. तारा सिंह को अपना नया बोर्ड स्थापित करने की जल्दी है. उसने गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट की कलम 6 का संशोधन अभी तक भी रद्द नहीं करवाया हैं. क्योंकि सरकार जो योजनाबद्ध तरीके से करना चाह रही है तारा सिंह बखूबी वही अंजाम दे रहा हैं. बोर्ड का कानून पूरी तरह बदल कर सरकार हजूर साहिब के सिखों के हाथों से बोर्ड छीनना चाह रही है. दूसरा यह कि मुम्बईया लॉबी यहाँ अपना एकाधिकार स्थापित करना चाह रही हैं. ये चुनाव मात्र बाहरवालों की यहाँ सत्ता स्थापित करने की योजना हैं. तारा सिंह अपने भांझे - भतीजे और मुंबई के पैसे वालों के साथ ताजपोशी के लिए तैयार है. जैसे हि 31 दिसंबर को तीन सीटों के चुनाव नतीजे घोषित हो जायेंगे वैसे ही नए बोर्ड गठन की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएंगी. 
मैंने इन चुनावों को "सैक्रिफाइस चुनाव" का नाम दिया है. बलिदान!! जिसका मुख्य कारण यह है कि हजूर साहिब के सिखों की इस चुनाव को दिल खोलकर दी गई स्वीकृति. सरकार ने चुनाव लादे और सभी ने उत्साह के साथ उसे स्वीकार कर लिया ! किसी ने चुनाव का बहिष्कर नही किया. प्रशासन ने प्रक्रिया शुरू की तो मतदाता सूचि में नाम डालने की जल्दबाजी भी हुई. क्योंकि बहुत से लोगों को मेंबर बनने की जल्दी थी. किसी ने यह नहीं सोचा कि आगे क्या होगा?
चुनाव प्रक्रिया को लेकर जहां लोगों में उत्साह देखा जा रहा है, वो उत्साह कलम 11 और कलम 6 के संशोधन के ख़िलाफ़ नहीं देखा गया. बहुत अफ़सोस की बात है कि हजूरी संगत अपने बोर्ड को बचाना छोड़ कर उस तारा सिंह के चुंगल में फंस गए जिसने आपके पवित्र स्थल के प्रबंधन के सूत्र सरकार को सौंप दिए. आपकी सिक्खी को इसलिए प्रणाम कि आपने छिन्नेवालों को ही अपना नेता कबूल कर लिया. जिनका तन मन हजूरी बोर्ड के लिए समर्पित है उनका नेता तारा सिंह कैसे हो सकता हैं? यह नहीं होना चाहिए था.  

तारा सिंह द्वारा लादे गए चुनाव अपनाकर और उसका फिर से बोर्ड गठित कर हजूर साहिब के वफ़ादार सिख क्या साबित कर रहे हैं ? ये चुनाव अंतिम अवसर है इसके बाद तो चुनाव होना भी मुश्किल है. इसीलिए मैंने इसे सैक्रिफाइस चुनाव कहा है कि हमने वो सबकुछ कर दिया जो बाहर वाले चाहते हैं. हजूरी सिखों ने इन चुनावों के माध्यम से बोर्ड का बलिदान कर दिया ये मानकर चले. यह एक कड़वी सच्चाई हैं. अब आपके हाथ सिर्फ नौकरियां मांगना रह गया है. प्रतिकार नहीं करने, नहीं लड़ने की कोई तो किंमत चुकानी होगी. आगे चलकर ये कहावत मशहूर हो जाएगी कि "हाथ का बोर्ड गंवाना कोई हजूर साहिब के निष्ठावान सिखों से सीखे". 



गुरुतागद्दी त्रिशताब्दी के समय भी बहुत सी समस्याएं प्रस्तुत हुई थी पर कोई नहीं लड़ा था. जिसका परिणाम ये हुआ कि हजूर साहिब के सिखों में लड़ने की प्रवृत्ति ही समाप्त हो गई. एकबार फिर साबित हो गया हैं कि हम केवल एकदूसरे के साथ ही लड़ सकते हैं. सरकार के खिलाफ संघर्ष तक नहीं कर सकते. लड़ने वालों की टाँगे खींच सकते हैं. जो होना था वही हो रहा हैं? किसी को कोई खबर नहीं हैं. इसीलिए तो मैं कह रहा हूँ कि यह "बलिदान चुनाव" हैं. जो लोग चुनाव में जीत कर आएंगे उनमें से कोई भी ये मादा नहीं रखता कि हजूरी प्रधान वो बनाएगा. यहाँ तारासिंह को हटाना हमारे बस में नहीं है. क्योंकि हमें अब तक लगता था कि तारासिंह अकेला सब कुछ कर रहा हैं. लेकिन अब यह तथ्य सामने आ रहा हैं कि तारा सिंह ने भी जैसे बोर्ड को सरकार के अधीन करने की सुपारी उठाई हैं. बाद में यहाँ का बजट, सत्ता, आराम, चापलूस, चाकर और सुविधाएँ देखकर उसने कायम का यहां सत्ता में रहने का मन बना लिया हो. कुछ भी हो हमने अंतिम अवसर भी खो दिया हैं यह मानकर चलिए. ये खरी-खरी बातें बुरी लग रही हो तो लगे, क्षमा मांगना भी एक तरह से पक्के हजूरी विचारों से बेमानी होगी.   
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रविंदर सिंघ मोदी

सोमवार, 24 दिसंबर 2018

तारासिंह अब तक का सबसे निष्क्रिय प्रधान !
लगभग २०० करोड़ के बजट का नहीं क्या गया उपयोग 
क्या हजूर साहिब बोर्ड को शिरडी ट्रस्ट जैसा बनाया जा रहा हैं?
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रविन्दरसिंह मोदी

इससे पूर्व भी मैंने बेबाक तौर पर यह बात कही है कि विधायक तारा सिंह की प्रधानगी नांदेड़ के सिखों के लिए अभिशाप से कम नहीं है. अब मेरी यह बात भी तारा सिंह के समर्थक वर्ग को अप्रिय प्रतीत हो सकती है, जब मैं यह तर्क प्रस्तुत करूँ कि सन १९५६ से अब तक के गुरुद्वारा बोर्ड कार्यकाल में तारा सिंह का विगत पौने चार वर्षों का कार्यकाल सबसे निष्क्रिय साबित हुआ है. पिछले तीन वर्षों में गुरुद्वारा बोर्ड के बजट का ठीक से उपयोग करने में भी तारासिंह बुरी तरह से विफल साबित हुआ है. मैं बेबाक और खरी खरी कह रहा हूँ आप खुद जाँच कर देख लीजिये. 
विधायक तारा सिंह ने अप्रैल २०१५ में महाराष्ट्र सरकार के आदेश से गुरुद्वारा सचखंड मंडल (बोर्ड) का अध्यक्ष पद प्राप्त किया था. पद पर बैठने के बाद जब तारासिंह ने गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड (मंडल) के आर्थिक मामलों का निरिक्षण किया तो उसके अधिपत्य में ६० करोड़ राशि के बजट की संस्था थी. उसके बाद वर्ष २०१६ - २०१७ आर्थिक वर्ष का बजट प्रस्तुत हुआ तो वह बढ़कर ६८ करोड़ हो गया. वर्ष २०१७-२०१८ में बजट की राशि ८८ करोड़ इतनी दर्शाई गई थी. अभी वर्ष २०१८ - २०१९ का जब वार्षिक बजट प्रस्तुत हुआ तो यह अकड़ा बढ़कर ९५ करोड़ हो गया. वर्ष २०१५-१६ से वर्ष २०१८-१९ इन चार सालों का आर्थिक प्रारूप कहता हैं कि चार वर्षों में दो सौ करोड़ से तीन सौ करोड़ की राशि खर्च करने का अवसर था. जो तारा सिंह ने गंवाया हैं. इस राशि के उपयोग से नांदेड़ शहर में छह भव्य मार्केट इमारतों का निर्माण हो सकता था. वही लगभग ५० एकड़ जमीन खरीदी जा सकती थी. तारा सिंह ने कोई संपत्ति खड़ी नहीं की. क्यों? सोचिए?

तारासिंह के कार्यकाल में प्रस्तावित और अनुमानित आर्थिक व्यवहार की संभावित सीमा तीन सौ करोड़ (३०० करोड़) से ज्यादा की है. उसी तरह से पिछले तीन वर्षों का शुद्ध बजट देखा जाए तो लगभग २०० करोड़ रूपयों का व्यवहार प्रभावित हुआ है. बोर्ड के पास इतना बड़ा विकल्प होने के बावजूद भी तारासिंह ने अध्यक्ष के नाते इस बजट का उपयोग ठीक तरह से नहीं किया. तारासिंह ने भूमिपूजन तो दो से तीन स्थानों पर किये लेकिन प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हुए. तारासिंह के कार्यकाल में गुरुद्वारा बोर्ड के धन राशि से कोई नयी ईमारत, मार्किट, काम्प्लेक्स, गुरुद्वारा, डेवढ़ी, बाथरूम, रोड या कोई छत का निर्माण हुआ हो तो बताइयेगा. इतनी जमीनें उपलब्ध होने के बावजूद उसने कोई भी स्ट्रक्चर खड़ा नहीं किया. क्योंकि एक तो उसके पास विज़न (दूरदृष्टि) नहीं, दूसरे इच्छाशक्ति नहीं, तीसरे फुट डालों झगडे कराओ की राजनीति और चौथे केवल सरकारी अध्यक्ष होने का रौब. इस कारण उसने कोई गुरु घर का पैसा बैंकों में ब्लॉक रखा.
अब जायजा लेते है उन कुछ कामों का जो उसने करवाएं. पहले नम्बर पर चिल्ड्रन पार्क का काम. यह कार्य उसने मुंबई के अपने निकटतम व्यक्ति से करवाया. यह विषय भी काफी चर्चा में रहा था. तारा सिंह ने दूसरा काम करने में रूचि दिखाई वो है श्री गुरु गोबिंद सिंघजी म्यूजियम के अधूरे कार्यों के विषय में. तारा सिंह के पद लेने के बाद खर्च की कोई सीमा ही नहीं रही. जो वस्तु १० रुपयों की थी वो मान लीजिये ५० रुपयों में खरीदी गई. खर्च और मरम्मत कार्यों का खर्च लाखों में होने की बात सामने आयी हैं. जिसमे ठेकेदार को अग्रिम धन देने का मामला भी चर्चा में रहा हैं. म्युझियम में कितने के कार्य करवाएं गएँ, किसके ऑब्जरवेशन में करवाएं गए, अभी और कितना खर्च करना हैं जैसे प्रश्न खड़े हैं. जाहिर हैं तारा सिंह तो जवाब नहीं देगा. सरकार भी धांधलियों की जाँच नहीं करवाएंगी. 
खैर मुद्दे पर आते हैं, दशमेश अस्पताल में संसाधन बढ़ाने के पहले के बोर्ड के निर्णय पर उसने कुछ खर्च किया. छोटे-मोटे स्लाइडिंग, पार्टीशन, बॉउंड्री वॉल, खालसा हाई स्कूल , सचखंड पब्लिक स्कूल रिनिवेशन, वृद्ध आश्रम के कमरों को अधिकारियों  का निवास स्थान बनाने के लिए रेनोवशन में खर्च, तोड़फोड़ आदि कार्य कर उसने कुछ करोड़ व्यर्थ किये ऐसा आरोप स्वयं बोर्ड के मेंबर ही लगा रहे हैं. तारा सिंह ने कोई ईमारत खड़ी नहीं की.  यात्री निवास नहीं बनाया.  उत्पन्न बढ़ाने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की. 
बोर्ड की बैठकें मुंबई में लेकर तीन से साढ़े तीन वर्षों में करोड़ों का खर्च करवाया. मुंबई  बैठकें हुई, उनमें क्या प्रभावी निर्णय हुए? बोर्ड का उत्पन्न तो नहीं बढ़ा उलटे खर्च ज्यादा हुए. तारा सिंह जब जब नांदेड़ दौरे पर आया तो दौरा खर्च भी बढ़ गया. अख़बारों में विज्ञापन छपवाकर गुरुघर में खुद का दरबार आयोजित किया गया. बैनर और पोस्टर में भी अब तक करोड़ के निकट खर्च हुए होंगे. अभी भी आवश्यक खर्च जारी हैं. 
उसने अपने रिश्तेदारों को ऊँचे पैकेज पर डायरेक्टर बनाया. जहां जगह नहीं थी वहां भर्ती करवाई. चार महीनों में चार सौ कर्मचारी भर्ती करते समय बोर्ड मीटिंग में किसी तरह का कोई प्रस्ताव पास नहीं किया. नयी भर्ती किये गए कर्मचारियों का प्रति माह अंदाजा ३३ लाख रुपयों के वेतन की अतिरिक्त व्यवस्था नहीं की गई बल्कि गोलक से ही वो खर्च किया जा रहा हैं. ऊपर से इतने कर्मचारियों को भविष्य में स्थाई (परमानेंट) नौकरी का आश्वाशन भी नहीं दिया गया, क्योंकि सभी को डेलीवेजस पर नहीं बल्कि कॉन्ट्रैक्ट टाइप नौकरिया बांटी गई. किसी भी कर्मचारी को भर्ती के साथ पद बहाल नहीं किये गए. स्थाई कर्मचारियों को रोटेशनल प्रमोशन नहीं दिए गए जो कि उनका हक्क और अधिकार बनता हैं. वरिष्ठ कर्मचारी प्रमोशन से वंचित हैं. उनके साथ सरासर अन्याय किया गया. तारा सिंह ने उनकी बात तक नहीं सुनी. बोर्ड में कार्यरत महिला कर्मचारियों को प्रमोशन में न्याय नहीं दिया गया. उल्टा महिला शोषण बढ़ने के समाचार सुनने में आते रहे हैं. तारा सिंह के निकटवर्तीय की जाँच के लिए महिला और बाल उत्पीड़न पथक ने छानबीन भी की हैं. यानी तखत की गरिमा बनाये रखने में वो पूरी तरह से विफल साबित हुआ हैं. 
क्या निष्क्रिय प्रवृत्ति का व्यक्ति दुबारा प्रधान बनना चाहिए?
तारा सिंह के प्रधान राज्य में क्या विकास किया गया साध संगत को आज खुलकर बताया जाये यह सभी की मांग हैं. सरकारी नुमाईंदा होने और चार सालों का आर्थिक बजट हाथ में रहते हुए भी उसने कोई बड़ा काम नहीं किया. इतना बजट उसने ब्लॉक क्यों रखा उसका सच बाहर आना चाहिए. आगे भी तारा सिंह प्रधान बनने के लिए पासे बिछा चूका हैं. जो लोग गुरुद्वारा बोर्ड के चुनाव लढ रहे हैं, उन्होंने हजूरी प्रधान का विषय गंभीरता से लेते हुए तारा सिंह से सवाल करना चाहिए कि पिछले पौने चार सालों में उसने बजट ब्लॉक क्यों रखा? क्या शिरडी ट्रस्ट की तरह ही सरकार को लोन देने की कोई गुप्त योजना हैं? क्या फिक्स डिपॉजिट्स पर किसी को लोन की सिफारिश की गई हैं? विकास नहीं करना था तो पद पर बैठकर हजूर साहिब  झगडे लगाने की क्या जरुरत थी? तखत साहब पर मेम्बरों को कसम खिलने की क्या जरुरत थी?
हजूर साहिब के लोगों का दुर्भाग्य कहा जाना चाहिए की १९५६ से लेकर आज तारीख तक केवल १६ साल ही हजूरी प्रधान पद पर रहे. जिनमें से नांदेड़ के केवल दो ही प्रधान रहे जिन्होंने साढ़े नौ साल प्रधान पद पर निकला. बाकी समय यानी पचास वर्षों के करीब बाहरवालों ने, कलेक्टर ने और प्रशासकों ने यहाँ की सत्ता संभाली हैं. फिर भी हजूर साहिब के बाशिंदे जो कहते हैं कि गुरु हाजिर नजीर हैं, वो नहीं चाहते कि गुरुघर में स्थानीय प्रधान बनें. गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव में २२ उम्मीदवार खड़े हैं जिनमे से कुछ डम्मी माना जाएं तो भी आठ से नौ उम्मीदवार मैदान में हैं. सभी योग्य हैं और राजनीती समझते हैं. मैं किसी उम्मीदवार के लिए व्यक्तिगत नहीं कह रहा हूँ चयन संगत का अधिकार हैं. सभी उम्मीदवार चाहते हैं हजूरी प्रधान बनें. लेकिन प्रत्यक्ष में बनाने के हालत में कोई नहीं दिखता. क्योंकि उनकी मानसिकता स्थिर हो गई हैं कि बोर्ड पर बाहर वालों का राज कायम रखना है. जाहिर हैं सरकारी नियुक्ति की प्रथा के रहते यहाँ का प्रधान चुनने का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता. इस समस्या का हल किसके पास हैं? जो सबसे योग्य उम्मीदवार है वो यह जाहिर करें. 
क्या वर्तमान में त्यागपत्र देकर भी गद्दी पर बैठा निष्क्रिय प्रधान दुबारा से प्रधान बनना चाहिए? क्या सरकार यहाँ निष्क्रिय व्यक्ति लादकर सचखंड बोर्ड को भी शिरडी ट्रस्ट जैसा बना रही जहां सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहे? और तारा सिंह इसी छुपे अजेंडे पर काम कर रहा हैं?
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शुक्रवार, 21 दिसंबर 2018

हजूरी प्रधान कैसे ?
फिर प्रधान बनने के लिए तारासिंह की तडजोड़ शुरू 
बोर्ड पर स्थापित होगा मुम्बईया राज?
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रविन्दरसिंघ मोदी 
जब तक मुख्यमंत्री श्रीमान देवेंद्र फडणवीस जी का आँख बँधकर समर्थन कायम है तब तक भाजपा के विधायक और गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड नांदेड़ के सरकारी प्रधान तारा सिंह का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता यह तो स्पष्ट हो चला है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस उनकी हर गलती, नादानी, मनमानी, अफरा-तफरी और साजिश को नजर अंदाज कर रहे हैं. गुरुद्वारा सचखंड के प्रबंधन में उन्हें जी.पी.सी. के मेंबर उनके हुकुम के आगे नतमस्तक दिखाई दे रहे है. 
इस कुशल हुकुमरान ने हजूर साहिब में नौकरियां बांटकर सब सिखों की जुबानें सील दी हैं. प्रमोशन तो मिठाई जैसी बाँट कर उन्होंने नियमों को तक पर रख दिया. उनके खिलाफ कितनी भी शिकायतें कर लीजिये उनको पद से कोई नहीं हटा सकता। भाजपा के इस विधायक के पीछे सरकार खड़ी हो जाने से उसकी मनमानी इतनी बढ़ गई कि गुरु घर के प्रबंधन में सैकड़ों गलतियाँ कर दी. नुकसान कर दिया. गोलक पर खर्च लाद दिया और सच्चा सुच्चा बनने का नाटक करना शुरू कर दिया. भाजपा के ईमानदार सरकार द्वारा लादे हुए इस प्रधान ने गुरुघर के प्रबंधन को उसने किसी निजी ट्रस्ट की सत्ता जैसा हाँकना शुरू कर दिया. आज भी हाँक रहा हैं. शायद उसे मरने तक भी यहाँ का प्रधान बना रहना है. अब तो उसके साथ इस.जी.पी.सी. की मुंबई की हस्तियाँ और दशम की विरोधी भी कंधे से कन्धा लगाकर काम कर रहे हैं. सभी की यही इच्छा है कि हजूर साहिब में हजूरी प्रधान नहीं बनना चाहिए. 
अब तो औरंगाबाद में भी यही बात फैलाई जा रही हैं की यहाँ हजूरी प्रधान ठीक नहीं हैं. इसलिए मुंबई वालों की सत्ता हजूर साहिब में स्थापित होनी चाहिए. बहुत सी शक्तियाँ इस काम में जुट गई हैं कि हजूरी प्रधान ना  बन पाएं और कलम ग्यारह (११) सरकार के अधीन रखकर ही हजूर साहिब बोर्ड का प्रशासन चलाया जाना चाहिए. और यह काम तारा सिंह के लिए कोई कठिन नहीं हैं. मुंबई से औरंगाबाद और वहाँ से हजुरसाहिब तक उसने अपना नेटवर्क मजबूत कर लिया हैं. अपना नेटवर्क मजबूत करने के लिए उनसे भाजपा को पहले दूर कर दिया. उसने कांग्रेस के कुछ मोहरों को मैदान में उतारा. कुछ पढ़े लिखों को पदों का लालच देकर अपने साथ कर लिया. दीवान ख़त्म करने की धमकियां देकर एक गुट को खामोश कर दिया तो दूसरें को उत्साहित कर दिया. 
अब गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव में वो अपने तीन मेंबर चुनकर लाने के प्रयास में हैं. उसकी नीति और राजनीति हजुरसाहिब की संगत के आगे कामयाब लग रही हैं. हो सकता हैं कि चुनाव के बाद तारासिंह अपने साथ मुंबई के दो से तीन मेंबर बोर्ड में लेकर आ जाएँ. पिछली बार जिनकों सरकार द्वारा मनोनीत कर दिया गया था शायद उनके स्थान पर मुंबई और नागपुर से  कोई मेंबर बनकर आये. और हजूर साहिब के स्वाभिमानी सिख उन्हें "साहब" "साहब" कहकर सिरमात्थे लगा ले.    
 स्मरण होगा कि अपने इसी राजनीतिक बल और राजनीतिक पहुँच के कारण ही तारासिंह ने गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड कानून १९५६ (कलम ११) में जबरन संशोधन करवाकर गुरु घर का सरकारीकरण करवा दिया था और हम कुछ नहीं कर पाए थे. बाहुबली तारासिंह सिंह यही तक नहीं रुके उन्होंने तो बाद में प्रधान का कोरम मुंबई में बैठे बैठे प्राप्त करने के लिए गुरुद्वारा बोर्ड एक्ट १९५६ में कलम ६ में भी संशोधन करवा दिया.  यह संशोधन पीछे लेने के लिए उसके खिलाफ आंदोलन किया गया. पर उसने कुशलता से उसे दबा दिया. इस आंदोलन को निरस्त करने करने के लिए उसने साम दाम दंड भेद का सहारा लिया. यहाँ तक कि संतों की अपील पर भी उसने संशोधन पीछे नहीं लिया. क्योंकि उसे अपनी राजनीतिक ताकत केवल गुरुघर के खिलाफ ही उपयोग में लाना था. इस पगड़ीधारी विधायक ने अपनी राजनीतीक साख गुरु घर के सरकारी कारण करने में खर्च कर दी. अब बोर्ड की चाब्बीयां भी सरकार को सौंपने की उसकी तैयारी दिखाई दे रही हैं. 
औरंगाबाद से खेल शुरू !!
(औरंगाबाद में २० दिसंबर को कलम ग्यारह के समर्थक मुंबई के मेंबर चुनाव प्रचार करते हुए.) 
औरंगाबाद में उसने गुरुवार ता. २० दिसंबर को गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव का प्रचार किया लेकिन भाजपा के लिए नहीं. उसने स्पष्ट कहा हैं कि नांदेड़ के एक उम्मीदवार को वोट दे बाकी दो यही के उम्मीदवारों को वोट दे. यानी वो नांदेड़ और औरंगाबाद के मतदाताओं में सीधी फूट डालना चाह रहा हैं. उसके साथ प्रचार में इस.जी.पी.सी. के मेंबर भी थे, मीत प्रधान भूपिंदर सिंह मिन्हास और गुरविंदर सिंह बावा,. इकबाल सिंह, सुरजीत सिंह भी प्रचार बैठक में शामिल थे. विधायक तारा सिंह की ऐसी नीतियाँ हैं तो हजुरसाहिब के सिखों को भी सोचना चाहिए कि उनका भविष्य क्या होगा? तारा सिंह को निष्पक्ष रहना चाहिए थे या भाजपा के उम्मीदवार खड़े करने चाहिए थे. मुख्यमंत्री जी तारा सिंह से और क्या करवाना चाहते हैं आप?  वर्ष २०१५ से आपने हमारा बोर्ड अधिग्रहित कर लिया हैं. अब बोर्ड बर्खास्त करना था लेकिन नहीं किया. तारासिंह का इस्तीफा क्यों लिया गया? सरकार का बल लेकर वो अब नान्देड़ के सिखों के साथ खेल खेल रहा हैं. आपस में एक दूसरों को लड़ा रहा हैं. ऐसे में हजूरी प्रधान कैसे बनेगा? 
(विधायक तारा सिंह औरंगाबाद में चनाव प्रचार में अपना सिक्का जमाते हुए. )
इस चुनाव में भी विधायक तारासिंह सभी को चॉकलेट दे रहा हैं. जिनका प्रचार कर रहा है उन्हें भी बेवकूफ बना रहा हैं. वो किसी भी हाल में हजूरी प्रधान बनने नहीं देगा. चुनकर आनेवाले मेंबर उसकी गोद में बैठकर राजनीति नहीं करेंगे, इसकी क्या गारंटी? चाहे कोई भी स्थानीय व्यत्कि मेंबर बनें, कोई भी हजूर साहिब निवासी का निवासी प्रधान बनें हमे आपत्ति नहीं. ना विरोध होगा. सभी को अधिकार है वो प्रधान बनें , मेंबर बनें. लेकिन गुरुघर के, तारासिंह के नहीं. इसलिए जो लोग तारासिंह का सहारा ले रहे हैं उन्हें उसकी कोई जरुरत ही नहीं हैं. अपनी काबिलियत पर चुनकर आये हम स्वागत करेंगे. आपका काम आपको सफलता देगा. लेकिन यदि आप तारा सिंह के लिए चुनकर आना चाहते हैं तो आपकी राजनीतिक कुशलता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाता हैं. हजूर साहिब की भोली भली संगत का भविष्य दाँव पर लगाना किसी हाल में भी उचित नहीं होगा. तारा सिंह ने गुरुघर का सरकारीकरण कर पाप ही किया हैं उसके पाप में  हजूर साहिब का कोई भी भागीदार ना बनें यही प्रार्थना हैं.  
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बुधवार, 12 दिसंबर 2018

गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड चुनाव का 
प्रचार जोरों में... 
रविंदर सिंघ मोदी  


तखत सचखंड श्री हजूर साहिब बोर्ड के तीन सदस्य पदों के लिए आगामी २८ दिसंबर को आयोजित चुनाव के लिए उम्मीदवारों की प्रचार यंत्रणा सक्रीय हो गई हैं. चुनाव मैदान में हालाँकि २६ उमीदवार हैं लेकिन जिनमें से कुछ डमी प्रत्याशी हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने केवल समर्थन घोषित करने के लिए अपना परचा भरा हैं. लेकिन चुनाव मैदान में असल में सोलह (१६) उम्मीदवार ही अंत तक लड़ेंगे ऐसा प्राथमिक चित्र दिखाई दे रहा हैं. संभव हैं की अंत तक केवल ग्यारह (११) लोग ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में दिखाई दे.

जो उम्मीदवार चुनाव लड़ा  रहे हैं उनमें रणजीत सिंह कामठेकर, गुरमीत सिंघ महाजन, रविंदर सिंह बुंगई, कुँजीवाले मनप्रीत सिंह, तेजपालसिंह खेड़, धूपिया जसबीर सिंह, अवतारसिंह पहरेदार, जोगिन्दर सिंह रामगाड़िया, गुलाटी हरचरण सिंह गोबिंदसिंह, ओबेराय ऋषिराज सिंह, कौशल परविंदर सिंह जगजीत सिंह, गाड़ीवाले कर्नलसिंघ, गुलबीरसिंघ नवाब, हरप्रीत सिंह लांगरी, दिगवा हरभजनसिंह, प्रकाश सिंह कान्सा यह अपने स्वयं के लिए मतदान मांग रहें हैं. 
इच्छुक लेकिन अन्य के लिए प्रयासरत उम्मीदवारों में संभाव्य उम्मीदवार के रूप में अथवा डमी के रूप में बलजीत सिंह बावरी, हरदीपसिंह घड़ीसाज, पेशकर परमजीत सिंह, प्रेमजीतसिंघ सुखाई, तेजवंत सिंह संतोकसिंघ रागी, पुजारी सतनामसिंह, बाठ हरप्रीतसिंघ के नाम चर्चा में हैं. 

अधिकतर उम्मीदवारों ने अपना चुनाव प्रचार आरम्भ कर दिया हैं. पूर्व बोर्ड सचिव और वर्त्तमान मेंबर रणजीत सिंह कामठेकर द्वारा बगैर पैनल के अकेले उम्मीदवार के रूप में भाग्य आजमाया जा रहा हैं. बोर्ड मेंबर गुरमीतसिंह महाजन भी अकेले चुनाव मैदान में हैं. मैनेजिंग मेंबर रविंद्र सिंह बुंगाई भी अपने बुते पर अकेले लड़ रहे हैं. हजूरी क्रांति संघटन के उम्मीदवार मनप्रीत सिंह कुँजीवाले भी अकेले चल रहे हैं. शिवसेना के नेता अवतारसिंह पहरेदार और जोगिंदर सिंघ रामगडिया भी बगैर किसी पैनल के मैदान में हैं. 

उधर चुनाव की दृष्टी से महत्वपूर्ण माने जानेवाले औरंगाबाद के निवासी उम्मीदवारों में सबसे अनुभवी हरचरण सिंघ गुलाटी, नए उम्मीदवार कौशल परविंदर सिंघ और प्रकाशसिंघ कान्सा अकेले के बलबूते चुनाव मैदान में हैं. जो उम्मीदवार स्वयं के बुते चुनाव में हैं उनकी रणनीति थर्ड ऑप्शन की रही हैं. यह नीत्ति बहुत बार कारगर साबित होती हैं लेकिन चुनावी हवा में नुकसान भी पहुंचाती हैं. इसलिए यह नीति एक गैम्बल जैसी प्रतीत हो रही हैं. 
एकमात्र पैनल : 
इस चुनाव में एकमात्र पैनल बना है. इस पैनल का नाम "हम चाकर गोबिंद के " रखा गया हैं. जिसमें तेजपाल सिंघ खेड़ (नांदेड़), गुलबीरसिंघ नवाब (नांदेड़) और ऋषिराज सिंह ओबेराय (औरगांबाद) का समावेश हैं. तेजपालसिंह खेड़ को पिछले चुनावों में बड़ी संख्या में वोट मिले थे पर वे कुछ वोटों से चुनाव में असफल साबित हुए थे. जिसके कारण इस बार उन्होंने ने पैनल की रणनीति को अमल में लाया हैं. 

प्रचार की शुरुवात जोरों में 
गुरुद्वारा बोर्ड चुनाव के प्रचार तंत्र की शुरुवात जोरों में हुई हैं. उम्मीदवारों ने पोस्टर और पर्चों के साथ अपने प्रचार यात्रा की शुरुवात हुई हैं. अधिकतर उम्मीदवारों ने अपने प्रचार की नांदेड़ जिले में पहली फेरी पूर्ण कर ली है. शहरी और ग्रामीण मतदाताओं से मेलमुलाकत कर अपनी निशानियाँ और चुनावी पत्रक का वितरण शुरू कर दिया हैं. गुरुद्वारा मार्ग, चिखलवाड़ी, बड़पुरा, अबचलनगर कॉलोनी, यात्रिनिवास सहित अन्य स्थानों पर चुनावी पोस्टर और बैनर लग गए हैं. कुलमिलकर विधानसभा चुनावों जैसा यहाँ चित्र दिखाई दे रहा हैं. 
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रविंदर सिंघ मोदी 
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गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

समाचार 
हजूर साहिब बोर्ड चुनाव में २६ प्रत्याशी मैदान में 
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१२ उम्मीदवारों ने नामांकन पीछे लिए 
२८ दिसंबर को होगा मतदान. 
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रविन्दरसिंघ मोदी 
श्री हजूर साहिब, नांदेड़ स्थित गुरुद्वारा तखत सचखंड बोर्ड की तीन सीटों के लिए आयोजित चुनाव के मैदान में अब २६ प्रत्याशी रह गए हैं. ता. ६ दिसंबर की दोपहर ३ बजने तक नामांकन पर्चा पीछे लेने की अंतिम अवधि थी. जिसके तहत बारह प्रत्याशियों ने अपने पर्चे पीछे ले लिए. भले ही चुनाव में दमदार प्रत्याशी शामिल नहीं है लेकिन परिस्थिति बड़ी रोचक हो गई हैं. ता. २८ दिसंबर को मतदान होगा. जिसके लिए मराठवाड़ा के नांदेड़, औरंगाबाद, उस्मानाबाद, बीड, जालना, परभणी, हिंगोली, लातूर और चंद्रपुर जिले के तीन तहसीलों के मतदाता मतदान करेंगे. सूचि में १२ हजार सात सौ से अधिक मतदाताओं का समावेश हैं. 
पर्चे पीछे लेने के बाद चुनाव मैदान में २६ उमीदवार खड़े हैं, जिनमें रणजीत सिंह कामठेकर, गुरमीत सिंघ महाजन, रविंदर सिंह बुंगई, कुँजीवाले मनप्रीत सिंह, तेजपालसिंह खेड़, धूपिया जसबीर सिंह, अवतारसिंह पहरेदार, जोगिन्दर सिंह रामगाड़िया, गुलाटी हरचरण सिंह गोबिंदसिंह, ओबेराय ऋषिराज सिंह, कौशल परविंदर सिंह जगजीत सिंह, गाड़ीवाले कर्नलसिंघ, गुलबीरसिंघ नवाब, हरप्रीत सिंह लांगरी, दिगवा हरभजनसिंह, बलजीत सिंह बावरी, हरदीपसिंह घड़ीसाज, पेशकर परमजीत सिंह, प्रेमजीतसिंघ सुखाई, प्रकाश सिंह कान्सा , तेजवंत सिंह संतोकसिंघ रागी, पुजारी सतनामसिंह, बाठ हरप्रीतसिंघ आदि का समावेश हैं. 
नामांकन पीछे लेनेवालों में वर्तमान सदस्य शेरसिंघ हीरा सिंह फौजी, मोहनसिंह गाड़ीवाले, रामगडिया गुरदेवसिंघ, ओबेराय जसपालसिंह, ओबेराय ओंकारसिंह, बावरी ठाकुर सिंह, सेना गुरमीतसिंह, खैरा जोगेंद्र सिंह, बुंगाई रघबीर सिंह, चाहेल तेजपालसिंह और राजसिंघ फौजी का समावेश हैं. शेरसिंघ फौजी वर्तमान बोर्ड में सदस्य हैं. चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों में रणजीत सिंह कामठेकर, गुरमीत सिंह महाजन बोर्ड में सदस्य हैं. जबकि रविंदर सिंह बुंगाई मैनेजिंग कमिटी में मेंबर हैं. 
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इस चुनाव में बड़ी हस्तियों द्वारा दुरी बनाये हुए हैं जो सामान्य मतदाताओं में चर्चा का विषय बन गया हैं. गुरुद्वारा बोर्ड के प्रधान के रूप में सरकार द्वारा सीधी नियुक्ति किये जाने के कारण अधिकतर संगत में रोष व्याप्त हैं. उसी तरह से बोर्ड चुनाव जितने के लिए अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल और सरकार हस्तक्षेप के कारण भी समझदार सिख चुनाव से दूर ही दिखाई दे रहे हैं.  
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बुधवार, 5 दिसंबर 2018

पुलिस द्वारा की गई अमानवीय पिटाई में सिखलीगर सिख की मौत 
कौन खड़ा रहेगा सिखलीगरों के उत्थान के लिए ? 
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रविंदर सिंघ मोदी

महाराष्ट्र पुलिस ने बेहद शर्मनाक और अमानवीय घटना को अंजाम दिया हैं. मराठवाड़ा संभाग के परभणी शहर के पास बलसा गांव में ता. १ दिसंबर की सुबह कत्ता सिंघ पिता जसमत सिंघ दुदानी नामक ५० वर्षीय सिखलीगर सिख की पुलिस द्वारा डंडे बरसाएं जाने के बाद मौत हो गई. ये गरीब सिख परिसर के एक गुरुद्वारा और निशान साहिब को तोड़ने से मना कर रहा था. 
प्राप्त जानकारी के मुताबिक मुताबिक ता. एक दिसंबर की सुबह परभणी शहर से सटे पिंगली इलाके में बलसा ग्रामपंचायत में कैनाल किनारे सिचाई विभाग की सरकारी जमीन पर से पुलिस और प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने की मुहीम शुरू की गयी. सुबह लगभग ९ बजे के समय सरकारी अतिक्रमण पथक पुलिस को लेकर वहाँ पहुंचा. पथक के कर्मचारियों ने आव देखा ना ताव देखा मकान तोड़ने शुरू कर दिए. 
अतिक्रमण पथक द्वारा प्रोक्लीन (जे.सी.बी.) मशीन की सहायता से मकान हटाने शुरू किये गए. यह मशीन जैसे ही निशान साहिब के पास पहुंची कत्तासिंघ ने निशान साहिब तोड़ने का विरोध किया. कत्तासिंघ दुदानी ने निशान साहब का कसकर पकड़ लिया और कहा कि यह हमारा पावन चिन्ह हैं इसे न तोड़े. तब पुलिस ने सत्ता सिंघ पर लाठियां भांजनी शुरू कर दी. उसकी सहायता के लिए दूसरे लोग पहुंचे लेकिन पुलिस ने लाठीचार्ज करते हुए सभी की धुनाई कर दी. उन्होंने महिलाओं को भी नहीं बक्शा. कत्ता सिंघ अभी भी निशान साहब से चिपका हुआ था तो उसकी पीठ और सिर पर पुलिस ने डंडे बरसायें. जिससे वो बेहोश हो गया. 
पुलिस ने उसे खींचकर दूर किया. लेकिन जैसे ही ये संकेत मिले की वो गंभीर रूप से घायल हो चूका है तो लाठी चार्ज बंद कर पुलिस ने उसके परिवार से वायरल हुए हैं. 
परिवार ने कुछ युवकों के साथ मिलकर आखरी सांसें गिन रहे कत्ता सिंघ को तुरंत परभणी शहर के सरकारी अस्पताल में उपचार हेतु भर्ती करवाया लेकिन उपचार के चलते ही रात में उसकी मौत हो गई. जिसके बाद जैसे सिखलीगर समाज में मातम सा फ़ैल गया. 
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घटना के बाद सिखलीगर समाज को तुरंत सहायता नहीं मिल पायी. पुलिस ने बहुत डराया. जिला प्रशासन ने भी उल्टा मामला बनाने और अपने अधिकारी एवं कर्मचारियों को तथा मारपीट में शामिल पुलिस के अधिकारी और पुलिस को बचाने का बहुत प्रयास किया. 
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ता. ३ दिसंबर को गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदर सिंघ मिन्हास, गुरुद्वारा मेंबर गुरमीत सिंह महाजन, सरजीत सिंघ गिल, रणजीत सिंह कायहाँ की जमींन पर विगत तीस वर्षों से सिखलीगर समाज के लगभग ३० परिवार मकान बनाकर रह रहे थे. उनके द्वारा वहाँ पूजापाठ के लिए एक गुरुद्वारा भी उनके द्वारा बनाया गया था. गुरुद्वारा परिसर में एक बड़ा निशान साहिब लगाया गया था. विगत तीस वर्षों से यहाँ के निवासी टैक्स भी चूका रहे हैं. 
 कहामठेकर, डी.पी. सिंह, गुरविन्दर सिंह वाधवा, सुखविंदर सिंह हुंदल, गुरप्रीत सिंह सोखी, कर्नल सिंह गाड़ीवाले, गुरमीत सिंह बेदी, मनप्रीत सिंह कुँजीवाले, जसपाल सिंह गाड़ीवाले सहित बड़ी संख्या में सिख समाज के लोग घटनास्थल पर पहुंचे. बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदर सिंह मिन्हास ने मृतक के परिवार की सांत्वना की. बोर्ड मेम्बरों द्वारा यह निर्णय भी अवगत करवाया गया कि हजूर साहिब बोर्ड द्वारा मृतक के परिवार को एक लाख की आर्थिक सहायता की जाएगी. साथ ही जिन परिवारों के मकान तोड़ दिए गए हैं उन्हें २५ हजार की मदत की जाएगी. साथ ही खुले में पड़े परिवारों के लिए सचखंड बोर्ड एक महीने तक दोनों समय का लंगर लगाएगा. 
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इस घटना से मराठवाड़ा के सभी जिलों में सिखलीगर परिवार रोष में है. सरकार द्वारा बगैंर सुचना के इस तरह से ठण्ड के दिनों में मकान तोड़ दिए जाने से महिला और छोटे बच्चे भी खुले में आ गए हैं. ता. २ दिसंबर को परभणी के जिला कलेक्टर को साधसंगत की ओर से एक ज्ञापन सौपकर मामले की जाँच कराने और गरीब सिखलीगर समाज को दुबारा मकान बनाकर देने की मांग की गई. इस समय जिलाधीश कार्यालय के सामने नारेबाजी की गई. 
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कौन लड़ेगा सिखलीगरों के लिए : 

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न ये उठ रहा हैं कि महाराष्ट्र प्रदेश में सभी ओर सिखलीगर समाज उपेक्षित और वंचित हैं. बार - बार ये समाज पुलिस बर्बरता से कांप जाता हैं. पुलिस भी सिखलीगर को पकड़कर पहले पिटाई कर देती है बाद में पूछताछ करती हैं. सिखलीगर समाज पर हुए अन्याय को लेकर लड़ने के लिए उस संभ्रांत सिखों की जरुरत हैं जो स्वयं को उच्च प्रति के सिख मानते हैं. हालांकि सिखलीगर समुदाय ऐसा है जो केश और ककार रखता हैं. सिखलीगर समाज ने कभी केश कत्तल कर सिक्खी छोड़ी नहीं. १९८४ के कठीण दौर में भी सिखलीगर समाज ने सितम झेले पर सिक्खी नहीं छोड़ी. सिखलीगर समाज के उत्थान के लिए सिख समाज को एकजुट होकर लड़ने की जरुरत हैं. हजूर साहिब के सिक्खो पर बहुत कुछ निर्भर करता हैं. राजनीति को अलग रखकर आज पुलिस बर्बरता की घटना को गंभीरता से लेने की जरूरत हैं. उसी तरह सिखलीगर समाज और समुदाय के नेताओं से भी प्रार्थना है की इस विषय को संजीदगी से ले. गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के चुनाव से प्रभावित होकर कोई काम न करें. सबसे पहला काम तो बेघर हुए सिखलीगर परिवारों को सरकारी आवास बनवाकर दिलाने का हैं. सामूहिक रूप से ये प्रयास सभी को करना होगा. 
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शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

गुरुद्वारा तखत सचखंड मंडल (बोर्ड) के प्रधान 
तारा सिंह ने मुख्यमंत्री को आखिर प्रधानगी का त्यागपत्र सौंपा 
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(तारा सिंह विधायक मुलुंड मुंबई)

रविंदर सिंघ मोदी 
तखत सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब मंडल (बोर्ड) के सरकार नियुक्त प्रधान विधायक तारा सिंह को आखिर अपने प्रधानगी का त्यागपत्र मुख्यमंत्री को सौंपना पड़ा. या यह कहिए मुख्यमंत्री के मांगने पर त्यागपत्र देने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं था. इस त्यागपत्र मामले की दो प्रमुख वजह सामने आ रही हैं. 
एक तो आगामी दिसम्बर माह में गुरुद्वारा मंडल के तीन सदस्य पदों के चुनाव होने का पूर्ण अनुमान है. चुनाव मतदाता सूचियों के निर्माण की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है. चुनाव करवाने के लिए एक्ट १९५६ के तहत बोर्ड बर्खास्त करना अनिवार्य है. बोर्ड बर्खास्त करने के लिए प्रधान और वर्तमान सदस्यों को जिम्मेदारी से मुक्त करना भी आवश्यक हो जाता हैं. 
दूसरी वजह ये है कि विगत तीन साल सात माह और कुछ दिनों के कार्यकाल में तारासिंह खासे विवादित रहे हैं. उनके द्वारा गुरुद्वारा बोर्ड और विधानसभा के कार्यकाल में कोई अंतर नहीं किया गया. एक धार्मिक संस्था की गरिमा को राजनीतिकस्तर प्रदान किया. गुरुद्वारा बोर्ड के कार्यकाल में सर्वाधिक विरोध का सामना करनेवाले वे अग्रणी प्रधान है. उनके ख़िलाफ़ कई आरोप लगे. जिनमें अफरातफरी और धांधलियों के आरोप भी शामिल है. अपने निकटवर्तीय रिश्तेदारों को डायरेक्टर नियक्त कर ६० हजार रुपए वेतन (मानधन) देने का विषय हो, कर्मचारी नियुक्ति और प्रमोशन में अनियमितता का विषय हो अथवा टेंडर प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी हो. या फिर दखनी साधसंगत के विरोध का विषय हो. सबकुछ तारासिंह के विपरीत दिखाई देते हैं. तारासिंह द्वारा गुरुद्वारा बोर्ड में कांग्रेस  स्थानीय पदाधिकारियों और मेम्बरों की ताल में ताल मिलाने के कारण भी मुख्यमंत्री खासे नाराज होने की बात सामने आ रही हैं. स्थानीय भाजपाई इस बात को लेकर परेशान थे कि तारासिंह ने कोंग्रेसियों के हाथ में स्थानीय व्यवस्थाएं सौप दी है. यहाँ तक कि गुरुद्वारा बोर्ड के सदस्यों  भी बोर्ड के कामकाज से दूर कर दिया था. इस विषय में बहुत सी शिकायतें मुंबई पहुँच रही थीं. साथ ही एक अहम् विषय यह भी रहा कि, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस तारीख ३१ दिसम्बर २०१७ के दिन गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजुरसाहिब में संपन्न हुए एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए थे. उस समय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अपने भाषण में गुरुद्वारा बोर्ड पर स्थित सरकारी कर्ज की ६२ करोड़ की राशि माफ़ करने का आश्वासन दिया था. विगत दस माह में इस आश्वासन की पूर्ति नहीं हो पायी. हाल ही में यह विषय दैनिक सकाल (सकाळ) समाचार पत्र में प्रकाशित भी हुआ था. इस विषय में भी तारासिंह को जिम्मेदार माना जा रहा है की उन्होंने इस विषय की तकनीकी पहलुओं को सरकार के सामने उजागर नहीं किया.  तारा सिंह का त्यागपत्र एक तरह से सही समय पर आया है. गुरुद्वारा के चुनाव निष्पक्ष हो इस बात के लिए बोर्ड का बर्खास्त होना जरुरी हो गया है. कुछ लोगों ने गुरुद्वारा बोर्ड के सम्भाव्य चुनाव के लिए गुरुद्वारा बोर्ड कार्यालय का जबरदस्त इस्तेमाल शुरू कर दिया था. तारासिंह के त्यागपत्र के बाद गुरुद्वारा प्रशासन अनुशासन से कार्य करने लगेगा ऐसे कयास लगाएं जा रहे हैं. 
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अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजिये. 

शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

: ताजा समाचार : 
नरेंद्र मोदी है भगवान विष्णु का ग्यारहवां अवतार’
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महाराष्ट्र के एक भाजपा प्रवक्ता अवधूत वाघ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान विष्णु का ‘ग्यारहवां अवतार’ बताया है. उन्होंने एक ट्वीट किया, ‘सम्मानीय प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी भगवान विष्णु का ग्यारहवां अवतार हैं.’ बाद में एक मराठी चैनल के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, ‘देश का सौभाग्य है कि हमें मोदी में भगवान जैसा नेता मिला है.’ वाघ के इस बयान के बाद महाराष्ट्र में राजनीतिक गलियारों से अलग-अलग बयान जारी हो रहे हैं. श्री मोदी को देवताओं की कतार में खड़ा कर देने से देशभर में यह विषय सियासी चर्चा का मुद्दा बना रहा. 


वाघ के वक्तव्य पर प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता अतुल लोंधे ने कहा कि यह देवताओं का ‘अपमान’ है. उन्होंने कहा, ‘यह वाघ द्वारा खोई हुई राजनीतिक जमीन हासिल करने की कोशिश भी है. मुझे नहीं लगता कि इस टिप्पणी को ज्यादा महत्व देने की जरुरत है.’ लोंधे ने कहा कि यह टिप्पणी सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के अंदर ‘संस्कृति के निम्नस्तर’ की झलक है. विपक्ष में यह विषय छाया हुआ है. 

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने कहा, ‘वाघ वीजेटीआई से अभियांत्रिकी स्नातक हैं. अब इस बात की जांच करने की जरुरत है कि उनका सर्टिफिकेट असली है या नहीं.’

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बेअदबी घटनाओं को लेकर 

AAP विधायक फुल्का ने दिया इस्तीफा

पंजाब में बीते कुछ समय से चल रहे धार्मिक बेअदबी मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के विधायक एचएस फुल्‍का ने शुक्रवार को पंजाब विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. फुल्का ने बेदअबी की घटनाओं में पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और सेवानिवृत्त डीजीपी सुमेध सिंह सैनी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने में राज्य सरकार की कथित 'नाकामी' पर नाराजगी जताते हुए इस्तीफा दिया है. फुल्का ने पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा, 'मैंने पंजाब विधानसभा के विधायक के पद से अपना इस्तीफा विधानसभाध्यक्ष को ई-मेल से भेज दिया है.' विधानसभा अधिकारियों ने बताया कि विधानसभा अध्यक्ष राणा केपी सिंह ने अभी इस्तीफे पर कोई फैसला नहीं किया है. पंजाब में बेअदबी की घटनाओं को लेकर राजनीतिक घमासान मचा हैं. 
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हिंदी और संस्कृत का प्रचार प्रसार :-
अमेरिका सरकार द्वारा अमरीका में हिन्दी और संस्कृत भाषाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विविध कदम उठाएं हैं. जिसके अंतर्गत वाशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने जल्द ही दोनों भाषाओं के लिए नि:शुल्क साप्ताहिक कक्षाएं शुरू करने की घोषणा की है. दूतावास ने एक बयान में कहा है कि कक्षाएं एक घंटे की होंगी और दूतावास में भारतीय संस्कृति के शिक्षक डॉक्टर मॉक्स राज ये कक्षाएं लेंगे.

कक्षाएं दूतावास परिसर में चलाई जाएंगी. कक्षाएं शुरू करने की तारीख के बारे में जल्द ही घोषणा की जाएगी. बयान में बताया गया है कि हिन्दी की कक्षा हर मंगलवार को शाम छह बजे से सात बजे के बीच होगी और संस्कृत की कक्षा हर गुरुवार को इसी समय पर होगी.

वहीं भारतीय दूतावास ने अन्य जानकारी देते हुए ट्वीटर पर नोटिस की एक कॉपी भी शेयर की है. इसमें दी जानकारी के अनुसार इच्छुक लोग हिंदी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं की क्लास कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें केवल अपना नाम, टाइटल, पद और क्लास लिखकर डॉ.मॉक्स राज के ई-मेल पर भेजना होगा. 
अमरीका सरकार ने हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार के लिए एक बड़ी राशि का प्रावधान अपने राष्ट्रिय बजट में किया हैं. 
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रविंदर सिंह मोदी 
श्री हजूर साहिब, नांदेड़. 

बुधवार, 19 सितंबर 2018

"मनमर्जियां " के बहाने दिमागी विकृति 
सिखों की भावनाओं को आहत करने की साजिश 
रविंदर सिंह मोदी 

फ़िल्म उड़ान , गैंग ऑफ़ वसेपुर और क्वीन जैसी फिल्मों के लिए फ़िल्म फेयर अवार्ड जीतनेवाले फ़िल्म और टी.वी. सीरियलों के निर्माता निर्देशक अनुराग कश्यप कमाल के षडयंत्रकारी व्यक्ति प्रतीत हो रहे हैं. उत्तरप्रदेश के गोरखपुर की इस पैदाइश ने सिख धर्म के नीतिमूल्यों का खुलकर मजाक उड़ाने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी है. सिख धर्म में धूम्रपान वर्जित है यह सभी हिन्दू और अन्य जातियों के लोग भलीभाँति परिचित हैं. लेकिन अनुराग कश्यप ने अपनी नयी फिल्म "मनमर्जियाँ " में एक दस्तार (पगड़ी) पहने हुए व्यक्ति से स्मोकिंग (धूम्रपान) करवाने के कुछ सीन फिल्मों में जानबूझकर डाल दिए हैं. साथ ही सिख परिवार से संबंधित एक लड़की तापसी पन्नू को धूम्रपान करते दिखाना यानी धार्मिक मूल्यों का अवमूल्यन उसकी के सर मढ़ने वाली बात हो गई हैं. जरूर अनुराग कश्यप ने सिख धर्म को साजिश के तहत बदनाम करने और सिख अनुयायियों में फिल्मों का ग्लैमर जगाने का प्रयत्न किया है. ये बात निषेधार्य है.  
निषेध और निषेध :

दिल्ली, अमृतसर, नांदेड़ साथ साथ देश में जगह जगह से सिखों ने फिल्म का विरोध किया. बाद में फिल्म से कुछ दृश्य हटाने के लिए पहल की गई. लेकिन तब तक अनुराग कश्यप की फिल्म ने २० से २२ करोड़ की अच्छी कमाई कर ली थी. फ़िल्म बनाते समाज अनुराग कश्यप के दिमाग में सभी फार्मूलें एक साथ चल रहे थे. भारतीय लड़कियों को विदेशी लड़कियों के तुलना में खड़ा करने की पूर्ण सहूलियत इस फिल्म में परोसी गई है. लड़कियों की आज़ादी हर सीमा लाँघने के पूर्ण अधिकार ये फ़िल्म प्रदान करती है. सोशल मीडिया का कहा तक दुरूपयोग किया जाना चाहिए यह तो उस व्यक्ति का जातिगत स्वतंत्र हो गया है, जो इसका इस्तेमाल कर  रहा हैं. कश्यप ने उन्हें बढ़ावा देने में कहीं कोई कसार नहीं छोड़ी है. कहीं यह संस्कारी को बेशर्म बनाने की कश्यप की राष्ट्रीय साजिश तो नहीं?
आये दिन फिल्मों में सिखों के चरित्र को कमजोर दिखाने प्रयास हो रहे हैं. किसी फिल्म में सिख का चरित्र नामर्द का दिखाया जा रहा हैं, तो किसी फिल्म में उसे जोकर से कम नहीं दिखाया जा रहा हैं. बहुत बार तो सिखों को खलनायक दिखाया जा रहा हैं. बहुत बार नायिका का पत्र सिख का होता है जिसका अफेयर किसी अन्य धर्म के पात्र के साथ दिखाया जाता हैं. टी.वी. पर विज्ञापनों में सरदार के पीछे बैठी उसकी लड़की को सिर मुण्डे लड़के के छेड़ने जैसे दृश्य दिखाएं जा रहे हैं. ऐसा सिख धर्म के साथ ही क्यों किया जा रहा हैं. 
अनुराग कश्यप किस तरह के हिन्दू है?

उल्लेखनीय है मनमर्जियाँ की शूटिंग के दौरान अनुराग कश्यप, अभिषेक बच्चन, तापसी पन्नू और टीम के कुछ सदस्यों ने श्री दरबार साहिब, हरिमंदर साहिब, अमृतसर के दर्शन भी किये थे. उस समय क्या उन्हें सिख धर्म और सिख संस्कृति के दर्शन नहीं हुए थे? क्या उस समय सिख धर्म के नीतिमूल्यों की उन्हें जानकारी नहीं मिली थी. तापसी पन्नू तो एक सिख (पंजाबी) परिवार से है, क्या उसे भी सिख धर्म के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं हैं ? अनुराग कश्यप को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि, वे किस तरह के हिन्दू है ? गोरखपुर में पैदा होकर भी होने न खुद का धर्म ज्ञात है और न किसी और धर्म का सम्मान ही वे करते हैं. हिन्दू धर्म किसी अन्य धर्म का अनादर नहीं कर सकता. अनुराग को पहले हिन्दू धर्म सिखने की जरुरत है. सिखों के चरित्र इस तरह से पेश कर वे सिख धर्म का अप्रत्यक्ष रूप से मजाक उड़ा रहे हैं. 
संसार बोर्ड लापरहवाह क्यों ?
मीडिया में सिखों के साथ आये दिन साजिश जारी हैं. मीडिया और फिल्म जगत ने मनमर्जी चला रखीं हैं सिखों को अपमानित करने की. क्या सिख देश के सेन्सॉर बोर्ड को सिख धर्म के नीति मूल्यों के संबंध कोई जानकारी नहीं. सिखों के बलिदान और उनके साहस के सम्बन्ध में सेन्सॉर बोर्ड को कोई तथ्य ज्ञात नहीं. कितने गैर जिम्मेदाराना लोग सेन्सॉर बोर्ड में बैठे हैं ? क्या सेंसर बोर्ड भी सिखों की उपेक्षा को आसानी से ले रहा हैं ? सिखों की भावनाएं आहत करनेवाली एक वर्ष में दस से पंद्रह फिल्में अथवा टी.वी. सीरियल दिखाएं जा रहे हैं. सेंसर बोर्ड खामोश है. जो हो रहा हैं उसे होने दिया जा रहा हैं. सेंसर बोर्ड पर सबसे पहले धार्मिक भावनाओं का सम्मान नहीं करने या सिखों के बारे में जानबूझकर अप्पतिजनक तथ्यों के प्रचार के आरोप में कानून करवाई होने चाहिए. 

  होली हल्ला महल्ला यात्रा मार्ग की दुरुस्ती करें : मनबीरसिंघ ग्रंथी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार समूह) के युथ प्रदेश सचिव स. मनबीर...