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बुधवार, 5 दिसंबर 2018

पुलिस द्वारा की गई अमानवीय पिटाई में सिखलीगर सिख की मौत 
कौन खड़ा रहेगा सिखलीगरों के उत्थान के लिए ? 
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रविंदर सिंघ मोदी

महाराष्ट्र पुलिस ने बेहद शर्मनाक और अमानवीय घटना को अंजाम दिया हैं. मराठवाड़ा संभाग के परभणी शहर के पास बलसा गांव में ता. १ दिसंबर की सुबह कत्ता सिंघ पिता जसमत सिंघ दुदानी नामक ५० वर्षीय सिखलीगर सिख की पुलिस द्वारा डंडे बरसाएं जाने के बाद मौत हो गई. ये गरीब सिख परिसर के एक गुरुद्वारा और निशान साहिब को तोड़ने से मना कर रहा था. 
प्राप्त जानकारी के मुताबिक मुताबिक ता. एक दिसंबर की सुबह परभणी शहर से सटे पिंगली इलाके में बलसा ग्रामपंचायत में कैनाल किनारे सिचाई विभाग की सरकारी जमीन पर से पुलिस और प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने की मुहीम शुरू की गयी. सुबह लगभग ९ बजे के समय सरकारी अतिक्रमण पथक पुलिस को लेकर वहाँ पहुंचा. पथक के कर्मचारियों ने आव देखा ना ताव देखा मकान तोड़ने शुरू कर दिए. 
अतिक्रमण पथक द्वारा प्रोक्लीन (जे.सी.बी.) मशीन की सहायता से मकान हटाने शुरू किये गए. यह मशीन जैसे ही निशान साहिब के पास पहुंची कत्तासिंघ ने निशान साहिब तोड़ने का विरोध किया. कत्तासिंघ दुदानी ने निशान साहब का कसकर पकड़ लिया और कहा कि यह हमारा पावन चिन्ह हैं इसे न तोड़े. तब पुलिस ने सत्ता सिंघ पर लाठियां भांजनी शुरू कर दी. उसकी सहायता के लिए दूसरे लोग पहुंचे लेकिन पुलिस ने लाठीचार्ज करते हुए सभी की धुनाई कर दी. उन्होंने महिलाओं को भी नहीं बक्शा. कत्ता सिंघ अभी भी निशान साहब से चिपका हुआ था तो उसकी पीठ और सिर पर पुलिस ने डंडे बरसायें. जिससे वो बेहोश हो गया. 
पुलिस ने उसे खींचकर दूर किया. लेकिन जैसे ही ये संकेत मिले की वो गंभीर रूप से घायल हो चूका है तो लाठी चार्ज बंद कर पुलिस ने उसके परिवार से वायरल हुए हैं. 
परिवार ने कुछ युवकों के साथ मिलकर आखरी सांसें गिन रहे कत्ता सिंघ को तुरंत परभणी शहर के सरकारी अस्पताल में उपचार हेतु भर्ती करवाया लेकिन उपचार के चलते ही रात में उसकी मौत हो गई. जिसके बाद जैसे सिखलीगर समाज में मातम सा फ़ैल गया. 
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घटना के बाद सिखलीगर समाज को तुरंत सहायता नहीं मिल पायी. पुलिस ने बहुत डराया. जिला प्रशासन ने भी उल्टा मामला बनाने और अपने अधिकारी एवं कर्मचारियों को तथा मारपीट में शामिल पुलिस के अधिकारी और पुलिस को बचाने का बहुत प्रयास किया. 
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ता. ३ दिसंबर को गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदर सिंघ मिन्हास, गुरुद्वारा मेंबर गुरमीत सिंह महाजन, सरजीत सिंघ गिल, रणजीत सिंह कायहाँ की जमींन पर विगत तीस वर्षों से सिखलीगर समाज के लगभग ३० परिवार मकान बनाकर रह रहे थे. उनके द्वारा वहाँ पूजापाठ के लिए एक गुरुद्वारा भी उनके द्वारा बनाया गया था. गुरुद्वारा परिसर में एक बड़ा निशान साहिब लगाया गया था. विगत तीस वर्षों से यहाँ के निवासी टैक्स भी चूका रहे हैं. 
 कहामठेकर, डी.पी. सिंह, गुरविन्दर सिंह वाधवा, सुखविंदर सिंह हुंदल, गुरप्रीत सिंह सोखी, कर्नल सिंह गाड़ीवाले, गुरमीत सिंह बेदी, मनप्रीत सिंह कुँजीवाले, जसपाल सिंह गाड़ीवाले सहित बड़ी संख्या में सिख समाज के लोग घटनास्थल पर पहुंचे. बोर्ड के मीत प्रधान भूपिंदर सिंह मिन्हास ने मृतक के परिवार की सांत्वना की. बोर्ड मेम्बरों द्वारा यह निर्णय भी अवगत करवाया गया कि हजूर साहिब बोर्ड द्वारा मृतक के परिवार को एक लाख की आर्थिक सहायता की जाएगी. साथ ही जिन परिवारों के मकान तोड़ दिए गए हैं उन्हें २५ हजार की मदत की जाएगी. साथ ही खुले में पड़े परिवारों के लिए सचखंड बोर्ड एक महीने तक दोनों समय का लंगर लगाएगा. 
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इस घटना से मराठवाड़ा के सभी जिलों में सिखलीगर परिवार रोष में है. सरकार द्वारा बगैंर सुचना के इस तरह से ठण्ड के दिनों में मकान तोड़ दिए जाने से महिला और छोटे बच्चे भी खुले में आ गए हैं. ता. २ दिसंबर को परभणी के जिला कलेक्टर को साधसंगत की ओर से एक ज्ञापन सौपकर मामले की जाँच कराने और गरीब सिखलीगर समाज को दुबारा मकान बनाकर देने की मांग की गई. इस समय जिलाधीश कार्यालय के सामने नारेबाजी की गई. 
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कौन लड़ेगा सिखलीगरों के लिए : 

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न ये उठ रहा हैं कि महाराष्ट्र प्रदेश में सभी ओर सिखलीगर समाज उपेक्षित और वंचित हैं. बार - बार ये समाज पुलिस बर्बरता से कांप जाता हैं. पुलिस भी सिखलीगर को पकड़कर पहले पिटाई कर देती है बाद में पूछताछ करती हैं. सिखलीगर समाज पर हुए अन्याय को लेकर लड़ने के लिए उस संभ्रांत सिखों की जरुरत हैं जो स्वयं को उच्च प्रति के सिख मानते हैं. हालांकि सिखलीगर समुदाय ऐसा है जो केश और ककार रखता हैं. सिखलीगर समाज ने कभी केश कत्तल कर सिक्खी छोड़ी नहीं. १९८४ के कठीण दौर में भी सिखलीगर समाज ने सितम झेले पर सिक्खी नहीं छोड़ी. सिखलीगर समाज के उत्थान के लिए सिख समाज को एकजुट होकर लड़ने की जरुरत हैं. हजूर साहिब के सिक्खो पर बहुत कुछ निर्भर करता हैं. राजनीति को अलग रखकर आज पुलिस बर्बरता की घटना को गंभीरता से लेने की जरूरत हैं. उसी तरह सिखलीगर समाज और समुदाय के नेताओं से भी प्रार्थना है की इस विषय को संजीदगी से ले. गुरुद्वारा सचखंड बोर्ड के चुनाव से प्रभावित होकर कोई काम न करें. सबसे पहला काम तो बेघर हुए सिखलीगर परिवारों को सरकारी आवास बनवाकर दिलाने का हैं. सामूहिक रूप से ये प्रयास सभी को करना होगा. 
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शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

गुरुद्वारा तखत सचखंड मंडल (बोर्ड) के प्रधान 
तारा सिंह ने मुख्यमंत्री को आखिर प्रधानगी का त्यागपत्र सौंपा 
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(तारा सिंह विधायक मुलुंड मुंबई)

रविंदर सिंघ मोदी 
तखत सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब मंडल (बोर्ड) के सरकार नियुक्त प्रधान विधायक तारा सिंह को आखिर अपने प्रधानगी का त्यागपत्र मुख्यमंत्री को सौंपना पड़ा. या यह कहिए मुख्यमंत्री के मांगने पर त्यागपत्र देने के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं था. इस त्यागपत्र मामले की दो प्रमुख वजह सामने आ रही हैं. 
एक तो आगामी दिसम्बर माह में गुरुद्वारा मंडल के तीन सदस्य पदों के चुनाव होने का पूर्ण अनुमान है. चुनाव मतदाता सूचियों के निर्माण की प्रक्रिया पूर्ण हो चुकी है. चुनाव करवाने के लिए एक्ट १९५६ के तहत बोर्ड बर्खास्त करना अनिवार्य है. बोर्ड बर्खास्त करने के लिए प्रधान और वर्तमान सदस्यों को जिम्मेदारी से मुक्त करना भी आवश्यक हो जाता हैं. 
दूसरी वजह ये है कि विगत तीन साल सात माह और कुछ दिनों के कार्यकाल में तारासिंह खासे विवादित रहे हैं. उनके द्वारा गुरुद्वारा बोर्ड और विधानसभा के कार्यकाल में कोई अंतर नहीं किया गया. एक धार्मिक संस्था की गरिमा को राजनीतिकस्तर प्रदान किया. गुरुद्वारा बोर्ड के कार्यकाल में सर्वाधिक विरोध का सामना करनेवाले वे अग्रणी प्रधान है. उनके ख़िलाफ़ कई आरोप लगे. जिनमें अफरातफरी और धांधलियों के आरोप भी शामिल है. अपने निकटवर्तीय रिश्तेदारों को डायरेक्टर नियक्त कर ६० हजार रुपए वेतन (मानधन) देने का विषय हो, कर्मचारी नियुक्ति और प्रमोशन में अनियमितता का विषय हो अथवा टेंडर प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी हो. या फिर दखनी साधसंगत के विरोध का विषय हो. सबकुछ तारासिंह के विपरीत दिखाई देते हैं. तारासिंह द्वारा गुरुद्वारा बोर्ड में कांग्रेस  स्थानीय पदाधिकारियों और मेम्बरों की ताल में ताल मिलाने के कारण भी मुख्यमंत्री खासे नाराज होने की बात सामने आ रही हैं. स्थानीय भाजपाई इस बात को लेकर परेशान थे कि तारासिंह ने कोंग्रेसियों के हाथ में स्थानीय व्यवस्थाएं सौप दी है. यहाँ तक कि गुरुद्वारा बोर्ड के सदस्यों  भी बोर्ड के कामकाज से दूर कर दिया था. इस विषय में बहुत सी शिकायतें मुंबई पहुँच रही थीं. साथ ही एक अहम् विषय यह भी रहा कि, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस तारीख ३१ दिसम्बर २०१७ के दिन गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजुरसाहिब में संपन्न हुए एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए थे. उस समय मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अपने भाषण में गुरुद्वारा बोर्ड पर स्थित सरकारी कर्ज की ६२ करोड़ की राशि माफ़ करने का आश्वासन दिया था. विगत दस माह में इस आश्वासन की पूर्ति नहीं हो पायी. हाल ही में यह विषय दैनिक सकाल (सकाळ) समाचार पत्र में प्रकाशित भी हुआ था. इस विषय में भी तारासिंह को जिम्मेदार माना जा रहा है की उन्होंने इस विषय की तकनीकी पहलुओं को सरकार के सामने उजागर नहीं किया.  तारा सिंह का त्यागपत्र एक तरह से सही समय पर आया है. गुरुद्वारा के चुनाव निष्पक्ष हो इस बात के लिए बोर्ड का बर्खास्त होना जरुरी हो गया है. कुछ लोगों ने गुरुद्वारा बोर्ड के सम्भाव्य चुनाव के लिए गुरुद्वारा बोर्ड कार्यालय का जबरदस्त इस्तेमाल शुरू कर दिया था. तारासिंह के त्यागपत्र के बाद गुरुद्वारा प्रशासन अनुशासन से कार्य करने लगेगा ऐसे कयास लगाएं जा रहे हैं. 
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अपनी प्रतिक्रिया जरूर दीजिये. 

शनिवार, 13 अक्टूबर 2018

: ताजा समाचार : 
नरेंद्र मोदी है भगवान विष्णु का ग्यारहवां अवतार’
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महाराष्ट्र के एक भाजपा प्रवक्ता अवधूत वाघ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान विष्णु का ‘ग्यारहवां अवतार’ बताया है. उन्होंने एक ट्वीट किया, ‘सम्मानीय प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी भगवान विष्णु का ग्यारहवां अवतार हैं.’ बाद में एक मराठी चैनल के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, ‘देश का सौभाग्य है कि हमें मोदी में भगवान जैसा नेता मिला है.’ वाघ के इस बयान के बाद महाराष्ट्र में राजनीतिक गलियारों से अलग-अलग बयान जारी हो रहे हैं. श्री मोदी को देवताओं की कतार में खड़ा कर देने से देशभर में यह विषय सियासी चर्चा का मुद्दा बना रहा. 


वाघ के वक्तव्य पर प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता अतुल लोंधे ने कहा कि यह देवताओं का ‘अपमान’ है. उन्होंने कहा, ‘यह वाघ द्वारा खोई हुई राजनीतिक जमीन हासिल करने की कोशिश भी है. मुझे नहीं लगता कि इस टिप्पणी को ज्यादा महत्व देने की जरुरत है.’ लोंधे ने कहा कि यह टिप्पणी सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के अंदर ‘संस्कृति के निम्नस्तर’ की झलक है. विपक्ष में यह विषय छाया हुआ है. 

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने कहा, ‘वाघ वीजेटीआई से अभियांत्रिकी स्नातक हैं. अब इस बात की जांच करने की जरुरत है कि उनका सर्टिफिकेट असली है या नहीं.’

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बेअदबी घटनाओं को लेकर 

AAP विधायक फुल्का ने दिया इस्तीफा

पंजाब में बीते कुछ समय से चल रहे धार्मिक बेअदबी मामले में आम आदमी पार्टी (आप) के विधायक एचएस फुल्‍का ने शुक्रवार को पंजाब विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. फुल्का ने बेदअबी की घटनाओं में पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और सेवानिवृत्त डीजीपी सुमेध सिंह सैनी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने में राज्य सरकार की कथित 'नाकामी' पर नाराजगी जताते हुए इस्तीफा दिया है. फुल्का ने पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा, 'मैंने पंजाब विधानसभा के विधायक के पद से अपना इस्तीफा विधानसभाध्यक्ष को ई-मेल से भेज दिया है.' विधानसभा अधिकारियों ने बताया कि विधानसभा अध्यक्ष राणा केपी सिंह ने अभी इस्तीफे पर कोई फैसला नहीं किया है. पंजाब में बेअदबी की घटनाओं को लेकर राजनीतिक घमासान मचा हैं. 
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हिंदी और संस्कृत का प्रचार प्रसार :-
अमेरिका सरकार द्वारा अमरीका में हिन्दी और संस्कृत भाषाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विविध कदम उठाएं हैं. जिसके अंतर्गत वाशिंगटन स्थित भारतीय दूतावास ने जल्द ही दोनों भाषाओं के लिए नि:शुल्क साप्ताहिक कक्षाएं शुरू करने की घोषणा की है. दूतावास ने एक बयान में कहा है कि कक्षाएं एक घंटे की होंगी और दूतावास में भारतीय संस्कृति के शिक्षक डॉक्टर मॉक्स राज ये कक्षाएं लेंगे.

कक्षाएं दूतावास परिसर में चलाई जाएंगी. कक्षाएं शुरू करने की तारीख के बारे में जल्द ही घोषणा की जाएगी. बयान में बताया गया है कि हिन्दी की कक्षा हर मंगलवार को शाम छह बजे से सात बजे के बीच होगी और संस्कृत की कक्षा हर गुरुवार को इसी समय पर होगी.

वहीं भारतीय दूतावास ने अन्य जानकारी देते हुए ट्वीटर पर नोटिस की एक कॉपी भी शेयर की है. इसमें दी जानकारी के अनुसार इच्छुक लोग हिंदी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं की क्लास कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें केवल अपना नाम, टाइटल, पद और क्लास लिखकर डॉ.मॉक्स राज के ई-मेल पर भेजना होगा. 
अमरीका सरकार ने हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार के लिए एक बड़ी राशि का प्रावधान अपने राष्ट्रिय बजट में किया हैं. 
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रविंदर सिंह मोदी 
श्री हजूर साहिब, नांदेड़. 

बुधवार, 19 सितंबर 2018

"मनमर्जियां " के बहाने दिमागी विकृति 
सिखों की भावनाओं को आहत करने की साजिश 
रविंदर सिंह मोदी 

फ़िल्म उड़ान , गैंग ऑफ़ वसेपुर और क्वीन जैसी फिल्मों के लिए फ़िल्म फेयर अवार्ड जीतनेवाले फ़िल्म और टी.वी. सीरियलों के निर्माता निर्देशक अनुराग कश्यप कमाल के षडयंत्रकारी व्यक्ति प्रतीत हो रहे हैं. उत्तरप्रदेश के गोरखपुर की इस पैदाइश ने सिख धर्म के नीतिमूल्यों का खुलकर मजाक उड़ाने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी है. सिख धर्म में धूम्रपान वर्जित है यह सभी हिन्दू और अन्य जातियों के लोग भलीभाँति परिचित हैं. लेकिन अनुराग कश्यप ने अपनी नयी फिल्म "मनमर्जियाँ " में एक दस्तार (पगड़ी) पहने हुए व्यक्ति से स्मोकिंग (धूम्रपान) करवाने के कुछ सीन फिल्मों में जानबूझकर डाल दिए हैं. साथ ही सिख परिवार से संबंधित एक लड़की तापसी पन्नू को धूम्रपान करते दिखाना यानी धार्मिक मूल्यों का अवमूल्यन उसकी के सर मढ़ने वाली बात हो गई हैं. जरूर अनुराग कश्यप ने सिख धर्म को साजिश के तहत बदनाम करने और सिख अनुयायियों में फिल्मों का ग्लैमर जगाने का प्रयत्न किया है. ये बात निषेधार्य है.  
निषेध और निषेध :

दिल्ली, अमृतसर, नांदेड़ साथ साथ देश में जगह जगह से सिखों ने फिल्म का विरोध किया. बाद में फिल्म से कुछ दृश्य हटाने के लिए पहल की गई. लेकिन तब तक अनुराग कश्यप की फिल्म ने २० से २२ करोड़ की अच्छी कमाई कर ली थी. फ़िल्म बनाते समाज अनुराग कश्यप के दिमाग में सभी फार्मूलें एक साथ चल रहे थे. भारतीय लड़कियों को विदेशी लड़कियों के तुलना में खड़ा करने की पूर्ण सहूलियत इस फिल्म में परोसी गई है. लड़कियों की आज़ादी हर सीमा लाँघने के पूर्ण अधिकार ये फ़िल्म प्रदान करती है. सोशल मीडिया का कहा तक दुरूपयोग किया जाना चाहिए यह तो उस व्यक्ति का जातिगत स्वतंत्र हो गया है, जो इसका इस्तेमाल कर  रहा हैं. कश्यप ने उन्हें बढ़ावा देने में कहीं कोई कसार नहीं छोड़ी है. कहीं यह संस्कारी को बेशर्म बनाने की कश्यप की राष्ट्रीय साजिश तो नहीं?
आये दिन फिल्मों में सिखों के चरित्र को कमजोर दिखाने प्रयास हो रहे हैं. किसी फिल्म में सिख का चरित्र नामर्द का दिखाया जा रहा हैं, तो किसी फिल्म में उसे जोकर से कम नहीं दिखाया जा रहा हैं. बहुत बार तो सिखों को खलनायक दिखाया जा रहा हैं. बहुत बार नायिका का पत्र सिख का होता है जिसका अफेयर किसी अन्य धर्म के पात्र के साथ दिखाया जाता हैं. टी.वी. पर विज्ञापनों में सरदार के पीछे बैठी उसकी लड़की को सिर मुण्डे लड़के के छेड़ने जैसे दृश्य दिखाएं जा रहे हैं. ऐसा सिख धर्म के साथ ही क्यों किया जा रहा हैं. 
अनुराग कश्यप किस तरह के हिन्दू है?

उल्लेखनीय है मनमर्जियाँ की शूटिंग के दौरान अनुराग कश्यप, अभिषेक बच्चन, तापसी पन्नू और टीम के कुछ सदस्यों ने श्री दरबार साहिब, हरिमंदर साहिब, अमृतसर के दर्शन भी किये थे. उस समय क्या उन्हें सिख धर्म और सिख संस्कृति के दर्शन नहीं हुए थे? क्या उस समय सिख धर्म के नीतिमूल्यों की उन्हें जानकारी नहीं मिली थी. तापसी पन्नू तो एक सिख (पंजाबी) परिवार से है, क्या उसे भी सिख धर्म के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं हैं ? अनुराग कश्यप को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि, वे किस तरह के हिन्दू है ? गोरखपुर में पैदा होकर भी होने न खुद का धर्म ज्ञात है और न किसी और धर्म का सम्मान ही वे करते हैं. हिन्दू धर्म किसी अन्य धर्म का अनादर नहीं कर सकता. अनुराग को पहले हिन्दू धर्म सिखने की जरुरत है. सिखों के चरित्र इस तरह से पेश कर वे सिख धर्म का अप्रत्यक्ष रूप से मजाक उड़ा रहे हैं. 
संसार बोर्ड लापरहवाह क्यों ?
मीडिया में सिखों के साथ आये दिन साजिश जारी हैं. मीडिया और फिल्म जगत ने मनमर्जी चला रखीं हैं सिखों को अपमानित करने की. क्या सिख देश के सेन्सॉर बोर्ड को सिख धर्म के नीति मूल्यों के संबंध कोई जानकारी नहीं. सिखों के बलिदान और उनके साहस के सम्बन्ध में सेन्सॉर बोर्ड को कोई तथ्य ज्ञात नहीं. कितने गैर जिम्मेदाराना लोग सेन्सॉर बोर्ड में बैठे हैं ? क्या सेंसर बोर्ड भी सिखों की उपेक्षा को आसानी से ले रहा हैं ? सिखों की भावनाएं आहत करनेवाली एक वर्ष में दस से पंद्रह फिल्में अथवा टी.वी. सीरियल दिखाएं जा रहे हैं. सेंसर बोर्ड खामोश है. जो हो रहा हैं उसे होने दिया जा रहा हैं. सेंसर बोर्ड पर सबसे पहले धार्मिक भावनाओं का सम्मान नहीं करने या सिखों के बारे में जानबूझकर अप्पतिजनक तथ्यों के प्रचार के आरोप में कानून करवाई होने चाहिए. 

शनिवार, 15 सितंबर 2018

समाज रचनाकार नहीं होने का अफ़सोस !
आज का सिख, योद्धा नहीं बल्कि राजनीतिक गुलाम है 
रविंदर सिंघ मोदी 
मनुष्य को आदिम जीवन से सामाजिक जीवन तक पहुँचने में हजारों साल लग गए. सामाजिक जीवन तक पहुँचने के लिए मनुष्य को कई सभ्यताओं से गुजरना पड़ा, कई संस्कृतियों की अनुपालना करनी पड़ी, तरह-तरह के धर्म और जातियों के नियमों को अपनाना पड़ा. कदम-कदम पर संघर्ष झेलने पड़े. बहुत बार बलिदान देना पड़ा, कई बार आहुतियाँ देनी पड़ी तब जाकर एक सुरक्षित सामाजिक जीवन हमें प्राप्त हुआ. सामाजिक जीवन का भी एक दायरा होता है. उस दायरे में जाति, प्रथा, रस्मों - रिवाज और उत्तरदायित्व असीमित होते हैं. उत्तरदायित्व का वहन कर जो समाज रचना में योगदान देते हैं वे इतिहास में स्थान पाने के भी हक़दार होते हैं. आमतौर पर इतिहास दो तरह का लिखा जाता हैं. एक इतिहास नायक पद प्रदान करता है तो दूसरा खलनायक की उपाधि देता हैं. समाज हित के पक्षधर नायक की श्रेणी में अग्रक्रम में होते हैं. खलनायकों का इतिहास विध्वंसक, लुटेरा, बेईमान और अमानवीय मूल्यों को तक पर रखनेवाले के रूप में लिखा जाता है. यह जरुरी नहीं की नायक और खलनायक ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी. उसके कर्म और दूरदृष्टि उसका स्थान तय करती है. इसीलिए तो बादशाह सिकंदर भी इतिहास रचने के बाद भी खाली हाथ चला गया.
श्री गुरु नानक देवजी ने दौलत, संपत्ति का संग्रह नहीं किया लेकिन उन्होंने अच्छे और पवित्र कर्म करते हुए अपनी इहलोक यात्रा को भी स्वर्ग यात्रा में परिवर्तित कर दिया. आज गुरु नानकदेवजी के श्रद्धालु करोड़ों की संख्या में हैं, लेकिन सिकंदर के भक्त कितने हैं. सिकंदर को लोग केवल बल, छल का प्रतिक और एक बादशाह के रूप में ही जानते हैं. जबकि गुरु नानक देवजी, एक समाज रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं. सिकंदर ने कई देश जीतें और वो शासक बना. लेकिन किसी भी देश में उसका नाम समाज रचनाकार के रूप में नहीं लिया जाता. जबकि गुरु नानक देवजी ने फकीरों के वेश में विश्वभ्रमण कर मानवों के दिलों में स्थान पाया. वे बाबर जैसे बादशाह से भी नहीं डरे. जेल में जाकर चक्की चलाई। निडर होकर बादशाह बाबर को जाबर कहने का साहस किया. गुरु नानक देवजी की निडरता, निस्वार्थ जीवन ही आगे चलकर सिख धर्म की मूल नींव बनी. उनकी निडरता सिक्खी जीवन में सिद्धान्त के रूप में जीवित रही. आगे चलकर जब संत परंपरा के बावजूद भी शस्त्र उठाना पड़ा तब सिख गुरुओं ने उसी निडरता सिद्धांत को सर्वपरि माना.
सिख धर्म की रचना में गुरु नानक देव जी ने एक अभियंता की भूमिका निभाई हैं. गुरु जी ने केवल उपदेश नहीं दिया, केवल वाणी नहीं रची बल्कि समाज को रचने, बसने, फलने और फूलने की पर्याप्त व्यवस्था की. गुरूजी ने गांव और नगर बसाएँ. गुरूजी पानी की व्यवस्था के लिए कुएं खुदवाएं, सरोवरों का निर्माण करवाया. धर्म (समाज) को संचालित करने के लिए खेती में स्वयं परिश्रम किया. धार्मिक शोध, खोज और भक्तों के सेवा के लिए सिखों से दसवंध लेने की प्रथा शुरू की. उसी दसवंध से सिख धामों और गुरुद्वारों का निर्माण हुआ. दसवँध नाम की संकल्पना धार्मिक प्रयोजनों के लिए व्यवस्था का हिस्सा बनीं थी.
कालांतर बाद, दशम पिता श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज तक ये प्रथा अविरत चलती रहीं. उनके बाद भी तीन शताब्दियों से सिखों ने दसवंध की प्रथा जीवित रखीं हुई हैं. गुरु की गोलक में साध संगत की किर्त-कमाई का संग्रहण होता है. ये कमाई केवल धार्मिक कार्यों और सामाजिक उद्देशों की पूर्ति के लिए खर्च होनी चाहिए. लेकिन वर्तमान में दसवंध केवल कमाई का साधन बन गया है. गुरुघर, सेवा नहीं बल्कि सत्ता केंद्र बन गए हैं. गुरुघर को राजनीति के अड्डों के रूप में उपयोग में लाया जा रहा हैं. गुरुघर का नियंत्रण आज सेवक नहीं बल्कि राजनेता कर रहे हैं. जिनके लिए दसवंध केवल उनके ऐशोआराम का साधन हो गया.
पंजाब से लेकर हजूर साहिब नांदेड़ तक और नांदेड़ से लेकर इंग्लैंड, कॅनडा जैसे देशों में भी दशवंध का अधिकतर स्थानों पर दुरुपयोग ही हो रहा हैं. क्योंकि सिक्खी सिद्धांतों को अमल में नहीं लाया जा रहा हैं. हमारे दस गुरुओं ने सिक्खी सिद्धांतों को प्रचारित किया और उनको सिक्खी जीवन का हिस्सा बनाया. आज समाज बिखरा हुआ हैं. सिख गुटगुटों में बिखरें हुए हैं. केवल सर पर पगड़ी धारण कर सिख होने का दिखावा मात्र कर रहे हैं. समाज की भलाई के लिए कोई काम नहीं कर रहा हैं. सभी की सोच केवल ग्राहक (संगत) बढाकर गोलक भरने मात्र तक सिमित रह गई हैं.
आज गुरुघरों के सेवादार बनने की होड़ तो मची हैं लेकिन कोई भी सच्चा सिख बनने को तैयार नहीं है. आज भी सिख धर्म और समाज को एक सशक्त रचनाकार की जरुरत है. जहां - जहां समाज विघटित हैं वहां - वहां समाज रचनाकारों की जरुरत हैं. लेकिन कोई उद्यमी व्यक्ति समाज के लिए उद्योग करने को तैयार नहीं. राजनीति के लिए सिखों का उपयोग करने के लिए सभी तैयार हैं. लेकिन राजनीति से सिख समाज को बृहद बनाने के लिए कोई कुछ करना नहीं चाहता. सिख धर्म का अनुयाई अपने पूर्व समाज रचनाकारों का इतिहास, योगदान भुला चुके हैं. स्वार्थ के आगे सभी नग्न होकर खड़े हैं. सिक्खी सिद्धांतों का चोला कब शरीर से छूट गया किसी को अहसास तक नहीं. वर्तमान में सिख नाम का प्राणि न आपने गुरु घर की रक्षा के लिए सक्षम दिखाई दे रहा है और न उसमें कहीं सिद्धांतों के जीवित होने के लक्षण ही शेष दिखाई दे रहे हैं.
यदि यही हाल रहा तो वर्ष २०५० तक विश्व में सिखों की संख्या घटकर एक करोड़ से भी कम हो जाएगी. जब तक सिक्खी सिद्धांत जीवित रहेंगे तब तक सिक्खी स्वाभिमान खड़ा रहेगा. सिख धर्म (पंथ) को सिक्खी सिद्धांतों से ही चलाया जाना चाहिए ना कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्र सोच से चलाया जाना चाहिए. आज जिनकी सोच से गुरुघरों का सञ्चालन हो रहा हैं उनकी सोच केवल व्यक्तिगत, राजनीतिक और महत्वकांशी है. उस सोच से आज किसी की जेब गर्म रह सकती हैं. गुजरा के लिए भत्ता मिल सकता हैं लेकिन धर्म साबित नहीं रह सकता. जब तक समाज को निष्पक्ष और निस्वार्थ समाज रचनाकार नहीं मिल जाते तब तक सिक्खी खतरें में हैं. हर सिख खतरे में हैं. टक्के-टक्के में बिकनेवाले यदि आज समाज के संचालन का श्रेय लेना चाह रहे है तो यह केवल जुगाड़ की भाषा है. जुगाड़ और तोड़मरोड़ से राजनिति चल सकती है. समाज और गुरु घर नहीं. क्या हर्ज है कि आज सिखों को ज्ञानवान की जगह आदिम कहा जाये. क्या होगा यदि आज के परिवेश में सिखों को योद्धा नहीं बल्कि राजनीतिक गुलाम कहा जाएं? 
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(१५ सितंबर की तारीख अभियंता दिवस के रूप में मनाई जाती है. ऐसे समय रचनाकारों की भूमिका और दायित्व के सम्बन्ध में विचार ताजा हो जाना स्वाभाविक सी बात है.)

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

"अटल-विचार" बेबाक थे 
रविंदर सिंह मोदी 

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक साहित्यिक, एक कवी के रूप में मेरे लिए सदैव आदर्श रहें हैं. उनके विचार स्पष्ट और बेबाक थे क्योंकि उनमें नैतिकता अंत तक जीवित थी. राजनीति में 'साम-दाम, दंड-भेद' का प्रयोग उन्होंने दूर ही रखा था. केवल चरित्र, ईमानदारी, नैतिकता और चिंतन के सहारे उन्होंने अपना राजनीतिक व्यक्तित्व खड़ा किया था, जो वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी से बड़ा दिखाई दे रहा हैं. उनकी छवि विराट प्रतीत हो रही है. उनका जीवन एक सदी जैसा लग रहा है. देश के राजनीतिक इतिहास में अटल जी का अध्याय ईमानदारी के सुवर्ण पृष्ठों पर अंकित हो गए हैं. सबसे अच्छी बात तो यह थी कि, वे स्वयं की भी हर गतिविधि का सूक्षम अवलोकन करते थे. हर विषय, हर भूमिका के बाद आत्ममंथन करते थे. अटल जी के जीवन  की सबसे बड़ी उपलब्धि यही कही जा सकती है कि जो लोग राजनीति में रूचि नहीं रखते वें भी उन्हें पसंद करते थे.  अटल जी अपनी दुविधा भी बहुत बेबाक तरीके से प्रस्तुत करते थे. जैसे की उनकी निम्नलिखित पंक्तियाँ:

नकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं 
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं
गीत नहीं गाता हूं

पीठ मे छुरी सा चांद, राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं

गीत नहीं गाता हूं.  



दिल्ली और लखनऊ के राजनीतिक पटल पर काम-काज की जदोजहद के बावजूद उनके द्वारा साहित्य क्षेत्र के लिए समय निकलना बहुत बड़ी बात थी. उनके सामने सफ़ेद कागज़ का एखाद टुकड़ा भी बिखरा होता तो उसे उठाकर वे फाईल में अथवा अपनी जेब में रख लेते थे. बहुत बार उन टुकड़ों पर कुछ अशियार भी लिखकर जेब में रख लेते थे. हर सुबह पेन की स्याही जरूर जाँच लेते थे. 
एक पत्रकार के रूप में उन्होंने कार्य शुरू किया और अपनी लेखनी से उन्होंने विचारों की क्रांति पैदा की. जनसंघ और भाजपा के लिए उन्होंने समस्त भारत का भ्रमण किया. विविध संस्कृतियों का उन्होंने अध्यन किया. देश के किसी क्षेत्र पर उन्होंने कभी अप्रिय शब्द व्यक्त नहीं किये. यहाँ तक कि कश्मीर के विषय में उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा कि उसे पचाया ना जा सकें. पंजाब के आतंकवाद पर भी उन्होंने संभलकर ही बात रखी. निम्न कविता में कश्मीर और पंजाब के प्रति उनका दर्द स्पष्ट हो जाता है. 
 दूध में दरार पड़ गई
खून क्यों सफेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया.
बंट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.

खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है.
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई.

अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता.
बात बनाएं, बिगड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.  

अटल जी जाने के बाद भी उनके विचार सामान्य लोगों को भी प्रेरणा देते रहेंगे. आज राजनीति को हथियार बनाकर 'साम-दाम, दंड-भेद' की राजनीति को अंजाम देने वालों को तो अटल जी की प्रिय भाजपा में रहकर भाजपा का अपमान करने की कोई जरुरत ही नहीं. अटलजी के विचार भाजपा ही नहीं देश को एक रूप करने में बहुत कारगर हैं. वे विचार सदैव अटल अरु बेबाक रहेंगे इसमें कोई संदेह नहीं हैं. ऐसे महामानव को श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए अंतकरण: बोझिल महसूस कर रहा हैं. परमात्मा उन्हें दुबारा इसी भारत भूमि पर नवजीवन प्रदान करे।  
 

शुक्रवार, 10 अगस्त 2018

देश के २१ राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट जारी 
हेमकुंड जानेवाले रास्तों पर मौसम की बढ़ाएं बढ़ीं
 उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से लेकर पश्चिम तक बारिश और बाढ़ का कहर देखने को मिल रहा हैं. उत्तराखंड,  हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर में बारिश, भूस्खलन और बदल फटने की लगातार घटनाएं लगातार जारी हैं. जिससे हेमकुंट साहिब की यात्रा में कठिनाइयाँ प्रस्तुत होने का पूर्ण अनुमान हैं. आनेवाले तीन दिनों में भरी बारिश से मुख्य मार्ग भी बंद हो सकते हैं. ऐसी जानकारी प्राप्त हुई हैं. 
मौसम विभाग ने देश आनेवाले तीन दिनों के लिए 21 राज्यों में भारी बारिश होने का अनुमान जताकर का शुक्रवार (ता. १० ऑगस्ट, २०१८) को अलर्ट जारी किया। जिसके तहत उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, झारखंड, बिहार, पश्चिमी बंगाल, सिक्किम, मध्यप्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में अगले तीन दिन भारी बारिश हो सकती है।
हिमाचल में छह दिन  परेशानियों के : हिमाचल में खराब मौसम से काफी दिक्कत हो रही है। गुरुवार सुबह धूप खिली, लेकिन दोपहर बाद राजधानी शिमला समेत कई स्थानों पर बारिश हुई। मौसम विभाग ने 10 अगस्त से 15 अगस्त तक लगातार बारिश का अनुमान जताया है। 12 और 13 अगस्त को भारी बारिश की भी चेतावनी जारी की गई। गुरुवार को सबसे ज्यादा बारिश 33 मिलीमीटर भुंतर में हुई। बारिश के कारण प्रदेश में करीब 160 सड़कों से संपर्क टूट चुका है। एडिशनल डिप्टी कमिश्नर कृष्णलाल शर्मा ने दावा किया है कि 4-5 दिन में सड़कें खोल दी जाएंगी। 
कुल्लू में बादल फटा : बंजार क्षेत्र की तीर्थन घाटी में गुरुवार देर रात करीब डेढ़ बजे अचानक से बादल फटने से नागनी पंचायत के साईरोपा और गहिधार और दाड़ी गांव में भारी नुकसान हुआ। इसमें दो मकान, एक गौशाला बह गई। वहीं, तीन मकानों को भी नुकसान पहुंचने के समाचार हैं. 

केरल में भरी तबाही का मंजर : दक्षिण के केरल राज्य में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से 26 लोगों की मौत होने के समाचार हैं. आपदा प्रबंधन विभाग अधिकारियों के मुताबिक, सबसे ज्यादा इडुक्की जिले में 11 लोगों की जान गई। यहां अब तक 10 हजार लोगों को राहत शिविरों में भेजा जा चुका है। नदियों के उफान पर होने के कारण राज्य के 24 बांध खोल दिए गए। इडुक्की बांध का गेट 26 साल बाद खोला गया। 
रविंदर सिंह मोदी, हजूर साहिब, नांदेड़. 


बुधवार, 8 अगस्त 2018

खतरा अभी टला नहीं 
शीतकालीन अधिवेशन में फिर प्रस्तुत हो सकता है संशोधन विधेयक
प्रस्ताव तारा सिंह के गले की हड्डी बना ! 
 रविंदर सिंघ मोदी 
महाराष्ट्र सरकार द्वारा आगामी दिनों में विधानसभा का शीतकालीन अधिवेशन बुलाया जा रहा हैं. चिंता की बात यह हैं कि शीतकालीन अधिवेशन में नांदेड़ गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर अपचलनगर साहिब मंडल (बोर्ड) एक्ट १९५६ में मंत्रिमंडल बैठक में मंजूर और प्रस्तावित संशोधन प्रस्ताव दुबारा चर्चा और अनुमति के लिए प्रस्तुत हो सकता हैं. क्योंकि महाराष्ट्र सरकार द्वारा आगामी अधिवेशन में उन सभी प्रस्तावों पर चर्चा की जा रही हैं जिन पर किसी कारणवश नागपुर अधिवेशन में चर्चा अथवा निर्णय नहीं किया गया हैं. 
नांदेड़ के सिखों के लिए ये विषय चिंताजनक है कि संशोधन विषय के मूल सूचक और निवेदक भाजपा के विधायक तारा सिंह ने आज तिथि तक प्रस्तुत विधेयक वापिस नहीं लिया हैं. कानूनी तौर पर अभी तक प्रस्ताव वापिस लेने संबंध में विधायक तारा सिंह को चाहिए था कि लिखित रूप से कारण दर्शाकर राजस्व विभाग से प्रस्ताव वापिस ले ले. लेकिन तारा सिंह का टाइमपास शुरू है. ऐसे तैसे तीन सीटों की चुनाव अचार संहिता शुरू हो जाये और नांदेड़ सिख इस विषय में उलझकर रह जाये यह उसकी योजना है. 
संशोधन विषय पर मेरी बहुत से लोगों के साथ चर्चा हुई है और उसमे यह तथ्य सामने आया है कि मंत्री मंडल की मंजूरी के बाद प्रस्ताव पीछे लेने में तांत्रिक रूप से बहुत कठिनाई है. उस पर चर्चा के समय ही बहुमत से निर्णय लिया जाता हैं. तारा सिंह की हिम्मत नहीं हो रही है कि प्रस्ताव कैसे पीछे लिया जाए. 
आदरणीय पंजप्यारे साहिबान के पत्र और हजूरी साध संगत की मांग पर तारा सिंह ने ता. २८ जुलाई, २०१८ की बैठक में मात्र कलम ६ के तहत प्रस्तावित छह मेम्बरों की संख्या बढाने के एक विषय संशोधन रद्द करने का प्रस्ताव पास किया है. लेकिन केवल आठ सदस्यों द्वारा चर्चा कर निर्णय लिया गया उक्त प्रस्ताव का ठराव (मीटिंग निर्णय) सरकार के राजस्व विभाग को नहीं भेजा है. जिससे यह विषय अभी भी अधिवेशन के पटल पर है यह मानकर चलना होगा. 
वैसे भी संशोधन के संबंध में मीटिंग में चर्चा करने और उसपर निर्णय लेने के लिए बोर्ड का दो-तिहाई बहुमत आवश्यक हैं. आठ की संख्या से यह निर्णय सर्वमान्य नहीं माना जा सकता और न कानूनी रूप से उसे स्वीकार किया जा सकता है. संशोधन का विषय यानी नया कानून बनाने का विषय हैं उस पर बोर्ड का बहुमत दो-तिहाई यानी १७ सदस्यों में से १२ सदस्यों का समर्थन जरुरी हैं. साधारण निर्णय के लिए सात के बहुमत का अंक कोरम के लिए योग्य माना जायेगा. 
यह संशोधन प्रस्ताव अब तारा सिंह के गले की हड्डी बन गया है. तारा सिंह परेशान हैं और उसे अब कम से कम १२ सदस्यों की दरकार हैं. और चार सदस्यों को अपनी ओर करने के लिए तारा सिंह की नरम नीति शुरू हो गई है. अब उन मेम्बरों को मालिक - मालिक कहना शुरू कर दिया हैं जिनको पदों से हटाने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी. कुछ सीनियर मेम्बरों से भी तारा सिंह का संपर्क जारी हैं ऐसे समाचार रोज प्राप्त हो रहे हैं. 
तारा सिंह द्वारा प्रयास किया जा रहा हैं की किसी तरह १७ सदस्यों की एक बैठक बुलाकर मीटींग का पूर्ण बहुमत सरकार को दिखाए. बाद में मीटिंग के मिन्ट्स तो लिखने के सभी अधिकार तारा सिंह के पास है ही वह सरकार को मीटिंग का ठराव (निर्णय) अपने अनुकूल बनाकर भेज देगा. कलम ११ का विषय भी वह काबिलियत से छुपा लेगा.  

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

श्री गुरु नानक देव जी को भूल गए इतिहासकार !
पंजाब की बारहवीं की इतिहास पुस्तक में गुरु नानक का जिक्र तक नहीं 

रविंदर सिंह मोदी 
बात पंजाब और सिक्खी की हो और पंथ के सृजनहार, पहले गुरु, श्री गुरु नानक देवजी का जिक्र ना हो, तो सोचिए कि कैसा प्रतीत होता है. गुरूजी, सिक्खी और सिखों का यह तो घोर अपमान हुआ ना ? यह सिख इतिहास के साथ षड़यंत्र हुआ ना ? बस यही कुछ घटित हुआ है पंजाब के शिक्षा क्षेत्र में. 
हाल ही में पंजाब के शिक्षा विभाग द्वारा कक्षा बारहवीं के इतिहास पाठ्यक्रम की एक पुस्तक वितरित की गई जिसमें १५ वीं और १६ वीं शताब्दी के पंजाब का चित्रण लगभग १२ पृष्ठों के लेख के द्वारा किया गया. आपको जानकर हैरानी होगी कि उसमें कहीं भी श्री गुरु नानक देवजी के नाम या कार्यों का उल्लेख तक नहीं किया गया. इस विषय का समाचार जैसे ही बाहर आया वैसे ही सिखों में रोष और चिंता व्याप्त हुई हैं. यह सब ऐसे समय में घटित  है जब सिख जगत श्री गुरु नानक देव जी के ५५० वें प्रकाश पूरब (जनम दिहाड़ा) मनाने की तैयारी में जुटा हुआ हैं. 
बताया जा रहा है कि, इतिहास के इस पाठ्यक्रम में पंजाब की राजसी दशा और इतिहास पर भरपूर जानकारी परोसी गई. सिकंदर लोधी के पंजाब आगमन की कहानी,  बाबर और हुमायूँ के इतिहास की जानकारी दी गईं हैं. जबकि उनके खिलाफ प्रतिकार की पहल करनेवाले गुरु नानक देव जी का जिक्र टाल दिया गया. सिकंदर लोधी से गुरु नानक देवजी की वैचारिक लड़ाई सिख जगत में प्रसिद्ध है. कई इतिहासकारों ने लिखा हैं. गुरु नानक देव जी बाबर की कैद में चक्की चलाते थे. बाबर को जाबर (अत्याचारी) कहकर उन्होंने प्रतिकार  किया था. लेकिन यह सारे ऐतहासिक प्रसंगों को पुस्तक में शामिल नहीं किया गया. यह सबकुछ जानबूझ कर और सोची-समझीं  विचारधारा के तहत घटित हो रहा हैं कहा जाएं तो गलत नहीं होगा. 
महाराष्ट्र के मराठा समाज की सराहना की जानी चाहिए कि उसने छत्रपति शिवाजी महाराज के इतिहास को जीवंत जीवंत ही नहीं रखा बल्कि इतिहास में एक लम्बा संशोधन भी करवाया. राजस्थान में भी वीर महाराणा प्रताप सिंह जी के इतिहास पर व्यापक शोध का कार्य क्षत्रिय राजपूत समाज ने जारी रखा. पंजाब में कुछ लापरवाही हुईं. 
वहां, अधिकतर इतिहास पंजाबी भाषा में और गुरुमुखी लिपि में होने के कारण इतिहास और जानकारी सिमित रह गईं. गुरुमुखी में रचित और छपे बहुत से सन्दर्भ ग्रन्थ, पुस्तकें और दस्तावेज नष्ट हो गए. आपको ज्ञात कराऊँ कि श्री गुरु गोबिंद सिंघजी महाराज जिस समय अपने परिवार और साथियों के साथ सिरसा नदी पार कर रहे थे तब बाढ़ के कारण दो टन वजन का बहुमूल्य सिख साहित्य जिसमें इतिहास खोजी दस्तावेज, पांडुलिपियां आदि पानी में बहकर नष्ट हो गए थे. गुरु जी ने वह साहित्य खोज करवाने और लिखवाने में बीस से पच्चीस वर्षों की मेहनत की थी. 
अब तक हमारे पास जो इतिहास और दस्तावेज सुरक्षित हैं उसके आधार पर सिख पंथ मार्गक्रमण कर रहा हैं. लेकिन युवा पीढ़ी की मानसिकता उस तथ्य को जल्दी स्वीकार करती हैं जो पाठ्यक्रम में लिखित सामग्री हो. ठीक है सिख धर्म में पैदा हुए बच्चों को सिख धर्म हम समझा सकते हैं लेकिन गैर सिख विद्यार्थियों को सिख धर्म समझने और पढ़ने की जरुरत ही महसूस नहीं होती है, वें क्यों जानना चाहेंगे सिख धर्म के सन्दर्भ में. साढ़े पांच सौ वर्षों में सिख धर्म जितना परिचित  चाहिए था, उतना नहीं हुआ. उसके कारणों पर चिंतन जरुरी हैं. लेकिन इस चिंतन के लिए किसी भी सिख के पास समय नहीं है. तब कहां सुरक्षित रह पायेगा आपका इतिहास और आप ?

सोमवार, 6 अगस्त 2018

तारा सिंह का वो गुमराह पत्र और कांग्रेस कनेक्शन !
रविंदर सिंह मोदी 
(फाइल फोटो )
कहावत है कि, बन्दर कितना भी बूढ़ा हो जाए कुलाटी मारना नहीं छोड़ता. शातिर व्यक्ति आँखों की रौशनी चली जाने के बाद भी षड़यंत्र रचने में कोई कसर नहीं छोड़ता उसी तरह राजनीतिक व्यक्ति मृत्युशैय्या पर लेटकर भी अंतिम समय तक राजनीति को अंजाम देने में नहीं चूकता. उसी तरह विधायक तारा सिंह गुमराह करने में कोई कसर नहीं रखता. 
उसकी आँख मटकी तो समझ लेना कि कोई नया तिकड़म लड़ाने की वो कोशिश कर रहा है. अब देखिये ना, जैसे ही उस पर गुरुद्वारा बोर्ड कानून में किये गए जबरन संशोधन रद्द करवाने के विषय में संगत ने चुप्पी साधे बैठने का आरोप लगाया तो नांदेड़ के सोशल मीडिया पर उसका एक पत्र वायरल किया गया. मजे की बात तो यह है कि, भाजपा के आमदार तारा सिंह द्वारा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भेजे गए गुरुद्वारा बोर्ड मीटिंग (ता. २८ जुलाई, २०१८) संपन्न होने की जानकारी देने वाला पत्र व्हाट्सएप्प पर नांदेड़ के कुछ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने वायरल किया. उन्होंने तारा सिंह को बधाई भी दी. तारा सिंह को साथ देनेवाले और बधाई देनेवाले सभी कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री श्री अशोक राव चव्हाण के निकटवर्तीय माने जाते हैं. साथ ही कांग्रेस विधायक डी.पी. सावंत के भी वे दहिने - बाये बताये जाते हैं. 
तारा सिंह द्वारा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भेजे गए पत्र की कॉपी सबसे पहले कांग्रेसियों के पास पहुंची कैसे ? क्या तारा सिंह के अंदरूनी रूप से कांग्रेस से तार जुड़े हुए हैं ? क्या साल २०१९ में राज्य में सत्ता परिवर्तन हो जाए तो तारा सिंह को कांग्रेस पार्टी दुबारा गुरुद्वारा का सीधा अध्यक्ष नियुक्त करनेवाली हैं ? क्या तारा सिंह को नांदेड़ के भाजपाइयों से एलर्जी हैं? या यहाँ के भाजपा कार्यकर्ता तारा सिंह की अवैध कार्यों में रुकावट बनें हुए हैं ? खुलासा होना चाहिए. आज कल गुरुद्वारा के टेंडर विषय पर बहुत चर्चा हो रही हैं. 
उधर शिवसेना के एक बड़े नेता (नाम सभी को पता है ) ने तो पिछले दिनों नागपुर अधिवेशन के समय नांदेड़ के एक शिवसेना पदाधिकारी के साथ बातचीत में यह तक संभावना व्यक्त कर दी कि तारा सिंह शिवसेना के संपर्क में है! 
इस विचित्र नेता तारा सिंह ने मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में सबसे पहले यह सन्देश देने का प्रयास किया हैं कि ''नांदेड़ के सभी सदस्य" बैठक में अनुपस्थित थे. जैसे कि उसने गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर अपचल नगर साहिब मंडल कानून (एक्ट - १९५६) की धारा ६, ७, और १५ में संशोधन करने के प्रस्ताव में लिखा है कि नांदेड़ के मेंबर मेरा कोरम पूरा नहीं होने दे रहे हैं इसलिए मुझे छह मेंबर बढाकर दिए जाएं। अपनी महत्वाकांक्षा भरी बात उसने पत्र में सबसे पहले लिख दी कि, "इस बार भी नांदेड़ के सदस्य मेरी बुलाई मीटिंग में नहीं पहुंचे" इसलिए मेरा संशोधन की मांग का प्रस्ताव एकदम सही है. लेकिन करें क्या ? हमारे पंजप्यारे साहिबान द्वारा और हजूर साहिब संगत द्वारा विरोध किये जाने के बाद सिर्फ १७ सदस्यों का बोर्ड चल जायेगा ऐसी हामी उसे भरनी पड़ी. तारा सिंह और ता. २८ जुलाई, २०१८ की मीटिंग में मेंबर साहिबान ने साध संगत की वो मांग क्यों ठुकरा दी जिसमें सरकार द्वारा "अध्यक्ष की सीधी नियुक्ति" करनेवाली धारा (कलम) ११ का वर्ष २०१५ में किया गया संशोधन रद्द करने की स्पष्ट मांग की गई थी. 
आदरणीय पंजप्यारे साहिबान का पत्र भी ठीक से पढ़ लेना चाहिए था. मीटिंग में सभी पढ़े-लिखे और दिग्गज मेंबर साहिबान थे. पत्र में क्या मांग है उस विषय में क्या पत्र व्यवहार किया गया, भाषा की चालखी आदि को लेकर तारा सिंह साध संगत से खुली चर्चा करे ऐसी हमारी मांग हैं. तारा सिंह की यह चालाखी विधानसभा में चल जाएगी लेकिन संगत की सभा में नहीं चलेगी ये ध्यान रखना. 
चलो आज तारा सिंह की महत्वाकांक्षा में बहुत से लोगों की भी ख्वाइशें जुडी हुई हैं इसलिए उसके खिलाफ आंदोलन करनेवालों को टारगेट किया जा रहा हैं. आंदोलन में सक्रीय बहुत से लोगों को विधायक तारा सिंह से सीधा खतरा हैं. वो साम दाम दंड भेद के अमल में माहिर है. उसके कुछ कट्टर समर्थक जिन पर तारा सिंह की रहमोकरम ज्यादा हैं वो आंदोलन शामिल कुछ नेताओं को बुरी निय्यत से देख रहे हैं. 
आनेवाले दिनों में गुरुद्वारा मंडल के तीन सीटों के चुनाव भी होने वाले हैं. नांदेड़ का वातावरण ये तारा सिंह और उसके समर्थक बिगाड़ सकते हैं, इसलिए तारा सिंह को बोर्ड के अध्यक्ष पद से तुरंत बर्खास्त करना ही सबसे योग्य रहेगा. उसके द्वारा गुरुद्वारा बोर्ड की सत्ता का दूरोपयोग करने की पूर्ण सम्भावना है. तारा सिंह के नजदीक के लोग तो बात बात पर तलवार से हमला कर देते हैं. हजूर साहिब के दो लोग तलवार हमले में बुरी तरह से घायल हुए हैं. ऐसी बिगड़ी परिस्थिति में तारा सिंह को तुरंत हटाना बेहद जरुरी हो गया है. नांदेड़  भारतीय जनता पार्टी के सभी स्थानीय नेता और पदाधिकारी भी इन घटनाओं से चिंतित हैं. उन्हें यहाँ की असलियत आलाकमान को तुरंत बतानी चाहिए. साथ ही इस भोले-भाले, नटखट और उत्पाती नेता की कांग्रेस के जाल में मारी गई ने कुलाटी का भी जिक्र विस्तार से करना चाहिए. तारा सिंह के इस कनेक्शन के कारण सिख मतदाता सम्भ्रमित हैं. इस बात का चिंतन भाजपा  करेगी ऐसी उम्मीद है.  

शनिवार, 4 अगस्त 2018

तारासिंह की प्रधानगी तखत साहब के लिए अभिशाप जैसी !
रविंदर सिंह मोदी 
(फ़ाइल फोटो )
एक व्यक्ति सिर पर दस्तार बांधता है. अपने नाम में अमृतपान में मिली उपाधि "सिंह" अथवा "सिंघ" का उपयोग करता हैं. गुरुद्वारा में जाकर मत्था भी टेकता है. एक अमृतधारी सिख की तरह बाहर समाज में आचरण भी करता है. लेकिन उसके दिल में ना सिख गुरु और ना सिक्खी तत्वों के प्रति आस्था रहती है और ना ही वह गुरु घर को नुकसान पहुँचाने में कोई कसर छोड़ता है. ऐसे व्यक्ति को क्या किसी तखत जैसे गरिमामय स्थान का प्रधान होना चाहिए ? 
जो व्यक्ति गुरु घर को बचाने के लिए (सरकार द्वारा किये गए संशोधन के प्रस्ताव का सूत्रधार बनता है और संगत की मांग के बावजूद भी सरकार के मुखिया मुख्यमंत्री के पास संशोधन रद्द करवाने के विषय में) आवाज नहीं उठता हो क्या ऐसे डरपोक और षडयंत्रकारी व्यक्ति को तखत जैसे स्थान पर प्रधान होना चाहिए ? 
जिस व्यक्ति ने जमीनों के वितरण में पक्षपात किया हो, जिसने अपने रिश्तेदारों को वेतन देने के लिए गुरु घर की गोलक खर्च की, जिसने योग्यता प्राप्त और हक़दार कर्मचारियों ना प्रमोशन दिया न ग्रेड दिया हो, जिसने ३५० बेरोजगार युवकों को डेलीवेजस पर नियुक्ति नहीं देकर फिक्स पे अथवा एग्रीमेंट टाइप के अप्पॉइंमेंट देकर उनके भविष्य से खिलवाड़ शुरू की हैं क्या उसे प्रधान बना रहना चाहिए ?
जिस व्यक्ति ने नांदेड़ के स्थानीय गुरुद्वारा बोर्ड मेम्बरों को हमेशा गुटों में बांटने की नीति अपनाकर अपना सिक्का चलाया. तखत की मर्यादा के ख़िलाफ कुछ मेम्बरों को वर्ष २०१५ में तखत साहब पर मत्था टीकाकार गुरु महाराज की और श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी की शपथ "कसम" खाने के लिए मजबूर किया. क्या उसे प्रधान पद पर रहने का अधिकार है?
तारा सिंह जैसे व्यक्ति को तखत सचखंड श्री हजूर साहिब गुरुद्वारा नांदेड़  का प्रधान बनाकर भारतीय जनता पार्टी ने पता नहीं क्या साध लिया. लेकिन हजूर साहिब के लोगों ने इस थापे गए व्यक्ति की प्रधानगी से सिर्फ अभिशाप और अभिशाप ही पाया है ऐसा में दावे के साथ कह सकता हूँ. देवेंद्र फडणवीस जैसे युवा नेतृत्व से गहरी चूक हो गई या मान लो कि लापरवाही में या अतिविश्वास में एक "पाप" हो गया. श्री गुरु गोबिंद सिंघजी महाराज के इस पावन स्थल पर कभी हैदराबाद रियासत के राजा, औरंगजेब का लड़का बहादुरशाह या निज़ाम ने भी कोई वास्तु लेकर जाने की नियत नहीं रखीं वहां ये तारा सिंह गुरुघर का सरकारीकरण करने पर तुला हुआ है. 
देश में बहुत से धार्मिक स्थलों का सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया गया हैं. महाराष्ट्र सरकार के निशाने पर नांदेड़ का गुरुद्वारा है. जब किसी ने भी जब मांग नहीं की तो संशोधन किसलिए ? तीन सालों  बार संशोधन? कल कोई और सिरफिरा सरकार से सीधा नियुक्त होकर आएगा और किसी ऐतहासिक गुरुद्वारा को किसी संत कोई देने या बोली लगाकर आवंटित करने की कोशिश करेगा तो क्या तब भी सरकार उसका साथ देगी और लोग खामोश तमाशा देखेंगे ? जो इस परिस्थिति में पूरी तरह से तारासिंह की नीतियों को शरणागत हो गए है वे लोग क्या कदम उठाएंगे ? कुछ नवजवानों को एक्ट संशोधन का ठीक से समझ नहीं आ रहा हैं, वे उतना ही समझ रहे हैं जितना उनके करीबी नेतागण उन्हें समझा रहे हैं. जिन्हें एक्ट संशोधन के संघर्ष में नहीं पड़ना है उन्हें गुरुद्वारा बोर्ड के चुनावों में रस क्यों हैं ? क्या सरकारी नियुक्त प्रधान की गुलामी करने के लिए ? या महज अपने ही समाज के कुछ व्यक्ति से बदला निकालने के लिए?  किसलिए यह सब किया जा रहा हैं ?  
आज एक्ट संशोधन को लेकर सिख समाज के लोग बँट गए हैं. एक दूसरे को दुश्मन की निगाह से देख रहे हैं. एक दूसरे की आलोचना कर रहे हैं. यहाँ तारा सिंह के राज में मारपीट, हमले और पुलिस करवाई जैसी बातों से समाज में विचलन हो रहा है. यह सब क्या किसी अभिशाप कम है ? सरकार का भेजा राजनीतिक नेता यहाँ सत्ता भोग रहा है और यहाँ के वतनदार निवासी अभिशाप की छाया में रहें ? देवेंद्र फडणवीस जी नांदेड़ की वतनदार सिखों ऐसी मानसिकता के आपका निर्णय कारणीभूत ही नहीं बल्कि एक अभिशाप प्रतीत हो रहा है. कुछ कीजिये ! या फिर जलियावालां की तर्ज पर नांदेड़ के वतनदार सिखों पर सीधा ऑपरेशन कर दीजिये. आप और तारा सिंह शासक है. सरकार है, आपको सबकुछ माफ़ हो जायेगा.   

बुधवार, 1 अगस्त 2018

हजूर साहिब के सभी आठ बोर्ड सदस्यों का धन्यवाद ! 
रविंदर सिंह मोदी 
- हजूर साहिब नांदेड़ - 
गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजूर अपचलनगर साहिब मंडल (बोर्ड ) का सरकार नियुक्त प्रधान और भाजपा का विधायक तारा सिंह अजीब हेकड़वृत्ती का मनुष्य है. उसने ठान ली है कि वो साधसंगत और जनमानस की मांग बिलकुल नहीं सुनेगा. उसने हजूर साहिब के पांच बोर्ड सदस्यों की हजूर साहिब नान्देड़ में रेक्वीजिशन की बैठक लेने की मांग पूर्णतः नजरअंदाज करते हुए मुंबई में ही ता. २८ जुलाई, २०१८ को आठ सदस्यों की मौजूदगी में बैठक संपन्न कर ली. 
इस हेकड़बाज प्रधान ने पंजप्यारे साहिबान द्वारा भेजे गए पत्र का उल्लेख कर बैठक में पहला प्रस्ताव मंजूर करवाया कि गुरुद्वारा कानून १९५६ में अंतर्भूत कलम ६ का संशोधन रद्द करवाने के लिए मुख्यमंत्री से चर्चा करूँगा. इसने प्रस्ताव में कहा हैं कि भाजपा का विधायक हूँ इसलिए सरकार के निर्णय के खिलाफ बात नहीं कर सकता. इस समय तारा सिंह ने चालाखी बरतते हुए कलम ११ के विषय को छुहा तक नहीं. यानी वो हमेशा सरकारी नियुक्त अध्यक्ष बना रहना चाहता है. या फिर उसकी यही इच्छा है कि गुरुद्वारा बोर्ड पर हमेशा सरकार अपना अध्यक्ष नियुक्त करती रहे. 
इसी मनुष्य ने वर्ष २०१५ में कलम ११ में संशोधन करवाकर गुरुद्वारा बोर्ड का अध्यक्ष पद सरकारी करने की अहम् भूमिका निभाई थी. तीन साल गुरुद्वारा बोर्ड को इसने सत्त्ता के केंद्र जैसा चलाया. अपनी मर्जी से इसने बोर्ड पर सत्ता हाँकते हुए मुंबई के मेम्बरों के इच्छाएं पूरी की. नांदेड़ के आठ मेम्बरों में हमेशा वो दरार डालकर दो गुटों की राजनीति को बढ़ावा देकर कई तरह की धांधलियों पर पर्दा डाला और धांधलियों को छुपा बढ़ावा भी दिया. तीन सालों में इसने कभी कलम ११ के विषय में बोर्ड मीटिंग में बात नहीं की. जबकि पहली मीटिंग के फेल होने पर उसने प्रेस और मीडिया के सामने कहा था कि वह कलम ११ का संशोधन वापस करवाएगा. बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होते होते इसने स्वयं सरकार को पत्र देकर मांग की कि मेरा मुंबई में कोरम पूर्ण हो इसलिए छह मेंबर बढाकर दे. 
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने आव देखा न ताव बस सीधा मंत्री मंडल मीटिंग में छह मेंबर बढाकर यानी सरकार नियुक्त मेंबर बढ़ाने की जल्दबाजी छह मेंबर बढ़ाने का यह विषय और भी तीन लोगों को पता था समय आने पर उनके नाम उजागर किये जायेगे. संशोधन हो गया एक माह बीत गया. इस तारा सिंह ने संशोधन के विषय में कोई पहल नहीं की. एक महीने में नागपुर अधिवेशन में उसकी उपस्थिति थी. अधिवेशन समाप्त होने के बाद भी वह तीन बार मंत्रालय गया लेकिन उसने कलम ११ या कलम ६, ७ या १५ के संशोधन रोकने के विषय में कोई  पहल नहीं की. मुंबई रहकर भी उसने इस विषय पर मुख्यमंत्री से चर्चा के लिए समय नहीं मांगा. उसके दिल में ही नहीं हैं कि संशोधन हो. 
नई दुकानदारी मिली नहीं कि उसे वह कैसे बंद करवाएगा. जैसे कलम ११  के लिए तीन सालों में कुछ नहीं किया वैसे ही हमें चुनावों के चक्करों में फांसकर कलम ६, ७, और १५ के विषय में टाइमपास करवाएगा. जो मेंबर तारा सिंह की मीटिंग में गए थे उनको भी धन्यवाद की उन्होंने बेबाक कदम उठाया. हम साध संगत को नहीं गिनेंगे. जो हुआ अच्छा हुआ, वैसे भी सांठगांठ करने और भीख मांगने का कोई अवसर नहीं होता. कभी कभी भिखारी जनाजे में चलनेवालों से भी भीख मांग लेते हैं. वैसे ही हजूरी सभ्यता का जनाजा निकालने पर उतारू तारा सिंह से पद मांग लिए गए होंगे तो उसका क्या अफ़सोस किया जाये.  इसके अलावा भी कुछ माँगा होगा तो मैं, उसकी तपशील में नहीं जाना चाहूँगा. क्योंकि ..... 
उधर एसजीपीसी के मेम्बरों का तो कहना है कि पानी में रहकर हम मगरमछ से कैसे बैर करें. हमें हजूर साहिब के लोगों का साथ देकर हासिल क्या होगा? मुंबई में तारा सिंह ही हमारे मदतगार हैं. हजूर साहिब के लोग बहुत लड़ते हैं. हम साल में एक या दो बार आते हैं, दर्शन कर चले जाएंगे. भाड़ में जाये हजूरी!
खैर, हम आते हैं और एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर. वह हैं हमारे हजूर साहिब के उन आठ मेंबर साहिबान के उस कदम का जो उन्होंने उठाया हैं. हजूर साहिब नांदेड़ के निवासी मेंबर भागिन्दर सिंघ घड़ीसाज, स. अमरीकसिंह वासरीकर, स. सरजीत सिंघ गिल,  स. शेरसिंघ फौजी, सुरिंदर सिंघ मेंबर, रणजीत सिंघ कामठेकर, राजिंदर सिंघ पुजारी और गुरमीत सिंघ महाजन ने हजूरी साध संगत की मांग पर मुंबई में होने वाली बैठक में नहीं जाने का सामूहिक फैसला किया. उस फैसले को निभाया भी. हुजूर साहिब के सिखों की भावनाओं को उन्होंने अपने व्यक्तिगत बातों से सर्वोपरि रखा. सभी मेंबर साहिबान ने खुद्दारी भरा निर्णय लिया. हमें राहत दी. भले तारासिंह ने तुरंत दुश्मनी निभाते हुए, उनके पद निकाल लिए. आगे देख लेने की भी धमकियां दी गई ऐसी चर्चा हैं. लेकिन हम हजूर साहिब के सभी मेंबर साहिबान के साथ हैं. 
हजूरी नवजवानों का भी शुक्रिया कि उन्होंने अपना जमीर श्री गुरु गोबिंदसिंघजी महाराज को समर्पित कर आनेवाली पीढ़ी की भलाई की दृष्टि से गुरुद्वारा कानून के संशोधन के विरोध में आंदोलन किया. कुछ लोग चाहकर भी आंदोलन में नहीं आ पाए क्योंकि उनके परिवार से कोई न कोई एक सदस्य गुरुद्वारा बोर्ड, खालसा हाईस्कूल, श्री हजूर साहिब आई.टी.आई. या स्कूलों में नौकरियों पर हैं. ये तारा सिंह उनके साथ भी दुश्मनी निकाल सकता है ये डर सभी के मन में था. हमने भी उन्हें कहा ठीक है आप अरदास कर हमारे साथ जुड़े रहें और वो जुड़े हुए ही हैं. आज जो लोग आंदोलन का हिस्सा नहीं हैं, उनसे कोई शिकायत नहीं हैं. हो सकता है कल आप हमारे साथ होंगे. आखिर गुरु के लिए भी तो कुछ करना है. यदि अबकी बार तारा सिंह तो अगली बार हमारा सच्चे पातशाह. 


सोमवार, 30 जुलाई 2018

मुख्यमंत्री जी, 
भाजपा की दो विधानसभा सीटों को हार का खतरा !
(नांदेड़ - फ़ाइल फोटो )
रविंदर सिंह मोदी 
नांदेड़ - गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजूर साहिब मंडल (बोर्ड) के प्रधान और विधायक तारा सिंह की धार्मिक संस्था में कारगुजारियों से स्थानिक सिख इतने रोष में हैं कि उसका सीधा असर आगामी विधानसभा चुनावों पर होने की पूर्ण सम्भावना हैं. वर्ष २०१९ के चुनावों में नांदेड़ के सिख मतदाता दो सीटों पर सीधा प्रभाव डाल सकते हैं. विगत माह के सामाजिक अवलोकन से ये ज्ञात हुआ हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने नांदेड़ के सिखों के दिलों से स्थान खो दिया हैं. केवल भाजपा के कुछ निष्ठावान और आशावान सिख कार्यकर्ताओं में ही भाजपा की रट जारी है. जबकि सिखों का रोष आगामी चुनावों के समीकरण बदल सकता है. 
आपको ज्ञात होगा कि वर्ष २०१४ के विधान सभा चुनावों में सिख समाज के सबसे ज्यादा वोट भाजपा के नांदेड़ दक्षिण उमीदवार दिलीप कंदकुर्ते को मिले थे. नांदेड़ दक्षिण चुनाव क्षेत्र में सिख समाज के लगभग तरह हजार मतदाता हैं. यदि सिख समाज एक गट्ठा मतदान करता हैं तो किसी भी बड़ी पार्टी के नतीजों पर आसानी से प्रभाव डाला जा सकता है. 
साथ ही नांदेड़ उत्तर विधान सभा क्षेत्र में सिखों के साढ़े चार हजार मतदाता हैं. पिछले चुनावों में उत्तर सीट का नतीजा बहुत कम अंतर से पाया गया था और भाजपा को शिकस्त खानी पड़ी थी. नांदेड़ दक्षिण और उत्तर विधान सभा सीटों के नतीजों पर सिख मतदाताओं की नाराजी गहरा असर कर सकती है. जिसके लिए भाजपा के विधायक तारा सिंह स्वयं कारणीभूत माने जा रहे हैं. 
वर्ष २०१४ में भाजपा सरकार सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तारा सिंह की मांग पर नांदेड़ के गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजूर साहिब मंडल (बोर्ड) कानून १९५६ में संशोधन कर कानून को तारा सिंह के अनुकूल बनाकर नांदेड़ के सिखों पर अन्याय किया. तारा सिंह को बोर्ड का शासन नियुक्त अध्यक्ष बनाकर भाजपा सरकार ने नांदेड़ के सिखों के अध्यक्ष चुनने का स्वतंत्रय छिन लिया. तीन से चार सालों से तारा सिंह के विरोध यहाँ आक्रोश का वातावरण चल रहा है लेकिन देवेंद्र फडणवीस सरकार ने नांदेड़  कोई सुध नहीं ली. 
तारा सिंह ने बोर्ड का स्टेटस घटाकर उसे मंडल में परिवर्तित कर दिया. अपने रिश्तेदारों को मोटी तनखाह देकर यहाँ ऐश करवाने के लिए नौकरी दी. कांग्रेस के लोगों को हमेशा साथ रखकर इसने भाजपा का नारा "सबका साथ, सबका विकास" का अर्थ ही बदल दिया. तारा सिंह ने नया नारा यहाँ शुरू किया हुआ है, "कांग्रेस का साथ, तारासिंह का विकास". इतनी शिकायतों  बावजूद, इतने उलटे सीधे कारनामों के बावजूद भी भाजपा इस तारा सिंह का यहाँ पोषण कर रही है. और तारा सिंह नांदेड़ के सिखों का शोषण कर रहा है. 
नांदेड़ के सिखों को इस तारा सिंह ने सरकार के जोर और प्रभाव की धमकियां देकर विवश कर रखा है. मुख्यमंत्री जी आप क्यों इस क़ाइय्याँ व्यक्ति को बार बार बचा रहे हैं. आप इस आमदार को जितना ईमानदार समझते हैं ना वो उतना ईमानदार हैं नहीं. नांदेड़ के लोगों का पास खासकर गुरुद्वारा बोर्ड के अन्य सदस्यों के पास उसकी धांधलियों के बहुत से प्रमाण है, समय निकालकर सच्चाई तो परख लीजिए.  फडणवीस साहब आप इस तारा सिंह को शरण देकर श्री गुरु गोबिंद सिंघजी का श्राप मत लीजिये. जिन्होंने भी गुरु महाराज जी का श्राप पाया है उनका क्या नुक्सान हुआ हैं ये आपको नांदेड़ के भाजपा नेतागण उदाहरण के साथ समझा सकते हैं. 
ठीक हैं, आप इस तारा सिंह का लाड और लालन - पोषण जारी रखिये, हम फिलहाल संयम रखेंगे और इसका जवाब भाजपा २०१९ के चुनावों में देंगे. हम समर्थ है. आपके नांदेड़ के दो से तीन सौ भाजपा कार्यकर्ता नांदेड़ दक्षिण और उत्तर आपको जीत नहीं दिला सकते ये बात आपके हृदयपटल पर में सजा लीजिये. इसलिए नांदेड़ की धार्मिक संस्था सिखों के हवाले कीजिये आपकी साख रह रह जाएगी. अच्छे प्रशासन और अच्छे ईमानदार नेताओं के हम दिल से कायल है लेकिन ये तारा सिंह जो कर रहा है उससे आपके प्रति नांदेड़ के सिखों के दिलों में व्याप्त सम्मान की भावनाएं इस समय दांव पर लगी हुई हैं. 
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शनिवार, 28 जुलाई 2018

तारा सिंह की सराहना होनी चाहिए 

रविंदर सिंह मोदी 
भारतीय जनता पार्टी के विधायक तारा सिंह की सचमुच सराहना की जानी चाहिए कि वह सही मायने में असली नेता है और दांव - पेच में उसका कोई सानी नहीं हैं. तारा सिंह में किसी को भी झिड़ककर दूर कर देने और जरुरत पड़ी तो उसको बाप बनाकर गोदी में बिठा लेने की महान कला अंतर्भूत हैं. ऐसी कला अनुभव से और उम्र घिसने के बाद अवगत होती है. तारा सिंह अनुभवी है, साठ सालों से वह आरएसएस, जनसंघ और बाद में भाजपा से जुड़ा हुआ हैं. नगर सेवक से विधायक तक पहुंचा हैं. तीन बार चुनकर आया है फिर भी उसने भाजपा सरकार से मंत्रिपद नहीं लिया हैं. उसने बस हजूर साहिब गुरुद्वारा की सत्ता मांगी और उसकी झोली में वो आ गिरी. क्योंकि मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रालय के दरबान तक सभी को झुककर सजदा करने की शिद्दत इस नेता में है. 
इस हुनरबाज नेता की दबंगाई तो देखों कि संगत और मेंबर साहिबान के विरोध के बावजूद उसने गुरुद्वारा सचखंड हजूर साहिब मंडल (बोर्ड) की मीटिंग मुंबई के खालसा कॉलेज में लेकर हजूर साहिबवालों को बड़ी टक्कर दी है. यही नहीं बोर्ड के सेक्रेटरी पद से भागिन्दर सिंह घड़ीसाज और प्रवक्ता पद से सरजीत सिंह गिल को हटाकर उसने ये जता दिया कि किसी को "यूज़ एंड थ्रो" कैसे करते हैं. अब तारासिंह के हाथ वोही पुरानी सामग्री है देखें कब तक उसका वह "यूज़" करता है. और जिन्होंने उसे सहायता की है वे तारा सिंह का कैसा "यूज़" करते हैं. 
तारा सिंह सचमुच मास्टर आदमी है. उसके पास लोगों को पास बुलाने और दूर भगाने का खूब हुनर है. सौदेबाजी और सांठगांठ में वो सचमुच सभी का बाप कहलाता है. उदहारण के लिए, उसने कुछ समय पहले शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के चार मेंबर साहिबान को बोर्ड के मेंबर पद से बर्खास्त करने की सरकार से सिफारिश की थी. देखिये शिरोमणि के वो मजबूर मेंबर कैसे दौड़े - दौड़े उसकी मीटिंग पूरी करने के लिए पहुँच गए. 
सचमुच तारा सिंह बहुत काबिल आदमी हैं. उसकी काबिलियत ऐसी है कि वो कह रहा है कि मैं भाजपा सरकार का विधायक हूँ, सरकार के किसी निर्णय के खिलाफ मैं जा नहीं सकता. इसलिए समय देखकर मुख्यमंत्री से निवेदन करूँगा कि वे एक्ट में संशोधन ना करे.  यह संशोधन प्रस्ताव आया कहा से? उस विषय को वो बड़ी काबिलियत से छुपा गया. 
महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में विधान सभा के सत्र में गुरुद्वारा तखत सचखंड श्री हजूर अपचलनगर साहिब बोर्ड कानून १९५६ में संशोधन करने का निर्णय लिया था और उसे विधान सभा का नागपुर सत्र में लाया भी था कि  निर्णय करे. लेकिन चर्चा हो नहीं पाई. महाराष्ट्र सरकार को शायद ख्याब आया था कि जबरन गुरुद्वारा बोर्ड में बाहर के छह मेंबर बढ़ा दिए जाये.  तारा सिंह के नाम से स्पष्ट प्रस्ताव हैं कि कोरम पूरा करने करने लिए उसे छह मेंबर की जरुरत हैं. लेकिन वो बड़ी कुशलता से संगत को यह दर्शाना चाह रहा हैं कि मैंने जत्थेदार साहिब और पंजप्यारे साहिबान के पत्र का सम्मान कर संशोधन ना हो यह कोशिश कर रहा हूँ.  हैं न ये काबिल आदमी ? इस काबिल आदमी ने अपनी मीटिंग का कोरम पूर्ण करने के लिए उनको पास बुला लिया जिनको बोर्ड के सेक्रेटरी पद से हटा दिया था। उन्हें दुबारा बुलाकर सेक्रेटरी बनाकर तारा सिंह ने सभी काबिल लोगों को अपने पास एकत्रित कर लिया हैं. 
तारा सिंह सचमुच गुणी नेता है. बाहर भले ही वो अपने काम निकलवाने के लिए "साम दाम दंड भेद " अच्छे से उपयोग करता है. लेकिन नांदेड़ में चल रहे आंदोलन को दबाने के लिए शिवसेना के बड़े नेताओं से स्थानिक शिवसेना पदाधिकारियों से फ़ोन करवाता है. तारा सिंह भाजपा का ईमानदार नेता है देखिये गुरुद्वारा बोर्ड में कैसे सिर्फ कांग्रेस की मंडली को लेकर कुशल राजनीति कर रहा है. पता नहीं वो अपनी कुशलता से कब गुरुद्वारा बोर्ड का अधिग्रहण भी करवा दे और हमारे छोटे पदों की लालच में उसका साथ दे दे. 
ऐसे होनहार तारा सिंह की आज सराहना करने को मन कर रहा है. हजूर साहिब लोगों को यह बहुत कुछ सिखा सकने का मादा रखता है. जिनको नैतिकता के आधार पर कुछ हासिल नहीं हो रहा हैं वे तारा सिंह से सबकुछ सिख सकते हैं. यदि आपको गुरु घर का सरकारीकरण करवाना है तो उसकी भी कला तारा सिंह को अवगत है. आपके बार जब तारा सिंह मिले तो उससे इन गुणों के बारे में जरूर पूछियेगा. उससे यह भी पूछिएगा कि भाई बगैर अमृत छके भी तू अपनी मूछों को इतने अच्छे से ताव कैसे देता है? तारा सिंह से बहुत कुछ सीखा जा सकता हैं. अब नए स्टूडेंट उससे क्या सिखते हैं यह उनपर निर्भर करेगा. 

१९८४ के सिख विरोधी दंगों पर राजनाथ सिंह का बयान दुर्भाग्यपूर्ण
भीड़तंत्र की आड़ में दोषी कांग्रेसियों को बचाने की कोशिश
रविन्दरसिंघ मोदी
हजूर साहिब नांदेड़ - केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का १९८४ के सिख विरोधी दंगों पर जारी किया गया बयान दुर्भाग्यपूर्ण है. ये बयान भी उन दंगों की तरह ही सिख विरोधी प्रतीत हो रहा है. दिल्ली और उत्तर भारत में ३४ साल पहले सिखों को निर्दयता के साथ मार डाला गया था, सिख महिलाओं और बच्चियों पर सामूहिक अत्याचार किया गया था. मासूम छोटे बच्चों को निर्दयता से कत्तल किया गया था. तीन से चार दिन चलें दंगों में पुलिस ने कुछ नहीं किया था. दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार दंगें देखते रहे थे. क्योंकि वो सब एक भीड़ कर रही थीं? भीड़ में यदि कांग्रेसी शामिल नहीं थे तो कौन था? 
यहां एक व्यक्ति की भी हत्या हो जाती है तो पुलिस छानबीन कर किसी न किसी तरह से कातिल तक पहुँच जाती है. दिल्ली में तो हजारों मार डाले गए. दिन और रात चार दिनों तक दंगे चलते रहें सरकार और पुलिस दोनों भी कुछ नहीं कर पाएं. बहुत सी जाँच समितियां बिठाई गई. पर उन कांग्रेस नेताओं के ख़िलाफ़ कोई करवाई नहीं हुई. अब जबकि लग रहा था कि इन्साफ होनेवाला हैं तो देश के गृह मंत्री स्वयं बयान देकर एक तरह से न्याय पालिका को छुप्पा निर्देश दे रहे हैं कि मामला भीड़ पर छोड़कर कांग्रेस नेताओं को क्लीन चिट बहाल कर दी जाएं. क्या अटल बिहारी वाजपेयी साहब से इसी तरह की राजनीति का पाठ पड़ा है क्या? 
केंद्रीय गृह मंत्री के बयान में दिल्ली के उस सिख समूह को भी एक तरह से चेतावनी ही दी गई हैं कि यदि आनेवाले चुनावों में भाजपा के साथ नहीं आओगे तो आगे मुश्किल होगी. संदेह हो रहा है कि भाजपा ने दिल्ली को भाजपामय बनाने के लिए एक तरह से साँठगाँठ की है. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के पहले देश की संसद ने एक तरह से सिखों के कातिलों को निर्दोष करार दे दिया हैं. सिखों को ना कांग्रेस रास आई और ना भाजपा! 

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

राजनीति प्रिय सिख युवा और प्रगति की बाधाएं  
रविंदर सिंघ मोदी 

भारत देश में राजनीति क्षेत्र अधिकतर लोगों के आकर्षण और उत्सुकता का विषय हैं. विशेषकर युवा वर्ग का एक बड़ा प्रमाण राजनीति क्षेत्र में गहरी उत्सुकता रखता दिखाई दे रहा हैं. पिछले सात से आठ वर्षों में देश में जितने बड़े आंदोलन हुए उसमें भी युवा वर्ग सबसे अग्रणी रहा था. हमारे देश में राजनीति में सक्रिय होने के लिए जातीय आधार भी बहुत मायने रखता हैं. जिस जाति की जनसंख्या का प्रमाण ज्यादा होता है वहां राजनीतिक संभावनाएं भी अधिक होती है. जिन जातियों की जनसंख्या का प्रमाण कम होता है उन जातियों के नागरिकों को राजनीति में सक्रिय होने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता है. परिश्रम का फल कभी मिलता है और कभी नहीं. इस कारण राजनीति एक व्यवसाय हो गई है. राजनीति अंतर्गत सेवाभाव केवल दिखावा मात्र रह गया हैं. 
वर्तमान में २० करोड़ से अधिक लोक राजनीतिक दलों के सदस्य के रूप में सक्रिय हैं. भाजपा के लिए देश में ११ करोड़ से ज्यादा सदस्य कार्यरत है. कांग्रेस पार्टी के सदस्यों की संख्या भाजपा से आधे से भी कम यानी ३ करोड़ ५० लाख के आसपास होने की सम्भावना हैं. अन्य राष्ट्रिय राजनीतिक दलों के समर्थक भी लाखों या करोड़ में बताये जाते हैं. लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि जिस पार्टी की सरकार सत्ता में होती हैं उनकी सदस्य संख्या बढ़ सी जाती हैं. दलबदलू कार्यकर्ता और नेता हर एक पार्टी में होते हैं. भाजपा पार्टी में भी बाहरी दलों से आये नेता और कार्यकर्ताओं संख्या  आश्चर्यकारक हैं. भाजपा में इस समय आधे से ज्यादा लोग बाहर के यांनी कांग्रेस के दिखाई दे रहे हैं. 
इतनी बड़ी कार्यकर्ता संख्या में लोकसभा के लिए केवल ५४५ लोग सांसद बनकर चुनकर आते हैं. वही अलग - अलग राज्यों से विधायक के रूप में चुनकर आनेवाले भी हजारों में होते हैं. शेष करोड़ों लोग कार्यकर्ता के रूप में अपना दायित्व निभाते हैं. कुछ खुशनसीब मंडलों में, महामण्डलों में, स्वीकृत सदस्य के रूप में स्थापित किये जाते हैं लेकिन स्थापना का दारोमदार भी जाति के अनुपात पर निर्भर रहता हैं. 
भारत में सिखों का अलग राज्य है. पंजाब के नाम से हम उसे जानते हैं. पंजाब सहित पुरे देश में सिख समुदाय की जनसंख्या दो करोड़ के लगभग है. जनसंख्या का अल्प प्रमाण ही सिखों की राजनीति में पिछड़े होने का सबसे बड़ा कारण माना जाता है और जातीय समीकरणों के चलते उपर्युक्त तथ्य सही भी है. महाराष्ट्र में सिखों की जनसंख्या तीन लाख से कुछ ऊपर है. नांदेड़ जिले में कितनी है उसका उत्तर मैं देना नहीं चाहता. पहला तर्क तो यही है कि, जातीय प्रमाण के समीकरण के चलते ही नांदेड़ जिले में सिख नेता का उभारना, स्थापित होना एक बड़ी मशकत है. दूसरा तर्क होनहार नहीं होना, तर्क रखने में असफल रहना, सही समय पर सही तथ्य न परोसना भी नेताओं की उत्पत्ति नहीं होने का बड़ा कारण है. तिसरा तथ्य प्रामाणिक कार्य नहीं करना और समय पर गुटबाजी और बयानबाजी कर छोटे विषयों को तूल देना भी नेताओं का विकास रोके हुए हैं. चौथा कारण आगे बढ़नेवाले की टाँग खींचना तथा पाँचवाँ कारण योग्य व्यक्ति का चयन नहीं कर अपने रिश्तेदार और मित्रों का पदों पर चयन करना भी एक रुकावट का प्रमुख कारण है. छठा कारण समर्पण भाव से काम नहीं कर चाटुकारिता और चापलूसी का प्रदर्शन भी प्रगति में बाधक हैं. राजनीतिक विफलता के और भी बहुत से कारण प्रस्तुत किये जा सकते हैं कि क्यों सिख युवकों को राजनीतिक आधार उपलब्ध नहीं हो पाता हैं. 
सिख नवयुवकों में सबसे बड़ी कमी विचारों का अनुग्रहण नहीं करना हैं. विचारों और आदर्शों की तुलना का उनके पास समय और ना ही कोई हुनर है. वर्तमान समय में राजनेता और राजनीति का स्तर क्या होना चाहिए इस विषय में कोई भी विचार नहीं कर पाता. गुटबाजी को फ़ौरन स्वीकृति मिल जाती है. ग़लत धरना पालने की कला अधिकतर नवयुवकों में दिखाई देती हैं. सिख युवकों को तो जैसे गुटबाजी का अभिशाप ही मिला हुआ हैं. कौम और समाज के लिए भी कार्य करना है तो सौ कारण प्रस्तुत हो जाते हैं. युवकों के दिलों में जिन नेताओं की धारना घर कर बैठी हुई है उसके आगे कौम और समाज के लिए होने चाहिए वो सारे योगदान फीके पड़ जाते हैं. आपके गल्ली के नेता ने कह दिया तो आपके लिए वो बात जैसे जीवन-मरण वाली बात हो गई. समाज खड्डे में भी जाये, आपका धर्म संकट में भी पड़ जाये तब भी युवकों में राजनीतिक प्रेरणा ही अधिक कार्य करती हैं. धार्मिक और सामाजिक चेतना से अधिक राजनीतिक चेतना सक्रिय होना सिख समाज की राजनीतिक उन्नती में भी सेंध लगाती है. 
इसी कारण सिख युवकों को न राजनीती क्षेत्र में दिशा में मिल रही है और न धर्म के लिए योगदान करने के लिए ही कोई प्रेरणा मिल रही हैं. हम अज्ञान को आगे रखना चाह रहे हैं और अज्ञान ही हमारे सिख युवकों का मार्गदर्शन कर रहा हैं. यही उदहारण पंजाब में दिखाई देने लगा हैं लेकिन वहां जातीय समीकरण ने अभी तक सिखों का नेतृत्व खड़ा रखा हैं. लेकिन महाराष्ट्र में तो सिखों के पास नेतृत्व ही नहीं हैं. सिखों के पास राजनितिक पद भी नहीं हैं. सिखों का कोई मंत्री नहीं है. एक विधायक है लेकिन उसका झुकाव सिक्खी में नहीं बल्कि हिंदुत्व में होने से वो हमारे किसी काम का नहीं. महाराष्ट्र में पैदा हुए सिख आईएएस या आईपीएस कैडर में भी नहीं हैं. प्रसाशनिक पदों पर भी सिख अधिकारी नहीं हैं. ऐसे में सिख युवकों का राजनीति में सक्रिय रहना एक छलावा मात्र है. दस से बीस साल के राजनीतिक जीवन में भी हमारे सिख युवक किसी गल्ली के नेता के कार्यकर्ता से अधिक पहचान नहीं बना पाते हैं. राजनेताओं तक उनकी सीधी पहुँच नहीं बन पाती हैं. 
क्यों? क्यों स्थापित नहीं होते सिख युवक? राजनीति प्रिय होने के बावजूद भी वो सिख युवकों का व्यवसाय नहीं बन पाने के कारणों पर जब तक निष्पक्ष चिंतन नहीं किया जाता तब तक राजनीतिक क्षेत्र सिख युवकों को स्थापित नहीं कर सकता यह मेरा यक्तिगत अनुभव हैं. मैंने पत्रकारिता के माध्यम से समाज को भी जाना, राजनीति को भी जाना, राजनीतिकों को भी जाना और कुछ कुछ हमारे युवा वर्ग को जाना हैं. मेरे अकेले के चिंतन करने में कोई अर्थ नहीं रह जाता. मेरी राय हैं कि यह एक सामूहिक चिंतन का विषय है. चिंतन का दायरा व्यापक होना चाहिए. युवकों के हर गुट, हर समूह में इस विषय पर चिंतन होना चाहिए. ये चिंतन आपकी अपनी मानसिकता से होना चाहिए किसी अन्य के प्रभाव से इस तथ्य का चिंतन ईमानदारी नहीं होगी. यदि चिंतन की करने की आपकी तैयारी है तो मेरी भी सामूहिक चिंतन की तैयारी है. कभी ना कभी तो विषय  निरपेक्ष चिंतन होना ही चाहिए. आगे युवा वर्ग की मर्जी. 

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रविंदर सिंह मोदी 

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